आपका कोना : सबको मिलकर देना होगा पहाड़ के विकास में सहयोग

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(‘नवीन समाचार’ में हम एक नया स्तंभ ‘आपका कोना’ शुरू कर रहे हैं। इस स्तंभ में हम ‘नवीन समाचार’ के पाठकों की कविताएं, लेख, विचार आदि प्रकाशित करेंगें। यदि आप भी ‘नवीन समाचार’ के माध्यम से अपने विचार, कविता-लेख आदि प्रकाशित कर हमारे अन्य पाठकों तक पहुंचना चाहते हैं तो हमें अपने विचार, कविता या लेख आदि हमें हमारे व्हात्सएप नंबर 9412037779 अथवा ईमेल पते saharanavinjoshi@gmail.com पर भेज सकते है। – नवीन समाचार)

अंक 8 :

कल एक व्यक्ति से चर्चा हुई तो बहुत सारे विचार और कुछ प्रश्न मन में आये ,,हमार पहाड के लोग सब शहर की ओर आ रहे है, क्यों रोजगार की कमी, शिक्षा की कमी और स्वास्थ सेवा की कमी के कारण ? इन तीन मुद्दों पर हमेशा से चर्चा हुई है ,,,,पर समाधान नहीं हुआ ,,,, मुझे समझ ये नहीं आया कि सरकार की नीतियों में कमी है या हम में ,,, हमेशा से इन मुद्दों पर चर्चा होती आ रही है पता नहीं कब तक यह चर्चा चलेगी,,,,,,युवा साथियों को जब तक जोश होता है तब तक गुमराह किया जाता है , फिर हिम्मत हार जाने के बाद वही पुराना जीवन ,,,,,,चोट खाये हुए है हमारे युवा साथी ,,,,, क्या कोई रोजगार पहाडों में नहीं खोल सकती सरकारें, क्या पहाडों के हास्पिटलों की स्थिति नही सुधार सकती, क्या शिक्षा का स्तर नहीं बडा सकती,,,,, या फिर मुझे लगता है हम ही जागरुक नहीं है ,,,, कही ना कही मैं खुद अपने समाज की भी कमी समझता हूं ,,,, हर दिन पहाडों की मिट्टी ,रेता ,पानी ,पत्थर से बडे बडे कंकरीट के जंगल तैयार हो रहे है उन पहाडों के लिए क्यों नहीं सोचा जा रहा है ,,,, शहरों में रहकर पहाडों के विकास की बातें बहुत करते है लोग,, हमारे जन प्रतिनिधि ,,,,,, पहाड के लोगों को विकास का प्रलोभन देकर वोट बैंक पूरा कर लिया जाता है फिर दूरस्त क्षेत्रों की ओर झांककर भी नही देखते है ,,,, एक उम्मीद के साथ वोटर वोट देता है परन्तु फिर वही जो आज तक चलता आ रहा है ,, मुझे जन प्रतिनिधियों से आशा है कि आप राजनीति में सेवा भाव से कार्य करेंगे ,,,,, कहना तो बहुत कुछ है परन्तु समय आने पर ,,,,,,,बदलाव करना है तो युवा साथियों आप को आगे आना होगा ,,,,,हर क्षेत्र में,,,, जितने भी लोग अच्छे पद पर है पहाड के आप सब के छोटे से सहयोग प्रयास से पहाड बदल सकता है एक दूसरे की टांग खींचने से अच्छा है आप सब मिलकर पहाडों के लिए सोचिए ,,,,,,,,,,इस सत्यता पर सभी से निवेदन करता हूं विचार जरूर कीजिएगा,,,,,, रमेश चन्द्र टम्टा, सामाजिक कार्यकर्ता।

अंक 7 : नवरात्र पर पढ़ें महामाया श्री जगदम्बा माता की अनेक लीलाओं का वर्णन…

माता श्री त्रिपुर सुंदरी

नवरात्र अर्थात अपने संकल्प श्रृष्टि  में आने वाले अवरोधों(अन्धकार) को अपने तेजोमयी ज्योति के प्रकाश से प्रकाशित करना महामाया नौ रात्रियों के अन्धकार को अपने तेज से दूर करके जीवों की आत्मा को प्रकाशित कर उज्जवल बना देती है। जिसमें जीव परमार्थ (मोक्ष) की यात्रा कर सके। वे नौ अवरोध हैं। 1- अहंकार, 2- काम 3- क्रोध 4- लोभ 5- मोह 6- मात्र्सय 7- इष्र्या 8- मद 9- द्वेष ।
श्री देवी भागवत का मूल मंत्र है ‘‘सर्व खलिवद मेवाहम् नान्यर्दास्त सनातनम” अर्थात मै ना स्त्री हूॅ न पुरूष हूॅॅ अपने ही तेज के प्रकाश से समपन्न हूॅ।
‘‘एकोहम् ब्रह्म द्वितीयम नास्ति” में एक आलौकिक रूप तेज से समपन्न हॅू मैं समस्त ब्रह्माण्डों के परमाणुओं में (इलेक्टोंन, प्रोटोन न्यूट्रोन व पोजीट्रोन ) में उनकी शक्ति रूप से विराजमान हूॅू। मुझसे दूसरा इस अखिल ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
अचानक महामाया के इच्छा, जिसे कौतुक व लीला कहते है ‘‘एकोहम बहुष्यामी” हुई अर्थात अनन्त ब्रह्माण्डों में अनेक रूपो में (चैरासी लाख यौनियों के प्राणी) जो सब मेंरे ही प्रतिबिम्ब (छाया) है। और सब मेरे उदर में संकल्प रूप से विराजमान है द्वारा कौतुक (लीला) करू क्योंकि ए जीव (समस्त श्रष्ठि) मेरी ही चेतना शक्ति द्वारा प्रकाशित है। ऐसा संकल्प करते ही सीमा रहित आकाश अनन्त ब्रह्माण्ड, उनमें रहने , स्थावर (स्थिर रहने वाले पर्वत पहाड़ व वृक्ष ) जंगम,  (चलने व रेंगने वाले प्राणी ) अर्थात चार प्रकार के प्राणी 1. जरायुज (स्तनधारी प्राणी) 2. स्वेदज (पसीने से उतपन्न होने वाले प्राणी जैसे पिस्सू खटमल, कीटाणु, जुएं आदि ) 3. अंडज (अंडो से उत्पन्न प्राणी) उदभिज्ज (जमीन तोड़कर बीज के अंकुरण से उत्पन्न प्राणी) ये चार प्राकर के जीव जो समय समय पर उनकी इच्छा द्वारा उत्पन्न हुए।
सर्वप्रथम महामाया द्वारा ऊंकार का अनाहत नाद हुआ जिससे उनकी संकल्प रूपी आकाश में वायु प्रवृष्टि हुई अनेक ब्रह्माण्ड जो उनके अन्दर में परमाणु रूप से विराजमान थे। बाहर आकाश में बिखर गये वायु से उनका सम्पर्क अर्थात घर्षण हुआ जिससे अग्नि उत्पन्न हुई । अग्नि व वायु के मिलन से जल उत्पन्न हुआ। जल के साथ अनन्त परमाणु गलकर पृथ्वी गृह, नक्ष़त्र, आकाशगंगा अग्नि की उपस्थिति के प्रभाव से ठोस विशाल पृथ्वी व ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गये ये ही पंच महाभूत कहलाए (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश) इनके अन्दर जो शक्ति 1. पृथ्वी में धारण करने की शक्ति 2. जल में सब को गलाने की शक्ति 3. अग्नि में समस्त पदार्थाे को सुखाने की शक्ति 4. वायु में जीवनदायिनी शक्ति 5. आकाश में सब को ग्रहण करने की शक्ति, महामाया द्वारा ही प्राप्त हुई। इसी शक्ति के प्रभाव से पंचभूतों को पंचीकरण हुआ। उसके प्रभाव से जीवन की उत्पत्ति हुई महामाया महालक्ष्मी का अर्थ है जिनका महान लक्षण चेतन शक्तियों को अपने तेज से उत्पन्न करना है। महालक्ष्मी, को ही – महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती भी कहते  हैं ये तीनो अलग-अलग नहीं है वरन् एक ही शक्ति हैं। ये उग्र प्रकाश से संपन्न होने के कारण जीवों के नेत्रों में चकाचौंध उत्पन्न कर देती हैं। अतः उनका वास्तविक रूप दिखाई नहीं पड़ता है। अतः सिद्व साधकों वह काली दिखाई पड़ी (जैसे वैल्डिंग मशीन के प्रकाश को नग्न आंखें से देखने के बाद अंधेरा ही अंधेरा आखों के आगे छा जाता है। उनकी जीभ लाल रंग की है। अर्थात महामाया अपने उदर से अनन्त शक्ति से सम्पन्न शीतल तेज उगल रहीं है। महान शक्ति से सम्पन्न होने के कारण वायु के सम्पर्क में आने से गुरूत्वाकर्षण (श्रेष्ठ तत्व का आकर्षण) रूपी चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। चुम्बकीय क्षे़त्र में वायु के विक्षेप से संसारिक विघुत उत्पन्न हो जाती है। (अर्थात डीसी का एसी में परिवर्तन) वही विद्युत चेतन तत्व के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड के परमाणुओं के अन्दर विराजमान है। इसी चेतन शक्ति के प्रभाव से स्थावर, जंगम (जरायुग, अण्डज, स्वेदज, उदभिज) ये चार प्रकार के जीव तथा समस्त सृष्टि उत्पन्न हो गई। 
ध्यान देवें महामाया न तो कर्ता है ना उनसे श्रेष्ठ कोई कारण है। उनकी चेतन शक्ति के प्रभाव से सब कुछ स्वयंमेव हो जाता है- जैसे विद्युुत स्वयं कुछ भी कार्य नहीं करती परन्तु विद्युुत के सम्पर्क में आने वाले उपकरण (यथा पंखा, बल्ब, हीटर, एसी  आदि कारखानों की मशीनें अपने आप कार्य करने लगते है।  महामाया की इसी चेतन शक्ति के प्रभाव से श्रृष्टि में निरंतर, उत्पत्ति, पालन व संहार कार्य घटित हो रहे हैं। श्री महाकाली के हाथों में खून से लतपथ जो मस्तक प्रतीक रूप में दर्शाया गया है। उसका अर्थ है वे अपने भक्तों के अंहकार (कामना, वासना रूपी मैं का संकल्प) को खड्ग से काटना है। लाल खून चाटती हुई जीभ प्रतीक रूप में यह दर्शाती है कि माता अपनी श्रद्धालु भक्तों के क्रोध व लोभ को चाटकर उदरस्थ करती है। भयंकर डरावने विशाल, नयनों का प्रतीक रूप में अर्थ है कि माता अपने भक्तों के अंदर उत्पन्न होने वाले मोह, मद, मात्सर्य, ईष्र्या, द्वेष रूपी अनर्थों को भयभीत करती हैं। 
श्री मांकाली इन्हीें आठ अर्थों को निरंतर भक्षण करती हैं (अर्थात भ्रमण योग्य बलि है) कि उनके भक्त इन आठ (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्र्मय, ईष्र्या, द्वेष) अनुभवों के अभाव से बनकर महात्मामय की शक्ति को प्राप्त हो जाय परंतु हम कितने जीभ लोलुप संसार की आशक्ति में पड़े हुए मुर्ख हैं। कि महामाया की चेतन शक्ति से उत्पन्न, उनकी श्रृष्टि के जीवों की बलि(हत्या) देते हैं। इन जघन्य कृत्यों से महामाया कितनी रूष्ट होती होगी इसकी कल्पना करते ही सिंहरन होती है। यही पाप है। पाप व पुण्य की इतनी ही परिभाषा है। 
1. जो कार्य सांसारिक कामनाओं से अपने स्वार्थों की सिद्धी के लिए दूसरे जीवों को कष्ट प्रदान कर किया जाता है उसे पाप कहते हैं। यही नर्क(आवागमन रूपी चक्र है) यही बंधन हैं।
2. जो कार्य संसार के समस्त जीवों के कल्याण हेतु किए जाते हैं। जिसमें  अपना स्वंय का हित साधन न हो वरन संसार का निस्काम(कामनारहित) सेवा हेतु शुभ विचार हो। जिसमें नाम, धन, पद, प्रतिष्ठा प्राप्ति हेतु अपना कोई स्वार्थ न हो- यही पुण्य, यही स्वर्ग और मोक्ष है। 
दुर्गा सप्तशती का यह रहस्य परम गोपनीय है इसको श्रद्धालु परमार्थी  भक्त ही समझ सकता है। कामनाओं व वासनाओं से सरोवर संसार में अत्यंत आशक्त व्यक्तियों की समझ से परे हैं। यही भगवान शिव द्वारा दुर्गा सप्तशती का कीलक किया जाना है- अर्थात भोगी के लिए कीलक श्रद्धालु भक्त कामनाओं से रहित योगी के लिए निष्कीलन है। 
प्रधान प्रकृति त्रिगुणमयी (तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण) परमेश्वरी महालक्ष्मी ही सबकी आदिकारण है वे ही दृष्य व अदृष्य रूप से संसार को व्याप्त करके स्थित हैं। उन्होंने ही शून्य (कुछ भी नहीं) जगत को अपनी अपनी तेजोराशि ऊर्जा से संपन्न किया है। परमेश्वरी महालक्ष्मी ने जगत को शून्य देखकर अपनी तमोगुण शक्ति से एक नारी को प्रकट किया। जिनकी कान्ति काले काजल, के समान श्यामवर्ण की थी। उनकी चार भुजायंे ढाल, तलवार, प्याले और कटे हुए मस्तक से सुभोभित थी। वह वक्षस्थल पर धड़ तथा मस्तक पर मुण्डों की माला धारण किये हुए थी। इस प्रकार प्रगट हुई तामसी देवी ने महालक्ष्मी से कहा माताजी  आपको नमस्कार। मुझे मेरे नाम व कर्म बताइये। महालक्ष्मी ने कहा तुम्हारे नाम होंगे महामाया, महाकाली, महामारी क्षुधा, तृषा, मिश्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि तथा दुरत्यय ये तुम्हारे नाम होंगे। 
तदन्तर महालक्ष्मी ने अत्यंत शुद्ध सतोगुण द्वारा दूसरा रूप धारण किया।  जो चंद्रमा के समान गौरवर्ण का था वह नारी अपने हाथों में अक्षमाला अंकुशवीणा और पुस्तक धारण किये हुए थी। महालक्ष्मी ने उन्हे भी नाम दिए महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक, सरस्वती, आर्या बा्रहमी, कामधेनू, वेदगमी, बुद्धि की स्वामिनी- ये तुम्हारे नाम होंगे। तदन्तर महालक्ष्मी ने महाकाली और महासरस्वती से कहा देवियो तुम दोनों अपने-अपने गुणों के योग्य स्त्री- पुरूष के जोड़े उत्पन्न करो। ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने सर्वप्रथम स्त्री- पुरूष का जोड़ा अपने शरीर से उत्पन्न किया वे दोनों निर्मल ज्ञान से संपन्न थे। महालक्ष्मी ने पुरूष को ब्रहमा धाता विधे  विरिच नाम से संबोधित  किया तथा स्त्री को श्री पद्मा-कमला-लक्ष्मी नाम से पुकारा। इसके बाद महाकाली ने एक स्त्री-पुरूष का जोड़ा उत्पन्न किया। महाकाली ने कण्ठ में नील चिन्ह से युक्त लाल भुजा श्वेत  स्थाणु, कपर्दी और त्रिलोचन के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा स़्त्री  के त्रयी- विद्या- कामधेनु- भाषा- अक्षरा और स्वरा नाम हुए । 
महासरस्वती ने गोरे रंग की स्त्री और श्याम रंग के पुरूष को प्रगट किया- उनसे पुरूष के नाम विष्णु-कृष्ण, हर्षाकेश,-वासुदेव और जर्नादन हुए तथा स्त्री के नाम उमा-गौरी- सती- चण्डी-सुन्दरी सुभगा और शिवा- इन नामों से प्रसिद्ध हुयी। महालक्ष्मी से सर्वप्रथम उत्पन्न महालक्ष्मी- महाकाली- महासरस्वती ने जोड़ा उत्पन्न कर तत्काल पुरूष में परिणित हो गयी। 
उसी पुरूष को ज्ञानीजन, परब्रहम परमात्मा श्रीकृष्ण  एवं श्री गणेश जी भी कहते हैं। अज्ञानी जनों की बुद्धि इस रहस्य को समझने में असमर्थ है।
तदन्तर महालक्ष्मी ने उत्पन्न हुए स्त्री-पुरूष के जोड़ों में से 1. सरस्वती जी को ब्रहमा जी के लिए पत्नी के रूप में समर्पित किया। 2. वरदायिनी गौरी(पार्वती) भगवान शिव  को पत्नी के रूप में दी। 3. भगवान विष्णु(वासुदेव) को लक्ष्मी पत्नी रूप में प्रदान की।
दुर्गतिहारिणी( संसार का हरण करने वाली) दुर्गा की नौ मूर्तियां हैं।  वे सिंह की पीठ पर सवार विराजमान है चारभुजाओं में शंख-चक्र-धनुष-वाण धारण करती है। वे भगवती( भग-छह एश्वर्यों से युक्त) है। संसार में आवागमन(जन्म-मृत्यु) रूपी दुर्गति को दूर करने वाली हैं। उनकी नौ मूर्तियों के नाम हैं।    
1. शैलपुत्री 2. ब्रहमचारिणी 3. चंद्रघंटेति 4. कुष्मांडा 5. स्कन्दमाता(स्वामी कार्तिकेय की माता) 6. कात्यायिनी(षष्टी देवी नवजात शिशुओं की रक्षा करने वाली)7. कालरात्रि( प्रलय के समय-यमराज(मृत्यु) का भी संहार करने वाली 8. महागौरी 9. सिद्धिदात्री।
2.  नौ शक्तियां हैं-  1. बा्रहमी देवी(सवारी हंस) 2. माहेश्वरी (वाहन बृषभ)3. कौमारी (वाहन मयूर)4. वैष्णवी(वाहन गरूड़)5. वाराही (वाहन भैंसा) 6. नारसिंही (वाहन सिंह) 7. एैन्द्वी( वाहन ऐरावत हाथी)8.  शिवदूती(वाहन वृषभ) 9. चामुण्ड (प्रेत पर सवारी करने वाली)                                            
चण्डिका देवी की मूर्तियां :
1. नंदा देवी( उत्तराखंड की कुलदेवी जिनकी पूजा राजजात के रूप में होती है) ये त्रिपुर सुंदरी(तीनों पुरों पृथ्वी, पाताल व स्वर्ग लोक में सबसे सुंदर ) कांतिवाली है। इनके वस्त्र और आभुषण स्वर्गमय है- चार भुजाओं में कमल, अंकुश, पाश, और शंख में सुशोभित है। नंदादेवी को ही श्री इन्दिरा, कमला, लक्ष्मी, और रक्ताम्बुज आसन सवुर्ण के आसन पर विराजमान होती है। 
2. भ्रामरी देवी- भ्रमर के समान अनेक रंगों की तेजोमंडल के कारण तुर्घर्ष है इन्होंने बैजनाथ् मं अरूण दैत्य  का वध भ्रमरों के रूप में किया था। अरूण दैत्य की राजधानी गरूड़ नाम से प्रसिद्ध थी। इन्हें ही रण चण्डिका(कोटामायी) कहा जाता है। 
3. शाकम्भरी देवी- कान्ति नीलकमल के समान है नील कमल का आसन धारण करने वाली हाथों में वाणों की भरी मुष्टि कमल शाक समूह, प्रकाशमान धनुष- शाक समूह, फल-फूलों, अन्न के रसों से भरी है। शाकम्भरी को श्रीशताक्षी और दुर्गा भी कहते हैं। 
4. रक्तदन्तिका- का आकार विशाल ब्रहमांड के समान है। चार हाथों में खड़ग, पानपात्र, मूसल, हल धारण करती है। इन्हे रक्त चामुण्डा और योगेश्वरी भी कहते हैं। 
5.  भीमादेवी- का रूप अत्यंत भयंकर है इन्होंने हिमालय में भीम दैत्य का वध किया था ये हाथों में खड्ग, डमरू, मस्तक , पानपात्र धारण करती है। इन्हे कालरात्रि या कामदा भी कहते हैं। 
ध्यान देवें, महालक्ष्मी के तीन रूप हैं- 1. महालक्ष्मी 2. महाकाली 3. महासरस्वती 
1. महालक्ष्मी- भगवान विष्णु की दुस्तर माया है योगनिद्रा है। समस्त देवताओं के तेज  से इनका प्रादुर्भाव हुआ है इन्होंने ही महिषासुर (अंहकार का प्रतीक) का वध किया। अपनी कान्ति से प्रभावित कमल के आसन पर विराजमान अठारह भुजाओं वाली सर्वदेवमयी और सबकी ईश्वरी है। 
2. महाकाली- भी महालक्ष्मी का ही एक रूप (लीला करने हेतु) है। मधु (अज्ञान-अंधकार) कैटभ (कोहरा, महानमोह) का वध करने वाली महाकाली( नंदादेवी) है। यद्यपि उनका भंयकर रूप है। परंतु भक्तों के लिए उनका रूप अत्यंत कमनीय है महती संपदा(आत्माान व मोक्ष) प्रदान करने वाली- ये दस भुजाओं से संपन्न हैं। 
3. महासरस्वती- महालक्ष्मी का ही एक स्वरूप है। जो एकसमान सतोगुण के आश्रित हो पार्वती से शरीर के आधेभाग(गौरवर्ण) से प्रगट हुयी जिन्हे कौशिकी भी कहते हैं। इन्होंने शुम्भ- निशुंभ (कामना-वासना रूपी प्रतीक) का वध किया। ये साक्षात सरस्वती कही गई। ये आठ भुजाओं से संपन्न हैं। 
श्री पार्वती के आधे शरीर(कृष्णवर्ण) से चामुण्डा उत्पन्न हुयी। इन्होंने चण्ड-मुण्ड (क्रोध मोह रूपी) एवं रक्तबीज(लोभ व संसार की आसक्ति दोष का प्रतीक) आदि असुरों का वध किया। देवी सर्वरूपमयी है तथा संपूर्ण जगत देवीमय है। अतः मै उन विश्वरूपा परमेश्वरी को नमस्कार करता हूं।
-हेम चंद्र उपाध्याय, दुर्गा मंदिर बाजपुर
-हेम चंद्र उपाध्याय, दुर्गा मंदिर बाजपुर (संकलन- श्रीदेवीभागवत व श्रीदुर्गा सप्तशती)

अंक 6 : प्रकृति भी कर रही नव वर्षाभिनंदन…

हर्षित नव मधुमास मनोरम
स्वागत है दोउ जोरि करों से,
नवल वर्ष की प्रथम रश्मि का,
अभिनन्दन शुभ शंख स्वरों से !
 
सज-धज कर नव वत्सर प्रकटे,
ज्यों सवार अरुणिम घोटक पर,
मधुर प्रफुल्लित, प्राची दिशि से,
सुस्वागत करते  हैं दिनकर  !
वन-उपवन-वाटिका पल्लवित,
 
उलसित, कर में पुष्प थार ले,
ठाड़ी अतुल अलंकृत धरणी, 
परम प्रतीक्षित मृदु दुलार ले  !
ज्यों चूमे जननी प्रिय सुत को,
निज कोमल मधुमय अधरों से,
नवल वर्ष की प्रथम रश्मि का,
अभिनन्दन शुभ शंख स्वरों से !!
 
निरखि प्रकृति की छटा अलौकिक, 
जैसे कोष धनाधिप खोले ,   
चहु दिशि सुन्दर शगुन स्वरों में,
वनप्रिय मधुरिम गायन बोले !
सुमधुर पूजन मन्त्र आरती,  
वेद ऋचाएं ‘हरि-गृह’ गूंजें ,
नाना प्रचलित पृथक-पृथक विधि,
निज-निज आराध्यों को पूजें !
सकल धरा अब भई मनोहर,
मानो गुंजित ‘गण-भ्रमरों’ से।
नवल वर्ष की प्रथम रश्मि का,
अभिनन्दन शुभ शंख स्वरों से !!
 
– नवीन जोशी ‘नवल’ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा- वि.सं. २०७६, 
 

अंक 5 : उत्तरांचल में चैत्र माह में बहन-बेटियों से उनके ससुराल जाकर स्नेह-भेंट करने की विलक्षण प्राचीन परंपरा “भिटौली” पर…

 
दिखेँ कहीं राह में पिता या भाई आते ,
कातर दृग एकटक अनंत तक ताकते   
भिटौली क्यों नहीं आई मेरे उस घर से ?
सब ठीक तो हैं ! हृदय हांफता इस डर से 
दूर आता दिखे कोई थैला सा हाथ लिए 
आँखों में जलने लगे शीघ्र स्नेह  के दिये
फिर नर्वस विवस! अरे यह तो है कोई और,
विचलित अंतर्तम में नहीं सुख के लिए ठौर !
  
क्यों विचलित, क्यों वह इतनी आहत है?
क्या मां-पिता, भाई से कुछ उसे चाहत है ?
नहीं!  उसे  तो एक अदृश्य दुलार चाहिए 
जन्म से हैं अपने जो उनका प्यार चाहिए
मेरा परिवार मेरा है, ऐसा विश्वास खोजती,
मेरे पीछे सहारा है, एक अहसास खोजती  !
यह चाहत नहीं एक भावना, एक आस है ,
मैं विस्मृत नहीं हूँ, एक अटूट विश्वास है ! 
 
विकास का युग है, स्वयं को परखना होगा, 
पावन परम्पराओं को जीवित भी रखना होगा
महकती चहकती रही वर्षों जिस आंगन में  
दिवाली, होली, फूलदेई व राखी वाले सावन में  
जहाँ वह उछलती कूदती करती रही ठिठौली
व्यथित होना ही है न जाए वहां से भिटौली !!
 
– नवीन जोशी ‘नवल’, 4 अप्रैल 2019

अंक 5 : महामाया जगदम्बा की स्तुति ‘दुर्गा सप्तशती’ में जानें ‘कीलक  स्तोत्र’ का महत्व 

माता भद्रकाली के मंदिर में माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली की तीन प्राकृतिक स्वयंभू पिंडियाँ

महामाया जगदम्बा की स्तुति के ‘दुर्गा सप्तशती पाठ मात्र से साधक के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। उसे दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है तथा वह कल्याण का भागी होकर सिद्ध हो जाता है। उसको मंत्र व औषधि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। उसके समस्त उच्चाटन व अभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं। अत: यह आवश्यक है कि महामाया के साधक को परम परमार्थिक होना चाहिए। जिससे वह ‘दुर्गा सप्तशती’ में, जो माता की अपार शक्ति भरी हुई है, के पाठ मात्र से ही समाज व दु:खी लोगों का भला कर सकें। परंतु कुछ साधक (मार्गभ्रष्ट होकर) धन के लोभवश तथा संसार की झूठी मान प्रतिष्ठा के फेरे में पड़कर ‘दुर्गा सप्तशती’ का दुरुपयोग अपनी साधना के द्वारा समाज के लोगों को अभिचारिक मत्रों द्वारा नुकसान पहुंचाने लगे। अतः श्री भगवान शंकर ने श्रीचंडिका के सप्तशती नामक स्तोत्र को कीलक (अर्थात गुप्त) कर दिया कि दुष्ट विचारधाराओं वाले सांसारिक लोगों को  ‘दुर्गा सप्तशती’ की साधना में सफलता न प्राप्त हो सके जिससे वह समाज का अहित न कर सकें। 

भगवान शिव ने निष्कीलन की विधि भी अपने सानी व आसक्तिहीन भक्तों को समझायी है कि नि:ष्काम भावना रखते हुए समग्र अर्पण (भेंट) महामाया कों कर दें। ध्यान देंवे हम भेंट वह कर सकते हैं जो हमारी स्वंय की वस्तु हो। परंतु यह शरीर व इंद्रिया पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश) से निर्मित हुआ है। यह शरीर भी महामाया ने हमे धरोहर के रुप में दिया है। इसमें हमारा स्वत: अधिकार नही है। हमारा अधिकार हमारी अपनी वस्तुओं केवल (मन) है। मन न तो पंचभूतों से निर्मित हुआ है न ही इसमें कोई चेतन शक्ति है। यह अंधकार के समान (अज्ञान) है। अंधकार को कोई अपना अस्तित्व नहीं होता। प्रकाश (ज्ञान) का न होना ही अंधकार है। अतः अपने अंदर के समस्त संकल्पों को (काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सय, ईश्र्या, दोष) जो अज्ञान की उपस्थिति में ही हमारे (मन) द्वारा प्रकट हो जाता है। मन हमारे विपरित दिशा में गति करता है। अर्थात शुभ से अशुभ, देवता से शैतान, सुख से दु:ख, लाभ से हानि में स्थित कर देता है। हमेशा चलायमान रहता है। अत: अब गंभीर समस्या यह है कि मन को महामाया के चरणों में कैसे अर्पण करें। इसका उत्तर श्री महादेव शंकर ने बताया कि संसार व जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में सर्वत्र एक महामाया को विराजमान अनुभव करें क्योंकि 84 लाख योनियों में इनकी चेतन शक्ति (ऊर्जा) एक ही है। और उनकी यह समष्टि प्रकृति (जो उनकी अपनी ही छाया-माया है) उन्ही की धरोहर समझकर उन्ही को अर्पण कर दें। तथा एकाग्र चित्त से प्रार्थना करें माता आज से यह न्याय द्वारा कमाया हुआ धन, सपंत्ति तथा अपने आप (अंहकार) को भी मैने आपकी सेवा में अर्पित कर दिया। अब इस पर मेरा कोई स्वत्व नही रहा। फिर अपने ह्दय गुहा में विराजमान भगवती चण्डिका का ध्यान करते हुए यह भावना करें मानो जगदम्बा कह रही हैं मेरे भक्त बेटा संसार यात्रा (पारवध के नाश होने तक) के निर्वाहार्थ तू मेरा यह प्रसाद रुपी धनग्रहण कर मैं तेरी व्यवस्था स्ंवय करुंगी (योग क्षेमं वहाम्यह्म) इस प्रकार देवी क आज्ञा शिरोधार्य कर उस धन को प्रसाद बुद्वि से ग्रहण करें। धर्म शास्त्रों में जो न्याय मार्ग बताए गए हैं। उस मार्ग से धन का सत्य, व्यवहार से व्यय करते हुए सदा देवी के अधीन होकर रहें। देवी की कृपा स्वयमेंव हो जाती है। 

ध्यान देंवे संसार एक एश्वर्य, भोग, सुख व मान-प्रतिष्ठा प्राप्ति हेतु निष्कीलन कदापि नहीं हो सकता। श्रीमहामाया की इच्छा-लीला को सर्वोपरि मानते हुए समाज में दु:खी लोग के कष्ट निवारण हेतु नि:ष्काम भावना से अगर ‘दुर्गा सप्तशती’  का पाठ किया जाय तो श्रीघ्र शुभ फलों की प्राप्ति महामाया करवा देती हैं। मूल मंत्र हैं- ऊं ऐं ह्री क्लीं चाण्मुडाये विच्छै इसका अर्थ हे चित्तस्वरुपणी (आत्मरुपणी) महासरस्वती हे सदरुपणी (स्वंय अपने ही प्रकाश में प्रकाशित), महालक्ष्मी, हे आनंदरुपणी (अपने स्वरुप का ज्ञान द्वारा अनुभव करवाकर आनंद प्रसाद करने वाली) महाकाली जी ब्रह्म विद्या (ब्रहम ज्ञानी) ब्रह्म ज्ञान पाने के लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती स्वरुपिणी चण्डिके तुम्हे नमस्कार है। मेरे अज्ञान रुपी रस्सी की दृढ़ गांठ को खोलकर मुझे जो मेरे द्वारा ही बांधे हुए आसक्तिरुपी सांसारिक भ्रम-माया के बंधन हैं उन्हे मुक्त करो।

संकलन-  ‘दुर्गा सप्तशती’  के पाठ से- हेम चंद्र उपाध्याय, दुर्गा मंदिर(शास्त्री मंदिर) बाजपुर, ऊधमसिंहनगर मो. 9410465975

अंक 4 : जानें उत्तराखंड के कुलदेवता-गोलूदेवता (श्रीगोलज्यू) व राजा विक्रमादित्य के बारे में…

उत्तराखंड के कुलदेवता गोलू देवता(श्री गोलज्यूू) एवं उज्जैन नरेश राजा भृतृहरि के अनुज राजा विक्रमादित्य (जिनके नाम पर विक्रमी संवत चल रहा है) चेतन शक्तियां, अवतारी पुरुष हैं, ये सिद्ध महापुरुष हैं। चेतन शक्तियां उन्हें कहा जाता है जो एक ही एक काल में अनेक स्थानों पर आवाह्न किए जाने पर अवतरित हो सकते हैं। इस प्रकार सिद्ध पुरूष, अपनी इच्छानुसार शरीर धारण कर लेते हैं क्योकिं वे अमृततत्व को प्राप्त आत्मा है। अग्नि की तरह परमाणु-परमाणु में विराजमान हैं। 

वैसे तो 84 लाख योनियों के जीव सब महामाया जगदम्बा की कृपा से उनकी चेतनशक्ति द्वारा ही उत्पन्न हुए हैं, परंतु अज्ञान भ्रम के कारण अपने स्वरुप (अमृततत्व) का बोध न होने से वे संसारी जीव कहलाते हैं। 

श्री गोलज्यू एवं राजा विक्रमादित्य भगवान शिव के ग्यारह अवतार (रुद्र-भैरव) में आठवे भैरव के रुप में अवतरित हुए थे। ये दोनो देवता स्वरुप हैं। इन्होंने जीवन भर अन्याय, अधर्म, अराजकता के विरोध में संघर्ष किया और अभी भी सतत न्याय दिलवा रहे हैं। अज्ञान भ्रम का नाश कर रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य को उनके स्वरुप (अमृततत्व) का निरंतर बोध प्रदान कर रहे हैं। श्री गोलज्यू का वंश कत्यूरी है। धूमाकोट मंडल (चंपावत) का शासन श्री गोलज्यू के न्यायानुकूल हाथों में था। इनकी वंशावली में राजा तलराई (परदादा), राजा हलराई (दादा जी) एवं राजा झालूराई (पिताश्री) थे। श्री गोलूदेवता आठवें भैरव के अंशावतार हैं। 

श्री बृजेंद्र लाल साह जिनका निवास देवीभजन लाला बाजार अल्मोड़ा में हैं। उन्होंने अति सुंदर गोलू त्रिचालीसा की रचना की है। उसी में से उद्धृत श्री गोलू आरती मानव जीवन का कल्याण करने वाली है। प्रस्तुत है गोलू देवता आरती –

ऊं जयश्री गोलू देवा स्वामी जय गोलू देवा

शरणागत हम स्वामी स्वीकारो सेवा

वंश कत्यूरी तुम्हारो, धूमाकोट वासी, स्वामी धूमाकोट वासी

जय-जय हे करुणाकर, जय-जय सुखरासी

हलराई के पोते, पिता झालूराई

तपस्विनी कालिंका माता कहलाई 

ऊं जय श्रीगोलू देवा

नाम अनेक तुम्हारे ग्वैल, गोलू, गोरिल स्वामी 

गौर भैरव दुधाधारी  बालगौरिया न्यायिल

परजा पालकरक्षक, तुम हो दु:ख हरता

पोषक दीन दयाला, तुम त्राता भरता

पंचदेव के भांजे, भैरव अवतारी

श्वेत अश्व आरु ढ़ी, जयति धनुरधारी

भेंट चढ़े ध्वज घंटी, मिष्ठान अरु मेवा

द्वारा खड़े हम तुम्हरे, स्वीकारो सेवा

शरणागत आरत की पीर हरो देवा

विनवे दास बृजेन्दर साह करे सेवा


संकलन- हेम चंद्र उपाध्याय दुर्गा मंदिर(शास्त्री मंदिर) बाजपुर , ऊधमसिंहनगर 

अंक 3 : अल्मोड़ा (उत्तराखंड) की चेतन शक्तियां  श्रीत्रिपुर सुंदरी, श्री बाला व भोलानाथ (शिव)

अल्मोड़ा के पलटन बाजार में स्थापित बटुक भैरब भोलानाथ जी के मंदिर का गर्भगृह

 

 

जगदंबा माता की दस महाशक्तियां (महाविद्या) हैं : 1. श्रीकाली 2. श्रीतारा 3. श्रीछिन्नमस्ता 4. श्रीषोडस्ती 5. श्रीभुवनेश्वरी 6. त्रिपुर भैरवी 7. श्रीघूमावती 8. श्रीबगुलामुखी 9. श्रीमातंगी माता 10. श्रीकमला माता

माता श्री त्रिपुर सुंदरी

 

 

 

ये महाविद्यायें (महाशक्तियां) ब्रहमांड की दसों दिशाओं की रक्षा करती हैं। पंद्रहवी व सोलहवीं सताब्दी के मध्य अल्मोड़ा के राजाओं को अकाल व गोरखों के आक्रमण से त्रस्त होना पड़ा था। उस समय वर्मा राज्य (वर्तमान त्रिपुरा प्रदेश) से कुछ संतों की टोली कैलास मानसरोवर यात्रा के दौरान अल्मोड़ा के राजा के वहां आतिथ्य रुप में ठहरी थी। राजा ने उनसे अपना कष्ट निवेदन किया। संतो में एक सिद्ध संत भी थे वे त्रिपुर भैरवी के उपासक थे। वे गृहस्थ भी थे, उनकी पत्नी व पुत्र उनके साथ थे। पत्नी भी श्री त्रिपुर भैरवी भी परम उपासक थी। उन्होंने राजा के कष्ट निवारण हेतु माता त्रिपुर भैरवी का आवाह्न किया, तथा अल्मोड़ा में श्रीत्रिपुर सुंदरी माता का मंदिर निर्माण करवाया। माता की उपासना से कुछ काल के उपरांत राजा के राज्य का कष्ट निवारण हो गया। अत: राजा ने त्रिपुरा (वर्मा) के उन सिद्ध संत का राज्योचित सम्मान किया। इससे राजा के पुरोहित को ईष्या हुई। उसने षड़यंत्र रचकर उन संत की पुत्र व पत्नी समेत हत्या करवा दी। इस पर सिद्ध संतों की आत्माओं ने पूरे शहर में विपल्व मचा दिया। राजा ने प्रायश्चित किया। डोब गांव के एक सिद्ध ब्राहमण थे। उन्होंने राजा से अनुष्ठान करवाया। अपने मंत्र बलों से उन्हें शांत करवाया। उन्होंने उन सिद्ध महात्मा को श्री शिव भोलानाथ, उनकी पत्नी को बर्मी माता तथा उनके पुत्र को श्री बाला भगवान के रुप में स्थान प्रदान किया। आज भी अल्मोड़ा शहर की कन्या का विवाह होता है तो कन्या की रक्षा हेतु उनकी डोली के साथ ये देवता उसके ससुराल में अपनी पूजा व सम्मान हेतु स्थान पाते हैं। अत: ध्यान देवें ये देवता चेतन हैं। ये मृतक आत्मा (भूत देवता) नहीं हैं। हालाँकि अल्मोड़ा क्षेत्र की जनता के आराध्यदेव भोलानाथ को चंद राजवंश के राजकुमार के रूप में भी कथा क्षेत्र में कही जाती है।  उल्लेखनीय है कि श्री त्रिपुर सुंदरी माता का मंदिर त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 56 किमी दूर उदयपुर (मातावरी) स्थान में है।  मुंडमाला, तंत्रोंत्र महाविद्यास्त्रोत्र में श्रीत्रिपुर सुंदरी की स्तुति है-

त्रिपुरी सुंदरी बाला अबला गण भूषिताम्
शिवदूती शिवाअराध्या शिवध्येया सनातनिम्
सुंदरी तारणी सर्व शिवगण विभूषितम्
नारायणी विष्णुपूज्या ब्रह्म विष्णु हर प्रियाम्
सर्व सिद्धी प्रदा नित्या अनित्या गुण वर्जिताम्
सगुण निर्गुणा घ्येया अर्चिता सर्व सिद्धिकाम
 
(संकलन- हेम चंद्र उपाध्याय, दुर्गा मंदिर (शास्त्री मंदिर) बाजपुर, ऊधमसिंहनगर )

अंक-2 : गांवों से पलायन की पीड़ा पर दिल्ली से अल्मोड़ा मूल के नवीन जोशी ‘नवल’ की अभिव्यक्ति : “मैं तेरा घर-आंगन”

नवीन जोशी “नवल”

बनकर मूक-तपस्वी रहता आस संजोये मन ही मन 
सूना-सूना बाट जोहता वर्षों – “मैं तेरा घर-आंगन”

भरे नेत्रजल राह ताकता, दे प्रियवर अब मुझको तोषिक,
करले मुझको याद कभी तो, मैं तेरा तू मेरा पोषित।
कहाँ गया उल्लास मोद, कहाँ गयी वह अमित प्रीत है,
कहाँ गयीं होली-दीवाली, कहाँ गये वे नवल गीत हैं।
तीज-बसंत विविध अवसर पर, क्यों छोड़ा है मेरा दामन?
सूना-सूना बाट जोहता वर्षों – “मैं तेरा घर-आंगन” ।१।

कितने सावन, कितने फागुन, मैंने देख लिये भर लोचन,
विस्मित कातर भीत बना अब, जो आँगन था नंदन कानन ।
पर छोड़ी ना आस आज लौ, फिर बहुरेगा उपवन मेरा,
उल्लसित किलकित गुंजित होकर, सुरभित हो हर कोना मेरा ।
नव-बसंत, अगणित पतझड़ औ, झेली हैं ऋतुएँ मनभावन,
सूना-सूना बाट जोहता वर्षों – “मैं तेरा घर-आंगन” ।२।

किस सुख की चाहत में मुझको छोड़ा तूने आज बता दे,
क्या खोया-क्या पाया अब लौ, सारी गठरी आज दिखा दे ।
था वैभव गोदी में मेरी, कितना उसको और बढाया ?
संरक्षण की बात नहीं है, संवर्धन कितना कर पाया ?
किंचिद् उस निधि में से मेरी जीर्ण देह तो कर दे पावन,
सूना-सूना बाट जोहता वर्षों -“मैं तेरा घर-आंगन” ।३।

चिर प्रतिक्षित मैं उपेक्षित, जर्जर, दुर्बल, मौन, हताहत,
शिथिल ह्रदय मैं खड़ा आज ले, अपनों से मिलने की चाहत ।
कालकूट सी मेघ गर्जना, भरी दुपहरी, रात घनेरी,
पर विश्वास न छोड़ा अब तक, आयेगी फिर संतति मेरी।
पुन: खिलेंगे पुष्‍प गोद में, फिर आयेगा नूतन सावन,
सूना-सूना बाट जोहता वर्षों – “मैं तेरा घर-आंगन” ।४।

श्री जोशी का पत्र : 

महोदय,

नमस्कार, अत्यंत हर्ष का विषय है कि आपने “आपका कोना” नाम से पाठकों के लिए स्तंभ बनाया है, जो निश्चित ही साहित्य को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करेगा।
मैं नवीन जोशी “नवल” मूलतः अल्मोड़ा जिले से हूं, वर्तमान में दिल्ली में निवास है। मैं अपनी स्वरचित कविता प्रकाशन हेतु भेज रहा हूं, यदि संभव हो तो प्रकाशित करने की कृपा करेंगे।

                  – नवीन जोशी “नवल”, ,मूलतः अल्मोड़ा से, वर्तमान में दिल्ली में निवासरत (10 फ़रवरी 2019)

अंक-1, दिल्ली बटी लोक कलाकार जगदीश तिवारी ज्यूकि द्वि कुमाउनी कविता 

1- सड़का तू आई लकी आब आई

जगदीश तिवारी

सड़का तू आई लकी आब आई
सड़का तू आई लकी आब आई

गौं-बाखई खाली हैगे,
चौथरमॅ बुकिल भौगाव जामिगे
पख दन्यारिम बाघ भै रौ
मलस्यारि बानर, तलस्यारी सूअरा बोई रौ
भितेर टुटि ग्वोठ ऐगो
ग्वठ बयै रै बिराई
सड़का तू आई लकी आब आई
सड़का तू आई लकी आब आई

32 झड़ियॉ कुठुम्ब ओ ईजा
राति शंखक टुटाट, दिन भरी चडमडाट
परबेर गोबिन्दुकरॉक बुड़बाड़ीलै
य तलि है न्है गयीं
हिन्दी में, जानि द्या मिहै कै गयी, हमर द्वार म्वार लै चहै दिये, ताई
सड़का तू आई लकी आब आई
सड़का तू आई लकी आब आई

खेती पाति बड-ख्वड़
तलि-तलि, मलि-मलि
सारी व्वड़ सारिय रै गो
गोरू बछा टान पन
टान टान रै गो
टपकनै टपकनै आखों मजा ऑस लै सुखि गो
बिजुली त छ, बडम, जगहै आब काकै बुलाई
आई लै म्यर नान-तिन एैल, आस सबुल लगै रै, मैल लै लगाई
सड़का तू आई लकी आब आई
सड़का तू आई लकी आब आई

2- नक झन माानिया ईजा, पहाडी छूं पहाड़ी बुलानू

नक झन माानिया ईजा, पहाडी छूं पहाड़ी बुलानू

आफूं कतुकै हिन्दी में बड़बड़ाट पाड़ो, अंग्रेजी में फड़फड़ाट पाड़ो
मिकैं नी लागनी सरम, किलैकि मैं इकैणी माननू आपण धरम करम
आपण भिड़ परि ल्यौण, म्यर उचेणी उचेणी बै खाई छीं
झाल परि हिसाव थ्वप, किलमौड़, काफों, ब्यर
राति पर पॉव पड़ि ताजि, ख्याणा, मिहौव म्यर पचकायी छीं
तुमलै खछा के,
अलघता-परघता नी टावो,
जे नी हल झनप्प हो, में त हर साल एक-द्वी बार, आपण पहाड़ जरूर जानू
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानू
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानू

ओ ईजा भटक चुड़काणी, गाजड़
गहतक बेडू, डुबुक, मनुवक स्वटमॅ घ्यों पचक
गुनीगुनी ताज्जी छॉ, झोई व छचियै गजैक,कैं
किलै भुलीगोछा,
वू मू-गढेरी साग, आहा पिगौं ककड़ रैत
आज लै पहाड़ जै बेर, पिसी लूणम नीमू राई बेर
पैलियैक जस, मैतै पचकानु
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानू
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानू

हमर गौं मथै द्यप्ता थान, ठुल बाज्यू रातियै नाई धोई बेर, दुर्गा पाठ, ज्ञान ध्यान
मन्दिरों में ह्यौनों दिनोंक सप्ताह, गमिछिकांे रामलीला
फुल देई फूल, दिवाई ऐपण, उतरैणी गूड़, नाख ठुकुम घ्यांे, कान जडों में जौ
तुमुकै लै याद हुनल,
मैं आजि लै पहाड़ जै बेर, दशहरा द्वार पत्र
आपण हाथोंल आपण द्वारों पै चिपकौनूं
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानु
नक झन माानिया ईजा, पहाडी छू पहाड़ी बुलानु

                                              -जगदीश तिवारी, लोक कलाकार, उत्तराखंड, वर्तमान में दिल्ली में निवासरत (9 फरवरी 2019)

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