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लद्दाख एवं नैनीताल की वेधशाला भविष्य हेतु दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए संभावनाओं से भरपूर

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ARIES Gallery | Aryabhatta Research Institute of Observational Sciencesडॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अक्टूबर 2021। नैनीताल की देवस्थल स्थित एशिया की दूसरी सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ऑप्टिकल वेधशाला एवं लद्दाख में लेह के निकट हान्ले में स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला-आईएओ सहित पहाड़ की वेधशालाएं दुनिया भर में संभावनाओं से भरपूर वेधशालाएं स्थल बन रही हैं। हाल के एक अध्ययन में यह कहा गया है। ऐसा इसलिये कि यहां की रातें बहुत साफ होती हैं, प्रकाश से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण नाममात्र को होता है, हवा में तरल बूंदों की मौजूदगी के साथ अत्यंत शुष्क परिस्थितियां हैं और मानसून से किसी प्रकार की बाधा नहीं आती।

उल्लेखनीय है कि दुनिया भर के खगोल-विज्ञानी लगातार दुनिया में ऐसे आदर्श स्थानों की तलाश में हैं, जहां वे अपनी अगली विशाल दूरबीन लगा सकें, जो कई वर्षों के जमा किये हुये स्थानीय मौसमी आंकड़ों के आधार पर लगाई जायें। इसी कड़ी में भारत के भारतीय तारा भौतिकी संस्थान (आईआईए) बेंगलुरू के डॉ. शांति कुमार सिंह निंगोमबाम और आर्यभट्ट वेधशाला विज्ञान अनुसंधान संस्थान, नैनीताल के वैज्ञानिकों ने ने आठ ऊंचे स्थान पर स्थित लद्दाख की हान्ले और मेराक स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला, देवस्थल नैनीताल की वेधशाला, चीन के तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र की अली वेधशाला, दक्षिण अफ्रीका की लार्ज टेलिस्कोप, टोक्यो यूनिवर्सटी, अटाकामा ऑबजर्वेटरी, चिली, पैरानल और मेक्सिको की नेशनल एस्ट्रॉनोमिकल ऑबजर्वेटरी आदि वेधशालाओं के ऊपर रात के समय बादलों के जमघट का विस्तार से अध्ययन किया। इन वेधशालाओं में नैनीताल की देवस्थल सहित तीन भारत की वेधशालायें भी थीं। अनुसंधानकर्ताओं ने एवं फोटोमेट्री और स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसे उपकरण विभिन्न खगोलीय उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए पुनर्विश्लेषित आंकड़ों के साथ ही पिछले 41 वर्षों के दौरान किये जाने वाले मुआयनों एवं उपग्रह से जुटाये गये 21 वर्ष के आंकड़ों को शामिल करते हुए यह निर्णय निकाला है कि हान्ले चिली के अटाकामा रेगिस्तान जितना ही शुष्क है और देवस्थल से कहीं अधिक सूखा है। वहां वर्ष में 270 रातें बहुत साफ होती है। इसलिए यह स्थान इंफ्रारेड और सब-एमएम ऑप्टिकल एस्ट्रोनॉमी के लिये सर्वथा उचित है।
वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि अन्य स्थानों की तुलना में देवस्थल में साफ रातें ज्यादा होती हैं, लेकिन वहां साल में तीन महीने बारिश होती है। बहरहाल, आइएओ-हान्ले में रातों को 2 मीटर के हिमालय चंद्र दूरबीन (एचसीटी) से अवलोकन बिना मानसून की बाधा के साल भर किया जा सकता है। रातें ज्यादा साफ हैं, प्रकाश का न्यूनतम प्रदूषण है, पानी की बूंदे मौजूद हैं और अत्यंत शुष्क वातावरण है। साथ ही मानसून की कोई अड़चन भी नहीं है। इसलिये यह क्षेत्र खगोलीय अध्ययन के लिये अगली पीढ़ी के हवाले से पूरी दुनिया के लिये संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र बन रहा है। अध्ययन में यह तथ्य भी आया कि भारत के हान्ले, मेराक व देवस्थल तथा चीन के अली में बादलों का जमघट क्रमशः 66-75 प्रतिशत, 51-68 प्रतिशत, 61-78 प्रतिशत और 61-76 प्रतिशत रहता है।

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-नासा की दूरबीन से हुए एक खास गामा किरणों के विस्फोट कोे एरीज के वैज्ञानिक डॉ. शशि भूषण पांडेय ने भी देखा
-26 अगस्त 2020 को हुआ खास जीआरबी, आज नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ इस पर शोध अध्ययन
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 26 जुलाई 2021। गत वर्ष 26 अगस्त 2020 को अंतरिक्ष में स्थित नासा के फर्मी गामा-रे स्पेस टेलीस्कोप ने उच्च ऊर्जा विकिरण के एक ऐसा विस्फोट का पता लगाया था, जो ब्रह्मांड की वर्तमान आयु के लगभग आधे समय से पृथ्वी की ओर आ रही थी। केवल एक सेकंड तक चले, समय के हिसाब से इस अब तक का सबसे छोटे गामा-रे विस्फोट यानी जीआरबी का कारण किसी विशाल तारे की मृत्यु थी, परन्तु इसने एक नया कीर्तिमान भी स्थापित कर दिया। यह विस्फोट सोमवार 26 जुलाई 2021 को नेचर एस्ट्रोनॉमी नामक पत्रिका में प्रकाशित दो अध्ययनों का विषय है।

स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वैज्ञानिक शशि भूषण पांडेय, उस वैज्ञानक समूह के सदस्य हैं जिन्होंने 10.4 मीटर जीटीसी से इस घटना को देखा और उसके दूरी का मापन कर इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डा. पांडेय के अनुसार इस घटना के अध्ययन ने गामा किरण विस्फोट के बारे में दुनिया के वैज्ञानिकों की समझ में नये आयामों को जोड़ा है। इससे इस विषय को और अधिक गहराई से समझने में मदद मिलेगी।

डॉ. पांडेय ने बताया कि 0.65 सेकेंड तक चले इस जीआरबी में 200826 एंपियर उच्च ऊर्जा विकिरण का एक तेज वस्फोट हुआ था। विस्तारशील ब्रह्मांड में युगों तक यात्रा करने के बाद, फर्मी गामा रे बर्स्ट मॉनीटर द्वारा इसका पता लगया गया था। तब यह संकेत लगभग 1 सेकेंड का हो गया था। यह घटना नासा के पृथ्वी और सूर्य के बीच एक बिंदु की परिक्रमा करने वाले 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित विंड मिशन, और 2001 से मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाले मार्स ओडिसी तथा ईएसए यानी यूरोपियन स्पेश एजेंसी के इंटीग्रल उपग्रह द्वारा भी देखा गया। 26 अगस्त 2020 को हुए इस विस्फोट को इस तारीख के आधार पर जीआरबी 200826ए नाम दिया गया है।

उन्होंने बताया कि यह खोज लंबे समय से असुलझी पहेली को सुलझाने मे मदद करती है। लंबी अवधि के जीआरबी सुपरनोवा से जुड़े होने चाहिए, लेकिन लंबी अवधि के जीआरबी की तुलना में सुपरनोवा बहुतायत में पाते हैं। खगोलविद जीआरबी का प्रेक्षण कर सकें इसके लिए जेट हमारी दिशा में झुके होने चाहिये, इस तथ्य का ध्यान रखने के बाद भी यह विसंगति जारी है। शोधकर्ता एकमत हैं कि संकुचनशील तारे से उत्सर्जित होने वाले छोटी अवधि के जीआरबी बहुत कम ही होते होंगे, जिनके प्रकाश की गति से निकले जेट सफलता और असफलता की एकदम सीमा पर होंगे। यह निष्कर्ष इस धारणा से भी संगत है कि ज्यादातर विशालकाय तारों का अंत जेट और जीआरबी उत्पन्न किये बिना हो जाता है। मोटे तौर पर यह निष्कर्ष दर्शाता है कि जीआरबी की अवधि मात्र इसके मूल स्रोत का अंदेशा नहीं दे सकती। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-डॉ. शशिभूषण पांडे के निर्देशन में काम करने वाले पीएचडी शोध छात्र अमित कुमार के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की मासिक पत्रिका में हुआ है प्रकाशित
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 जुलाई 2021। एरीज नैनीताल के भारतीय शोधकर्ताओं ने एक अत्यंत विशाल व उज्जवल और हाइड्रोजन की कमी के साथ तेजी से उभरने वाले सुपरनोवा का पता लगाया है। यह सुपरनोवा एक अति-शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के साथ एक अनोखे न्यूट्रॉन तारे से ऊर्जा लेकर चमकता है। इसका पता लगने से आकाशीय पिंडों के गहन अध्ययन से प्रारंभिक ब्रह्मांड के रहस्यों की जांच करने में मदद मिल सकती है।

बताया गया है कि इस प्रकार के सुपरनोवा को सुपरल्यूमिनस सुपरनोवा (एसएलएसएनई) कहा जाता है जो काफी दुर्लभ होते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे आम तौर पर बहुत बड़े तारों (न्यूनतम सूर्य के 25 गुना से अधिक द्रव्यमान वाले) तारों से उत्पन्न होते हैं और हमारी आकाशगंगा अथवा आसपास की आकाशगंगाओं में ऐसे विशाल तारों का वितरण काफी कम है। एसएलएसएनई-1 स्पेक्ट्रोस्कोपिक तौर पर अब तक पहचाने गए अपनी तरह के लगभग 150 आकाशीय पिंडों में शामिल है। ये प्राचीन पिंड सबसे कम समझे जाने वाले सुपरनोवा में शामिल हैं क्योंकि उनके अंतर्निहित स्रोतों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है और उनकी अत्यधिक चमक को पारंपरिक एसएन पावर सोर्स मॉडल का उपयोग करके भी स्पष्ट नहीं किया जा सका है।

बताया गया है कि इस श्रेणी के एसएन 2020एएनके नाम के सुपरनोवा की खोज सबसे पहले 19 जनवरी 2020 को ज्विकी ट्रांजिएंट फैसिलिटी द्वारा की गई थी। फरवरी 2020 से और उसके बाद मार्च एवं अप्रैल की लॉकडाउन अवधि में इसका अध्ययन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एरीज नैनीताल के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। यह सुपरनोवा उस क्षेत्र में मौजूद अन्य पिंडों के समान नीली वस्तु के रूप में स्पष्ट तौर पर दिख रहा था, जो उसकी अत्यंत चमक वाली प्रकृति को दर्शाता है।

डॉ. शशिभूषण पांडे
डॉ. शशिभूषण पांडे

इसका अध्ययन करने वाली टीम ने एरीज स्थित संपूर्णानंद टेलीस्कोप-1.04 मीटर और हिमालयन चंद्र टेलीस्कोप- 2.0 मीटर के साथ हाल ही में चालू किए गए भारत के देवस्थल में स्थापित की गई एशिया की दूसरी सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ऑप्टिकल टेलीस्कोप-डॉट में विशेष व्यवस्थाओं का उपयोग करते हुए इसका अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि प्याज जैसी संरचना वाले सुपरनोवा की बाहरी परतों को छील दिया गया था और कोर किसी अन्य ऊर्जा स्रोत के साथ चमक रहा था। यह अध्ययन डॉ. शशिभूषण पांडे के निर्देशन में काम करने वाले एक पीएचडी शोध छात्र अमित कुमार के नेतृत्व में किया गया और इसे रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की मासिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इसमें कहा गया है कि ऊर्जा का स्रोत एक अति-शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटार) वाला अनोखा न्यूट्रॉन तारा हो सकता है जिसका कुल उत्सर्जित द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के मुकाबले 3.6 से 7.2 गुना अधिक है। यह अध्ययन भविष्य में बहुत ही दुर्लभ एसएलएसएनई की खोज में देवस्थल में स्थापित डॉट-3.6. मीटर के उपयोगी हो सकने की भी पुष्टि करना है। साथ ही इसकी गहन जांच से इसमें अंतर्निहित भौतिक ढांचे, संभावित पूर्वजों, ऐसे दुर्लभ विस्फोटों की मेजबानी करने वाले वातावरण और गामा-रे बर्स्टएवं फास्ट रेडियो बर्स्ट जैसे अन्य ऊर्जावान विस्फोटों के साथ उनके संभावित जुड़ाव का पता लगाया जा सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-17 से सोमवार 24 मई तक ‘भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष आजादी का अमृत महोत्सव’ के उपलक्ष्य में आयोजित हुआ प्रशिक्षण कार्यक्रम
नवीन समाचार, नैनीताल, 24 मई 2021। मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के द्वारा गत 17 से सोमवार 24 मई के बीच 8 दिनों तक स्नातकोत्तर छात्रों के लिए खगोल विज्ञान में एक ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम-‘एरीज ट्रेनिंग स्कूल इन ऑब्जर्वेशनल एस्ट्रोनॉमी-एटीएसओए-2021’ आयोजित किया गया। ‘भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष आजादी का अमृत महोत्सव’ के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में पूरे देश के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों के लगभग 100 छात्रों ने वर्चुअल माध्यम से प्रतिभाग किया और खगोल विज्ञान के विविध आयामों व रहस्यों से परिचित हुए।
इस कार्यक्रम के दौरान एरीज के वैज्ञानिकों ने छात्रों को दूरबीनों, तारों की रचना एवं विकास, सौर मंडल से बाहर के ग्रहों, सौर भौतिकी, मंदाकिनी एवं परामंदाकिनी यानी अपनी आकाशगंगा एवं आकाशगंगा से बाहरी ब्रह्मांड, खगोल विज्ञान, एरीज की प्रेक्षण सुविधाओं, दुनिया की सबसे बड़ी प्रस्तावित 30 मीटर टेलीस्कोप परियोजना और आदित्य एल-1 अंतरिक्ष मिशन जैसे विभिन्न विषयों से परिचित कराया। साथ ही फोटोमेट्री, स्पेक्ट्रोस्कोपी, पोलारिमेट्री और मशीन लर्निंग जैसी विभिन्न खगोलीय डेटा प्रोसेसिंग तकनीकों पर आधारित व्यावहारिक और प्रदर्शन सत्र भी आयोजित हुए। बताया गया कि ब्रह्मांड की वर्तमान समझ न केवल प्रेक्षण सुविधाओं के निरंतर होते विकास पर निर्भर है, बल्कि इन सुविधाओं से उत्पन्न डेटा का विश्लेषण करने वाले लोगों की संख्या पर भी है। तकनीकी विकास के कारण विद्युत चुम्बकीय तरंगों के विभिन्न पट्टों में पूरे विश्व और अंतरिक्ष में कई खगोलीय वेधशालाएं कार्यरत हैं और कई आगामी हैं। ये वेधशालाएं बड़ी मात्रा में डेटा उत्पन्न करेंगी, जिसके विश्लेषण के लिए और खगोलीय पिंडों की समझ बेहतर करने के लिए शोधकर्ताओं की बड़ी संख्या की आवश्यकता होगी। प्रतिवर्ष प्रशिक्षण स्कूलों का संचालन करने के पीछे एरीज का उद्देश्य युवा छात्रों को खगोलीय डेटा-विश्लेषण में विशेषज्ञता-कुशलता प्रदान करना और हमारे देश में एक प्रतिभावान पीढ़ी विकसित करना है। एटीएसओए-2021 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

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-एरीज की छात्रा दुनिया के खगोलविदों के समूह जीएआईए द्वारा की गई बड़ी खोज में शामिल, एरीज की डॉट व आईएलएमटी दूरबीनों का भी खोज में योगदान

चतुष्कोणीय बहुरूपीय क्वेजार।

नवीन समाचार, नैनीताल, 08 अप्रैल 2021। मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के नाम पर बड़ी उपलब्धि जुड़ी है। दुनिया के खगोलविदों के संगठन जीएआईए यानी गुरुत्वाकर्षण लेंस वर्किंग ग्रुप ने जनपद के देवस्थल में लगी एशिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी प्रकाशीय दूरबीन-डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप और यहीं प्रस्तावित 4 मीटर व्यास की आईएलएमटी दूरबीन सहित दुनिया की कई जमीन और अंतरिक्ष में लगी दूरबीनों की मदद से चतुष्कोणीय बहुरूपीय क्वेजार की खोज की है। इसे मनुष्यों एवं तथा मशीन आधारित एआई यानी संवर्धित बुद्धि की मदद से इंसान और मशीन की अनूठी जुगलबंदी की एक बड़ी खोज भी माना जा रहा है। इस अध्ययन में एरीज की शोध छात्रा प्रियंका जालान भी बेल्जियम की यूनिवर्सिटी ऑफ लिज के प्रोफेसर जीन सुरर्देज के साथ सह लेखिका हैं।
बताया गया है कि पिछले केवल डेढ़ वर्ष से चल रहे इस शोध अध्ययन में पृथ्वी से अरबों प्रकाश वर्ष दूर स्थित पिंडों के अध्ययन में सहायता मिलेगी। इस अध्ययन से ब्रह्मांड के अंतिम छोर का आंकलन भी हो सकेगा। बताया गया है कि विशाल आकाशगंगाओं के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा एक क्वेजार की चार छवियां यानी चतुष्कोणीय बहुरूपीय क्वेजार प्राप्त करना दुर्लभ होता है। वर्ष 1985 में पहला चतुष्कोणीय प्रतिबिंब खोजा गया था। इसके बाद पिछले चार दशकों में करीब 50 चतुष्कोणीय बहुरूपीय क्वेजार या क्वैड्स खोजे गए हैं, लेकिन इधर इस अध्ययन में केवल डेढ़ वर्ष में किये गए अध्ययन से क्वैड्स की संख्या में 25 फीसद की वृद्धि हो गयी है। इस अध्ययन में अमेरिका की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला के डैनियन स्टर्न और क्रोन मार्टिस आदि वैज्ञानिक भी सहयोगी हैं।

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-केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की मौजूदगी में ऑनलाइन आयोजित कार्यक्रम में एमओयू हुआ हस्ताक्षरित
नवीन समाचार, नैनीताल, 27 मार्च 2021। भारत सरकार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने देश भर में वायु प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम-एनसीएपी शुरू किया था। अब इस एनसीएपी कार्यक्रम को देश के 132 गैर-प्राप्ति वाले शहरों में लागू किया जा रहा है। एनसीएपी के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नैनीताल के एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशन साइंसेज, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-यूकेपीसीबी और देहरादून नगर निगम के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस समझौते के अनुसार एरीज व यूकेपीसीबी प्रदेश की राजधानी देहरादून शहर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए विशिष्ट कार्य योजना तैयार करने के लिए तकनीकी भागीदार होंगे। जबकि राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-सीपीसीबी और एमओईएफ और सीसी समन्वय और तकनीकी अनुपालन की देखरेख करेंगे। इन सभी के द्वारा केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की उपस्थिति में ऑनलाइन एमओयू हस्ताक्षर समारोह आयोजित किया गया। समारोह में एरीज के निदेशक प्रो. दीपांकर बनर्जी और अध्यक्ष, वायुमंडलीय प्रभाग के वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा ने शामिल रहकर एरीज की ओर से हस्ताक्षर किए।

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  • पिछले विवादित निदेशक प्रो. रामसागर के कार्यकाल पर कैग ने लगाए लाखों रूपयों के वित्तीय अनियमितता के आरोप
  • नैनीताल निवासी देवेन्द्र जोशी द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गयी रिपोर्ट में हुआ खुलासा 

Aries, Nainital

नवीन जोशी, नैनीताल, 8 जनवरी 2018। चांद-सितारों व आकाशगंगाओं के अध्ययन के कार्य में जुटे नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण एवं शोध संस्थान यानी एरीज और खासकर इसके पिछले विवादित निदेशक प्रो. रामसागर के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। भारत सरकार के लेखा परीक्षा वैज्ञानिक विभाग यानी कैग के प्रधान निदेशक द्वारा वर्ष 2012 से 2016 के बीच विभिन्न मामलों का निरीक्षण करने का बाद तैयार रिपोर्ट में नैनीताल स्थित एरीज परिसर में 80 सेमी की दूरबीन स्थापित करने, देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर की टेलीस्कॉप के लिए स्पेक्ट्रोग्राफ उपकरण का निर्माण करने तथा गैरकानूनी तरीकों से पदों का सृजन करने व केन्द्रीय वित्त मंत्रालय की सहमति के बिना वेतन वृद्धि करने जैसे कई बड़ी गड़बड़ियां होने और सरकारी कोष को करोड़ों रुपए का नुकसान करने की बात कही गयी हैं।

भारत सरकार के विद्यान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत उत्तराखंड में संचालित एरीज के बाबत कैग की करीब डेढ़ दर्जन पन्नों वाली इस रिपोर्ट के अनुसार नैनीताल स्थित एरीज परिसर में 80 सेमी की दूरबीन को स्थापित करने में कई तय प्रावधानों का उल्लंघन किया गया। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में संबंधित कंपनी ने 259 दिनों की देरी की। इसके बावजूद एरीज ने कंपनी को 54.13 लाख में से 53.90 लाख रूपये का भुगतान बेरोकटोक कर दिया। प्रोजेक्ट में देरी के लिए न तो कंपनी का भुगतान रोका और न ही बैंक गारंटी कैश करायी। इस प्रकार एरीज की लापरवाही से सरकारी कोष को 53.90 लाख रूपये का नुकसान उठाना पड़ा, और इतनी धनराशि खर्च करने के बावजूद तकनीकी गड़बड़ियों के चलते टेलीस्कोप लगाने का उद्देश्य भी पूरा नहीं हो पाया। इसी एरीज के देवस्थल परिसर में स्थापित एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर की आप्टिकल टेलीस्कोप के लिए स्पेक्ट्रोग्राफ नामक यंत्र की जरूरत थी, जिसे एरीज ने अपने वर्कशाप में बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए वर्कशॉप में सीएनसी वर्टिकल मशीनरी सेंटर की स्थापना करने के लिए निविदा के माध्यम से बैंगलुरू की भारत फ्रिट्ज वेलनेर लिमिटेड नामक कंपनी को 60 लाख रूपये में जिम्मेदारी सौंपी गयी। बाद में धनराशि को 60 से बढ़ाकर पहले 77.95 लाख और दुबारा बढ़ाकर 78.35 लाख रूपये कर दिया गया। बावजूद कंपनी ने न केवल काम में देरी की बल्कि जो मशीनरी उपलब्ध करायी वह भी काम नहीं कर पायी। यानी स्पेक्ट्रोग्राफ उपकरण बनाने का काम भी शुरू नहीं हो पाया। लेकिन इस कंपनी को भी दो चरणों में कुल 74.04 लाख रूपये का यानी करीब पूरा भुगतान कर दिया गया।

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इसके बाद एरीज ने अपनी नाकामी को छुपाने के लिए कुशल मैकेनिकल इंजीनियर नहीं होने का बहाना बनाकर नवम्बर 2014 में गाजियाबाद के पवन उद्योग नामक आउटसोर्स कंपनी को 37.74 लाख रूपये में स्पेक्ट्रोग्राफ खरीदने का आर्डर दे दिया। इस कंपनी ने भी निर्धारित समयावधि के बाद उपकरण उपलब्ध कराया, और उसे 35.90 लाख रूपये का भुगतान कर दिया गया। इस प्रकार रिपोर्ट में कहा गया है कि एरीज की लापरवाही के कारण सरकारी कोष को लाखों रूपये का नुकसान उठाना पड़ा है। इसी प्रकार रिपोर्ट में के अनुसार एरीज ने भारत सरकार के वित्त तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की अनुमति के बिना ही 26 पदों का पदों का सृजन कर दिया, और केन्द्र सरकार के नियमों व प्राविधानों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर वैज्ञानिकों व इंजीनियरों के 25 पदों व रजिस्ट्रार के एक पद को भी अपग्रेड कर दिया। इस बाबत रिपोर्ट में साफ लिखा गया है कि एरीज ने मौलिक नियमों का उल्लंघन किया और 43.73 लाख रूपये का अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ाया। रिपोर्ट में कहा गया कि एरीज के निदेशक का वर्ष 2004 व 2006 में वेतनमान नियमविरुद्ध दो बार 16400-450-20000 से बढ़ाकर 22400-600-26000 कर दिया गया। साथ ही ग्रेड बी के 11 वैज्ञानिकों को ग्रेड सी व ग्रेड सी के तीन वैज्ञानिकों को ग्रेड डी में यानी कुल 14 वैज्ञानिकों को समय पूर्व पदोन्नति दी गयी। इससे 65.42 लाख रूपये का अनावश्यक बोझ पड़ा। इसी तरह 2009 से 2016 के मध्य 2082.10 लाख रूपये की लागत से विभिन्न प्रकार के कार्य करवाये लेकिन केन्द्र सरकार के नियमों के तहत 104.11 लाख रूपये का लेबर सेस व वर्क कांटेक्ट टैक्स (डब्ल्यूसीटी) की वसूली नहीं की। इसमें ‘द बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्क्स वेलफेयर एक्ट 1996’ का उल्लंघन करते हुए 20.82 लाख रूपये का लेबर सेस व 83.29 लाख रूपये का डब्ल्यूसीटी शामिल है। इस बाबत पूछे जाने पर एरीज के रजिस्ट्रार ने कहा कि आरोप प्रारंभिक व पुरानी लंबी अवधि के हैं, लिहाजा भ्रष्टाचार के आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई हैं। इनमें से कई पर कैग को जवाबी रिपोर्ट भेज दी गयी है।

एरीज में रिकार्ड 16 वर्ष लंबी सल्तनत रही है विवादित निदेशक प्रो. रामसागर की

Pr. Ram Sagar

1996 से 2012 तक उत्तर प्रदेश राजकीय वेधशाला के उत्तराखंड वेधशाला और एरीज बनने के बाद तक रहा निदेशक के रूप में सर्वाधिक लंबा कार्यकाल
नवीन जोशी, नैनीताल। सूर्य एवं चांद सितारों के प्रेक्षण, वायुमंडलीय एवं मौसमी शोधों के साथ देश की सबसे बड़ी ३.६ मीटर व्यास की दूरबीन स्थापित करने और दुनिया की सबसे बड़ी ३० मीटर व्यास की दूरबीन में सहभागिता के लिए पहचाने जाने वाला एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान इस बार अपने पूर्व निदेशक प्रो. रामसागर २००८ के एक मामले में सीबीआई द्वारा की गई जांच के बाद जेल जाने को लेकर सुर्खियों में रहे हैं, आखिर उन्हें देहरादून स्थित सीबीआई अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा।

उल्लेखनीय है कि १९५५ में यूपी राजकीय वेधशाला के रूप में स्थापित वर्तमान एरीज के करीब छह दशक लंबे इतिहास में प्रो. राम सागर के नाम सर्वाधित १६ वर्ष निदेशक रहने का रिकार्ड दर्ज है। इस बीच कभी अपने लोगों को ही नियुक्तियां देने तो कभी एरीज-मनोरा पीक और कभी देवस्थल में अनाधिकृत तौर पर पेड़ काटने जैसे आरोप भी उन पर लगते रहे, लेकिन उनकी जमी-जमाई सल्तनत में कभी कोई विरोध का स्वर अधिक मुखर नहीं हो पाया। किंतु इधर उन पर बुरे वक्त ने ऐसा खेल दिखाया कि एक अभियंता की नियुक्ति के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि उनके खिलाफ सीबीआई जांच हो गई, और लाख प्रयासों के बाद असफल रहने के बाद आखिर उन्हें आत्मसमर्पण करने को मजबूर ही होना पड़ा। इधर एरीज में उनके जेल जाने पर एक भी अधिकारी, वैज्ञानिक कर्मचारी एक भी शब्द बोलने से बचते दिखे। कुछ का कहना था, मामले में कानून अपना कार्य कर रहा है, उसे अपना कार्य करने देना चाहिए।

बनारस के एक कमरे से देश की सबसे बड़ी दूरबीन तक का सुनहरा इतिहास रहा है एरीज का

नैनीताल। आजादी के बाद खगोल विज्ञान प्रेमी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने सर्वप्रथम १९५१ में राजकीय वेधशाला बनाने का निर्णय लिया था। २० अप्रैल १९५४ में यह बरारस गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के एक कक्ष में स्थापित की गई। डीएसबी कॉलेज नैनीताल के डा. एएन सिंह को इसका निदेशक बनाया गया, लेकिन जुलाई ५४ में ही उनका हृदयाघात से निधन हो जाने के बाद नवंबर १९५४ में डा. एमके वेणुबप्पू इसके निदेशक बनाए गए, जिन्होंने पहाड़ पर ही खगोल विज्ञान की वेधशाला होने की संभावना को देखते हुए इसे पहले नैनीताल के देवी लॉज में तथा बाद में वर्तमान १९५१ मीटर ऊंचाई वाली मनोरा पीक चोटी में स्थापित करवाया। आगे डा. केडी सिंभ्वल १९६० से १९७८, डा. एमसी पांडे ७८ से बीच में कुछ अवधि छोड़कर १९९५ तक इसके निदेशक रहे, तथा जुलाई १९९६ में प्रो. रामसागर इसके निदेशक बने। आगे राज्य बनने के बाद यूपी राजकीय वेधशाला उत्तराखंड सरकार को हस्तांतरित हुई तथा २२ मार्च २००४ में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने इसे अपने हाथ में लेकर एरीज के रूप में केंद्रीय संस्थान की मान्यता दे दी। वर्तमान में यहां सीसीडी कैमरा, स्पेक्टोफोटोमीटर व फिल्टर्स जैसी आधुनिकतम सुविधाओं युक्त १५ सेमी, ३८ सेमी, ५२ सेमी, ५६ सेमी व १.०४ मीटर एवं देवस्थल में १.३ मीटर की दूरबीनें उपलब्ध हैं, जिन पर खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी, वायुमंडलीय विज्ञान एवं सूर्य तथा सौर प्रणाली पर २४ वैज्ञानिक गहन शोध करते रहते हैं। २८ अक्टूबर २००३ को यहां के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक व वर्तमान कार्यवाहक निदेशक डा. वहाबउद्दीन ने विश्व में पहली बार १५ सेमी की दूरबीन से ४बी/एक्स१७.२क्लास की ऐतिहासिक बड़ी सौर भभूका का प्रेक्षण करने में सफलता प्राप्त की थी। ग्रह नक्षत्रों के मामले में अंधविश्वासों से घिरे आमजन तक विज्ञान की पहुंच बढ़ाने एवं खासकर छात्राों को ब्रह्मांड की जानकरी देने की लिऐ एरीज ने अपने ‘पब्लिक आउटरीच” कार्यक्रम के तहत पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत दूरबीन (प्लेनिटोरियम) स्थापित की है। देवस्थल में देश व एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी ३.६ मीटर व्यास की की आप्टिकल अगले कुछ माह में स्थापित होने जा रही है, जिसके लिए १९८० के दौर से प्रयास चल रहे हैं।

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नवीन समाचार
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