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उत्तराखंड के भूजल पर बेहद चिंताजनक समाचार, 40 फीसद हैंडपंपों में खतरनाक आर्सनिक और शीशा

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-‘पानी सजीव जीवनः चुनौतियाँ और समाधान’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ समापन

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प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 मार्च 2019। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में यूजीसी के प्रो. बीएस कोटलिया ने उत्तराखंड के जल प्रदूषण के एक सर्वे पर व्याख्यान देते हुए कहा कि प्रदेश में 569 हैंड पम्पों के पानी के नमूनों में से 6 पर्वतीय जिलों-चमोली, ऊधम सिंह नगर, पिथौरागढ़, नैनीताल, अल्मोड़ा व चम्पावत में 231 नमूनों में खतरनाक आर्सनिक और शीशे से अत्यधिक मात्रा से प्रदूषित पाये गये हैं। बताया कि यह नमूने मानसून से पहले, मानसून के दौरान और मानसून के बाद लिए गये। इनमें ऊधम सिंह नगर जिले के पानी के नमूने सबसे अधिक प्र्रभावित पाये गये है।
प्रो. कोटलिया कुविवि द्वारा उपसा के सहयोग से यूजीसी-मानव संसाधन विकास केंद्र, में उत्तराखण्ड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एण्ड टैक्नोलॉजी (यूकोस्ट) देहरादून के सहयोग से ‘पानी सजीव जीवनः चुनौतियाँ और समाधान’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में शनिवार को बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। वहीं भूगोल विभाग के प्रो. पीसी तिवारी ने पर्वतीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों को उनके प्राकृतिक चक्र में बिना व्यवधान पहंुचाये लोगों तक जल पहुँचाने का प्रबन्धन किये जाने पर बल दिया। ओरियंटेशन प्रोग्राम और रिफ्रैशर कोर्स के कुल सेमीनार के उप-विषयों पर अपनी राय दी। अध्यक्षता कर रहे एचआरडीसी के निदेशक प्रो. बीएल साह, ने दैनिक जीवन के कार्यों में जल का सही सदुपयोग करके जल को बचाने का गुरू मंत्र दिया। मौसम विज्ञान विभाग नई दिल्ली के उप-महानिदेशक डा. आनन्द शर्मा ने वैश्विक स्तर पर जल सम्बन्धी समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए इसके समाधान हेतु स्थानीय स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया। संगोष्ठी के दूसरे दिन ओरियंटेशन प्रोग्राम एवं रिफ्रैशर कोर्स के 82 प्रतिभागियों ने पावर पाइंट के माध्यम से अपने शोध पत्र पढ़े। सत्र के अंत में सेमीनार के रिपोर्टर डा. अरूण कुमार मौर्य,ं डा. मनमोहन सिंह, डा. टीयू सिद्दीकी एवं डा. लक्ष्मीकान्त ने भी विचार रखे। संचालन डा. रीतेश साह ने किया।

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-11 हजार वर्षों की पुरा जलवायु पर अध्ययन किया है प्रो. कोटलिया ने
-झीलों, गुफाओं एवं 500-600 वर्ष पुराने वृक्षों पर संयुक्त रूप से किया अध्ययन

प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 5 फरवरी 2019। 11 हजार वर्षों की पुरा जलवायु का अध्ययन करके हिमालयी प्रदेश में बारिश का पैटर्न बताने वाले कुमाऊं विश्वविद्यालय के यूजीसी से नामित प्राध्यापक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया को ‘नेशनल जियोसाइंस अवार्ड-2018’ दिये जाने की घोषणा हुई है। यह राष्ट्रीय पुरस्कार देश के राष्ट्रपति के हाथों एवं अमूमन हर वर्ष अप्रैल-मई माह में दिये जाते हैं। कोटलिया को मिलने जा रहा पुरस्कार पुरा जलवायु की श्रेणी में देश का इकलौता है। उन्हें यह पुरस्कार मिलने पर विश्वविद्यालय में हर्ष का माहौल है।
देश का यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलने पर ‘नवीन समाचार’ से बात करते हुए प्रो. कोटलिया ने अपने बरसों के शोध प्रविधि एवं निश्कर्षों को साझा किया। बताया कि उन्होंने यह शोध हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली अनेक झीलों व गुफाओं में मिलने वाली शिवलिंग जैसी आकृतियों के साथ ही जागेश्वर में मिलने वाले 490 व 570 वर्ष की उम्र के प्राचीनतम वृक्षों का संयुक्त रूप से अध्ययन करके किया है। इससे पता चलता है कि पिछले 10 हजार वर्षों में हिमालयी क्षेत्र की जलवायु बाकी भारत की जलवायु से उलट रही है। यहां की जलवायु, खासकर अधिक बारिश से बाढ़ आने व कम बारिश से सूखा पड़ने की स्थितियां बाकी देश से उलट रही हैं। कई बार ऐसा हुआ है किसी कालखंड में मैदानी क्षेत्रों में सूखा पड़ा तो हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़ आई, और अन्य कालखंडों में इसका उल्टा हुआ। इस कारण ही बाकी देश में जहां अधिक पानी की जरूरत वाली धान व इससे जुड़ी फसलों की पैदावार होती हैं, वहीं पहाड़ों पर गेहूं व इससे जुड़ी फसलों की पैदावार अधिक होती है। इसके पीछे पश्चिमी विक्षोभ का बड़ा कारण रहा है।

(यह भी सच है कि हिमालय के होने का कारण ही पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली शीतकालीन वर्षा है, न कि मानसून। यानी पश्चिमी विक्षोभ ही हिमालय का मूल कारण है और यह ही हिमालयी क्षेत्र के मौसम को प्रमुख रूप से प्रभावित करता है। -नवीन समाचार)

कोटलिया बताते हैं कि पूर्व में यही माना जाता रहा कि पूरे देश के साथ पहाड़ की जलवायु को भी जुलाई से सितंबर माह में आने वाला मानसून ही प्रभावित करता है, जबकि पहाड़ों की जलवायु पर पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली शीतकालीन वर्षा की बड़ा प्रभाव डालती है। इस बात को सर्वप्रथम उन्होंने ही वैज्ञानिक तौर पर स्थापित किया है। कोटलिया के अनुसार उन्होंने ही इस बात को वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित किया है कि हड़प्पा की प्राचीन सभ्यता भूगर्भीय कारणों से नहीं वरन पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव में अलग-अलग चरणों में बारिश की कमी होते जाने की वजह से समाप्त हुई थी। अलग-अलग कालखंडों मंे पश्चिमी विक्षोभ की वजह से बारिश का कम होना हड़प्पा सभ्यता के समाप्त होने का बड़ा कारण रहा।

कोटलिया के शोध के प्रमुख निश्कर्ष:

1. हिमालयी क्षेत्र की जलवायु बाकी भारत की जलवायु से उलट रही है। पूरे देश में जब सूखा रहा, तब यहां बारिश हुई और जब देश में अधिक बारिश हुई-यहां सूखा पड़ा।
2. इस कारण बाकी देश में जहां अधिक पानी वाली धान व इससे जुड़ी की फसलें होती हैं, वहीं यहां गेहूं व इससे जुड़ी पैदावार अधिक होती है।
3. कोटलिया ने पहली बार बताया कि हिमालयी क्षेत्र की जलवायु को पश्चिमी विक्षोभ बड़े स्तर पर प्रभावित करता है।
4. कोटलिया ने इस बात को वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित किया कि हड़प्पा सभ्यता भूगर्भीय कारणों से नहीं वरन पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव में अलग-अलग चरणों में बारिश की कमी होने की वजह से समाप्त हुई।

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  • चीन व अमेरिका की प्रयोगशालाओं से यूरेनियम सिरीज की आधुनिकतम तकनीकों के जरिए देहरादून के निकट साहिया की गुफाओं के अध्ययन से तैयार किए गए हैं आंकड़े
  • नैनीताल निवासी शोध वैज्ञानिक गायत्री कठायत का ‘15 इंपैक्ट फैक्टर वाला’ शोध पत्र दुनिया की शीर्ष शोध पत्रिका ‘साइंस एडवांस’ में हुआ है प्रकाशित

नवीन जोशी, नैनीताल। देश-दुनिया में मौसमी आंकड़ों की कमी के बावजूद चल रही मौसमी परिवर्तन व ग्लोबलवार्मिंग की चिंताओं के बीच विज्ञान की दुनिया से न केवल भारतीय उपमहाद्वीप वरन पूरी दुनिया के लिए मौसमी आंकड़ों के मोर्चे पर बड़ी खुशखबरी आई है। एक भारतीय युवा वैज्ञानिक डा. गायत्री कठायत की अगुवाई में चीन व अमेरिका के वैज्ञानिकों का ‘15 इंपैक्ट फैक्टर वाला’ एक शोध पत्र ‘The Indian monsoon variability and civilization changes in the Indian subcontinent’ 10 से अधिक ‘इम्पैक्ट फैक्टर’ वाली दुनिया की शीर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप के 2-3 वर्ष की उच्च परिशुद्धता युक्त 5700 वर्षों के मानसून के आंकड़े अत्याधुनिक यूरेनियम श्रेणी एवं ऑक्सीजन आइसोटोप की प्रविधि से तैयार किए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता का उदय और पतन मजबूत और कमजोर मॉनसून की अवधियों के दौरान हुआ। जबकि पूर्व अध्ययन इसके जल प्रलय आने जैसे अन्यान्य कारण बताते हैं।

राष्ट्रीय सहारा, 21 दिसंबर 2017

शोध वैज्ञानिक डा. गायत्री ने बताया कि उनका नया अध्ययन पुष्टि करता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन सभ्यताओं के समाजशास्त्रीय विकास को आकार देने में जलवायु परिवर्तनों, खासकर मानसून के उतार-चढ़ाव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह शोध अध्ययन उनकी अगुवाई में चीन एवं अमेरिकी वैज्ञानिकों ने देहरादून के पास स्थित साहिया की गुफाओं की लिंगनुमा ‘स्टेलेगमाइट’ आकृतियों का चीन स्थित प्रयोगशाला में यूरेनियम श्रेणी तथा ‘ओ-16’ व ‘ओ-18’ ऑक्सीजन आइसोटोप परीक्षण करके प्राप्त किया गया है। बताया कि साहिया भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा के प्रमुख कारक ‘ग्रीष्मकालीन दक्षिण पश्चिमी मानसून’ के दृष्टिकोण से कमोबेश मध्य में स्थित होने के कारण बेहद संवेदनशील स्थान है। यहां का अध्ययन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप व उत्तरी गोलार्ध में मानव सभ्यताओं के विकसित होने, उनके उत्थान व विघटन के साथ सांस्कृतिक इतिहास के मौसम के साथ संबंध को प्रकट करता है। साथ ही चूंकि मौसम किसी एक क्षेत्र की स्थितियों पर निर्भर नहीं होता है, इसलिए इन मौसमी आंकड़ों का वैश्विक महत्व भी है। उन्होंने बताया कि भारत में अंग्रेजी दौर के 1861 से मानसून के आंकड़े उपलब्ध हैं, और वैज्ञानिकों खोजों से अब तक केवल 100 से 150 वर्ष की परिशुद्धता के आंकड़े प्राप्त करने की सुविधा ही उपलब्ध हैं। जबकि इस अध्ययन में भारतीय मानसून के 2-3 वर्षों की परिशुद्धता के 5,700 वर्षों के आंकड़े उपलब्ध हो गए हैं। यह आंकड़े अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता, उचित इंस्ट्रूमेंटेशन के साथ ही पांच वर्ष के गहन विश्लेषणात्मक और बौद्धिक प्रयासों का प्रतिफल तथा सबसे महंगे अनुसंधानों में से एक है ।

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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने लगभग 4350 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के खत्म होने की वजह बने सूखे की अवधि का पता लगाया है। शोध में पता लगा है कि यह सूखा कुछ साल या कुछ दशक नहीं बल्कि पूरे 900 साल तक चला था। इसी के साथ वैज्ञानिकों ने उस सिद्धांत को भी गलत साबित कर दिया जिसमें सूखे के 200 साल में खत्म हो जाने की बात कही थी।

भूगर्भशास्त्र और भूभौतिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने पिछले लगभग 5000 हजार साल के दौरान मॉनसून के पैटर्न को पढ़ा और पाया कि लगभग 900 साल तक उत्तर पश्चिम हिमालय में बारिश न के बराबर हुई। इस कारण बारिश के सहारे भरी रहने वाली नदियां सूख गईं। इन नदियों के पास ही सिंधु घाटी सभ्यता बसती थी। नदियों में पानी खत्म होने से लोग पूर्व और दक्षिण की ओर चले गए जहां बारिश बेहतर होती थी। 
900 साल चला सूखा, पलायन कर गए थे लोग 
टीम ने लेह-लद्दाख की झील में 5000 साल तक रहे मॉनसून के पैटर्न्स को पढ़ा। शोध में पाया गया कि 2,350 बीसी (4,350 साल पहले) से 1,450 बीसी तक, मॉनसून सभ्यता वाले इलाके में काफी कमजोर होने लगा था। धीरे-धीरे सूखा पड़ने लगा। ऐसे में लोग हरे इलाकों की ओर पलायन करने लगे। बता दें कि सिंधु नदी के पास बसने के कारण ही इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता पड़ा था लेकिन इसके निशान रावी, चिनाब, व्यास और सतलज के किनारे भी मिलते हैं। इन घाटियों से पलायन कर रहे लोग गंगा-यमुना घाटी की ओर पूर्व और केंद्रीय यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, विंध्याचल और गुजरात जाने लगे। 

मानसून के उतार-चढ़ाव से हुआ सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यताओं का उत्थान व पतन: रिपोर्ट

डा. गायत्री कठायत द्वारा तैयार भारतीय मानसून के सिंधु घाटी व वैदिक सभ्यता के दौर के आंकड़े।

नैनीताल। भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु घाटी के दौर से रही कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की मौसम पर अच्छे मानसून पर निर्भरता विदित है। अच्छे मानसून के साथ वर्षा अच्छी होती है तो अच्छी कृषि उपज के साथ सभ्यताएं विकसित होती हैं, और सूखे जैसी स्थितियों में सामाजिक इकाइयों का विघटन होता है। डा. गायत्री ने अपने मानसूनी आंकड़ों का पुरातात्विक आंकड़ों से मिलान भी किया है, जिसके आधार पर वह बताती हैं कि शाहिया गुफाओं के उत्तर में भारतीय मानसून पर ही निर्भर तिब्बत क्षेत्र में 10वीं शताब्दी में कूगा राजवंश बहुत उत्थान कर रहा था, किंतु 16वीं शताब्दी तक यह राजवंश खत्म हो गया।

आंकड़े बताते हैं इसी दौरान 1620 ईसवी के आसपास इस क्षेत्र में पिछले 6000 वर्षों का सबसे कमजोर मानसून रहा, और करीब 10 वर्ष लंबा भयंकर सूखा पड़ा। इसी तरह भारतीय मानसून में ईसा से 3,900 से 3,300 ईसवी पूर्व के बीच भारी गिरावट आई, और इसी दौरान कांस्य युग की सबसे बड़ी सभ्यताओं में से एक-सिंधु घाटी सभ्यता रहस्यमय ढंग से विघटित हो गयी। आगे ताजा वैज्ञानिक अध्ययन के आंकड़े भी पुष्टि करते हुए चलते हैं कि ईसा पूर्व 3050 से 2450 के बीच भारतीय मानसून के मजबूत होने के साथ वैदिक सभ्यता भी मजबूत हुई। इस दौर में कृषि, धातु, जिंस उत्पादन, और व्यापार में भी मोटे तौर पर विस्तार हुआ। आगे वैदिक काल के विघटन के 2450 वर्ष ईसा पूर्व के दौर में मानसून फिर से अचानक कमजोर हुआ, इसकी भी वैदिक ग्रंथों के उद्धरणों से कमोबेश पुष्टि होती है।

अत्यधिक महंगी, भारत में अनुपलब्ध प्रविधि से किया गया है अध्ययन

नैनीताल। साइंस एडवांसेज रिसर्च जरनल में ‘द इंडियन मॉनसून वैरिएबिलिटी एंड सिविलाइजेशन चेंजेज इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट’ शीर्षक से प्रकाशित इस शोध पत्र की प्रथम लेखिका मूलतः नैनीताल निवासी चीन के शियान जियाटोंग यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल इन्वायरनमेंट की युवा वैज्ञानिक गायत्री कठायत हैं, जबकि उनके शोध अनुदेशक, विश्व के ‘हाएस्ट साइटेड साइंटिस्ट’ यानी शोध अध्ययनों में सर्वाधिक संदर्भित अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के भूविज्ञान विभाग के चीनी मूल के वैज्ञानिक हाई छिंग, कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के भूविज्ञान विभाग के भारतीय मूल के वैज्ञानिक आशीष सिन्हा व चीन के टोंगी यूनिवर्सिटी शंघाई के लियांग यी, के साथ शियानग्लेई ली, हवाई झेंग, हैंगिंग ली, यूफेंग निंग व आर लॉरेंस एडवर्डस हैं। गायत्री ने बताया कि भारत में अभी गुफाओं में मिलने वाली लिंगाकार ‘स्टेलेगमाइट’ आकृतियों की उम्र आदि का अध्ययन ‘कार्बन-14’ प्रविधि से होता है, जिनका ‘रिजॉल्यूशन’ यानी परिशुद्धता 50 से 100 वर्षों की होती है, जबकि यूरेनियम श्रेणी के अध्ययनों से दो वर्ष तक की परिशुद्धता के सटीक आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं। काफी महंगी यूरेनियम प्रविधि के जरिए एक डाटा तैयार करने में लगभग 500 डॉलर और एक ऑक्सीजन आइसोटॉप की जांच में 15 डॉलर का खर्च आता है। इस शोध अध्ययन में पांच वर्षों में करीब 32 डाटा का यूरेनियम एवं 2000 ऑक्सीजन आईसोटोप अध्ययन किए गए हैं।

नैनीताल के डीएसबी की छात्रा उपाध्यक्ष रहीं, यहीं से एमएससी की गायत्री ने

डा. गायत्री कठायत।

नैनीताल। युवा वैज्ञानिक गायत्री की प्रारंभिक और उच्च शिक्षा नैनीताल से हुई है। उन्होंने यहीं कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर से 2006 में भूविज्ञान विभाग से एमएससी की। इस दौरान वे डीएसबी परिसर छात्र संघ की छात्रा उपाध्यक्ष पद पर भी रहीं। यहां उन्होंने पीएच.डी. भी शुरू की, किंतु इसी दौरान ‘चायनीज एकेडमी ऑफ साइंस’ की छात्रवृत्ति प्राप्त होने पर वे यहां पीएच.डी. छोड़कर चीन चली गयीं, और वहां पीएचडी की। दो बहनों व एक भाई में सबसे बड़ी गायत्री के पिता चंदन सिंह कठायत यहां नगर पालिका परिषद से सेवानिवृत्त और माता तुलसी कठायत भाजपा नेत्री हैं। इससे पूर्व 2015 व 2016 में उनके शोध पत्र 54 से अधिक इंपैक्ट फैक्टर वाली विश्व की सर्वोच्च शोध पत्रिका ‘नेचर’ में सह लेखिका के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं।

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-अमेरिका की अगुआई में चल रहा है अध्ययन, अरब सागर और भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों में समानता मिलने की है संभावना

-परियोजना में भारत के आठ वैज्ञानिक शामिल, जिनमें कुमाऊं विवि के भूविज्ञानी एवं वाडिया संस्थान के शोध छात्र भी

-सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए हो सकता है अत्यधिक महत्वपूर्ण

प्रो.जी.के.शर्मा

प्रो.जी.के.शर्मा

नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिका की एक परियोजना के तहत हो रहे भू-वैज्ञानिक महत्व के शोध भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस परियोजना के तहत प्रारंभिक आकलनों के अनुसार अरब सागर भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों से ही बना हो सकता है। यदि यह आकलन अपने निष्कर्षो पर इसी रूप में पहुंचे तो भारत अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकता है और इस पर अमेरिका का भी स्पष्ट तौर पर जुड़ाव होने की वजह से विश्व बिरादरी की मुहर भी आसानी से लग सकती है। कुल मिलाकर यह परियोजना भारत को बड़ा सामरिक लाभ दिला सकती है।अरब सागर भारत के दक्षिण पश्चिम में करीब 38.62 लाख वर्ग किमी में फैला है और करीब 2400 किमी यानी करीब 1500 नॉटिकल मील (सामुिद्रक दूरी मापने की इकाई) की चौड़ाई में स्थित है। हिमालय से निकलकर भारत से होते हुए पाकिस्तान से इसमें आने वाली प्रमुख नदी सिंधु के नाम पर इसका प्राचीन भारतीय नाम ‘सिंधु सागर’ था, लेकिन बाद में अंग्रेजी दौर में इसका नाम अरब सागर, उर्दू व फारसी में बह्न-अल-अरब और यूनानी भूगोलवेत्ताओं के द्वारा इरीरियन सागर भी कहा जाता है। बहरहाल अमेरिका की एक परियोजना-‘ज्वॉइंट इंटीग्रेटेड ओसेन ड्रिलिंग प्रोग्रोम’ के तहत अरब सागर की भूसतह की चट्टानों का भारतीय सतह से मिलान किया जा रहा है। इस परियोजना में अमेरिका सहित जर्मनी, जापान व भारत के करीब 36 अलग-अलग क्षेत्रों में महारत रखने वाले भूवैज्ञानिक शामिल हैं। भारत की इस परियोजना में 50 फीसद की वित्तीय भागेदारी के साथ अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। इसमें उत्तराखंड से कुमाऊं विवि के भू-विज्ञान विभाग के प्रोफेसर जीके शर्मा तथा वाडिया इंस्टीटय़ूट देहरादून के एक शोध छात्र अनिल कुमार सहित भारत के सर्वाधिक आठ वैज्ञानिक शामिल हैं। प्रोजेक्ट में भारत के एक वैज्ञानिक को सह टीम लीडर की हैसियत भी प्राप्त है। परियोजना में शामिल प्रो. शर्मा बताते हैं इस परियोजना के तहत भूवैज्ञानिकों की टीम पूरे दो माह अरब सागर में रहकर लौटी है। परियोजना के तहत उनके जिम्मे अरब सागर की सतह पर पाई जाने वाली ‘रेडियो लेरिया’ नाम की ‘माइक्रो फॉसिल’ यानी एक तरह का जीवाश्म है, जिसके जरिये वह इस जीवाश्म का भारत के तमिलनाडु में पाई जाने वाली देश की करीब 12 अरब वर्ष पुरानी चट्टानों से संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा अन्य वैज्ञानिक करीब 15-20 प्रकार की अरब सागर की भू-सतह की मूल ‘इग्नियस’ यानी आग्नेय और ‘मेटा मॉर्फिक’ यानी कायांतरित चट्टानों तथा उन पर ताजा मिट्टी के जमाव का अलग-अलग दृष्टिकोणों से अध्ययन करेंगे। अपने अध्ययनों से वह प्रारंभिक तौर पर कह सकते हैं कि भारत के तमिलनाडु और अरब सागर की गहराइयों में मौजूद चट्टानों में समानता हो सकती है।

पेट्रोलियम भंडार का भी खुल सकता है राज

नैनीताल। प्रो. जीके शर्मा के अनुसार उनके द्वारा किए जा रहे ‘रेडियो लेरिया’ नाम की ‘माइक्रो फॉसिल’ के अध्ययन में भारत और तमिलनाडु की चट्टानों की एकरूपता के साथ ही इस जीवाश्म से ही पेट्रोलियम पदार्थो व गैस इत्यादि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हो सकती है कि यह पदार्थ अरब सागर में कितनी गहराई में और कहां हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रो. शर्मा पूर्व में अंटार्कटिक महासागर और भारती चट्टानों की एकरूपता की जांच भी कर चुके हैं, तथा उन्हें दुनिया के सभी समुद्रों में जाकर शोध अध्ययन करने का गौरव भी प्राप्त है।

भारत के मजबूत हुए बिना देश की विदेश नीति की सफलता संदिग्ध

प्रो. एसडी मुनि

-दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ जवाहर लाल नेहरू विवि के प्रोफेसर एसडी मुनि ने कहा-अमेरिका व रूस की नजदीकी भारत के हित में
-चीन के बाबत कहा कि 15वीं-18वीं सदी तक भारत के बराबर व पीछे रहा चीन आगे निकलते ही संबंध खराब कर रहा
-पाकिस्तानी सेना तिजारत और सियासत से दूर हो तभी पाकिस्तान का और भारत से उसके संबंधों का हो सकता है भला
नवीन जोशी। नैनीताल। दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ एवं जवाहर लाल नेहरू विवि के प्रोफेसर एसडी मुनि ने कहा कि भारत काफी हद तक आर्थिक व सामरिक मोर्चों पर मजबूत हुआ है, बावजूद अभी देश ने वह स्तर नहीं छुवा है कि दुनिया के देश उसकी सुन पायें। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने व स्वयं उनके पारिवारिक समारोह में पाकिस्तान जाने व चीन के राष्ट्रपति शी के साथ झूला झूलने जैसे डिप्लोमैटिक उपाय भी इन देशों के साथ बेहतर रिश्ते नहीं बना सके। उन्होंने अमेरिका व रूस के बीच राष्ट्रपति ट्रम्प के आने के बाद बढ़ रही नजदीकी को भारत के हक में बताया। कहा कि ऐसा होने से रूस की चीन पर निर्भरता घटेगी। साथ ही कहा कि ओबामा के दोस्ती के दौर के बावजूद अमेरिका कभी भारत के लिये रूस जितना विश्वस्त नहीं रहा। पाकिस्तान पर उन्होंने कहा, ‘जब तक पाकिस्तानी फौज तिजारत व सियासत से अलग नहीं होती, तब तक भारत-पाकिस्तान के संबंध नहीं सुधर सकते।’ भारत चीन संबंधों पर उन्होंने टिप्पणी की कि 15वीं शताब्दी तक चीन ‘सोने की चिड़िया’ और बुद्ध की धरती रहे भारत से आर्थिक, सामाजिक व सामरिक स्तर पर पीछे और 15वीं से 18वीं सदी तक बराबर रहा। तब भारत-चीन के बीच बेहतर संबंध रहे। किंतु इधर भारत से आगे निकल रहा चीन आंखें तरेर रहा है। कहा कि भारत की विदेश नीति तभी सफल हो सकती है, जबकि वह स्वयं को और अधिक मजबूत करे।
प्रो. मुनि ने कहा कि कहा कि भारत आज दुनिया का सबसे युवा, सशक्त, सबसे बड़े बाजार युक्त व विश्वस्त देश है। उसे अपनी इन ताकतों के साथ विश्व राजनीति में आगे बढ़ना होगा। कहा कि पाकिस्तान की समस्या का कोई इलाज संभव नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बुरे संबंध पाकिस्तान की फौज की आंतरिक समस्या में निहित हैं। इसलिये इसका कोई निदान संभव नहीं है। सिवाय इसके कि भारत स्वयं अत्यधिक मजबूत होकर उसे विश्व बिरादरी से अलग-थलग कर दे। वहीं चीन से भारत के संबंध तभी मजबूत हो सकते हैं, जब भारत चीन से अधिक शक्तिशाली हो जाये, और दक्षिण एशिया के अपने पड़ोसी देशों को चीन के मदद के बहाने घुसने से दूर रख पाये, तथा चीन को दलाईलामा से बात करने को मजबूर कर सके। उसे अपनी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ से हुई ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ पर कार्य करके दक्षिण पूर्व के मित्र देशों को भी अपने साथ एकजुट रखना और पड़ोसियों से संबंधों को और प्रगाढ़ करना होगा। अमेरिका व भारत के रिस्तों के बाबत उन्होंने कहा कि 1949 में नेहरू के पहले अमेरिकी दौरे से ही भारत अमेरिका से बेहतर संबंधों का पक्षधर रहा, और ये संबंध ओबामा-मोदी के साथ परवान चढ़े।

ओसामा के पतन के बाद भारत को चीन-पाक से खतरा बढ़ा : ले.ज. भंडारी

राज्य की सीमाओं पर सुरक्षा को लेकर संवेदनशील रहे सरकार
भारत को अमेरिका, चीन, पाक और रूस से जारी रखनी चाहिए वार्ता
नवीन जोशी, नैनीताल। परम विशिष्ट व अति विशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डा. एमसी भंडारी ने आशंका जताई कि ओसामा की मौत के बाद भारत पर दोतरफा खतरा है। पाकिस्तान से आतंकियों की आमद के साथ चीन भी भारत की ओर बढ़ सकता है। डा. भंडारी ने कहा कि भारत पांच-छह वर्षो में दुनिया की आर्थिक सुपर पावर बन सकता है। इसलिए उसे इस अवधि में कूटनीति का परिचय देते हुए अमेरिका, चीन, पाकिस्तान व रूस सहित सभी देशों से बातचीत जारी रखनी चाहिए। 
कुमाऊं विवि के अकादमिक स्टाफ कालेज में कार्यक्रम में आए डा. भंडारी ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ से कहा कि ओसामा बिन लादेन के बाद पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे 32 शिविरों से प्रशिक्षित आतंकी दो-तीन माह में भारत की तरफ कूच कर सकते हैं। कश्मीर में शांति पाकिस्तान की ‘जेहाद फैक्टरी’ में बैठे लोगों को रास नहीं आएगी। ओसामा ने भी कश्मीर में जेहाद की इच्छा जताई थी। उधर चूंकि पाकिस्तान बिखर रहा है, इसलिए तालिबानी- पाकिस्तानी भी यहां घुसपैठ कर सकते हैं। पाक पहले ही गिलगिट व स्काई क्षेत्रों में अनधिकृत कब्जा कर चुका है, दूसरी ओर चीन के 10 से 15 हजार सैनिक ‘पीओके’ में पहुंच चुके हैं, पाकिस्तान ने उन्हें सियाचिन के ऊपर का करीब 5,180 वर्ग किमी भू भाग दे दिया है, ऐसे में चीन तिब्बत के बाद भारत के अक्साई चिन व नादर्न एरिया तक हड़पने का मंसूबा पाले हुए है। उन्होंने कहा कि चीन ने यहां उत्तराखंड के चमोली जिले के बाड़ाहोती में 543 वर्ग किमी व पिथौरागढ़ के कालापानी में 52 वर्ग किमी क्षेत्र को अपने नक्शे में दिखाना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में उत्तराखंड में अत्यधिक सतर्कता बरतने व सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन रोकने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में चीन के घुसने की संभावना वाले 11 दर्रे हैं, जिनके पास तक चीन पहुंच गया है, और भारतीय क्षेत्र जनसंख्या विहीन होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में सीमाओं की सुरक्षा मुख्यमंत्री देखें और वह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ें। साथ ही उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के बावजूद 10 फीसद की विकास दर वाला भारत अगले पांच-छह वर्षो में सुपर पावर बन सकता है, इसलिए उसे इस अवधि में सभी देशों से कूटनीतिक मित्रता करनी चाहिए और अपने यहां सीमाओं की सुरक्षा दीवार मजबूत करनी चाहिए, ताकि बिखरते पाकिस्तान के बाद जब अमेरिका, चीन मजबूत होते भारत की ओर आंख उठाएं, वह मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार हो जाए। उन्होंने भारत में सेना का बजट जीडीपी का 2.1 फीसद (64 हजार लाख रुपये) को बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया।

नवीन जोशी

4 thoughts on “उत्तराखंड के भूजल पर बेहद चिंताजनक समाचार, 40 फीसद हैंडपंपों में खतरनाक आर्सनिक और शीशा

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