ऐपण : उत्तराखण्ड की लोक चित्रकला

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प्रमोद प्रसाद, इतिहास विद्यार्थी, नैनीताल। ऐपण या अल्पना एक लोक चित्रकला है। जिसका कुमाऊँ के घरों में एक विशेष स्थान है। ये उत्तराखण्ड की एक परम्परागत लोक चित्रकला है। यह चित्रकला उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र से सम्बन्धित है। ऐपण शब्द संस्कृत के शब्द अर्पण से व्युत्पादित है। ऐपण का वास्तविक अर्थ है लिखायी या लिखना। ऐपण मुख्यतः तीन अंगुलियों से लिखा जाता है। कुमाऊँ का कोई भी त्यौहार और धार्मिक अनुष्ठान ऐपण के बिना अधूरा माना जाता है। कुमाउनी महिलाएं सभी धार्मिक अनुष्ठान व त्यौहारों की शुरुआत अपने आँगन में ऐपण बना कर करती हैं। ऐपण त्यौहार, पूजा और बहुत से अवसर जैसे जन्म, विवाह, जनेऊ और कुछ कारण मे मृत्यु में भी बनाये जाते हैं। ऐपण में बहुत से ज्यामिती रेखा आरेख व देवी-देवताओं के चित्र प्रयोग कर एक सुन्दर रूप दिया जाता है। ऐपण दीवारों व कपड़े आदि में बनाये जाते हैं।

ऐपण संबंधी चित्र:

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ऐपण गेरू व बिस्वार से बनाया जाता है। गेरू सिंदूरी रंग की मिट्टी होती है जिसे भिगो कर उस स्थान पर रंगा जाता है जहाँ ऐपण बनाना होता है। गेरू से रंग कर ऐपण का आधार तैयार किया जाता है। फिर उसके ऊपर से बिस्वार जो रात भर भिगो कर पिसे गये चावल या चावल के आटे से तैयार एक घोल होता है, से कलात्मक चित्रों के रूप में बनाया जाता है।
महिलाएं अपनी पुत्री और बहू को ऐपण सिखाती हैं जिससे यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है।  कुमाऊँ क्षेत्र मे मुख्यतः तीन प्रकार के ऐपण देखने को मिलते हैं :
सिद्धू- इस प्रकार के ऐपण आँगन व चौकियों में बनाये जाते हैं।
दाविया- यह एक प्रकार का पट्टा होता है, जिसमें ज्योतिषीय आकृतियां होती हैं।
लौकिका- यह एक प्रकार की बार बूंद शैली है, जो दीवारों में लिखी जाती है।
जगह के अनुसार ऐपण को चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है:
जमीन चित्रकला- यह दो श्रेणियों में विभाजित है। पहली जो देहली में लिखी जाती है। इसमें फूल और लताऐं होती हैं। दूसरा जो पूजा स्थल मे बनाये जाते हैं। जैसे शिव पीठ, लक्ष्मी पीठ व आसन आदि।
दीवार चित्रकला- यह चित्रकला दो भाग में विभाजित होती है। पहली रसोई में (नाता और लक्ष्मी नारायण), दूसरी जहाँ धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं।
कपड़े में- कुछ ऐपण कपड़े में भी बनाये जाते हैं जैसे खोड़िया चौकी पिछौड़े में और शिव पीठ, पीले कपड़े में बनायी जाती है। इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठान में किया जाता है।

लकड़ी की चौकी- ये उपासना आसन होते हैं जो देवताओं के लिए और विभिन्न अवसरों में प्रयोग किये जाते हैं।
आकार और रूप के अनुसार ऐपण का वर्गीकरण:
नव दुर्गा चौकी- यह चौकी देवी पूजन के लिए प्रयोग की जाती है। यह तीन क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रेखा के चित्रों द्वारा बनायी जाती है जिसके मध्य स्वातिक का चिन्ह बनाया जाता है। इस चौकी की मुख्य बात यह है कि इसमें नौ बिन्दु होते हैं, जो नौ दुर्गाओं को प्रदर्शित करते हैं।
आसन चौकी- यह बहुत से अवसर में प्रयुक्त होती है। यह चौकी का एक जोड़ा होता है जो उपासक और उसकी पत्नी के लिये होता है ।
चामुंडा हस्त चौकी- यह चौकी हवन और योग के लिए प्रयुक्त होती है। इसमें दो त्रिकोणों और दो विकर्ण लाइनें एक साथ जुड़ी होती हैं, जिनके मध्य एक सितारा होता है, जो एक वृत्त से बंद होता है। इनके मध्य के रिक्त स्थान में फूल या लक्ष्मी के पैर बनाये जाते हैं। इसका मध्य भाग अक्सर आठ कमल कि पंखुड़ी से सजाया जाता है।
सरस्वती चौकी- सरस्वती विद्या की देवी है। जब एक बच्चा औपचारिक शिक्षा के तैयार होता है, तब उसकी अच्छी शुरुआत के लिए एक पूजा का आयोजन होता है। इस पूजा का मुख्य बिन्दु सरस्वती चौकी होती है। इसमें एक सितारा होता है, जिसके पाँच कोने होते हैं, जिसके मध्य स्वास्तिक फूल या दिया बना होता है।
जनेऊ चौकी- यह चौकी जनेऊ संस्कार के लिए प्रयुक्त होती है। इसके मुख्य अनुभाग में छह पक्षीय चित्र के भीतर सात सितारे होते हैं जो सप्त ऋषि को प्रदर्शित करते हैं।
शिव या शिवचरण पीठ- शिव की पूजा मुख्यतः सावन और माघ के महीनों में की जाती है। इस पीठ में आठ कोनों का डिजाइन होता है जो बारह बिन्दु और बारह लाइन से जुड़ा होता है।
विभिन्न अवसरों के अनुसार ऐपण का वर्गीकरण:
जन्म के लिए विशेष प्रकार कि चौकी बनायी जाती हैं।
सूर्य दर्शन चौकी- यह चौकी नामकरण समारोह में काम आती है। ग्यारह दिनों तक नए जन्मे बच्चे को अंदर रखा जाता है। ग्यारहवें दिन सूर्य दर्शन के लिए बच्चे को बाहर लाया जाता है। यह चौकी आँगन में बनाई जाती है जहां पंडित मंत्र पढ़ते हैं।
स्यो ऐपण- यह एक ज्यामिती नमूना होता है, जो बच्चे को बुरी आत्माओं से बचाता है। यह बच्चे के जन्म के ग्यारह दिन में बनायी जाती है।
शादी- विवाह संस्कार के अवसर पर तीन प्रकार की चौकियां बनायी जाती हैं। शादी के ऐपण हल्दी, सिन्दूर और चारकोल से बनाये जाते हैं।
आचार्य चौकी- विवाह संस्कार में पंडित या आचार्य के लिए एक विशेष चौकी बनाई जाती है। इसमें एक स्वास्तिक लाल रंग के साथ बनाया जाता है। साथ ही कमल और अन्य शुभ प्रतीकों जैसे घण्टी, शंख और कभी-कभी दो तोते स्वास्तिक के आसपास चित्रित किये जाते हैं।
विवाह चौकी- यह विवाह के लिए प्रयुक्त होती है जो दूल्हे की ओर से उपलब्ध करायी जाती है। यह पीले रंग कि होती है जिसमें कमल की पंखुड़ी और दो तोते बने होते हैं।
धूलि अर्ध्य चौकी- यह चौकी मुख्यतः दुल्हे के दुल्हन पक्ष के द्वारा स्वागत के लिए बनायी जाती हैं। पूर्व में दूल्हा सायं-गोधूलि के समय पर ही विवाह स्थल पर पहुँचता था। दूल्हा नारायण का रूप माना जाता है इसलिए दुल्हन के पिता पूजा से पूर्व उसे धूलि अर्घ्य चौकी में खड़ा कर उसके पैरों को धुलाते हैं।
ज्योति पट्टा- कुमाऊं मे विशेषतः ब्राह्मण और साह परिवारों के मध्य इसका प्रचलन है। यह उस कमरे की दिवार में बनायी जाती हैं जहाँ धार्मिक समारोह होते हैं। ज्यूनीत इसका स्थानीय नाम है। ये निम्नलिखित हैं: महा मात्रिका, महा लक्ष्मी, महा सरस्वती और महा काली।
त्यौहार के अनुसार ऐपण :
दुर्गा थापा- यह कुमाऊँ कि महिलाओं के द्वारा कागज में बनाया जाता है, जो काफी कठिन होता है। इसमें माँ दुर्गा शेर के साथ होती हैं। इसमें और भी स्थानीय देवी-देवता होते हैं।
लक्ष्मी यंत्र- यह दिवाली में उस स्थान पर रखा जाता है जहाँ माँ लक्ष्मी की पूजा होती है।
जन्माष्टमी पट्टा- यह मुख्यतः कृष्ण के जन्मदिन-जन्माष्टमी पर उनकी पूजा हेतु बनाया जाता है।
ऐपण चित्रकला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सिखायी जाती है पर नवीनीकरण, पलायन और संयुक्त परिवार ना होने के कारण यह अपना स्थान खो रही है।

यह भी पढ़ें : यहां अजरा, आसना, ईरम, आयशा व बीना कौर ने सीखा ऐपण से लक्ष्मी, गणेश व दुर्गा चौकियां बनाना

-ऐपण बनाने वाली महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने में मदद करें बैंक: डीएम

ऐपण की प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रतिभागियों के साथ डीएम सविन बंसल।

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 दिसंबर 2019। नैनीताल में डीएम सविन बंसल की अभिप्रेरणा से जनपद की महिला हस्तशिल्पियों एवं बालिकाओं के लिए जिला कार्यालय में आयोजित तीन साप्ताहिक विशेष नवाचारी कौशल वृद्धि कार्यक्रम में सर्वधर्म संभाव की झलक देखने को मिली। ऐपण प्रशिक्षण में मुस्लिम समाज की अजरा परवीन, आसना, ईरम, आयशा, पंजाबी समुदाय की बीना कौर ने प्रशिक्षक अशरफ जहां व मंजू रौतेला, जानकी बिष्ट आदि से कुमाऊं की पारंपरिक लोक कला ऐपण के माध्यम से श्री गणेश चौकी, दुर्गा चौकी, लक्ष्मी चौकी आदि बनाने का प्रशिक्षण लिया।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन अवसर पर संबोधित करते हुए डीएम बंसल ने कहा कि हमारी संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली ऐपण कला महिलाओं को रोजगार से जोड़ कर उनकी आर्थिकी मजबूत कर सकती है। उन्होंने महाप्रबन्धक उद्योग को निर्देश दिए कि वह ऐपण प्रशिक्षार्थियों का पीएमईजीपी व महिला उद्यमिता विकास योजना में पंजीकरण करते हुए स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बैंक से लिंक कराए ताकि प्रशिक्षणार्थी अपने लघु उद्योग प्रारंभ कर सकें। उन्होंने कहा कि महिला उद्यमियों द्वारा तैयार किए गए ऐपण को विपणन हेतु बाजार उपलब्ध कराने के लिए जनपद के विभिन्न स्थानों पर आउटलेट उपलब्ध कराये जायेंगे। इसके अलावा माल रोड सहित पर्यटकों की अधिक चहल-कदमी वाले शासकीय कार्यालयों, सूचना विभाग, पर्यटन विभाग, उद्योग विभाग के मुख्य द्वारों पर भी ऐपण का प्रदर्शन किया जाएगा। उन्होंने महिलाओं एवं बालिकाओं के ऐपण कला में पूर्ण दक्षता एवं निपुणता हासिल करने के लिए बालिकाओं के लिए अप्रैल-मई माह में 2 माह का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश भी महाप्रबंधक उद्योग जिला उद्योग केंद्र को दिए। इस अवसर पर महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र विपिन कुमार, संजीव भटनागर सहित प्रशिक्षु हंसी, तमन्ना, मान्यता मेहरा, नेहा बिष्ट, विमला रौतेला, कमला चिलवाल, विमला तिवारी, दीपा, हेमा आर्या, दीपिप्त बोहरा हेमा पाण्डे, अंशी नेगी, स्वाति भाकुनी आदि भी मौजूद रहीं।

यह भी पढ़ें : कुमाउनी ऐपण: शक, हूण सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की भी मिलती है झलक

नवीन जोशी, नैनीताल। लोक कलाएं संबंधित क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ ही उस संस्कृति के उद्भव और विकास की प्रत्यक्षदर्शी भी होती हैं। उनकी विकास यात्रा में आने-जाने वाली अन्य संस्कृतियों के प्रभाव भी उनमें समाहित होती हैं इसलिए वह अपनी विकास यात्रा की एतिहासिक दस्तावेज भी होती हैं। कुमाऊं के लोकशिल्प के रूप में ऐपण तथा पट्टालेखन का भी ऐसा ही विराट इतिहास है, जिसमें करीब चार हजार वर्ष पुरानी शक व हूण जैसी प्राचीन सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की झलक भी मिलती है।

पुराणों में मिलते हैं कुमाउनी ऐपण विधा के मूल संदर्भ

कुमाउनी ऐपण विधा के मूल संदर्भ पुराणों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए विवाह के अवसर पर प्रयुक्त की जाने वाली धूलिअर्घ्य चौकी का पूरा विवरण शिव पुराण और विष्णु पुराण में अनुग्रह यंत्र के रूप में मिलता है। वहीं इस विधा पर सबसे पुरानी पुस्तक अल्मोड़ा में शिक्षक रहे नाथू राम जी की बताई जाती है। यहां नैनीताल में ऐपण विधा को बचाने के प्रमाणिक प्रयास 1971 में शारदा संघ संस्था के द्वारा कार्यशाला एवं प्रतियोगिताएं आयोजित करने के रूप में हुए। इन कार्यशालाओं में किशोरियों-युवतियों को ऐपण विधा को उनके मूल स्वरूप में बनाना सिखाया जाता था। जैसे लक्ष्मी चौकी में मूलतः दो त्रिभुजों का आपस में मिला कर एक तारा बनाया जाता है। यह दो त्रिभुज प्रकृति एवं पुरुष के संयुक्त रूप के द्योतक हैं। साथ ही लक्ष्मी के पैर बनाए जाते हैं। वहीं सरस्वती चौकी भी कमोबेस लक्ष्मी चौकी जैसी ही बनाई जा सकती है, किंतु उसमें लक्ष्मी के पैरों की आकृति नहीं बनाई जाती है। नव दुर्गा की चौकी नौ स्वास्तिक निसानों के साथ बनाई जाती है। इसी तरह शिव की पीठ आठ बिंदुओं के वर्ग के भीतर द्वि ज्यामितीय (2 Dimensional) आधार पर शिव को स्थापित किया जाता है, जोकि त्रि ज्यामितीय (3 Dimensional) अनुभव करने पर यह चार द्वारों से युक्त वेदी पर शिव के लिए आसन जैसा नजर आता है। शिव चौकी में बेदी के बाहर की ओर अष्ट कमलों की आकृति भी बनाई जाती है, जिन्हें आठों दिशाओं के दिग्पालों को आह्वान कर अवस्थापित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। कुमाऊं में परंपरागत तौर पर तंत्र आधारित पूजा पद्धतियों का प्राविधान है, जिनमें अलग-अलग देवताओं का आह्वान करते समय उन्हें आसन देने के लिए खास तरह की ऐपण चौकियां बनाई जाती हैं। इस तरह यह समझना भी आवश्यक है कि ऐपण केवल एक लोक कला नहीं वरन कुमाऊं अंचल में होने वाली तांत्रिक पूजा (ॐ  एँ ह्रीं क्लीं प्रकार की) में देवगणों-देवियों का आह्वान कर उन्हें आसन देने के लिए प्रदान की जाने वाली चौकियां हैं।  शिव व विष्णु पुराण सहित अनेक पुराणों में भी इन चौकियों का वर्णन आता है। तिब्बत में भी इसी तरह की जमीन पर विशाल आकार की ‘किंखोर” कही जाने वाली चौकियां बनाई जाती हैं।

1971 में ऐपण विधा के समाप्त होने का अंदेशा होने पर शारदा संघ के संस्थापक सदस्य के रूप में चंद्र लाल साह ने ऐपण प्रतियोगिता की शुरुआत की थी। बीते करीब डेढ़ दशक से शारदा संघ की प्रतियोगिता समाप्त हो गई, इसके बाद उनके पुत्र राजेंद्र लाल साह ने चंद्र लाल साह मेमोरियल सोसायटी के तहत वृंदावन स्कूल शुरू होने पर 2010 में अंतर विद्यालयी ऐपण प्रतियोगिता शुरु की।

उल्लास को प्रकट करते हैं ऐपण

त्योहारो, पर्वों तथा मानव जीवन के विभिन्न शुभ-संस्कार अवसरों पर कुमाउनी महिलाओं का उल्लास अलंकार आलेखन-ऐपण के रूप में प्रकट होता है। सुबह स्नानोपरांत महिलाएं लाल, गाढ़ी मिट्टी एवं गोबर से घर की लिपाई करती हैं। रसोईघर की लिपाई हर रोज भोजन तैयार करने के बाद नियमपूर्वक की जाती है। दीवारों एवं द्वार पर ऐपण के रूप में पांच, सात अथवा नौ के समूह में अंगुलियों से खड़ी लकीरें बनाई जाती हैं, जिन्हें वसुधारा कहा जाता है। घर के देवस्थान में बनी वेदी की लिपाई कर उसे सुंदर ऐपण-आलेखनों से सजाया जाता है। ऐपण तथा आलेखन के लिए पहली शाम से भीगे चावलों को सिल-बट्टे पर पीस कर और पानी में घोल हल्का गाढ़ा ‘विश्वार’ बनाया जाता है। नवागत शिशु को सूर्य दर्शन कराने पर सूर्य चौकी, छठी एवं नामकरण संस्कार पर लकड़ी की चौकी को लाल मिट्टी से लीप कर से विश्वार से ऐपण बनाकर ‘जनमबार चौकी’ बनाई जाती है। इसी तरह उपनयन, विवाह और आखिरी अंतिम संस्कार में भी संस्कार करने की भूमि को पवित्र करने के लिए लिपाई और आलेखन किया जाता है।
रक्षाबंधन एवं उपनयन संस्कार पर ‘उपनयन चौकी’ बनाने का प्राविधान है। विवाह पर पूजा स्थल में वर अथवा वधू के माता-पिता यानी यजमान दंपति के बैठने के लिए ‘दोहरी चौकी’, कन्या पक्ष के आंगन में वर के स्वागत के लिए ‘धूलिअर्घ्य चौकी’, देव पूजन एवं गणेश पूजन के लिए ‘विवाह चौकी’, कन्यादान के लिए बेटी के वस्त्राभूषण रखने के लिए ‘कन्यादान चौकी’, तथा वर एवं आचार्य के लिए पीले रंग की चौकी में विभिन्न रंगों के आलेखन होते हैं। इस मौके पर चौकी को कच्ची हल्दी से रंगकर रोली (पिठ्यां) के रंग से महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, गणेश, सूर्य, चंद्रमा, सोलह मात्रिका देवियों, पांच बेल-बूटे एवं हिमालय के प्रतीकों से युक्त मातृका चौकी भी बनाई जाती है। बेल-बूटे, बरगद का पेड़, अष्टकमल, दो तोते तथा बीच में राधा कृष्ण, सूर्य, चंद्रमा, शिव के प्रतीक सांप व 15 से 25 कर बिंदुओं (भित्ति चित्रों) से युक्त ज्योति पट्टा, बनाया जाता है। दीपावली पर शुभ लक्ष्मी चौकी तथा घर के बाहर से लेकर प्रत्येक द्वार से होते हुए हर कमरे और खासकर मंदिर तक माता लक्ष्मी के पग बनाए जाते हैं। गोवर्धन पूजा पर ‘गोवर्धन पट्टा’ तथा कृष्ण जन्माष्टमी पर ‘जन्माष्टमी पट्टे’ बनाए जाते हैं। नवरात्र में ‘नवदुर्गा चौकी’ तथा कलश स्थापना के लिए नौ देवियों एवं देवताओं की सुंदर आकृतियों युक्त ‘दुर्गा थापा’ बनाया जाता है। इसके अलावा भी महिलाएं प्रत्येक सोमवार को शिव व्रत के लिए ‘शिव-शक्ति चौकी’ बनाती हैं। सावन में पार्थिव पूजन के लिए ‘शिवपीठ चौकी’ तथा व्रत में पूजा-स्थल पर रखने के लिए कपड़े पर ‘शिवार्चन चौकी’ बनाई जाती है। वहीं इतिहासकारों के अनुसार कुमाउनी लोक कला ऐपण एवं भित्ति चित्रों में ईसा से करीब दो सहस्त्राब्दि पूर्व कुमाऊं के मूलवासी रहे हूण एवं शकों की संस्कृति के साथ ही राजस्थान, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार एवं तिब्बत के भी कुछ प्रभाव दिखते हैं। साथ ही इस कला में यहां के लोगों की कलात्मक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी होती है। वीणा की लहरों, फूल मालाओं, सितारों, बेल-बूटों व स्वास्तिक चिन्ह में समरूपता से इनमें तांत्रिक प्रभाव भी दृष्टिगोचर होते हैं। साथ ही अलग-अलग प्रकार के ऐपण तैयार करते समय के लिए अनेक मंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है, तभी ऐपण आलेखन का अभीष्ट पूर्ण होता है।

डा. यशोधर मठपाल की कुमाउनी लोक चित्रकारी

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