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उत्तराखंड के 43.17 फीसद लोगों ने किया पलायन ! दूसरे प्रदेशों के 12.5 लाख से अधिक लोग यहां आ गये..

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-पलायन करने वालों में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2019। राज्य ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के हालिया आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड  में 43.17 प्रतिशत लोग पलायन करके एक जगह से दूसरी जगह जा बसे हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की जनसंख्या एक करोड़ 86 हजार 292 है। पलायन आयोग के सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश के 43.17 लाख लोगों ने खुद को पलायन करके आया हुआ बताया। इनमें से भी अधिकांश यानी करीब 70 फीसद यानी 29.83 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे गांवों से पलायन करके शहरों में आये। जबकि आधे लोगों ने अपने ही जिले के भीतर पलायन किया। वहीं केवल 14 प्रतिशत लोगों ने ही कहा कि उन्होंने नौकरी की तलाश में पलायन किया, जबकि दो प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने बेहतर शिक्षा के लिए पलायन किया। पलायन करने वालों में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का है। 66 फीसद महिलाओं के पलायन की वजह विवाह है।

वहीँ, जिलावार पलायन करने कर आने वालों की तादाद देखें तो 70 प्रतिशत लोगों ने गांवों से शहरों में पलायन किया है। पहाड़ से सबसे ज्यादा लोग मैदानी जिलों में पलायन करके बसे हैं। इनमें देहरादून सबसे ऊपर है। यहां 21 फीसद यानी 894455 लोग, ऊधमसिंह नगर में 714252 यानी 17 फीसद, हरिद्वार में 673506 यानी 16 फीसद पलायन करके बसे हैं। बागेश्वर, रुद्रप्रयाग और चंपावत में सबसे कम यानी करीब दो-दो फीसद आबादी पलायन करके आई है। इसके उलट प्रदेश में 12.5 लाख से अधिक लोग दूसरे प्रदेशों से आये हैं। यह प्रदेश की आबादी का करीब 12 फीसद है। इनमें से 8.9 लाख से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश से जबकि 76 हजार से ज्यादा लोग बिहार, 52 हजार से अधिक लोग दिल्ली से आकर बस गए हैं।
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी के मुताबिक प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन एक बड़ी चिंता का विषय है। इसकी असली वजह गांवों में लोगों की कम आय लगती है। प्रदेश में गांवों में अधिकांश लोगों की औसत आय पांच हजार रुपये मासिक है। इसलिए वह रोजगार के नए व बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। उनके मुताबिक प्रदेश सरकार को गांवों में लोगों की आय बढ़ाने के उपाय करने होंगे, तभी इस प्रवृत्ति की रोकथाम की जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि पलायन करने वालों का दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का है। यह उस धारणा से उलट है जिसके तहत कहा जाता है कि रोजगार के अवसरों की तलाश में लोग पलायन करते हैं। डा. नेगी का कहना है कि महिलाओं के पलायन की असली वजह उनकी शादी है। शादी के बाद महिला को अपना घर- गांव यहां तक कि जिला तक छोड़ना होता है। इसीलिए पलायन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है। यानी सव्रेक्षण में 66 फीसद महिलाओं ने अपने पलायन की वजह विवाह को बताया।

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-जिला-मंडल मुख्यालय में पता ही नहीं चल रहा कि चुनाव भी हैं
-अब तक केवल केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह आये हैं पहाड़ पर
-केवल तीन दिन पूर्व ही भाजपा और केवल दो दिन पूर्व ही कांग्रेस का मोहल्लों में शुरू हुआ है चुनाव प्रचार

पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान प्रकाशित समाचार

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 अप्रैल 2019। लोक सभा चुनाव के प्रचार का एक सप्ताह ही शेष है, लेकिन जिला व मंडल मुख्यालय तथा पर्यटन नगरी नैनीताल सहित पहाड़ों पर चुनाव करीब होने का कोई चिन्ह नजर नहीं आ रहा है। अब तक कुमाऊं मंडल के पहाड़ों पर स्टार प्रचारक के तौर पर केवल केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह आये हैं। वहीं मंडल मुख्यालय में चुनाव प्रचार के नाम पर केवल एक दिन पूर्व ही खुले कांग्रेस के और बीते सप्ताह खुले भाजपा कार्यालय के अलावा माल रोड सहित कहीं भी, किसी भी पार्टी का एक भी झंडा, और यहां तक छोटे पोस्टर व बिल्ले भी लगे नजर नहीं आ रहे हैं। अन्य चुनावों की तरह किराये की चुनाव पार्टियां भी इस चुनाव में घर-घर नहीं जा रही हैं। अलबत्ता करीब तीन दिन से भाजपा के कार्यकर्ता स्वयं ही घर-घर जा रहे हैं। इसे पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों को हुए पलायन का जीता-जागता प्रमाण बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पहाड़ की छितरी व बची-खुची आबादी खासकर नैनीता-ऊधमसिंह नगर जैसे आधे पहाड़ व आधे मैदान की लोकसभा सीट पर कोई मायने नहीं रखती है। जीत का असली दारोमदार मैदान में बसे मतदाताओं पर ही है।

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वहीं स्टार प्रचारकों की बात करें तो अब तक कुमाऊं मंडल के पहाड़ों पर स्टार प्रचारक के तौर पर केवल केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह आये हैं। वहीं मंडल मुख्यालय में किसी भी पार्टी के स्टार प्रचारक दूर बड़े नेता भी नहीं आ रहे हैं। केवल अब तक कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत ने तल्लीताल से मल्लीताल तक रोड शो किया है और सोमवार को कांग्रेस विधायक व पूर्व विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल ने नगर के घोड़ेवालों से जनसंपर्क कर पार्टी प्रत्याशी के लिए वोट मांगे वहीं यमकेश्वर से भाजपा विधायक आम जनता से तो नहीं मिलीं अलबत्ता पार्टी की महिला मोर्चा कार्यकर्ताओं में जोश जरूर भरा। आगे सात अप्रैल को भाजपा प्रत्याशी अजय भट्ट के मुख्यालय आने की बात कही जा रही है।

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-32 लाख लोगों के साथ ही मुख्यमंत्री सहित अनेक राजनेता व प्रत्याशी भी कर चुके पलायन

पहाड़ के एक गाँव में पलायन के बाद वीरान पड़ा एक संभ्रांत परिवार का घर और मंदिर

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 26 मार्च 2019। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये करीब 5000 करोड़ रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। वहीं हाल में आई ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 17.4 फीसद शिक्षित युवा बेरोजगार हैं, जो रोजगार न मिलने की स्थिति में पलायन करने को तैयार बैठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में स्वरोजगार करने वालों की संख्या में भी करीब 12 फीसद की कमी आ चुकी है। यह वह समस्या है जिससे उत्तराखंड उलट-पलट हो गया है। पूरा पहाड़ खाली हो गया है। मनुष्य तो छोड़िये, देवी-देवताओं ने भी पलायन कर दिया है।
2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17793 गांवों में से 1053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत विकास केंद्र के एक अध्ययन के अनुसार तो प्रदेश के तीन हजार से अधिक गांव 2,57,875 घर ताले लटकने से वीरान हो गये हैं। इनमें से 42 फीसद ने रोजगार, 30 फीसद ने मूल सुविधाओं और 26 फीसद ने शिक्षा के अवसरों के अभाव अपने गांव छोड़े हैं। वहीं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत-डोईवाला, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अल्मोड़ा से नैनीताल और पूर्व में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, पूर्व मुख्यमंत्री के सलाहकार रणजीत रावत (सल्ट से रामनगर), दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक हरिद्वार के साथ ही पहाड़ के अनेक नेता मैदानी सीटों को अपने लिये सुरक्षित करने में जुटे हुए हैं। यही नहीं पहाड़ के भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई कुल व ईष्ट देवताओं के मंदिरों को मैदानों पर स्थापित कर एक तरह से उनका भी पलायन कर दिया गया है।

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नवीन समाचार 17 जनवरी 2019। पिछला यानी 2018 का वर्ष ‘रोजगार वर्ष’ के रूप में मनाने का दावा करने वाली उत्तराखंड सरकार के लिए एक सरकारी रिपोर्ट खतरे की घंटी के रूप में आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या तो बढ़ ही रही है साथ ही स्वरोजगार करने वालों की संख्या घट रही है। ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 17.4 फीसदी शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। 12वीं या इससे अधिक की शिक्षा लेने वाले युवाओं को इस श्रेणी में रखा गया है। अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग की ओर से रिपोर्ट जारी की गई है।

राज्य सरकार का स्वरोजगार को बढ़ावा देने का दावा भी झूठा साबित हो रहा है। ताजा रिपोर्ट बताती है कि पांच साल में स्वरोजगार करने वालों की संख्या में करीब 12 फीसदी की कमी आ चुकी है। 2012 में जहां 69 फीसदी स्वरोजगार कर रहे थे वहीं 2017 तक यह संख्या घटकर 56.9 पर आ चुकी है। इसके उलट दैनिक वेतनभागी रोजगार छह फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। हालांकि नियमित रोजगार भी सात फीसदी बढ़ा है। बेरोजगारी की मुख्य वजह आर्थिक तरक्की का तीन मैदानी जिलों तक सीमित रहना है। देहरादून 30 फीसदी शिक्षित बेरोजगारों के साथ प्रदेश में अव्वल है। रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी व चम्पावत जिले में दो तिहाई लोग स्वरोजगार कर रहे हैं।

राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बेरोजगारी
दूसरी ओर केंद्र सरकार की एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सीएमआईई) की रिपोर्ट भी उत्तराखंड में बेरोजगारी बढ़ने की पुष्टि कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2018 में प्रदेश में बेरोजगारी की रफ्तार 7.5 फीसदी रही। जो कि राष्ट्रीय औसत 7.4 से भी ज्यादा है। आंध्र प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश ने बेरोजगारी कम करने में सफलता पाई है। इसके उलट  असम, मध्य प्रदेश पंजाब, त्रिपुरा, राजस्थान में यह दर बढ़ी है।

लोगों तक पहुंच रही सरकारी योजनाएं
पहाड़ों में सरकार की योजनाएं अब ज्यादा तेजी से लोगों तक पहुंच रही है। रिपोर्ट बताती है कि 13.3 फीसदी पर्वतीय जनता एनआरएलएम, एमएमएसजे, शिल्पीग्राम योजना, एनयूएलएम और पर्यटन विकास की योजना का लाभ उठा रहे हैं। हालांकि मुद्रा लोन का वितरण पहाड़ों में कम हो रहा है।

पर्यटन नहीं पकड़ पा रहा रफ्तार
हिमाचल व जम्मू कश्मीर की जीडीपी में पर्यटन का हिस्सा करीब सात फीसदी का है। पूर्वोत्तर के राज्य भी पर्यटन विकास के मामले में उत्तराखंड से आगे निकल रहे हैं। उत्तराखंड में पर्यटक बढ़ रहे हैं पर स्थानीय विकास में योगदान अन्य राज्यों के मुकाबले कम है। विदेशी पर्यटक भी उत्तराखंड में बढ़ रहे हैं।

फसल बीमा का लाभ कम
पहाड़ों में जंगली जानवर व प्राकृतिक कारणों से फसल को नुकसान ज्यादा हो रहा है। लेकिन फसल बीमा योजना आगे नहीं बढ़ रही है। उत्तरकाशी और ऊधमसिंहनगर में छह फीसदी फसल ही बीमा के दायरे में पहुंच रही है।

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-पलायन रोकने के उपाय के साथ ही प्रमुख वजहें भी बतायीं
-कहा-कृषि नहीं ग्रामीण उद्यमों से रुकेगा पलायन
-पलायन के लिए आर्थिक कारण मुख्य, अंग्रेजी शिक्षा का आकर्षण भी प्रमुख वजह: डा. नेगी

राष्ट्रीय संगोष्ठी में विचार रखते पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डा. एसएस नेगी एवं मंचासीन गणमान्य।

नैनीताल, 19 नवंबर 2018। उत्तराखंड पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डा. शरण सिंह नेगी ने कहा कि पहाड़ों से पलायन केवल कृषि के भरोसे नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण उद्यम को बढ़ावा देना होगा। कहा कि पलायन के पीछे आर्थिक कारण प्रमुख है। ग्रामीणों की आय बढ़ाकर ही उन्हें गांवों में रोका जा सकता है। साथ ही ग्रामीणों में बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलाने का बड़ा आकर्षण भी पलायन करने की प्रमुख वजह है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात पहाड़ के ही रहने वाले शिक्षकों व चिकित्सकों-चिकित्सा कर्मियों का गांव में न रुककर दूर शहरों से आना-जाना करना भी पलायन और ग्रामीण क्षेत्रों में असुविधाओं का बड़ा कारण है।
डा. नेगी सोमवार को मुख्यालय स्थित हरमिटेज परिसर स्थित एचआरडीसी सभागार में कुमाऊं विवि के सर्वप्रमुख डीएसबी परिसर के वाणिज्य विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेसरनल स्टडीज एंड रिसर्च यानी आईपीएसडीआर एवं ‘हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायअी उत्तराखंड’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय हिमालय क्षेत्र से पलायन: चुनौतियां तथा समाधान’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता अपने विचार रख रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन का कारण आर्थिक विषमता है। कहा, एक ओर उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय गुजरात से भी बेहतर है, परंतु इसका बड़ा हिस्सा तीन मैदानी जिलों हरिद्वार, देहरादून व ऊधमसिंह नगर से आता है। हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय 2.54 लाख जबकि रुद्रप्रयाग की मात्र 80 हजार रुपये है। इसके साथ ही पर्वतीय जिलों के बेतालघाट, ओखलकांडा, स्याल्दे, ताकुला, चौखुटिया आदि विकासखंड विकास में बहुत पीछे हैं। वहीं नजदीकी शहरों में सब्जी-दूध आदि की खपत होने के कारण अच्छी आर्थिक स्थिति बेहतर होने से खिर्सू, थलीसेंण व दुगड्डा आदि विकासखंडों में जनसंख्या घटने के बजाय बढ़ी भी है। अन्य क्षेत्रों में वर्षा आधारित व जनसंख्या घटने से वन्य जीवों का शिकार हो रही खेती के कारण पहाड़ के अधिकांश परिवारों की आय मात्र 5 हजार रुपये मासिक तक सीमित है। ऐसे में वे खेती की जगह नियमित आय के लिये आसपास के नगरों का रुख कर रहे हैं। बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने का शौक भी ग्रामीणों को ‘सड़क पर ला रहा है।’ इन स्थितियों को बदलने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वहां की जरूरत के कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ाने वाले उद्यमों को बढ़ावा देने एवं विश्वविद्यालयों को ग्रामीण क्षेत्रों का अध्ययन करवाने तथा अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं को ‘क्रेडिट पॉइंट’ देने की जरूरत बताई। वहीं अध्यक्षता कर रहे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एनएस बिष्ट ने कहा कि पहाड़ ही नहीं देश की 30 फीसद जनसंख्या पलायन की समस्या से ग्रस्त है। कहा कि उत्तराखंड को पृथक राज्य पर्वतीय प्रदेश के नाते बनाया गया था कि किंतु राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को ही उचित योजनाओं के अभाव में राज्य बनने का लाभ नहीं मिला। संगोष्ठी के आयोजक वाणिज्य विभागाध्यक्ष प्रो. अतुल जोशी ने बताया कि विवि में पहले ही ग्रामीण प्रबंधन पर चल रहे पाठ्यक्रम कर रहे छात्र-छात्राएं ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर कार्य कर रहे हैं। डा. शरमनी पांडे ने ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की कीमत बढ़ाने वाले उपक्रम करने, ग्रामीण उत्पादों को अमेजन जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जोड़ने की आवश्यकता जताई। संगोष्ठी में रिसर निदेशक प्रो. एलएम जोशी, प्रो. अजय रावत आदि ने भी विचार रखे। संचालन प्रो. इंदु पाठक ने किया। इस मौके पर संयोजक वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष प्रो. बीपी सिंघल, प्रो. गंगा बिष्ट, डा. रीतेश साह सहित अनेक अन्य प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं भी मौजूद रहे।

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पहाड़ के एक गाँव में पलायन के बाद वीरान पड़ा एक संभ्रांत परिवार का घर और मंदिर

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये 409 अरब रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17,793 गांवों में 1,053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। प्रदेश के अधिकांश बड़े राजनेताओं (कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, यशपाल आर्य) ने भी अपने लिये मैदानी क्षेत्रों की सीटें तलाश ली हैं, वहीं भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई देवताओं ने भी पहाड़ों से मैदानों में पलायन कर दिया है।

प्रदेश के खासकर सीमांत क्षेत्रों उत्तरकाशी से लेकर चंपावत तक नेपाल-तिब्बत (चीन) से जुड़ी सरहद मानव विहीन होने की स्थिति में पहुंच गई है और यह इलाका एक बार फिर इतिहास दोहराने की स्थिति में आ गया है। कई सौ साल पहले मुगल और दूसरे राजाओं के उत्पीड़न से नेपाल समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से लोगों ने कुमाऊं और गढ़वाल की शांत वादियों में बसेरा बनाया था। लेकिन आजादी के बाद सरकारें इन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रहीं, जिस कारण पलायन ने गति पकड़ी, और सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही पहाड़ के 1,053 पर्वतीय गांव खाली हो गये। जबकि वास्तविकता यह है कि अकेले कुमाऊं में ही पांच हजार से अधिक गांव वीरान हो गये हैं। खासतौर पर नेपाल और तिब्बत सीमा से लगे गांवों से अधिक पलायन हुआ है, और हजारों एकड़ भूमि बंजर हो गई है। पलायन की गति 1980 के दशक से बढ़ी मानी जाती है। उस दौर में शहरों की ओर निकले लोग अब वृद्ध होने की स्थिति में स्वयं को पहाड़ की बजाय मैदानों में ही स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं, और वे हर साल पहाड़ आने से बचने के लिये अपने ग्राम व ईष्ट देवी-देवताओं को भी साथ मैदानों की ओर ले गये हैं।

नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर में सामने आया कड़वा सच

नाबार्ड ने वार्षिक स्टेट फोकस पेपर में राज्य की स्थिति को लेकर काफी भयावह तथ्य सामने आये हैं। 24 जनवरी 2018 को जारी फोकस पेपर के अनुसार उत्तराखंड के 968 गांव पूरी तरह खाली होकर भूतगांव (घोस्ट विलेज) बन गये हैं, वहीं राज्य गठन के बाद के इन वर्षो में एक लाख हेक्टेयर कृषि भूमि भी बंजर हो गयी है। पर्वतीय क्षेत्र की छोटी जोतों को समय रहते नहीं बचाया गया तो सरकारी प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे। समाधान के तौर पर नाबार्ड ने आने वाले वित्त वर्ष के लिए उत्तराखंड के किसानों को 20301.87 करोड़ ऋण देने की सिफारिश की है।

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राज्य बनने के बाद पलायन पहाड़ से पलायन अपने ही राज्य में तराई-भावर की ओर अधिक हुआ है। राज्य बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं, और यहीं तीन से चार हजार तक विभिन्न पर्वतीय देवी-देवताओं नामों के देवी देवताओं के मंदिर भी बन गये हैं। पलायन के कारणों की पड़ताल करें तो पहाड़ों में 0.68 हेक्टेयर औसत भूमि स्वामित्व है, जो कि बहुत कम है। वहीं कभी कभी 60 फीसद से अधिक ग्रामीण रोजगार देने वाली पहाड़ की खेती जंगली जानवरों के प्रकोप, घर के पुरुषों के पलायन से हल जोतने वाले हाथों के अभाव जैसे कारणों से बंजर हो चुकी है, फलस्वरूप खाली हो चुके गांवों में लेंटाना (कुरी) घास की झाडि़यां और बंजर हो चुके उपजाऊ खेत ही देखने को मिलते हैं। सशस्त्र सुरक्षा बल के आंकड़ों के अनुसार अब लोग खेती के लिए नेपाली मजदूरों को भूमि सौंपने लगे है। 128 नेपाली परिवार दोहरी नागरिकता लेकर पहाड़ी किसान बन चुके हैं। वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 7,69,944 हेक्टेयर कृषि भूमि में से खेती घटकर 2014-15 तक मात्र 7,01,030 हेक्टेयर में सिमट गयी है। ग्रामीण अब कृषि की जगह मनरेगा से रोजगार प्राप्त करते हुए मजदूर बन गये हैं। सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना के अनुसार एक से तीन रूपये की कीमत पर राशन मिल जाने से भी उनमें मेहनत करने की भावना खत्म हो रही है।

जहां सबसे पहले सड़क आयी, वहीं सबसे अधिक पलायन

नैनीताल। संगोष्ठी में श्रमयोग्य पत्र के संपादक अजय कुमार ने दिलचस्प तथ्य पेश करते हुए बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी व अल्मोड़ा जिलों में जनसंख्या 2001 के मुकाबले घटी है, और इन जिलों के नैनीडांडा और सल्ट ब्लॉकों से सर्वाधिक पलायन हुआ है। अब यह संयोग है अथवा कुछ और कि इन्हीं दो ब्लॉकों में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के लिहाज से सबसे पहले सड़क आयीं। यानी सड़कें विकास को गांवों में लाने का माध्यम बनने की जगह ग्रामीणों को पलायन कर शहर ले जाने का माध्यम भी अधिक बनी हैं।

वहीं पलायन कर दूर देश में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों की भूमिका दूर बैठकर ‘नराई’ लगाने या दूर से ही ‘उपदेश’ देने तक ही सीमित हो गयी है। किसी में वहां के ‘सुख’ छोड़कर पहाड़ आने, अपनी म्हणत से दूसरों के बजाय अपना घर सजाने-संवारने का साहस नहीं है…. है क्या ???

पहाड़ के पलायन पर एक कविता (साभार गूगल से)

मैंने देखा है अपने आँगन में
तेरे दादा और परदादा को भी,
तुतलाते,अलमस्त बचपन बिताते,
तख्ती पे घोटा लगाते,कलम बनाते….
मुस्कराते,गुनगुनाते और खिलखिलाते,
जब अ से अनार सीखते थे तेरे बूबू…..
       मैं  तब भी थी , मैं आज भी हूँ,

    मैं बाखली हूँ……..

खेले हैं मैंने होली के रंग ,तेरे पुरखों के संग ,
ना जाने कितनी दिवालियों में सजी हूँ,
सुनी है मैंने वो “काले-कव्वा काले ” की पुकार
जब घूघूते की माला ले के दौड़ते थे तेरे बाज्यू…
           मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ……
गवाह हूँ मैं कितनी डोलियों की याद नहीं,
कितनी बेटियों की विदाई में बहे आंसू मेरे
कितनी बहुवों की द्वारपूजा की साक्षी हूँ….
जब चाँद सी सजके आई थी तेरी ईजा ……
              मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
               मैं बाखली हूँ……….
फिर तेरे नामकरण की वो दावत
कितनी लम्बी पंगतों को जिमाया मैंने….
तेरा बचपन, तेरी शिक्षा,तेरा संघर्ष,
कितना फूला था मेरा सीना ,जब आया तू
पहली बार मेरे आँगन में ठुल सैप बनके
                 मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ…
                  मैं बाखली हूँ……
पर शायद मेरा आँगन छोटा हो गया ,
तेरे सपनो  के लम्बे सफर के लिए…
तुझे पूरा हक है, जीने का नई जिंदगी।
शायद समय की दौड़ में मैं ही पिछड़ गई हूँ…
याद है वो भी जब आखिरी बार कांपते हाथों से 
सांकल चड़ाई थी तूने………………
            मैं तब भी थी,मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ…………..
अब शायद और ना झेल पाऊं वक्त की मार,
अकेलेपन ने हिला दिया है मेरी बुनियादों को….
अब तो दरवाजों पे लगे तालों पे भी जंक आ गया
पर मेरा रिश्ता तेरी बागुड़ी से आज भी वही है।
लेके खड़ी  मीठी यादें,ढेरों आशीर्वाद……
                   मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
                    मैं बाखली हूँ………

पलायन की दुखती रग

पहाड़ दूर से बहुत सुंदर लगते हैं। करीब जाइए तो उनकी हकीकत समझ में आती है। अपनी आंखों के सैलानीपन से बाहर आकर आप देखेंगे तो पाएंगे कि पहाड़ की जिंदगी कितने तरह के इम्तिहान लेती है। यह बदकिस्मती नहीं, विकास की बदनीयती है कि इन दिनों पहाड़ के संकट और बढ़ गए हैं। पहाड़ आज की तारीख में बेदखली, विस्थापन और सन्नाटे का नाम है। घरों पर ताले पड़े हुए हैं, दिलों में उदासी है, थके हुए पांव राहत नाम के किसी बुलावे की उम्मीद में पहाड़ों से उतरते हैं। आज पलायन उत्तराखंड के लिए एक गम्भीर प्रश्न बन गया है। हमें पलायन को रोकने के लिए कारणों का निवारण करना होगा। उच्च शिक्षा की बात करें तो देहरादून के अलावा उंगलियों में गिनने लायक ही अच्छे शिक्षा संस्थान हैं। कृषि योग्य भूमि का कम होना और साथ में परम्परागत अनाज को उसका उचित स्थान न मिलना भी पलायन का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। उत्तराखंड के उन किसानों पर किसी का ध्यान नहीं जाता जो कभी जौ, बाजरा, कोदा, झंगोरा उगाते थे और उस खेती का सही लागत मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने इसे उगाना ही छोड़ दिया। सरकार चाहे तो यहां के परम्परागत अनाज का सही लागत मूल्य जारी कर पलायन रोकने के लिए एक अच्छा कदम उठा सकती है। वर्ष 2011 की जनगणना में कहा गया था कि 2001 में पहाड़ी इलाकों में 53 प्रतिशत लोग थे। लेकिन 2011 में इन पहाड़ी इलाकों मात्र 48 प्रतिशत ही लोग रह गए। एनएसएसओ का 70वां सव्रे बताता है कि उत्तराखंड में कृषि उपज की कीमत राष्ट्रीय औसत से 3.4 गुना कम है। उत्तराखंड में औसत कृषि उपज कीमत 10,752 रुपये प्रति परिवार थी। जबकि कृषि उपज कीमत का राष्ट्रीय औसत 36,696 रुपये। अगर पड़ोसी राज्य हिमाचल की बात की जाए तो खेतिहर परिवार की आय हिमाचल से लगभग आधी है। उत्तराखंड में एक खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 4,701 रुपये थी। जबकि हिमाचल में खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 8,777 रुपये थी। कृषि प्रधान देश होने के नाते कई सीखें विरासत में हमें मिलीं, पर हम उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमारे खेत छोटे हैं, बिखरे पड़े हैं और जहां गांवों में पलायन हो चुका है वहां खेत बंजर और खाली पड़े हैं। पाली हाउस तकनीक से ज्यादा-से-ज्यादा सब्जियां उगाने पर ध्यान दिया जा सकता है। हिमाचल हमारे लिए एक उदाहरण है कि कैसे वहां कृषि को फलों की तरफ मोड़कर समृद्धि हासिल की गई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की 5.1 प्रतिशत आबादी घटी है। पहले कुल जनसंख्या का ज्यादातर अनुपात गांवों में रहता था, लेकिन पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो गए हैं। ग्रामीण आबादी शहरी क्षेत्र की तरफ सिमट रही है। स्वास्य की समस्या से पहाड़ जूझ रहा है। डॉक्टर तो हैं नहीं साथ ही पैरामेडिकल और फाम्रेसी स्टाफ की भी बेहद कमी है। 108 एंबुलेंस हमारे लिए जीवनदायनी जरूर साबित हुई पर पीपीपी मॉडल का यह खेल बहुत से सवाल भी छोड़ता है। तीर्थ स्थल गौरवान्वित महसूस कराते हैं, मगर यह पूरा सिस्टम इतना अव्यवस्थित है कि इससे अच्छा रोजगार नहीं जुटाया जा सका है। युवा पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाती है और वहीं की होकर रह जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 17793 गांवों में से 1053 गांव पूरी तरह से वीरान हो चुके हैं। अन्य 405 गांवों में लगभग 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। 2013 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से गांवों से पलायन का ग्राफ बढ़ गया है। सरकार की योजना जुलाई अंत तक पर्वतीय क्षेत्रों में डक्टरों की तैनाती सुनिचित करने के लिए उत्तराखंड में 2700 डक्टर लाने की है। इसके लिए तमिलनाडु, उड़ीसा व महाराष्ट्र आदि राज्यों से डॉक्टर लेने की तैयारी चल रही है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए 13 नये क्षेत्र खोले जा रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि बहुत ही कम युवा आज की तारीख में गांवों की तरफ रुख कर रहे हैं?
राज्य सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है, जिसके तहत यहां का युवा पहाड़ के विकास के लिए काम करे। आज उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कठिन जिंदगी से मुक्ति की जिंदगी को पलायन का नाम दिया जाता है। यदि इसी प्रकार पलायन बढ़ता गया तो गांवों में इंसान नहीं जानवर देखने को मिलेंगे। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गढ़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन।                                                                ♦♦♦ आशीष रावत

तीन करोड़ प्रवासी उत्तराखंडियों की ‘घर वापसी’ कराएगा आरएसएस !

-प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विदेशों में बसे भारतवंशियों से किए जा रहे आह्वान की तर्ज पर उत्तराखंडियों से किया जाएगा वर्ष में एक सप्ताह अपने गांव आने का आह्वान करते हुए शुरू की ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना
-संघ ने इस कार्य हेतु 670 गांवों में तैनात कर दिए हैं संयोजक
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य की वर्ष 2011 में हुई जनगणना में आबादी एक करोड़ एक लाख 16 हजार 752 है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि इससे तीन गुना उत्तराखंडी पलायन कर चुके हैं। इनमें से 30-35 लाख उत्तराखंडी प्रवासी तो अकेले दिल्ली में ही हैं, जबकि अमेरिका, जापान, यूएई सहित दुनिया भर में फैले हुए हैं। जापान जैसे छोटे देश में भी संघ के अनुसार करीब 35 हजार उत्तराखंडी रहते हैं। संघ अब इन लोगों को वर्ष में कम से कम एक बार सप्ताह भर के लिए अपने मूल गांव वापस लाने का खाका बुन रहा है। इस हेतु संघ ने ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना शुरू की है। योजना के तहत प्रदेश की 670 न्याय पंचायतों में संयोजक तैनात कर दिए हैं, जिन्हें प्रवासियों को गाँव लौटाने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रचारक डा. हरीश कहते हैं कि पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है। इसकी वजह से इस सीमांत राज्य के गांव के गांव खाली हो रहे हैं। इससे देश की सीमाएं भी खाली और सामरिक दृष्टिकोण से कमजोर होती जा रही हैं। पहाड़ को पलायन के अभिशाप से मुक्त कराने के लिए यह पहल की जा रही है। गत दिनों दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना की शुरुआत की है। खास बात यह भी है डा। हरीश ही इस योजना के योजनाकार हैं, और उत्तराखंड से हैं, लिहाजा उत्तराखंड पर इस योजना का सबसे ज्यादा फोकस है। योजना के तहत उत्तराखंड के तीन करोड़ प्रवासियों को पीएम मोदी के भारतवंशियों से अपने विदेश दौरों में किए जा रहे आह्वान की तरह एक सप्ताह के लिए अपने घर आने का आह्वान किया जाएगा। प्रवासी घर आएंगे तो अपने गांव, घर, क्षेत्र को कुछ तो देकर जाएंगे। इससे एक ओर उनके गांवों में पसरा सन्नाटा टूटेगा, और इस पहल के तहत यदि पांच हजार प्रवासी भी गांवों में आए तो उनकी आवाजाही से 10 से 15 करोड़ रुपये की आर्थिकी विकसित होगी। साथ ही वह यहां से कोंदो, झंगोरा, गहत, राजमा, काला भट्ट, मसूर सरीखी पहाड़ी दालों जैसी गांव की वनस्पतियों, दाल, फल, सब्जियों को वापस ले जाएंगे। इन स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ेगी तो लोग उसका और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित होंगे, और स्थानीय लोगों का भी गांवों के प्रति लगाव बढ़ेगा।

विकट है उत्तराखंड में पलायन की स्थिति

नैनीताल। वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार पिछले एक दशक में 78 गांव गैर-आबाद हो चुके हैं, और यह संख्या 1143 तक पहुंच गई है। वहीं इस दौरान राज्य के दो जनपदों, अल्मोड़ा की आबादी 1.73 फीसद और पौड़ी की 1.51 फीसद बढ़ने के बजाए घट गई है, जबकि अन्य पहाड़ी जिलों चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर की आबादी भी पांच फीसद से भी कम की रफ्तार से बढ़ी है, वहीं इसके उल्टे राज्य के मैदानी जिलों, ऊधम सिंह नगर की आबादी 33.40, हरिद्वार 33.16 की, देहरादून की 32 और नैनीताल की आबादी 25 फीसद की रफ्तार से बढ़ी है। जबकि प्रदेश की आबादी के बढ़ने की औसत दशकीय दर 16 और देश की 17 फीसद है। वहीं योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार करीब 9 .3 फीसद की विकास दर वाले राज्य में पहाड़ के करीब 32.8 9 लाख ग्रामीण 17 रुपए से कम में दिन का गुजारा करने को मजबूर हैं। वहीं स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो मैदान में आपातकाल में रोगी के डॉक्टर तक पहुंचने के 20 मिनट के औसत समय के मुकाबले पहाड़ पर यह समय 4 घंटा 48 मिनट है। वहीं राज्य के करीब 16 हजार गांवों में 45 हजार से अधिक स्वयं सेवी संस्थाएं कहने भर को कार्य कर रहे हैं।

पलायन : वर्ष 2017 में 7,000 भारतीय करोड़पति हो गए विदेशों में शिफ्ट
नयी दिल्ली, 04 फरवरी (एएनएस)। देश से बाहर जाने वाले करोड़पतियों की संख्या में 2017 में 16% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान 7,000 ऊंची नेटवर्थ वाले भारतीयों ने अपना स्थायी निवास (डोमिसाइल) बदल लिया। यह चीन के बाद विदेश चले जाने वाले करोड़पतियों की दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रपट के अनुसार 2017 में 7,000 करोड़पतियों ने अपना स्थायी निवास किसी और देश को बना लिया। वर्ष 2016 में यह संख्या 6,000 और 2015 में 4,000 थी। वैश्विक स्तर पर 2017 में 10,000 चीनी करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला था। अन्य देशों के अमीरों का अपने देश से दूसरे देश में बस जाने की संख्या में तुर्की के 6,000, ब्रिटेन के 4,000, फ्रांस के 4,000 और रुस के 3,000 करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला है। स्थायी निवास बदलने के रुख के मुताबिक भारत के करोड़पति अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड गए हैं जबकि चीनी करोड़पतियों का रुख अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की ओर है।

पहाड़ के नेता भी मैदानों को कर गये ‘पलायन’

-मौजूदा विस चुनाव में ‘रणछोड़’ नेताओं में सीएम हरीश रावत, किशोर उपाध्याय  और मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत प्रमुख रूप से शामिल -कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, हरक, अमृता भी कर चुके हैं अपनी पर्वतीय सीटों से मैदानों की ओर पलायन -एक दौर में यूपी के सीएम चंद्रभान गुप्ता ने पहाड़ की रानीखेत विधानसभा से लड़ा था चुनाव -अब जनता पर कि ‘रणछोड़” नेताओं को सबक सिखाती है कि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल उच्च न्यायालय में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में 12 नवंबर 2014 को अधिवक्ताओं के बीच पलायन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए कहा था, ‘तो क्या पहाड़ पर बुल्डोजर चला दूं। प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ पर तैनाती के आदेशों पर ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं, मानो किसी ने उनके मुंह में नींबू डाल दिया हो…” उनका तात्पर्य पहाड़ों पर बुल्डोजर चलाकर उन्हें मैदान कर देने से था, ताकि पहाड़-मैदान में असुविधाओं का भेद मिट जाये। लेकिन इस वक्तव्य के करीब सवा दो वर्ष बाद ही उनकी अगुवाई में ही जब उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो स्वयं रावत ही अपनी धारचूला सीट छोड़कर दो-दो मैदानी सीटों-किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण सीटों पर पलायन कर गये हैं। यही नहीं उनकी पार्टी के प्रमुख किशोर उपाध्याय भी अपनी, दो बार 2002 व 2007 में विजय दिलाने वाली पहाड़ की परंपरागत टिहरी सीट छोड़कर सहसपुर उतरते हुए पहाड़ों के ‘रणछोड़’ साबित हुये हैं। साथ ही मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत भी अपनी परंपरागत साल्ट सीट छोड़कर रामनगर उतर आये हैं। जबकि एक दौर में पूर्ववर्ती राज्य यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता (1967 में) पहाड़ की रानीखेत सीट से चुनाव लड़े और जीते थे, और अकबर अहमद डम्पी जैसी मैदानी नेता भी राज्य बनने से पूर्व पहाड़ से चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं करते थे। जबकि अपने गोविन्द बल्लभ पन्त बरेली,  हेमवती नन्दन बहुगुणा बारा और नारायण दत्त तिवारी काशीपुर की मैदानी सीटों से चुनाव लड़ते रहे।

गौरतलब है कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में जनाक्रोश भड़कने और लोगों के आंदोलित होने में पलायन की गंभीर समस्या सर्वप्रमुख थी। लेकिन पलायन का मुद्दा राज्य बनने के बाद पहली बार 2001 में हुई जनगणना में ही पहाड़ की जनसंख्या के बड़े पैमाने पर मैदानों की ओर पलायन करने से हाशिये पर आना शुरू गया। यहां तक कि राज्य में 2002 के बाद पांच वर्ष के भीतर ही 2007 में दूसरी बार विस सीटों का परिसीमन न केवल बिना किसी खास विरोध के हो गया, वरन नेता मौका देख कर स्वयं ही नीचे मैदानों की ओर सीटें तलाशने लगे। 2007 के नये परिसीमन के तहत पहाड़ों का पिछड़ेपन, भौगोलिक व सामाजिक स्थिति की वजह से मिली छूटें छीन ली गयीं, और पहाड़ की छह विस सीटें घटाकर मैदान की बढ़ा दी गयीं। पहली बार नये परिसीमन पर हुए 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (अब भाजपा) नेता डा. हरक सिंह रावत व अमृता रावत सहित कई नेता पहाड़ छोड़कर मैदानी सीटों पर ‘भाग’ आये।

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इस सूची में यशपाल आर्य भी शामिल हो मुक्तेश्वर छोड़ बाजपुर आ गये, अलबत्ता इस बार पुत्र संजीव आर्य को नैनीताल भेजकर उन्होंने एक तरह से पहाड़ के प्रति कुछ हद तक सम्मान का परिचय दिया है। अमृता के पति सतपाल महाराज भी कुछ इसी तरह पहाड चढ़ गये हैं। इस बीच भाजपा नेता प्रकाश पंत भी पिथौरागढ़ के साथ मैदान पर उतरे तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा से भिड़ने के नाम पर सितारगंज उतर आये थे, और आगे लालकुआ में भी करीब दो वर्ष ‘राजनीतिक जमीन’ तलाशने में नाकामी के बाद वापस पिथौरागढ़ लौटने को मजबूर हुए हैं, जबकि बहुगुणा ने बेटे सौरभ के साथ सितारगंज में ही जड़े गहरी करने की ठानी है। बहरहाल, अब जनता को तय करना है कि वे अपने पहाड़ के इन ‘रणछोड़’ नेताओं का क्या भविश्य तय करती है। याकि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है।

बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे पहाड़ की उपेक्षा करने में

नैनीताल। पहाड़ की उपेक्षा करने में पहाड़ के बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे। यहां तक कहा जाता है कि पहाड़ के कई बड़े नेता अलग पर्वतीय राज्य का इसलिये विरोध करते थे कि इससे कहीं उनकी पहचान भी छोटे राज्य की तरह सिमट न जाये। वहीं लोक सभा चुनावों में भी कांग्रेस के बड़े हरीश रावत से लेकर दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अपनी परंपरागत सीट छोड़कर हरिद्वार तो भाजपा के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत को नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट पर उतरने से कोई गुरेज नहीं रहा। वहीं एक अन्य पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी पहाड़ के होते हुए भी कमोबेश हमेशा ही मैदानी सीटों से चुनाव लड़े। कुछ इसी तरह पर्वत पुत्र कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को भी पहाड़ की बजाय मैदानी सीटें ही अधिक रास आर्इं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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