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‘आज़ाद के तीर’ में आज : .. क्योकि गैस होम डिलीवरी आपका अधिकार है

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अंक 65 (15 दिसंबर 2018) : .. क्योकि गैस होम डिलीवरी आपका अधिकार है

साहिबान,
आज हमारे पास एक घरेलू मुद्दा है, जी हाँ, बिल्कुल सही पकड़ें हैं, वो है गैस होम डिलीवरी का मुद्दा 
अक्सर लोगों को गैस लेने की इतनी चिंता होती है कि वो गैस सिलेंडर की गाड़ी आने से एक या दो घंटा पहले लाइन में अपने ख़ाली सिलेंडर रखकर बैठ जाते हैं और गाड़ी आने पर धक्का –  मुक्की सहते हुए बड़ी जद्दोजहद के बाद गैस बांटने वाले भइया की मेहरबानी से सिलेंडर की प्राप्ति करते है, कुछ लोगों के चेहरे गैस मिलने के बाद ऐसे खिलते हैं, मानो गैस प्राप्ति न हो गयी पुत्र धन प्राप्ति हुई हो, 
और हाँ, मज़े की बात ये है कि ज़्यादातर लोग अपना मज़दूर करके घर सिलेंडर ले जाते है
 तब मज़दूरी मिलाकर करीब 
₹ 900 में एक सिलेंडर पड़ता है,
हाँ, हाँ 
अब आपका कहना होगा कि हम बहुत कहते हैं लेकिन गैस वाले भइया होम डिलीवरी के लिये कह देते हैं सब मज़दूर गए हैं, तो हम चुप-चाप आ जाते हैं,
अपना मज़दूर करके,
हम समझ सकते हैं इस 
आपा- धापी वाले युग में समय की बड़ी क़ीमत है और आप सब उन लोगों से बहस करके अपना वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते,
इसलिए हम आज आपको ऐसी तरक़ीब बताने वाले हैं, जिससे आपकी गैस की परेशानी हमेशा के लिये खत्म हो जाएगी और गैस  पहुंचेगा, आपके घर तक वो भी बिना मज़दूरी दिये,
तो जनाब तरक़ीब ये है कि जब आप ऑनलाइन या फ़ोन पर बुकिंग करते हैं तब एक काम ये करना है कि 05942-235257
पर सुबह 10 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक अपना सिलेंडर होम डिलीवरी के लिये बुक करा दें,
आपके क्षेत्र में जब 
गैस वितरण के लिये आएगा तब गैस ऑफिस से आपकी बुकिंग की पर्ची को प्राथमिकता दी जाएगी, दूसरा यदि आप ऑफिस में फ़ोन पर होम डिलीवरी के लिए नहीं कह पाते हैं तो आप अपनी बुकिंग पर्ची गैस बांटने वाले भइया के पास ले जाइये और होम डिलीवरी के लिए कहें, उस पर भी यदि वो मना करे तो आप सीधे गैस मैनेजर संतोष पंत को  8650002562 पर फ़ौरन शिकायत कर सकते हैं,
हम आपको यक़ीन दिलाते हैं, गैस वाले भइया आपको होम डिलीवरी के लिये दोबारा मना नहीं करेंगे|
ख़ैर,
आज के लिये इतना ही 
आख़िर में,
नैनीताल के इज़्ज़तदार बाशिंदों से हमारी गुज़ारिश है कि गैस के लिये टेंशन न लें, बस जो नंबर ऊपर दिए गए हैं उनका इस्तेमाल करें, अरे भई जबसे फ़ोन पर बुकिंग होना शुरू हुआ है न, ऑफिस वाले कर्मचारी दिन भर बोर हो जाते हैं, कुछ काम करेंगे तो बोरियत भी दूर होगी,
आइये, प्रण लें उनको बोर नहीं होने देंगे और गैस मज़दूरी भी बचाएंगे,

अंक 64 (14 दिसंबर 2018) :

मैं जल हूँ,
मैं ही जीवन हूँ,
फिर भी हो रहा बर्बाद,
कौन बचाएगा मुझे ?

साहिबान,
ये जो तस्वीर / वीडियो आप देख रहे हैं न, वो हमारे खूबसूरत शहर नैनीताल में बिरला रोड पर
प्रिम रोज़ होटल से थोड़ा आगे की है, इस तस्वीर / वीडियो के लाल घेरे में जो चीज़ दिखाने की कोशिश की गयी है वो है, पानी की बेतहाशा बर्बादी, यहां
पानी की लाइन में बहुत दिनों से भयंकर लीकेज है, जिसमें से हज़ारों लीटर पीने का पानी सड़क पर गिरकर बर्बाद हो रहा है। यही स्थिति बिड़ला रोड पर अल्बनी लॉज के पास भी करीब भी बनी हुई है। यह जानकारी कुमाऊं विश्वविद्यालय के डॉ. महेंद्र राणा जी ने दी है। इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है, वक़्त ही कहाँ है आजकल किसी के पास, जो जल संस्थान को लीकेज की खबर दे, वो तो भला हो हमारे साथी नीरज जोशी (अध्यक्ष, टूर एन्ड ट्रेवल्स ) का जिनकी नज़र उस बर्बादी पर पड़ी और उन्होंने आज फ़ौरन इस ख़बर को हमसे साझा किया,
जनाब आपका वक़्त ज़्यादा न लेते हुये सीधे ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हैं।

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय, नैनीताल,
विधायक महोदय, नैनीताल,
अधिशासी अभियंता महोदय,
जल संस्थान, नैनीताल
आपसे ख़ुसूसी इल्तेजा है कि
नैनीताल में जगह-जगह हो रही लीकेज को चिन्हित करवाकर पानी की बर्बादी को रोकने के लिये ठोस क़दम उठायें साथ ही साथ जिस तक़लीफ़ को आज आपके साथ साझा किया है उसपर तत्काल प्रभाव से मरहम लगाने के लिये अपने कारिंदों को हुक्म देने की मेहरबानी करें,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक 63 (13 दिसंबर 2018) : पानी की बर्बादी पार्ट -1

मैं जल हूँ,
मैं ही जीवन हूँ,
फिर भी हो रहा बर्बाद,
कौन बचाएगा मुझे ?

साहिबान,
ये जो तस्वीर / वीडियो आप देख रहे हैं न, वो हमारे खूबसूरत शहर नैनीताल के एक गंदे से नाले की है, जो चीना बाबा मंदिर के सामने से झील में जा रहा है, लेकिन अभी हम थोड़ी जल्दी में हैं (गंदगी के बारे में कोई बात नहीं करेंगे ) क्यूंकि इस तस्वीर के लाल घेरे में जो चीज़ दिखाने की कोशिश की गयी है वो है, पानी की बेतहाशा बर्बादी, चीना बाबा मंदिर के सामने,
कॉरोनेशन होटल आउट हाउस से लगते हुये नाले पर पानी की लाइन में बहुत दिनों से भयंकर लीकेज है, जिसमें से हज़ारों लीटर पीने का पानी नाले में गिरकर बर्बाद हो रहा है,
जिसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है, वक़्त ही कहाँ है आजकल किसी के पास, जो जल संस्थान को लीकेज की खबर दे, वो तो भला हो हमारे साथी अधिवक्ता शारिक ख़ान का जिनकी नज़र उस बर्बादी पर पड़ी और उन्होंने आज फ़ौरन इस ख़बर को हमसे साझा किया, आपका वक़्त ज़्यादा न लेते हुये सीधे ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हैं,

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय, नैनीताल,
विधायक महोदय, नैनीताल,
अधिशासी अभियंता महोदय,
जल संस्थान, नैनीताल
आपसे ख़ुसूसी इल्तेजा है कि
नैनीताल में जगह- जगह हो रही लीकेज को चिन्हित करवाकर पानी की बर्बादी को रोकने के लिये ठोस क़दम उठायें साथ ही साथ जिस तक़लीफ़ को आज आपके साथ साझा किया है उस पर तत्काल प्रभाव से मरहम लगाने के लिये अपने कारिंदों को हुक्म देने की मेहरबानी करें।

अंक 62 (12 दिसंबर 2018) : फिर हुआ असर’आज़ाद के तीर’ का, शुक्रिया ईओ नगर पालिका परिषद, नैनीताल

साहिबान,
आज़ाद मंच ने नवीन समाचार के आज़ाद के तीर स्तंभ में सड़क पर बहता गंदा पानी बना दो विभागों की फुटबॉल उन्वान के साथ नैनीताल की ग्लैन्डन रोड पर जल संस्थान के सामने, प्राथमिक विद्यालय के पास से सटी हुई नाली की तस्वीर दिखाई थी, जिसमें गौशाला से आने वाला गंदा पानी बंद नाली होने की वजह से सड़क पर फ़ैल रहा था और झील में जा रहा था, जिसको तत्काल प्रभाव से रोकने और बंद पड़ी नाली की सफ़ाई करने के लिये हमने दोनों विभागों (जल संस्थान और नगर पालिका ) के उच्चाधिकारियों से विनम्र अपील की थी कि कार्य क्षेत्र विवाद में न उलझें बल्कि नैनीताल नगर के हित को सबसे ऊपर रखते हुए कोई ठोस क़दम उठायें,
हमारा विनम्र निवेदन अधिशासी अधिकारी नगर पालिका, नैनीताल रोहिताश शर्मा ने स्वीकार किया तथा अपनी टीम को भेजकर कार्रवाई की वहीं मल्लीताल बाज़ार वार्ड सभासद मोहन सिंह नेगी ने बताया कि ईओ के निर्देशन में और उनकी मौजूदगी में नाली की सफ़ाई की गयी,
बहरहाल,
जो भी हुआ है उससे हमारे नैनीताल के दिल को सुकून ज़रुर मिला होगा,
जिसके लिये हम
आज़ाद मंच परिवार
की ओर से
नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहिताश शर्मा तथा सभासद मोहन सिंह नेगी का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हैं और उम्मीद करते हैं आने वाले वक़्त में भी नैनीताल के लिये आपका यही जज़्बा क़ायम रहेगा|

अंक 61 (11 दिसंबर 2018) : सड़क पर बहता गंदा पानी बना दो विभागों की फुटबॉल

गंदा पानी समा रहा है झील में, जल संस्थान बोलता है नगर पालिका की ज़िम्मेदारी, नगर पालिका समझती है जल संस्थान का है मामला, मझधार में फंसा आम नागरिक

साहिबान,

ये जो तस्वीर आप देख रहे है न
ये ग्लैन्डन रोड, जल संस्थान वाली सड़क के नाम से भी जिसे जाना जाता है वहां प्राथमिक विद्यालय (गौशाला स्कूल) की दीवार से सटी हुई नाली से बहुत दिनों से गंदा पानी शीतल पेय पदार्थ गोदाम के पास से गुज़रता हुआ नाले में गिर रहा है जो सीधे झील में समां रहा है,
पड़ताल करने पर पता चला कि उक्त गंदा पानी सीवर का नहीं है बल्कि गौशाला से आ रहा है,
जो पहले नाली साफ़ होने की वजह से सड़क पर फैलता नहीं था लेकिन काफ़ी दिनों से बंद पड़ी नाली के कारण गंदा पानी सड़क तक फैलकर आने -जाने वाले लोगों के पैरों में तो लग ही रहा है, साथ -साथ झील में भी जा रहा है,
अब सवाल उठता है कि
क्या होना चाहिये?
हमारा सुझाव है कि मामला गंभीर है, जैसे अपराध होने पर दो थाने आपसी सीमा विवाद में उलझ जाते हैं, मेहरबानी करके ऐसे न उलझें बल्कि समाधान की बात करें क्यूंकि नगर का हित है
सर्व प्रथम,
बाक़ी तो सब मोह माया है साहब,

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय, नैनीताल
अध्यक्ष महोदय व
अधिशासी अधिकारी महोदय,
नगर पालिका नैनीताल,
अधिशासी अभियंता,
जल संस्थान, नैनीताल
से हमारी तहेदिल से इल्तेजा है कि नगर के हित को सबसे पहले रखते हुये झील में जाते हुये गंदे पानी को रोकने के ठोस उपाय करने की कोशिश करें,
आपकी मेहरबानी होगी।

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

अंक 60 (10 दिसंबर 2018) : यहाँ शायद बंद पड़े सीवर प्लांट से भी मिल रही मलाई !

हरीनगर में बरसों से बॉयलर, खराब पड़ा है, फिर किस बात की ठेकेदारी चल रही है ? क्यों जल संस्थान घोड़े बेचकर सोया ?

साहिबान,
ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न वो किसी ख़ाली पड़ी लोहे से बनी टंकियों की नहीं है बल्कि हमारे प्रिय जल संस्थान की
बहु चर्चित योजना सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की है, जिसे बरसों पहले इस आशा से स्थापित किया गया था कि यहां सफलतापूर्वक सीवरेज का ट्रीटमेंट हो जाया करेगा, आशा अच्छी थी सोच भी अच्छी थी, इसलिए किसी बाहरी कम्पनी को गुणवत्ता कार्य करने के लिये ठेका दे दिया गया, कुछ दिन धड़ल्ले से यहां ट्रीटमेंट का काम भी हुआ, फिर अचानक एक मनहूस दिन प्लांट का बॉयलर ख़राब हो गया, फिर जल संस्थान से लेकर ठेका कम्पनी के आला अधिकारी-कनिष्ठ कर्मचारी सभी परेशान रहे, धीरे -धीरे सारे ज़ख़्म भरने लगे और बंद पड़े प्लांट का दर्द और वहां नियुक्त स्टाफ भी कम होने लगा, एक दिन वो आया जिस दिन वहां कोई झाँकने वाला नहीं रहा, अब ख़राब बॉयलर को ठीक कराने की बात पुरज़ोर तरीक़े से कोई नहीं रखता,
सुनने में आया है कि प्लांट के चले बिना ही सबको मलाई खाने को मिल रही है, तो सही कराकर क्या फ़ायदा ?
वो कहते है न :- जो मिले यूं तो कोई करे क्यों ? यानी जब प्लांट के बिन चले ही मलाई मिल रही हो तो… बाकी आप खुद ही समझदार हैं।
अब यही हाल सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़े लोगों का है, शायद अब यही मानसिकता हो गयी होगी अगर प्लांट सही हो जाएगा तो काम भी करना पड़ेगा, और वैसे भी काम करके तो कोई भी खा लेता है लेकिन असली बाज़ीगर तो वो है, जो बंद पड़े प्लांट की रोटियां तोड़े। मलाई खाये..

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय, नैनीताल,
अधिशासी अभियंता,
जल संस्थान, नैनीताल से हमारी
तहेदिल से इल्तेजा है कि हरिनगर में मौजूद जीर्ण -क्षीर्ण पड़े सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट को दोबारा ज़िंदगी देने की मेहरबानी करें,
जिससे दोबारा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम सुचारु हो सके।

अंक-56 (9 दिसंबर 2018) : मौत का कुआँ बना रास्ता, ‘हैप्पी न्यू इयर’ पर कहीं हो न जाये ‘हैप्पी बड्डे’

पगडंडी जितनी बची है चौड़ाई, टूट चुकी है सुरक्षा दीवार

साहिबान,
ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न वो किसी मौत के कुएं की नहीं है बल्कि एक ज़माने में बहुत ही मशहूर रहे सिनेमा हॉल अशोक टॉकीज (वर्तमान में कार पार्किंग) के मैदान की है, जहाँ से आम जनता के लिए लगभग एक हाथ चौड़ा रास्ता छोड़ा हुआ है, इतने चौड़े रास्ते पर शहर के आवारा स्वान भी निकलने से हिचकिचाते हैं और पक्की सड़क से घूमते हुए माल रोड पर निकल जाते हैं लेकिन मनुष्य का जीवन बेहद ही व्यस्त हो गया है, वो दो मिनट बचाने के लिये मौत के कुएं वाली पगडंडी पर चलने को मजबूर है, यहां मौत की पगडंडी इसे इसलिए कहा जा रहा है क्यूंकि अगर यहां से गुज़रते हुये किसी का ज़रा भी बैलेंस बिगड़ा तो भले ही उसे खेल का शौक हो न हो वो शख़्स सीधा ज़िला खेल संघ के परिसर में एंट्री लेगा, इसकी वजह ये है कि बरसों पहले जिस रेलिंग पर फ़िल्मो के शौक़ीन लोग टिकट खिड़की खुलने या फ़िल्म खत्म हो जाने के इंतज़ार में बैठकर चने- मूंगफली खाया करते थे, वो रेलिंग भी अपने आका सिनेमा हॉल की फ़िल्म ख़त्म होने पर ख़ुद भी ख़त्म हो गयी, फिर उसकी जगह रह गया सिर्फ़ ख़तरा वो भी जानलेवा ख़तरा क्यूंकि ऊपर रास्ते से नीचे की गहराई लगभग इतनी है कि किसी भी अच्छे भले इंसान की वहां से गिरने के बाद कोई सूरमा उसकी हड्डी-पसलियों में फ़र्क़ पैदा नहीं कर सकता,
सुनने में ये भी आया है कि कुछ दिन पहले कोई पुलिसकर्मी इस जगह से गिर भी चुका है उस पीड़ित के वर्तमान हालात अभी पता नहीं लग पाये हैं,
हादसे के बावजूद कोतवाली का बाक़ी स्टाफ अभी भी मजबूरी में इस रास्ते पर से जोखिम उठाते हुये आता-जाता है।
इत्तेफ़ाक़ से दूसरी तरफ़ हमारे शहर की नगर पालिका भी है जिसके कर्मचारी भी दिन भर में यहां से गुज़रते होंगे, कुल मिलाकर
कहने का इतना सा मतलब है कि जनाब चाहे कर्मचारी या स्टाफ किसी का भी हो सबको सुरक्षा से जीने का अधिकार है, तो फिर क्यों न इस पगडंडी को रास्ता बनाया जाये और क्यों न आम नागरिकों की हिफाज़त के लिये एक सुरक्षा दीवार बनवाई जाये।

कुछ वर्ष पूर्व ‘हैप्पी न्यू ईयर’ पर यहां से गिरकर कुछ लोगों का ‘हैप्पी बड्डे’ भी हो चुका है। फिर ‘हैप्पी न्यू ईयर’ आ रहा है, इसलिए हमारी चिंता और बढ़ गयी है।

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय, नैनीताल
अध्यक्ष महोदय और
अधिशासी अधिकारी महोदय,
नगर पालिका, नैनीताल
आप सबसे विनम्र निवेदन है कि मामले का संज्ञान लेते हुए कृपया जनहित के इस छोटे किन्तु गंभीर मुद्दे पर शीघ्र अति शीघ्र कोई कार्रवाई करने की कृपा करें, जिससे उपरोक्त मार्ग से आने- जाने वाले जनमानस की सुरक्षा बनी रहे, आपकी अति
कृपा होगी।

अंक-55 (8 दिसंबर 2018) : सर पर लटकी तलवार,कभी भी हो सकता है हादसा

साहिबान,
बोलते हुए डर लगता है क्यूँकि आज जो तस्वीर आपके सामने पेश की जा रही है वो हमारे ज़िलाधिकारी कार्यालय परिसर नैनीताल की है, अब इतने उच्च कोटि के कार्यालय परिसर के बारे में कुछ कहना हिमाक़त करने जैसा काम है लेकिन अपनी ख़ता पर मिलने वाली सज़ा की परवाह न करते हुये आप सबकी जानकारी के लिये ये बताना ज़रूरी समझा जा रहा है कि आप जब कभी तहसील में कोई काम करवाने आयें, जैसे :- आय, जाति, स्थाई प्रमाण पत्र बनवाने आये तो तहसील की तरफ़ से आने वाली सीढ़ियों से न आकर डाक घर की तरफ से आएं और जन सेवा केंद्र में सावधानीपूर्वक अपना काम निबटाकर चले जायें,
अब आपके ज़ेहन में यही सवाल घूम रहा होगा कि इतने छोटे से काम के लिये इतना घुमाकर क्यों बुलाया जा रहा होगा,
अरे जनाब,
कभी तो इशारों की ज़ुबान समझ लिया करो,
किसी दिन पिटवाओगे बाय गॉड,
ख़ैर,
अब थोड़ा क़रीब आकर सुनिए
(क्योंकि व्हाट्सप्प ग्रुप के भी कान होते हैं)
मामला ये है कि जन सेवा केन्द्र के ठीक सामने वाली बिल्डिंग में
छत पर एक तलवार नुमा धारदार टीन लटकी हुई है,
जो कभी भी बिल्डिंग की छत को अलविदा कह सकती है और￰ किसी भी मासूम के सर पर गिर सकती है, यहां हम जगह -जगह निकले रखे खड़ंजे के ख़ूबसूरत पत्थरों की बात नहीं करेंगे,
क्या पता किस ठेकेदार का भला किया गया हो, जिसने अच्छे खासे पत्थरों को निकाला और अब क्या पता उन्हीं तिकोने टाइप पत्थरों को लगाकर कौन ठेकेदार मलाई खाने वाला हो,
न न, इन सब बातों के बारे में बिल्कुल भी बात नहीं करनी है,
ये अत्यंत गोपनीय मामला है,
ख़ैर, ज़्यादा न कहते हुये अपने लफ़्ज़ों को आराम देते हैं,

आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय,
उपज़िलाधिकारी महोदय,
अपर ज़िलाधिकारी महोदय,
तहसीलदार महोदय,
पटवारी महोदय,
समस्त कर्मचारी महोदय,
उनके परिवारों के समस्त सदस्यों,
सदस्यों के परिचितों,
परिचितों के परिचितों
तथा यहां से आने-जाने वाले मासूम लोगों से निवेदन है कृपया तहसील की गली से बच के गुज़रना,
क्योंकि हमें यक़ीन ही नहीं बल्कि पूरा भरोसा है कि जब तक वो धारदार तलवार टीन तेज़ हवा से ख़ुद न गिर जाये, किसी की मजाल नहीं जो उसे हटाने की ज़हमत उठाये| सब भौएं मोड़कर यही कहेंगे,
इतने बिजी टाइम में ये सब देखने की किसे पड़ी है भला…हुंह्ह

अंक 54 (7 दिसंबर 2018) : फिर हुआ असर आज़ाद मंच व नवीन समाचार का : शुक्रिया उस्मान साहब

साहिबान,
हमने नवीन समाचार के कॉलम आज़ाद के तीर में बुधवार के अंक में ‘खम्बों के साथ भी खम्बों के बाद भी’ उन्वान के साथ एक बीमा कम्पनी के विज्ञापन की चर्चा की थी, जिसमें नैनीताल के ठंडी सड़क व आस-पास के इलाक़ों में बिजली के खम्बों को प्रचार-प्रसार का माध्यम बना रखा था, क्यूंकि सरकारी सम्पत्ति का दुरूपयोग हो रहा था इसलिये हमने विद्युत वितरण खंड के अधिशासी अभियंता से ख़ुसूसी इल्तेजा कि और इस पर अधिशासी अभियंता जनाब सय्यद शीराज़ उस्मान साहब ने फ़ौरन कार्रवाई करते हुये उक्त कम्पनी के फ़्लैक्स उतरवाने के निर्देश दे दिये फ़क़त एक दो
(डिग्री कॉलेज, सड़क पर) को छोड़कर लगभग सभी फ़्लैक्स हटवा दिए गये हैं, न न, यहां छूटे हुये एक-दो फ़्लैक्स की बात करके हम आपकी कार्यशैली पर सवाल नहीं उठा रहे हैं बल्कि उन कारिंदों के बारे में आपको ये पॉइंट बता रहे हैं कि जिन्हे आप फ्री समझ रहे थे वो निहायती बिजी निकले और जल्दबाज़ी में काम करते हुये
निकल गये, अब उनको कौन पकड़ कर लाये,

आख़िर में,
इस तरह फ़ौरन कार्रवाई करने पर हम आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हैं और उम्मीद करते हैं की आने वाले वक़्त में भी आप इसी तरह समाज व सरकार के हित को सबसे ऊपर रखते हुये काम करते रहेंगे.

अंक 53 (5 दिसंबर 2018) : खम्बों के साथ भी, खम्बों के बाद भी : एलआईसी

सरोवर नगरी नैनीताल से एक बीमित ख़बर आ रही है कि एलआईसी ने अपने 62 साल पूरे करने की ख़ुशी में जहां एक तरफ अपनी ताबड़तोड़ योजनायें शुरू की हैं। वहीं दूसरी तरफ़ इस जश्न की खुशी में सरकारी बिजली के खम्बे भी झूम रहे हैं, न, न
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि नगर पालिका के सीमेंट वाले खम्बों पर खुशी का नशा कम हो, बिल्कुल नहीं वो भी मदमस्त होकर मस्ती में झूम रहे हैं लेकिन हो सकता है वो कारोबारी रिश्ते की वजह से झूम रहे हों लेकिन यहां तो किसी भी तरह के कारोबारी रिश्ता होने से जनाब सय्यद शीराज उस्मान साहब जो बिजली विभाग के अधिशासी अभियंता हैं उन्होंने सरासर इंकार किया है,
लेकिन उस पार्टी को नोटिस देने के नाम पर मसरूफियत की दुहाई देकर झट से पल्ला-पलड़ा दोनों झाड़ लिए।
बाय गॉड, अब इतनी मसरूफ़ रहने वाली हस्ती को कौन फ़ुर्सत में लाये और सरकारी सम्पति के नाजायज़ इस्तेमाल पर कौन रोक लगवाने को मुत्तासिर करे।
भई हमसे तो न हो पाएगा, हमने जब उनसे मामले का संज्ञान लेने को कहा तब तो उन्होंने हमारा मान रखने के लिए ‘देखते हैं’, कहकर टाल दिया फिर कुछ दिन बाद हमने फॉलो अप लेने के लिए बात करनी चाही फिर तो साहब ने हमारा नंबर देखर उठाना ही बंद कर दिया,
समझ नहीं आरा क्या बिगाड़ा होगा हमने ऐसा???
आख़िर में,
जनाब अधिशासी अभियंता से हमारी ग़ुज़ारिश है कि सरकारी सम्पति का दुरूपयोग क्या होता
है उसकी परिभाषा सभी
को बता देनी चहिये ताकि निकट भविष्य में ऐसे कामोों की पुनरावृत्ति न हो।

अंक 52 (4 दिसंबर 2018) : जानें आज एक बार फिर हुआ कहाँ हुआ आज़ाद मंच और नवीन समाचार का असर
शुक्रिया : ई ओ नगर पालिका नैनीताल का

जनाब,
जैसा कि आप सब अच्छी तरह जानते हैं हमने ‘नवीन समाचार’ के ‘आज़ाद के तीर’ में 2 दिसंबर के अंक में ‘नैनीताल के नाले बने कूड़ा घर’… उन्वान के साथ
सनवाल स्कूल के पास वाले नाले की दुःखभरी दास्तान से ईओ, साहब को रूबरू कराया था,
कल शपथ ग्रहण समारोह के चलते सभी लोग मसरूफ़ रहे लेकिन सोमवार की सुबह अपने साथ कुछ ठोस इरादे लेकर निकली और जिसका अंजाम ये हुआ कि सुबह से ही हमारे पास नाले की सफ़ाई शुरू हो गयी और सफ़ाई चल रही की तस्वीरें लगातार आने लगी, जिसे देखकर दिल खुश हो गया, आज के लिये ईओ साहब तारीफ़ के क़ाबिल हैं जिनके ज़हन में मामला आते ही तत्काल कार्रवाई को अंजाम दिया गया, तहे दिल से आपका शुक्रिया ,
आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय,
अधिशासी अधिकारी और अब अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हो चुके सबके प्रिय सचिन नेगी से अर्ज़ है कि जैसा करिश्मा आज एक नाले की सफ़ाई करके दिखाया गया है, अंदर की बात बताऊँ तो पूरे शहर के सारे नालों का यही हाल है इसलिए अगर आपकी एक टीम पूरी तरह से नालों की ख़िदमत में लग जाये तो मुश्किल से एक महीना भी नहीं लगेगा और शहर के सारे नालों को नई ज़िंदगी मिल जाएगी,
करके देखिये, अच्छा लगेगा और दुआएं मिलेंगी सो अलग…

अंक 51 (3 दिसंबर 2018) : जल्दी आना मित्र पु….., आपके इंतज़ार में आपकी-ठंडी (पड़ी) सड़क

जनाब,
एक रोज़ की बात है, लगभग
एक अर्सा पहले सरोवर नगरी नैनीताल ठंडी सड़क के नाम से मशहूर एक सूनसान सी सड़क के किनारों पर दो छोटे-छोटे टीन शेड बनाये गये,
एक मल्लीताल के छोर पर
दूसरा तल्लीताल के छोर पर, जहां तक हमें लगता है इसका मक़सद ठंडी सड़क की वीरानी दूर करने और उसको गुनहगारों की ऐश गाह बनने से रोकना रहा होगा।
ख़ैर,
उन चौकियों का नाम रखा गया जल पुलिस चौकी।
जिसके अभिभावकों के तौर पर ज़िम्मेदारी उठाने वाले कोतवाली मल्लीताल और थाना तल्लीताल के वज़ीर बने थे। इन ख़ूबसूरत सी नयी-नयी जल चौकियों को देखने शहर के बाशिंदों के साथ -साथ दूर दराज़ से सैलानी भी आये और इस तरह की बेहतरीन पहल की सबने जमकर तारीफ़ की।
जिस सड़क पर अँधेरा होते ही नशेड़ियों का क़ब्ज़ा हो जाया करता था, उन नशेड़ियों में दहशत फ़ैल गयी और उन्होंने अपना रुख़ किसी और अड्डे की तरफ़ कर लिया। जिसका असर ये हुआ कि शराबी-कवाबी, गुंडे-मवालियों के नाम से दहशतज़दा सड़क पर अँधेरा होने के बाद भी महिलायें व बच्चे आते-जाते ख़ुद को हिफाज़त में महसूस करने लगे। हालांकि नैनीताल में गुनाह का स्तर बाक़ी शहरों के सामने बौना है, फिर भी ठंडी सड़क पर
जल पुलिस चौकी होने से एक तो मनचलों पर रोक लगी, वहीं दूसरी तरफ़ तालाब में छलांग लगाने वाले बाज़ीगरों को भी ऐसा करने में रिस्क लगा, क्योंकि उनकी समझ में आ गया था कि अगर जल पुलिस ने उन्हें देख लिया तो उनके अरमानों पर पानी फिर जाएगा, इसलिए ख़ुदकुशी का ग्राफ भी कम होता चला गया। सब कुछ ठीक चल रहा था,
फिर अचानक क्या हुआ ?
जल पुलिस चौकी पर वर्दीधारियों की गिनती कम होने लगी और एक-एक करके सारे वर्दीधारी वहां से ग़ायब होते चले गए। फिर एक दौर वो भी आया जब जल चौकी कहे जाने वाले टीन शेड आवारा कुत्तों के पसंदीदा रैन बसेरे बन गये,
इसके बाद कुत्तों की ज़्यादती से आजिज़ आकर किसी जनाब ने शेड में ताला लगा दिया, जिससे सारे आवारा कुत्तों में ये ख़बर आग की तरह फैल गयी, जिससे उन सबमें मायूसी की लहर दौड़ गयी, फिर उन्होंने भी खुली छत के नीचे साँस लेने में अपनी शान और भलाई समझी।
ख़ैर,
अब किसने क्या समझा, ये जाँच का मामला है, जो हमारे बस की बात नहीं। हम तो आज आपके सामने सिर्फ़ इतना पेश करना चाहते हैं कि वहां अब न कोई हमारा वर्दीधारी मित्र गश्त करता दिखता है, न ही अँधेरे को ख़त्म करने की कोई रोशनी होती है। वहां गुण्डे-मवालियों, नशेड़ियों का अड्डा फिर से फल- फूल रहा है, जिसे देखने वाला शायद तब तक कोई नहीं जब तक कोई बड़ी वारदात उस इलाक़े में न हो जाये। आज हमारी ठंडी-ठंडी सड़क का हाल हर शाम के बाद
बद से बदतर होता चला जाता है लेकिन शहर के शरीफ़ लोग अराजक तत्वों के मुंह लगना नहीं चाहते और वर्दीधारी मित्र वहां तक जाना नहीं चाहते।
अब हमारी समझ मे ये बात नहीं आ रही कि इस मामले में क्या ऊपर से फ़रिश्ते आएंगे-
हमारी मदद करने या उत्तराखंड की ज़मीन पर मौजूद हमारे मित्र आएंगे…?
आख़िर में,
मा. उच्च न्यायालय, उत्तराखंड और
उत्तराखंड पुलिस के आला अधिकारियों से हमारी इल्तेजा है कि ऊपर जिस मामले का ज़िक्र किया गया है उसे अपनी जानकारी में लेने की मेहरबानी करें और अपने अधीनस्थों को हुक़्म देकर, उस वीरान और सूनसान पड़ी ठंडी सड़क पर पुलिस और प्रकाश व्यवस्था दुरुस्त करने का अज़ीम और
नेक काम करें,
जिससे नैनीताल के बाशिंदों के साथ- साथ सैलानियों को भी वहां घूमने में हिफाज़त महसूस हो सके।

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-50 (2 दिसंबर 2018) : नैनीताल के नाले बने कूड़ा घर, ज़रा सी बारिश के बाद झील में लेेजाने को तैयार है कूड़ा

जनाब,
ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न वो सनवाल स्कूल मल्लीताल, नैनीताल के पास एक बेबस नाले और उसमें पड़े कूड़े की है जिसकी दास्तां कुछ यूँ है,
तो साहब,
बरसात को बीते हुए भी लगभग 2 महीने हो गए लेकिन नैनीताल शहर में अब तक ये हालत रहे कि कोई चुनाव में मसरूफ़ था, कोई पुलाव में, किसी ने भी नालों में बारिश के साथ आये कूड़े को नहीं देखा, बरसात के बाद सर्दी भी आधी उम्र को आ गयी, लेकिन कूड़ा जहां पड़ा था, आज भी वहीं पड़ा हुआ, कूड़ा दिन भर पड़ा -पड़ा ये सोच रहा है कि कोई तो ऐसा मसीहा आये, जो नाले की ज़मीन से उठाकर, उन्हें उनके जायज़ मुक़ाम तक ले जाये, लेकिन हुआ इसका कुछ उल्टा जेब से अमीर लोगों ने उस लाचार कूड़े को, उसकी गर्त से निकाला तो नहीं बल्कि अपने घर का भी कूड़ा लाकर, कूड़े के ख़ानदान में इज़ाफ़ा कर दिया, अब आलम ये है कि शहर के नालों में जितने भी कूड़ा रोकने वाले जाल लगे हैं, वे सब जाल मुंह तक लबालब भर गए हैं और जिनको देखने वाला कोई रहबर या रफ़ीक़ नहीं है,
बेचारा कूड़ा तो मासूमियत से आने -जाने वाले लोगों को
टक-टकी लगाये बेचारगी भरी नज़रों से देखता है लेकिन उसकी बेचारगी पर वे लोग रहम नहीं खाते क्यूंकि वे फ़ास्ट फ़ूड खाते हैं और नाले की क़िस्मत में दो थैला कूड़ा और बढ़ा देते हैं, कूड़ा बार -बार नाले से बाहर निकलने की कोशिश में हवाओं को खरी -खोटी सुनाता है,
हवाएं उसकी चाल को समझ नहीं पाती और अपना पूरा ज़ोर लगाकर कूड़े की हस्ती उड़ाना चाहती हैं लेकिन 2-4 कागज़ों के अलावा कूड़े का कुछ नहीं उड़ा पाती क्यूंकि नाले की गहराई उसके सितम से ज़्यादा है, जिसकी वजह से हवा का हर वार बेकार जाता है आख़िरकार हवा भी उदास होकर अपने घर चली जाती है, फिर वो दोबारा जब शहर घूमने आती है कूड़े की छल फ़रेबी बातों में नहीं आती,
ख़ैर,
सबसे बड़ा
सवाल ये है कि अब क्या हो सकता है ???
कूड़े ने नाले से ख़ुद निकलने की बेहद कोशिशें कीं लेकिन सब नाकाम रही,
अब तो किसी इंसान ने ही कूड़े की मदद करनी पड़ेगी और उसे झील में डूबने से पहले ही बचाना पड़ेगा वरना कूड़े के ख़ानदान की बददुआएँ, हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी और जो पानी ख़राब करने के साथ झील की ख़ूबसूरती और पर्यावरण को हर तरह से नुक़सान पहुचाएंगी,
आख़िर में,
ज़िलाधिकारी महोदय,
अधिशासी अधिकारी,
नगर पालिका परिषद, नैनीताल
से हमारी इल्तेजा है कि शहर में जितने भी नाले मौजूद हैं उन सबके लिये सफ़ाई का महाअभियान चलाकर हमारी प्यारी झील में कूड़ा जाने से बचा दें, जिसके लिये शहर का हर बशर आपका अहसानमंद रहेगा..

अंक-49 (1 दिसंबर 2018) : कला के सर पर छत नहीं, बिन ऑडिटोरियम सब सून

कला जिसका मज़हब
कला जिसका ईमान है,
अदा, कला, फ़न, जिसके
ज़मीनो आसमान हैं,
न वो हिन्दू, न मुसलमान है
वो फ़क़त इंसान है,
इंसान है, इंसान है….

बरसों पुरानी बात है,
नैनीताल की सरज़मीं पर
एक नन्ही परी ने क़दम रखा,
दूर तक पूरे इलाक़े में सूनसानी ने अपना क़ब्ज़ा जमाया हुआ था, (कहीं से लकड़ी काटने की आवाज़ बेहद धीमी आ रही थी) इतनी वीरानी और सूनसानी देखकर नन्ही परी का मन घबराया और वो ज़ोर -ज़ोर से रोने लगी,
सन्नाटे को चीरती हुई उसकी आवाज़ लकड़ी काटने वाले के कानों तक जा पहुंची, बच्चे की आवाज़ सुनकर वो दौड़ा -दौड़ा चला आया उसने पास आकर देखा एक बेहद ख़ूबसूरत बच्ची जिसका चेहरा गुलाब की तरह खिल रहा था, जिसकी बड़ी-बड़ी
आंखें कुछ बड़ी उम्मीदों और अंजानी खुशियों का पैग़ाम दे रही थी, जिसके खूबसूरत छोटे -छोटे पैर, बड़ी -बड़ी मंज़िलों की सम्त बता रहे थे,
उसके रोने में भी कई सुर मिल रहे थे, ये सब देखकर लकड़हारा हैरान हो गया, इतनी प्यारी बच्ची को उसने वीरान जंगल में छोड़ना मुनासिब नहीं समझा, इसलिए लकड़हारा उस बच्ची को अपने सीने से लगाकर अपनी बीवी के पास ले आया, खुले आसमान के नीचे खाना बना रही लकड़हारे की बीवी ने जब उसके हाथों में मासूम बच्ची को देखा वो
भी खिलखिला उठी और झट से लकड़हारे से बच्ची को छीनते हुए बोली कौन है ये प्यारी बच्ची और कहां से लाये हो इसे???
लकड़हारे ने सारी दास्तान कह सुनाई, दोनों के कोई औलाद नहीं थी, इसलिये लकड़हारे ने फैसला किया कि अब वो ही उस बच्ची को पालेंगे, दोनों ने एक दूसरे की पसंद से उस बच्ची का नाम
कला रखा और दोनों मिलकर उस नन्ही कला की परवरिश करने लगे, देखते ही देखते नन्ही कला कब बालिग़ हो गयी पता ही नहीं चला, बचपन में कला अपने आंगन में ही खेलकर ख़ुश हो जाया करती थी लेकिन जब उसने जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा तो कला अपने आंगन में बंधकर नहीं रहना चाहती, उसने बाहर आकर नैनीताल के बाशिंदों को अपना फ़न दिखाना चाहा, इस पर उसके क़द्रदानों ने उसे चौराहे पर बैठा दिया और उसके फ़न उसके हुनर से अपना मन बहलाया, कला अकेली थी और तमाशबीन हज़ार, वो करती भी क्या, यूँ ही वक़्त बीतता गया, सियासतदानों की बेशर्मी के आगे कला बेबस ही रही, एक के बाद एक हुनरमंद कलाकार कला के ख़ानदान में पैदा हुये और चौराहों पर अपना क़िरदार पेश करके रुख़सत हो गये, लेकिन आज तक ‘कला’ का कोई भी ऐसा पुजारी या क़द्रदान सामने नहीं आया जो चौराहे पर खड़े, कलाकार को किसी ‘छत’ से नवाज़े, जिसमें वो अपने फ़न को खुलकर पेश करे, उसे भी आंधी-तूफ़ान, सर्दी, गर्मी, बारिश किसी भी मौसम की ज़्यादती से बचने का हक़ है, उसे भी महफूज़ रहकर हिफ़ाज़त से जीने का हक़ है, या ये बताइये क्या वो अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में एक बेबसी का आसमान ही देगी, जिसके नीचे खड़े होकर वो तमाशबीनों का मन बहलाये और अपने रोते हुए दिल से, चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर, ख़ुश रहने की अदाकारी करे और अदाकारी करती जाये, करती जाये,
करती जाये,
लेकिन साहिबान,
सबसे बड़ा सवाल है
आख़िर कब तक ???
आख़िर में,
देश के मुखिया, सूबे के मुखिया ज़िले के मुखिया और तमाम आला हस्तियों से तहे दिल से हमारी ये गुज़ारिश है कि नैनीताल में कला चौराहे पर खड़ी है उसके सर पर छत मुहैया करा दीजिये, एक रंगशाला रंगकर्मियों के लिये बनवा दीजिये, जिससे कला को उसका जायज़ मुक़ाम मिल सके और आने वाली नस्लें कला की तरफ मुतास्सिर हो सकें,
जनाब आप जानते ही हैं बिन ऑडिटोरियम सब सून
कलाकारों की नगरी नैनीताल में एक अदद रंगशाला (ऑडिटोरियम) बनवा दीजिये,
आपकी बड़ी मेहरबानी होगी,
ये चेतावनी नहीं अर्ज़ है हमारी।

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-48 (30 नवंबर 2018) : पानी की बर्बादी करने में महान, हमारा जल संस्थान !

साहिबान,
आज आपने जो तस्वीर / वीडियो देखी उसके लिये आप
ये मत समझियेगा कि बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी न न,
जिसके शहर में हमारे यहां जैसा क़ाबिल और फ़ाज़िल
जल संस्थान हो उसे भला कभी मेहनत करनी पड़ेगी,
कभी नहीं,
जी हाँ,
ये नज़ारा है सैनिक स्कूल वार्ड के प्रॉस्पेक्ट लॉज कंपाउंड का जहां काफ़ी दिनों से इतनी तेज़ रफ़्तार से पानी बह रहा है, जिसमें एक घंटे में लगभग 10,000 लीटर पानी शर्तिया बर्बाद हो रहा होगा, जिसे देखने वाला कोई नहीं है।
ये तो रही हमारे सैनिक स्कूल वार्ड क्षेत्र का हाल, अगर फुर्सत निकालकर पूरा शहर घूम लिया जाये तो लीकेज का खज़ाना हाथ लग जाएगा, वो किसी और दिन,
ख़ैर,
मज़े की बात ये है कि यहाँ
पानी पीने को मयस्सर नहीं होता, लेकिन बर्बादी के लिये खूब पानी मौजूद है, इतना होने पर भी विभाग की तरफ से पानी के लिये हर तीन माह में चंदे की रसीद आ जाती है, जिसमें चेतावनी लिखी होती है, यदि समय से चंदा जमा नहीं किया तो आपका सूखा हुआ नल भी काट दिया जाएगा, अब उम्मीद पर पानी क़ायम है, क्या पता कब हमारे नल में पानी अपनी पायल छनकाते हुये आ जाये और हम बिन घुंघरू डांस करने पर मजबूर हो जायें।
इसी लालच में हमारे शहर के लोग जल संस्थान को चुपचाप चंदा अदा कर देते हैं।
वो कहते हैं न
“शौक़ बड़ी चीज़ है” बस इसी चक्कर में थोड़ा नवाबसाब टाइप की फीलिंग्स
भी आ जाती हैं,
(सरकार की मदद करने में )

अंत में,
ज़िलाधिकारी महोदय,
अधिशासी अभियंता,
जल संस्थान नैनीताल से हमारा अनुरोध है कि अपने कर्मचारियों को कड़े निर्देश करते हुए शहर में जगह -जगह हो रही पानी की लीकेज चिह्नित कर बंद करवाएं,
और सैनिक स्कूल के प्रॉस्पेक्ट लॉज कंपाउंड, मल्लीताल, नैनीताल में हो रही पानी की भयंकर बर्बादी को रोकने के तत्काल आदेश करें।सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-47 (29 नवंबर 2018) : असर आज़ाद मंच और नवीन समाचार का, शुक्रिया : ईओ नगर पालिका नैनीताल का

आज़ाद के तीर में नवीन समाचार के ज़रिये 25 अक्तूबर के अंक में हमने झील का गुनहगार पेशाबघर उन्वान के साथ पेशाबघर की साफ़ सफ़ाई के लिये इल्तेजा की थी। निकाय चुनाव के चलते जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हो पायी थी, अब चुनाव के ख़त्म होने के बाद अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका परिषद, नैनीताल ने इस पेशाबघर की सफाई का हुक़्म अपने कारिंदों को दिया और अगली सुबह साफ़ सफ़ाई भी की गयी…इसके लिये
आज़ाद मंच आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता है।
हालांकि,
स्थायी लोक अदालत में लंबित मामले में भी फ़ैसला हो गया है,
जिसमें अदालत ने ये फ़ैसला सुनाया है कि विवादित पेशाबघर का मरम्मत कार्य जिसमें जल संयोजन, सीवर संयोजन द्वारा निकासी, नये यूरिनल पॉट तथा फ़र्श करवाया जाएगा। इन सब कार्यों के लिये अदालत ने दो माह का समय नगर पालिका को दिया है।
जनहित के इस फ़ैसले के लिए हम स्थायी लोक अदालत के न्यायाधीश श्री बृजेन्द्र सिंह जी का आज़ाद मंच परिवार की तरफ़ से बेहद शुक्रिया अदा करते हैं तथा उम्मीद करते हैं आने वाले वक़्त में भी आप यूँही तेज़ी के साथ लोकहित में न्याय करते रहेंगे।

अंक-46 (28 नवंबर 2018) : बीडी पांडे अस्पताल की सड़क की दुःख भरी कहानी

(1)नशे का अड्डा,
(2)मलबे का ढेर,
(3)अघोषित टैक्सी पार्किंग
तीनों की सरगना बनी
बीडी पांडे अस्पताल की सड़क

साहिबान,
आज हम आपके सामने जो तस्वीर पेश कर रहे हैं
वो नैनीताल की जानी- मानी बीडी पांडे अस्पताल के पीछे वाली सड़क की है, जहाँ पर अवैध पार्किंग का मुद्दा बेहद पुराना हो गया है,
न जाने ऐसा क्या है, जो बार-बार शिकायत होने के बाद नाम मात्र की कार्रवाई होकर एक दो दिन बाद टैक्सी चालकों की पसंदीदा फ्री पार्किंग फिर से आबाद हो जाती है, सड़क के दोनों ओर टैक्सियां खड़ी रहती हैं, उल्टे पुलिस कार्रवाई के नाम पर स्थानीय लोगों को चार पहिया-दो पहिया वाहनों का भी चालान कर परेशान करती है।

टैक्सियों और तीक्ष्ण चढ़ाई वाली ‘सड़क पर गड्ढों’, याकि ‘गड्ढों पर सड़क’ की वजह से नीचे या ऊपर से नीचे आने वाले लोगों को अपनी गाड़ी बेहद सावधानी से लेकर आनी पड़ती है, और स्कूली बच्चों को आने-जाने में भी बेहद परेशानी का सामना करना पड़ता है, अभिभावकों को भी ये डर लगा रहता है कहीं कोई गाड़ी अचानक से न आ जाये, कोई अनहोनी न हो जाये।
ये तो थी पहली परेशानी, परेशानी नंबर दो:-
यहां आस-पास के जितने ज़हीन लोग हैं, वे घर से निकले मलबे व गंदगी के कट्टों को भरकर रातों-रात सड़क के किनारे रखकर चले जाते हैं, फिर न ही नगर पालिका उसकी ख़बर लेती है, न ही कोई और महकमा उसकी पकड़ करता है। सब मस्त हैं जो चल रहा है, चलने दो। आधी सड़क मलबे ने घेर दी, आधी सड़क बिन बुलाये टैक्सी ड्राइवरोंं ने। तो जिसका मन आये गाड़ी लाओ, जिसकी मर्ज़ी अपने घर का मलबा सड़क पर ही फेंक कर जाओ, कौन पूछने वाला है।

अब तीसरी और सबसे हैरान करने वाली परेशानी ये है कि सड़क की चढ़ाई शुरू होते ही जो सरकारी चिकित्सकों के आवास बने हैं न, ठीक उसके नीचे, पॉपुलर कंपाउंड को जाने वाले रास्ते के मुहाने पर, पिछले कई महीनों से एक लड़का मोमोज़ बेचता है। बेरोज़गारी से लड़ने के लिये उस लड़के ने स्वरोज़ग़ार किया, हम उसका तहे दिल से इस्तक़बाल करते हैं, शायद उस मोमोज़ बेचने वाले को भी अंदाज़ा नहीं होगा कि उसके मोमोज़ खाने जो लोग आते हैं, वे ज़्यादातर नशे में पहले से ही होते हैं या मोमोज़ लेकर वहीं किनारे बाइक पर रखकर शराब नोशी करते हैं।उसके बाद जितनी लड़कियां और महिलायें वहां से अपने घरों को जाती हैं,
ज़्यादातर के साथ छेड़-छाड़ होती है या उनके सामने आपस में गाली- गलौच करते हैं।
कोई भी शरीफ इंसान उन नशेबाज़ लोगों के मुंह नहीं लगना चाहता, कई महिलाओं व लड़कियों ने इस मामले की हमसे शिकायत की है।
इसलिये हम ये मुद्दा उठाकर पुलिस प्रशासन को नींद से जगाना चाहते हैं,
आख़िर में,
ज़िलाधिकारी नैनीताल,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल और नव निर्वाचित अध्यक्ष
नगर पालिका परिषद नैनीताल, साहेबान को मामले की जानकारी देते हुए ये इल्तेजा करना चाहेंगे कि बच्चे / युवक नशे का शिकार हो रहे हैं, जगह-जगह अवैध पार्किंग और अघोषित कूड़ेदान बन रहे हैं, इन परेशानियों से शहरवासियों को निजात दिलाने की मेहरबानी करें..

क्योंकि सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

अंक-46 (27 नवंबर 2018) : आज़ाद मंच और नवीन समाचार का एक बार फिर हुआ असर, शुक्रिया, जल संस्थान नैनीताल !!

साहिबान,

ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं वो असल में नैनीताल शहर की बिरला स्कूल सड़क
(स्टोनले कंपाउंड के नज़दीक ) की है, जिसके एक हिस्से में पानी के पाइप से लगातार पानी बहता हुआ दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरे हिस्से में पाइप से पानी बहना बंद हो गया है, ये सब बताकर यहां हम आपके साथ पहेलियाँ नहीं बुझा रहे हैं बल्कि आपको ये जानकारी दे रहे हैं कि उस जगह पर लगातार तीन दिन से पानी बह रहा था जिसे देखने वाला कोई नहीं था, आने-जाने वाले लोग इसे दूसरे की प्रॉब्लम समझकर आगे बढ़ जा रहे थे, हाँ इतना ज़रूर है अगर चुनाव खत्म नहीं हुये होते तो शायद कोई नेता आकर इसपर भाषण भी देता और सही होने पर अपने चेलों के साथ मिलकर सेल्फी लेता और घर घर जाकर डींगे मारता, अब चुनाव ख़त्म, मुद्दा ख़त्म, जीते या हारे किसी भी नेता ने वहां आकर नहीं देखा, वो तो भला हो आज़ाद मंच के सदस्य व अध्यक्ष प्रत्याशी रहे नीरज जोशी का जिन्होंने ऐसा होते हुए देखा और वे विचलित हो गए उन्होंने बर्बाद होते पानी की तस्वीरें खींची और आज़ाद मंच में तथा सम्बंधित अधिकारियों को भेजी, तस्वीरें आने के बाद आज़ाद मंच व नवीन समाचार के ज़रिये भी जल संस्थान से पानी की बर्बादी तुरंत रोकने की इल्तेजा की गयी,
चौतरफ़ा क्रिया-प्रतिक्रिया के होने से अधिशासी अभियंता,
जल संस्थान, नैनीताल ने तत्काल कार्रवाई करते हुए अपनी टीम को तथाकथित स्थान पर भेजा और काम शुरू करवाया, कुछ देर मशक्क़त के बाद बर्बाद होता पानी बंद हो गया, जल संस्थान की इस तरह से तत्काल कार्रवाई करने पर आज़ाद मंच परिवार तहेदिल से आपका शुक्रिया अदा करता है,
और उम्मीद करता है कि आने वाले वक़्त में भी आपकी कार्य शैली यूँही बनी रहेगी..

याद रखिये, बर्बाद होता पानी नहीं, लहू है हमारा

अंक-45 (26 नवंबर 2018) : आज़ाद मंच और नवीन समाचार का असर एक बार फिर हुआ सबसे तेज़

तहेदिल से जल संस्थान आपका शुक्रिया

साहिबान,
नवीन समाचार के ज़रिये हमने आज़ाद के तीर में नये पर्यटन स्थल के लिये जल संस्थान आपका शुक्रिया शीर्षक से रविवार के अंक में हमने हल्द्वानी राष्ट्रिय राजमार्ग पर ज़िला जेल गेट के ठीक सामने सीवर के खुले ढक्कन के बारे में शासन- प्रशासन को मामले की जानकारी देते हुए, अधिशासी अभियंता
जल संस्थान, नैनीताल से उस मुद्दे पर हाथों हाथ कार्रवाई करने की इल्तेजा की थी, जिसका मान रखते हुये अवकाश यानि छुट्टी होने के बावजूद अधिशासी अधिकारी साहिब ने तत्काल प्रभाव से उस पर कार्रवाई की और अपनी टीम को भेजकर काम शुरू करवा दिया है,
इसके लिए आज़ाद मंच परिवार
आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करता है और इसके साथ आपकी तेज़तर्रार कार्यशैली को सलाम करता है, आज से हमारी उम्मीदें आपसे और ज़्यादा बढ़ गयी हैं, अब जब भी आपसे मुत्तल्लिक़ हमारे पास कोई भी परेशानी आएगी तो हम उस पर भी इसी तरह आपसे तत्काल कार्रवाई की आरज़ू रखेंगे,
हम पुरख़ुलूस यक़ीन के साथ अब कह सकते हैं कि जल संस्थान, नैनीताल सोया नहीं है और जब -जब भी कहीं कोई मामला सामने आएगा, हमारे अज़ीज़ अधिकारी उस का निबटारा कराएंगे,
हमें ये भी एहसास है कि हमारा यक़ीन अब कभी टूटेगा नहीं,
आख़िर में,
ज़िलाधिकारी नैनीताल और अधिशासी अभियंता, नैनीताल का दिल से शुक्रिया करने के साथ साथ हम ये साफ़ कर देना चाहते हैं कि हमारा किसी भी सरकारी या ग़ैर -सरकारी महकमों या राजनैतिक दलों या किसी व्यक्ति विशेष से या किसी से भी कोई दुश्मनी नहीं है, हमारी लड़ाई सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़लत के साथ है, समाज या मआशरे में हमें जब भी कुछ भी ग़लत दिखेगा हम उस मुद्दे को बेख़ौफ़ उठाएंगे,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद मंच, नैनीताल से

अंक-44 (25 नवंबर 2018) : नये पर्यटन स्थल के लिये, जल संस्थान आपका शुक्रिया !!!

वाह,
हम कितने ख़ुशनसीब हैं जो
हमें जन्नत जैसी सरोवर नगरी में ज़िंदगी बसर करने का मौक़ा मिला है, यहां ख़ुदा ने हमें अपनी क़ुदरत में से बेशक़ीमती नज़ारे अता किये हैं, उसका जितना शुक्र किया जाये वो कम ही है लेकिन यहां इंसानी हरकतों में भी बेहद बरक़त है वो भी ख़ासतौर पर सरकारी दफ्तरों के इंसानों की उनमें भी जल संस्थान के नुमाइंदों की हरक़तें तो कमाल हैं, बेशक़ उनके काम करने का जज़्बा क़ाबिले तारीफ़ है क्योंकि उन्होंने शहर में जो सीवर लाइन बिछाई है उसके तो क्या कहने, सीवर को इस तरह शहर के दामन में पिरोया गया है वो कारीगरी लाजवाब है, जल संस्थान के काम की रफ़्तार की बात करें तो वो इतनी तेज़ है कि कुछ बोला ही नहीं जा सकता, जिस काम को करने में दो दिन लगेंगे वो यहां के तेज़ तर्रार साहब लोग महज़ दो साल में करवा देते हैं, आपने तल्लीताल रिक्शा स्टैंड के पास एक होटल के नीचे सड़क पर देखा होगा कि आये दिन वो लाइन लीक होती है लेकिन मजाल है हमारे कर्मठ जल संस्थानियों की जो वहां आकर देखें, जब सीवर का पानी सब झील में चला जाता है तब ख़ुद ब ख़ुद लीकेज बंद हो जाती है, फिर सबको लगता है उस पर कोई क़दम उठाया गया होगा लेकिन ये हमारी कोरी ख़ुशफ़हमी होती है,

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ख़ैर,
ऐसे कारनामे तो शहर में कहीं न कहीं ज़रूर हो रहे होंगे उनकी बात फिर कभी, आज हमारे पास जो तस्वीरें हैं उनकी बात करते हैं,
तो साहिबान,
हल्द्वानी को जाने वाली सड़क पर ज़िला जेल, नैनीताल के ठीक सामने जल संस्थान ने एक नया *पर्यटक स्थल* कुछ महीनों से आम लोगों के लिये खोल रखा है,
जिसे देखने के लिये दूर -दूर से बसें भरकर आ रही हैं, इस वजह से उस रूट पर जाम लगातार बना रहता है, अब जब बात रमणीय स्थल के दर्शन की हो तो जाम के की कौन परवाह करे, दिन में तो लोग इस स्थल का दर्शनकर दूर से ही चल देते हैं लिन दूर दराज़ से जो लोग रात के अँधेरे में नैनीताल पहुंचते हैं, वे लोग अपनी बाइक या स्कूटी के साथ इसके अंदर जाकर भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं, (हाँ, अगर विभाग की मेहरबानी रही तो वो दिन दूर नहीं जब कोई शख़्स नैनीताल से घुसकर रुसी गांव में निकलने का रिकॉर्ड बनाये) इस दर्शन में उनकी हड्डी- पसलियों को थोड़ा टूटना पड़ता है,
इतनी ज़बरदस्त लोकप्रियता को देखते हुए *जल संस्थान* नैनीताल को हमारी तरफ़ से सलाह है कि जिस सीवर का ढक्कन महीनों से हटा है और उसने *टूरिस्ट स्पॉट* का रूप इख़्तियार कर लिया है क्यों न उसके दर्शन के लिए एक टिकट घर बनाया जाये, जिससे कोई भी इंसान उस बेनज़ीर नज़ारे का लुत्फ़ मुफ़्त में न उठा पाए,
हाँ, इससे इतना नुकसान ज़रूर होगा कि रात के मुसाफ़िर सीधे अंदर नहीं जा पाएंगे क्यूंकि उससे पहले टिकट लेने के लिए उन्हें आपका काउंटर देखकर रुकना पड़ेगा, इससे उनके राजस्व को थोड़ा नुकसान हो सकता है,
आख़िर में,
ज़िलाधिकारी और
अधिशासी अभियंता
जल संस्थान, नैनीताल से हमारी इल्तेजा है कि जेल गेट के सामने जो सीवर का ढक्कन हादसों को दवार दावत दे रहा है, मेहरबानी करके उसे तत्काल प्रभाव से बंद करवाकर शहरवासियों के साथ-साथ सैलानियों की हिफाज़त फरमायें,

अंक-43 (24 नवंबर 2018) : भावी चेयरमैन साहब, कृपया ध्यान दें !!!

जनाब,
ये चित्र किसी गांव या कस्बे का नहीं है, बलि मा.उच्च न्यायालय, उत्तराखंड जिस जगह अपनी विशेष खूबसूरती बिखेर रहा है, उसी शहर नैनीताल का ये नज़ारा है, यहां की एक ख़ास बात और है कि यहां आप जब भी पहुंचेंगे आपके स्वागत के लिये 10-12 आवारा कुत्ते ज़रूर तैनात होंगे, जो हर गली, मोहल्लों में अपना झुण्ड बनाये मिलेंगे, ये हमारी प्यारी नगर पालिका की तरफ से विशेष सुविधा दी गयी है, यदि इत्तेफ़ाक़ से आपका रात 10 बजे के बाद और सुबह 7 बजे से पहले नैनीताल में प्रवेश होता है, तब तो आपको कुछ फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं होगी, 10-12 मेहमानवाज़ों का ख़्वाब फिर आप भूल जाइये क्योकि उस वक्त पूरी की पूरी बारात आपके स्वागत में खड़ी होगी और निःशुल्क सेवा देते हुए आपको होटल या कमरे तक छोड़ा जाएगा, हाँ उसमें रनिंग से आपकी साँस ज़रूर फूल सकती है तो घबराइयेगा नहीं बल्कि शुक्र मनाइयेगा कि आप सही सलामत अपनी मंज़िल तक पहुंच गये, क्या कहा भेदभाव,
नहीं, नहीं जनाब,
जानवर कहाँ भेदभाव करते हैं
वो तो इंसानों का महंगा शौक़ है,
और ये आवारा कुत्ते पर्यटक हो या स्थानीय नागरिक किसी में फ़र्क महसूस नहीं करते, कुछ समय पहले की बात बताऊं,
एक पर्यटक की मासूम बच्ची की मौत का कारण यही आवारा कुत्ते बने थे, जिसमें वो बच्ची तल्लीताल स्थित लकड़ी टाल के पास गिर गयी थी, गंभीर चोटें आने के बाद उसकी मौत हो गयी थी, अफ़सोस…
लेकिन
प्रशासन ने उस घटना से भी सबक़ नहीं लिया क्यूँकि उनका इरादा अभी शायद कुत्तों को लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाने का है,
ख़ैर,
अभी एक कुछ दिन पहले एक स्थानीय महिला को मॉर्निंग वॉक के दौरान सुबह 7 बजे के आसपास मॉल रोड एचडीएफसी बैंक के पास किसी आवारा कुत्ते ने काट लिया था,
जिनको अस्पताल में तुरंत ले जाया गया तथा हर सम्भव उपचार किया गया,
साहब,
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती,
उस दिन उक्त महिला को काटा था,
कल तथाकथित कुत्तों द्वारा किसको काट लिया जाए कुछ नहीं कहा जा सकता,
पालिका प्रशासन ने मॉल रोड लाइब्रेरी के सामने कुत्तों से बचने के उपाय सम्बन्धी एक बड़ा सा होर्डिंग लगाक़र अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है,
और हाथ झाड़े भी क्यों न?
स्थानीय लोगों या पर्यटकों को कुत्ते काटते हैं तो काटें, उनकी बला से, उनपर कोई असर नहीं पड़ता,
ख़ैर,
अंत में,
मा.उच्च न्यायालय, आयुक्त महोदय, ज़िलाधिकारी महोदय,
*नवनिर्वाचित चेयरमैन* महोदय व *अधिशासी अधिकारी* नगर पालिका परिषद् नैनीताल से हमारा अनुरोध है कृपया
आवारा कुत्तों तथा बंदरों का कुछ ठोस उपाय करें जिससे
शहरी बाशिंदों के साथ- साथ बाहरी मेहमान भी नैनीताल की सरज़मीं पर बेख़ौफ़ होकर कभी भी घूम सके, उनका स्वागत इंसानों के द्वारा हो न कि उन्हें शिकार बनाने की घात लगाये
बैठे आवारा कुत्तों के द्वारा…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-42 (23 नवंबर 2018) : थमने का नाम नहीं ले रहा काशीपुर में चुनाव प्रचार ???

साहिबान,
जैसा कि शहर का बच्चा -बच्चा जानता है कि निकाय चुनाव सम्पन्न हो गए हैं, परिणाम आने के बाद मेयर साहिबा को जीत की जो मालायें पहनाई गयी वो भी पुरानी हो गयीं, लेकिन हमारे काशीपुर में ऐसे महान प्रत्याशी भी हैं जिन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि वास्तव में चुनाव परिणाम आ चुके हैं और उनमें से कोई एक नगर प्रमुख (मेयर) बन भी गयी हैं, हमें हैरत इस बात की है कि उम्मीदवार अभी भी मतदाताओं से उम्मीद लगाये बैठे हैं शायद इसलिए उनके फ्लैक्स नगर में जगह- जगह लगे हैं ( जिनमें मुख्य बाज़ार, महाराणा प्रताप चौक, रतन रोड, बाज़पुर रोड, व रामनगर को जाने वाली सड़क प्रमुख हैं ) जहां पर बिजली के खम्बों आदि पर लगे फ्लैक्स चुनाव के पश्चात् अब तक नगर की शोभा बढ़ा रहे हैं,
ख़ैर,
हमारा मक़सद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, हम आपके जज़्बातों को समझते हैं व उनकी क़द्र करते हैं, सफ़लता और असफ़लता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिये हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, आज सिक्का उल्टा पड़ा है कल सीधा भी आएगा, प्रयत्न करना किसे कहते हैं, हमें एक मकड़ी से सीख लेनी चाहिए जो बार- बार गिरकर उठती है और आख़िरकार फिसलती दीवार पर चढ़ ही जाती है,
अंत में,
शहर के जाने- माने व्यक्तिव व समस्त सम्मानित प्रत्याशियों से हमारा विनम्र निवेदन है कि अपने प्यारे शहर *काशीपुर* के प्रति थोड़ी सी और ज़िम्मेदारी दिखाते हुये अपने -अपने फ़्लैक्स उतरवाकर शहर को साफ़, सुंदर व स्वच्छ बनाने में अपना-अपना योगदान प्रदान करने की कृपा करें,
हमें आशा है हमारे निवेदन को सकारात्मक रूप में लिया जाएगा तथा उस पर कार्रवाई भी की जाएगी,
धन्यवाद……

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
काशीपुर से

अंक-41 (22 नवंबर 2018) : एक प्रत्याशी ने उतारे अपने फ़्लैक्स, बाक़ियों का प्रचार शायद अभी थमा नहीं

साहिबान,
जैसा कि शहर का बच्चा -बच्चा जानता है कि निकाय चुनाव सम्पन्न हो गए हैं, परिणाम आने के बाद नये अध्यक्ष का स्वागत समारोह भी हो गया है। लेकिन एक मात्र प्रत्याशी नीरज जोशी के अलावा बाक़ी प्रत्याशी (जिन लोगों ने लगाये ही नहीं, वे इसमें शामिल नहीं हैं) ऐसे हैं कि उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि वास्तव में चुनाव परिणाम आ चुके हैं, और उनमें से कोई एक नगर प्रमुख बन भी गया है, उनके फ्लैक्स नगर में जगह- जगह लगे हैं। ( जिनमें तल्लीताल डायमंड के पास तथा मल्लीताल में मुख्य डाकघर वाली सड़क प्रमुख हैं) जो चुनाव के पश्चात् अब तक नगर की शोभा बढ़ा रहे हैं।
ख़ैर,
हमारा मक़सद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। हम आपके जज़्बातों को समझते हैं व उनकी क़द्र करते हैं। सफ़लता और असफ़लता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिये हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आज सिक्का उल्टा पड़ा है कल सीधा भी आएगा। प्रयत्न करना किसे कहते हैं, हमें एक मकड़ी से सीख लेनी चाहिए जो बार- बार गिरकर उठती है और आख़िरकार फिसलती दीवार पर चढ़ ही जाती है।
अंत में,
शहर के जाने-माने व्यक्तिव व समस्त सम्मानित प्रत्याशियों से हमारा विनम्र निवेदन है कि अपनी प्यारी सरोवर नगरी के प्रति थोड़ी सी और ज़िम्मेदारी दिखाते हुये अपने-अपने फ़्लैक्स उतरवाकर नगर को साफ़, सुंदर व स्वच्छ बनाने में अपना-अपना योगदान प्रदान करने की कृपा करें।
हमें आशा है हमारे निवेदन को सकारात्मक रूप में लिया जाएगा तथा उस पर कार्रवाई भी की जाएगी।
धन्यवाद……

अंक-40 (21 नवंबर 2018) : न हम बैठे हैं न हम मौन हैं, काम करके बताइयेगा आप कौन हैं ? :- नैनीतालवासी

नगर पालिका परिषद, नैनीताल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष महोदय श्री सचिन नेगी व 15 वार्ड के समस्त सभासद महोदय/महोदया को उनकी जीत के लिए हार्दिक बधाई व आने वाले सुनहरे कार्यकाल के लिये अनेकों शुभकामनायें।
साहिबान,
जनादेश आ गया है, हम सब उसको ससम्मान स्वीकार करते हैं, लगी-चुपड़ी बात करनी हमें नहीं आती इसलिए सीधे मुद्दे पर आते हैं।
तो जनाब,
अंग्रेज़ों के शासन से चली आ रही नगर पालिका, नैनीताल के अब तक बने अध्यक्ष व सभासदों ने जो किया, सो किया, पहले के दौर से वर्तमान हालात तक  नैनीताल का जन-जन वाक़िफ़ है।
क्या से क्या हो गया, नैनीताल का हाल और हमने कुछ नहीं बोला बस यूँही मौन रहकर तमाशा देखते रह गये।
ख़ैर,
अभी उसकी तह तक जाना आपके वक़्त को ज़ाया करके गुनाह करने जैसा होगा।
इसलिए सीधे नगर पालिका के हुक्मरानों से मुख़ातिब होते हैं और उनसे ये दिली ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हैं कि आप सबको बेहद ही उम्मीदों के साथ चुना गया है।
अध्यक्ष में 13 उम्मीदवारों में से सरोवर नगरी की जनता ने आप पर स्नेह, प्रेम और करुणा दिखाई और इसी तरह प्रत्येक सभासद भी इसी प्रेम, स्नेह और करुणा के कारण मिनी सदन का हिस्सा बने हैं।
इस प्रेम, करुणा और स्नेह का बदला चुकाने का समय आ गया है।
जनता ने आपको इसलिए चुना है ताकि आप नगर के हित व समाज के हित के लिये हमेशा तत्पर रहें।
आप उन लोगों से प्रेरणा न लें जिन्होंने इन पदों पर रहकर सिर्फ़ अपनी दुकानें चलाई  बल्कि उन लोगों से प्रेरणा लें जिन्होने समाज हित को सदैव अपना हित समझा।
नगर प्रमुख या सदस्य आपको इसलिये नहीं बनाया गया है कि आप इन नामों की फसल काटेंगे या घर में चादर तानकर सोएंगे।
आप सबकी जानकारी के लिये अत्यंत गुप्त सूचना लीक की जा रही है कि अब नैनीताल की जनता जागरूक हो चुकी है।
किसी भी पदाधिकारी को अब चैन से नहीं बैठने दिया जाएगा।
हाँ,
ये अलग बात है कि यदि उसके क्षेत्र में साफ़-सफ़ाई, स्ट्रीट लाइट व्यवस्था तथा अन्य जन संबंधी कोई समस्या नहीं होगी तो उसको सम्मान भी पूरा दिया जाएगा, और नहीं होगी तो उससे काम भी लिया जाएगा।
हिंदी में कुल मिलाकर इल्तेजा/प्रार्थना इतनी है कि अब कुर्सी में बैठने का समय नहीं है बस सरोवर नगरी को चमकाने का वक़्त है, नगर में आवारा कुत्तों, बंदरों, गंदगी से निपटने का वक़्त है क्योंकि जो कुर्सी में बैठते हैं उन्हें उस पर बैठने का दोबारा मौक़ा नहीं मिलता इसलिए याद उसे ही रखा जाएगा जो दूसरों की गलती से सीख ले।
और नित नई ऊर्जा के साथ
नये- नये कार्य करे,
हम जानते हैं अभी आप सब स्वागत- सत्कार में व्यस्त होंगे, चलिये ये अरमान पूरा करने के लिए नैनीताल की जनता आपको एक सप्ताह का समय दे रही है यानि 28/11/2018 दिन बुधवार से आपको पूर्ण रूप से अपने पद की गरिमा को निभाते हुये नैनीताल की जनता अथवा अपने क्षेत्र के लोगों के लिये ऐसे जी-जान से लगना है कि आने वाला समय आप सबके नामों की नज़ीर पेश करे, या यूँ समझ लीजिये आप नैनीताल रूपी बस के ड्राइवर व कंडक्टर हैं, और हम सब उस बस के ऐसे मुसाफ़िर हैं जो ड्राइविंग सीट पर बैठे ड्राइवर को सोने देते हैं न कंडक्टर को,
अंत में
नगर पालिका परिषद, नैनीताल के साथ-साथ पूरे उत्तराखण्ड की ग्राम सभाओं, नगर पंचायतों, नगर पालिकाओं तथा नगर निगमों के समस्त पदाधिकारियों से भी हमारी उपरोक्त अपील है कि कृपया अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर से बेहतर कार्य करें, ताकि प्रत्येक नागरिक के घर, ग्राम, क़स्बे शहर से होता हुआ विकास हमारे देश के कोने कोने तक पहुंचे।
तभी हमारा भारत उन्नति व तरक़्क़ी कर पाएगा,
हमें अपने देश के लिए ज़मीन से 2.5 इंच ऊपर उठकर सोचना होगा।
याद रखिये,
सावधानी हटी
दुर्घटना घटी
और
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है।

अंक-39 (19 नवंबर 2018) : जीतियेगा, मगर रखियेगा ध्यान इतना…

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p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
नगर निकाय चुनाव सुस्त चाल, कामचलाऊ सरकारी व्यवस्था से ही सही लेकिन शांतिपूर्ण तरीक़े से रविवार को सम्पन्न हुआ, इसके लिये शासन- प्रशासन तथा नगर की भोली- भाली जनता का हम हार्दिक धन्यवाद अर्पित करते हैं, जिसने पोलिंग बूथ पर मौजूद कर्मचारियों के ढुल- मुल रवैये, मतदान करते समय मात्र गत्ते की आड़ में गोपनीयता की दुहाई देते लचर प्रबंध, आदि की किसी से कोई शिकायत नहीं की,
ऐसी सहनशीलता को नमन है,
अब बात करते हैं परिणामों की तो जनाब आंकड़ें बेहद उलझे हुए और दिलचस्प हैं, किसी एक का नाम नहीं लिया जा सकता,
केतली में उबाल कितना है,
कप- प्लेट में चाय कितनी है,
फूल की सुगंध सरोवर नगरी को महकाने के लिये कितनी तैयार है,
हाथ से हाथ मिलाकर नगर कितना विकसित होगा,
बल्ला ने जो सेंचुरी बनाई वो मैन ऑफ़ द मैच दिला पाएगी या नहीं,
मोमबत्ती से हर घर में कितनी रोशनी होगी,
अलमारी जब खुलेगी तो उसमें से नगर के लिए क्या जादू निकलेगा,
सिलेंडर में गैस कितनी है,
नारियल कितना शुभ होगा,
या
हाथी पहाड़ पर चढ़कर इतिहास रचेगा या नहीं ???
इन सब सवालों के जवाब हमें कल देर शाम तक मिल जाएंगे,
ख़ैर,
परिणाम जो भी हो,
हम जनादेश को स्वीकार करेंगे,
वो जो भी होगा जनता के द्वारा चुना गया नैनीताल का प्रमुख होगा,
इसी के साथ
नैनीताल के प्रथम नागरिक बनने जा रहे और अन्य प्रत्याशियों से हमारी विनम्र अपील है कि जितनी जगह आपकी चुनाव प्रचार सामग्री नगर की शोभा बढ़ा रही है (क्योंकि अब उसका कोई औचित्य नहीं रह गया है इसलिए) कृपया करके उसे दरों दीवार से हटवाकर एक बेहतरीन व्यक्तित्व का परिचय देने की कृपा करें,
साथ ही परिणाम जो भी हों,
हम सब जानते हैं कि आप में से ही कोई एक नगर पालिका अध्यक्ष बनेगा, इसलिए सौहार्द व आपसी भाईचारा आज की ही तरह क़ायम रखियेगा, नैनीताल के हर बाशिंदे को आज की ही तरह परिवार का सदस्य समझियेगा, छोटा सा नगर है और सबने सुबह-शाम एक दूसरे से ही मिलना है, एक-दूसरे के सुख दुःख में काम आना है, चुनाव तो आते-जाते रहेंगे लेकिन आप और हम यहीं रहेंगे,
अंत में,
समस्त प्रत्याशियों को परिणाम के लिए आज़ाद मंच शुभकामनायें अर्पित करता है तथा आप सबके उज्जवल भविष्य की कामना करता है,
धन्यवाद

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-38 (18 नवंबर 2018) : वोट देना एक को, ……जैसे नेक को

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p style=”text-align: justify;”>हुजूर,
गुस्ताख़ी माफ़ हो लेकिन
अब समय आ गया है, हमें अपने अधिकार की शक्ति पहचाननी ही पड़ेगी, हमने अपने कलमठ प्रत्याशी के बारे में सोचना ही पड़ेगा, न कि अपने नगर के बारे में, हमने इस बात का ध्यान रखना है कि अगर उसको वोट नहीं दिया तो चुनाव के बाद वो हमारे बारे में क्या सोचेगा, हमें ‘बंदर छाप च्यवनप्राश’ की कसम है, हम अपनी नाते-रिश्तेदारी का पूरा कर्त्तव्य निभाएंगे और अपने कलमठ-जुजारु प्रत्याशी को ही वोट देंगे फिर चाहे हमारा प्रत्याशी हार ही क्यों न जाये, यही सोचेंगे आख़िर गिरते हैं, शह सवार ही मैदाने जंग में,
क्या कहा,
शहर????
नगर????
वो किसका मुंह देखेगा???

<

p style=”text-align: justify;”>अरे छोड़िये, साहब,
नगर, शहर के लिए अगले 5 साल बाद जो चुनाव आएँगे न, उसमें सोचेंगे,
इस बार तो हमें अपने कलमठ प्रत्याशी को ही वोट देना है,
अरे भई,
कर्त्तव्य बनता है हमारा उसके प्रति, क्योंकि हमने उसका नमक खाया है, दावतें उड़ा रखी हैं, आठ के ठाट वाले हमारे शौक भी कलमठ पूरे करता है, कल तो उसने हमारे क्षेत्र में पानी की जगह अंगूर की धारा ही बहा दी थी, और हाँ, हम तो रज़ाई की उम्मीद क़र रहे थे लेकिन कलमठ ने पूरे के पूरे कंबल ही डाल दिये हमारे क्षेत्र के लोगों पर, आप ये मत समझियेगा, ये घाटे का सौदा है, गधा भी ₹20,000 में बिकता है, वगैरह वगैरह, हमें पता था कि आप सब यही कहेंगे इसलिए हमने चतुराई दिखाते हुये अपने कलमठ प्रत्याशी से पूरा 20,001 रुपया लिया है, हमने तो साफ़ कह दिया था कि भाई हमारी क़ीमत गधे से ज़्यादा है, ये सुनकर आपकी तरह वो भी इसी तरह मुस्कुराया था, और हमारी चतुराई देखकर दंग रह गया था, अब जाएंगे कल अपना कर्त्तव्य पूरा करने और अपने कलमठ को वोट देकर आएँगे, आख़िर 5 साल में तो कोई इतने प्यार से बोलता है हमसे, उसका भी सम्मान न रखें।
और हम तो ये कहते हैं हमारी तरह आप भी अपने बारे में अपनी नाते-रिश्तेदारी के बारे में सोचो और वोट दो,
अपने नगर, अपने शहर के बारे में क्या सोचना???
चुनकर
जो भी आता है हमें उससे क्या?
हमारे काम तो सब होने हैं,
तो रिश्ते निभाइये अंदर में,
मोहर लगाइये…………..!

<

p style=”text-align: justify;”>वाह !
आप तो बेहद समझदार हैं। समझ गये,
अब देख लीजियेगा फिर अपने हिसाब से रिश्तेदारी ज़रूरी है या अपना नगर ???
वोट आपका, फैसला आपका

<

p style=”text-align: justify;”>सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है, लेकिन वोट जरूर दीजियेगा…
आज़ाद मंच
नैनीताल से
🙏🙏🙏🙏🙏

अंक-37 (17 नवंबर 2018) : 13 में से केवल एक प्रत्याशी ने ही समझी अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी

<

p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
जैसा कि आप सब जानते हैं,
नैनीताल में चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन लगभग सभी प्रत्याशियों ने जुलूस निकालकर
शहर को अपनी चुनाव प्रचार सामग्री से पाट दिया था,
आज़ाद मंच ने समस्त प्रत्याशियों से नैतिकता की ज़िम्मेदारी को समझते हुये शनिवार को एक सफ़ाई अभियान चलाकर शहर में सफ़ाई करवाने की विनम्र अपील की थी,
लेकिन शनिवार सुबह का नज़ारा कुछ और ही बयान क़र रहा था,
13 में से केवल एक प्रत्याशी
वो भी निर्दलीय प्रत्याशी नलिनी नेगी सुबह- सुबह नैनीताल की सड़कों पर सफाई करती नज़र आयी,
हम जानते हैं पूरे शहर में किसी एक के करने से सफ़ाई नहीं हो सकती लेकिन नलिनी नेगी ने चाहे जितनी भी सफ़ाई की हो वो क़ाबिले तारीफ़ है,
फ़र्क़ इससे पड़ता है की उन्होने अपनी प्रथम नागरिक वाली ज़िम्मेदारी को समझते हुये हाथ में झाड़ू उठाई और निकल पड़ीं सफ़ाई अभियान पर,
हम उनके इस जज़्बे को सलाम करते हैं, जिन्होंने जब शहर को गंदा देखा तो उनको भी दुःख पंहुचा,
हमारा मानना है यदि कोई और भी नैनीताल की सड़कों को साफ़ करने निकलते तो वो भी एक सलाम के हक़दार बनते,
लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ,
खैर,
नलिनी नेगी को आज़ाद मंच
उनके नैनीताल के प्रति दिखाए गए जज़्बे के लिए सलाम करता है,
हमें ख़ुशी है नैनीताल को अपना समझने वाले प्रत्याशी भी हैं मैदान में।

<

p style=”text-align: justify;”>(नोट:- हमारा किसी प्रत्याशी के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है हम हमेशा सकारात्मक सोच के साथ जुड़ते हैं)
आज़ाद मंच
नैनीताल से
🙏🙏🙏🙏

अंक-33 (16 नवंबर 2018) : आज गंदगी फैलाई, क्या कल सुबह सफाई अभियान चलाकर खुद को नगर का जिम्मेदार नागरिक साबित करेंगे भावी प्रथम नागरिक ?

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p style=”text-align: justify;”>एक अपील
हमारे शहर नैनीताल के
प्रथम नागरिक बनने का दावा करने वाले प्रत्याशियों,
आप सबको सादर प्रणाम,
चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन आप सबने जो शक्ति प्रदर्शन किया, वो तो लाजवाब था और
उससे भी कहीं ज़्यादा लाजवाब आपके समर्थकों का उत्साह देखने लायक़ था, जो आपकी मुहब्बत में इतना जज़्बाती हो गया कि जिस शहर की ज़िम्मेदारी हमारे प्रत्याशी महोदय उठाने को उतारू बैठे हैं, उसी शहर के दामन को पम्फ्लेट्स से पाटता चला गया, अब हमारा विनम्र निवेदन है कि यदि आप लोगों के मन में शहर के प्रति जितनी भी ईमानदारी, प्रेम, दया, करुणा, श्रद्धा या जो कुछ भी कहिये, यदि है तो हमें उम्मीद है कल शनिवार की सुबह चाहे जिसने हमारे शहर की खूबसूरती में चार चाँद लगाए हैं उससे कोई मतलब नहीं है लेकिन आपने प्रथम नागरिक वाली कर्त्तव्यनिष्ठा लेकर शहर में सफ़ाई करवानी होगी, चुनाव प्रचार बंद हुआ है, सफ़ाई अभियान नहीं,
ध्यान रहे जनाब,
ये निवेदन केवल उन लोगों के लिये है जो नैतिकता की परिभाषा समझते हैं, अब जिन लोगों को नैतिकता किसी चिड़िया का नाम प्रतीत हो, उनका 18 नवंबर भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता,
अंत में
हमारा किसी प्रत्याशी विशेष से कोई सरोकार नहीं है,
हमारा निवेदन केवल उन लोगों से है जिनकी कर्त्तव्यनिष्ठा से हमारे नैनीताल शहर की शोभा कल बढ़ सकती है, हमें
उम्मीद है कल नैतिकता की जीत होगी, नैनीताल के सच्चे प्रेमी हो तो हमारे निवेदन को शहर का निवेदन समझकर कल सुबह एक सफ़ाई अभियान आप ज़रूर चलाएंगे,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद मंच
नैनीताल से
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अंक-32 (16 नवंबर 2018) : काश, आचार संहिता यूँ ही लागू रहे…

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p style=”text-align: justify;”>संविधान तेरा शुक्रिया,
जो तूने लोकतंत्र बनाया,
लोकतंत्र तेरा धन्यवाद,
जो तूने चुनाव बनाये,
चुनाव तेरा आभार,
जो तूने नेता बनाये,
नेता तेरा एहसान,
जो तूने रिश्ते बनाये,

<

p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
इस आपा-धापी वाली ज़िंदगी में मनुष्य अपने जीवन में खुद को ही समय नहीं दे पा रहा है, तो वो अपने परिवार को क्या समय देगा, जब वो परिवार को समय नहीं दे पाएगा तो रिश्तेदारों को क्या ख़ाक दे पाएगा, फिर दोस्त या पड़ोसियों के लिये कौन वक़्त की सुराही में से जाम निकालकर देगा,
संडे आने की जितनी ख़ुशी होती है, उससे कहीं ज़्यादा उसके जाने का ग़म होता है,
फिर मंडे से लेकर सैटरडे तक दिन के उतार- चढ़ाव को
उतारते-चढ़ाते माथे का पसीना घुटनों तक आ जाता है, इतनी तपस्या के बाद, तब कहीं जाकर संडे की सुनहरी सुबह नसीब होती है और वही सुबह कब शाम में बदल जाती है, पता नहीं लगता और दिन हाथ से रेत की तरह फिसलता जाता है, आज का इंसान इसी संडे-मंडे में उलझा हुआ होता है कि जनाब, अचानक चुनावी घोषणा हो जाती है, फिर तो गली, घर, मोहल्लों से निकलते हुए रिश्तेदारी पूरे शहर में घूमने लगती है, चुनाव के मौसम में भूले-बिसरे रिश्ते ऐसे निकलकर आते हैं, जैसे गधे के सर से गायब हुए सींग वापस आ जायें,
चाचा, ताऊ, मामा, मौसी के बाद कौन सा रिश्तेदार, किस श्रेणी में आता है, वो बस एक आदर्श नेता ही बता सकता है,
अपनी गणित इस मामले में ज़रा कमज़ोर है भाईसाब,
भला हो इस चुनावी मौसम का जिसकी बारिश में नेताजी ने हमारे बिछड़े सारे रिश्तेदारों को मिलाने के साथ-साथ उन लोगों को भी रिश्तेदार बना दिया हैै, जिनसे हमारा दूर-दूर तक कोई नाता न था, वाह भला हो हमारे नेताजी का, जो इतना बड़ा हृदय रखते हुये एक साथ इतने लोगों की अनसुलझी रिश्तों की डोरी को भी सुलझाते फ़िरते हैं, वे दोनों हाथों से रिश्तों की नाव में ऐसा चप्पू चलाते हैं, जिसमें बैठने वाला भी हैरान और बैठाने वाला भी हैरान,
कश्ती में छेद भले हो जाये लेकिन खोज किया हुआ रिश्ता चुनाव रुपी किनारे तक अवश्य ले जाया जाता है और असली खेल तो तब शुरू होता है, जब हम नेताजी को भाईचारे में तड़का लगाने के लिये दुहाई दे रहे होते हैं और चुनाव परिणाम उनकी थाली से निकलकर किसी और का लड्डू बन जाये, फिर तो जनाब कैसी रिश्तेदारी, किसकी रिश्तेदारी, गुस्से में टमाटर की तरह लाल हुये नेताजी अपने गिने-चुने, खुले समर्थकों के अलावा किसी और को पहचानते तक नहीं,
जी हाँ, यही हाल जीत का लड्डू अपनी थाली में रखकर बैठे हुए उन महाशय का भी होता है,
कुल मिलाकर लड्डू मिले या न मिले, ये रिश्तों के मसीहा फिर उन्हीं रिश्तेदारों की तरह कहीं खो जाते हैं, जिन्हें ढूंढ़कर ये कभी हमारे पास लाते हैं,
काश, कितना अच्छा होता अगर 5 साल की जगह इनका केवल एक साल का कार्यकाल होता और 4 साल तक भरसक चुनाव प्रचार, जिसमें नेताजी यूँ ही रिश्तों के तार से तार जोड़ते जाते, जनता की प्लेट में पुलाव रहता और जेब में गुलाबी गाँधी मुस्कुराते, क्षेत्रवासियों की सुबह और शाम दावतों में गुज़रती, आचार संहिता के डर से ही सही लेकिन लोग एक दूसरे के गले तो मिलते, वाह ग़ज़ब का नज़ारा होता वो भी,
मेरी तो ख़्वाहिश यही है,
काश, आचार संहिता यूँ ही लागू रहे और चुनावी मौसम में समर्थकों से लेकर नेताजी तक में आज जैसा अगाध प्रेम उमड़ रहा है ये प्रेम ज्वाला यूँ ही हमेशा जलती रहे,
अंत में
नैनीताल के समस्त नागरिकों से हमारा अनुरोध है कि 18 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करें, आपका एक मत किसी की हार अथवा किसी की जीत को निर्धारित कर सकता है, इसलिये मतदान ज़रूर करें।
साथ ही मतदान आपको ये आत्मविश्वाश भी देता है कि जो पदाधिकारी आप चुनकर लाये हैं यदि वो अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से नहीं निभा पाता तो आप उससे अपनी शिकायत पूर्ण अधिकार से कह सकते हैं। वरना जब आपने ही मतदान दिवस को केवल अवकाश बनाकर रख दिया तो आप भी तो अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं क़र रहे, इसलिये मताधिकार का अवश्य प्रयोग कर, नगर पालिका, नैनीताल की नई कार्यकारिणी के गठन में जरूर सहयोग करें।
धन्यवाद !

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-31 (14 नवंबर 2018) : कब होंगे हम ‘,ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ से आज़ाद ??

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p style=”text-align: justify;”>मेरा मानना है
ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान, आज़ाद मंच परिवार के समस्त सदस्यों ने देखनी चाहिये,
जिसमें एक ‘आज़ाद गिरोह’ का संघर्ष अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ दिखाया गया है, जैसे यहां हमारे￰
‘आज़ाद मंच’ का संघर्ष अस्त व्यस्त लचर व्यवस्था के ख़िलाफ़ जारी है, जी हाँ, फ़िल्म में तो 2:44:07 घंटे में सब कुछ ठीक हो गया था, अंग्रेज़ मारे गये, देश अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद तो हो गया लेकिन कुछ बरस बाद से ही भ्रष्टाचार की गिरफ़्त में आ गया था। तब से रगों में ज़हर की तरह फैलते इस भ्रष्टाचार से हमें कब आज़ादी मिलेगी, कब हमारे कार्यालयों में बिना रिश्वत लिए फाइल आगे बढ़ेंगी, कब सरकारी स्कूल में ‘मिड डे मील’ के नाम पर धांधली चलेगी और अच्छी शिक्षा मिलेगी, कब निजी स्कूल व कॉलेज में शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का लूटना बंद होगा, कब सरकारी अस्पतालों की हालत में सुधार होगा…

<

p style=”text-align: justify;”>कब निजी अस्पतालों में बिल बढ़ाने के चक्कर में मुर्दे को वेंटीलेटर पर रखकर जीवनदान देने का नाटक चलेगा, हर काम आसानी से हो जाये की हमारी आदत ने पैसे दे देकर उन लोगों के रास्ते भी बंद कर दिए, जो बेचारे पैसे देने में असल में असमर्थ हैं, अब चिकित्सक सरकारी अस्पताल में मरीज़ों को इसलिये सही से नहीं देखते क्योंकि शाम को उन्हें अपने क्लिनिक पर जो बैठना होता है…
पता सबको है लेकिन बोलना कोई नहीं चाहता क्योंकि ये उनके घर का मामला नहीं है या इससे उनके काम नहीं रुक रहे, आज का मनुष्य इतना बड़ा प्रोफेशनल हो गया है, अगर उसको भूख न लगे तो वो खाने को न पहचाने और प्यास न लगे तो पानी को,
माँ-बाप का दर्जा तो आपको पता ही है आश्रमों की ऊँचाई तक पहुंच गया हैं, कुल मिलाकर कहने का मक़सद ये है कि आज़ादी से पहले हमें सिर्फ़ गोरों से डर था, बाक़ी सब लोग ठीक थे, लेकिन अब न गोरे हैं न उनका ख़ौफ़, फिर क्यों सारी व्यवस्थायें मात्र पैसे पर टिक गयी हैं,
पैसे को ही हर जगह का सर्वेसर्वा क्यों बना दिया गया है, आख़िर क्यों ?
अंत में,
सबसे हमारा अनुरोध है कि माना पैसा बहुत कुछ है लेकिन इतना भी नहीं की उसकी ग़ुलामी की जाये, जिस दिन हमने पैसों के लिये मरना छोड़ दिया, उसी दिन से हम जीना सीख जाएंगे,
किसी ने सच ही कहा है, पैसा मनुष्य के लिए बनाया गया था लेकिन मुश्किल तब से शुरू हुई जब से पैसे के लिये मनुष्य बनने लगे, फिर तो पैसा कमाने की होड़ ने मनुष्य को न ज़मीन का छोड़ा न आसमान का, हम अपने ही हिंदोस्तान को ठगने लगे, अब समय आ गया है, हमें पैसों की मानसिक ग़ुलामी से आज़ाद होना ही पड़ेगा, भ्र्ष्टाचार जैसी ठगी से आज़ादी लेनी पड़ेगी तभी असल में हम ‘आज़ाद’ हो पाएंगे, हमारा देश ‘आज़ाद हो पाएगा..

(नोट:- कृपया इस लेख को ये कहकर नकारा न जाये कि आज स्वतंत्रता दिवस थोड़ी न है जो ऐसा लिखा है, ग़ुलामी और आज़ादी की बात किसी भी दिन हो सकती है, लोगों ने ये ट्रेंड बना लिया है कि देशभक्ति की बात बस 15 अगस्त या 26 जनवरी को होगी, बाक़ी के दिन देशभक्ति रेस्ट पर रहेगी, जो सरासर ग़लत अवधारणा है, देशभक्ति हमेशा जागृत रहनी चाहिये, एक देशभक्ति ही है जो हमें हर बुरी भावना से दूर कर सकती है)

अंक-30 (12 नवंबर 2018) : नैनीताल का प्रथम नागरिक बनना है; बस, समाज का सामना नहीं करना है…

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p style=”text-align: justify;”>आज़ाद मंच द्वारा समाज के लोगों को साथ लेकर रविवार को एक आम सभा ‘प्रश्न मंच’ का आयोजन श्रीराम सेवक सभा, मल्लीताल, नैनीताल में किया गया, जिसका उद्देश्य समस्त प्रत्याशियों को एक मंच पर लाकर एक साथ समाज से रु -ब-रु कराना था,
जिसमें एक  (राष्ट्रीय दल-बसपा) के उम्मीदवार श्री रईस अहमद अंसारी तथा निर्दलीय प्रत्याशियों में से श्रीमती नलिनी नेगी (जिन्होंने समय से पहुंचकर समय की पाबन्दी का परिचय भी दिया) व नीरज जोशी ने उपस्थिति दर्ज कर आम नागरिकों के सवालों के जवाब दिये, हम उस मुद्दे पर नहीं जाएंगे कि किसने कितने अच्छे प्रकार से जवाब दिए या किसने नहीं दिये बल्कि यहां हम उनके जज़्बे की क़द्र करते हैं जो उन्होंने अपनी प्रथम नागरिक वाली ज़िम्मेदारी को समझा, समाज को समझा और आकर सबके सवालों के बेबाक़ी से जवाब दिये, हम समस्त प्रत्याशियों को समाज से डायरेक्ट जोड़ना चाह रहे थे,
लेकिन सवालों का सामना करने केवल तीन प्रत्याशी पहुंचे,
हम ये नहीं कहना चाह रहे हैं कि हमारा किसी दल या किसी विशेष व्यक्ति से कोई द्वेष है, बल्कि हम यहां अपनी निराशा व्यक्त कर रहे हैं, निराशा ये है कि जनता आपको सुनना चाहती थी,
लेकिन आप पर्दे के पीछे छिप गये,
जनता आपके विचारों को जानना चाहती थी लेकिन आपने जनता के इस विचार को ही विचाराधीन बना दिया,
हम ये क़ुबूल करते हैं कि ‘आज़ाद मंच’ (सामाजिक संस्था) कोई ब्रांड नहीं है , शायद ये सोचकर आपमें से कई लोग ‘प्रश्न मंच’ में नहीं पहुंचे, लेकिन आपने उस जनता की भावनाओं का अपमान किया है जो आपसे उम्मीदें लगाये बैठी थी, सब इसी आस को लेकर बैठे थे कि शायद राष्ट्रीय पार्टी भाजपा व कांग्रेस, क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल प्रत्याशी स्वयं आएंगे अपितु नैतिक ज़िम्मेदारी के आधार पर पार्टी या दल का कोई प्रतिनिधि अवश्य भेजेंगे लेकिन इनमें से किसी ने ऐसा करने की ज़हमत नहीं उठाई, उन्हें तो पार्टी से टिकट मिल गया है काफ़ी है, पार्टी के सिद्धांत या जनता की भावनाओं से उन्हें कोई सरोकार नहीं है, ये तो रही बड़ी पार्टी अथवा दल की बात लेकिन हमारी समझ से परे, अब भी ये है कि (नीरज जोशी और नलिनी नेगी के अलावा ) बाक़ी निर्दलीय प्रत्याशियों को क्या हुआ जो ये कहते हैं हमारा किसी दल से कोई मतलब नहीं हैं हम आपमें से ही एक हैं , हमारा उन समस्त अनुपस्थित निर्दलीयों से सवाल है साहब,
जो जनता पलकें बिछाकर आपका इंतज़ार क़र रही थी वो भी तो आपमें से ही थी, उनको मायूस क्यों किया आपने?
या आप सबको इस कार्यक्रम के लोगों से परहेज़ था, तो जनाब आपकी जानकारी के लिए बता देते हैं नैनीताल के प्रत्येक कोने से कोई न कोई मतदाता ज़रूर आया था तो क्या अब आप डोर टू डोर में उसका दरवाज़ा छोड़कर आगे बढ़ जाएंगे जो इस कार्यक्रम में आया था और उसके मन में आपके विचारों को जानने की बहुत जिज्ञासा थी, क्योंकि आपको तो सवालों को स्किप करना आता है,
अंत में,
हम कार्यक्रम में उपस्थित तीनों प्रत्याशियों रईस अहमद अंसारी (बसपा), नीरज जोशी व नलिनी नेगी (निर्दलीय) के जज़्बे को सलाम करते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं कि उनमें जीत से पहले भी जनता के सामने आकर जवाब देने का साहस है, तो उनसे ये भी उम्मीद की जा सकती है कि वो जीत के बाद वीआईपी नहीं बन जाएंगे जनता के किसी सवाल से मुंह छिपाते नहीं फिरेंगे,
हमारा मानना है कि शायद आप कहीं व्यस्त भी थे तो कम से कम अपना कोई सन्देश ही जनता के बीच भिजवा देते हम उसको बाइज़्ज़त पढ़कर सुनाते,
ख़ैर,
कोई बात नहीं कुल मिलाकर आपने आना उचित नहीं समझा,
बाक़ी क्या उचित है क्या अनुचित
जनता का निर्णय सर्वोपरि होगा,
हमने तो बस नैनीताल के प्रथम नागरिक बनने का दावा करने वालों को जानने व समझने की कोशिश के लिए जनता को एक माध्यम दिया था, लेकिन शायद आप गुप चुप नीति के पक्षधर हैं जो खुली चर्चा में आने से किनारा कर गए…
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है…

(नोट : ‘नवीन समाचार’ के इस कॉलम ‘आज़ाद के तीर’ के बारे में आप इसके लेखक से 09756293651 नंबर पर सीधे संपर्क सकते हैं।)

अंक-29  (11 नवंबर 2018) : बंद कीजिये पानी की कटौती या रोकिये लीकेज

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल में पानी की कटौती के साथ पानी की बर्बादी के दृश्य कम होने का नाम नहीं ले रहे,
मुख्य डाक घर मल्लीताल नैनीताल के गेट के निकट
पिछले 24 घंटे से पानी केेई लाइन टूटी पड़ी है। लेकिन किसी का ध्यान इस पर नहीं जा रहा है,
वैसे पीने के लिए जल संस्थान के पास पानी नहीं है, लेकिन नालों में बहाने के लिए न जाने कहाँ से इतना पानी आ जाता है ?
अब तो लगता है एक-आध नाले का रुख अपने घर की तरफ मोड़ना पड़ेगा, शायद फिर कहीं से पानी लीक हो और सीधे हमारे घर आये क्योंकि विभाग के माध्यम से तो बस बिल ही मिलता है, पानी तो लीकेज से लेना पड़ेगा ,
ऐसा उद्देश्य लगता है जल संस्थान का …
अंत में,
हमारा अनुरोध है कि या तो ‘पानी नहीं है’ का ड्रामा बंद करिये या पूरे नगर में हो रही जगह जगह लीकेज से पानी की बर्बादी तत्काल रोकें,
ये हमारा विनम्र निवेदन है,

सावधानी ही पहला समाधान है।

अंक-28  (10 नवंबर 2018) : सावधान ! हम आपको नौंच खाने को तैयार बैठे हैं !!

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p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
एक बार फिर यह चित्र किसी गांव या कस्बे का नहीं है, बल्कि माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय, जिस जगह अपनी विशेष खूबसूरती बिखेरने वाले शहर नैनीताल का है, यहां की एक ख़ास बात और है कि यहां आप जब भी पहुंचेंगे आपके स्वागत के लिये 10-12 आवारा कुत्ते ज़रूर तैनात होंगे, जो हर गली, मोहल्लों में अपना झुण्ड बनाये मिलेंगे, ये हमारी प्यारी नगर पालिका की तरफ से विशेष सुविधा दी गयी है, यदि इत्तेफ़ाक़ से आपका रात 10 बजे के बाद और सुबह 7 बजे से पहले नैनीताल में प्रवेश होता है, तब तो आपको कुछ फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं होगी, 10-12 मेहमाननवाज़ों का ख़्वाब फिर आप भूल जाइये क्योकि उस वक्त पूरी की पूरी बारात आपके स्वागत में खड़ी होगी और निःशुल्क सेवा देते हुए आपको होटल या कमरे तक छोड़ा जाएगा, हाँ उसमें रनिंग से आपकी साँस ज़रूर फूल सकती है तो घबराइयेगा नहीं बल्कि शुक्र मनाइयेगा कि आप सही सलामत अपनी मंज़िल तक पहुंच गये, क्या कहा भेदभाव,
नहीं, नहीं जनाब,
जानवर कहाँ भेदभाव करते हैं
वो तो इंसानों का महंगा शौक़ है,
और ये आवारा कुत्ते, यहां केे बाजार की तरह पर्यटक हो या स्थानीय नागरिक किसी में फ़र्क महसूस नहीं करते। कुछ समय पहले की बात बताऊं,
एक पर्यटक की मासूम बच्ची की मौत का कारण यही आवारा कुत्ते बने थे, जिसमें वो बच्ची तल्लीताल स्थित लकड़ी टाल के पास गिर गयी थी, गंभीर चोटें आने के बाद उसकी मौत हो गयी थी, अफ़सोस…
लेकिन
प्रशासन ने उस घटना से भी सबक़ नहीं लिया क्यूँकि उनका इरादा अभी शायद कुत्तों को लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाने का है,
ख़ैर,
अभी एक दो दिन पहले एक स्थानीय महिला को मॉर्निंग वॉक के दौरान सुबह 7 बजे के आसपास मॉल रोड एचडीएफसी बैंक के पास किसी आवारा कुत्ते ने काट लिया था,
जिनको अस्पताल में तुरंत ले जाया गया तथा हर सम्भव उपचार किया गया,
साहब,
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती,
आज उक्त महिला को काटा हैं,
कल किसको काट लें कुछ नहीं कहा जा सकता,
पालिका प्रशासन ने मॉल रोड लाइब्रेरी के सामने कुत्तों से बचने के उपाय सम्बन्धी एक बड़ा सा होर्डिंग लगाक़र अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है,
और हाथ झाड़े भी क्यों न?
स्थानीय लोगों या पर्यटकों को कुत्ते काटते हैं तो काटें, उनकी बला से, उनकी आँख में शर्म का बाल होता, तो कोई असर भी होता। और इधर तो बताया जा रहा है कि इनकी आबादी में कटौती करने के लिए इनके ऑपरेशन करने वाली संस्था के साथ भी कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया है।

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p style=”text-align: justify;”>और उधर शर्दियों में स्कूलों की छुट्टियां होने के बाद बन्दरों-लंगूरों का आतंक बढ़ना भी तय है।
ख़ैर,
अंत में,
मा.उच्च न्यायालय, आयुक्त महोदय, ज़िलाधिकारी महोदय, अधिशासी अधिकारी नगर पालिका परिषद् नैनीताल से हमारा अनुरोध है कृपया
आवारा कुत्तों तथा बंदरों का कुछ ठोस उपाय करें जिससे
शहरी बाशिंदों के साथ-साथ बाहरी मेहमान भी नैनीताल की सरज़मीं पर बेख़ौफ़ होकर कभी भी घूम सके, उनका स्वागत इंसानों के द्वारा हो न कि उन्हें शिकार बनाने की घात लगायेेे।

अंक-27  (9 नवंबर 2018) : 18 वर्ष के युवा हो रहे उत्तराखंड के दिन देखें मॉल रोड पर 5 वर्ष के मासूम बच्चे-बच्चियां के नशा लेने की भयावह तस्वीर

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p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
आज 18 वर्ष के युवा हो रहे उत्तराखंड के दिन जो तस्वीर आप देख रहे हैं वो किसी गांव, देहात की नहीं है बल्कि देवभूमि उत्तराखंड राज्य की सबसे ख़ूबसूरत नगरी,
सरोवर नगरी नैनीताल के मॉल रोड का है,
तो जनाब,
आपको सबसे पहले बच्चों का जनरल इंट्रोडक्शन दे देते हैं,
इस तस्वीर में महज़ 4 बच्चे दिखाई दे रहे हैं, ये एक सच है लेकिन दूसरा सच ये है कि ये करीब 20-25 बच्चे होंगे,
जो हर रोज़ शाम को मॉल रोड पर अपना झुण्ड लेकर निकलते हैं, (मॉल रोड पर घूमने वाले ख़ुशनसीब लोग कहानी समझ गए होंगे, बाक़ी लोगों के लिए आगे अर्ज़ हैं ) मात्र 5 से 10 साल तक के ये मासूम नियमित तौर पर अपने हाथों में ग़ुब्बारे लेकर आते हैं और ₹10 का एक गुब्बारा टूरिस्ट या लोकल लोगों को बेच देते हैं,
हाँ ये भीख मांगने से ज़्यादा
अच्छी बात है, हमने भी एक-आध बार उनके ग़ुब्बारे,
ये सोचकर खरीद लिये कि क्या पता इनके घर में क्या मजबूरी है, जो ये मासूम इतनी सी उम्र में व्यापार करने निकल पड़े,
इतना सोचकर ज़िम्मेदारी से हाथ झाड़ते हुये हम भी वहां से चल दिये, दुःख तो तब पहुंचा जब एक दिन अचानक मॉल रोड से गुज़रते हुये इन बच्चों पर नज़र पड़ी, ग़ौर से देखा तो ये बच्चे कुछ सूंघते दिखाई पड़े, पास जाकर जैसे ही इनकी फ़ोटो लेनी चाही, तो सारे बच्चे तितर-बितर हो गए बस 4 नशे में मशगूल बच्चे ही समझ नहीं पाये और वो कैमरे में क़ैद हो गए, तस्वीर में 3 बच्चे कुछ नशीला पदार्थ सूंघ रहे हैं,
बाक़ी बच्चे अपना-अपना नशा लेकर भाग गये हैं,
क़ाबिलेगौर बात ये है कि इनमें सब लड़के ही नहीं हैं कुछ लड़कियां भी शामिल हैं, जो नशे की गिरफ़्त में हैं…
अब सीधे मुद्दे पर आते हैं,
माना कि बच्चे भीख नहीं मांग रहे, मजबूरी में गुब्बारे बेचकर घर चला रहे हैं, लेकिन इस बात को यक़ीन के साथ हम तब मानते जब ये बच्चे ग़ुब्बारे बेचकर
आये पैसों से नशा नहीं खरीदते,
अब दूसरा पहलू ये है कि इन बच्चों के माँ-बाप कहाँ हैं
(इस संबंध में हमने बच्चों से बात करनी चाही लेकिन बच्चों ने कोई जवाब नहीं दिया और वे भाग गये)
या ये बच्चे किसी गिरोह के शिकार हैं या कुछ और ?
इसके पीछे की कहानी कुछ भी हो लेकिन वर्तमान हालात ठीक नहीं हैं।
नशा मॉल रोड तक आ पंहुचा है। उस मॉल रोड तक, जहाँ से प्रतिदिन न जाने कितनी संख्या में स्थानीय नागरिकों के तथा कुछ कम संख्या में पर्यटकों के बच्चे इन नशेबाज़ बच्चों के पास से गुज़रते होंगे और उनको नशा सूंघते हुए भी ज़रूर देखते होंगे,
इसका उनपर क्या असर पड़ता होगा, ये आप भी समझ सकते हैं और हम भी लेकिन जो अपनी आँखों पर पट्टी और मुंह पर फेवी क्विक लगाकर बैठा है वो है नैनीताल का प्रशासन,
क्या प्रशासन के किसी अधिकारी तक अब तक ये बात नहीं पहुंची या जानबूझ कर भी सब अनजान बने हैं, (इसमें पुलिस प्रशासन भी शामिल है, उनको अलग से निमंत्रण नहीं भेजा जाएगा )
क्यों अभी तक उन नशे की गिरफ़्त में आ चुके बच्चों के लिये कुछ सोचा नहीं गया?
क्यों अभी तक उनसे पूछताछ करके उनके परिजनों तक ये मामला नहीं पहुंचाया गया?
क्यों अभी तक पुलिस व प्रशासन मौन है ?
क्यों रिक्शा स्टैंड तक ही पुलिस महदूद यानि सीमित रहती है, आगे माल रोड में क्या चल रहा है उससे पुलिस बेपरवाह क्यों रहती है,
आख़िर क्यों ?
अंत में,
प्रशासन के उच्चाधिकारियों से हमारा अनुरोध है कि बच्चे देश के कर्णधार हैं, भविष्य हैं,
तो क्यों न उक्त बच्चों को नशे की गिरफ़्त से बाहर लाकर,
एक नेक कार्य किया जाये,
क्यों न सड़क पर भटकते हुये बचपन को किसी स्कूल में शिक्षा दी जाये,
क्यों न देश के भविष्य की अच्छी परवरिश की जाये जिससे निकट भविष्य में परिणाम भी सुखद मिलें,
केवल पढ़ेगा इंडिया,
तभी तो बढ़ेगा इंडिया,
कह देने से हमारे देश की तस्वीर नहीं बदल सकती उसके लिये हमें कुछ सख़्त पहल भी करनी होगी…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-26  (8 नवंबर 2018) : नैनीताल में आचार संहिता का हो रहा है उल्लंघन, गहरी नींद में सोया चुनाव आयोग !

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p style=”text-align: justify;”>हमारे शहर में चुनाव की बेला क्या शुरू हुई, वार्डों में स्वच्छता अभियान का दम्भ भरने वाली पार्टी विशेष के उम्मीदवार सहित कई दलीय-निर्दलीय सभासद प्रत्याशी, अपनी पार्टी की छवि व देश के मुखिया के सपनों को धूमिल करने में लगे हुए हैं, साथ ही उनके क्षेत्र में आने वाली निजी संपत्ति तथा सरकारी संपत्ति को अपने प्रचार -प्रसार का माध्यम बनाकर आचार संहिता का अचार डालकर भद्दा मज़ाक़ बना रहे हैं। उदाहरण के लिये एक प्रत्याशी ने तो विशेष तौर पर एस आर गर्ल्स हॉस्टल के गेट पर, डीएसबी कैंपस की दीवार पर, आंगनबाड़ी केंद्र, जल संस्थान की पानी की टंकियों पर व तमाम निजी दीवारों पर अपने प्रचार के पोस्टर लगाए हुए हैं,
इससे आचार संहिता की अवहेलना तो हो ही रही है,
साथ-साथ उनकी मंशा भी ज़ाहिर हो रही है कि उन्हें अपने प्रचार के सामने अपनी पार्टी के सिद्धांतों की भी परवाह नहीं हैं।

यही स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी नज़र आ रही है-

बिजली के पोलों, पानी की टंकियों, सरकारी भवनों, दीवारों तक को छोटे-बड़े स्टीकरों, होर्डिंग को तक नहीं छोड़ा गया है। निजी भवनों पर भी बिना पूछे दबंगई दिखाते हुए प्रचार सामग्री लगा दी गयी है।

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p style=”text-align: justify;”>अंत में,
हमारा सर्वप्रथम पार्टी प्रत्याशियों से आग्रह है कि वो अपनी पार्टी के उद्देश्यों व सिद्धांतों का सम्मान करते हुये, शीघ्र अति शीघ्र अपनी प्रचार सामग्री को निजी व सरकारी संपत्ति से हटाकर सफ़ाई अभियान को आगे बढ़ाएं और एक सभ्य कार्यकर्ता व जागरूक नागरिक होने का परिचय दें,
इसके साथ ही निर्वाचन आयोग से हमारा अनुरोध है कि वो भी इस दिशा में कोई ठोस क़दम उठायें ताकि निकट भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हों,

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p style=”text-align: justify;”>नोट:- हमारा किसी पार्टी विशेष से कोई सरोकार नहीं है, यदि आपको भी कोई प्रत्याशी आचार संहिता का उल्लंघन करता हुआ दिखाई देता है तो आप भी हमें सूचित कर सकते हैं, हम उतनी ही बेबाक़ी से अपनी बात रखेंगे,
क्योंकि देश है सर्वप्रथम…

🙏जय हिन्द,जय उत्तराखंड🙏

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-25  (7 नवंबर 2018) : अध्यक्ष पद के उम्मीदवार- नोटा भाई और मोटा भाई

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p style=”text-align: justify;”>हमारे शहर में नगर निकाय चुनाव प्रचार – प्रसार ज़ोरों पर है क्योंकि आगामी 18 नवंबर को मतदान होना है सभी प्रत्याशियों ने कमर कस ली है लेकिन ‘नोटा भाईसाब’ कहीं नज़र नहीं आ रहे, हमने तो सुना था पीयूसीएल संस्था ने इनके लिए 2004 से अदालती लड़ाई लड़ी फिर कहीं 10 साल की कड़ी मेहनत के बाद
‘नोटा भाईसाब’ अस्तित्व में आये और पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में खड़े भी हुए, जिसमें बिहार राज्य में
5 लाख 81 हज़ार 11 मतदाताओं ने इनको चुना था
वहीं गुजरात में
4 लाख 54 हज़ार 880 मतदाताओं ने सभी प्रत्याशियों को नकारते हुये इन पर भरोसा किया था,
तब से हमारे देश में ‘नोटा भाईसाब’ हर चुनाव में अपने देश वासियों का मन टटोलने आ जाते हैं कि कितने लोग राजनैतिक अथवा निर्दलीय किसी भी दल के प्रत्याशियों को पसंद नहीं कर रहे, कितने लोगों में कितना रोष है, जो इन सबको क़ाबिल मानते ही नहीं, बस उन्ही का दुखड़ा सुनने
‘नोटा भाईसाब’ हर चुनाव में पहुंच जाते हैं, इन भाईसाब की ख़ासियत ये है कि न तो इनका नामांकन होता है, न कोई पोस्टर, न कोई बैनर, बस एक चुनावी निशान होता है ‘गुलाबी रंग का बटन’ और ये गुलाबी रंग का बटन भी सबसे नीचे दिया होता है, जहाँ तक किसी मतदाता की नज़र जाने से पहले कोई न कोई बटन ऊपर ही दब जाता है, फिर वो मुस्कुराता हुआ गुलाबी बटन को देखकर बस यही कह पाता है,
ओह! ‘नोटा भाई’ आप भी थे सॉरी बट किसी ने आपके बारे में बताया नहीं, कोई कह रहा था मेरे ‘मोटा भाई’ खड़े हैं कोई कह रहा था मेरी पार्टी को वोट देना वगैरह – वगैरह लेकिन किसी ने भी यहां तक सरकार के किसी नुमाइंदे ने भी आपका ज़िक्र नहीं किया, मैं तो ऐसा ही उम्मीदवार ढूंढ रहा था जो मेरा रोष लेकर सरकार तक जाये कि मैं तंग आ गया हूँ अपने मताधिकार का ज़बरदस्ती प्रयोग करते करते, कोई भी जीते, सबका हाल वही हो जाता है, आख़िर में आम जनता ही पिसती रह जाती है,
आम नागरिक को तो बस सरकारी कार्यालयों में जूते घिसने पड़ते हैं, जैसे वोट मांगने के लिए ये नेता लोग घर – घर जाते हैं कभी चुनाव जीतने के बाद
किसी घर में जाकर पूछते हैं कि किसीको कोई परेशानी तो नहीं है, मुझे इसी बात का दुःख है
‘नोटा भाई’ चुनाव के बाद कोई भी अपने क्षेत्र में जाकर नहीं देखता, अब आप आये हो तो लगता है एक उम्मीद जागी है कि अगर ‘मोटा भाई’ ने सही ढंग से काम नहीं किया तो हमारे पास एक विकल्प ‘नोटा भाई’ भी है,
सबको मज़े चख़ाने के लिये,
अंत में,
NOTA का
None Of The Above पूरा नाम है NOTA का बटन ईवीएम में सबसे अंतिम होता है, जिसका रंग गुलाबी होता है, किसी भी दल अथवा पार्टी का कोई भी नेता पसंद न हो तो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, उक्त जानकारी सरकारी स्तर पर भी दी जानी चाहिये लेकिन कोई भी सरकार
ये नहीं चाहेगी कि उसके प्रत्याशी को कोई पसंद न करे, इसलिए मतदाता के इस अधिकार की जड़ों में तेज़ाब डाला जा रहा है ताकि ये 4 वर्षीय पौधा कभी वृक्ष न बन पाये…

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p style=”text-align: justify;”>नोट:- हमारा उद्देश्य केवल नोटा के प्रति जागरूकता फैलाना है, किसी पार्टी, दल या निर्दलीय किसी भी प्रत्याशी के ऊपर आशंका करना अथवा करवाना नहीं है,
कृपया इस लेख को सकारात्मक रूप से लें, व्यक्तिगत न लें…
धन्यवाद

अंक-25  (6 नवंबर 2018) : नैनीताल की बदलती तस्वीर

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p style=”text-align: justify;”>किसी ने सच ही कहा है अगर जज़्बा हो तो आसमान में भी सुराख़ हो सकता है, बस लगन और हिम्मत होनी चाहिये,
‘आज़ाद मंच’ और ‘नवीन समाचार’ के संयुक्त प्रयास अब रंग लाने लगे हैं, नैनीताल के अघोषित कूड़ाघरों से कूड़ा हटाया जा रहा है, जो कूड़ेदान सुबह से शाम तक फुल रहते थे, अब उनको नियमित रूप से ख़ाली किया जा रहा है,
इसके लिए हम सीधे तौर पर नैनीताल नगर पालिका के स्वच्छता सिपाहियों का ही हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहेंगे, जिन्होंने हमारी बात समझी और उस पर अमल भी किया,
अब रही बात नरभक्षी बन चुके कुत्तों से तथा बंदरों के आतंक से निजात व सुरक्षा दिलाने की, जहाँ तक लगता है अब ये नगर पालिका की नई कार्यकारिणी गठन के पश्चात् ही कुछ हो पाएगा क्योंकि इस मामले हमारे प्रिय अधिशासी अधिकारी कोई ठोस क़दम उठाने में असमर्थ रहे हैं, असफ़ल होना फिर भी बड़ी बात है क्योंकि उसमें प्रयास करना पहली शर्त होती है लेकिन असमर्थता क़ायरता की जुड़वा बहन है,
हम आशा करते हैं आगामी पालिका की नई कार्यकारिणी ठोस क़दम उठाये, जिससे हमारा शहर पूरे देश में साफ व स्वच्छता की मिसाल पेश करे…

अंक-24  (5 नवंबर 2018) : मेरे सपनों का कमाऊ विश्वविद्यालय

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p style=”text-align: justify;”>ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि काश कहीं कोई ऐसा विश्वविद्यालय हो जहाँ मैं बिना कॉलेज जाये, रेगुलर स्टूडेंट बना रहूं, पांचों दिन धनिया बेचूं और छठे दिन कॉलेज चले जाऊँ, छठे दिन भी क्लास का मुंह देखने का मुझको सौभाग्य न मिले, क्यूंकि धनिया बेचकर मुझे छात्र राजनीति में ही उतरना है, इसलिए फोकस राजनीति पर ही रखना है, खेल -कूद, शिक्षा- दीक्षा हैं किस विश्वविद्यालय की मूली, मुझे तो बस अपना भविष्य सूरजमुखी करना है, जैसे-तैसे (परीक्षा में तो हम होशियार बनकर नकल कर लेंगे) परीक्षा पास हो जाऊँ और एक बार छात्र नेता बन जाऊँ, फिर तो पूरे
विश्वविद्यालय पर अपना और अपने चेलों का राज होगा,
फिर परीक्षा में नकलची बनने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, अपने छात्र नेता को पास करना विश्वविद्यालय का परम कर्त्तव्य बन जाएगा और मेरे साथ मैं अपने तमाम चेले चपाटों को भी लुढ़कने नहीं दूंगा, और अगर कोई ग़लती से (अरे भई, विश्वविद्यालय की) आपने क्या सोचा ख़ुद की ग़लती से, न न,
मेरा चेला और ग़लती, कभी नहीं,
वो कमाऊ विश्वविद्यालय नहीं जो परीक्षा में पर्चे के साथ ‘उत्तर कुंजी’ (Key)भी थमा दे… इसलिए उसकी इस हरक़त की क़ीमत विश्वविद्यालय को खुद ही चुकानी होगी, उसको पास करके, न तो कर ही नहीं सकते, क्यूंकि पिछवाड़े वाली खिड़की में किसीने सुतली बम तो फोड़वाना नहीं है, और अगर तब भी नहीं माने फिर हमारे पास है न, आत्मदाह की धमकी वाला ब्रह्मास्त्र वो चला देंगे,
ख़ैर,
मेरे साथ मैं अपने किसी मित्र को गोल नहीं होने दूंगा, ये मेरा दावा है,
क्या कहा?
आम छात्रों के बारे में क्या रवैया रहेगा, मेरे सपनों के विश्वविद्यालय के कर्मचारियों का???
भाई ये तो रिस्क फैक्टर में आएगा, इतना रिस्क तो छात्रों को लेना पड़ेगा,
नो रिस्क नो गेन, अगर उनका मूड सही हुआ और उनको लगेगा सुबह से कुछ काम नहीं किया, चलो, इसका कर देते हैं, तब तो हो जाएगा और अगर ग़लती से सुबह से उनकी बोनी नहीं हुई हो (क्या कहा वेतन, हाँ , हाँ पता है उनको वेतन मिलेगा, लेकिन पापी पेट का नाम तो सुना होगा बस उसी की ख़ातिर वहां के कर्मचारियों को बोनी भी करनी पड़ेगी)
फिर आम छात्र तो गया काम से, काम तो दूर की बात,
वो मान्यवर,आपकी तरफ देखेंगे भी नहीं और बहुत देर तक आप बुत बने खड़े रहे, तो हो सकता है दूसरी तरफ से आपका प्रार्थना-पत्र आपको हवाई जहाज़ बनकर मिले, इसलिए मौक़े की नज़ाक़त और कर्मचारी की हिमाक़त दोनों को भांपते हुये, अगले दिन ही आने की कोशिश करना और हो सके तो किसी का जुगाड़ लेकर आइयेगा, ध्यान रहे,
यदि जुगाड़ तगड़ा नहीं हुआ तो बोनी के लिये हरे या गुलाबी गाँधी (जिस स्तर का कार्य हो)अपनी जेब में डालकर लाना,
फिर देखना, मेरे सपनों के कमाऊ विवि के कर्मचारियों का दिमाग़ चाचा चौधरी (कॉमिक पात्र जिसका दिमाग़ कम्प्यूटर से भी तेज़ चलता है) से भी ज़्यादा तेज़ चलेगा और हाथ दिमाग़ से ज़्यादा तेज़ और आपका काम आज तक (न्यूज़ चैनल) से भी ज़्यादा तेज़ हो जाएगा,
तो देखा न प्रवेश से लेकर डिग्री निकालने तक हर काम जिस विश्वविद्यालय में जुगाड़ से या बोनी से हो जाये,
उस विश्वविद्यालय के छात्रों को कोई राजनीति, सॉरी, तरक़्क़ी करने से नहीं रोक सकता,
क्या आप मुझे बता सकते हैं
कि कभी मेरे सपनों के
‘कमाऊ विश्वविद्यालय’ का कहीं निर्माण हो पाऐगा,
क्या बनेगा कहीं ऐसा आदर्श
विश्वविद्यालय???
अगर कभी आपको पता लगे तो नीचे लिखे नंबर पर अवश्य बताइयेगा…

अंक-23  (2 नवंबर 2018)

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p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
24 अक्टूबर के अंक में हमने
नवीन समाचार के माध्यम से
जल संस्थान अब आंखें खोलो, पानी लाये हैं मुंह धो लो’ शीर्षक के साथ अल्का होटल के पीछे ज़िला पंचायत, नैनीताल कार्यालय वाली सड़क पर लीक हो रही सीवर लाइन का मुद्दा उठाया था, आज वहां जाकर
मौका मुआयना किया गया तो पाया कि लीक हुआ सीवर ठीक कर दिया गया है, हमने वहां इस बावत एक दुकानदार से पूछा तो उन्होंने हमें बताया कि शायद
लेख छपने के अगले दिन ही
जल संस्थान की ओर से कर्मचारी इसको ठीक करने आ गए थे, तब से अब तक तो कोई समस्या नहीं आई है, आगे राम जाने, उन्होंने हमें ये भी बताया कि अब स्कूली बच्चे साफ़ -सुथरी सड़क पर शान से चलते हुए अपने -अपने स्कूल जाते हैं, कोई महिला या पुरुष गंदगी से बचने के लिये अपने पैरों को देखते हुए नहीं जाते, बहुत सुकून मिल गया है अब,
साथ ही उन्होंने आज़ाद मंचनवीन समाचार को धन्यवाद भी कहा,
इस पर हमने उन्हें आज़ाद मंच का नंबर दे दिया है और आग्रह किया है समाज हित से जुड़ा कोई भी मुद्दा हो तो हमें अवश्य बताये,
ख़ैर,
अंत में,
हम जल संस्थान के अधिकारियों को धन्यवाद अर्पित करते हैं कि हमारी ख़बर का संज्ञान लेकर उन्होंने शीघ्र कार्रवाई की और बहती गंदगी को झील में जाने
से रोका, हम जानते हैं सीवर कहीं पर भी, कभी भी ओवर फ्लो हो सकती है लेकिन हम आशा करते हैं कि जब भी, जहाँ भी भविष्य में ऐसी समस्या उत्पन्न होती है तो इसी तरह मुस्तैदी से तत्काल कार्रवाई करते हुए,
महोदय
उस समस्या का निदान करेंगे और समाज को शुद्ध वातावरण प्रदान करने की कृपा करेंगे,
धन्यवाद।

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-23  (1 नवंबर 2018) : सावधान ! हम आपको काट खाने को तैयार बैठे हैं !!

अंक-23  (30 अक्तूबर 2018) : अवैध निर्माण में पेड़ों को तो बख़्स दो सरकार

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p style=”text-align: justify;”>यह दृश्य गार्डन हाउस मल्लीताल, नैनीताल का है, जिसमें झील विकास प्राधिकरण के नियमों को ताक पर रखकर खुले आम पक्के मकान का निर्माण चल रहा है,
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि एक घने वृक्ष (बांज/देवदार) को मकान की चाहरदीवारी के अंदर ले लिया गया है, ज़ाहिर है बुनियाद खोदते समय उस वृक्ष की जड़ों पर हानिकारक प्रभाव अवश्य पड़ा होगा,
हमारा ये आशय नहीं कि महोदय का घर न बने, हम सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि पर्यावरण के ख़ातिर वृक्षों पर तो दया कीजिये…
एक निवेदन
🙏🙏🙏🙏

अंक-23  (30 अक्तूबर 2018) : स्वच्छता के सिपाहियों को आज़ाद मंच का सलाम

‘नवीन समाचार’ और ‘आज़ाद मंच’ आज उन स्वच्छता के सिपाहियों को
आपके सामने ला रहा है जो मल्लीताल (नैनीताल) के चार्टन लॉज इलाके में पूरी मेहनत व ईमानदारी के साथ काम कर
रहे हैं,
इस टीम के लीडर (सुपरवाइज़र) हैं उनका नाम मंगू लाल है, जो अपनी टीम को लेकर सुबह 7 बजे अपने कार्यस्थल पर आ जाते हैं और 9 बजे (स्कूली बच्चों के स्कूल जाने से पहले ) तक पूरे इलाक़े में अपनी टीम द्वारा सफ़ाई करवाकर उक्त क्षेत्र को चकाचक बना देते हैं, हालांकि ये तस्वीर पहले ऐसी नहीं थी, पहले स्कूल जाने वाले समय पर ही, सफ़ाई अभियान चलता रहता था, कूड़ा उठाने वाली गाड़ी बीच रास्ते में खड़ी होकर, कूड़ादान उठाया करती थी, जिससे बच्चों व अभिभावकों को परेशानी का सामना करना पड़ता, उससे
कोई भी अप्रिय घटना होने की संभावना हमेशा बनी रहती, आज़ाद मंच  की पहल पर सुपरवाइज़र मंगू लाल से बात
की गयी तथा उनको किसी भी अप्रिय घटना होने से पहले,
सचेत किया गया, थोड़ा आना कानी के पश्चात्, मंगू लाल को बात समझ में आ गयी तथा अगले ही दिन से मंगू लाल
अपनी टीम को लेकर एक घंटा पहले, चार्टन लॉज गेट के पास पहुंचे और कार्य शुरू करवा दिया, जब छोटे- छोटे बच्चों के स्कूल जाने का टाइम शुरू हुआ तब तक उस इलाक़े की तस्वीर ही बदल चुकी थी, साफ़ सुथरी सड़क पर बच्चे इठलाते हुए अपने-अपने स्कूल जाने लगे,
अब किसीको किसी हादसे का डर नहीं सताता, यहां पर हम मंगू लाल की टीम में शामिल संजय (छोटे ), राजेंद्र तिर्मल, उमेश जयराम, रानी , बीरो, कोमल, संजय, हरचरण व सुनीता को
भी हार्दिक धन्यवाद करना चाहेंगे,
जो अपना कर्तव्य पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं, इनमें ख़ासियत
ये है कि ये लोग अपना -अपना कूड़ा एकत्र करके जलाते या झाड़ी में छुपाते नहीं हैं बल्कि इनके पास एक छोटी सी गाड़ी होती है उसके ज़रिये कूड़ेदान में लाकर डालते हैं, इन सबके बीच हमें एक बात और पता चली
कि मंगू लाल की टीम में कपिल  व रामकिरत नाम के दो कर्मचारी और हैं जो पालिका से अपना वेतन तो ले रहे हैं लेकिन काम पर पिछले कई महीनों से नहीं आये,
जिससे उन नाकारा लोगों के हिस्से का भी काम बाक़ी टीम को करना पड़ रहा है,
ये बेहद चिंता का विषय है,
अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका परिषद्, नैनीताल
ने उपरोक्त मामले का संज्ञान लेकर ऐसे निकम्मे कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से निष्कासित करना चाहिये,
ख़ैर,
हमें यक़ीन है, आपके इलाक़े में भी ऐसे ही मंगू लाल की टीम काम करने आती होगी बस ज़रूरत है उन्हें एहसास दिलाने की, कि वो क्या कर रहे हैं और उन्हें क्या करना चाहिये,
अगर सारा काम हम प्रशासन के निर्देशों के भरोसे छोड़ देंगे तो हमारे इलाक़े को जहन्नुम बनने से कोई नहीं रोक सकता और थोड़ी सी सजगता दिखाते हुए सफ़ाई के सिपाहियों को हमने प्रेमपूर्वक प्रोत्साहित किया तो हमारे शहर को स्वर्ग बनने से कोई नहीं रोक सकता,
आइये सफ़ाई के सिपाहियों से
बात करते हैं
अपने शहर के लिए एक स्वच्छ शुरुआत करते हैं
 
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

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p style=”text-align: justify;”>मंच
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन(आज़ाद)

अंक-22 (29 अक्तूबर 2018) : खून समान पानी की बर्बादी रोकने को बहानेबाजी ठीक नहीं

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p style=”text-align: justify;”>आजाद मंच’ व ‘नवीन समाचार’ द्वारा उठाई गई पानी की बर्बादी की समस्या को

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p style=”text-align: justify;”>
28:10:2018 के अंक में अमर उजाला समाचार पत्र ने भी पानी का लीकेज मामला गंभीरता से उठाया है, उसके लिये हम शुक्रगुज़ार हैं। नैनीताल ही नहीं हल्द्वानी क्षेत्र में भी लीकेज से जल की बर्बादी हो रही है, शहर की 46 पेयजल लाइन लीक पायी गयी हैं, जिसमें से महज़ 17 की मरम्मत करके मामले की लीपापोती की गयी है, .ऐसा सुनने में आया है कि
जल संस्थान, हल्द्वानी को रोड कटिंग परमिशन लो.नि.वि तथा नगर निगम से नहीं मिल पा रही है जिस बावत लीकेज बदस्तूर जारी है, यहां ये बात सामने आती है
कि एक तो वैसे ही मन नहीं था काम करने का ऊपर से परमिशन न मिलने का बहाना अच्छा मिल गया, आज़ाद मंच का एक छोटा सा सवाल है, यदि मान लिया जाये परमिशन एक साल तक नहीं मिलती तो क्या लीकेज के ज़रिये प्रतिदिन 50 लाख लीटर पानी की बर्बादी को अधिकारी लोग यूँ ही असहाय होकर देखते रहेँगे? दूसरा सवाल ये है कि यदि एक साल आपको अपना वेतन प्राप्त करने की परमिशन न दी जाये तब आप क्या असहाय बनकर यूँ ही देखते रहेंगे,
जवाब होगा नहीं,
तब तो निम्न स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के सभी कर्मचारी और अधिकारी बौखला जाएंगे,
कर्मचारी एकता ज़िंदाबाद के नारे सुनाई देने लग जाएंगे,
कार्य बहिष्कार, अनशन
और तो और कोई तुर्रम खां आकर आत्मदाह तक की धमकी दे सकता है,
अरे मेरे देश के सरकारी सिपाहसलारों एक वेतन ही सब कुछ है, आपके लिये?
जिसके न मिलने पर आपका खून खौल उठता है, मतलब वो कुछ नहीं जिसके लिए आपको मोटा वेतन मिल रहा है,
सिर्फ एक घटिया सा परमिशन का बहाना बताकर आप
कंबल ओढ़ कर सो गए,
किसी ने भी कोई कोशिश की या परमिशन के लिये दबाव बनाया ???
आप लोगों में ज़रा भी शर्म बची है या नहीं या सब शर्म टेबल के नीचे ही सिमट कर रह गयी,
मेरे देश के सरकारी शेरो जागो,
उठो, अब समय आ गया है कंबल से निकलकर कुछ कर्म करने का,
भारत बदल रहा है, आपको जो वेतन मिल रहा है उसका हक़ आपको अदा करना ही पड़ेगा,
हमारी तो ये समझ नहीं आ रहा है, बिन काम का पैसा आपको हज़म कैसे हो जाता है या रात को चैन की नींद कैसे आ जाती है?
ख़ैर,
अभी भी ज़्यादा समय निकला नहीं है, हम भारतीय हैं बहुत भावुक होते हैं, जल्दी माफ़ करके भूल जाएंगे, इसलिए ये पानी की बर्बादी रोकने के लिये भी थोड़ा ज़ोर दिखाइए,
कर्मचारी एकता को सामने लाइए,
हम भी तो देखें वो आपकी वाली ‘एकता’ स्वार्थी नहीं होती समाज हित में भी होती है,

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p style=”text-align: justify;”>अंत में,
हमारा कमिश्नर महोदय से पुनः निवेदन है कि मामले का संज्ञान लेते हुये, लो.नि.वि व नगर निगम को हाज़िर कर परमिशन में देरी के लिये क्लास लगाएं तथा तत्काल प्रभाव से परमिशन दिलवाकर उक्त लीकेज को रोकने की कार्रवाई के आदेश करें,
यूँ समझ लीजिए वो पानी नहीं
‘आज़ाद मंच’ का ख़ून है…
जो दिन रात बर्बाद हो रहा है,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-21 (28 अक्तूबर 2018) : लीकेज रोकने को M Seal के इंतज़ार में जल संस्थान

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p dir=”ltr” style=”text-align: justify;”>साहिबान,
आज हमने नगर में जगह-जगह पानी की लीकेज होते देखीं, उसके लिये आप ये मत समझियेगा कि हमें बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी न न,
जिसके शहर में हमारे यहां जैसा क़ाबिल और फ़ाज़िल जल संस्थान हो उसे भला कभी मेहनत करनी पड़ेगी कभी नहीं,
सबके सब लीकेज एक के बाद एक मिले हैं और वो भी उत्तराखंड राज्य अतिथि गृह (नैनीताल क्लब ) के बिल्कुल पीछे वाली सड़क पर,
पहले लीकेज में इतनी तेज़
स्पीड से पानी बह रहा है तो यूँ समझ लीजिए एक घंटे में
10,000 लीटर पानी शर्तिया बर्बाद हो रहा होगा, इसका मतलब ये नहीं जनाब कि
दूसरे और तीसरे लीकेज
पानी के मज़े न ले रहे हों,
जी जी,
वो दोनों भी अपने कद से कहीं ज़्यादा पानी बर्बाद कर रहे हैं,
या साफ़ कहूं तो गुल छर्रे उड़ा
रहे हैं, वो भी पानी के साथ
(अब आप भी न,
बडे मज़ाकिया हो )
ये तो रही हमारे क्षेत्र के 50
मीटर की दूरी का हाल, तो अंदाज़ा लगाइये अगर फुर्सत निकालकर पूरा शहर घूम लिया जाये तो लीकेज का खज़ाना हाथ लग जाएगा, वो किसी और दिन,
ख़ैर,
मज़े की बात आपको पता नहीं होगी पिछले कुछ दिनों से यहां
की जनता को जल के लिये
बहुत तरसाया जा रहा है, यहाँ
का आदमी जल के लिये जंगल और जमीन एक क़र दे रहा है लेकिन उसको पानी मयस्सर
नहीं हो रहा, इतना होने पर भी विभाग की तरफ से पानी के लिये हर तीन माह में चंदे  की रसीद आ जाती है, जिसमें चेतावनी लिखी होती है, यदि समय से चंदा जमा नहीं किया तो आपका सूखा हुआ नल भी काट दिया जाएगा,अब उम्मीद पर पानी क़ायम है, क्या पता कब हमारे नल में पानी अपनी पायल छनकाते हुये आ जाये और हम
बिन घुंघरू डांस करने पर मजबूर हो जायें, इसी लालच में हमारे शहर के लोग जल संस्थान को चुपचाप चंदा अदा कर देते हैं,
वो कहते हैं न “शौक़ बड़ी चीज़ है” बस इसी चक्कर में थोड़ा नवाबसाब टाइप की फीलिंग्स
भी आ जाती हैं, (सरकार की मदद करने में )
क्या बात कर रहे हैं साहब,
उनकी बात बताऊँ,
नहीं नहीं,
मेरी माँ कहती है,
जो लोग ऊंचे पदों पर बैठकर
मोटी-मोटी तनख़्वाह लेते हैं न,
उनकी बात में बहुत वज़न होता है, वो जब तक कुछ नहीं करते तो नहीं करते लेकिन जब करने पर आते हैं न, घर के घर पानी में बह जाते हैं, फिर दुश्मन की भी ज़रूरत नहीं पड़ती!
अंत में,
कमिश्नर साहब से नैनीताल के अन्य सामाजिक संगठनों के साथ-साथ हमारा भी अनुरोध है कि जल संस्थान के अधिकारियों को कड़े निर्देश करते हुए शहर में जगह-जगह हो रही पानी की लीकेज चिह्नित कर बंद करवाएं तथा पानी की जो किल्लत पिछले दिनों से शहरवासी भोग रहे हैं उससे जल्द से जल्द निजात दिलवायें,
जिससे पानी का बिल, बिल ही लगे, चंदा न लगे!

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-20 (26 अक्तूबर 2018) : हिम्मत की दाद दीजिये इस बिजली के खम्भे की..

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p style=”text-align: justify;”>👆👆👆
ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं …

वो उत्तराखंड प्रदेश के विश्वप्रसिद्ध पर्यटक स्थल

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल में
बी .डी. पाण्डे अस्पताल के पीछे खड़ी चढ़ाई वाली सड़क की है …
जहाँ रास्ते में कई बिजली के पोल हैं …
हालाँकि ये अलग बात है
उनपर रात में कभी बल्ब नहीं जलता ,
जिसे देखने वाला कोई नहीं …
और जो देखेगा उससे कहने वाला कोई नहीं ,
तो जनाब…
बात ये है कि
रात के अँधेरे में ..
इस अँधेरी सड़क पर से …
बिना पैर गंदा किये …
कोई सूरमा
अपने घर तक पहुंच जाये तो अगली सुबह
उसके मोहल्ले में मिठाई बांटी जाती है ,
आस- पास के
बच्चे प्रभात फेरी निकालकर ( जी हाँ …जैसेे अभी हाल में गांधी जयंती को निकली थी…

<

p style=”text-align: justify;”>उसके नाम के नारे लगाते हैं…
और अगर कोई शख़्स
अँधेरे में पैर फिसलने से
नाले में गिर जाये ,
और जैसे-तैसे
वो बचकर बाहर आ जाये ,
फिर तो उसके नाम की कसमें खायी जाने लगती हैं …

<

p style=”text-align: justify;”>ख़ैर..
ये तो रहा रात का हाल,
अब जानते हैं दिन में क्या माजरा रहता है इस सड़क पर …

<

p style=”text-align: justify;”>चिड़ियों के चहचहाने के बाद
ये सड़क बिजी हो जाती है ,
ये समझ लो इसे साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती ,
फिर आठ बजे से छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने लगते हैं ,
और छुट्टी के बाद इसी रास्ते से अपने घर वापस भी आते हैं …
लेकिन बच्चे तो मासूम फ़रिश्ते होते हैं …
उन्हें तो बस मौज मस्ती से मतलब …
(हम जिनको पकड़ेंगे उन्हें आप जानते ही हैं )
तो
हुज़ूर…

उक्त चित्र में आप लाल घेरे में जो बिजली का खम्भा देख रहे हैं न

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p style=”text-align: justify;”>वो पिछले दो साल पहले किसी गाड़ी से क्षतिग्रस्त हो गया था,
तबसे आज तक यूँ ही बिजली के तारों के सहारे
ये खंभा झुका खड़ा है …..
( बाई गॉड… हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी )

<

p style=”text-align: justify;”>हालाँकि उसके बराबर में एक दूसरा खम्भा लगा दिया गया था,
जिसका जन्मदिवस परसों ही मनाया गया है…
इसलिये मात्र एक वर्ष का नौनिहाल होने के कारण ही विभाग उस पर बिजली के तारों का भार देने से कतरा रहा है …

<

p style=”text-align: justify;”>शायद विभाग को इस बात की भविष्यवाणी हो गयी होगी
कि
जिस खम्भे की कमर दुर्घटना में झुक गयी थी,
वो पंचवर्षीय योजना मनाकर ही मानेगा…..

<

p style=”text-align: justify;”>उसका जो भी हो
लेकिन

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p style=”text-align: justify;”>हम बिजली विभाग से ये अनुरोध करते हैं कि इस तरह की मनगड़ंत भविष्यवाणियों
पर भरोसा न करते हुये
विभाग ने अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिये,
जिस उद्देश्य से नया खम्भा लगाया है …
उसे परिपूर्ण करना चाहिये….

नौजवान खम्भे के कांधों पर ज़िम्मेदारी जल्द से जल्द सौंपने की कृपा करनी चाहिये…

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p style=”text-align: justify;”>क्यूंकि हादसे कभी बताकर नहीं आते …
उनकी आहट को सिर्फ़ महसूस किया जाता है …

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-19 (25 अक्तूबर 2018) : झील का गुनहगार पेशाबघर !

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p style=”text-align: justify;”>ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न,
ये हमारे शहर नैनीताल के चार्टन लॉज कंपाउंड मल्लीताल की है,
इस क्षेत्र को ऐसे समझ सकते हैं,
जब आप मुख्य डाकघर से होते हुए आएंगे तो चार्टन लॉज की पुलिया के पास रुक जाएं फिर धीरे -धीरे बीडी पाण्डे अस्पताल वाले रास्ते से नीचे झील की तरफ जायेंगे तब पुलिया से थोड़ा नीचे आने पर ही बाईं तरफ़ आपको कूड़े से लबालब भरा हुआ एक बड़ा सा कूड़ेदान अपने हाथों में विभिन्न खुशबुएं लिये आपका स्वागत करेगा जैसे ही नाक पर कपड़ा रखकर आप उन कथित खुशबुओं को मुंह चिढ़ाते हुए आगे बढ़ेंगे तो आपको मुंह चिढ़ाता एक पुराना जीर्ण -क्षीर्ण पेशाबघर टूटे दाँत दिखाते हँसते हुये दिखाई देगा,
जिसे देखकर आपके सर से आसमान और पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी, आप क़ब्र में पैर लटकाये हुये उस पेशाबघर की दादागिरी देखकर हैरान हो जाएंगे, आप देखेंगे कि वो किस तरह वहां पेशाब का अवैध बाज़ार चला रहा है, उसकी ही शय पर मदिरा सेवन करने वाले, जुऐ,
नशे के शौकीन लोग उक्त स्थान पर पेशाब करते हैं, फिर कोई उचित निकासी न होने के कारण वही पेशाब सड़क पर फैलता है, सड़क पर फैलकर वहां से गुज़रने वाले छोटे -छोटे स्कूली बच्चों के पैरों में तथा उनके अभिभावकों के पैरों में लगता है,
वही गंदगी लेकर सब लोग उन लोगों को दुआयें देते हुये आगे बढ़ जाते हैं, जो लोग उसके लिये ज़िम्मेदार हैं,
ख़ैर,
बहती चीज़ कहाँ रुकती है,
वही पेशाब सड़क पर अपनी बादशाहत कायम करता हुआ, पड़ोसी नाले में अपने परिवार समेत कूद पड़ता है, और ऊपर चट्टानों की तरफ़ से आते हुये पानी में जलमग्न होकर किसी बहरूपिये की शक्ल में हमारी भोली भाली झील में समां जाता है और हमारे प्यारे जल संस्थान के माध्यम से फिर से वो हम सबके घरों में ससम्मान जल के रूप में अपनी पैंठ बना लेता है और हम वही पानी पी पीकर ऐसे पेशाब करने वालों को दरवाज़े के आगे खड़े होकर फिर कोसते हैं,
उक्त पेशाबघर की
हक़ीक़त जानकर आप हैरान हो जाएंगे जनाब,
हमारी आदर्श नगर पालिका ने किसी ज़माने में पता नहीं किस आनन-फानन में उक्त पेशाबघर का निर्माण करवाया कि जल संस्थान से सीवर कन्नेक्शन ही नहीं लिया गया, यानि निकासी के नाम पर ताल ज़िंदाबाद ही सोच रही होगी, इससे ये साफ़ ज़ाहिर है,
हालाँकि,
आज़ाद मंच के माध्यम से उक्त पेशाबघर के विरूद्ध स्थायी लोक अदालत में मामला जारी है,
अंत में
स्थायी लोक अदालत, नैनीताल के माननीय न्यायाधीश श्री बृजेन्द्र सिंह से अनुरोध करना चाहेंगे कि उक्त मामले में नियत 30 अक्टूबर की तिथि को ही निर्णायक तिथि बनाते हुये, उक्त पेशाबघर का तत्काल प्रभाव से जीर्णोद्धार करवाने के आदेश पारित करने की कृपा करें,
धन्यवाद
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-18 (24 अक्तूबर 2018) : जल संस्थान अब आँखे खोलो पानी लाये हैं मुंह धो लो…

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p style=”text-align: justify;”>ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न,
वो हमारे सरोवर नगरी के पॉश इलाक़े की है, या यूँ समझे वो जो आलीशान अल्का होटल है न,
बस उसके पीछे का मामला है,
न न , ऐसा नहीं है कि यहाँ से कोई ज़िम्मेदार अधिकारी या
शहर के दिग्गज लोग आते-
जाते नहीं हैं,
बेशक़, सब आते भी यहीं से हैं और जाते भी यहीं से लेकिन
अब भला कार के शीशों से कहाँ ये छोटी- मोटी समस्याएं दिखती हैं, उन्हें तो अपना व्हाट्सप्प देखने से ही फुर्सत नहीं मिलती,
ख़ैर, छोड़ देते हैं उन्हें और
उन्हें पकड़ते हैं जो असल में
इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार हैं,
वो है सीवर निकासी का ज़िम्मा उठाने का दावा करने वाले
सबका प्यारा, राज दुलारा
जल संस्थान,(नहीं जनाब,
तारीफें अभी नहीं साहब बुरा
मान गए तो ) वैसे सुनने में ये आया है कि कथित सीवर बार -बार ओवर फ्लो हो जाता है, जिसका उचित व स्थायी उपाय अब तक नहीं किया गया है, जिससे वहां रहने वाले लोगों तथा वहां से गुज़रने वाले स्कूली बच्चों को होने वाली परेशानी के साथ-साथ सीवर का गंदा पानी ताल
में जाने से ताल का पानी दूषित हो रहा है जिसे हम सब नैनीताल वासी पीने को मजबूर हैं,
इतना गजब पानी तो मत पिलाओ बाय गॉड,
कहीं किसी दिन ऊँट ही
पहाड़ के नीचे न आ जाये,
इसलिये मेहरबानी करें,
अपना भी ख़याल रखें,
अंत में
जल संस्थान नैनीताल के
उच्च अधिकारियों से
हमारा विनम्र अनुरोध है कि कृपया करके उक्त सीवर ओवर फ्लो का स्थायी समाधान निकालें, जिससे वहां रह रहे लोगों के साथ- साथ दूषित पानी पीने वाली समस्त जनता आपकी हार्दिक आभारी हो जाये,
कुछ कर दिखाइए साहब…
इस बार आम जनता पलकें बिछाकर आप जैसे मसीहा का इंतज़ार कर रही है,
वो मासूम चुनाव के चक्कर में अपने इस अधिकार से महरूम न रह जायें,
थोड़ा ध्यान रखियेगा,
प्लीज,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

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p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

1.  ‘आज़ाद के तीर’ और ‘नवीन समाचार’ का फिर कहाँ और क्या हुआ असर

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p style=”text-align: justify;”>साहिबान,
12 अक्टूबर के अंक में
हमने ‘नवीन समाचार’
के माध्यम से
‘ग्लूकोज़ रिस्क पर बीडी पांडे हॉस्पिटल’

<

p style=”text-align: justify;”>शीर्षक से वहां की स्थिति को दर्शाया था,
जिससे प्रभावित होकर अस्पताल प्रशासन हरकत में आया और अपनी सफ़ेद पोशाक को दाग़दार होने से बचाने के लिये एक रेफेरल रजिस्टर व
रोगी की स्थिति बोर्ड तैयार किया हैै, जिसमें रोगी का नाम, रोग की स्थिति अथवा रेफर का कारण दर्शाया गया है,
बीडी पाण्डे (पुरुष)चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक
डॉ. राजेश ने यह जानकारी दी।

वहीं बीडी पाण्डे (महिला) चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (कार्यवाहक) डॉ. वीके पुनेरा नेे अस्पताल प्रशासन का बचाव करते हुये रोगियों के काफ़ी हद तक ठीक होने की बात कही, तथा ये भी बताया कि इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) न होने के कारण हमारे पास गंभीर रोगियों को रेफर करने के अलावा दूसरा चारा नहीं है,

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में
अस्पताल प्रशासन के थोड़े जागरूक रवैये को देखकर हमें थोड़ी ख़ुशी महसूस हुई है लेकिन
हमारी स्वास्थ्य मंत्रालय
( केन्द्र / राज्य) से ये शिकायत उस दिन ख़त्म होगी जिस दिन नैनीताल के बाशिंदों को
इसी अस्पताल में सारी सुविधाएँ मुहैया होंगी, किसी भी रोगी को हल्द्वानी, बरेली अथवा दिल्ली न जाना पड़े,
सबका इलाज एक ही छत के नीचे हो वो भी
बीडी पाण्डे चिकित्सालय तथा रैमजे चिकित्सालय तल्लीताल की छत के नीचे,
तभी हमारे संघर्षों की जीत होगी,
आम इंसान के साहस की जीत होगी,

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

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p style=”text-align: justify;”>2. 17 अक्टूबर के अंक में हमने नवीन समाचार के माध्यम से “डीएम साहब की दीवारों दर को ग़ौर से पहचान लीजिये” शीर्षक के अंतर्गत हमने अपनी बात रखकर सफ़ाई का अनुरोध किया था। जिस पर त्वरित कार्रवाई करते हुये ज़िलाधिकारी के आदेश व नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी के निर्देश पर ज़िलाधिकारी आवास के सामने की गंदगी साफ़ कर दी गयी है।
जिसके लिये ‘नवीन समाचार’ और ‘आजाद मंच’ पूरे प्रशासन का आभार व्यक्त करता है तथा आशा करता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति न हो।

धन्यवाद

अंक-17 : मेरे देेश के नेता भ्रष्टाचार उगलें, निगलें हीरे मोती

<

p style=”text-align: justify;”>ये मेरे देश की विडंबना
नहीं तो क्या है, जहाँ हर त्याग और बलिदान आम जनता को
ही देने पड़ते हैं,
जी हाँ, मेरा इशारा उसी तरफ़
है जहाँ आप समझ रहे हैं,
क्या कोई पैरोकार मुझे ये समझाएगा कि जनता के सेवक कहे जाने वाले नेताजी अपनी सैलरी में से कुछ हिस्सा ग़रीबों को क्यों नहीं देते ? सैलरी तो दूर की बात जो निधि मिलती है वो ही ख़र्च नहीं क़र पाते, और जो करते हैं-उसमेंं भारी भ्रष्टाचार।
और हाँ यहां हम किसी पार्टी विशेष के ऊपर टिप्पणी नहीं
क़र रहे हैं, चाहे किसी भी पार्टी का नेता हो, क्या किसी ने
ये कहा है कि मुझे तथाकथित भत्ते नहीं चाहिये, भत्तों से किसी ग़रीब बेटी की शादी में मदद करवा दो, या किसी नेता ने
संसद कैंटीन में सस्ता भोजन
करते वक़्त कभी ये सोचा है
कि इस सस्ते भोजन की तो
हमारे हर शहर और गांव में ज़रूरत है, मैं कैंटीन के इस
सस्ते भोजन का विरोध करता
हूँ, तो जवाब होगा नहीं, क्योंकि उस वक़्त उनमें से कोई भी नेता देश के बारे में नहीं सोचता,
वहां तो वो बस चौड़े होकर ठट्टे मारकर हँसते हैं और सस्ता भोजन अपना अधिकार समझ कर खा लेते हैं, एक आरटीआई के ज़रिये जानकारी प्राप्त हुई है कि उत्तराखंड के एक राज्य मंत्री का मासिक वेतन भत्तों समेत
₹ 3,36,500 है जबकि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया का वेतन ₹ 2.80 लाख होने वाला है (प्रस्तावित है) अभी तक उनका वेतन ₹ 1 लाख प्रति माह था, अब इसी से आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि क्या हालत है,
एक राज्य मंत्री और क़ानून के मुखिया के बौद्धिक स्तर, सोच
व समझ के हिसाब से भी बहुत फ़र्क़ नज़र आता है,
नहीं, नहीं आपकी वो बात भी
सर आँखों पर है कि हर चीज़ पैसों से नहीं तौली जाती,
CJI का अपना रुतबा होता है, बिल्कुल हम आपकी बात से सहमत हैं लेकिन आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता,
ये जानकर कि मंत्रियों को सिर्फ़ फोन भत्ता ही ₹15000 मासिक मिलता है, अब बताओ ₹399 में तीन महीने की अनलिमिटेड कालिंग और 1.5GB डेटा प्रति दिन फ्री के ज़माने में ₹15000 का भत्ता???
हाय रे, बेहोश हो जाऊंगा, बाय गॉड
वैसे सच कहूं ऐसे ऊल जलूल भत्तों ने देश का बट्टा बैठा रखा है,
एक सुझाव है यक़ीनन बुरा लगेगा लेकिन मानो मत मानो आपकी मर्ज़ी, ये जो फोन भत्ते टाइप के अनाप शनाप भत्ते हैं न उन्हें देश के ग़रीब जनता में बाँट दिया करो, कम से कम किसी माँ की रसोई में चूल्हा तो जल जाएगा,
अब कम लिखे को ज़्यादा समझना, हम जानते हैं
आप बेहद समझदार हैं,
लेकिन ऐसा करके देखिये,
सच में अच्छा लगेगा, कसम से!

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-16 : रावण अभी मरा नहीं…

<

p style=”text-align: justify;”>हमने रावण को जला दिया,
जलते हुये रावण को देखकर
हमने आतिशबाज़ी का आनंद
भी ले लिया, बस हो गया अपना कर्तव्य पूरा, हम ख़ुश होकर घर लौट आते हैं कि आज हमने रावण को जला दिया,
तो साहिबान,
ये हमारी ग़लतफ़हमी होती है, दरअसल रावण जलते हुए अपने धुएं से पूरे वायुमंडल के ज़रिये फिर से जीवित हो जाता है,
वो हम सबमें समां जाता है,
हाँ ये अलग बात होती है वो किसी में कम किसी में ज़्यादा होता है, लेकिन मरता नहीं है, अगर वास्तव में रावण मर जाता है तो क्या कोई मुझे ये आश्वासन दे सकता है कि कल से किसी की बहन, बेटी के साथ अत्याचार/बलात्कार नहीं होगा?
क्या कोई बहू दहेज़ के नाम पर नहीं जलाई जाएगी,
क्या कोई दूसरी निर्भया या आसिफा अब नहीं बनेगी,
अगर हमारे पास इसका जवाब
न में है तो ये हम सबके लिए शर्म की बात है, हमें सबसे पहले अपने अंदर के रावण को मारना होगा,
क्यूँकि किसी का बुरा चाहना,
झूठ बोलना ये भी रावण होने की निशानी है, यदि ये निशानियां
हम अपने अंदर से मिटा दें,
फिर हमारा अधिकार बनता है अगले वर्ष रावण को जलते हुये देखने का, तभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने सुखी संसार को देखकर प्रसन्न होंगे और हमारे लिये अगले दशहरे पर ख़ुशी दोगुनी हो जाएगी, हम ये भी जानते हैं कि लालच, घमंड, वासना जैसे अवगुणों को मारना थोड़ा मुश्किल ज़रुर होगा,
लेकिन नामुमकिन नहीं है,
आइये मिलकर प्रण करते हैं,
कल के सुनहरे, सुरक्षित,
सुखमय भविष्य के लिये आगामी दशहरे की शुभकामनाओं के साथ

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-15 :  ऐसा रोज़गार मेला प्रारम्भ, जिसमें हल्दी लगे न फिटकरी, और रंग चोखा

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p style=”text-align: justify;”>मेरा एक मित्र संता
अपनी बेरोज़गारी से
बहुत परेशान था,
चपरासी से लेकर
पटवारी तक के अनगिनत
फॉर्म भरे, लेकिन नतीजा सिफ़र, आपको तो पता ही है न
आजकल नौकरी पाना सिर्फ़ सेटिंग का खेल है, और कुछ नहीं, जिसकी सेटिंग, उसकी बैटिंग,
तो बेचारे की नौकरी के सपने भी धराशायी हो गये,
फिर उसने सोचा बिज़नेस करूं,
अब बिज़नेस में तो इन्वेस्टमेन्ट का लफड़ा है और वो भी चले न चले किसने देखा, सारे दोस्त सर से सर मिलाकर सोच ही रहे थे कि ब्रेकिंग न्यूज़ आ गयी सूबे में होंगे निकाय चुनाव, 18 नवंबर को होंगे चुनाव , 20 नवंबर को परिणाम घोषित, बस सबका एक साथ माथा ठनका और उठकर हवा में उछलकर तीन बार
यस यस यस बोला, और बना दी संता को चुनाव में खड़ा करने की रणनीति,
फिर क्या था संता को तो जैसे डूबते को चुनाव का सहारा मिल गया, अब बारी थी तय करने की कौन से पद के लिये नामांकन कराये, सभासद या अध्यक्ष क्यूंकि सभासद का फॉर्म भी एसडीएम कार्यालय से ₹200 का मिल रहा है और अध्यक्ष का भी (फ़्लैश बैक में संता सोचते हुये- जबकि नौकरी के फॉर्म 500 से नीचे नहीं भरा जाता है, परीक्षा यात्रा खर्चा अलग, मज़े आ गये) फिर एक अदेयता प्रमाण- पत्र नगर पालिका से और एक अदेयता प्रमाण पत्र तहसील से लेकर सभासद पद के लिये
एक (01) प्रस्तावक और
अध्यक्ष पद के लिये दस (10) प्रस्तावक लेकर नामांकन कराना है, फिर क्या था उसने सोचा क्यों न अपने एक और बेरोज़गार मित्र की मदद की जाये, और सभासद पद के लिये आ गया बंता,
फिर क्या था संता ने अध्यक्ष
और बंता तथा बंता के
दोस्तों ने सभासद के लिये आसानी से नामांकन कराया
और खड़े हो गए चुनाव में,
उनके क्षेत्र में भारी मतदान हुआ और परिणाम घोषित हुआ, जिसमें संता की लाटरी लग गयी, संता अध्यक्ष और बंता व बंता के दोस्त सभासद के पद पर भारी मतों से विजयी हुए,
शहर में विजयी जुलूस निकाला गया, जो लोग उनके निठल्लेपन और बेरोज़गारी पर ताने मारते थे उनके जुलूस में नारे लगाते हुए सबसे आगे दिखे,
अब संता को न नौकरी के
फॉर्म भरने की ज़रूरत,
न बंता को छोले – कुल्चे या मूंगफली का ठेला लगाने की दरकार, क्यूंकि नगर में बन गयी उनकी सरकार,
वो कहते हैं न एक आईडिया दुनिया बदल सकता हैं,
तो बदल गयी दुनिया,
अब बंता के समस्त बेरोज़गार युवा दोस्त भी ख़ुश थे जिनके पास व्यवसाय करने के लिये धन की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी, जिनका धंधा- मंदा चल रहा था, वो भी ख़ुश हुये जो हर विभाग में पैसा खिलाकर मायूस हो चुके थे, उनकी निराशा आशा में बदली, बेशक़ चुनाव ने किया शर्तिया इलाज, जनता ने सुनहरी कृपा बरसाई, अब हो जाएगा संता – बंता की हर समस्या का समाधान,
और हाँ…
अंत में…
आपको मज़ेदार बात भी बताते चलें, दबंग, संगीन अपराधी, बुरी प्रवृत्ति के व्यक्तित्व जिनको सबसे बड़े न्यायकर्ता से चुनाव लड़ने की विशेष छूट प्राप्त है, वो भी खुलकर चुनाव मैदान में कूदें, और हमारी भोली जनता ने उनपर भी कृपा बरसाई,
ये बात सर्वविदित है
जिस प्रकार मताधिकार
सबका अधिकार है,
उसी प्रकार चुनाव लड़ना सिर्फ़ गिने चुने लोगों का अधिकार नहीं है, सबका अधिकार है,
बस वो पागल या दीवालिया न हो
( *वैसे माननीयों की मेहरबानी हुई तो क्या पता अगले चुनाव तक पागल और दीवालियों को भी ये अधिकार मिल जाये,
इस आधार पर कि जब अपराधी वर्ग चुनाव लड़ सकता है तो पागलों का भी बहुत बड़ा वर्ग है यहाँ उन्हें वंचित करना उचित नहीं )
इन सबके बीच एक बात समझ नहीं आती शिक्षित,
सभ्य, नैतिकतापूर्ण, कर्मठ, जुझारू, ईमानदार युवा इन चुनावों में बढ़ चढ़कर हिस्सा क्यों नहीं लेते,
अरे भई,
अगर आप लोग पॉवर में नहीं आये तो यूँही होता रहेगा,
गली, मोहल्ले से निकलते हुये रायता पूरे देश में फैलेगा,

<

p style=”text-align: justify;”>तो जल्दी करें, समय कम है
और सीटें सीमित हैं!

<

p style=”text-align: justify;”>नोट:- *इस लेख में लिखे सभी पात्र व घटनायें काल्पनिक हैं, हमारा प्रयास नगर के शिक्षित, कर्मठ, ईमानदार युवाओं को प्रेरित करना है,
किसी की भावना को ठेस पहुंचना कदापि नहीं है,
कृपया व्यक्तिगत न लें, बस आनंद लें, धन्यवाद!

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

अंक-14 : जिला कलक्ट्रेट में खतरों की खिड़की…

<

p style=”text-align: justify;”>ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं
वो हमारे ज़िला नैनीताल के जिला कलक्ट्रेट-तहसील परिसर स्थित खतौनी खिड़की की है….
जिसे आप खतरों की खिड़की भी कह सकते हैं…

वैसे तो हमारी तहसील परिसर साफ़ सफ़ाई के लिये जानी जाती है लेकिन वहां जो चीज़ एक बार टूट गयी तो टूट गयी… फिर उस पर ध्यान देने वाला कोई नहीं..

<

p style=”text-align: justify;”>अब इन सीढ़ियों की ही बात करें तो इन पर खड़े होकर प्रत्येक दिन
न जाने कितने लोग
अपनी-अपनी खतौनी प्राप्त करते होंगे,
कोई टूटी सीढ़ी से अचानक गिरता भी होगा..

<

p style=”text-align: justify;”>गिरने पर अंदर बैठा कर्मचारी सोचता होगा कि शायद
भाई साहब चले गए, क्योंकि
ये खिड़की बहुत अटपटी जगह पर बनी है…
जहाँ से अंदर से बाहर का कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता…
(सिवाय प्रत्येक खतौनी के 30 रुपये लेने के)… तो कर्मचारी तो अपने तीस रुपये पकड़कर अंदर बैठा रहता है… बाहर क्या हो रहा है… उसकी बला से…

आपको जानकर हैरानी होगी ये खतौनी वाली खिड़की इतनी अजीब जगह है जहाँ अगर कोई बेहोश होकर गिर जाये तो कोई उसको देखने वाला नहीं…

<

p style=”text-align: justify;”>मैं प्रशासन से उक्त खतौनी खिड़की को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की अपील करता हूँ…
साथ ही ये निवेदन करता हूँ कि जब तक इसका स्थानांतरण नहीं हो जाता…
कृपया उन सीढ़ियों की मरम्मत करवाने के आदेश करने की कृपा करें…
इससे पहले की कोई घटना, दुर्घटना का रूप ले ले…

<

p style=”text-align: justify;”>सावधानी…
समस्या का पहला समाधान है…

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद )

अंक -13 : (डीएम साहब की) दीवारो दर को ग़ौर से पहचान लीजिये

<

p style=”text-align: justify;”>जी हाँ
आज हम बात करेंगे,
हमारे सम्मानित ज़िलाधिकारी
के आवास की, वैसे आवास
का अंदर से क्या हाल होगा
हम उसके अंदर तो नहीं जाने वाले, अरे भई
हमें अंदर थोड़ी न जाना है, इसलिए हम तो बस वही बात आपके सामने रख रहे हैं जो
हर दिन वहां से आने -जाने
वाला प्रत्येक व्यक्ति देखता है, लेकिन वो सिर्फ़ देखता है और देखकर आगे बढ़ जाता है,
नहीं -नहीं,
हम ये बिल्कुल नहीं कहना चाहते की कुछ लोग कुछ भी नहीं बोलते, बोलते होंगे, सोचते भी होंगे कि ज़िलाधिकारी आवास के गेट के आगे इतनी गंदगी कहाँ से आ गयी, लेकिन तत्परता से ख़ुद को या अपने साथी को जवाब देते हुए मुंह बंद कर देते होंगे कि
अरे भाई,
हो सकता है किसी प्रकांड विद्वान ने रखवाया हो ये कथित कूड़ा क्यूंकि जिस गेट के सामने
ये कूड़ा रखा है हो सकता हो वो गेट प्रयोग में ही नहीं आ रहा हो,
तो स्टोर के रूप में अगर जगह का इस्तेमाल कर भी लिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया,
हमारा भी यही कहना है
बिल्कुल सही कहा जब गेट का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा हो तो उसे कुछ तो प्रयोग में लाना चाहिए,
लेकिन इतना विकराल प्रयोग
तो नासा वाले भी नहीं करते होंगे, कौन है वो महान हस्ती, जिसने ज़िलाधिकारी आवास के गेट के सामने इतनी गंदगी फ़ैलाने का हौसला दिखाया है, हम उससे ज़रूर मुलाक़ात करना चाहेंगे, पता नहीं क्यों लेकिन अंदर से फीलिंग आ रही है,
कोई न कोई स्टाफ़ का ही मामला है, आम जनता इतनी ऊपर आने की ज़हमत नहीं उठाने वाली ठेरी
सोलह टके सच बात है,

<

p style=”text-align: justify;”>ख़ैर
अंत में
हमारा पहले माननीय ज़िलाधिकारी महोदय से अनुरोध है कि कृपया कभी शाम के समय अपने आवास के आसपास भी चहलकदमी करने की मेहरबानी कर दिया कीजिये, क्योंकि इससे शहर की जनता का हाल तो जानने को मिलेगा साथ ही अपने आवास के आगे क्या चल रहा है, उसकी भी पोल खुल जाएगी
तथा नगर पालिका प्रशासन से अनुरोध है कि यदि अति व्यस्त रहने वाले डीएम साब यदि सफ़ाई के आदेश नहीं दे पा रहे हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि उनके आवास को ही ………
बना दिया जाये,
कृपया करके कथित गंदगी ज़िलाधिकारी आवास से हटवाने का प्रयास शीघ्र करें, कहीं ऐसा न हो महोदय की अकस्मात दृष्टि पड़े और सबकी छुट्टी हो जायें….

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-12 : तुम तो ठहरे नेताजी…

<

p style=”text-align: justify;”>चुनाव का मौसम आ गया है , सफ़ेद, हरे, पीले, काले, नीले
न जाने कितने रंगों से सजे
मेरे शहर में अब नेता जी मिलेंगे,
कभी उस गली, कभी इस गली,
हर चौराहे पर चर्चा करते हुए
बस इन्हीं के मुद्दे चलेंगे,
व्हाट्सप्प, फेसबुक
(नहीं नहीं ट्वीटर पर नहीं) पर सैकड़ों प्रशंसकों द्वारा
हज़ारों नारे ज़िंदाबाद के
लगने लगेंगे, पूरे परिणाम चुनाव से पहले ही दूरदर्शी विद्वान
घोषित करा देंगे,
कुछ गिने चुने उम्मीदवारों को छोड़कर बाकि अंजान उम्मीदवारों की पहचान
कराने के लिए चुनाव आयोग
का कोटि कोटि धन्यवाद,
जो बचपन से नहीं दिखे वो
सीधे अपना हक़ (वोट) मांगने आ जाते हैं, अब हम हिन्दुस्तानियों का दिल ही इतना बड़ा होता है कि हमारे पास वोट एक होता है, लेकिन वादा हम हर नेता से
कर लेते हैं,
नहीं भई, लालच या डर की वजह से नहीं वो तो बस सम्मान रखना पड़ता है न,
आख़िर कोई आपकी चौखट पर पहली और आख़िरी बार जो आता है तो उसे ख़ाली नहीं भेजा करते न,
दाज्यू,
ये चुनाव भी अजीब चीज़ है,
अधिकतर नेताजी
चुनाव जीतकर ख़ुशी से ग़ायब हो जाते है और जो चुनाव हार गए वो हारने के ग़म में अंडरग्रॉउंड हो जाते हैं ( दोनों में पांच साल की समानता देखी जाती है )
हम लोग तो कन्फ्युजा जाते हैं , ग़ायब तो दोनों ही हैं इनमें हारा कौन था, जीता कौन था ???
और वही गाना गाते रह जाते हैं
“तुम तो ठहरे नेताजी साथ किया निभाओगे”
इन सबके बीच मज़े की बात
ये होती है जिन मुद्दों को
आधार बनाकर हमारा आधार हिला दिया जाता है,
वो मुद्दे हमें लम्बी ज़ुबान निकालकर हर चौराहे पर
चिढ़ाते हैं,
और हम अगली बार सही नेता चुनने की बात कहकर (मुद्दों को) अगले 5 साल बाद देख लूंगा की चुनौती देकर आगे बढ़ जाते हैं,
घर आकर वही मायूसी,
वही उदासी, वो तो भला हो केबीसी के श्री अमिताभ बच्चन का जिन्हें देखकर
मन खुश हो जाता है,
और कम से कम घर बैठे लखपति बनने का सपना पूरा होता दिख जाता है,
हालाँकि एक रुपयापति अभी तक न बने हों लेकिन वो बंदा पूरे पैसे वसूल करवा जाता है,

<

p style=”text-align: justify;”>और एक हमारे नेताजी हैं,
जो अपने किये पर पछतावे के अलावा हमें कुछ देकर जाते हैं
तो बस अगली बार का
“विवेकपूर्ण मताधिकार”
जो घूमकर बार-बार घड़ी की सुई की तरह वापस वहीं आकर (रिश्तेदारियों के चक्कर में )
हमारे 12 बजा देता है,

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में
ख़ुशी की बात ये है कि हमारे शहर में भी चुनाव नज़दीक हैं उम्मीद जगी है शायद
इस बार हम सबको कुछ बेहतर नेतृत्व मिले, जो सरोवरनगरी को समझे, उसके बाशिंदों को समझे,
जो महज़ चुनाव जीतकर रुतबा हासिल करने वाला न हो, सभासद से लेकर चेयरमैन तक हर व्यक्ति आम जनता से सीधे संवाद करनेवाला हो, जिससे एक सशक्त नगर पालिका परिषद् का गठन हो, हमारे नैनीताल की प्रत्येक समस्या की सुनवाई हो, उसका निदान हो…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक -11 :  ‘टुच्च कोटि’ का ‘दुखीला बीमारी’ अस्पताल

<

p style=”text-align: justify;”>जी हाँ …
आज हम बात करेंगे
कुमाऊँ के जाने माने
(यहां एक बार जो बैठा हुआ आता है, लेटा हुआ जाता है इसलिए मशहूर) एक मात्र
‘दुखीला बीमारी’ अस्पताल की,
जैसा की आपको
नाम से ही पता लग
गया होगा, जी
तो हम आज आपको
उसके स्तर की बात बता रहे हैं, एक तो होता है उच्च कोटि
और एक उससे भी
बड़ा वाला होता है
‘टुच्च कोटि’
जी, जी
ये अस्पताल उसी कोटि
में आता है,
उच्च कोटि से बढ़कर इसलिए कहा क्यूंकि यहाँ एक से बढ़कर एक क़ाबिल चिकित्सक हैं,
उनको सहायता करने वाले
हज़ारों मेडिकल स्टूडेंट्स है, काफ़ी हद तक हर प्रकार की चिकित्सा हेतु आधुनिक
उपकरण हैं, उन्हें ऑपरेट
करने के लिए सैंकड़ों तकनीशियन कर्मचारी हैं,
कुल मिलाकर पूरे अस्पताल को चलाने में लाखों रुपयों का खर्चा प्रत्येक माह में सरकारी ख़ज़ाने से ज़रूर होता होगा, इतना होने के बावजूद
‘टुच्च कोटि’ का इसलिये है
क्योंकि
एक आरटीआई से खुलासे
के बाद ये तथ्य सामने आया है कि पिछले 10 वर्षों में लगभग 12000 लोगों की मौतें यहां उपचार
के दौरान हुई हैं,
हमारा सवाल है
इसका ज़िम्मेदार कौन है,
वे चिकित्सक जो मोटी- मोटी तनख़्वाह पाने के बावजूद किसी की जान नहीं बचा पा रहे हैं,
या वे जूनियर जो सीनियर की बताई गयी बातों को हल्के में लेकर मरीज़ को मात्र
एक्सपेरिमेंट का साधन मान कर
उसकी बॉडी के साथ खिलवाड़ करते हैं, या वे लोग जो किसी भी जाँच की तारीख़ इतनी लम्बी देते हैं कि उतने दिनों में मरीज़ ही वापस न आये,
लिफ़्ट, कैंटीन, साफ़ -सफ़ाई आदि सुविधायें
ठीक ठाक होने के बावजूद,
आये दिन होने वाली मौतों का ज़िम्मेदार आख़िर कौन है ??
कौन है उन 12000 मौतों का
ज़िम्मेदार ???
हम कितना ही विनम्र
होकर या गुस्से में पूछें
यहां कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं,
ज़िम्मेदारी के नाम
पर चिकित्सा में बस एक
डायलॉग सिखाया जाता है,
जो हर मौत के बाद बोला जाता है, “आई एम् सॉरी मैं उनकी जान नहीं बचा सका /सकी”
चिकित्सक तो इतना कहकर किनारे हो जाते हैं,
और हर गुनाह से बच जाते हैं, लेकिन कभी इस बात को सोचा है कि उस परिवार पर क्या बीतती होगी, जिसने अपने घर का कोई भी सदस्य खोया हो,

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में
स्वास्थ्य मंत्रालय भारत व राज्य सरकार से हम ये अपील करते हैं कि किसी भी सरकारी अस्पताल को मौत का मकबरा न बनने दें , हम जानते हैं आपके चिकित्सक अव्वल दर्जे के हैं लेकिन उसके बावजूद ये कटु सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आपके अधिकतर सरकारी अस्पताल बीमार चल रहे हैं, (सबका नाम किसी और दिन) उन्हें ख़ुद किसी अच्छे उपचार की ज़रूरत है।
कृपया अस्पतालों की
बीमारी दूर करें,
मान्यवर, गुस्ताख़ी माफ़ हो
आपके अधिकतर अस्पताल कोमा में चले गए हैं…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है…

अंक-10 : ‘मित्र पुलिस’ रीत सदा चली आई, अपराधी जाये-पर चालान न जाई

इस तस्वीर में जो आप गाड़ियां देख रहे हैं न,

<

p style=”text-align: justify;”>अरे…नहीं…साहब
अपनी नहीं है
हमारी हैं, हम सबकी हैं,
लेकिन हममें से कोई
इस बात की ज़िम्मेदारी
नहीं ले सकता कि
ये गाड़ियां हमने अस्त-व्यस्त तरीक़े से सड़कों के
किनारे ही क्यों खड़ी कर रखी है,
क्या इससे बाक़ी आने जाने
वाले वाहनों को दिक़्क़त नहीं होगी,
क्या हमने ऐसा करके￰ उचित किया है?
इस तस्वीर के माध्यम से हम नैनीताल के प्रमुख
अघोषित पार्किंग स्थलों
जैसे ज़िलाधिकारी आवास मार्ग, ठंडी सड़क, बीडी पाण्डे के
पीछे वाली सड़क,
मल्लीताल थाने के पीछे
लकड़ी टाल के नज़दीक़,
चीना बाबा मंदिर से
आयकर आयुक्त वाली सड़क और भी मशहूर पार्किंग स्थल हैं
जिनसे आपको रूबरू करा रहे हैं ताकि जब कभी नैनीताल आना हो तो शर्माइएगा नहीं,
निडर होकर आप भी अपनी गाड़ी खड़ी करियेगा,
वो भी “फ्री “

<

p style=”text-align: justify;”>हाहाहा ….
क्या कहा “हल्द्वानी”
अरे नहीं जनाब
हल्द्वानी तो इस मामले में भी
दो क़दम आगे है ..
हल्द्वानी की शराफ़त का
यहीं से आपको अंदाज़ा हो जाएगा, जनाब
तिकोनिया चौराहे से
शुरू होने वाले केनाल रोड को तो
आपने देखा ही होगा
और उसका आजकल का ज़बरदस्त हाल भी देखा होगा, जहां लगभग 5 साल पहले
परिंदा ही पर मार सकता था , लेकिन अब परिंदे तो दूर-दूर तक
नज़र नहीं आते,
बस
बन्दे ही बन्दे दिखते हैं,
और वो बंदे जब उस रोड पर आते हैं तो सड़क किनारे
गाड़ी खड़ी करके अपने
ज़रूरी काम निपटाते हैं,
प्रत्येक वाहन स्वामी इस ख़ुशफ़हमी में रहता है,
जैसे गाड़ी के साथ उसने
रोड की भी रजिस्ट्री करा ली हो जहाँ चाहे वो गाड़ी खड़ी कर देंगे, फिर वहां जाम लगे या झाम उनकी बला से,
यहां से थोड़ा आगे जाएंगे
तो आप पाएंगे दुर्गा सिटी सेंटर
के एरिया का अस्त व्यस्त हाल, जिसकी मर्ज़ी जहां आयी,
उसने वहां गाड़ी टिकाई

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, हल्द्वानी, उधम सिंह नगर, काशीपुर, रामनगर के
साथ-साथ लगभग हर क्षेत्र का यही हाल है,
जहाँ तक मुझे ज्ञान है
उत्तराखंड के लगभग
प्रत्येक शहर में पुलिस है,
हाँ वो अलग बात है उसे हेलमेट …
सॉरी अब तो
“डबल हेलमेट” वाला चालान काटने में समय कहाँ होगा, अघोषित निःशुल्क पार्किंग पर कार्रवाई करने का,
अरे …वो ज़रूरी भी है,
कोई अपने घर से
अपनी पत्नी को लेकर
अस्पताल जा /आ रहा हो और
उसने हेलमेट नहीं पहना हो तब तो ये अव्वल दर्जे का अपराध माना जाऐगा,
उसका चालान होना ही चाहिये, आख़िर सुरक्षा भी कोई चीज़ है
ये अलग बात है राजस्व उससे बड़ी,

<

p style=”text-align: justify;”>धन्य हो,
उत्तराखंड पुलिस ,
बाई गॉड,
असली मित्र तो
आप ही हो हमारी,
उफ़्फ़,
कितना ख़याल
रखती हो हमारा,

<

p style=”text-align: justify;”>अब हमारे हेल्मटिया चालान
के चक्कर में, कार से
भले ही कोई शातिर
मुजरिम निकल जाये,
परवाह नहीं करते,
लेकिन 100 का चालान
कटना चाहिये,

<

p style=”text-align: justify;”>वो कहते हैं ना,
रघुकुल रीत
सदा चली आयी ….
अपराधी जाये,
पर चालान न जायी
(अब ये मत
कहियेगा ऎसे नहीं था)

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में
उत्तराखंड
पुलिस प्रशासन से
हमारा अनुरोध है कृपया
हेलमेट चालान से
थोड़ा हाथ रोककर
(पार्ट टाइम में ही सही)
शहर की अन्य स्थितियों से भी अवगत हो जाएँ,
अघोषित पार्किंग,
युवाओं में बढ़ती
नशे की आदत,
विशेषकर हल्द्वानी की आपराधिक घटनाओं
पर अंकुश लगाने की भी
कभी- कभी ज़हमत
उठा लिया कीजिये,

<

p style=”text-align: justify;”>हाँ, इससे थोड़ा नुकसान
तो ज़रूर होगा,
एक-दो चालान
कटने रह जाएंगे
लेकिन क़सम से
अगर अपराध का ग्राफ
कम हो गया न,
तो आम नागरिकों के
साथ-साथ आपको भी
चैन की नींद आएगी,
करके देखिये
अच्छा लगता है…

<

p style=”text-align: justify;”>सावधानी ही
समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-9 : 377 के दौर में me too

<

p style=”text-align: justify;”>क्या सही ?
क्या ग़लत ?

<

p style=”text-align: justify;”>साहिबान
सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर
ये “#मीटू” है किस बला का नाम और इसकी शुरुआत कैसे हुई ?

<

p style=”text-align: justify;”>तो जनाब
क़रीब 12 साल पहले
अमेरिका की सामाजिक कार्यकर्ता टेरेना बर्क ने
ख़ुद के साथ हुए,
यौन शोषण का
ज़िक्र करते हुए,
सबसे पहले इन
शब्दों का इस्तेमाल किया ,
हालांकि
उन शब्दों का असर
होने में थोड़ा टाइम लग गया ,
लेकिन वो कहते हैं न,
शब्द नहीं मरते ,
2017 में हॉलीवुड प्रोड्यूसर
हार्वे वाइंस्टीन पर
50 से ज़्यादा महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए ,
उसके बाद एक और हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी आरोप लगाए और
“# me too” के ज़रिये
अपनी बात रखी,
तत्पश्चात उनको हैशटैग करने वालों की संख्या 32 हज़ार से ज़्यादा पहुंच गयी
तब से ये “# me too” का
चलन बढ़ा है,
हमारे भारत में इसे लाने का श्रेय नहीं …नहीं बाबा …
आप तो हमेशा बेचारी
राखी सावंत को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं,
इस बार ये महान कार्य किया है , इमरान हाशमी की हीरोइन
तनुश्री दत्ता ने जो अपनी दाल गलाने अमेरिका गयीं थी
लेकिन कुकर फट जाने के कारण वो वापस भारत आ गयीं यहाँ आकर उन्होंने “# me too” ￰नामक कुकर लिया
जिसमें गणेश और नाना प्रकार की दाल गला दी,
जबसे ये दाल गलने की रेसिपी फेमस हुई है तब से हमारे भारत में सादी छवि वाले आलोकनाथ से लेकर पत्रकार से राजनेता बने एम जे अकबर तक लपेटे में गये, (आरोप जाँच का विषय है)
बहरहाल,
दुनिया के सामने अब
me too के मायने ही बदल गए,
भई
पहले ज़माने में कोई
अच्छा लगता तो उससे कहा जाता था,
I Love U बदले में वो
Me too बोलता या बोलती

<

p style=”text-align: justify;”>फिर माननीय ने
क़ानून बदला और
लड़के लड़कों से और
लड़कियां लड़कियों से
I Love u और
me too कहने लगे,
फिर भी माननीय का
घड़ा नहीं भरा तो उन्होंने
किसी दूसरे की पत्नी को
किसी दूसरे युवक से
metoo metoo
कहने की आज़ादी दे दी ,

<

p style=”text-align: justify;”>अब तो इस me too ने प्यार के इज़हार की परिभाषा ही बदल दी ,
अब इसका मतलब हो गया ,
स्त्री के साथ
छेड़छाड़, बदतमीज़ी
या शोषण
हम किसी भी हालत में ये नहीं कहना चाह रहे हैं कि
महिलाओं को
सुरक्षा का अधिकार या
किसी प्रकार की आज़ादी नहीं हैं , हम महिलाओं का सम्मान
करते हैं लेकिन
ये तो सभी ने सुना होगा
किसी भी चीज़ की अति
विनाश को आमंत्रित करती है
कहीं ऐसा न हो
अधिकार, आज़ादी की
अति उपलब्धता
पुरुष और स्त्री के बीच इतनी गहरी खाई बना दे,
जिसे पाट पाना
फिर किसी क़ानून के हाथ में न रह जाये…

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में
हमारा समस्त
स्त्री व पुरुषों से
विनम्र निवेदन है
कृपया
प्यार, स्नेह ,
सम्मान और आकर्षण
एक दूसरे के प्रति बनाये रखें,
क्योंकि यदि समय रहते
हम नहीं सम्भले तो
आनेवाला समय
अपने हाथों में इतने भयंकर उपकरण लाने वाला है
जिसके चंगुल में एक बार
फंसने के बाद निकलना
असम्भव होगा,
इसलिए मायावी जाल में
खुद को फंसने न दें,
इनका पल भर का आकर्षण
हमको जीवनभर के लिए
तन्हा कर सकता है,
और तन्हाई में हमारे साथ
सिर्फ़ और सिर्फ़ तन्हाई होती है जो हमारे मुंह में पानी नहीं
डाल सकती,
उसके लिये परिवार का होना ज़रूरी है,
नस्लों का होना ज़रूरी है ,
ये सार्वभौमिक सत्य है कि
377 को मानने वाले चाहे कितनी ही जुगत लगा लें,
अपने ख़ून से
अपना कुटुंब नहीं बढ़ा सकते,
उन्हें पूर्वजों के पद चिन्हों पर ख़ुशी से या मजबूर होकर
चलना ही होगा …

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

 

अंक-8: ग्लूकोज-रिस्क पर बीडी पांडे जिला अस्पताल

<

p style=”text-align: justify;”>मोदी स्वास्थ्य योजना
“आयुष्मान”

( योजना का नाम )

बनाम

बी.डी. पाण्डे ज़िला चिकित्सालय , नैनीताल

(योजना में पलीता लगाने वाले प्रबल दावेदार का नाम )

<

p style=”text-align: justify;”>दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना कही जाने वाली “” आयुष्मान स्वास्थ्य योजना”
का
प्रधानमंत्री समेत भारत के 26 राज्यों व
6 केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने एक साथ
हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ किया था ,
बहुत नेक क़दम है , फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी
चाहे लाख योजनायें ले आयें लेकिन
उत्तराखंड का प्रसिद्ध
पर्यटन स्थल जिसे
सरोवर नगरी नैनीताल के नाम से जाना जाता है ,
वहां मुख्य बाज़ार क्षेत्र में
अँग्रेज़ी शासन में बनी
भव्य इमारत मौजूद है,
जिसमें राजकीय बी.डी.पाण्डे ज़िला चिकित्सालय नाम से
एक अस्पताल जैसा कुछ
चलाया जाता है,
यहाँ ‘अस्पताल जैसा’ शब्द इसलिए इस्तेमाल किया गया क्योंकि वहां अस्पताल के नाम पर सिर्फ़ वहां नियुक्त चिकित्सकों को मोटा वेतन मिलता है ,
जिसके एवज़ में वो
फ़ाज़िल और क़ाबिल चिकित्सक
अस्पताल में आये
बुख़ार या सिर दर्द से पीड़ित मरीज़ का ऐसा उपचार करते हैं , ऐसा उपचार करते हैं कि
ग्लूकोज़ चढ़ा-चढ़ा कर उसको खली जैसा बलवान बनाकर ही मानते हैं…
आख़िरकार हार थक कर मरीज़ ख़ुद बोल पड़ता है …
साहिब जाने दीजिये …
अब मेरे बस की बात नहीं और ज़्यादा ग्लूकोज़ चढ़ाने की…
इतना सुनकर चिकित्सक की आँखों से आंसू बहने लगते हैं… ( मन में सोचते हुए कि आख़िर उनका एक्सपेरिमेंट कामयाब हुआ )
आंसू देखकर मरीज़ भी भावुक हो उठता है और चिकित्सक साहब की ख़ुशी की ख़ातिर
जाते – जाते एक ग्लूकोज़ की बोतल और चढ़वा लेता है …
तब जाकर उस मरीज़ को वहां से छुटकारा मिलता है …
फिर सीधा वो नयना देवी मंदिर में जाकर मत्था टेकता है….
प्रसाद चढ़ाता है और
मन में ठान लेता है कि
उस दिन को वो आज से 15 अगस्त के रूप में मनाएगा….

<

p style=”text-align: justify;”>जी बिल्कुल नहीं जनाब..
ऐसा मत सोचियेगा कि
यहां के
फ़ाज़िल और क़ाबिल चिकित्सक बुख़ार और मामूली सिर दर्द वाले सभी मरीज़ों को
ग्लूकोज़िया ट्रीटमेंट देते हों …
न न …
जब वो देखते हैं कि
कुछ रसूखदार लोग
मरीज़ के साथ आये हैं तो
उनको थोड़ी मेहनत भी करनी पड़ जाती है …
फिर
मरीज़ को ग्लुकोज़ के साथ-साथ आयरन , कैल्सियम की गोली भी खिला देते हैं …

<

p style=”text-align: justify;”>जब बहुत देर हो जाती है …
तो चतुरता दिखाते हुए चिकित्सक, मरीज़ को सीधे हल्द्वानी या दिल्ली ले जाने का परामर्श दे डालता है …
( मन में सोचते हुए कि आखिर कब तक इसे भी ग्लूकोज़ चढ़ाऊंगा ….
अपना सम्मान भी बनाये रखना है और वैसे भी हाई – प्रोफाइल मामला है …
कहीं लेने के देने न पड़ जायें)

<

p style=”text-align: justify;”>अब परेशानी में रसूखदार लोगों को भी वही उचित लगता है .. चिकित्सक महोदय सही कह रहे हैं ..
यहाँ रखकर रिस्क कौन ले …???
बोलकर अपने मरीज़ को हल्द्वानी या दिल्ली ले जाते हैं …

मुद्दा यही है ‘रिस्क कौन ले’ ????????

<

p style=”text-align: justify;”>जिस अस्पताल में नाम मात्र के चिकित्सक हों ,
संसाधन के नाम पर
जो अस्पताल सिर्फ़ ग्लूकोज़ से चल रहा हो …
क्या वो अस्पताल
दुनिया की सबसे बड़ी
स्वास्थ्य योजना का
पलीता लगाने में
कारगर साबित नहीं होगा???

ये तो सिर्फ़ छोटे से शहर नैनीताल की बात है …

<

p style=”text-align: justify;”>पूरे देश में न जाने कितने ऐसे
बी.डी.पाण्डे अस्पताल हैं
जो अपनी लचर व्यवस्था के कारण
ख़ुद बीमार हैं,

<

p style=”text-align: justify;”>देश के प्रधानमंत्री से
हमारा यही अनुरोध है कि
पहले बीमार अस्पतालों की
सेहत में सुधार लाना चाहिए ,
तत्पश्चात इंसानी स्वास्थ्य को सही करने की योजना बनानी चाहिये….

<

p style=”text-align: justify;”>”मंच”
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद)

अंक -7:  कैसे सरकारी स्कूल चलें हम…

कल के अंक में आपने पढ़ा
कि निजी स्कूल किस तरह से अभिभावकों पर
 मनमानी चला रहे हैं
और अभिभावक उनकी
हर शर्त मानने को तैयार हैं ….
आज हम बात करेंगे
सरकारी स्कूल के बारे में ….
 
तो श्रीमान …
सबसे पहले
हम अपनी लाइफ को
थोड़ा पीछे लेकर चलते हैं ,
न, न
ज़्यादा नहीं
बस ….90 के दशक
तक के हालात देखें ,
उसमें आप पाएंगे कि
सरकारी स्कूल का
बोल बाला था ,
एक एक क्लास में
100-150  बच्चे
प्रत्येक वर्ष होते ,
बच्चों की बढ़ती संख्या
को देखते हुए ,
उनके सेक्शन बनते
A, B,C….तब कहीं जाकर
बच्चे एडजस्ट हो पाते….
क्या कहा …..
पढ़ाई अच्छी नहीं होगी ????
नहीं नहीं …
उस समय ट्यूशन का
 ज़माना नहीं था ,
 जो भी था स्कूल था ,
इसलिए बच्चे क्लास में ही
मन लगाकर पढ़ लिया करते ,
अरे साहब …
अब उनकी बात तो
हम अभी कर ही नहीं रहे …
 
हाँ…हाँ…
सबके सब बच्चे तो
पढ़ाकू नहीं होते थे ,
कुछ स्कूल गोल मारने वाले
भी होते थे
 लेकिन वो भी शाम को घर जाकर पढ़ते ज़रूर थे …
इन सबके पीछे
मज़बूत कड़ी का
काम करते थे …
उस ज़माने के शिक्षक
जो …
बच्चो के माता –  पिता के
साथ साथ उनके दादा – नाना जी को भी जानते थे ,
तो गुरूजी कान खींचते वक्त
पापा का नाम तो नहीं लेते थे , सीधे दादा या नाना का
रौब दिखाते,
इसलिये बच्चा शर्म से
सर झुकाये
 शिक्षक की डांट सुनता रहता, कुल मिलाकर …
हिंदी , अंग्रेज़ी, गणित , विज्ञान सभी विषयों में
शिक्षक पारंगत होने वाले ठेरे…
तो रिजल्ट भी अच्छा आने वाला हुआ …..
हाँ…बस…
एक रोष था शिक्षकों में …
बच्चे तो कक्षा में बहुत थे ,
लेकिन जेब में पैसे कम
हुआ करते,
न ट्यूशन ,
न कोई कोचिंग इंस्टिट्यूट
का फंडा…
जो भी था , बस वही सरकारी स्कूल था ,
समय बदला और निजी विद्यालयों की क्रांति आ गयी ,
मोहल्लों में भी कुकुरमुत्तों की तरह छोटे -छोटे स्कूल उग गए …
इन कुकुरमुत्तों ने अंग्रेज़ी भाषा का ऐसा रौला काटा
और डर भी लगने लगा
 कि अगर अंग्रेज़ी नहीं पढ़ी
तो समझो दुनिया
अनपढ़ समझेगी आपको ..
बिल गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट के ज़रिये कंप्यूटर को घर -घर पहुंचाया …(उनका धन्यवाद )
 
अभिभावक इसी होड़ में
कि हमारा बच्चा कंप्यूटर सीखने में पीछे न रह जाये ,
(किसीने फैला दिया होगा कि आने वाले समय में हर काम कम्प्यूटर से होगा, लेकिन ये नहीं बताया कि कंप्यूटर चलाने वाला मनुष्य ही होगा )
इसलिये सब
अपने -अपने बच्चों को
सरकारी स्कूल से निकालकर निजी स्कूलों में डालने लगे ,
धीरे -धीरे सरकारी स्कूलों में
बच्चों की संख्या
घटती चली गयी …
पहले 90 बच्चों पर
एक शिक्षक होता था
आज 9 बच्चों पर
एक शिक्षक है ,
फिर भी शिक्षा की वो गुणवत्ता नहीं आ पा रही है ,
 जो 90 बच्चों की कक्षा में
आ जाती थी ,
जबकि आज सरकारी
विद्यालयों में बच्चों के लिए भोजन उपलब्ध  है ,
फीस बहुत ही कम,
पुस्तकें भी सरकार के स्तर पर काफी हद तक
मुफ़्त मिल जाती हैं ,
किसी तरह का कोई
अतिरिक्त शुल्क नहीं
लिया जा रहा ,
फिर भी अभिभावक
अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में डालने से
कतरा रहे हैं ….
आख़िर क्यों ???
शायद इसलिए कि
उन्हें लगता है
कहीं उनके बच्चे की अंग्रेज़ी के साथ खिलवाड़ न हो जाये ..
तो…
जनाब…
ऐसा बिल्कुल नहीं है , इस बात को दिल से निकाल दें , आज भी सी.आर.एस. टी.इण्टर कॉलेज , नैनीताल में
श्री सोबन सिंह बिष्ट जैसे
शिक्षक हैं
जो बच्चों पर अपनी
जान भी लगाने को तैयार रहते हैं , शहीद सैनिक विद्यालय में
श्री गोपी बोरा हैं जो
बच्चों को खेल में महारत हासिल कराने के लिए दिन रात
एक कर देते हैं ,
वहीं रा. प्रा.वि. बजेला, धौलादेवी अल्मोड़ा, के सहायक अध्यापक भाष्कर जोशी जी बच्चों की अंग्रेज़ी के साथ भविष्य को सँवारने में लगे हुए हैं,
ऐसे ही न जाने कितने …
सोबन सर, गोपी सर और भाष्कर सर हैं जो
सरकारी विद्यालयों में अपनी मेहनत, ईमानदारी और लगन से बच्चों के सर्वांगीण विकास को  तत्पर हैं ….
 
अंत में ….प्रशासन से नहीं
आज
अभिभावकों से हमारा अनुरोध है कि कृपया अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही
प्रवेश दिलाये,
सरकारी स्कूल की तरफ
आपका बढ़ता रुझान
 उन विद्यालयों की
खस्ता हालत में
सुधार ला सकता है ,
जिनमें बच्चों की संख्या
न के बराबर है
और सरकारी शिक्षक मोटी तनख्वाह (बिना काम किये)  खाने को विवश  हैं ,
 एक दो बच्चों में तो सरकारी शिक्षक का पढ़ाने का
मूड ही नहीं बनता ….
जिसके लिये
हम और आप ही ज़िम्मेदार हैं , हमने ही बच्चों को वहां न भेजकर सरकारी शिक्षकों को
काम टलाऊ बना दिया है ….
और हाँ … सिर्फ़ अंग्रेज़ी के चक्कर में ख़ुद के घर का गणित मत बिगाड़िए ….साहब….
 
बच्चे को ग्रामर पढ़ाइये ,
अंग्रेज़ी न्यूज़ पेपर दीजिये , अंग्रेज़ी में ख़ुद
बात करिये…
ज़्यादा जल्दी में हो तो
अंग्रेज़ी स्पोकन क्लास
शुरू करवा दीजिये ….
किन्तु इन भष्मासुर जैसे
इंग्लिश मीडियम स्कूल का शिकार मत बनिये….🙏🙏
 
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….
 
आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक-7: आज के स्कूल का वादा-पढाई कम, बिज़नेस ज़्यादा

पढ़ेगा इंडिया…तभी तो .
बढ़ेगा इंडिया…

भारतीय आम नागरिकों को
प्रोत्साहित करने के लिये
इससे अच्छा नारा नहीं हो सकता….
इसका नतीजा ये हुआ कि
मेरे एक मित्र के मन में
देशभक्ति वाला फुल टू भाव जाग्रत हुआ ,
और जोश में आकर
होश की दुकान बंद कर बैठा…
कहने लगा…
मैंने तो बच्चों को इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ाना है,
मेरे बच्चे बड़े होकर
चटर- पटर
इंग्लिश बोलेंगे
तो मुझे उन पर नाज़ होगा…
मैंने बोला… भाई
वो बात तो ठीक है लेकिन आजकल के ज़माने में
अंग्रेज़ी मीडियम का मतलब पता है ???
किसी ठीक ठाक स्कूल में
बच्चों का एडमिशन करने
जाओ तो
सबसे पहला बम
एडमिशन के नाम पर डोनेशन यानि दान
अपने सर पर फोड़ना पड़ेगा…
थूक दान, पीक दान , कूड़ा दान तो सुना था,
ये स्कूल दान भी कोई बला है,
ये एडमिशन टाइम पर
पता चलता है,

जी… जनाब …
एडमिशन फीस और डोनेशन….
(साहब…ये दोनों एक दूसरे को पहचानते तक नहीं )
इससे पैसा आपके पास से तो
चला जाता है लेकिन उसका एडमिशन फीस से
दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं होता,
वो अलग होती है,
फिर मंथली फी,
ऐकडेमिक फी,
कल्चरल एक्टिविटी फी,
स्पोर्ट्स फी,
लाइट फी,
बल्ब फी,
चॉक फी,
डस्टर फी,
जिस गेट से अंदर आये
उस गेट की फी,
जिस रास्ते पर चलकर आये उसकी टाइल्स फी,
जिस कैमरा ने तुम्हे कैप्चर किया उसकी सीसीटीवी फी,
करीब 9999 टाइप की फी जोड़कर (जिसमें स्कूल का मनोरंजन कर नहीं जोड़ा गया है , वो समय समय पर आपको बुलाकर आपसे वसूला जाएगा)
जब आपको बताया जाता है तो आपके पैरों से ज़मीन
और सर से आसमान
ज़रूर ग़ायब होता है,
लेकिन क्या करें,
सर से कफ़न भी तो
बांधा हुआ है,
आखिर हमारे पडोसी
शर्मा जी का बेटा भी तो यहीं पढ़ता है,
तो म्हारा बेटा
राजकुमारों से कम है के
वाली फीलिंग्स आ जाती हैं,
और हम चौड़े होकर
वो गोरी मैडम
की बातें सुनकर
यक़ीन करते चले जाते हैं,
उस टाइम तो सब मोह माया लगता है,
बस उस काउंसलर की बातों में सत्य के दर्शन होते हैं,
तो जहाँ-जहाँ मेमसाब
साइन करने को बोलती हैं,
धड़ा धड़ हम करते जाते हैं
(मात्र मुस्कराहट की इतनी ज़बरदस्त परफॉरमेंस को देखते हुए , छोटे -बड़े लगभग सभी स्कूलों ने फीमेल काउंसलर रखने की इस युग में ऐतिहासिक शुरुआत की थी)

तो साहब … मोटी रकम देकर
हो गया एडमिशन…
अब स्कूल से बाहर निकलते वक्त जब गेटकीपर ने सलाम ठोका,
तब तो बाई गॉड…
बिल गेट्स वाली अनुभूति हुई,
घर आकर मोहल्ले में
एक दिन की ब्रेकिंग न्यूज़ का हिस्सा बनने का अलग ही मज़ा है..
और फिर तो…
मज़े की शुरुआत हो जाती है,
स्कूल वाले आपको कभी बोर नहीं होने देते,
जैसे ही आप
रिलैक्स महसूस करोगे,
स्कूल से कॉल
आ जाती है,
अगले दिन बुलाया जाता है,
वहां आपके हाथ में
एक लिस्ट थमा दी जाती है
कि उक्त स्टेशनरी का सामान ( किताबें इत्यादि शामिल )
फलां दुकान से लाना है,
यूनिफार्म फलां से,
और अगर किसीने
गलती से पूछ लिया …
फलां से क्यों लाएं ???
कहीं और की नहीं चलेंगी
तब तो पूरे मजमे में
सब आपकी ही तरफ घूर कर
ऐसे देखेंगे जैसे
आपने देश के ख़िलाफ़
कोई टिप्पणी कर दी हो,
हद तो तब हो जाती है
जब पड़ोस वाले शर्मा जी की पत्नी भी
गिरी हुई नज़रों से देखने लगती हैं…
जैसे मन में सोच रही हों,
‘छी पुअर लोग , कहाँ से आ जाते हैं यहां , हुंह’……

ख़ैर….
स्कूल के आदेशानुसार
सारी चीज़ें उनके बताये हुए
अड्डे से ले ली जाती हैं,
( ऐसे में वो दिन दूर नहीं
जब घर के लिये टिंडे कौन सी दुकान से खरीदने हैं स्कूल वाले बताएंगे )
जिन बच्चों के अभिभावक
गाय की तरह सिर हिलाकर
हाँ में जवाब देते हैं,
उन्हीं बच्चों की बल्ले- बल्ले
होती है स्कूल में,
और जिन अभिभावकों ने
थोड़ी सी भी अधिकारों, जागरूकता या
नैतिकता वाली बात की,
स्कूल प्रशासन
अपने कोर शिक्षकों की
आपात बैठक बुलाकर
उस बच्चे के भविष्य पर
इमर्जेन्सी लगा देता है,
फिर तो उसे क्लास में
पानी की मोहलत भी
ऐसे दी जाती है
जैसे कर्फ्यू में ढील…
हैरत वाली बात है कि
बच्चों को पता नहीं कहाँ से
ये बातें पता लग जाती हैं
और वो सब भी
उस बच्चे से
कन्नी काटने लगते हैं,
ऐसा माहौल हो जाता है
मानो स्कूल ने
उसके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा चला दिया हो,

मतलब इतना भयंकर
माहौल बना देते हैं
कि बच्चा डिप्रेशन में
जाने को तैयार दिखता है,
चिंतित अभिभावक
अपने बच्चे को
बिना कोई शिकवा किये
स्कूल से निकाल लेते हैं,
दूसरे स्कूल में
डालने की सोचते हैं,
लेकिन अब कहीं एडमिशन मिलने को तैयार नहीं,
अजीब-अजीब से
बहाने बनाकर
हर स्कूल वाले टरका देते …

काफी दिनों के संघर्ष के बाद किसी स्कूल चपरासी के मार्फ़त पता लगता है कि
स्कूल  स्कूल मौसेरे भाई,

जब तक आप पहले स्कूल प्रशासन से माफ़ी नहीं मांगेंगे आपके बच्चे को
कोई एडमिशन नहीं देगा…
तब बेचारे….
जागरूक अभिभावक को
अपने बच्चे के
भविष्य के ख़ातिर
झुकना पड़ता है ,
वैसे दुनियाभर के
रंग-बिरंगे अभिभावक संघ
और समितियां बनी हुई होती हैं , लेकिन एन्ड टाइम पर
जब साथ देने की बात आती है …
सबके सब टें… बोल जाते हैं…

हाँ कहीं चाय -पकौड़ी मिलने वाली हो,
सबके सब अभिभावक हित की डींगे मारते नज़र आएंगे ,
या किसी स्कूल में कोई बलात्कार या छेड़छाड़ की घटना हो जाये, उसके बाद
बैटरी फुल चार्ज करके
स्कूल प्रशासन को कोसते हैं , लेकिन कभी भी
घटना से पहले स्कूल के सामने सेल्फी तक नहीं लेते…

अंत में
मेरा प्रशासन (राज्य व स्कूल) से अनुरोध है
कि कृपया शिक्षा को शिक्षा ही रहने दें , व्यवसाय न बनाएं ,
आज अपने बच्चों को महंगी शिक्षा देने की कोशिश में अधिकतर अभिभावक खुद को गिरवी रखकर
स्कूल का पेट भर रहे हैं ,
लेकिन आजकल स्कूल का पेट इतना बड़ा हो गया है
कि भरने में ही नहीं आता…
माँ-बाप दोनों मिलकर
लगे पड़े हैं बच्चों की फीस जमा करने के चक्कर में ,
कोई ज़मीन बेच रहा है,
कोई ज़मीर बेच रहा है,
सब मजबूर कर दिए गए हैं…
इन होटल नुमा फाइव स्टार स्कूलों ने…
आये दिन
पैसों के लिए मुंह खोले इस बिज़नेस क्लास वर्ग पर किसी प्रकार स्पीड गवर्नर लगाकर ,
कृपया अभिभावकों की बेसाख्ता, बेतरतीब,
असहाय व अस्त-व्यस्त
होती ज़िंदगी को
पुनः पटरी पर लाने का
प्रयास करें…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

आज़ाद
मंच
नैनीताल से

अंक -6 : चिराग़ तले अँधेरा ….

 
ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न ,
उसके दो भाग किये गए हैं , जिससे हमारे सामने सारी तस्वीर साफ़ हो सके …
ऊपर से पहला भाग रेगिस्तान वाले राज्य राजस्थान के पार्क का है , दूसरा भाग हरी -भरी प्रकृति की गोद में बैठे , उत्तराखंड के पार्क का  है ….
जी आपके चेहरे की मुस्कान बता रही है कि आपने ख़त का मजमूं भांप  लिया है …. लिफ़ाफ़ा देखकर ….
वाह …बधाई के पात्र हैं आप …
और बधाई से याद आया हमारे शहर नैनीताल में कैपिटोल सिनेमा के सामने कुछ वर्ष पहले बड़ी गर्मजोशी के साथ , एक पार्क बनाया गया था , ज़ाहिर सी बात है , मोटा पैसा स्वीकृत हुआ होगा ,
नहीं नहीं …
मेरा इशारा अभी दूसरी तरफ़ नहीं …
( आप भी न …जहाँ पैसे के नाम आया , सोचते हो खा लिया होगा )
ऐसा नहीं है ….कुछ पैसा लगाया भी गया , और कुल मिलाकर देखने लायक़ ठीक- ठाक पार्क तैयार किया गया , चलो ठीक है ..
हम ख़ुश हुए ….कुछ नहीं बोले …
चलो कुछ तो अच्छा हुआ …
ये सोचकर उस उस मामले  पर पर्दा डाल दिया, किसने क्या खाया ???
क्या पिया ???
क्यूंकि साफ़ बात ये है भैया …
न हम खाते-पीते हैं , न बात करते हैं …
तो कहाँ थे हम …
जी…तो पार्क हो गया कम्प्लीट  ..
जनता ख़ुश….
फिर वही हुआ , जो हर फिल्म में हीरो  की फैमिली के साथ होता है ,
खुशियां को विलेन की नज़र लग गयी , और पार्क को तोड़ने के टेंडर निकल गए …
टेंडर पाकर
आख़िरकार ज़ालिम मोगेम्बो ने पार्क तोड़ भी दिया ,
हाँ…हाँ…
अब भला फ्री में तोड़ने की इतनी ज़बरदस्त सेवाएं कौन देगा भला ???
कोई जिगरवाला नहीं है ऐसा …
टूट गया पार्क ….
हो गए ख़ुश..
 
अरे  सॉरी…सॉरी
मोगेम्बो इतनी जल्दी ख़ुश कहाँ होता है ,
अभी तो एक बार और टेंडर डलेगा, फिर बनाने का ठेका मिलेगा ,
और प्रलय आने तक निरंतर यही तोड़ने , बनाने की  प्रक्रिया जारी रहेगी …..
तब कहीं जाकर हमारे राज्य के मोगेम्बो ख़ुश हो पाएंगे …
वैसे…मेरे समझदान में एक बात नहीं आ रही है …
जहाँ बारिश बहुत कम होती हो,
गर्मी ज़्यादा होती हो ,
 और पर्यावरण को रेगिस्तान ने चारों ओर से घेर रखा हो ,
फिर वहां के पार्क इतने हरे- भरे कैसे ???
क्या वहां कोई मोगेम्बो नहीं है , जो हमारे यहाँ की तरह पहले पार्क बनाये , फिर तोड़े , फिर बनाये ,
 **बना –  तोड़ –  बना** फॉर्मूले  पर सतत प्रयास जारी रखे …
मैं पहले ही सोच रहा था …
आपका जवाब यही होगा …
कि हमारे राज्य और राजस्थान राज्य में बहुत अंतर है , वहां के लोग रिस्क लेना नहीं जानते , जो चीज़ एक बार बन गयी सो बन गयी , उसके बाद उसे अच्छी तरह मेन्टेन रखते हैं बस , और सादा जीवन जीने में विश्वाश करते हैं ,
लेकिन हमारे यहां के लोगों में टैलेंट कूट- कूटकर भरा है (अब ये भरा कौन सी मशीन से है वो
एल.वाई.यू .वाले भी ढूंढ रहे हैं) उसी टैलेंट के माध्यम से ये मोगेम्बो लोग हर शहर में पार्क बना-तोड़-बना के सिद्धांत पर दिल की गहराईयों से जज़्बाती हुए पड़े हैं …और नैनीताल ही नहीं पूरे राज्य को दीमक की तरह खोखला किये जा रहे हैं …
 
अंत में प्रशासन से हमारा अनुरोध है कि या तो कुछ पार्क की तरह प्रत्येक पार्क को निजी संस्थाओं को गोद दे दिया जाये , जिससे उनका लालन-  पालन एक शिशु  की तरह प्यारभरी हो ,
या बना -तोड़ -बना जैसा खेल खेलकर आम जनता के एहसासों(  जिसमें मूलरूप से उसका अदा किया हुआ कर शामिल है )  के साथ न खेला जाये …

अंक -6 : वन संरक्षक कार्यालय का अद्भुत पर्यावरण संरक्षण : आपके चरण कहाँ हैं ???…

<

p style=”text-align: justify;”>उत्तराखंड को देवों की भूमि यानि देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है ,
यहां के लोग सभ्यता और शालीनता के लिये जाने जाते रहे हैं , और वो बात भी आपने सुनी होगी कि गेंहू के साथ घुन पिस जाते हैं ,
जी हाँ …
बस अब इसको थोड़ा उल्टा टाइप से कर देते हैं ,
हमारे यहां घुन के साथ गेहूं पिसने का रिवाज पनपने लगा है साहब ….

अब यहाँ सस्पेंस करके कुछ होने वाला है नहीं , इसलिए आपको फिल्म के टीज़र में ही पता चल जाएगा कि घुन किस किरदार को कहा जा रहा है …

<

p style=”text-align: justify;”>बहुत बढ़िया …जनाब
आपने तो पारखी नज़र का बेहतरीन इस्तेमाल करके कमाल दिखा ही दिया आख़िर…

<

p style=”text-align: justify;”>जी हाँ …
हमारे नैनीताल में वन संरक्षक कार्यालय का जो दफ़्तर जैसा है न …जिसमें
सबके सब काफ़ी प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी विराजमान हैं ,
अरे वही …. जो वृक्ष आदि बचाने का बीड़ा उठाये रहते हैं ( ऐसा उनको लगता है, कितने वृक्ष वो कैसे बचा रहे हैं , उनका चित्रण अगले अंक में )
बस…
हाँ थोड़ा इधर घुमाइए …
जी बिल्कुल सही …अब ठीक है …
तो उनको ऐसा लगता है वो वनों की रक्षा के लिये नियुक्त किये गये हैं …
अब चाहे पर्यावरण में कितनी ही गंदगी फ़ैल जाये , उससे उन्हें क्या ???
वो तो गंदगी में अपने कार्यालय का कूड़ा डालकर चार , पांच , छह ….
अरे मालिक…
यूँ समझ लो
20 -25 चाँद लगा देते हैं …
इतने ज़्यादा चाँद इसलिये भी लग रहे हैं क्योंकि इनका कूड़ा किसी कूड़ेदान में नहीं डलता बल्कि
खुले में सड़क के किनारे डाला जाता है ,
और क़ाबिलेग़ौर बात ये है कि
कूड़ा डाला तो डाला..
ज़्यादा होने पर उसे स्वाहा भी कर दिया जाता है …
बाई गॉड ….
एन जी टी का भी ख़ौफ़ नहीं ….
एन जी टी ….क्या कहा ???
ये किस चिड़िया का नाम है ,
हमारे पेड़ों पर तो बैठे हुए हमने कभी देखी नहीं …
एन जी टी वाली चिड़िया …
अब इस बहस में कौन पड़े …

<

p style=”text-align: justify;”>इसलिये मान्यवरों से डायरेक्ट
निवेदन है कि कृपया अपने कार्यालय का कूड़ा खुले में न फेंके तथा चतुरता दिखाते हुए जलाये भी नहीं ….
ये पब्लिक है सब जानती है , अब आपके मुंह पर नहीं बोलती वो अलग बात है …
लेकिन आपके पीछे दिल खोलकर तारीफ़ होती है आपकी …

<

p style=”text-align: justify;”>इसलिए अपनी तारीफ़ अधिक न करवायें, ….
स्वच्छता सबसे बड़ी उपलब्धि है ..
एक बार
करके देखिये अच्छा लगता है …

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है ….

<

p style=”text-align: justify;”>मंच
नैनीताल से
‘आज़ाद’

अंक – 5 : पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट’ की ’23 लाख की धूल’

<

p style=”text-align: justify;”>ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं न असल में
ये तस्वीर नहीं है …

तक़दीर है.. तक़दीर

उन लोगों की जो इस तस्वीर के एम.एफ.हुसैन हैं…

ज़ाहिर सी बात है सब यही पूछेंगे….

वो कैसे ???

<

p style=”text-align: justify;”>तो भैया, वो ऐसे…
ये तो सबकी हार्ड डिस्क में
होगा ही कि
कुछ दिन पहले लोअर माल रोड के कुछ हिस्से ने ताल में छलांग लगा दी थी,
अब ये दीगर बात है कि उसने वैसा क्यों किया था , उस पहलू पर चर्चा किसी और दिन… (फ़िलहाल आप भी उसके पहलू खोजने के मूड में नहीं लग रहे…हैंं)

<

p style=”text-align: justify;”>ख़ैर…
सड़क के क़रीब 20 – 25 मीटर लम्बाई वाले हिस्से ने
ताल में कूद लगाई  जिसकी चौड़ाई लगभग 10 – 20 फ़ीट रही होगी,
रंग डामरी और दोनों कानों में सफ़ेद रंग की झुमकियां पहने था,
रात के अँधेरे में तो उसकी झुमकियों से लाल रंग की जो जगमगाहट होती थी
वो और कमाल लगती थी….

जिससे झील के किनारे और खूबसूरत लगने लगते…

<

p style=”text-align: justify;”>हाय! क्या गज़ब नज़ारा होता था,
डोंट बी इमोशनल…

आगे क्या होता है ये देखिये …

<

p style=”text-align: justify;”>फिर… उस ख़ुदकुशी के बाद सब हैरत में पड़ गए, ….
क्या करें, क्या न करें वाली पोज़िशन हो गयी…

<

p style=”text-align: justify;”>सड़क के नातेदार, रिश्तेदार सब परेशान…
आनन – फ़ानन में सूबे के मुखिया से उतने हिस्से की सर्जरी के लिए मदद की गुहार लगाई,

देर सबेर ही सही प्रशासन से सर्जरी की आधी रकम आ गयी,

<

p style=”text-align: justify;”>उम्मीद तो थी कि बड़ी रकम आएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं और ये कहा गया की दूसरी खेप बाद में आएगी… पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट द्वारा
सोचा तो गया था, कि बड़ी रकम आएगी तो
किसी बड़े डॉक्टर से सर्जरी करवा लेंगे…
लेकिन
आधी रकम देखकर तो
पूरे ख़ानदान के चेहरे उतर गए, जैसे बीमे की रकम हाथ से निकल गयी हो,
फिर क्या था,
जितना गुड़ डलेगा, उतनी मिठास भी आएगी,
और यहाँ तो गुड़ क्या
चीनी की रकम तक नहीं आयी…

<

p style=”text-align: justify;”>अब सारे ज़िम्मेदार लोगों ने सलाह मशविरा किया और सब सेटिंग होने के बाद
ये तय हुआ कि कहीं किसी एक्सपर्ट या स्पेशलिस्ट को बुलाने की ज़रूरत नहीं है,
हमारे यहां के फाज़िल और क़ाबिल डॉक्टर्स ही
अब उसकी सर्जरी करेंगे…
झोलाछाप हुए तो क्या हुआ,
वो भी डॉक्टर ही कहलाते हैं,

<

p style=”text-align: justify;”>तो फिर क्या था, उन बेहतरीन डॉक्टर्स ने मिट्टी और लोहे के एंगल की बेजोड़ चिकित्सा से
उस क्षतिग्रस्त हिस्से की सर्जरी धड़ा धड़ कर डाली…

<

p style=”text-align: justify;”>ऊपर से प्रेशर था…
ऑपरेशन भी जल्दी पूरा करना था, इसलिए क्या सही, क्या गलत ???
हमें पूछने की फुर्सत नहीं,
उन्हें बताने की…

<

p style=”text-align: justify;”>और इसी के साथ
32 दिन में ऑपरेशन सक्सेसफुल हुआ.. (उनकी नज़र में)

<

p style=”text-align: justify;”>उसकी सक्सेसफुलनेस का अंदाज़ा आपको भी लगाना हो तो कभी पधारो म्हारे देस…
क़सम से अगर
गोबर पर चलने वाली फीलिंग नहीं आयी तो,
जब कहना…

<

p style=”text-align: justify;”>अब आलम ये है कि जितने वाहन उस मिट्टी- सर्जरी वाले
हिस्से पर से जब गुज़रते हैं न,
इतनी धूल उड़ाते हैं,
इतनी धूल उड़ाते हैं
कि सामने कैफ़े कॉफी डे में कॉफी पर धूल की चॉकलेट जम जाती है,
और आस-पास की दुकानों का सामान इतना गंदा हो जाता है जिसे टूरिस्ट देखने से भी कतराते हैं…

<

p style=”text-align: justify;”>तो हो गए न…
आम के आम गुठलियों के दाम…
सड़क तो बनी चौपट,
ऊपर दुकानदारों का
धंधा भी कर दिया चौपट…
अगर किसी को अपने श्याम रंग से शिकवा है तो
इतने हिस्से पर कुछ देर विश्राम कर लें…
फिर फेयर एंड हैंडसम वाला ऐसा निखार आएगा वो ख़ुद को भी नहीं पहचान पाऐगा….

<

p style=”text-align: justify;”>तो है न…
हमारे यहाँ कमाल के लोग
और उनमें ग़ज़ब की क़ाबिलियत…..

<

p style=”text-align: justify;”>अंत में मेरा प्रशासन से यही अनुरोध है कि
चलो माना जो भी हुआ,
उस पर डामर डालते हैं…
( क्योंकि मिट्टी का हाल तो सब देख ही चुके हैं )
जैसी भी हुई सड़क
तैयार तो हुई…
लेकिन क्या
उस उड़ती धूल की भूल का
कुछ उपाय किया जा सकता है ???…
जिससे नगरवासियों के साथ- साथ पर्यटकों को भी नैनीताल में आनंद की अनुभूति हो…

सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

<

p style=”text-align: justify;”>मंच
नैनीताल से
‘आज़ाद’

अंक -4 : मेरी आदर्श… नरक पालिका नैनीताल

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p style=”text-align: justify;”>किसी भी नगर की पालिका को अपना शहर नरक बनाकर दुनिया के नक़्शे में अपनी जगह बनानी हो तो …
अरे भाई ….
चौंकिये नहीं ….
इसमें खास बात ये है कि
आपको करना कुछ नहीं है …
सबसे पहले अपनी कार्यशैली नैनीताल की नरक पालिका की जैसी महान बना लें…
हाँ…ये ज़रूर है कि इतनी आसानी से इतना उम्दा क़िस्म का नकारापन और नालायक़पन नहीं आ सकता ….उसके लिये दिन – रात की हरामख़ोरी अनिवार्य है …

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p style=”text-align: justify;”>उसके लिये कुछ आसान से उपाय नीचे दिये जा रहे हैं ….
उम्मीद है उन्हें अपनाकर आप भी अपने शहर की पालिका को सर्वश्रेष्ठ नरक पालिका बनाने में क़ामयाब हो जाएंगे…

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p style=”text-align: justify;”>तो सबसे पहले करना ये है कि श्री अमिताभ बच्चन के सफ़ाई का सन्देश देने वाले
बड़े -बड़े फ्लैक्स छपवाकर शहर में चारों तरफ़ लगवाने हैं …
उसमें साफ़ साफ़ लिखवा देना ” वीरू अपना कूड़ा ख़ुद उठाना “
बस…हो गया …
अब अपने बंदों से सोनम के मोमोज़ मंगवाकर खाओ …
तुम भी आराम का वेतन पाओ और अधीनस्थों से भी बोलो आराम फरमाओ…
नगर के किसी भी वार्ड में चाहे कितनी ही गंदगी फैल जाये, उसमें चाहे ज़िलाधिकारी कार्यालय मार्ग या ज़िलाधिकारी आवास के द्वार पर जमा गंदगी ही क्यों न शामिल हो,
तुम्हें क़सम है सम्राट किल्बिस (एक प्रसिद्ध धारावाहिक का किरदार) की सफ़ाई नहीं करवानी है …
शहर में हर चौराहे पर तैनात आवारा कुत्तों की फौज का भी कुछ इलाज नहीं करना है
फिर चाहे बाहर से आये सैलानी की मासूम बच्ची की मौत का कारण ये आवारा कुत्ते ही क्यों न बने …
(इसमें रोज़मर्रा लोगों को काटने का आंकड़ा शामिल नहीं है )

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p style=”text-align: justify;”>जब तक अतिव्यस्त रहने वाले हमारे ज़िलाधिकारी महोदय साक्षात् अवतरित होकर निर्देश न दें (वो तो अच्छा है अभी तक अपने ही आवास के द्वार की गंदगी के विषय में साहब को ज्ञान नहीं है वरना ख़ैर नहीं थी किसी की )
या माननीय उच्च न्यायालय अपने संज्ञान में लेकर आदेश न दे ….

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p style=”text-align: justify;”>अरे भाई …
आम जनता की क्यों टेंशन ले रहे हो …
जब ज़िले के साहिबान के पास ही समय नहीं है अपने शहर को देखने का
फिर यहां की जनता तो
ख़ुद को
सीएम टाइप का फ़ील करने वाली ठेरी..
वो कहाँ मुंह लगेगी तुम्हारे …

ख़ैर जाने दो ….

ये तो रहा सफ़ाई इत्यादि का स्मार्ट फॉर्मूला…

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p style=”text-align: justify;”>अब सुनो पैसा कैसे कमाया जाता है ….
टेंडर निकालो , ठेके दो (पार्किंग, चुंगी इत्यादि के ),

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p style=”text-align: justify;”>सफ़ाई हो न हो ..
हर घर से सफ़ाई कर ,
भवन कर आदि समय रहते वसूल लेना …
स्ट्रीट लाइट के नाम पर ख़ाली खानापूर्ति करना

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p style=”text-align: justify;”>हाँ…लेकिन भाई
मुख्य रास्तों पर तो लाइट लगवा देना
क्योंकि शाम को जज साहब का राउंड होता है …
उनकी नज़र पड़ी तो …..
समझ रहे हो न …..

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p style=”text-align: justify;”>हाँ कार्रवाई के नाम पर
ग़रीब फड़ व्यवसायियों को ज़रुर खदेड़ना, उनका सामान ज़ब्त कर लेना ,
उनके साथ अभद्र व्यवहार करना क्योंकि वो मजबूर हैं …
आप कुछ भी कह सकते हो कर सकते हो,
ये सब करके आप अपना काला चिट्ठा सफ़ेद बना सकते हो …
और ग़रीबों के अरमानों की लाशों पर खड़े होकर अपनी इमारतें ऊँची बना लेना …

<

p style=”text-align: justify;”>बस फिर क्या है ….
बन गए तुम …
अपने शहर के शहंशाह ….
और भटकने दो आम आदमी को
अँधेरी रातों में …
सुनसान राहों पर ….

हा हा हा हा

<

p style=”text-align: justify;”>तो….
बोलो
भइया….

नरक पालिका की जय …

<

p style=”text-align: justify;”>मंच
नैनीताल से …
मो. ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद )

अंक – 3 : न रहेगा पोस्टल आर्डर-न लगेगी आरटीआई बनाम अधिकार को दबाने की साज़िश….

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p style=”text-align: justify;”>सूचना अधिकार अधिनियम – 2005
जिसे हम सब इसलिए जानते हैं क्योंकि ये सरकारी व्यवस्था की पोल खोलने में काफ़ी कारगर साबित हुआ है, सरकारी दफ्तरों में आर.टी.आई. का ख़ौफ़ भी देखने को मिलता है ,
ख़ुशी होती है कि भ्रष्टाचार पर कहीं न कहीं लगाम तो ज़रूर लगी है…

<

p style=”text-align: justify;”>सब कुछ ठीक चल रहा था ,
आर.टी.आई. के ज़रिये हर विभाग अपनी जानकारियां देने में जुटा हुआ था , जिससे विभागों के भांडे भी फूट रहे थे ,
फिर अचानक कहानी में ट्विस्ट आ जाता है ,
नैनीताल जिले के डाक घरों से पोस्टल ऑर्डर रातों रात
ग़ायब हो जाते हैं …

रविवार को एक समाचार पत्र में ख़बर आई कि हल्द्वानी के प्रधान डाकघर में भी पोस्टल ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं ,

अब सवाल ये उठता है कि डाक घरों से सारे पोस्टल ऑर्डर कहाँ ग़ायब हो गए…???

<

p style=”text-align: justify;”>मुझे यक़ीन है आप सब जानते होंगे कि
कोई आर.टी.आई. लगाने के लिए ₹10 का पोस्टल ऑर्डर लगाना अनिवार्य है..
उसके बिना सम्बंधित विभाग आपको वाञ्छित सूचनायें देने में असमर्थ हो जायेगा…
तो कहीं न कहीं
पोस्टल ऑर्डर को ग़ायब करना पिछले दरवाज़े से भ्र्ष्टाचार को अंदर बुलाना है
और अगले दरवाज़े से सूचना अधिकार अधिनियम को ठेंगा दिखाने जैसा…

<

p style=”text-align: justify;”>इसमें आपकी तरह मैंने भी यही सोचा था ,
जो आप सोच रहे हैं,
कि इसमें डाकघरों से क्या मतलब???
कोई उनके ख़िलाफ़ आर.टी.आई. का इस्तेमाल थोड़ी न कर रहा था

<

p style=”text-align: justify;”>जी बिल्कुल सही सोचा आपने….
लेकिन अगर हम थोड़ा गहराई से इस बात को सोचें….
तो हमें इसके पीछे किसी न किसी साज़िश की बू ज़रुर नज़र आएगी….

<

p style=”text-align: justify;”>और
ये साज़िश आर.टी.आई. को पंगू करने के लिये बनाई गयी है ,

<

p style=”text-align: justify;”>न रहेगा पोस्टल ऑर्डर,
न लगेगी आर.टी.आई…

<

p style=”text-align: justify;”>एक कहावत में वो किसको???
किसका???
मौसेरा भाई बताया गया है ????

जी हाँ ….

बिलकुल वही हाल है ,

<

p style=”text-align: justify;”>वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी …
विभागों में काफ़ी टैलेंटेड लोग बैठे हैं ,
वही फॉर्मूला अपना दिया …
अधिकार भी मर जाये और अधिनियम भी न टूटे …

अब सांप का नाम लेकर मैंने अपने पीछे नागिन थोड़ी न लगानी है ….

<

p style=”text-align: justify;”>ख़ैर….
मुद्दे पर आते हैं …

<

p style=”text-align: justify;”>पोस्टल ऑर्डर तक़रीबन
पूरे ज़िले से ग़ायब हैं
(शायद अब तक प्रदेश की सीमा पार न कर दी हो )
लेकिन इसमें मज़े की बात ये है कि
हर पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी में कॉन्फिडेंस पता नहीं
किसने ठूँस -ठूँस कर भर दिया है , पोस्टल ऑर्डर के बारे में पूछने पर हर कर्मचारी इस तरह आँखें भीगा कर जवाब दे रहा है …
जिसका कोई जवाब नहीं ..
वो कहता है …
“बस अभी ख़त्म हुए हैं , थोड़ी देर पहले”(और उसके भोलेपन को देखकर एक पल के लिये लगता है जैसे ताल में कूद जाऊं, उस पर शक़ किया)

<

p style=”text-align: justify;”>और ये क़िस्सा ठीक वैसा ही हो जाता है …
जो मल्लीताल में पंसारी जी की दुकान पर लिखा रहता है,
“आज नक़द …कल उधार”
फिर …न
कभी वो कल आता है और
न हमें उधार मिल पाता है …

अंत में…

<

p style=”text-align: justify;”>हमारे आदरणीय,
अतिव्यस्त ज़िलाधिकारी महोदय से
मैं निवेदन करता हूँ कि
कृपया ज़िले के डाकघरों से पोस्टल ऑर्डर ग़ायब होने की ख़बर का संज्ञान लेते हुए …
सम्बंधित अधिकारियों को पोस्टल ऑर्डर बहाली के लिये आदेशित करने की कृपा करें …
जिससे हम विभागों से किसी भी सूचना को अधिकार से मांग सकें ..

<

p style=”text-align: justify;”>धन्यवाद….
मंच
नैनीताल से
मो.ख़ुर्शीद हुसैन (आज़ाद)

अंक-2 (‘नवीन समाचार’ के नये कॉलम ‘आज़ाद के तीर’ में आज बारी जिला पूर्ति कार्यालय की : सार्वजनिक सूचना…. कृपया ध्यान ‘न’ दें…

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p style=”text-align: justify;”>ये चित्र उस भवन का है जो वर्तमान में जर्जर हालत में आ चुका है ….जिसे देखकर प्रथम दृष्टया बहुत दया भाव उमड़ पड़ता है …और इसी दया भाव को लेकर आप अंदर दाख़िल होते हैं ….पहला कमरा (ज़िलापूर्ति अधिकारी का) सुनसान दिखाई पड़ता है ऐसा लगता है मानो वहां रामसे ब्रदर्स (डरावनी फिल्मों के मशहूर निर्माता) की शूटिंग का सेट लगा हो …. अगले कमरे में बारिश का पानी इस बात की तस्दीक़ कर रहा था कि इस कमरे में कोई आये न आये पानी को आने से कोई नहीं रोक सकता …
जी हाँ …इस भवन में ज़िला पूर्ति कार्यालय चलाया जाता है ….ऐसा कहा जाता है ….
लेकिन इसके अंदर जाकर आप देखेंगे तो चलती हुई कोई चीज़ आपको दिखाई नहीं देगी ….
सिवाय वहां नियुक्त महिलाकर्मियों की ज़ुबान चलने के ….(अब किसी एक ज़िम्मेदार महिलाकर्मी का नाम लें और बाक़ी छोड़ दें तो बची हुई महिलाएं इसे प्रेस्टीज इशू मान बैठेंगी इसलिए रहने देते हैं )
और अगर मुश्किल से हिम्मत जुटाकर आपने उनकी बातों में जो उनकी नज़र में विधान सभा सत्र के जैसी अहम होती हैं उनमें ख़लल डाला तो समझ लीजिये आप जिस भी काम से वहां हार-थक कर पहुँचे हो वो मेहनत आपकी मिट्टी के तेल में मिल जाएगी ….
आपका सवाल कितना ही मनमोहन क्यों न हो ….
उनका जवाब मायावती ही होना है ….
कुछ देर आप वहां अपने आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचे ऐसा फ़ील करने के लिए ….
प्लास्टिक मुस्कराहट उन कथित कर्मियों की ओर बिखेरते हो ….
बाबा रामदेव की तरह लम्बी- गहरी साँस लेते हो और उलटे पाँव बाहर निकल आते हो …
बाहर निकलते ही जब दोबारा उस जर्जर भवन को पलटकर देखते हैं तो प्रथम दृष्टया का भाव ऐसे ग़ायब हो जाता है जैसे चुनाव जीता हुआ नेता और सिर्फ़ एक ही भाव बचा रह जाता है ….कि हमारी सरकार कितनी दरियादिल है जो बिना काम के ऐसे विभाग चला रही है जिसमें बैठने वाले कथित अधिकारियों, कर्मचारियों को किसी भी योजना की जानकारी नहीं है। वे लोग महज़ इस बात की मोटी तनख़्वाह पा रहे हैं जैसे सरकारी दामाद / ननद हों ….
ये हाल नैनीताल ज़िले के खाद्य पूर्ति कार्यालय का ज़रुर है लेकिन पूरे प्रदेश में या अगर पूरे भारत की बात की जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कमोबेश सरकारी कार्यालयों की यही स्थिति है। कोई आम नागरिक बिना सिफ़ारिश या रिश्वत दिये अपना कोई छोटा सा भी काम नहीं करा सकता और अगर वो किसी तरह साहस जुटाकर घर से निकल पड़ता है तो उसके जूतों में छेद हो जाता है।चप्पलें टूट जाती हैं लेकिन सरकारी कामों के पेंच उससे कभी नहीं खुल पाते…..
आख़िरकार सवाल फिर वही पैदा होता है कि कब तक भारत का आम नागरिक पिसता रहेगा ….जिसके चुकाए गये विभिन्न करों से सरकारी तंत्र चलता है …..उस आम नागरिक का कब उन कार्यालयों से बिना सिफ़ारिश, बिना रिश्वत काम पूरा होगा ….
आख़िर कब ????
इसी जवाब के
इंतज़ार में ….
भारत का एक आम नागरिक
नैनीताल से….
मो.ख़ुर्शीद हुसैन _

अंक-1 : आज समानता के पैरोकार लोक निर्माण विभाग की बारी

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p style=”text-align: justify;”>जी हाँ …
आज हम बात करेंगे पब्लिक वर्स्ट डिपार्टमेंट
यानि पी.डब्ल्यू .डी. की
जिसकी बदौलत आज हम गाड़ी में बैठे -बैठे ऐसा महसूस करते हैं जैसे किसी झूले में झूल रहे हों ,
और जब पैदल चलते हैं
तो ये गर्व महसूस होता है कि हमारे देश में कोई तो विभाग ऐसा है,
जो समानता का अधिकार अधिनियम को दिल से मानता है और सिर्फ़ मानता ही नहीं
करके भी दिखाता है …
इस विभाग के लिए गड्ढों और सड़कों में कोई भेदभाव नहीं है ,
आप जब भी नैनीताल आएंगे तो सच्ची में कंफ्यूज़ा जाएंगे ….
सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क …
हमारे यहाँ आपको देखने मिलेगा …
गड्ढों और सड़कों का
अजब संगम …

<

p style=”text-align: justify;”>न न न ….
आज हम
विभाग के अधिकारियों के
मोटे वेतन , कामचोर रवैये या विभागीय भ्रष्टाचार की बात नहीं करेंगे ….
आज बस बात होगी
तो सिर्फ़ गड्ढों की …

<

p style=”text-align: justify;”>हुज़ूर…
ऐसा नहीं है …
कथित विभाग जनता का भला नहीं चाहता …

<

p style=”text-align: justify;”>न न …
ऐसा सोचना भी बाई गॉड पाप होगा ….
विभाग जनता का इतना भला चाहता है कि वो दूरदृष्टि का इस्तेमाल करता है ,
अब जिस जगह गड्ढ़े ही नहीं होंगे.
तो वहां वाहन तेज़ गति से चलेंगे जिससे कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है ….
लेकिन हमारे यहाँ सड़कों में गड्ढेनुमा स्पीड ब्रेकर जो लगे हैं , मजाल है कोई वाहन 10 किमी / घंटा से अधिक भाग ले ,
जिससे दुर्घटना का सवाल ही नहीं उठता साहब ,

<

p style=”text-align: justify;”>हाँ वो अलग बात है कोई गड्ढे में नियंत्रण खोकर गिर पड़े …
उसके लिए पी.डब्ल्यू.डी. ज़िम्मेदार नहीं होगा ,

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p style=”text-align: justify;”>अरे भाई …
आपको
गड्ढे में पैदल चलने या गाड़ी चलाने का हुनर नहीं आया तो इसमें भला हमारे प्रिय विभाग की क्या ग़लती ….

वैसे मेरा एक छोटा सा आईडिया अगर विभाग माने तो …

उसने जगह जगह ये बोर्ड लगा देने चाहिये जिसमें लिखा हो …

<

p style=”text-align: justify;”>”ऐ भाई ज़रा देख के चलो…
आगे ही नहीं , पीछे भी ,
जवान ही नहीं , बुड्ढा भी,
सड़क ही नहीं…..
गड्ढा भी ….
ऐ भाई “…..

<

p style=”text-align: justify;”>ख़ैर,
अंत में
मेरा प्रशासन से अनुरोध है कि
गड्ढों में बनी सड़क को केवल सड़क बनाने के आदेश सम्बंधित विभाग को करने की कृपा करें …
जिससे जनमानस के लिये आवाजाही आसान हो और सड़कें साफ़ सुधरी व अच्छी होंगी तो बाहर से आये पर्यटकों पर भी उसका बहुत सुन्दर प्रभाव पड़ेगा…जिससे वो किसी और को भी नैनीताल घूमने की सलाह देगा …
सावधानी ही समस्या का पहला समाधान है….

(नोट : इस कॉलम में विचार लेखक के अपने हैं। ‘नवीन समाचार’ केवल समाज के हर तरह के विचारों को सामने लाने का माध्यम है। उम्मीद है कि अतिरेक के साथ कही गयी बात जिम्मेदार अधिकारियों को चुभे भी तो वे इसे निजी तौर पर दिल पर लेने के बजाय व्यवस्थाओं को सुधारने की कोशिश करें।)

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