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उत्तराखंड के इस जिले में तेज हो रही खालिस्तान की मुहिम !

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ऊधमसिंह नगर, 16  अक्टूबर 2018। अपराध के दृष्टि से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले ऊधमसिंह नगर जिले में भी खालिस्तान समर्थकों की सोशल मीडिया के माध्यम से मुहीम लगातार बढ़ने के प्रयास जारी हैं। तीन माह पहले जहां पुलिस ने खटीमा क्षेत्र से खालिस्तान समर्थक को जेल भेजा वहीं चार दिन पहले रुद्रपुर में एक बुजुर्ग को वीडियो और पोस्ट सोशल साइट पर पोस्ट करने के मामले में पुलिस ने पकड़ा है।
उल्लेखनीय है कि 1984 के सिख दंगों के बाद 1990 के दशक में तराई भी सिख आतंकवाद से प्रभावित हुई थी। इसी दौरान सिख समाज के लिए अलग राष्ट्र की मांग उठाने वाले पंजाब के जनरैल सिंह भिंडरवाला की ओर से चलाई गई खालिस्तान बिग्रेड से कुछ लोग जुड़े और 20-20 खालिस्तान रिफ्रेंडम के नाम से मुहिम छेड़ी। इस मुहिम में खालिस्तान समर्थकों ने भारत में ही सिख समाज के लोगों के लिए एक अलग राष्ट्र बनाने की मांग उठाई जिसमे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश, यूपी और उत्तराखंड राज्य को शामिल करने की मांग की गई।वर्तमान में भी भिंडरवाला समर्थक सोशल मीडिया पर प्रचार प्रसार के लिए भारत के नक्शा प्रेषित कर उसमें उक्त राज्यों के क्षेत्रफल को नारंगी रंग में दर्शाते हैं। पुलिस प्रशासन की सख्ती के बाद भिंडरवाला के कुछ समर्थक विदेश भाग गए और वर्तमान में वहीं से सोशल मीडिया के जरिये खालिस्तानी विचारधारा को प्रचारित- प्रसारित कर रहे है। सूत्रों के अनुसार  पिलीभीति के भी कुछ खालिस्तान समर्थक ऊधमसिंह नगर जिले में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। खटीमा में पकड़े गये खालिस्तान समर्थकों से पूछताछ के दौरान मुहीम से जुड़ा परमिंदर बोरा भी एक नाम पुलिस के सामने आया था जिसकी जांच पड़ताल पुलिस और खुफिया एजेंसिया कर रही हैं। साथ ही वर्ष 2011 में रामनगर के बैलपड़ाव क्षेत्र से भी पुलिस ने एक खालिस्तान समर्थक को पकड़कर उसके पास से हथियार बरामद किए थे।

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खटीमा, 4 सितंबर 2018। उत्तराखंड की खटीमा पुलिस ने निकट के जादौपुर गांव के रहने वाले हरजीत सिंह उर्फ बाबी भिंडर पुत्र बख्शी सिंह नाम के युवक को गिरफ्तार किया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार उसके खिलाफ राजद्रोह तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 153बी, 505 व आई एक्ट केे तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। उस पर सोशल मीडिया पर खालिस्तान समर्थक ‘भिंडरवाला’ नाम से सोशल मीडिया में ग्रुप बनाकर संदेश प्रसारित करने और लोगों को देशद्रोह के लिए भड़काने और दो समुदायों के बीच वैमनस्यता फैलाने के आरोप लगाये गये हैं। वह अपने नाम के आगे भी भिंडरवाला लिखता है। पुलिस इस ग्रुप के मुख्य एडमिन के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रही है। साथ ही उसके अन्य साथियों पर भी शिकंजा कस रही है। मामला संगीन होने के कारण पुलिस के अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व उत्तराखंड पुलिस ने सितंबर 2016 में भी ऋषिकेश से भी एक खालिस्तान समर्थक जगजीत सिंह सिंह उर्फ जग्गा पुत्र हरविंदर सिंह निवासी तिलक मार्ग ऋषिकेश को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार आरोपी शिरोमणि अकाली दल (मान) अमृतसर का युवा उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष भी था। उसने अपनी फेसबुक वॉल पर राष्ट्रविरोधी नारे व पोस्टर अपलोड किए थे, साथ ही 22 फरवरी 2016 को अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट शेयर की थी। इसमें मोहम्मद अली जिन्ना व आतंकवादी जनरैल सिंह भिंडारवाला के पोस्टर शामिल थे। उसके खिलाफ भी राष्ट्रद्रोह के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

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हरिद्वार, 9 अक्टूबर 2018। देहरादून के एक संस्थान में आईटी के छात्र के जम्मू-कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन का आतंकी बनने की बात प्रकाश में आने के अगले ही दिन हरिद्वार के रेलवे स्टेशन अधीक्षक महावीर सिंह को मिले एक पत्र ने उत्तर प्रदेश समेत उत्तराखंड के सुरक्षा में तैनात अ​धिकारियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। इस पत्र में उत्तर प्रदेश के रेलवे स्टेशनों के अलावा उत्तराखंड के चारों धामों, हर की पैड़ी सहित रूड़की के धार्मिक स्थलों और काठगोदाम से लेकर देहरादून तक के तमाम रेलवे स्टशेनों को बम से उड़ाने की चुनौती दी गई है। हिंदी में लिखे इस पत्र में दावा किया गया है कि पत्र लश्करे तैयबा के एरिया कमांडर मौलवी अम्बी सलीम की ओर से भेजा गया है और पत्र में जेहादियों की मौत का बदला लेने की धमकी दी गई है। खासकर उत्तराखंड के बारे में लिखा गया है कि उत्तराखंड को खून से रंग देंगे, यहां तबाही ही तबाही मचा देंगे। पत्र के अंत में लकश्कर जिंदाबाद, सईद जिंदाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लिखे गए हैं। स्टेशन अधीक्षक ने यह पत्र जीआरपी को सौंप दिया है। अब खुफिया एजेंसियां पत्र की सच्चाई को लेकर छानबीन में जुट गई हैं।
पत्र में लिखा गया है कि बीस अक्टूबर को देहरादून, हरिद्वार, रूड़की, लक्सर,मुरादाबाद,बरेली, काठगोदाम, नैनीताल, रामपुर, सहारनपुर,मेरठ, मुजफ्फरनगर,सहित उत्तराखंड की रेलवे स्टशेनों को बम से उड़ा दिया जाएगा। (संभवत: धमकी देने वाले को पता नहीं होगा कि नैनीताल में कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। उसने बीच में हल्द्वानी का जिक्र नहीं किया है। )
पत्र में आगे कहा गया है कि 10 नवंबर को हरिद्वार की हर की पैड़ी, लक्ष्मण झूला, चारों धाम व रूड़की के धार्मिक स्थल (इनमें मजार भी शामिल हैं ) को बम से उड़ा दिया जाएगा। हरिद्वार रेल्वे स्टेशन अधीक्षक महावीर सिंह ने बताया कि पांच अक्टूबर को उन्हें डाक से यह पत्र मिला था जिसे तत्काल जीआरपी को सौंप दिया गया था।
पत्र के एक पन्ने पर आतंकवारदी संगठन, लश्करे तैयबा, एरिया कमांडर मौलवी अंबी सलीम, किश्तवाड़़, कश्मीर जम्मू, करांची पाकिस्तान लिखा है।

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देहरादून, 8 अक्टूबर 2018। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का दूसरी बार आतंकी कनेक्शन सामने आया है। यहां के एक संस्थान में आईटी के छात्र के जम्मू-कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन का आतंकी बनने की बात प्रकाश में आया है। गौरतलब बात यह भी है कि यह अपनी तरह का पहला नहीं, बल्कि दूसरा मामला है, और ऐसा भी लग रहा है जैसे पिछली बार की कहानी भी केवल नाम के बदलाव से दोहराई जा रही है।
उल्लेखनीय है कि मई 2017 में देहरादून के एक संस्थान में अध्ययनरत श्रीनगर कश्मीर निवासी छात्र दानिश परीक्षा बीच में छोड़ गायब हो गया था। दून पुलिस उसकी तलाश कर रही थी, कि तभी दानिश एक आतंकी के जनाजे की फोटो में देखा गया, और इस फोटो में उसके एक देहरादून के सहपाठी ने उसे पहचान लिया। अलबत्ता जून 2017 में दानिश आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा से जुड़ गया था।
कुछ ऐसी ही कहानी इस बार दून के प्रेमनगर थाना क्षेत्र स्थित एक इंस्टीट्यूट में बीएससी आइटी तृतीय वर्ष के छात्र कश्मीर के कुलगाम के बमब्रत गांव के रहने वाले 22 साल के शोएब अहमद लोन के साथ दोहरायी गयी है। बताया गया है कि पंद्रह दिन पहले शोएब कॉलेज के लिए निकला था, लेकिन लापता हो गया। शोएब यहां से गायब होकर आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़ गया है, और उसे संगठन ने मुरसी भाई नाम दिया है। इधर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक तस्वीर में वह हाथ में एके-47 लिए हुए दिखाई दे रहा है। फोटो पर उसका नाम, पता, पिता के नाम के साथ हिजबुल से जुड़ने की तिथि 20 सिंतबर 2018 लिखी हुई है।
बताया गया है कि वह इस वर्ष जनवरी में परीक्षा देने के बाद घर गया तो लौटकर नहीं आया। चार महीने पहले इंस्टीट्यूट ने शोएब के घर वालों को उसके गैरहाजिर होने के संबंध में पत्र भेजा। तब उसके घर वालों ने तलाश शुरू की। इस बीच सोशल मीडिया पर शोएब की आतंकियों की वेशभूषा में फोटो और वीडियो वायरल हो गई। जिसके बाद सेना और पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उत्तराखंड पुलिस से संपर्क भी किया। इधर पांच दिन पूर्व उसकी मां ने सेना और पुलिस के अधिकारियों से संपर्क साधा और शोएब को वापस लाने की गुजारिश की। इसके बाद से शोएब के बारे में जानकारी जुटाने के लिए खुफिया एजेंसियां भी अलर्ट मोड में आ गई। बताया जा रहा शोएब वर्ष 2015 में देहरादून आया था। यहां उसने बीएससी आइटी में दाखिला लिया।

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एलआईयू-पुलिस की गिरफ्त में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिया।

लंढौरा, 4 सितंबर 2018। उत्तराखंड में अवैध रूप से रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को एलआईयू ने रविवार को लंढौरा क्षेत्र से सत्यापन अभियान के दौरान गिरफ्तार किया है। बताया गया है कि यह बांग्लादेशी नागरिक पिछले कई सालों से बिना पासपोर्ट के उत्तराखंड में रह रहा था। बकायदा यहां उसने क्लिनिक भी खोल दिया था, और स्थानीय युवती से शादी कर ली थी और उससे उसकी दो बेटियां भी हैं। पूर्व में उसे उत्तराखंड पुलिस गिरफ्तार कर बांग्लादेश सीमा पर छोड़ आई थी, लेकिन वह फिर दिल्ली होते हुए यहां लौट आया। इस बार उसके खिलाफ अवैध तरीके से बिना पासपोर्ट के रहने के मामले में गिरफ्तार कर विदेशी अधिनियम सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में पेश किया गया, और कोर्ट के आदेशों पर जेल भेज दिया गया।
बांग्लादेशी नागरिक की पहचान अलाउद्दीन सरकार पुत्र हकीमुल्ला उर्फ अब्दुल मलिक निवासी मोहल्ला आदरा पोस्ट तलतौला जिला बीबरया बांग्लादेश के रूप में हुई है। सत्यापन के दौरान एलआईयू को पूछताछ में उसने बताया कि कुछ साल पूर्व वह अवैध तरीके से भारत में घुसा था और लंढौरा क्षेत्र में आकर रहने लगा। यहां रहते हुए ही उसने एक स्थानीय युवती से शादी भी कर ली और क्लीनिक भी खोल लिया था। इधर वह अपनी पत्नी और दो बेटियों से मिलने आया था।

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ऊधमसिंह नगर जिले के गदरपुर में 367 बांग्लादेशी घुसपैठियों के घुस आने और सभी प्रकार के प्रमाण पत्र भी हासिल करने तथा यही नहीं ग्राम पंचायत के पदों पर भी कब्जा करने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। जिले में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी का मामला सामने आने के बाद पुलिस व खुफिया एजेंसियों के भी कान खड़े हो गए हैं। वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने राज्य के ऊधमसिंह नगर जिले के 367 बांग्लादेशी बांग्लादेशियों की घुसपैठ की शिकायत को बेहद खतरनाक मानते हुए केंद्र व राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले में अगली सुनवाई 14 सितंबर नियत की गई है। 

उल्लेखनीय है कि गदरपुर निवासी सुरेश मंडल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि उनकी ग्राम पंचायत में 367 बांग्लादेशी घुस आए हैं। उन्होंने सभी प्रकार के प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिए हैं। यही नहीं ग्राम पंचायत के पदों पर भी कब्जा कर लिया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि याचिका दायर होने के बाद उसकी मुश्किलें बढ़ गई हैं और प्रताड़ित किया जाने लगा है। आरोप लगाया है कि पुलिस व प्रशासन की मिलीभगत से याचिकाकर्ता को गैंगस्टर घोषित करने की कोशिश की गई है। 

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में बांग्लादेशियों की घुसपैठ के कर्इ मामले सामने आ चुके हैं। ऋषिकेश, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में भी इनके द्वारा घुसपैठ की जा चुकी है। उत्तराखंड पुलिस कर्इ घुसपैठियों को हिरासत में भी ले चुकी है। हाल ही में हरिद्वार के कलियर से भी एक बांग्लादेशी घुसपैठ को पुलिस ने गिरफ्तार किया गया है। अब मामले के हार्इ कोर्ट में जाने से राज्य सरकार इन पर कार्रवाई तेज करेगी, ऐसी उम्मीद है। 

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arrested al-qaida man trying to establish rohingya army
पुलिस की गिरफ्त में अलकायदा का  संदिग्ध।

स्पेशल सेल ने अल-कायदा के एक संदिग्ध आतंकी समीउन रहमान उर्फ सूमोन हक उर्फ राजू भाई (28) को लैपटॉप और मोबाइल फोन के साथ गिरफ्तार करने में सफलता अर्जित की है। इन्हें फरेंसिक जांच के लिए लैब भेज दिया है। इससे कुछ और राज बाहर आने की उम्मीद है। रहमान से पूछताछ में पता चला है कि उसका असली मकसद भारत में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की एक फौज बनाकर उन्हें म्यांमार आर्मी के सामने खड़ा करना था। सूत्रों के मुताबिक, रहमान रोहिंग्या मुसलमानों की सेना बनाने के लिए मणिपुर या मिजोरम में ट्रेनिंग कैंप भी स्थापित करना चाहता था। इस फौज को हथियार अल-कायदा से मिलने थे। हालांकि, इससे पहले ही वह पकड़ा गया। इस बात की जांच की जा रही है कि वह सितंबर में शुरू होने जा रहे फेस्टिव सीजन में दिल्ली-एनसीआर में रामलीलाओं, दुर्गा पूजा, दशहरा या फिर दिवाली पर कोई आतंकवादी हमला तो नहीं करने वाला था? टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पूछताछ के दौरान रहमान ने कबूला है कि बांग्लादेश की जेल में रहने के दौरान उससे अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के सहयोगियों ने संपर्क किया था। इससे भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियों के उन दावों की पुष्टि होती है, जिनके मुताबिक डी-कंपनी आईएसआई की मदद से भारत में आतंकी गतिविधियों को हवा दे रही है। बता दें कि हाल ही में इंटेलिजेंस एजेंसियों ने डी-कंपनी से जुड़े एक अन्य मेंबर शम्सुल हुदा की भारत में रेल दुर्घटनाओं में भूमिका होने में आशंका जताई थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रहमान ने इंटेलिजेंस एजेंसियों को बताया है कि खुद को डी-कंपनी का ऐक्टिव मेंबर बताने वाला फारूख नाम का एक शख्स ढाका जेल में उससे 2016 में मिला था। रहमान के मुताबिक, फारूख ने उसे भारत में हमलों को अंजाम देने के लिए हथियारों और गोला बारूद की सप्लाई देने का वादा किया था। फारूख को रहमान के अल-कायदा से जुड़े होने के बारे में पता था। उसने रहमान से कहा कि वह जेल से अप्रैल 2017 में बाहर आने के बाद डी-कंपनी के एक अन्य सदस्य रऊफ से संपर्क करे।
स्पेशल सेल ने दाऊद के सहयोगियों के तौर पर रऊफ और फारूख की पहचान की पुष्टि की है। एजेंसियां इन दोनों की भूमिकाओं के बारे में पता लगाने में जुट गई है। रऊफ पिछले साल तक भारतीय जेल में था। छूटने के बाद उसे डिपोर्ट कर दिया गया था। पुलिस ने मंगलवार को बताया कि रहमान 10 दिन पुलिस कस्टडी में रहेगा। उससे सबूतों के आधार पर पूछताछ की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने कुछ ऐसे लोगों की पहचान की है, जिनकी भर्ती रहमान ने की थी। भर्ती का मकसद आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिलाना था। एजेंसियां उस शख्स को भी पकड़ने के काफी करीब हैं, जिससे मिलने रहमान मणिपुर जाने वाला था।
रहमान से संबंधित और ज्यादा जानकारी निकलवाने के लिए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ढाका पुलिस से संपर्क किया है। दिल्ली पुलिस अदनान और तंजील नाम के उन दो लोगों से पूछताछ कर सकती है, जिन्हें 2014 में रहमान के साथ बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का कहना है कि रहमान करीब दर्जन भर रोहिंग्या शरणार्थियों के संपर्क में भी था, जिन्हें उसने जिहाद के मकसद से रिक्रूट किया था। सूत्रों के मुताबिक, इन लोगों को ढूंढकर डिपोर्ट करने की योजना है।

रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का गुस्सा नैनीताल तक पहुंचा

पड़ोसी देश म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, हत्याओं के विरोध में सरोवरनगरी के मुस्लिम समुदाय के लोगों ने शुक्रवार (15 सितम्बर 2017) को  जुम्मे की नमाज के बाद नगर में मौन जुलूस निकाला, और राष्ट्रपति को ज्ञापन भिजवाया। जश्न-ए-ईद मिलादुन नबी कमेटी के बैनर तले नगर के मुस्लिम धर्मावलंबी जुम्मे की नमाज के उपरांत मल्लीताल जामा मस्जिद से माल रोड होते हुए मौन जुलूस की शक्ल में जिला कलक्ट्रेट के लिये निकले, और जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से देश के राष्ट्रपति को ज्ञापन भिजवाया। ज्ञापन में कहा गया है कि म्यांमार (बर्मा) में रोहिंग्या मुसलमानों और हिंदुओं की हत्या करने, जला कर मारने की देश भर के मुसलमानों के साथ वे निंदा करते हैं। इस संबंध में भारत सरकार से निंदा करते हैं कि म्यांमार सरकार से अविलंब बातचीत कर निर्दोष बच्चों, बूढ़ों व जवान मुसलमानों का कत्लेआम रोका जाए। साथ ही भारत सरकार मानवीय सहायता की खेप लेकर म्यांमार में अपने प्रतिनिधि भेजकर रोहिंग्या मुसलमानों की मदद करे। ज्ञापन भेजने वालों और जुलूस में कमेटी के सदर फिरोज खान, नायब सदर मोहम्मद नसीम, महासचिव मो. नाजिम बख्श, याकूब, मो. इस्लाम, सगीर अहमद, मो. अजीम, अहाहिद वारसी, मुजाहिद, रईश भाई, गजाला कमाल, रईश वारसी, रमजान बख्श, समीर अहमद सहित अनेक लोग शामिल रहे।

कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान ?

रोहिंग्या मुसलमान सुन्नी इस्लाम को मानने वाले लोग हैं। बौद्ध बहुल देश म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान 1400 ई. के आस-पास से बर्मा (आज के म्यांमार) के अराकान (रखाइन) प्रांत में रह रहे हैं। इनके पुरखे अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (बर्मीज में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में प्रश्रय दिया था। हालांकि रोहिंग्या संगठनों की मानें तो वे 12वीं शताब्दी से म्यांमार में रहते चले आ रहे हैं।

रोहिंग्या मुसलमानों को नहीं मिली नागरिकता

रोहिंग्या मुसलमान विश्‍व का ऐसा अल्‍पसंख्‍यक समुदाय है, जिनकी आबादी करीब दस लाख के बीच है। लेकिन इनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं है।  1982 में म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता भी छीन ली। जिसके बाद से वे बिना नागरिकता के जीवन बिता रहे हैं। इन्हें आधिकारिक रूप से देश के 135 जातीय समूहों में शामिल नहीं किया गया है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। इसलिए सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। ये रोहिंग्या या रुयेन्गा भाषा बोलते हैं। जो रखाइन और म्यांमार के दूसरे भागों में बोली जाने वाली भाषा से कुछ अलग है, और बांग्लादेश की बांग्ला से काफी मिलती-जुलती है। जिसके चलते अधिकांश बौद्ध रोहिंग्या मुसमानों को बंगाली समझने लगे और उनसे नफरत करने लगे। ये खुद को अरब और फारसी व्यापारियों का वंशज मानते हैं।

अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक रोहिंग्या रखाइन में प्राचीन काल से रह रहे हैं। 1824 से 1948 तक ब्रिटिश राज के दौरान आज के भारत और बांग्लादेश से एक बड़ी संख्या में मजदूर वर्तमान म्यांमार के इलाके में ले जाए गए। ब्रिटिश राज म्यांमार को भारत का ही एक राज्य समझता था इसलिए इस तरह की आवाजाही को एक देश के भीतर का आवागमन ही समझा गया। ब्रिटेन से आजादी के बाद, इस देश की सरकार ने ब्रिटिश राज में होने वाले इस प्रवास को गैर कानूनी घोषित कर दिया। इसी आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। 

म्यांमार में रोहिंग्या लोगों को एक जातीय समूह के तौर पर मान्यता नहीं है। इसकी एक वजह 1982 का वो कानून भी है जिसके अनुसार नागरिकता पाने के लिए किसी भी जातीय समूह को यह साबित करना है कि वो 1823 के पहले से म्यांमार में रह रहा है। 

रोहिंग्या मुसलमानों को बिना अधिकारियों की अनुमति के अपनी बस्तियों और शहरों से देश के दूसरे भागों में आने जाने की इजाजत नहीं है। यह लोग बहुत ही निर्धनता में झुग्गी झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं। पिछले कई दशकों से इलाके में किसी भी स्कूल या मस्जिद की मरम्मत की अनुमति नहीं दी गई है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की भी रोहिंग्या मुसलमानों को इजाजत नहीं है और अब उनकी जिंदगी प्रताड़ना, भेदभाव, बेबसी और मुफलिसी से ज्‍यादा कुछ नहीं है। 

म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं। म्यांमार में बहुत से लोग रोहिंग्या को अवैध प्रवासी मानते हैं। म्यांमार की सरकार रोहिंग्या को राज्य-विहीन मानती है और उन्हें नागरिकता नहीं देती। म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ऐसे प्रतिबंधों में आवागमन, मेडिकल सुविधा, शिक्षा और अन्य सुविधाएं शामिल है। हालांकि ताजा विवाद के बाद म्यांमार की काउंसलर और नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की ने कहा है कि सरकार रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करेगी।

1.23 लाख रोहिंग्या कर चुके हैं पलायन, मारे जा चुके हैं 400 लोग 

म्यामांर के रखाइन में 25 अगस्त की सुबह चौबीस पुलिस चौकियों और सैन्य अड्डों पर रोहिंग्या विद्रोहियों के हमले में एक दर्जन सुरक्षाकर्मियों सहित लगभग 89 लागों की मौत हो गई। स्टेट काउंसलर के कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक तकरीबन 150 रोहिंग्या विद्रोहियों ने दो दर्जन से ज्यादा पुलिस चौकियों और एक सैन्य अड्डों पर तेज हमला किए। इस हमले में देसी बारूदी सुरंगों का भी प्रयोग किया गया। रखाइन के साथ-साथ बुथिदाउंग शहर भी भीषण हिंसा का शिकार हुआ। धार्मिक घृणा के चलते बंटे तटीय देश में पिछले साल अक्टूबर से चल रही हिंसा में यह सबसे बड़ा हमला था। रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ पिछले वर्ष भी सेना ने बड़ी कार्रवाई की थी, जिसकी वजह से लगभग 87 हजार रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश चले गए थे।

म्यांमार के अशांत रखाइन प्रांत की स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। 25 अगस्त के हमले के बाद सेना ने रोहिंग्या विद्रोहियों और उनके अड्डों को खत्म करने का अभियान छेड़ दिया है। एक सितंबर तक इस खूनी टकराव में लगभग 400 लोग मारे जा चुके हैं। म्यामांर सेना के मुताबिक मरने वालों में 370 रोहिंग्या विद्रोही, 13 सेना के जवान, दो सरकारी अधिकारी और 14 आम नागरिक हैं। इसके अलावा कुछ विद्रोहियों को पकड़ा भी गया है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस सैन्य अभियान के बाद 38 हजार रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर गए हैं और तकरीबन बीस हजार से ज्यादा शरणार्थी सीमावर्ती इलाकों में फंसे हुए हैं। इस दौरान शरणार्थियों से लदी एक नौका म्यामांर तथा बांग्लादेश को बांटने वाली नफ नदी में डूब गई थी जिसमें तकरीबन 40 लागों की मौत हो गई। बांग्लादेश के सीमाई इलाके कॉक्स बाजार में हजारों की तादाद में भूखे-प्यासे रोहिंग्या शरणार्थी पहुंच रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरस ने हिंसा में आम लोगों मारे जाने की रिपोर्ट पर गहरी चिंता जताई है। गुतेरस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिका की ओर से जारी बयान में बांग्लादेश से शरणार्थियों का सहयोग करने आग्रह किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के अनुसार म्यांमार में 25 अगस्त को भड़की हिंसा के बाद करीब दो हफ्तों में करीब 1.23 लाख रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार से पलायन कर चुके हैं, जबकि करीब 400 लोग मारे जा चुके हैं।

रखाइन प्रान्त में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है. इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि 2012 में धार्मिक हिंसा का चक्र शुरू होने के बाद से लगभग एक लाख बीस हजार रोहिंग्या लोगों ने रखाइन छोड़ दिया है. इनमें से कई लोग समंदर में नौका डूबने से मारे गए हैं। और यह बांग्लादेश या फिर भारत में अपनी जान बचाने के लिए शरण मांगते दर-दर भटक रहे हैं।

वहीं अक्तूबर 2016 से अब तक 87 हज़ार मुसलमान अपना घर बार, कार्य स्थल और खेत छोड़कर चले गये हैं। रोहिंग्या कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनके साथ के 100 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप लग रहे हैं. 

1978 में भी बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश चले गए थे। इसके बाद दिसंबर 1991 से मार्च 1992 तक की अवधि में तकरीबन दो लाख रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश भाग गए थे। रोहिंग्या मुसलमानों के जब तब थाईलैंड और मलेशिया भागने की खबरे आती रहती हैं।

सन 2014 के बाद से अब तक एक लाख अड़सठ हजार रोहिंग्या मुसलमानों ने पड़ोसी देशों में शरण ली है। वर्तमान में म्यांमार में लगभग 11 लाख, बांग्लादेश में तीन लाख, मलेशिया में एक लाख, भारत में 40 हजार और इण्डोनेशिया में दो हजार रोहिंग्या मुसलमान रह रहे हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक सैटलाइट तस्वीर जारी की थी. इसमें बताया गया था कि पिछले 6 हफ्तों में रोहिंग्या मुसलमानों के 1,200 घरों को तोड़ दिया गया.और इसके साथ इन अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ लूट, हत्या और महिलाओं, लड़कियों और बच्चों के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी कर रहे हैं.

अपनी स्थितियों के लिए खुद भी हैं जिम्मेदार :

मानवाधिकारवादी बुद्धिजीवी चाहे कितना ही प्रलाप क्यों न कर लें किंतु वास्तविकता यह भी है कि रोहिंग्या मुसलमान अपनी बुरी स्थिति के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। ये लोग मूलतः बांग्लादेश के रहने वाले हैं। आरोप है कि जिस तरह करोड़ों बांग्लादेशी भारत में घुस कर रह रहे हैं, उसी प्रकार ये भी रोजी-रोटी की तलाश में बांग्लादेश छोड़कर बर्मा में घुस गए। 1962 से 2011 तक बर्मा में सैनिक शासन रहा। इस अवधि में रोहिंग्या मुसलमान चुपचाप बैठे रहे किंतु जैसे ही वहां लोकतंत्र आया, रोहिंग्या मुसलमान बदमाशी पर उतर आए।

जून 2012 में बर्मा के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों ने एक बौद्ध युवती से बलात्कार किया। जब स्थानीय बौद्धों ने इस बलात्कार का विरोध किया तो रोहिंग्या मुसलमानों ने संगठित होकर बौद्धों पर हमला बोल दिया। इसके विरोध में बौद्धों ने भी संगठित होकर रोहिंग्या मुसलमानों पर हमला कर दिया। इस संघर्ष में लगभग 200 लोग मारे गए जिनमें रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या अधिक थी। तब से दोनों समुदायों के बीच हिंसा का जो क्रम आरम्भ हुआ, वह आज तक नहीं थमा। रोहिंग्या मुसलमानों ने नावों में बैठकर थाइलैण्ड की ओर पलायन किया किंतु थाइलैण्ड ने इन नावों को अपने देश के तटों पर नहीं रुकने दिया। इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों की नावें इण्डोनेशिया की ओर गईं और वहाँ की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी।
 
रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा में रोहिंग्या रक्षा सेना का निर्माण करके अक्टूबर 2016 में बर्मा के 9 पुलिस वालों की हत्या कर दी तथा कई पुलिस चौकियों पर हमले किए। इसके बाद से बर्मा की पुलिस रोहिंग्या मुसलमानों को बेरहमी से मारने लगी और उनके घर जलाने लगी इस कारण बर्मा से रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन का नया सिलसिला आरम्भ हुआ। वर्तमान में लगभग 20 हजार रोहिंग्या मुसलमान बर्मा तथा बांग्लादेश की सीमा पर स्थित नाफ नदी के तट पर डेरा डाले हुए हैं। वे भूख से तड़प रहे हैं तथा उन्हें जलीय क्षेत्रों में रह रहे सांप भी बड़ी संख्या में काट रहे हैं। उनमें से अधिकतर बीमार हैं तथा तेजी से मौत के मुंह में जा रहे हैं।

इसके अलावा पिछले दिनों म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर अज्ञात लोगों के साथ झड़प में 9 पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बाद रखाइन स्टेट में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया था. सरकार के कुछ अधिकारियों का दावा है कि ये हमला रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने किया था. इसके बाद सुरक्षाबलों ने मौंगडोव ज़िला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और एक व्यापक ऑपरेशन शुरू किया. सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या के आरोप लग रहे हैं. हालांकि सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है. कहा जा रहा है कि सैनिक रोहिंग्या मुसलमानों पर हमले में हेलिकॉप्टर का भी इस्तेमाल कर रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि म्यांमार में 25 वर्ष बाद पिछले साल चुनाव हुआ था. इस चुनाव में नोबेल विजेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली थी हालांकि संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं. सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं.

रोहिंग्याओं के आतंकी कनेक्शन भी :

यह लड़ाई बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच नहीं है. तथ्य यह है कि पश्चिमी सरकारें, उनके संस्थान और मानवाधिकार संगठन रोहिंग्या लोगों की आवाज को उठा रहे हैं और वह भी शुरू से जब 2012 में रखाइन में यह संकट शुरू हुआ. म्यांमार और बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियां ही रोहिंग्या लोगों की ज्यादा मदद कर रही हैं जबकि जिहादी समूह, तुर्की के राष्ट्रपति रैचेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं.

25 अगस्त को म्यांमार के सुरक्षा बलों पर हमला करने वाले गुट अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी के जिहादी संगठनों से रिश्ते हैं. ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि रोहिंग्या चरमपंथियों के सऊदी अरब, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी लिंक हैं. पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जिहादी गुट रोहिंग्या लोगों के नाम पर चंदा जमा करते हैं. इंडोनेशिया के चरमपंथी भी इस मामले में शामिल हो रहे हैं. इनमें से बहुत से लोगों के अल कायदा और तथाकथित इस्लामी स्टेट से रिश्ते हैं. म्यांमार की सरकार कह रही है कि वह सिर्फ जिहादी खतरे से निपट रही है. एक हद तक यह बात सही भी है, लेकिन म्यांमार की सरकार इसके जरिए रोहिंग्या लोगों के उत्पीड़न को भी उचित ठहराने की कोशिश करती है।

दुनिया भर में मुसलमानों की समस्याओं पर इस्लामी संगठनों का रवैया भी एक जैसा नहीं होता. मध्य पूर्व के गरीब देश यमन में शिया लोगों पर जब बमबारी की गयी तो सऊदी अरब के किसी सहयोगी देश ने इसका विरोध नहीं किया. 2015 से अब तक यमन में हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान सरकार या फिर खाड़ी देशों की तरफ से सऊदी अरब की कभी आलोचना नहीं की गयी. सीरिया और इराक के संकट पर भी मुस्लिम देशों का रवैया इस बात पर निर्भर करता है कि वे सऊदी अरब के करीब हैं या फिर ईरान के. इस्लामी कट्टरपंथियों की वजह से जो मानवीय त्रासदी, नरसंहार और अत्याचार हो रहे हैं, उन्हें भी मुस्लिम देश अकसर सांप्रदायिक चश्मे से ही देखते हैं।

भारत-बांग्लादेश में रोहिंग्याओं के आने से समस्या :

संयुक्त राष्ट्र ने तीन हजार से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थियों के बांग्लादेश में पहुंचने की पुष्टि की है। इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन संस्था के मुताबिक अब तक 18445 रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में अपना पंजीकरण करा चुके हैं। हजारों की तादाद में बांग्लादेश पहुंच रहे रोहिंग्या शरणार्थियों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं। इनमें कई गोली से घायल हैं तो कई बीमार हैं। म्यांमार की सीमा से लगते बांग्लादेश के कॉक्स बाजार के अस्पतालों में इन शरणार्थियों का इलाज चल रहा है। रोहिंग्या शरणार्थियों के आने से बांग्लादेश की समस्याएं बढ़ने लग गई है।

बांग्लादेश की तरह भारत में भी रोहिंग्या शरणार्थी पहले से मौजूद हैं। अब नए शरणार्थियों के आने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। भारत में रोहिंग्या शरणार्थी जम्मू, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, हैदराबाद और राजस्थान में रह रहे हैं। भारत सरकार इनको बांग्लादेश भेजने की तैयारी में है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता केएस धातवालिया के अनुसार भारत में रह रहे 14 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने पंजीकृत किया है। इससे भारत में दशकों से रह रहे बाकी रोहिंग्या शरणार्थी अवैध माने जाएंगे। इसलिए उन सभी अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों को अब बाहर भेजा जाएगा। दरअसल भारत ने संयुक्त राष्ट्र कंवेंशन में शरणार्थियों को लेकर कोई दस्तखत नहीं किए हैं। इसलिए देश में शरणार्थियों पर कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है। फिलहाल इसमें कूटनीतिक स्तर पर बांग्लादेश व म्यांमार से बातचीत जारी है।

भारत में भी कश्मीर से हजारों पंडितों के विस्थापन पर कोई बात नहीं होती है, परन्तु जिस तरह रोहिंग्याओं को भारत में शरण देने के लिए विपक्षी दलों से सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, हिन्दू बहुल जनता में इससे अच्छा सन्देश नहीं जा रहा है।

बहुत से रोहिंग्या मुसलमानों ने भागकर बांग्लादेश में शरण ली किंतु भुखमरी तथा जनसंख्या विस्फोट से संत्रस्त बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों का भार उठाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इन्हें वहाँ भोजन, पानी रोजगार कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और हजारों रोहिंग्या मुसलमानों ने भारत की राह पकड़ी। भारत का पूर्वी क्षेत्र पहले से ही बांग्लादेश से आए मुस्लिम शरणार्थियों से भरा हुआ है, अतः भारत नई मुस्लिम शरणार्थी प्रजा को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।
 
समस्या के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास शुरू :
तुर्की के राष्ट्रपति रचैब तैयब बांग्लादेश जाकर इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं तथा वे अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से रोहिंग्या मुसलमानों को बर्मा में ही रहने देने के लिए बर्मा की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची पर दबाव बनाना चाहते हैं। इस बीच अफगानिस्तान की नोबल पुरस्कार विजेता मलाला ने ट्वीट जारी कर सू ची की निंदा करते हुए कहा है कि मैं बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पीड़न के समाचारों से दुखी हूँ। सू ची की कठिनाई यह है कि यदि वह रोहिंग्या मुसलमानों का कठोरता से दमन जारी नहीं रखती हैं तो बर्मा में 50 सालों के संघर्ष के बाद आया लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा तथा बर्मा की सेना, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को कमजोर घोषित करके पुनः सत्ता पर अधिकार जमा लेगी।
 
इसी बीच भारत में भी कम्युनिस्ट विचारधारा तथा मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले संगठनों से जुड़े बुद्धिजीवियों के धड़ों ने भारत सरकार पर दबाव बनाना आरम्भ कर दिया है कि रोहिंग्या मुसलमानों को भारत स्वीकार करे। प्रश्न ये है कि इस बात की क्या गारण्टी है कि रोहिंग्या मुसलमान आगे चलकर भारत के लिए सिरदर्द सिद्ध नहीं होंगे! जबकि आगे चलकर देखने की जरूरत नहीं है, वे आज ही भारत के लिए सिरदर्द बन चुके हैं।
‘बर्मा के बिन लादेन’ कहे जा रहे बौद्ध गुरु विराथु की भी बड़ी भूमिका :
‘बर्मा के बिन लादेन’ कहे जा रहे बौद्ध गुरु विराथु ने रोहिंग्या मुस्लिमों को भगाने के लिए यह तरीका भी उपयोग किया। जैसे मुसलमानों का ‘786’ का नंबर लकी माना जाता है, वैसे ही विराथु ने ‘969 ‘ का नंबर निकाला, और उन्होंने पुरे देश के लोगों से आह्वान किया कि जो भी राष्ट्रभक्त बौद्ध है वो इस स्टीकर को अपने अपने जगह पर लगायें. इसके बाद टैक्सी चलाने वालों ने टैक्सी पर, दूकान वालों ने दूकान पर, इसको लगाना शुरू किया. विराथु का सन्देश साफ़ था कि हम बौद्ध अपने सारे खरीदारी और व्यापार वहीँ करेंगे जहां ये स्टीकर लगा होगा. किसी को टैक्सी में चढ़ना हो तो उसी टैक्सी में चढ़ेंगे जिसके ऊपर ये स्टीकर होगा, उसी रेस्टोरेंट में खायेंगे जहां ये स्टीकर होगा। उन्होंने ये भी कहा कि हो सकता है ऐसी हालत में रोहिंग्या सऊदी से आये पैसों के दम पर अपने माल को कम कीमत पर बेच कर आपको आकर्षित करें, लेकिन आप ध्यान रखना, आप दो पैसा ज्यादा देना, और सोचना कि आपने अपने देश के लिए पैसा लगाया है, दो पैसे कम में खरीद कर मातृभूमि से गद्दारी मत करना, वो आपके पैसे आपको ही मिटाने में लगाते हैं, मूर्खता मत करना। हालत ये हो गए कि रोहिंग्या मुस्लिम के व्यापार ठप्प पड़ गए। ये लोग इतने आतंकित हुए कि इस स्टीकर लगे टैक्सी को चढ़ना तो दूर, किनारे से कन्नी काटने लगे। पुरे देश में मुसलमानों के होश ठिकाने आ गए, और फिर ये स्टीकर एक तरह से देशभक्ति का प्रमाण बन गया, उनके जिहाद का जवाब बन गया, और इस अनोखे आईडिया का प्रभाव यह हुआ कि आज बर्मा से रोहिंग्या मुस्लिम भाग चुके हैं….
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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