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अब बनाइये ऐसे बंबू हट, जिन पर गोली, आग व भूकंप का भी असर न होगा

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Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट
Interior of Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट का इंटीरियर

-नैनीताल स्थित चिड़ियाघर में ऐसा ही एक बंबू हट, जो है पूरी तरह ईको फ्रेंडली तथा बारिश, सर्दी-गर्मी व बारिश के प्रभावों से भी सुरक्षित
नवीन जोशी, नैनीताल। पहाड़ों पर सीमेंट, सरिया की जगह हल्की संरचना के, पारिस्थितिकी के अनुकूल यानी ईको-फ्रेंडली घर बनाने की जरूरत तो बहुत जतायी जाती है, और इसके लिये बंबू हट यानी बांश के बनों घरों का विकल्प सुझाया भी जाता है, लेकिन बंबू हट एक सुरक्षित घरों की जरूरतों को पूरा नहीं करते। उनमें जल्द बारिश-नमी की वजह से फफूंद लग जाती है। बांश की लकड़ी को दीपक भी कुछ वर्षों के भीतर चट कर जाती है, और बांश की खपच्चियों के बीच से सर्द हवायें भीतर आकर बाहर जैसी ही ठंड कर देती हैं। वहीं ऐसे घरों में आग लगने, हल्के धक्कों में भी इसकी दीवारों को तोड़कर किसी के भी भीतर घुस जाने जैसे अन्य तमाम खतरे भी बने रहते हैं। लेकिन अब आप चाहें तो बांश से ही पूरी तरह ईको फ्रेंडली के साथ ही पूरी तरह सुरक्षित बंबू हट बनाने की अपनी ख्वाहिश आम घरों से कम कीमत में पूरी कर सकते हैं। ऐसा ही एक बंबू हट मुख्यालय स्थित नैनीताल जू में रिसेप्सन, टिकट काउंटर व सोविनियर शॉप के लिये इन दिनों निर्मित किया जा रहा है।

इन बंबू हट के निर्माताओं के दावों को सही मानें तो यह बंबू हट रिक्टर स्केल पर 9.5 यानी अधिकतम तीव्रता के भूकंप के लिये परीक्षित यानी टेस्टेड हैं। इस प्रकार यह पूरी तरह भूकंपरोधी है। इनका उपयोग लेह-लद्दाख में सेना के बंकरों के रूप में भी किया जाता है, जहां यह बारिश-बर्फवारी के साथ ही दुश्मन की गोलियों से भी न केवल पूरी तरह सुरक्षित हैं, वरन इनके भीतर बाहरी मौसम का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। बांश चूंकि घास की श्रेणी में आता है, और इन हट्स के निर्माण में बांश की जिन एक तरह की प्लाईवुड जैसी ही कंपोजिट शीट्स का प्रयोग किया जाता है, उनमें 99 फीसद बांश को ही प्रयोग करने का दावा किया जाता है, इस प्रकार इनके निर्माण के लिये एक भी पेड़ को काटने तथा र्इंट, सीमेंट, कंक्रीट व लोहे आदि का प्रयोग नहीं किया जाता है।

नैनीताल चिड़ियाघर में बम्बू कंपोजिट शीट्स से बन रहा भवन
नैनीताल चिड़ियाघर में बम्बू कंपोजिट शीट्स से बन रहा भवन

इसका ढांचा आम सीमेंट-कंक्रीट के घरों के मुकाबले बेहद हल्का भी होता है। दीवारों में बांश की शीट्स के बीच ग्लाशवूल का प्रयोग किया जाता है, जिससे बाहर के मौसम, सर्दी-गर्मी का प्रभाव नहीं पड़ता है, इस प्रकार इनके भीतर सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्मी और गर्मियों में अपेक्षाकृत ठंड रहती है, तथा गर्मी या ठंड के उपकरणों-एसी आदि की भी जरूरत नहीं पड़ती है। बांश की कंपोजिट शीट्स इस तरह अत्यधिक दबाव की तकनीक से निर्मित की जाती हैं कि इसे स्टील से भी अधिक घनत्व का होने का दावा भी किया जा रहा है। इस कारण इस पर बहुत प्रयास से भी कील नहीं ठुक पातीं, और ड्रिल मशीन से कील ठोंकनी पड़ती हैं। इस कारण यह फफूंद, दीमक और बारिश-नमी से भी पूरी तरह सुरक्षित बताया गया है। इसकी कीमत फर्श के क्षेत्रफल के आधार पर करीब दो हजार रुपये वर्ग फीट आती है। इस प्रकार 100 वर्ग फीट क्षेत्रफल का घर करीब दो लाख रुपये में बन जाता है, जो कि सामान्य घरों के निर्माण की कीमत से अधिक नहीं है। दिखने में भी यह घर बेहद सुंदर एवं यूरोपीय डीएफओ पराग मधुकर धकाते ने बताया कि नैनीताल चिड़ियाघर में वार्षिक योजना के करीब 20 लाख रुपये की लागत से चिड़ियाघर में निर्माण किये जा रहे हैं। हल्द्वानी के तराई-पश्चिमी वृत्त का डीएफओ कार्यालय भी इस तकनीक से बनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि वन विभाग के इको पर्यटन स्थल महेशखान स्थित वन विश्राम गृह में पहले से ही बम्बू हट उपलब्ध हैं।

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महेशखान सम्बंधित चित्रों के लिए यहाँ क्लिक करें।

महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट का इंटीरियर
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट का इंटीरियर

भारत सरकार से प्रमाणित है यह पद्धति

नैनीताल। डीएफओ पराग मधुकर धकाते ने बताया कि जिस तकनीक से नैनीताल चिड़ियाघर में रिसेप्सन सेंटर बन रहा है, वह भारत सरकार से न केवल प्रमाणित है, वरन सरकार इसे प्रोत्साहन दे रही है। इसी कारण वर्तमान में इसकी दर भी कम है। बांश की कंपोजिट शीट्स का निर्माण नार्थ-ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच ‘नेक्टर‘ के द्वारा विकसित किया जा रहा है, तथा नेक्टर ही इसे आगे आगे बढ़ा रही है। इसका कार्यालय शिलांग मेघालय में है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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