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‘आज़ाद’ के ‘तीर’ में आज पढ़ें : रावण अभी मरा नहीं…

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अंक-16 :

हमने रावण को जला दिया,
जलते हुये रावण को देखकर
हमने आतिशबाज़ी का आनंद
भी ले लिया, बस हो गया अपना कर्तव्य पूरा, हम ख़ुश होकर घर लौट आते हैं कि आज हमने रावण को जला दिया,
तो साहिबान,
ये हमारी ग़लतफ़हमी होती है, दरअसल रावण जलते हुए अपने धुएं से पूरे वायुमंडल के ज़रिये फिर से जीवित हो जाता है,
वो हम सबमें समां जाता है,
हाँ ये अलग बात होती है वो किसी में कम किसी में ज़्यादा होता है, लेकिन मरता नहीं है, अगर वास्तव में रावण मर जाता है तो क्या कोई मुझे ये आश्वासन दे सकता है कि कल से किसी की बहन, बेटी के साथ अत्याचार/बलात्कार नहीं होगा?
क्या कोई बहू दहेज़ के नाम पर नहीं जलाई जाएगी,
क्या कोई दूसरी निर्भया या आसिफा अब नहीं बनेगी,
अगर हमारे पास इसका जवाब
न में है तो ये हम सबके लिए शर्म की बात है, हमें सबसे पहले अपने अंदर के रावण को मारना होगा,
क्यूँकि किसी का बुरा चाहना,
झूठ बोलना ये भी रावण होने की निशानी है, यदि ये निशानियां
हम अपने अंदर से मिटा दें,
फिर हमारा अधिकार बनता है अगले वर्ष रावण को जलते हुये देखने का, तभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने सुखी संसार को देखकर प्रसन्न होंगे और हमारे लिये अगले दशहरे पर ख़ुशी दोगुनी हो जाएगी, हम ये भी जानते हैं कि लालच, घमंड, वासना जैसे अवगुणों को मारना थोड़ा मुश्किल ज़रुर होगा,
लेकिन नामुमकिन नहीं है,
आइये मिलकर प्रण करते हैं,
कल के सुनहरे, सुरक्षित,
सुखमय भविष्य के लिये आगामी दशहरे की शुभकामनाओं के साथ

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

(नोट : ‘नवीन समाचार’ के इस नये कॉलम ‘आज़ाद के तीर’ के बारे में आप इसके लेखक से 09756293651 नंबर पर सीधे संपर्क सकते हैं।)

अंक-15 :  ऐसा रोज़गार मेला प्रारम्भ, जिसमें हल्दी लगे न फिटकरी, और रंग चोखा

मेरा एक मित्र संता
अपनी बेरोज़गारी से
बहुत परेशान था,
चपरासी से लेकर
पटवारी तक के अनगिनत
फॉर्म भरे, लेकिन नतीजा सिफ़र, आपको तो पता ही है न
आजकल नौकरी पाना सिर्फ़ सेटिंग का खेल है, और कुछ नहीं, जिसकी सेटिंग, उसकी बैटिंग,
तो बेचारे की नौकरी के सपने भी धराशायी हो गये,
फिर उसने सोचा बिज़नेस करूं,
अब बिज़नेस में तो इन्वेस्टमेन्ट का लफड़ा है और वो भी चले न चले किसने देखा, सारे दोस्त सर से सर मिलाकर सोच ही रहे थे कि ब्रेकिंग न्यूज़ आ गयी सूबे में होंगे निकाय चुनाव, 18 नवंबर को होंगे चुनाव , 20 नवंबर को परिणाम घोषित, बस सबका एक साथ माथा ठनका और उठकर हवा में उछलकर तीन बार
यस यस यस बोला, और बना दी संता को चुनाव में खड़ा करने की रणनीति,
फिर क्या था संता को तो जैसे डूबते को चुनाव का सहारा मिल गया, अब बारी थी तय करने की कौन से पद के लिये नामांकन कराये, सभासद या अध्यक्ष क्यूंकि सभासद का फॉर्म भी एसडीएम कार्यालय से ₹200 का मिल रहा है और अध्यक्ष का भी (फ़्लैश बैक में संता सोचते हुये- जबकि नौकरी के फॉर्म 500 से नीचे नहीं भरा जाता है, परीक्षा यात्रा खर्चा अलग, मज़े आ गये) फिर एक अदेयता प्रमाण- पत्र नगर पालिका से और एक अदेयता प्रमाण पत्र तहसील से लेकर सभासद पद के लिये
एक (01) प्रस्तावक और
अध्यक्ष पद के लिये दस (10) प्रस्तावक लेकर नामांकन कराना है, फिर क्या था उसने सोचा क्यों न अपने एक और बेरोज़गार मित्र की मदद की जाये, और सभासद पद के लिये आ गया बंता,
फिर क्या था संता ने अध्यक्ष
और बंता तथा बंता के
दोस्तों ने सभासद के लिये आसानी से नामांकन कराया
और खड़े हो गए चुनाव में,
उनके क्षेत्र में भारी मतदान हुआ और परिणाम घोषित हुआ, जिसमें संता की लाटरी लग गयी, संता अध्यक्ष और बंता व बंता के दोस्त सभासद के पद पर भारी मतों से विजयी हुए,
शहर में विजयी जुलूस निकाला गया, जो लोग उनके निठल्लेपन और बेरोज़गारी पर ताने मारते थे उनके जुलूस में नारे लगाते हुए सबसे आगे दिखे,
अब संता को न नौकरी के
फॉर्म भरने की ज़रूरत,
न बंता को छोले – कुल्चे या मूंगफली का ठेला लगाने की दरकार, क्यूंकि नगर में बन गयी उनकी सरकार,
वो कहते हैं न एक आईडिया दुनिया बदल सकता हैं,
तो बदल गयी दुनिया,
अब बंता के समस्त बेरोज़गार युवा दोस्त भी ख़ुश थे जिनके पास व्यवसाय करने के लिये धन की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी, जिनका धंधा- मंदा चल रहा था, वो भी ख़ुश हुये जो हर विभाग में पैसा खिलाकर मायूस हो चुके थे, उनकी निराशा आशा में बदली, बेशक़ चुनाव ने किया शर्तिया इलाज, जनता ने सुनहरी कृपा बरसाई, अब हो जाएगा संता – बंता की हर समस्या का समाधान,
और हाँ…
अंत में…
आपको मज़ेदार बात भी बताते चलें, दबंग, संगीन अपराधी, बुरी प्रवृत्ति के व्यक्तित्व जिनको सबसे बड़े न्यायकर्ता से चुनाव लड़ने की विशेष छूट प्राप्त है, वो भी खुलकर चुनाव मैदान में कूदें, और हमारी भोली जनता ने उनपर भी कृपा बरसाई,
ये बात सर्वविदित है
जिस प्रकार मताधिकार
सबका अधिकार है,
उसी प्रकार चुनाव लड़ना सिर्फ़ गिने चुने लोगों का अधिकार नहीं है, सबका अधिकार है,
बस वो पागल या दीवालिया न हो
( *वैसे माननीयों की मेहरबानी हुई तो क्या पता अगले चुनाव तक पागल और दीवालियों को भी ये अधिकार मिल जाये,
इस आधार पर कि जब अपराधी वर्ग चुनाव लड़ सकता है तो पागलों का भी बहुत बड़ा वर्ग है यहाँ उन्हें वंचित करना उचित नहीं )
इन सबके बीच एक बात समझ नहीं आती शिक्षित,
सभ्य, नैतिकतापूर्ण, कर्मठ, जुझारू, ईमानदार युवा इन चुनावों में बढ़ चढ़कर हिस्सा क्यों नहीं लेते,
अरे भई,
अगर आप लोग पॉवर में नहीं आये तो यूँही होता रहेगा,
गली, मोहल्ले से निकलते हुये रायता पूरे देश में फैलेगा,

तो जल्दी करें, समय कम है
और सीटें सीमित हैं!

नोट:- *इस लेख में लिखे सभी पात्र व घटनायें काल्पनिक हैं, हमारा प्रयास नगर के शिक्षित, कर्मठ, ईमानदार युवाओं को प्रेरित करना है,
किसी की भावना को ठेस पहुंचना कदापि नहीं है,
कृपया व्यक्तिगत न लें, बस आनंद लें, धन्यवाद!

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-14 : जिला कलक्ट्रेट में खतरों की खिड़की…

ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं
वो हमारे ज़िला नैनीताल के जिला कलक्ट्रेट-तहसील परिसर स्थित खतौनी खिड़की की है….
जिसे आप खतरों की खिड़की भी कह सकते हैं…

वैसे तो हमारी तहसील परिसर साफ़ सफ़ाई के लिये जानी जाती है लेकिन वहां जो चीज़ एक बार टूट गयी तो टूट गयी… फिर उस पर ध्यान देने वाला कोई नहीं..

अब इन सीढ़ियों की ही बात करें तो इन पर खड़े होकर प्रत्येक दिन
न जाने कितने लोग
अपनी-अपनी खतौनी प्राप्त करते होंगे,
कोई टूटी सीढ़ी से अचानक गिरता भी होगा..

गिरने पर अंदर बैठा कर्मचारी सोचता होगा कि शायद
भाई साहब चले गए, क्योंकि
ये खिड़की बहुत अटपटी जगह पर बनी है…
जहाँ से अंदर से बाहर का कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता…
(सिवाय प्रत्येक खतौनी के 30 रुपये लेने के)… तो कर्मचारी तो अपने तीस रुपये पकड़कर अंदर बैठा रहता है… बाहर क्या हो रहा है… उसकी बला से…

आपको जानकर हैरानी होगी ये खतौनी वाली खिड़की इतनी अजीब जगह है जहाँ अगर कोई बेहोश होकर गिर जाये तो कोई उसको देखने वाला नहीं…

मैं प्रशासन से उक्त खतौनी खिड़की को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की अपील करता हूँ…
साथ ही ये निवेदन करता हूँ कि जब तक इसका स्थानांतरण नहीं हो जाता…
कृपया उन सीढ़ियों की मरम्मत करवाने के आदेश करने की कृपा करें…
इससे पहले की कोई घटना, दुर्घटना का रूप ले ले…

सावधानी…
समस्या का पहला समाधान है…

आज़ाद
मंच
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद )

अंक -13 : (डीएम साहब की) दीवारो दर को ग़ौर से पहचान लीजिये

जी हाँ
आज हम बात करेंगे,
हमारे सम्मानित ज़िलाधिकारी
के आवास की, वैसे आवास
का अंदर से क्या हाल होगा
हम उसके अंदर तो नहीं जाने वाले, अरे भई
हमें अंदर थोड़ी न जाना है, इसलिए हम तो बस वही बात आपके सामने रख रहे हैं जो
हर दिन वहां से आने -जाने
वाला प्रत्येक व्यक्ति देखता है, लेकिन वो सिर्फ़ देखता है और देखकर आगे बढ़ जाता है,
नहीं -नहीं,
हम ये बिल्कुल नहीं कहना चाहते की कुछ लोग कुछ भी नहीं बोलते, बोलते होंगे, सोचते भी होंगे कि ज़िलाधिकारी आवास के गेट के आगे इतनी गंदगी कहाँ से आ गयी, लेकिन तत्परता से ख़ुद को या अपने साथी को जवाब देते हुए मुंह बंद कर देते होंगे कि
अरे भाई,
हो सकता है किसी प्रकांड विद्वान ने रखवाया हो ये कथित कूड़ा क्यूंकि जिस गेट के सामने
ये कूड़ा रखा है हो सकता हो वो गेट प्रयोग में ही नहीं आ रहा हो,
तो स्टोर के रूप में अगर जगह का इस्तेमाल कर भी लिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया,
हमारा भी यही कहना है
बिल्कुल सही कहा जब गेट का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा हो तो उसे कुछ तो प्रयोग में लाना चाहिए,
लेकिन इतना विकराल प्रयोग
तो नासा वाले भी नहीं करते होंगे, कौन है वो महान हस्ती, जिसने ज़िलाधिकारी आवास के गेट के सामने इतनी गंदगी फ़ैलाने का हौसला दिखाया है, हम उससे ज़रूर मुलाक़ात करना चाहेंगे, पता नहीं क्यों लेकिन अंदर से फीलिंग आ रही है,
कोई न कोई स्टाफ़ का ही मामला है, आम जनता इतनी ऊपर आने की ज़हमत नहीं उठाने वाली ठेरी
सोलह टके सच बात है,

ख़ैर
अंत में
हमारा पहले माननीय ज़िलाधिकारी महोदय से अनुरोध है कि कृपया कभी शाम के समय अपने आवास के आसपास भी चहलकदमी करने की मेहरबानी कर दिया कीजिये, क्योंकि इससे शहर की जनता का हाल तो जानने को मिलेगा साथ ही अपने आवास के आगे क्या चल रहा है, उसकी भी पोल खुल जाएगी
तथा नगर पालिका प्रशासन से अनुरोध है कि यदि अति व्यस्त रहने वाले डीएम साब यदि सफ़ाई के आदेश नहीं दे पा रहे हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि उनके आवास को ही ………
बना दिया जाये,
कृपया करके कथित गंदगी ज़िलाधिकारी आवास से हटवाने का प्रयास शीघ्र करें, कहीं ऐसा न हो महोदय की अकस्मात दृष्टि पड़े और सबकी छुट्टी हो जायें….

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-12 : तुम तो ठहरे नेताजी…

चुनाव का मौसम आ गया है , सफ़ेद, हरे, पीले, काले, नीले
न जाने कितने रंगों से सजे
मेरे शहर में अब नेता जी मिलेंगे,
कभी उस गली, कभी इस गली,
हर चौराहे पर चर्चा करते हुए
बस इन्हीं के मुद्दे चलेंगे,
व्हाट्सप्प, फेसबुक
(नहीं नहीं ट्वीटर पर नहीं) पर सैकड़ों प्रशंसकों द्वारा
हज़ारों नारे ज़िंदाबाद के
लगने लगेंगे, पूरे परिणाम चुनाव से पहले ही दूरदर्शी विद्वान
घोषित करा देंगे,
कुछ गिने चुने उम्मीदवारों को छोड़कर बाकि अंजान उम्मीदवारों की पहचान
कराने के लिए चुनाव आयोग
का कोटि कोटि धन्यवाद,
जो बचपन से नहीं दिखे वो
सीधे अपना हक़ (वोट) मांगने आ जाते हैं, अब हम हिन्दुस्तानियों का दिल ही इतना बड़ा होता है कि हमारे पास वोट एक होता है, लेकिन वादा हम हर नेता से
कर लेते हैं,
नहीं भई, लालच या डर की वजह से नहीं वो तो बस सम्मान रखना पड़ता है न,
आख़िर कोई आपकी चौखट पर पहली और आख़िरी बार जो आता है तो उसे ख़ाली नहीं भेजा करते न,
दाज्यू,
ये चुनाव भी अजीब चीज़ है,
अधिकतर नेताजी
चुनाव जीतकर ख़ुशी से ग़ायब हो जाते है और जो चुनाव हार गए वो हारने के ग़म में अंडरग्रॉउंड हो जाते हैं ( दोनों में पांच साल की समानता देखी जाती है )
हम लोग तो कन्फ्युजा जाते हैं , ग़ायब तो दोनों ही हैं इनमें हारा कौन था, जीता कौन था ???
और वही गाना गाते रह जाते हैं
“तुम तो ठहरे नेताजी साथ किया निभाओगे”
इन सबके बीच मज़े की बात
ये होती है जिन मुद्दों को
आधार बनाकर हमारा आधार हिला दिया जाता है,
वो मुद्दे हमें लम्बी ज़ुबान निकालकर हर चौराहे पर
चिढ़ाते हैं,
और हम अगली बार सही नेता चुनने की बात कहकर (मुद्दों को) अगले 5 साल बाद देख लूंगा की चुनौती देकर आगे बढ़ जाते हैं,
घर आकर वही मायूसी,
वही उदासी, वो तो भला हो केबीसी के श्री अमिताभ बच्चन का जिन्हें देखकर
मन खुश हो जाता है,
और कम से कम घर बैठे लखपति बनने का सपना पूरा होता दिख जाता है,
हालाँकि एक रुपयापति अभी तक न बने हों लेकिन वो बंदा पूरे पैसे वसूल करवा जाता है,

और एक हमारे नेताजी हैं,
जो अपने किये पर पछतावे के अलावा हमें कुछ देकर जाते हैं
तो बस अगली बार का
“विवेकपूर्ण मताधिकार”
जो घूमकर बार-बार घड़ी की सुई की तरह वापस वहीं आकर (रिश्तेदारियों के चक्कर में )
हमारे 12 बजा देता है,

अंत में
ख़ुशी की बात ये है कि हमारे शहर में भी चुनाव नज़दीक हैं उम्मीद जगी है शायद
इस बार हम सबको कुछ बेहतर नेतृत्व मिले, जो सरोवरनगरी को समझे, उसके बाशिंदों को समझे,
जो महज़ चुनाव जीतकर रुतबा हासिल करने वाला न हो, सभासद से लेकर चेयरमैन तक हर व्यक्ति आम जनता से सीधे संवाद करनेवाला हो, जिससे एक सशक्त नगर पालिका परिषद् का गठन हो, हमारे नैनीताल की प्रत्येक समस्या की सुनवाई हो, उसका निदान हो…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक -11 :  ‘टुच्च कोटि’ का ‘दुखीला बीमारी’ अस्पताल

जी हाँ …
आज हम बात करेंगे
कुमाऊँ के जाने माने
(यहां एक बार जो बैठा हुआ आता है, लेटा हुआ जाता है इसलिए मशहूर) एक मात्र
‘दुखीला बीमारी’ अस्पताल की,
जैसा की आपको
नाम से ही पता लग
गया होगा, जी
तो हम आज आपको
उसके स्तर की बात बता रहे हैं, एक तो होता है उच्च कोटि
और एक उससे भी
बड़ा वाला होता है
‘टुच्च कोटि’
जी, जी
ये अस्पताल उसी कोटि
में आता है,
उच्च कोटि से बढ़कर इसलिए कहा क्यूंकि यहाँ एक से बढ़कर एक क़ाबिल चिकित्सक हैं,
उनको सहायता करने वाले
हज़ारों मेडिकल स्टूडेंट्स है, काफ़ी हद तक हर प्रकार की चिकित्सा हेतु आधुनिक
उपकरण हैं, उन्हें ऑपरेट
करने के लिए सैंकड़ों तकनीशियन कर्मचारी हैं,
कुल मिलाकर पूरे अस्पताल को चलाने में लाखों रुपयों का खर्चा प्रत्येक माह में सरकारी ख़ज़ाने से ज़रूर होता होगा, इतना होने के बावजूद
‘टुच्च कोटि’ का इसलिये है
क्योंकि
एक आरटीआई से खुलासे
के बाद ये तथ्य सामने आया है कि पिछले 10 वर्षों में लगभग 12000 लोगों की मौतें यहां उपचार
के दौरान हुई हैं,
हमारा सवाल है
इसका ज़िम्मेदार कौन है,
वे चिकित्सक जो मोटी- मोटी तनख़्वाह पाने के बावजूद किसी की जान नहीं बचा पा रहे हैं,
या वे जूनियर जो सीनियर की बताई गयी बातों को हल्के में लेकर मरीज़ को मात्र
एक्सपेरिमेंट का साधन मान कर
उसकी बॉडी के साथ खिलवाड़ करते हैं, या वे लोग जो किसी भी जाँच की तारीख़ इतनी लम्बी देते हैं कि उतने दिनों में मरीज़ ही वापस न आये,
लिफ़्ट, कैंटीन, साफ़ -सफ़ाई आदि सुविधायें
ठीक ठाक होने के बावजूद,
आये दिन होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार आख़िर कौन है ??
कौन है उन 12000 मौतों का
ज़िम्मेदार ???
हम कितना ही विनम्र
होकर या गुस्से में पूछें
यहां कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं,
ज़िम्मेदारी के नाम
पर चिकित्सा में बस एक
डायलॉग सिखाया जाता है,
जो हर मौत के बाद बोला जाता है, “आई एम् सॉरी मैं उनकी जान नहीं बचा सका /सकी”
चिकित्सक तो इतना कहकर किनारे हो जाते हैं,
और हर गुनाह से बच जाते हैं, लेकिन कभी इस बात को सोचा है कि उस परिवार पर क्या बीतती होगी, जिसने अपने घर का कोई भी सदस्य खोया हो,

अंत में
स्वास्थ्य मंत्रालय भारत व राज्य सरकार से हम ये अपील करते हैं कि किसी भी सरकारी अस्पताल को मौत का मकबरा न बनने दें , हम जानते हैं आपके चिकित्सक अव्वल दर्जे के हैं लेकिन उसके बावजूद ये कटु सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आपके अधिकतर सरकारी अस्पताल बीमार चल रहे हैं, (सबका नाम किसी और दिन) उन्हें ख़ुद किसी अच्छे उपचार की ज़रूरत है।
कृपया अस्पतालों की
बीमारी दूर करें,
मान्यवर, गुस्ताख़ी माफ़ हो
आपके अधिकतर अस्पताल कोमा में चले गए हैं…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है…

अंक-10 : ‘मित्र पुलिस’ रीत सदा चली आई, अपराधी जाये-पर चालान न जाई

इस तस्वीर में जो आप गाड़ियां देख रहे हैं न,

अरे…नहीं…साहब
अपनी नहीं है
हमारी हैं, हम सबकी हैं,
लेकिन हममें से कोई
इस बात की ज़िम्मेदारी
नहीं ले सकता कि
ये गाड़ियां हमने अस्त-व्यस्त तरीक़े से सड़कों के
किनारे ही क्यों खड़ी कर रखी है,
क्या इससे बाक़ी आने जाने
वाले वाहनों को दिक़्क़त नहीं होगी,
क्या हमने ऐसा करके￰ उचित किया है?
इस तस्वीर के माध्यम से हम नैनीताल के प्रमुख
अघोषित पार्किंग स्थलों
जैसे ज़िलाधिकारी आवास मार्ग, ठंडी सड़क, बीडी पाण्डे के
पीछे वाली सड़क,
मल्लीताल थाने के पीछे
लकड़ी टाल के नज़दीक़,
चीना बाबा मंदिर से
आयकर आयुक्त वाली सड़क और भी मशहूर पार्किंग स्थल हैं
जिनसे आपको रूबरू करा रहे हैं ताकि जब कभी नैनीताल आना हो तो शर्माइएगा नहीं,
निडर होकर आप भी अपनी गाड़ी खड़ी करियेगा,
वो भी “फ्री ”

हाहाहा ….
क्या कहा “हल्द्वानी”
अरे नहीं जनाब
हल्द्वानी तो इस मामले में भी
दो क़दम आगे है ..
हल्द्वानी की शराफ़त का
यहीं से आपको अंदाज़ा हो जाएगा, जनाब
तिकोनिया चौराहे से
शुरू होने वाले केनाल रोड को तो
आपने देखा ही होगा
और उसका आजकल का ज़बरदस्त हाल भी देखा होगा, जहां लगभग 5 साल पहले
परिंदा ही पर मार सकता था , लेकिन अब परिंदे तो दूर-दूर तक
नज़र नहीं आते,
बस
बन्दे ही बन्दे दिखते हैं,
और वो बंदे जब उस रोड पर आते हैं तो सड़क किनारे
गाड़ी खड़ी करके अपने
ज़रूरी काम निपटाते हैं,
प्रत्येक वाहन स्वामी इस ख़ुशफ़हमी में रहता है,
जैसे गाड़ी के साथ उसने
रोड की भी रजिस्ट्री करा ली हो जहाँ चाहे वो गाड़ी खड़ी कर देंगे, फिर वहां जाम लगे या झाम उनकी बला से,
यहां से थोड़ा आगे जाएंगे
तो आप पाएंगे दुर्गा सिटी सेंटर
के एरिया का अस्त व्यस्त हाल, जिसकी मर्ज़ी जहां आयी,
उसने वहां गाड़ी टिकाई

नैनीताल, हल्द्वानी, उधम सिंह नगर, काशीपुर, रामनगर के
साथ-साथ लगभग हर क्षेत्र का यही हाल है,
जहाँ तक मुझे ज्ञान है
उत्तराखंड के लगभग
प्रत्येक शहर में पुलिस है,
हाँ वो अलग बात है उसे हेलमेट …
सॉरी अब तो
“डबल हेलमेट” वाला चालान काटने में समय कहाँ होगा, अघोषित निःशुल्क पार्किंग पर कार्रवाई करने का,
अरे …वो ज़रूरी भी है,
कोई अपने घर से
अपनी पत्नी को लेकर
अस्पताल जा /आ रहा हो और
उसने हेलमेट नहीं पहना हो तब तो ये अव्वल दर्जे का अपराध माना जाऐगा,
उसका चालान होना ही चाहिये, आख़िर सुरक्षा भी कोई चीज़ है
ये अलग बात है राजस्व उससे बड़ी,

धन्य हो,
उत्तराखंड पुलिस ,
बाई गॉड,
असली मित्र तो
आप ही हो हमारी,
उफ़्फ़,
कितना ख़याल
रखती हो हमारा,

अब हमारे हेल्मटिया चालान
के चक्कर में, कार से
भले ही कोई शातिर
मुजरिम निकल जाये,
परवाह नहीं करते,
लेकिन 100 का चालान
कटना चाहिये,

वो कहते हैं ना,
रघुकुल रीत
सदा चली आयी ….
अपराधी जाये,
पर चालान न जायी
(अब ये मत
कहियेगा ऎसे नहीं था)

अंत में
उत्तराखंड
पुलिस प्रशासन से
हमारा अनुरोध है कृपया
हेलमेट चालान से
थोड़ा हाथ रोककर
(पार्ट टाइम में ही सही)
शहर की अन्य स्थितियों से भी अवगत हो जाएँ,
अघोषित पार्किंग,
युवाओं में बढ़ती
नशे की आदत,
विशेषकर हल्द्वानी की आपराधिक घटनाओं
पर अंकुश लगाने की भी
कभी- कभी ज़हमत
उठा लिया कीजिये,

हाँ, इससे थोड़ा नुकसान
तो ज़रूर होगा,
एक-दो चालान
कटने रह जाएंगे
लेकिन क़सम से
अगर अपराध का ग्राफ
कम हो गया न,
तो आम नागरिकों के
साथ-साथ आपको भी
चैन की नींद आएगी,
करके देखिये
अच्छा लगता है…

सावधानी ही
समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-9 : 377 के दौर में me too

क्या सही ?
क्या ग़लत ?

साहिबान
सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर
ये “#मीटू” है किस बला का नाम और इसकी शुरुआत कैसे हुई ?

तो जनाब
क़रीब 12 साल पहले
अमेरिका की सामाजिक कार्यकर्ता टेरेना बर्क ने
ख़ुद के साथ हुए,
यौन शोषण का
ज़िक्र करते हुए,
सबसे पहले इन
शब्दों का इस्तेमाल किया ,
हालांकि
उन शब्दों का असर
होने में थोड़ा टाइम लग गया ,
लेकिन वो कहते हैं न,
शब्द नहीं मरते ,
2017 में हॉलीवुड प्रोड्यूसर
हार्वे वाइंस्टीन पर
50 से ज़्यादा महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए ,
उसके बाद एक और हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी आरोप लगाए और
“# me too” के ज़रिये
अपनी बात रखी,
तत्पश्चात उनको हैशटैग करने वालों की संख्या 32 हज़ार से ज़्यादा पहुंच गयी
तब से ये “# me too” का
चलन बढ़ा है,
हमारे भारत में इसे लाने का श्रेय नहीं …नहीं बाबा …
आप तो हमेशा बेचारी
राखी सावंत को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं,
इस बार ये महान कार्य किया है , इमरान हाशमी की हीरोइन
तनुश्री दत्ता ने जो अपनी दाल गलाने अमेरिका गयीं थी
लेकिन कुकर फट जाने के कारण वो वापस भारत आ गयीं यहाँ आकर उन्होंने “# me too” ￰नामक कुकर लिया
जिसमें गणेश और नाना प्रकार की दाल गला दी,
जबसे ये दाल गलने की रेसिपी फेमस हुई है तब से हमारे भारत में सादी छवि वाले आलोकनाथ से लेकर पत्रकार से राजनेता बने एम जे अकबर तक लपेटे में गये, (आरोप जाँच का विषय है)
बहरहाल,
दुनिया के सामने अब
me too के मायने ही बदल गए,
भई
पहले ज़माने में कोई
अच्छा लगता तो उससे कहा जाता था,
I Love U बदले में वो
Me too बोलता या बोलती

फिर माननीय ने
क़ानून बदला और
लड़के लड़कों से और
लड़कियां लड़कियों से
I Love u और
me too कहने लगे,
फिर भी माननीय का
घड़ा नहीं भरा तो उन्होंने
किसी दूसरे की पत्नी को
किसी दूसरे युवक से
metoo metoo
कहने की आज़ादी दे दी ,

अब तो इस me too ने प्यार के इज़हार की परिभाषा ही बदल दी ,
अब इसका मतलब हो गया ,
स्त्री के साथ
छेड़छाड़, बदतमीज़ी
या शोषण
हम किसी भी हालत में ये नहीं कहना चाह रहे हैं कि
महिलाओं को
सुरक्षा का अधिकार या
किसी प्रकार की आज़ादी नहीं हैं , हम महिलाओं का सम्मान
करते हैं लेकिन
ये तो सभी ने सुना होगा
किसी भी चीज़ की अति
विनाश को आमंत्रित करती है
कहीं ऐसा न हो
अधिकार, आज़ादी की
अति उपलब्धता
पुरुष और स्त्री के बीच इतनी गहरी खाई बना दे,
जिसे पाट पाना
फिर किसी क़ानून के हाथ में न रह जाये…

अंत में
हमारा समस्त
स्त्री व पुरुषों से
विनम्र निवेदन है
कृपया
प्यार, स्नेह ,
सम्मान और आकर्षण
एक दूसरे के प्रति बनाये रखें,
क्योंकि यदि समय रहते
हम नहीं सम्भले तो
आनेवाला समय
अपने हाथों में इतने भयंकर उपकरण लाने वाला है
जिसके चंगुल में एक बार
फंसने के बाद निकलना
असम्भव होगा,
इसलिए मायावी जाल में
खुद को फंसने न दें,
इनका पल भर का आकर्षण
हमको जीवनभर के लिए
तन्हा कर सकता है,
और तन्हाई में हमारे साथ
सिर्फ़ और सिर्फ़ तन्हाई होती है जो हमारे मुंह में पानी नहीं
डाल सकती,
उसके लिये परिवार का होना ज़रूरी है,
नस्लों का होना ज़रूरी है ,
ये सार्वभौमिक सत्य है कि
377 को मानने वाले चाहे कितनी ही जुगत लगा लें,
अपने ख़ून से
अपना कुटुंब नहीं बढ़ा सकते,
उन्हें पूर्वजों के पद चिन्हों पर ख़ुशी से या मजबूर होकर
चलना ही होगा …

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-8: ग्लूकोज-रिस्क पर बीडी पांडे जिला अस्पताल

मोदी स्वास्थ्य योजना
“आयुष्मान”

( योजना का नाम )

बनाम

बी.डी. पाण्डे ज़िला चिकित्सालय , नैनीताल

(योजना में पलीता लगाने वाले प्रबल दावेदार का नाम )

दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना कही जाने वाली “” आयुष्मान स्वास्थ्य योजना”
का
प्रधानमंत्री समेत भारत के 26 राज्यों व
6 केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने एक साथ
हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ किया था ,
बहुत नेक क़दम है , फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी
चाहे लाख योजनायें ले आयें लेकिन
उत्तराखंड का प्रसिद्ध
पर्यटन स्थल जिसे
सरोवर नगरी नैनीताल के नाम से जाना जाता है ,
वहां मुख्य बाज़ार क्षेत्र में
अँग्रेज़ी शासन में बनी
भव्य इमारत मौजूद है,
जिसमें राजकीय बी.डी.पाण्डे ज़िला चिकित्सालय नाम से
एक अस्पताल जैसा कुछ
चलाया जाता है,
यहाँ *अस्पताल जैसा *शब्द इसलिए इस्तेमाल किया गया क्योंकि वहां अस्पताल के नाम पर सिर्फ़ वहां नियुक्त चिकित्सकों को मोटा वेतन मिलता है ,
जिसके एवज़ में वो
फ़ाज़िल और क़ाबिल चिकित्सक
अस्पताल में आये
बुख़ार या सिर दर्द से पीड़ित मरीज़ का ऐसा उपचार करते हैं , ऐसा उपचार करते हैं कि
ग्लूकोज़ चढ़ा-चढ़ा कर उसको खली जैसा बलवान बनाकर ही मानते हैं…
आख़िरकार हार थक कर मरीज़ ख़ुद बोल पड़ता है …
साहिब जाने दीजिये …
अब मेरे बस की बात नहीं और ज़्यादा ग्लूकोज़ चढ़ाने की…
इतना सुनकर चिकित्सक की आँखों से आंसू बहने लगते हैं… ( मन में सोचते हुए कि आख़िर उनका एक्सपेरिमेंट कामयाब हुआ )
आंसू देखकर मरीज़ भी भावुक हो उठता है और चिकित्सक साहब की ख़ुशी की ख़ातिर
जाते – जाते एक ग्लूकोज़ की बोतल और चढ़वा लेता है …
तब जाकर उस मरीज़ को वहां से छुटकारा मिलता है …
फिर सीधा वो नयना देवी मंदिर में जाकर मत्था टेकता है….
प्रसाद चढ़ाता है और
मन में ठान लेता है कि
उस दिन को वो आज से 15 अगस्त के रूप में मनाएगा….

जी बिल्कुल नहीं जनाब..
ऐसा मत सोचियेगा कि
यहां के
फ़ाज़िल और क़ाबिल चिकित्सक बुख़ार और मामूली सिर दर्द वाले सभी मरीज़ों को
ग्लूकोज़िया ट्रीटमेंट देते हों …
न न …
जब वो देखते हैं कि
कुछ रसूखदार लोग
मरीज़ के साथ आये हैं तो
उनको थोड़ी मेहनत भी करनी पड़ जाती है …
फिर
मरीज़ को ग्लुकोज़ के साथ-साथ आयरन , कैल्सियम की गोली भी खिला देते हैं …

जब बहुत देर हो जाती है …
तो चतुरता दिखाते हुए चिकित्सक, मरीज़ को सीधे हल्द्वानी या दिल्ली ले जाने का परामर्श दे डालता है …
( मन में सोचते हुए कि आखिर कब तक इसे भी ग्लूकोज़ चढ़ाऊंगा ….
अपना सम्मान भी बनाये रखना है और वैसे भी हाई – प्रोफाइल मामला है …
कहीं लेने के देने न पड़ जायें)

अब परेशानी में रसूखदार लोगों को भी वही उचित लगता है .. चिकित्सक महोदय सही कह रहे हैं ..
यहाँ रखकर रिस्क कौन ले …???
बोलकर अपने मरीज़ को हल्द्वानी या दिल्ली ले जाते हैं …

मुद्दा यही है ‘रिस्क कौन ले’ ????????

जिस अस्पताल में नाम मात्र के चिकित्सक हों ,
संसाधन के नाम पर
जो अस्पताल सिर्फ़ ग्लूकोज़ से चल रहा हो …
क्या वो अस्पताल
दुनिया की सबसे बड़ी
स्वास्थ्य योजना का
पलीता लगाने में
कारगर साबित नहीं होगा???

ये तो सिर्फ़ छोटे से शहर नैनीताल की बात है …

पूरे देश में न जाने कितने ऐसे
बी.डी.पाण्डे अस्पताल हैं
जो अपनी लचर व्यवस्था के कारण
ख़ुद बीमार हैं,

देश के प्रधानमंत्री से
हमारा यही अनुरोध है कि
पहले बीमार अस्पतालों की
सेहत में सुधार लाना चाहिए ,
तत्पश्चात इंसानी स्वास्थ्य को सही करने की योजना बनानी चाहिये….

“मंच”
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद)

अंक -7:  कैसे सरकारी स्कूल चलें हम…

कल के अंक में आपने पढ़ा
कि निजी स्कूल किस तरह से अभिभावकों पर
 मनमानी चला रहे हैं
और अभिभावक उनकी
हर शर्त मानने को तैयार हैं ….
आज हम बात करेंगे
सरकारी स्कूल के बारे में ….
तो श्रीमान …
सबसे पहले
हम अपनी लाइफ को
थोड़ा पीछे लेकर चलते हैं ,
न, न
ज़्यादा नहीं
बस ….90 के दशक
तक के हालात देखें ,
उसमें आप पाएंगे कि
सरकारी स्कूल का
बोल बाला था ,
एक एक क्लास में
100-150  बच्चे
प्रत्येक वर्ष होते ,
बच्चों की बढ़ती संख्या
को देखते हुए ,
उनके सेक्शन बनते
A, B,C….तब कहीं जाकर
बच्चे एडजस्ट हो पाते….
क्या कहा …..
पढ़ाई अच्छी नहीं होगी ????
नहीं नहीं …
उस समय ट्यूशन का
 ज़माना नहीं था ,
 जो भी था स्कूल था ,
इसलिए बच्चे क्लास में ही
मन लगाकर पढ़ लिया करते ,
अरे साहब …
अब उनकी बात तो
हम अभी कर ही नहीं रहे …
हाँ…हाँ…
सबके सब बच्चे तो
पढ़ाकू नहीं होते थे ,
कुछ स्कूल गोल मारने वाले
भी होते थे
 लेकिन वो भी शाम को घर जाकर पढ़ते ज़रूर थे …
इन सबके पीछे
मज़बूत कड़ी का
काम करते थे …
उस ज़माने के शिक्षक
जो …
बच्चो के माता –  पिता के
साथ साथ उनके दादा – नाना जी को भी जानते थे ,
तो गुरूजी कान खींचते वक्त
पापा का नाम तो नहीं लेते थे , सीधे दादा या नाना का
रौब दिखाते,
इसलिये बच्चा शर्म से
सर झुकाये
 शिक्षक की डांट सुनता रहता, कुल मिलाकर …
हिंदी , अंग्रेज़ी, गणित , विज्ञान सभी विषयों में
शिक्षक पारंगत होने वाले ठेरे…
तो रिजल्ट भी अच्छा आने वाला हुआ …..
हाँ…बस…
एक रोष था शिक्षकों में …
बच्चे तो कक्षा में बहुत थे ,
लेकिन जेब में पैसे कम
हुआ करते,
न ट्यूशन ,
न कोई कोचिंग इंस्टिट्यूट
का फंडा…
जो भी था , बस वही सरकारी स्कूल था ,
समय बदला और निजी विद्यालयों की क्रांति आ गयी ,
मोहल्लों में भी कुकुरमुत्तों की तरह छोटे -छोटे स्कूल उग गए …
इन कुकुरमुत्तों ने अंग्रेज़ी भाषा का ऐसा रौला काटा
और डर भी लगने लगा
 कि अगर अंग्रेज़ी नहीं पढ़ी
तो समझो दुनिया
अनपढ़ समझेगी आपको ..
बिल गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट के ज़रिये कंप्यूटर को घर -घर पहुंचाया …(उनका धन्यवाद )
अभिभावक इसी होड़ में
कि हमारा बच्चा कंप्यूटर सीखने में पीछे न रह जाये ,
(किसीने फैला दिया होगा कि आने वाले समय में हर काम कम्प्यूटर से होगा, लेकिन ये नहीं बताया कि कंप्यूटर चलाने वाला मनुष्य ही होगा )
इसलिये सब
अपने -अपने बच्चों को
सरकारी स्कूल से निकालकर निजी स्कूलों में डालने लगे ,
धीरे -धीरे सरकारी स्कूलों में
बच्चों की संख्या
घटती चली गयी …
पहले 90 बच्चों पर
एक शिक्षक होता था
आज 9 बच्चों पर
एक शिक्षक है ,
फिर भी शिक्षा की वो गुणवत्ता नहीं आ पा रही है ,
 जो 90 बच्चों की कक्षा में
आ जाती थी ,
जबकि आज सरकारी
विद्यालयों में बच्चों के लिए भोजन उपलब्ध  है ,
फीस बहुत ही कम,
पुस्तकें भी सरकार के स्तर पर काफी हद तक
मुफ़्त मिल जाती हैं ,
किसी तरह का कोई
अतिरिक्त शुल्क नहीं
लिया जा रहा ,
फिर भी अभिभावक
अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में डालने से
कतरा रहे हैं ….
आख़िर क्यों ???
शायद इसलिए कि
उन्हें लगता है
कहीं उनके बच्चे की अंग्रेज़ी के साथ खिलवाड़ न हो जाये ..
तो…
जनाब…
ऐसा बिल्कुल नहीं है , इस बात को दिल से निकाल दें , आज भी सी.आर.एस. टी.इण्टर कॉलेज , नैनीताल में
श्री सोबन सिंह बिष्ट जैसे
शिक्षक हैं
जो बच्चों पर अपनी
जान भी लगाने को तैयार रहते हैं , शहीद सैनिक विद्यालय में
श्री गोपी बोरा हैं जो
बच्चों को खेल में महारत हासिल कराने के लिए दिन रात
एक कर देते हैं ,
वहीं रा. प्रा.वि. बजेला, धौलादेवी अल्मोड़ा, के सहायक अध्यापक भाष्कर जोशी जी बच्चों की अंग्रेज़ी के साथ भविष्य को सँवारने में लगे हुए हैं,
ऐसे ही न जाने कितने …
सोबन सर, गोपी सर और भाष्कर सर हैं जो
सरकारी विद्यालयों में अपनी मेहनत, ईमानदारी और लगन से बच्चों के सर्वांगीण विकास को  तत्पर हैं ….
अंत में ….प्रशासन से नहीं
आज
अभिभावकों से हमारा अनुरोध है कि कृपया अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही
प्रवेश दिलाये,
सरकारी स्कूल की तरफ
आपका बढ़ता रुझान
 उन विद्यालयों की
खस्ता हालत में
सुधार ला सकता है ,
जिनमें बच्चों की संख्या
न के बराबर है
और सरकारी शिक्षक मोटी तनख्वाह (बिना काम किये)  खाने को विवश  हैं ,
 एक दो बच्चों में तो सरकारी शिक्षक का पढ़ाने का
मूड ही नहीं बनता ….
जिसके लिये
हम और आप ही ज़िम्मेदार हैं , हमने ही बच्चों को वहां न भेजकर सरकारी शिक्षकों को
काम टलाऊ बना दिया है ….
और हाँ … सिर्फ़ अंग्रेज़ी के चक्कर में ख़ुद के घर का गणित मत बिगाड़िए ….साहब….
बच्चे को ग्रामर पढ़ाइये ,
अंग्रेज़ी न्यूज़ पेपर दीजिये , अंग्रेज़ी में ख़ुद
बात करिये…
ज़्यादा जल्दी में हो तो
अंग्रेज़ी स्पोकन क्लास
शुरू करवा दीजिये ….
किन्तु इन भष्मासुर जैसे
इंग्लिश मीडियम स्कूल का शिकार मत बनिये….🙏🙏
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….
आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-7: आज के स्कूल का वादा-पढाई कम, बिज़नेस ज़्यादा

पढ़ेगा इंडिया…तभी तो .
बढ़ेगा इंडिया…

भारतीय आम नागरिकों को
प्रोत्साहित करने के लिये
इससे अच्छा नारा नहीं हो सकता….
इसका नतीजा ये हुआ कि
मेरे एक मित्र के मन में
देशभक्ति वाला फुल टू भाव जाग्रत हुआ ,
और जोश में आकर
होश की दुकान बंद कर बैठा…
कहने लगा…
मैंने तो बच्चों को इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ाना है,
मेरे बच्चे बड़े होकर
चटर- पटर
इंग्लिश बोलेंगे
तो मुझे उन पर नाज़ होगा…
मैंने बोला… भाई
वो बात तो ठीक है लेकिन आजकल के ज़माने में
अंग्रेज़ी मीडियम का मतलब पता है ???
किसी ठीक ठाक स्कूल में
बच्चों का एडमिशन करने
जाओ तो
सबसे पहला बम
एडमिशन के नाम पर डोनेशन यानि दान
अपने सर पर फोड़ना पड़ेगा…
थूक दान, पीक दान , कूड़ा दान तो सुना था,
ये स्कूल दान भी कोई बला है,
ये एडमिशन टाइम पर
पता चलता है,

जी… जनाब …
एडमिशन फीस और डोनेशन….
(साहब…ये दोनों एक दूसरे को पहचानते तक नहीं )
इससे पैसा आपके पास से तो
चला जाता है लेकिन उसका एडमिशन फीस से
दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं होता,
वो अलग होती है,
फिर मंथली फी,
ऐकडेमिक फी,
कल्चरल एक्टिविटी फी,
स्पोर्ट्स फी,
लाइट फी,
बल्ब फी,
चॉक फी,
डस्टर फी,
जिस गेट से अंदर आये
उस गेट की फी,
जिस रास्ते पर चलकर आये उसकी टाइल्स फी,
जिस कैमरा ने तुम्हे कैप्चर किया उसकी सीसीटीवी फी,
करीब 9999 टाइप की फी जोड़कर (जिसमें स्कूल का मनोरंजन कर नहीं जोड़ा गया है , वो समय समय पर आपको बुलाकर आपसे वसूला जाएगा)
जब आपको बताया जाता है तो आपके पैरों से ज़मीन
और सर से आसमान
ज़रूर ग़ायब होता है,
लेकिन क्या करें,
सर से कफ़न भी तो
बांधा हुआ है,
आखिर हमारे पडोसी
शर्मा जी का बेटा भी तो यहीं पढ़ता है,
तो म्हारा बेटा
राजकुमारों से कम है के
वाली फीलिंग्स आ जाती हैं,
और हम चौड़े होकर
वो गोरी मैडम
की बातें सुनकर
यक़ीन करते चले जाते हैं,
उस टाइम तो सब मोह माया लगता है,
बस उस काउंसलर की बातों में सत्य के दर्शन होते हैं,
तो जहाँ-जहाँ मेमसाब
साइन करने को बोलती हैं,
धड़ा धड़ हम करते जाते हैं
(मात्र मुस्कराहट की इतनी ज़बरदस्त परफॉरमेंस को देखते हुए , छोटे -बड़े लगभग सभी स्कूलों ने फीमेल काउंसलर रखने की इस युग में ऐतिहासिक शुरुआत की थी)

तो साहब … मोटी रकम देकर
हो गया एडमिशन…
अब स्कूल से बाहर निकलते वक्त जब गेटकीपर ने सलाम ठोका,
तब तो बाई गॉड…
बिल गेट्स वाली अनुभूति हुई,
घर आकर मोहल्ले में
एक दिन की ब्रेकिंग न्यूज़ का हिस्सा बनने का अलग ही मज़ा है..
और फिर तो…
मज़े की शुरुआत हो जाती है,
स्कूल वाले आपको कभी बोर नहीं होने देते,
जैसे ही आप
रिलैक्स महसूस करोगे,
स्कूल से कॉल
आ जाती है,
अगले दिन बुलाया जाता है,
वहां आपके हाथ में
एक लिस्ट थमा दी जाती है
कि उक्त स्टेशनरी का सामान ( किताबें इत्यादि शामिल )
फलां दुकान से लाना है,
यूनिफार्म फलां से,
और अगर किसीने
गलती से पूछ लिया …
फलां से क्यों लाएं ???
कहीं और की नहीं चलेंगी
तब तो पूरे मजमे में
सब आपकी ही तरफ घूर कर
ऐसे देखेंगे जैसे
आपने देश के ख़िलाफ़
कोई टिप्पणी कर दी हो,
हद तो तब हो जाती है
जब पड़ोस वाले शर्मा जी की पत्नी भी
गिरी हुई नज़रों से देखने लगती हैं…
जैसे मन में सोच रही हों,
‘छी पुअर लोग , कहाँ से आ जाते हैं यहां , हुंह’……

ख़ैर….
स्कूल के आदेशानुसार
सारी चीज़ें उनके बताये हुए
अड्डे से ले ली जाती हैं,
( ऐसे में वो दिन दूर नहीं
जब घर के लिये टिंडे कौन सी दुकान से खरीदने हैं स्कूल वाले बताएंगे )
जिन बच्चों के अभिभावक
गाय की तरह सिर हिलाकर
हाँ में जवाब देते हैं,
उन्हीं बच्चों की बल्ले- बल्ले
होती है स्कूल में,
और जिन अभिभावकों ने
थोड़ी सी भी अधिकारों, जागरूकता या
नैतिकता वाली बात की,
स्कूल प्रशासन
अपने कोर शिक्षकों की
आपात बैठक बुलाकर
उस बच्चे के भविष्य पर
इमर्जेन्सी लगा देता है,
फिर तो उसे क्लास में
पानी की मोहलत भी
ऐसे दी जाती है
जैसे कर्फ्यू में ढील…
हैरत वाली बात है कि
बच्चों को पता नहीं कहाँ से
ये बातें पता लग जाती हैं
और वो सब भी
उस बच्चे से
कन्नी काटने लगते हैं,
ऐसा माहौल हो जाता है
मानो स्कूल ने
उसके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा चला दिया हो,

मतलब इतना भयंकर
माहौल बना देते हैं
कि बच्चा डिप्रेशन में
जाने को तैयार दिखता है,
चिंतित अभिभावक
अपने बच्चे को
बिना कोई शिकवा किये
स्कूल से निकाल लेते हैं,
दूसरे स्कूल में
डालने की सोचते हैं,
लेकिन अब कहीं एडमिशन मिलने को तैयार नहीं,
अजीब-अजीब से
बहाने बनाकर
हर स्कूल वाले टरका देते …

काफी दिनों के संघर्ष के बाद किसी स्कूल चपरासी के मार्फ़त पता लगता है कि
स्कूल  स्कूल मौसेरे भाई,

जब तक आप पहले स्कूल प्रशासन से माफ़ी नहीं मांगेंगे आपके बच्चे को
कोई एडमिशन नहीं देगा…
तब बेचारे….
जागरूक अभिभावक को
अपने बच्चे के
भविष्य के ख़ातिर
झुकना पड़ता है ,
वैसे दुनियाभर के
रंग-बिरंगे अभिभावक संघ
और समितियां बनी हुई होती हैं , लेकिन एन्ड टाइम पर
जब साथ देने की बात आती है …
सबके सब टें… बोल जाते हैं…

हाँ कहीं चाय -पकौड़ी मिलने वाली हो,
सबके सब अभिभावक हित की डींगे मारते नज़र आएंगे ,
या किसी स्कूल में कोई बलात्कार या छेड़छाड़ की घटना हो जाये, उसके बाद
बैटरी फुल चार्ज करके
स्कूल प्रशासन को कोसते हैं , लेकिन कभी भी
घटना से पहले स्कूल के सामने सेल्फी तक नहीं लेते…

अंत में
मेरा प्रशासन (राज्य व स्कूल) से अनुरोध है
कि कृपया शिक्षा को शिक्षा ही रहने दें , व्यवसाय न बनाएं ,
आज अपने बच्चों को महंगी शिक्षा देने की कोशिश में अधिकतर अभिभावक खुद को गिरवी रखकर
स्कूल का पेट भर रहे हैं ,
लेकिन आजकल स्कूल का पेट इतना बड़ा हो गया है
कि भरने में ही नहीं आता…
माँ-बाप दोनों मिलकर
लगे पड़े हैं बच्चों की फीस जमा करने के चक्कर में ,
कोई ज़मीन बेच रहा है,
कोई ज़मीर बेच रहा है,
सब मजबूर कर दिए गए हैं…
इन होटल नुमा फाइव स्टार स्कूलों ने…
आये दिन
पैसों के लिए मुंह खोले इस बिज़नेस क्लास वर्ग पर किसी प्रकार स्पीड गवर्नर लगाकर ,
कृपया अभिभावकों की बेसाख्ता, बेतरतीब,
असहाय व अस्त-व्यस्त
होती ज़िंदगी को
पुनः पटरी पर लाने का
प्रयास करें…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक -6 : चिराग़ तले अँधेरा ….

ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न ,
उसके दो भाग किये गए हैं , जिससे हमारे सामने सारी तस्वीर साफ़ हो सके …
ऊपर से पहला भाग रेगिस्तान वाले राज्य राजस्थान के पार्क का है , दूसरा भाग हरी -भरी प्रकृति की गोद में बैठे , उत्तराखंड के पार्क का  है ….
जी आपके चेहरे की मुस्कान बता रही है कि आपने ख़त का मजमूं भांप  लिया है …. लिफ़ाफ़ा देखकर ….
वाह …बधाई के पात्र हैं आप …
और बधाई से याद आया हमारे शहर नैनीताल में कैपिटोल सिनेमा के सामने कुछ वर्ष पहले बड़ी गर्मजोशी के साथ , एक पार्क बनाया गया था , ज़ाहिर सी बात है , मोटा पैसा स्वीकृत हुआ होगा ,
नहीं नहीं …
मेरा इशारा अभी दूसरी तरफ़ नहीं …
( आप भी न …जहाँ पैसे के नाम आया , सोचते हो खा लिया होगा )
ऐसा नहीं है ….कुछ पैसा लगाया भी गया , और कुल मिलाकर देखने लायक़ ठीक- ठाक पार्क तैयार किया गया , चलो ठीक है ..
हम ख़ुश हुए ….कुछ नहीं बोले …
चलो कुछ तो अच्छा हुआ …
ये सोचकर उस उस मामले  पर पर्दा डाल दिया, किसने क्या खाया ???
क्या पिया ???
क्यूंकि साफ़ बात ये है भैया …
न हम खाते-पीते हैं , न बात करते हैं …
तो कहाँ थे हम …
जी…तो पार्क हो गया कम्प्लीट  ..
जनता ख़ुश….
फिर वही हुआ , जो हर फिल्म में हीरो  की फैमिली के साथ होता है ,
खुशियां को विलेन की नज़र लग गयी , और पार्क को तोड़ने के टेंडर निकल गए …
टेंडर पाकर
आख़िरकार ज़ालिम मोगेम्बो ने पार्क तोड़ भी दिया ,
हाँ…हाँ…
अब भला फ्री में तोड़ने की इतनी ज़बरदस्त सेवाएं कौन देगा भला ???
कोई जिगरवाला नहीं है ऐसा …
टूट गया पार्क ….
हो गए ख़ुश..
अरे  सॉरी…सॉरी
मोगेम्बो इतनी जल्दी ख़ुश कहाँ होता है ,
अभी तो एक बार और टेंडर डलेगा, फिर बनाने का ठेका मिलेगा ,
और प्रलय आने तक निरंतर यही तोड़ने , बनाने की  प्रक्रिया जारी रहेगी …..
तब कहीं जाकर हमारे राज्य के मोगेम्बो ख़ुश हो पाएंगे …
वैसे…मेरे समझदान में एक बात नहीं आ रही है …
जहाँ बारिश बहुत कम होती हो,
गर्मी ज़्यादा होती हो ,
 और पर्यावरण को रेगिस्तान ने चारों ओर से घेर रखा हो ,
फिर वहां के पार्क इतने हरे- भरे कैसे ???
क्या वहां कोई मोगेम्बो नहीं है , जो हमारे यहाँ की तरह पहले पार्क बनाये , फिर तोड़े , फिर बनाये ,
 **बना –  तोड़ –  बना** फॉर्मूले  पर सतत प्रयास जारी रखे …
मैं पहले ही सोच रहा था …
आपका जवाब यही होगा …
कि हमारे राज्य और राजस्थान राज्य में बहुत अंतर है , वहां के लोग रिस्क लेना नहीं जानते , जो चीज़ एक बार बन गयी सो बन गयी , उसके बाद उसे अच्छी तरह मेन्टेन रखते हैं बस , और सादा जीवन जीने में विश्वाश करते हैं ,
लेकिन हमारे यहां के लोगों में टैलेंट कूट- कूटकर भरा है (अब ये भरा कौन सी मशीन से है वो
एल.वाई.यू .वाले भी ढूंढ रहे हैं) उसी टैलेंट के माध्यम से ये मोगेम्बो लोग हर शहर में पार्क बना-तोड़-बना के सिद्धांत पर दिल की गहराईयों से जज़्बाती हुए पड़े हैं …और नैनीताल ही नहीं पूरे राज्य को दीमक की तरह खोखला किये जा रहे हैं …
अंत में प्रशासन से हमारा अनुरोध है कि या तो कुछ पार्क की तरह प्रत्येक पार्क को निजी संस्थाओं को गोद दे दिया जाये , जिससे उनका लालन-  पालन एक शिशु  की तरह प्यारभरी हो ,
या बना -तोड़ -बना जैसा खेल खेलकर आम जनता के एहसासों(  जिसमें मूलरूप से उसका अदा किया हुआ कर शामिल है )  के साथ न खेला जाये …

अंक -6 : वन संरक्षक कार्यालय का अद्भुत पर्यावरण संरक्षण : आपके चरण कहाँ हैं ???…

उत्तराखंड को देवों की भूमि यानि देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है ,
यहां के लोग सभ्यता और शालीनता के लिये जाने जाते रहे हैं , और वो बात भी आपने सुनी होगी कि गेंहू के साथ घुन पिस जाते हैं ,
जी हाँ …
बस अब इसको थोड़ा उल्टा टाइप से कर देते हैं ,
हमारे यहां घुन के साथ गेहूं पिसने का रिवाज पनपने लगा है साहब ….

अब यहाँ सस्पेंस करके कुछ होने वाला है नहीं , इसलिए आपको फिल्म के टीज़र में ही पता चल जाएगा कि घुन किस किरदार को कहा जा रहा है …

बहुत बढ़िया …जनाब
आपने तो पारखी नज़र का बेहतरीन इस्तेमाल करके कमाल दिखा ही दिया आख़िर…

जी हाँ …
हमारे नैनीताल में वन संरक्षक कार्यालय का जो दफ़्तर जैसा है न …जिसमें
सबके सब काफ़ी प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी विराजमान हैं ,
अरे वही …. जो वृक्ष आदि बचाने का बीड़ा उठाये रहते हैं ( ऐसा उनको लगता है, कितने वृक्ष वो कैसे बचा रहे हैं , उनका चित्रण अगले अंक में )
बस…
हाँ थोड़ा इधर घुमाइए …
जी बिल्कुल सही …अब ठीक है …
तो उनको ऐसा लगता है वो वनों की रक्षा के लिये नियुक्त किये गये हैं …
अब चाहे पर्यावरण में कितनी ही गंदगी फ़ैल जाये , उससे उन्हें क्या ???
वो तो गंदगी में अपने कार्यालय का कूड़ा डालकर चार , पांच , छह ….
अरे मालिक…
यूँ समझ लो
20 -25 चाँद लगा देते हैं …
इतने ज़्यादा चाँद इसलिये भी लग रहे हैं क्योंकि इनका कूड़ा किसी कूड़ेदान में नहीं डलता बल्कि
खुले में सड़क के किनारे डाला जाता है ,
और क़ाबिलेग़ौर बात ये है कि
कूड़ा डाला तो डाला..
ज़्यादा होने पर उसे स्वाहा भी कर दिया जाता है …
बाई गॉड ….
एन जी टी का भी ख़ौफ़ नहीं ….
एन जी टी ….क्या कहा ???
ये किस चिड़िया का नाम है ,
हमारे पेड़ों पर तो बैठे हुए हमने कभी देखी नहीं …
एन जी टी वाली चिड़िया …
अब इस बहस में कौन पड़े …

इसलिये मान्यवरों से डायरेक्ट
निवेदन है कि कृपया अपने कार्यालय का कूड़ा खुले में न फेंके तथा चतुरता दिखाते हुए जलाये भी नहीं ….
ये पब्लिक है सब जानती है , अब आपके मुंह पर नहीं बोलती वो अलग बात है …
लेकिन आपके पीछे दिल खोलकर तारीफ़ होती है आपकी …

इसलिए अपनी तारीफ़ अधिक न करवायें, ….
स्वच्छता सबसे बड़ी उपलब्धि है ..
एक बार
करके देखिये अच्छा लगता है …

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

मंच
नैनीताल से
‘आज़ाद’

अंक – 5 : पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट’ की ’23 लाख की धूल’

ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न असल में
ये तस्वीर नहीं है …

तक़दीर है.. तक़दीर

उन लोगों की जो इस तस्वीर के एम.एफ.हुसैन हैं…

ज़ाहिर सी बात है सब यही पूछेंगे….

वो कैसे ???

तो भैया, वो ऐसे…
ये तो सबकी हार्ड डिस्क में
होगा ही कि
कुछ दिन पहले लोअर माल रोड के कुछ हिस्से ने ताल में छलांग लगा दी थी,
अब ये दीगर बात है कि उसने वैसा क्यों किया था , उस पहलू पर चर्चा किसी और दिन… (फ़िलहाल आप भी उसके पहलू खोजने के मूड में नहीं लग रहे…हैंं)

ख़ैर…
सड़क के क़रीब 20 – 25 मीटर लम्बाई वाले हिस्से ने
ताल में कूद लगाई  जिसकी चौड़ाई लगभग 10 – 20 फ़ीट रही होगी,
रंग डामरी और दोनों कानों में सफ़ेद रंग की झुमकियां पहने था,
रात के अँधेरे में तो उसकी झुमकियों से लाल रंग की जो जगमगाहट होती थी
वो और कमाल लगती थी….

जिससे झील के किनारे और खूबसूरत लगने लगते…

हाय! क्या गज़ब नज़ारा होता था,
डोंट बी इमोशनल…

आगे क्या होता है ये देखिये …

फिर… उस ख़ुदकुशी के बाद सब हैरत में पड़ गए, ….
क्या करें, क्या न करें वाली पोज़िशन हो गयी…

सड़क के नातेदार, रिश्तेदार सब परेशान…
आनन – फ़ानन में सूबे के मुखिया से उतने हिस्से की सर्जरी के लिए मदद की गुहार लगाई,

देर सबेर ही सही प्रशासन से सर्जरी की आधी रकम आ गयी,

उम्मीद तो थी कि बड़ी रकम आएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं और ये कहा गया की दूसरी खेप बाद में आएगी… पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट द्वारा
सोचा तो गया था, कि बड़ी रकम आएगी तो
किसी बड़े डॉक्टर से सर्जरी करवा लेंगे…
लेकिन
आधी रकम देखकर तो
पूरे ख़ानदान के चेहरे उतर गए, जैसे बीमे की रकम हाथ से निकल गयी हो,
फिर क्या था,
जितना गुड़ डलेगा, उतनी मिठास भी आएगी,
और यहाँ तो गुड़ क्या
चीनी की रकम तक नहीं आयी…

अब सारे ज़िम्मेदार लोगों ने सलाह मशविरा किया और सब सेटिंग होने के बाद
ये तय हुआ कि कहीं किसी एक्सपर्ट या स्पेशलिस्ट को बुलाने की ज़रूरत नहीं है,
हमारे यहां के फाज़िल और क़ाबिल डॉक्टर्स ही
अब उसकी सर्जरी करेंगे…
झोलाछाप हुए तो क्या हुआ,
वो भी डॉक्टर ही कहलाते हैं,

तो फिर क्या था, उन बेहतरीन डॉक्टर्स ने मिट्टी और लोहे के एंगल की बेजोड़ चिकित्सा से
उस क्षतिग्रस्त हिस्से की सर्जरी धड़ा धड़ कर डाली…

ऊपर से प्रेशर था…
ऑपरेशन भी जल्दी पूरा करना था, इसलिए क्या सही, क्या गलत ???
हमें पूछने की फुर्सत नहीं,
उन्हें बताने की…

और इसी के साथ
32 दिन में ऑपरेशन सक्सेसफुल हुआ.. (उनकी नज़र में)

उसकी सक्सेसफुलनेस का अंदाज़ा आपको भी लगाना हो तो कभी पधारो म्हारे देस…
क़सम से अगर
गोबर पर चलने वाली फीलिंग नहीं आयी तो,
जब कहना…

अब आलम ये है कि जितने वाहन उस मिट्टी- सर्जरी वाले
हिस्से पर से जब गुज़रते हैं न,
इतनी धूल उड़ाते हैं,
इतनी धूल उड़ाते हैं
कि सामने कैफ़े कॉफी डे में कॉफी पर धूल की चॉकलेट जम जाती है,
और आस-पास की दुकानों का सामान इतना गंदा हो जाता है जिसे टूरिस्ट देखने से भी कतराते हैं…

तो हो गए न…
आम के आम गुठलियों के दाम…
सड़क तो बनी चौपट,
ऊपर दुकानदारों का
धंधा भी कर दिया चौपट…
अगर किसी को अपने श्याम रंग से शिकवा है तो
इतने हिस्से पर कुछ देर विश्राम कर लें…
फिर फेयर एंड हैंडसम वाला ऐसा निखार आएगा वो ख़ुद को भी नहीं पहचान पाऐगा….

तो है न…
हमारे यहाँ कमाल के लोग
और उनमें ग़ज़ब की क़ाबिलियत…..

अंत में मेरा प्रशासन से यही अनुरोध है कि
चलो माना जो भी हुआ,
उस पर डामर डालते हैं…
( क्योंकि मिट्टी का हाल तो सब देख ही चुके हैं )
जैसी भी हुई सड़क
तैयार तो हुई…
लेकिन क्या
उस उड़ती धूल की भूल का
कुछ उपाय किया जा सकता है ???…
जिससे नगरवासियों के साथ- साथ पर्यटकों को भी नैनीताल में आनंद की अनुभूति हो…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

मंच
नैनीताल से
‘आज़ाद’

अंक -4 : मेरी आदर्श… नरक पालिका नैनीताल

किसी भी नगर की पालिका को अपना शहर नरक बनाकर दुनिया के नक़्शे में अपनी जगह बनानी हो तो …
अरे भाई ….
चौंकिये नहीं ….
इसमें खास बात ये है कि
आपको करना कुछ नहीं है …
सबसे पहले अपनी कार्यशैली नैनीताल की नरक पालिका की जैसी महान बना लें…
हाँ…ये ज़रूर है कि इतनी आसानी से इतना उम्दा क़िस्म का नकारापन और नालायक़पन नहीं आ सकता ….उसके लिये दिन – रात की हरामख़ोरी अनिवार्य है …

उसके लिये कुछ आसान से उपाय नीचे दिये जा रहे हैं ….
उम्मीद है उन्हें अपनाकर आप भी अपने शहर की पालिका को सर्वश्रेष्ठ नरक पालिका बनाने में क़ामयाब हो जाएंगे…

तो सबसे पहले करना ये है कि श्री अमिताभ बच्चन के सफ़ाई का सन्देश देने वाले
बड़े -बड़े फ्लैक्स छपवाकर शहर में चारों तरफ़ लगवाने हैं …
उसमें साफ़ साफ़ लिखवा देना ” वीरू अपना कूड़ा ख़ुद उठाना ”
बस…हो गया …
अब अपने बंदों से सोनम के मोमोज़ मंगवाकर खाओ …
तुम भी आराम का वेतन पाओ और अधीनस्थों से भी बोलो आराम फरमाओ…
नगर के किसी भी वार्ड में चाहे कितनी ही गंदगी फैल जाये, उसमें चाहे ज़िलाधिकारी कार्यालय मार्ग या ज़िलाधिकारी आवास के द्वार पर जमा गंदगी ही क्यों न शामिल हो,
तुम्हें क़सम है सम्राट किल्बिस (एक प्रसिद्ध धारावाहिक का किरदार) की सफ़ाई नहीं करवानी है …
शहर में हर चौराहे पर तैनात आवारा कुत्तों की फौज का भी कुछ इलाज नहीं करना है
फिर चाहे बाहर से आये सैलानी की मासूम बच्ची की मौत का कारण ये आवारा कुत्ते ही क्यों न बने …
(इसमें रोज़मर्रा लोगों को काटने का आंकड़ा शामिल नहीं है )

जब तक अतिव्यस्त रहने वाले हमारे ज़िलाधिकारी महोदय साक्षात् अवतरित होकर निर्देश न दें (वो तो अच्छा है अभी तक अपने ही आवास के द्वार की गंदगी के विषय में साहब को ज्ञान नहीं है वरना ख़ैर नहीं थी किसी की )
या माननीय उच्च न्यायालय अपने संज्ञान में लेकर आदेश न दे ….

अरे भाई …
आम जनता की क्यों टेंशन ले रहे हो …
जब ज़िले के साहिबान के पास ही समय नहीं है अपने शहर को देखने का
फिर यहां की जनता तो
ख़ुद को
सीएम टाइप का फ़ील करने वाली ठेरी..
वो कहाँ मुंह लगेगी तुम्हारे …

ख़ैर जाने दो ….

ये तो रहा सफ़ाई इत्यादि का स्मार्ट फॉर्मूला…

अब सुनो पैसा कैसे कमाया जाता है ….
टेंडर निकालो , ठेके दो (पार्किंग, चुंगी इत्यादि के ),

सफ़ाई हो न हो ..
हर घर से सफ़ाई कर ,
भवन कर आदि समय रहते वसूल लेना …
स्ट्रीट लाइट के नाम पर ख़ाली खानापूर्ति करना

हाँ…लेकिन भाई
मुख्य रास्तों पर तो लाइट लगवा देना
क्योंकि शाम को जज साहब का राउंड होता है …
उनकी नज़र पड़ी तो …..
समझ रहे हो न …..

हाँ कार्रवाई के नाम पर
ग़रीब फड़ व्यवसायियों को ज़रुर खदेड़ना, उनका सामान ज़ब्त कर लेना ,
उनके साथ अभद्र व्यवहार करना क्योंकि वो मजबूर हैं …
आप कुछ भी कह सकते हो कर सकते हो,
ये सब करके आप अपना काला चिट्ठा सफ़ेद बना सकते हो …
और ग़रीबों के अरमानों की लाशों पर खड़े होकर अपनी इमारतें ऊँची बना लेना …

बस फिर क्या है ….
बन गए तुम …
अपने शहर के शहंशाह ….
और भटकने दो आम आदमी को
अँधेरी रातों में …
सुनसान राहों पर ….

हा हा हा हा

तो….
बोलो
भइया….

नरक पालिका की जय …

मंच
नैनीताल से …
मो. ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद )

अंक – 3 : न रहेगा पोस्टल आर्डर-न लगेगी आरटीआई बनाम अधिकार को दबाने की साज़िश….

सूचना अधिकार अधिनियम – 2005
जिसे हम सब इसलिए जानते हैं क्योंकि ये सरकारी व्यवस्था की पोल खोलने में काफ़ी कारगर साबित हुआ है, सरकारी दफ्तरों में आर.टी.आई. का ख़ौफ़ भी देखने को मिलता है ,
ख़ुशी होती है कि भ्रष्टाचार पर कहीं न कहीं लगाम तो ज़रूर लगी है…

सब कुछ ठीक चल रहा था ,
आर.टी.आई. के ज़रिये हर विभाग अपनी जानकारियां देने में जुटा हुआ था , जिससे विभागों के भांडे भी फूट रहे थे ,
फिर अचानक कहानी में ट्विस्ट आ जाता है ,
नैनीताल जिले के डाक घरों से पोस्टल ऑर्डर रातों रात
ग़ायब हो जाते हैं …

रविवार को एक समाचार पत्र में ख़बर आई कि हल्द्वानी के प्रधान डाकघर में भी पोस्टल ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं ,

अब सवाल ये उठता है कि डाक घरों से सारे पोस्टल ऑर्डर कहाँ ग़ायब हो गए…???

मुझे यक़ीन है आप सब जानते होंगे कि
कोई आर.टी.आई. लगाने के लिए ₹10 का पोस्टल ऑर्डर लगाना अनिवार्य है..
उसके बिना सम्बंधित विभाग आपको वाञ्छित सूचनायें देने में असमर्थ हो जायेगा…
तो कहीं न कहीं
पोस्टल ऑर्डर को ग़ायब करना पिछले दरवाज़े से भ्र्ष्टाचार को अंदर बुलाना है
और अगले दरवाज़े से सूचना अधिकार अधिनियम को ठेंगा दिखाने जैसा…

इसमें आपकी तरह मैंने भी यही सोचा था ,
जो आप सोच रहे हैं,
कि इसमें डाकघरों से क्या मतलब???
कोई उनके ख़िलाफ़ आर.टी.आई. का इस्तेमाल थोड़ी न कर रहा था

जी बिल्कुल सही सोचा आपने….
लेकिन अगर हम थोड़ा गहराई से इस बात को सोचें….
तो हमें इसके पीछे किसी न किसी साज़िश की बू ज़रुर नज़र आएगी….

और
ये साज़िश आर.टी.आई. को पंगू करने के लिये बनाई गयी है ,

न रहेगा पोस्टल ऑर्डर,
न लगेगी आर.टी.आई…

एक कहावत में वो किसको???
किसका???
मौसेरा भाई बताया गया है ????

जी हाँ ….

बिलकुल वही हाल है ,

वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी …
विभागों में काफ़ी टैलेंटेड लोग बैठे हैं ,
वही फॉर्मूला अपना दिया …
अधिकार भी मर जाये और अधिनियम भी न टूटे …

अब सांप का नाम लेकर मैंने अपने पीछे नागिन थोड़ी न लगानी है ….

ख़ैर….
मुद्दे पर आते हैं …

पोस्टल ऑर्डर तक़रीबन
पूरे ज़िले से ग़ायब हैं
(शायद अब तक प्रदेश की सीमा पार न कर दी हो )
लेकिन इसमें मज़े की बात ये है कि
हर पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी में कॉन्फिडेंस पता नहीं
किसने ठूँस -ठूँस कर भर दिया है , पोस्टल ऑर्डर के बारे में पूछने पर हर कर्मचारी इस तरह आँखें भीगा कर जवाब दे रहा है …
जिसका कोई जवाब नहीं ..
वो कहता है …
“बस अभी ख़त्म हुए हैं , थोड़ी देर पहले”(और उसके भोलेपन को देखकर एक पल के लिये लगता है जैसे ताल में कूद जाऊं, उस पर शक़ किया)

और ये क़िस्सा ठीक वैसा ही हो जाता है …
जो मल्लीताल में पंसारी जी की दुकान पर लिखा रहता है,
“आज नक़द …कल उधार”
फिर …न
कभी वो कल आता है और
न हमें उधार मिल पाता है …

अंत में…

हमारे आदरणीय,
अतिव्यस्त ज़िलाधिकारी महोदय से
मैं निवेदन करता हूँ कि
कृपया ज़िले के डाकघरों से पोस्टल ऑर्डर ग़ायब होने की ख़बर का संज्ञान लेते हुए …
सम्बंधित अधिकारियों को पोस्टल ऑर्डर बहाली के लिये आदेशित करने की कृपा करें …
जिससे हम विभागों से किसी भी सूचना को अधिकार से मांग सकें ..

धन्यवाद….
मंच
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद)

अंक-2 (‘नवीन समाचार’ के नये कॉलम ‘आज़ाद के तीर’ में आज बारी जिला पूर्ति कार्यालय की : सार्वजनिक सूचना…. कृपया ध्यान ‘न’ दें…

ये चित्र उस भवन का है जो वर्तमान में जर्जर हालत में आ चुका है ….जिसे देखकर प्रथम दृष्टया बहुत दया भाव उमड़ पड़ता है …और इसी दया भाव को लेकर आप अंदर दाख़िल होते हैं ….पहला कमरा (ज़िलापूर्ति अधिकारी का) सुनसान दिखाई पड़ता है ऐसा लगता है मानो वहां रामसे ब्रदर्स (डरावनी फिल्मों के मशहूर निर्माता) की शूटिंग का सेट लगा हो …. अगले कमरे में बारिश का पानी इस बात की तस्दीक़ कर रहा था कि इस कमरे में कोई आये न आये पानी को आने से कोई नहीं रोक सकता …
जी हाँ …इस भवन में ज़िला पूर्ति कार्यालय चलाया जाता है ….ऐसा कहा जाता है ….
लेकिन इसके अंदर जाकर आप देखेंगे तो चलती हुई कोई चीज़ आपको दिखाई नहीं देगी ….
सिवाय वहां नियुक्त महिलाकर्मियों की ज़ुबान चलने के ….(अब किसी एक ज़िम्मेदार महिलाकर्मी का नाम लें और बाक़ी छोड़ दें तो बची हुई महिलाएं इसे प्रेस्टीज इशू मान बैठेंगी इसलिए रहने देते हैं )
और अगर मुश्किल से हिम्मत जुटाकर आपने उनकी बातों में जो उनकी नज़र में विधान सभा सत्र के जैसी अहम होती हैं उनमें ख़लल डाला तो समझ लीजिये आप जिस भी काम से वहां हार-थक कर पहुँचे हो वो मेहनत आपकी मिट्टी के तेल में मिल जाएगी ….
आपका सवाल कितना ही मनमोहन क्यों न हो ….
उनका जवाब मायावती ही होना है ….
कुछ देर आप वहां अपने आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचे ऐसा फ़ील करने के लिए ….
प्लास्टिक मुस्कराहट उन कथित कर्मियों की ओर बिखेरते हो ….
बाबा रामदेव की तरह लम्बी- गहरी साँस लेते हो और उलटे पाँव बाहर निकल आते हो …
बाहर निकलते ही जब दोबारा उस जर्जर भवन को पलटकर देखते हैं तो प्रथम दृष्टया का भाव ऐसे ग़ायब हो जाता है जैसे चुनाव जीता हुआ नेता और सिर्फ़ एक ही भाव बचा रह जाता है ….कि हमारी सरकार कितनी दरियादिल है जो बिना काम के ऐसे विभाग चला रही है जिसमें बैठने वाले कथित अधिकारियों, कर्मचारियों को किसी भी योजना की जानकारी नहीं है। वे लोग महज़ इस बात की मोटी तनख़्वाह पा रहे हैं जैसे सरकारी दामाद / ननद हों ….
ये हाल नैनीताल ज़िले के खाद्य पूर्ति कार्यालय का ज़रुर है लेकिन पूरे प्रदेश में या अगर पूरे भारत की बात की जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कमोबेश सरकारी कार्यालयों की यही स्थिति है। कोई आम नागरिक बिना सिफ़ारिश या रिश्वत दिये अपना कोई छोटा सा भी काम नहीं करा सकता और अगर वो किसी तरह साहस जुटाकर घर से निकल पड़ता है तो उसके जूतों में छेद हो जाता है।चप्पलें टूट जाती हैं लेकिन सरकारी कामों के पेंच उससे कभी नहीं खुल पाते…..
आख़िरकार सवाल फिर वही पैदा होता है कि कब तक भारत का आम नागरिक पिसता रहेगा ….जिसके चुकाए गये विभिन्न करों से सरकारी तंत्र चलता है …..उस आम नागरिक का कब उन कार्यालयों से बिना सिफ़ारिश, बिना रिश्वत काम पूरा होगा ….
आख़िर कब ????
इसी जवाब के
इंतज़ार में ….
भारत का एक आम नागरिक
नैनीताल से….
मो.ख़ुर्शीद हुसैन _

अंक-1 : आज समानता के पैरोकार लोक निर्माण विभाग की बारी

जी हाँ …
आज हम बात करेंगे पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट
यानि पी.डब्ल्यू .डी. की
जिसकी बदौलत आज हम गाड़ी में बैठे -बैठे ऐसा महसूस करते हैं जैसे किसी झूले में झूल रहे हों ,
और जब पैदल चलते हैं
तो ये गर्व महसूस होता है कि हमारे देश में कोई तो विभाग ऐसा है,
जो समानता का अधिकार अधिनियम को दिल से मानता है और सिर्फ़ मानता ही नहीं
करके भी दिखाता है …
इस विभाग के लिए गड्ढों और सड़कों में कोई भेदभाव नहीं है ,
आप जब भी नैनीताल आएंगे तो सच्ची में कंफ्यूज़ा जाएंगे ….
सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क …
हमारे यहाँ आपको देखने मिलेगा …
गड्ढों और सड़कों का
अजब संगम …

न न न ….
आज हम
विभाग के अधिकारियों के
मोटे वेतन , कामचोर रवैये या विभागीय भ्रष्टाचार की बात नहीं करेंगे ….
आज बस बात होगी
तो सिर्फ़ गड्ढों की …

हुज़ूर…
ऐसा नहीं है …
कथित विभाग जनता का भला नहीं चाहता …

न न …
ऐसा सोचना भी बाई गॉड पाप होगा ….
विभाग जनता का इतना भला चाहता है कि वो दूरदृष्टि का इस्तेमाल करता है ,
अब जिस जगह गड्ढ़े ही नहीं होंगे.
तो वहां वाहन तेज़ गति से चलेंगे जिससे कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है ….
लेकिन हमारे यहाँ सड़कों में गड्ढेनुमा स्पीड ब्रेकर जो लगे हैं , मजाल है कोई वाहन 10 किमी / घंटा से अधिक भाग ले ,
जिससे दुर्घटना का सवाल ही नहीं उठता साहब ,

हाँ वो अलग बात है कोई गड्ढे में नियंत्रण खोकर गिर पड़े …
उसके लिए पी.डब्ल्यू.डी. ज़िम्मेदार नहीं होगा ,

अरे भाई …
आपको
गड्ढे में पैदल चलने या गाड़ी चलाने का हुनर नहीं आया तो इसमें भला हमारे प्रिय विभाग की क्या ग़लती ….

वैसे मेरा एक छोटा सा आईडिया अगर विभाग माने तो …

उसने जगह जगह ये बोर्ड लगा देने चाहिये जिसमें लिखा हो …

“ऐ भाई ज़रा देख के चलो…
आगे ही नहीं , पीछे भी ,
जवान ही नहीं , बुड्ढा भी,
सड़क ही नहीं…..
गड्ढा भी ….
ऐ भाई “…..

ख़ैर,
अंत में
मेरा प्रशासन से अनुरोध है कि
गड्ढों में बनी सड़क को केवल सड़क बनाने के आदेश सम्बंधित विभाग को करने की कृपा करें …
जिससे जनमानस के लिये आवाजाही आसान हो और सड़कें साफ़ सुधरी व अच्छी होंगी तो बाहर से आये पर्यटकों पर भी उसका बहुत सुन्दर प्रभाव पड़ेगा…जिससे वो किसी और को भी नैनीताल घूमने की सलाह देगा …
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

(नोट : इस कॉलम में विचार लेखक के अपने हैं। ‘नवीन समाचार’ केवल समाज के हर तरह के विचारों को सामने लाने का माध्यम है। उम्मीद है कि अतिरेक के साथ कही गयी बात जिम्मेदार अधिकारियों को चुभे भी तो वे इसे निजी तौर पर दिल पर लेने के बजाय व्यवस्थाओं को सुधारने की कोशिश करें।)

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