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:: ब्रेकिंग ::मुजफ्फरनगर कांड की फाइलें गायब ! हाई कोर्ट ने किया जवाब तलब

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नैनीताल, 1 मई 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के बहुचर्चित व राज्य के इतिहास में बदनुमा दाग माने जाने वाले मुजफ्फरनगर कांड के मामले में दुबारा से सुनवाई करते हुए जिला जज देहरादून से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। साथ ही सरकार व सीबीआई को नोटिस जारी किया है। मामले में मुजफ्फरनगर कांड की सभी फाइल गायब किये जाने का आरोप लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि इन फाइलों में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनन्त कुमार सहित कई अन्य आरोपी थे।
मंगलवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में मुजफ्फरनगर कांड के मामले में दुबारा से सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई, और अगली सुनवाई दो सप्ताह के बाद की नियत की गयी। मामले के अनुसार राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन कुमार साह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि राज्यआंदोलनकारियों को दस प्रतिशत आरक्षण देने वाली जनहित याचिका के निरस्त होने के कारण उन्होंने इस फैसले को सर्र्वाेच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए राज्य आंदोलनकारियों से सम्बन्धित दस्तावेजों को इकठ्ठा करने के लिए विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट देहरादून के कार्यालय से मुजफ्फर कांड से सम्बंधित दस्तावेज मांगे, परन्तु उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इस सम्बन्ध में कोई पत्रावली यहाँ उपलब्ध नही है। इसे लेकर उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने इसकी जाँच सीबीआई से कराने और संबंधित पत्रावलियां उन्हें उपलब्ध कराने और फाइल गायब कराने वाले सभी लोगो के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की प्राथर्ना की है।

सीबीआई ने खोला अनंत कुमार सिंह का काला चिट्ठा
याची ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि सन 1996 में उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने के लिए राज्य आंदोलन किया गया था। इस दौरान मुजफ्फरनगर में राज्य के लोगों के साथ पुलिस ने मारपीट, लूट, हत्या व बलात्कार किया। सीबीआई ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस कांड में 28 लोगो की मौत, 7 गैंग रेप 17 महिलाओ के साथ छेड़छाड़ हुई। सारी घटना मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार के आदेश पर हुई। सीबीआई ने 22 अप्रैल 1996 को सिंह को आईपीसी की धारा 302, 307, 324, 326/34 के तहत दोषी पाया। जिसको सिंह ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 22 जुलाई 2003 को निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर याचिका को निस्तारित कर दिया। इस आदेश पर पुनर्विचार याचिका सरकार व राज्य आंदोलनकारियों द्वारा दायर की गयी, जिस पर सुनवाई करते हुए उसी खंडपीठ ने अपने आदेश की वापस लेकर मामले को सुनने के लिए अन्य बेंच को भेज दिया। खंडपीठ ने 22 मई 2004 को सिंह की याचिका को खारिज कर दिया। तब से यह मामला निचली अदालत में लम्बित है इधर 17 फरवरी 2018 को याची ने 22 अप्रैल 1996 के आदेश को लेने के लिए निचली अदालत में आवेदन किया तो ऑफिस ने इस केस का रिकार्ड नहीं होने की जानकारी दी गई।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण पर फिर बंधी उम्मीद

मामला नई दलीलों के साथ फिर हाईकोर्ट पहुंचा, पुनर्विचार याचिका दाखिल

नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने का मामला नयी दलीलों के साथ फिर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में पहुंच गया है। इस मामले में उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रमन शाह ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। मामले पर सुनवाई अगले सप्ताह होने की उम्मीद है।
अधिवक्ता रमन साह ने याचिका में राज्य आंदोलनकारियों को पीड़ित बताते हए राहत और पुनर्वास नीति का हकदार बताया गया है। साथ ही कहा है कि अब तक मुजफ्फरनगर कांड में महिलाओं से दुष्कर्म, छेड़छाड़ तथा हत्या के मामलों के आरोपियों को सजा नहीं मिली है। यहां बता दें कि राज्य आंदोलनकारियों को दस फीसद क्षैतिज आरक्षण के मामले में खंडपीठ के दो न्यायाधीशों द्वारा अलग-अलग राय दी गई। जिसके बाद मामला मुख्य न्यायाधीश द्वारा तीसरी बेंच को रेफर किया गया, जिसने आरक्षण को असंवैधानिक घोषित करने के पक्ष में राय दी, जिसके बाद आरक्षण का फैसला असंवैधानिक हो गया। वहीं इसके बाद प्रदेश के काबीना मंत्री डा. धन सिंह रावत ने उच्च न्यायालय की डबल बेंच में चुनौती देने की बात कही थी, हालांकि उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं का मानना है कि तीन न्यायाधीशों के द्वारा मामला सुन लिए जाने के बाद डबल बेंच में जाने की बात कहना बचकाना है।

पूर्व आलेख : राज्य आंदोलनकारी 11 को हल्द्वानी में करेंगे महापंचायत

नैनीताल, 09 मार्च 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय से राज्य आंदोलनकारियों को राज्य सरकार की नौकरियों में 10 फीसद आरक्षण दिये जाने के शासनादेश व नियमावली को खारिज कर दिये जाने से आक्रोशित राज्य आंदोलनकारी रविवार 11 मार्च को हल्द्वानी में महापंचायत करेंगे। शुक्रवार को चिन्हित राज्य आंदोलनकारी समिति उत्तराखंड की मुख्यालय में केंद्रीय महामंत्री नवीन नैथानी की उपस्थिति तथा जिलाध्यक्ष सुंदर सिंह नेगी की अध्यक्षता व पान सिंह सिजवाली के संचालन में हुई बैठक में तय हुआ कि विषय में 11 मार्च को हल्द्वानी के सत्यनाराययण मंदिर परिसर में प्रातः 11 बजे से महापंचायत की जाएगी। बैठक में नैथानी ने कहा कि क्षैतिज आरक्षण के असंवैधानिक घोषित होने से राज्य आंदोलनकारियों में भारी आक्रोश है, तथा वे बेहद दुःखी हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस स्थिति के समाधान हेतु आगामी 20 मार्च से भराड़ीसैंण-गैरसेंण में प्रस्तावित बजट सत्र में चिन्हित राज्य आंदोलनकारियों व उनके आश्रितों को राज्य सरकार की नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण दिये जाने हेतु अध्यादेश सदन में रखकर पास कराना चाहिए। तभी इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो सकेगा। सभी राज्य आंदोलनकारियों से महापंचायत में पहुंचने का आह्वान भी किया जाएगा। बैठक में रईश अहमद, महेश जोशी, दीवान सिंह, धर्म सिंह, प्रकाश आर्या, मुनीर आलम, शमीम अहमद, जानकी प्रसाद राजपूत व नवीन जोशी आदि राज्य आंदोलनकारी उपस्थित रहे।

पूर्व आलेख (7 मार्च 2018) : हाईकोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण

  • राज्य सरकार का संबंधित शासनादेश व नियमावली भी अवैधानिक हुई
  • उच्च न्यायालय की संस्तुति पर दायर हुई संबंधित जनहित याचिका खारिज

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने को संविधान सम्मत नहीं ठहराया है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में पूर्व में खंडपीठ के दो न्यायाधीशों की राय परस्पर विपरीत आई थी। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण न देने सम्बंधित आदेश दिए थे, जबकि गत दिनों सेवानिवृत्त हो गये न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आन्दोलन कारियों के पक्ष में निर्णय दिया था। खंडपीठ के न्यायाधीशों के परस्पर विरोधी मत होने के कारण मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ ने मामले को न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की तीसरी बेंच को सुनने के लिए सौंपा था। बुधवार को न्यायमूर्ति धूलिया की एकलपीठ ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति धूलिया के आदेश को सही ठहराया, और राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद आरक्षण देने से सम्बंधित सरकार के शासनादेश को गलत व संविधान की धारा 16 (4) की भावना के खिलाफ माना, तथा उच्च न्यायालय की संस्तुति पर ही ‘इन द मेटर ऑफ अपोइन्टमेंट एक्टिविस्ट’ द्वारा दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस प्रकार उत्तराखंड सरकार के इस संबंध में जारी 11 अगस्त 2004 के शासनादेश एवं वर्ष 2010 में आयी नियमावली भी असंवैधानिक घोषित हो गयी है।


उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी लंबे समय से प्रदेश की सरकारी नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। सरकार ने पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों की मांग को देखते हुए 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था कर दी थी। मामले के अनुसार पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने के संबंध में हल्द्वानी निवासी करुणेश जोशी की याचिका को न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकलपीठ ने खारिज कर दिया था, एकलपीठ के इस आदेश की खंडपीठ में चुनौती दी गयी। खंडपीठ ने याचिका को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया। तब से अब तक यह मामला उच्च न्यायालय की कई बेंचों में चलता आ रहा था। यहां तक कि वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को दुबारा सुनने के लिए हाई कोर्ट को रेफर कर दिया था। पूर्व में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने अपने निर्णय में राज्य आंदोलन कारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण न देने और न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आंदोलन कारियों को आरक्षण देने का आदेश दिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की तीसरी एकलपीठ को मामला सुनने को दिया। जिसने बुधवार को अपना फैसला सुना दिया है।

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राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र ही नहीं था शुरुआती याचिका में

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने के मामले के बुधवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। ऐसे में इस संबंध में आये दोनों पक्षों को समझना भी एक दिलचस्प कहानी है। खास बात यह भी है कि यह मामला शुरू से राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाले आरक्षण से संबंधित कहा जा रहा है, जबकि खास बात यह है कि मामले में आरक्षण पर सुनवाई ही कई वर्षो के बाद हुई।
इस मामले की शुरुआत 11 अगस्त 2004 को आये तत्कालीन एनडी तिवारी की अगुवाई वाली सरकार के शासनादेश संख्या 1269 से हुई। जिसके आधार पर राज्य आन्दोलन के दौरान सात दिन से अधिक जेल में रहे राज्य आंदोलनकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार समूह ‘ग’ व ‘घ’ में सीधी भर्ती से नियुक्तियां दी गयीं (इस पर सरकार पर अपने चुनिन्दा लोगों को उपकृत करने के आरोप भी लगे, क्योंकि इस कसौटी पर खरे कई राज्य आन्दोलनकारियों को नौकरी नहीं मिली, और खास बात यह भी थी कि इस शासनादेश में कहीं भी राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र नहीं था) अलबत्ता आगे इसके साथ ही एक अन्य शासनादेश संख्या 1270 भी जारी हुआ था जिसमें उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत सभी सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने का प्राविधान किया गया था। बहरहाल, हल्द्वानी निवासी एक राज्य आंदोलनकारी करुणेश जोशी ने नौकरी की मांग करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। बताया गया है कि करुणेश के पास सरकार के बजाय निजी चिकित्सक का राज्य आंदोलन के दौरान घायल होने का प्रमाण पत्र था। इसी आधार पर उसे इस शासनादेश का लाभ नहीं मिला था। उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकल पीठ ने शासनादेश संख्या 1269 के बाबत राज्य सरकार की कोई नियमावली न होने की बात कहते हुए इस शासनादेश को असंवैधानिक करार देते हुए करुणेश की याचिका को खारिज कर दिया। इस पर राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में सेवायोजन नियमावली बनाते हुए उसमें शासनादेश संख्या 1269 के प्राविधानों को यथावत रख लिया। इस पर करुणेश ने पुनः उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर अब नियमावली होने का तर्क देते हुए उसे शासनादेश संख्या 1269 के तहत नियुक्ति देने की मांग की। इस बार न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की पीठ ने याचिका के साथ ही शासनादेश संख्या 1269 को भी खारिज कर दिया। साथ ही मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले को जनहित याचिका के रूप में लेने एवं राज्य सरकार की नियमावली की वैधानिकता की जांच करने की संस्तुति की। इस बीच 26 अगस्त 2013 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति एसके गुप्ता की खंडपीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य आंदोलनकारियों के लिए अंग्रेजी के ‘राउडी’ यानी ‘अराजक तत्व’ शब्द का प्रयोग किया गया। आगे एक अप्रैल 2014 को एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने पर भी रोक लगा दी। राज्य आंदोलनकारी एवं अधिवक्ता रमन साह ने वर्ष 2015 में इस शब्द ‘राउडी’ पर आपत्ति जताते हुए और इस शब्द को हटाने और आरक्षण पर आये स्थगनादेश को निरस्त करने की मांग की। उनका कहना था कि राज्य आंदोलनकारी कभी भी अराजक नहीं हुए, उन्होंने सरकारी संपत्तियों को नुकसान भी नही पहुंचाया। साह का कहना था कि राज्य आंदोलनकारी ‘पीड़ित’ हैं। उन्होंने राज्य के लिए अनेक शहादतें और माताओं-बहनों के साथ अमानवीय कृत्य झेले हैं। लिहाजा उन्हें संविधान की धारा 16 (4) के तहत तथा इंदिरा सावनी मामले में संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन न करते हुए, यानी अधिकतम 50 फीसद आरक्षण के दायरे में ही जातिगत आरक्षण के इतर, संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत बाढ़, भूस्खलन व दंगा प्रभावित आदि कमजोर वर्गों को मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर मिलने वाले आरक्षण की तर्ज पर सामान्य वर्ग के अंतर्गत ही क्षैतिज आधार पर सामाजिक आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस बीच खंडपीठ में अलग-अलग न्यायाधीशगण आते रहे। आखिर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ ने ‘राउडी’ शब्द को हटा दिया, अलबत्ता आरक्षण पर स्थगनादेश और मामले पर सुनवाई जारी रही। इसके अलावा जनहित याचिका में भवाली निवासी अधिवक्ता महेश चन्द पंत का कहना था कि अगर सरकार आरक्षण देती है तो उत्तराखंड के राज्य आंदोलन में भाग लेने वाले सभी लोगों को आरक्षण दे, अन्यथा किसी को भी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने के लिए वर्ष 1952 से लड़ाई चल रही थी, इसमें सभी ने भाग लिया था केवल वे ही लोग नही थे जो जेल गए थे या जो शहीद हो गए थे। इधर उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने गत 18 मार्च 2017 को सुनवाई पूरी कर इस पर फैसला सुनाया था। फैसले में खंडपीठ के दोनों न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने शासनादेश संख्या 1269 की वैधता के संबंध में अलग-अलग फैसले देते हुए मामले को बड़ी पीठ को संदर्भित करने की संस्तुति की।

सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे
नैनीताल। बुधवार को उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद राज्य आंदोलनकारियों की ओर से मामले में राज्य आंदोलनकारियों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रमन साह ने कहा कि मामले को उच्च न्यायालय की संविधान पीठ से सुने जाने का अनुरोध किया जाएगा, तथा सर्वोच्च न्यायालय जाने का विकल्प भी खुला है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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