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पुण्यतिथि पर सूखे फूलों से हुआ राष्ट्रपिता गांधी का ‘पुण्यस्मरण’

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नैनीताल। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मंगलवार को पुण्यतिथि थी, लेकिन इस दौरान उनका स्मरण नगरवासियों के द्वारा किस तरह किया गया, यह चित्र इसकी कहानी खुद-ब-खुद बयां करने वाला है। नगर के तल्लीताल डांठ पर जहां गांधी जी ने 13 व 14 जून 1929 को आकर अपना संबोधन दिया था, वहां पर उनकी आदमकद मूर्ति खड़ी है। लेकिन इस मूर्ति पर न तो आजादी के बाद से उनके नाम पर राजनीति करने वाले दल के कार्यकर्ताओं और न ही मौजूदा सरकार के लोगों तथा अनेक मौकों पर उनकी मूर्ति के नीचे आकर ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ करने वाले आंदोलनकारियों ने ही आज उनकी पुण्यतिथि पर आने की जहमत उठायी। यह भी नहीं हुआ कि चार दिन पूर्व गणतंत्र दिवस के दिन उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण की औपचारिकता निभाने को जो फूल मालाएं चढ़ाई गयी थीं, उन्हें भी सूख जाने पर नहीं हटाया गया है। इस प्रकार अपने शहादत दिवस, पुण्यतिथि पर गांधी अपने चाहने वालों की राह तकते ही रह गए।
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Freedom Fighter Dungar Singh Bisht
Freedom Fighter Dungar Singh Bisht

नवीन जोशी नैनीताल। जिद यदि नेक उद्देश्य के लिए हो और इच्छाशक्ति के साथ की जाए तो फिर पहाड को भी झुकना पड़ता है। जिस अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी अपने राज्य में सूर्य के न छिपने के घमंड वाले अंग्रेजों को झुका कर देश से बाहर खदेड़ दिया था, उसी अहिंसा और सत्याग्रह की जिद से पहाड़ के एक बेटे ने महात्मा गांधी को भी झुका दिया था। राष्ट्रपिता के समक्ष भी ऐसे कम ही अनुभव आए होंगे, जहां उन्हें किसी ने अपना निर्णय बदलने को मजबूर किया होगा। देश को आजाद कराने के लिए गांधी जी के ऐसे ही एक जिद्दी सिपाही और स्वतंत्रता सेनानी का नाम डुंगर सिंह बिष्ट था, जो आज 98 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

यह 1940 की बात है। 1919 में जिले के सुंदरखाल गांव में सबल सिंह के घर जन्मे डुंगर तब कोई 20 वर्ष के रहे होंगे। वह आईवीआरआई मुक्तेश्वर के सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे। तभी गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन से वह ऐसे प्रेरित हुए कि पांच नवंबर 1940 को नौकरी छोड़ कर आंदोलन में कूद पड़े और फौज में शामिल होने का मन बनाया। 14 नवंबर 1940 को भर्ती अफसर कर्नल एटकिंशन ने उन्हें देखते ही अस्थाई सेकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर चयनित कर लिया। इसी बीच हल्द्वानी में गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में चल रहे सत्याग्रह आंदोलन को देखकर उन्होंने फौज का रास्ता छोड़ सीधे सत्याग्रह आंदोलन में कूदने का मन बना डाला। पहले तत्कालीन कांग्रेस जिलाध्यक्ष मोतीराम पाण्डे को और फिर सीधे महात्मा गांधी को पत्र लिखकर सत्याग्रह की अनुमति देने का आग्रह किया। 26 दिसंबर 1940 को बापू के पीए प्यारे लाल नैयर ने उन्हें बापू का संदेश देते हुए पत्र लिखा, ‘उनके पिता 84 वर्ष के हैं तथा माता एवं भाभी की मृत्यु हो चुकी है और पिता की देखभाल को कोई नहीं हैं, इसलिए उन्हें सत्याग्रह की इजाजत नहीं दी जा सकती है। वह पिता की सेवा करते हुए बाहर से ही देश सेवा करते रहें।’
 
Dungar Singh Bisht
डुंगर अनुमति न मिलने से बेहद दु:खी हुए और पुन: एक जनवरी 1941 को बापू को पत्र लिखकर अनुमति देने की जिद की। आखिर उनकी जिद पर बापू को झुकना पड़ा और बापू ने 18 मार्च 41 को उन्हें, ‘स्वयं को उनके देश-प्रेम से बेहद हर्षित और उत्साहित’ बताते हुए इजाजत दे दी। इस पर डुंगर ने आठ अप्रैल 41 को कड़ी सुरक्षा को धता बताते हुए आठ दिनों तक घर व जंगल में छिपते-छिपाते सरगाखेत में अपने साथी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व पुरोहित भवानी दत्त जोशी के साथ सत्याग्रह कर ही दिया। हजारों लोगों के बीच वह अचानक मंच पर प्रकट हुए और ‘गांधी जी की जय-जयकार, अंग्रेजों भारत को स्वतंत्र करो’ तथा बापू द्वारा सत्याग्रह के लिए दिया गया संदेश ‘इस अंग्रेजी लड़ाई में रुपया या आदमी से मदद देना हराम है, हमारे लिए यही है कि अहिंसात्मक सत्याग्रह के जरिए हर हथियारबंद लड़ाई का मुकाबिला करें’ पढ़ा। इसके तुरंत बाद उन्हें पुलिस ने पकड़कर पांच वर्ष के लिए जेल भेज दिया। गत वर्ष ‘राष्ट्रीय सहारा’ से एक भेंट में बिष्ट ने बताया था कि जेल में भी वह जेलर व जेल अधीक्षकों की नाक में दम किए रहे, इस कारण उन्हें पांच वर्षो में अल्मोड़ा, नैनीताल, हल्द्वानी, आगरा, खीरी-लखीमपुर, लखनऊ कैंप व बनारस सहित 11 जेलों में रखना पड़ा। इस दौरान देश में 87 हजार लोगों ने सत्याग्रह किया था, लेकिन कहा जाता है कि 1945 में बनारस जेल से रिहा होने वाले वह आखिरी सत्याग्रही थे। देश को दी गई सेवाओं का सिला उन्हें अपने गांव का पहला प्रधान, सरपंच तथा आगे यूपी के मंत्री बनने के रूप में मिला।
 
स्वतंत्रता सेनानी डुंगर सिंह बिष्ट का 96 वर्ष की उम्र में हुआ निधन, तिरंगे झंडे में लपेटकर निकली अंतिम यात्रा
नैनीताल (एसएनबी)। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी डुंगर सिंह बिष्ट का सोमवार सुबह उनके आवास पिल्रग्रिम हाउस में निधन हो गया। सोमवार सुबह सवा नौ बजे उन्होंने 96 वर्ष आठ माह और 27 दिनों की आयु में प्राण त्यागे। कुमाऊं मंडल के अपर आयुक्त श्रीश कुमार ने उनके आवास पर पहुंचकर उनके शव को तिरंगे में लपेटकर देश की ओर से सम्मान प्रदर्शित किया। दिन भर उनके आवास पर नगर के गणमान्य लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। अपराह्न में उनकी अंतिम यात्रा निकली, जिसमें सैकड़ों की संख्या में नगरवासी एवं विभिन्न संगठनों, संस्थाओं से जुड़े लोग शामिल हुए। स्थानीय पाइंस स्थित श्मशान घाट पर उनके चारों पुत्रों ने उनकी पार्थिव देह का मुखाग्नि दी।
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार दो दिन से ही उन्हें स्वास्थ्य संबंधी हल्की परेशानियां थीं। सोमवार सुबह उनके स्वास्थ्य परीक्षण के लिए चिकित्सक को घर पर बुलाया गया था। इस दौरान उनके चारों पुत्र मुख्य लेखाधिकारी एवं राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के जिलाध्यक्ष बहादुर बिष्ट, पूर्व जिपं सदस्य गोपाल बिष्ट, राजकीय महिला महाविद्यालय के प्राचार्य गंगा सिंह बिष्ट एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय में राज्य सरकार के ब्रीफ होल्डर दिनेश बिष्ट के साथ पुत्रवधू नवनिर्वाचित जिपं सदस्य पूनम बिष्ट, अन्य पुत्रवधुएं व नाती-नातिन सामने ही थे, जब उन्होंने प्राण त्यागे। नगर की ओर से पालिकाध्यक्ष श्याम नारायण ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित किया। विधायक सरिता आर्या, पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल व खड़क सिंह बोहरा, पूर्व सांसद डा. महेंद्र पाल सहित सैकड़ों की संख्या में लोगों ने उनके अंतिम दर्शन किए तथा अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
यूपी में मंत्री रहे, उक्रांद से भी लड़ा चुनाव
नैनीताल। स्व. बिष्ट 1969 में यूपी के चंद्रभान गुप्त मंत्रिमंडल में वन, पर्वतीय उद्यान विकास व भूमि संरक्षण मंत्री रहे। लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता होने के साथ ही स्वर्गीय बिष्ट उत्तराखंड राज्य के आंदोलन में भी बेहद सक्रिय रहे थे। पूर्व विधायक एवं उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष रहे डा. नारायण सिंह जंतवाल ने बताया कि 1980 में उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल के टिकट पर यूपी की तत्कालीन नैनीताल-रामनगर सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ा था।
नगर के सबसे बुजुर्ग लोगों में शुमार थे
नैनीताल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डुंगर सिंह बिष्ट का जन्म नैनीताल जनपद के ग्राम सुंदरखाल में 25 अक्टूबर 1917 को सबल सिंह बिष्ट व बचुली देवी के घर में हुआ था। जन्म के मात्र 13 दिनों बाद ही वह माता का निधन हो जाने से माता के लाड-प्यार से वंचित हो गए। उन्होंने सोमवार को 96 वर्ष आठ माह और 27 दिनों की आयु में दुनिया को तब अलविदा कह दिया, जबकि लोग उन्हें शतायु होने की कामना कर रहे थे। बहरहाल, वह इस आयु में भी जनपद के बुजुर्गतम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और नगर के बुजुर्गतम लोगों में शुमार थे। उनके निधन पर पूर्व विधायक नारायण सिंह जंतवाल व खड़क सिंह बोहरा, पूर्व दायित्वधारी डा. रमेश पांडे, विधायक सरिता आर्या व पालिकाध्यक्ष सरिता आर्या ने कहा कि ऐसे व्यक्ति युगों में एक ही पैदा होते हैं।
स्वतंत्रता सेनानी बिष्ट के निधन पर शोक
देहरादून/हल्द्वानी (एसएनबी)। राज्यपाल अजीज कुरैशी, मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रसे अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने नैनीताल जिले के स्वतन्त्रता सेनानी एंव समाजसेवी डूंगर सिंह बिष्ट के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने ईर से स्व. बिष्ट की आत्मा की शांति एवं दु:ख की इस घड़ी में उनके परिजनों को धैर्य प्रदान करने की कामना की है। अपने शोक संदेश में मुख्यमंत्री ने कहा कि स्व. बिष्ट कुशल समाजसेवी एवं निष्ठावान जन नेता थे। उनका निधन प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति है। वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं कांग्रेस नेता डुंगर सिंह बिष्ट के निधन से जिले में शोक की लहर व्याप्त है। अध्यक्ष विधान सभा गोविन्द सिंह कुंजवाल, वित्तमंत्री इन्दिरा हृदयेश, राजस्व मंत्री यशपाल आर्य, श्रम मंत्री हरीश चन्द्र दुर्गापाल समेत तमाम नेताओं ने गहरा दुख प्रकट किया है। यहां जारी अलग-अलग शोक संदेश में सभी नेताओं के स्वतंत्रता सेनानी के कृतृत्व को याद किया और एक महान समाजसुधारक बताया। विधायक सरिता आर्या समेत सतीश नैनवाल, हरीश मेहता, हेमंत बगड़वाल, मौ.अनवार, संजीव आर्य, सुमित हृदयेश, गोविंद बिष्ट, राहुल छिमवाल, केदार पलड़िया, टीटू शर्मा, हाजी सुहैल सिद्दकी, मो गुफरान, एनबी गुणवंत, मोहन बिष्ट, शोभा बिष्ट, राजू टंडन, संजय जोशी तथा आयुक्त कुमाऊं अवेन्द्र सिंह नयाल, डीआईजी अन्नत राम चौहान, जिलाधिकारी अक्षत गुप्ता, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विम्मी सचदेवा ने शोक व्यक्त किया।
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