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गोरखपुर हादसा: सिर्फ राजनीति नहीं, कुछ करिये भी…

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गोरखपुर में मासूमों की मौत अत्यंत पीड़ादायक है। खासकर ऑक्सीजन की कमी से एक भी मासूम बच्चे की मौत निर्मम हत्या से कम नहीं है। पीड़ित माता-पिता के दुःख को समझना भी आसान नहीं है। यह घटना हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ ही चिकित्सा विज्ञान की ‘औकात’ बताने के लिये भी पर्याप्त है, जहां हम वर्षों से हर वर्ष सैकड़ों मासूमों की मौत के लिये इन्सेफलाइटिस की जानलेवा महामारी से निपटने में कमोबेश पूरी तरह अक्षम साबित हुए है। इस दिशा में पूरी संजीदगी से सोचने, लोगों को इस बीमारी से रोकथाम के लिये साफ-सफाई व एहतियात बरतने व पहले पोंगा-पंथियों, झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाकर समय बरबाद करने की जगह आखिर में नहीं बल्कि पहले ही अच्छे चिकित्सा संस्थानों में जाने के लिये जागरूक करने जैसे कदम उठाने के साथ ही अस्पतालों में व्याप्त विभिन्न खरीदों के भ्रष्टाचार पर नकेल कसने, सरकार के स्तर पर कड़ी नजर रखने तथा सरकार के साथ ही न्यायालय के स्तर पर दोषियों को ‘नजीर’ पेश करने वाली सजा देने जैसे उपायों की जरूरत है। केवल राजनीति करने, दुःख जताने, कड़ी निंदा करने से काम चलने वाला नहीं है….।

यह है बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इन्सेफलाइटिस वार्ड की सच्चाई 

आरडी मेडिकल कॉलेज के इन्सेफलाइटिस वार्ड में लगातार हो रही मौतों को लेकर दावा किया जा रहा है कि कमीशन के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोकी गई थी। इस जानकारी के सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज की सच्चाई जानने के लिए कुछ डॉक्टर्स, नर्स और हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन के अफसरों से बात की। बातचीत में पता चला कि कई इक्विपमेंट्स (उपकरण) की मेड‍िकल कॉलेज में कमी है, जिसकी वजह से नाॅर्मल ऑपरेशन भी एक-आध महीने लेट होते हैं। जरूरी दवाओं की भी कमी है, जबकि रिपेयर करने के लिए रखी हुई मशीनें कमीशन के चक्कर में बन नहीं पा रही हैं।
हड्डी और सर्जरी विभाग का ऐसा है हाल…
– डिपार्टमेंट से जुड़े एक डॉक्टर ने बताया, ”यहां ड्रायर स्टरलाइजेशन मशीन की कमी है। ये मशीन ऑपरेशन थिएटर को विसंक्रमित कर देती है।”
– ”रूटीन ओटी में एक मशीन है, लेकिन वो भी खराब पड़ी है। इसी तरह सी आर्म्स मशीन होती हैं, जिससे ऑपरेशन थिएटर में उस समय इमेजेस वगैरह देखी जाती हैं।”
– ”डिपार्टमेंट में सी आर्म्स की तीन मशीनें हैं। एक नई है, जबकि 2 थोड़ी पुरानी है। उनको रिपेयर करना है, लेकिन रिपेयर करने वाले ने हाथ खड़े कर दिए हैं। उसका पैसा बकाया है।
 मरीजों से बोलना पड़ता है झूठ
– हड्डी और सर्जरी विभाग के डॉक्टर ने बताया, ”कमीशन की वजह से मशीनों को रिपेयर नहीं कराया जाता है। इस वजह से आम आदमी को परेशानी उठानी पड़ रही है।”
– ”रूटीन ओटी में एक सी आर्म्स मशीन होने की वजह से डेढ़ महीने तक ऑपरेशन लेट होते हैं। यही नहीं, हमें मरीजों को झूठ तक बोलना पड़ता है कि मशीन सही होने में समय लगेगा, जबकि एक हफ्ते में मरीज घर जा सकता है।
ऑपरेशन थिएटर में एसी और पंखे भी खराब
– डॉक्टर के मुताबिक, ”ऑपरेशन थिएटर में लगी मशीनों को सही रखने के लिए एसी की जरूरत होती है। कुछ ओटी में एसी भी खराब पड़ी है।”
– ”यहां तक कि वार्ड में लगे पंखे भी खराब हैं। जरूरी ड्रेस और थिएटर में चप्पल की जरूरत होती है, यहां वो भी नहीं है।”
निलंबित प्रिंसिपल की चलती है पैथालॉजी
– हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े एक अफसर ने बताया, ”पूर्व प्रिंसिपल राजीव मिश्रा की निजी पैथालॉजी श्रीराम पैथालॉजी के नाम से चलती है।”
– ”शहर में 3 जगह पैथालॉजी हैं, जिसमें एक मेडिकल कॉलेज के सामने, गोलघर और बेतियाहाता में हैं। अगर जांच हो तो सब सामने आ जाएगा।”
छोटी-छोटी चीजों को बाहर नर्सिंग होम में भेज दिया जाता है…
– इन्सेफलाइटिस वार्ड में तैनात एक नर्स के मुताबिक, ”यहां जरूरी दवाओं की कमी है। कुछ दवाओं को छोड़कर सब बाहर से मंगाई जाती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रांडेड दवाओं पर कमीशन कम मिलता है।”
– ”छोटे-छोटे सामान जैसे इंट्राकैप वगैरह खरीदे तो मेडिकल कॉलेज जाते थे, लेकिन कुछ सामान बाहर भी बेच दिए जाते थे।”
वार्ड ब्वॉय-नर्सों के ट्रांसफर में लिया जाता था पैसा
– एक नर्स ने बताया, ”अगर हमारा एक डिपार्टमेंट से दूसरे डिपार्टमेंट में ट्रांसफर भी हुआ है तो पैसा देना पड़ता था।”
– ”यहां तक कि वार्ड ब्वॉय को भी इसी प्रॉसेस से गुजरना पड़ता था। वार्ड ब्वॉय और नर्स की भर्ती में काफी पैसा चलता था।”
डॉक्टर्स की है कमी
– एक डॉक्टर की मानें तो, ”एनेस्थीसिया के डॉक्टर्स की यहां कमी है। ये हाल तब है, जब बीआरडी मेडिकल कॉलेज पर लखनऊ के केजीएमसी से ज्यादा मरीजों का दबाव रहता है।”
– ”एक वार्ड में 5 से 6 रेजिडेंट डॉक्टर हैं, जबकि होने 15 से 17 रेजिडेंट डॉक्टर्स चाहिए।”
ऐसा है इन्सेफलाइटिस वार्ड का हाल
– वार्ड से जुड़े एक डॉक्टर ने बताया, ”बच्चों की सिंकाई के काम आने वाले वार्मर की जरूरत है। कई बार लिखकर दिया जा चुका है, लेकिन कमीशन के लिए डील रुकी हुई है।”
– ”सीएम योगी ने खरीदने के आदेश भी दे दिए हैं, लेकिन अब तक कोई कारवाई नहीं हुई है। इन्सेफलाइटिस वार्ड में ऊपर 14 बेड हैं, जबकि जरूरत ज्यादा की है। सीएम ने अपने इंस्पेक्शन में पहले भी इसे बढ़ाने का आदेश दिया था, लेकिन वह भी ठंडे बस्ते में चला गया।”
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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