यातायात सुरक्षा से किसी को इनकार या समस्या नहीं, पर….

नवीन जोशी, नैनीताल। सड़क यातायात में यात्रियों की सुरक्षा से किसी को आपत्ति और समस्या नहीं किंतु कुछ सवालों के जवाब भी आवश्यक हैं। यह सवाल उत्तराखंड में दोपहिया वाहनों में चालक के अलावा पीछे बैठने वाली दूसरी सवारी के लिए भी हेलमेट पहनना अनिवार्य करने के बाद उठ रहे हैं। इस अभियान को शुरू करने के साथ उत्तराखंड पुलिस ने शहरों के अंदर व्यापक स्तर पर चालान करने का अभियान छेड़ दिया है। थाने-चौकियों की पुलिस में मानो चालान करने की प्रतिस्पर्धा हो रही है। ऐसे में जनता की ओर से कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।

  • देश में स्कूटी-स्कूटरों में एक हेलमेट रखने का ही प्रबंध है, जबकि मोटरसाइकिलों में एक भी हेलमेट नहीं रखा जा सकता है। ऐसे में दोपहिया वाहन चालक कैसे दो हेलमेट साथ में रखकर चल सकते हैं। एक से दूसरे शहर या गांव से शहर पहुंचने जितनी लंबी यात्राओं में तो दोनों सवारियां अपनी सुरक्षा के लिए हेलमेट पहन सकती हैं। बड़े शहरों में भी सुबह-शाम ऑफिस जाने वाले दंपति, नियमित स्कूटर-बाइक पूल करने वाले लोग भी दोनों हेलमेट पहन कर चल सकते हैं। परंतु खासकर छोटे शहरों के अंदर, दिन भर दुपहिया वाहनों से इधर-उधर जाने वाले लोग शाम को बच्चों को लाने के लिए हेलमेट कहां रख कर चलते हैं। खास कर बरसात के मौसम में हेलमेटों को भीगने से बचाने का क्या प्रबंध हो सकता है ? पूरी संभावना है कि दोपहिया वाहनों में दोनों सवारियों के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य करने के बाद जरूरतमंदों को दोपहिया वाहनों से मदद-लिफ्ट भी नहीं मिल पायेगी। क्योंकि जरूरतमंद हेलमेट साथ लेकर मदद नहीं मांग रहे होंगे।
  • देश में अब तक उपलब्ध वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार दोपहिया वाहनों से हुई दुर्घटनाएं और दुर्घटनाओं में हुई मौतें कुल दुर्घटनाओं और मौतों की 34-34 फीसद है। और इनमें से करीब 19 फीसद मौतें दुपहिया वाहनों पर हेलमेट न पहनने से हुई हैं। यानी शेष 66 फीसद दुर्घटनाएं और मौतें अन्य चार-छः या अधिक पहियों वाले वाहनों से तथा सड़कों की बुरी दशा सहित अन्यान्य कारणों से होती हैं। लेकिन पुलिस की सख्ती केवल दुपहिया वाहनों पर ही दिखाई देती है। कहीं ऐसा इसलिये तो नहीं कि दुपहिया वाहनों के खिलाफ आदेश देने वाले न्यायाधीश/अधिकारी स्वयं कभी दोपहिया वाहनों में सवारी नहीं करते। उन्हें हेलमेट संभालने जैसी समस्याओं से रूबरू नहीं होना पड़ता है।
  • दोपहिया वाहनों में दोनों सवारियों को हेलमेट पहनना अनिवार्य करने से पहले या साथ क्या दुपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों को दो हेलमेट रखने का प्रबंध करने और दुपहिया खरीदने के साथ ही दो हेलमेट भी देने जैसे आदेश नहीं दिये जाने चाहिए ?
  • मोटर यान अधिनियम के अंतर्गत चार पहिया वाहनों में यात्रियों के लिए सीट बेल्ट लगाना अनिवार्य है। क्या उत्तराखंड पुलिस बता सकती है कि अब तक सीट बेल्ट न पहनने वाले कितने चार पहिया वाहनों की सवारियों का चालान किया गया ? क्या स्वयं समस्याएं झेल रहे निम्न-मध्यम वर्ग पर ही पुलिस का डंडा चल सकता है, कारों में चलने वाले उच्च वर्ग पर नहीं ?
  • मोटर यान अधिनियम में हेड एवं टेल लाइटों के लिए भी नियम प्राविधान हैं। लेकिन इनका खुलेमान उल्लंघन होता है। रात्रि में कई बार सामने से आने वाले वाहनों के लिए दुर्घटना का कारण बनने वाली अत्यधिक तेज व असुरक्षित लाइटें जलाकर चलने वाले चार पहिया वाहनों के खिलाफ क्या पुलिस कभी कोई कार्रवाई करती है, अथवा न्यायालयों से कोई कार्रवाई करने का आदेश हुए हैं ?
  • दोपहिया वाहनों में भी अधिकांश घटनाएं कम उम्र के बच्चों व युवाओं के वाहनों को अत्यधिक तेज चलाने के कारण होती है, क्या पुलिस ऐसे मामलों में किये गये चालानों के आंकड़े पेश कर सकती है ? इन अधिकांश सवालों के जवाब नकारात्मक ही मिलते हैं। ऐसे में यह जरूरत महसूस की जाती है कि पुलिस एवं प्रशासन को वाहन दुर्घटनाएं रोकने के लिए ईमानदार प्रयास किये जाने की जरूरत है। केवल दुर्बल पर डंडा चलाकर आंकड़े बनाने से इस समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। समाधान होने वाला होता, तो कभी का हो चुका होता।

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नैनीताल, 22 जून 2018। उत्तराखंड में अब दोपहिया वाहन केवल आईएसआई मार्क के हेलमेट पहनकर ही चलाए जा सकेंगे। साथ ही यदि दोपहिया वाहन चलाते हुए यदि मोबाइल फोन पर बात की तो लाइसेंस निरस्त किया जाएगा।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खण्डपीठ ने इस संबंध में राज्य सरकार को सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी भी मोटर साइकिल व स्कूटी चालक को बिना आईएसआई मार्क के हेलमेट पहने दोपहिया वाहन चलाने की अनुमति न दी जाये। साथ ही सरकार मोटर वाहन अधिनियम की धारा 129 का भी कठोरता से पालन सुनिश्चित कराये। आदेश का पालन कराने के लिए एसएसपी, सीओ व कोतवाल मुख्य तौर पर जिम्मेदार होंगे। साथ ही खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिए है की जो लोग वाहन चलाते वक्त मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं उनके लाइसेंस निरस्त करें और मोटरयान नियमो का उलँघन करने वालो के खिलाफ कार्यवाही करें। इसके अलावा नाबलिकों को लाइसेंस जारी ना करने और उन्हें वाहन चलाने की अनुमति न देने को भी कहा है। इसके अलावा सरकार को यह भी निर्देश दिए है किसी भी वाहन में उसकी लंबाई से ज्यादा ज्यादा लम्बाई के सरिया, स्टील के रॉड, खम्भे व पाइप आदि ले जाने पर प्रतिबन्ध करें। मामले के अनुसार अविदित नौनियाल ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार मोटरयान अधिनियम 1988 की धारा 128 व 129 का कठोरता से पालन नही करा रही है, जिससे लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं।

अब प्रस्तुत हैं भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा अब तक उपलब्ध ताज़ा अगस्त 2017 में आई वर्ष 2016 में हुई दुघटनाओं से सम्बंधित रिपोर्ट ‘भारत में सड़क दुर्घटनाएं-2016’ के मुख्य बिंदु:

  • रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2005 से वर्ष 2016 के बीच कम से कम 15,50,098 यानी करीब साढ़े 15 लाख से अधिक लोगों की मौत सड़क दुर्घटना में हुई है। वर्ष 2016 में भारत में कुल 4,80,652 वाहन दुर्घटनाएं हुईं। यानी हर दिन औसतन करीब 1,331 यानी हर घंटे 55 दुर्घटनाएं हुई हैं। इन दुर्घटनाओं में 1,50,785 लोग मारे गए। यानी हर घंटे 17 या हर तीसरे मिनट एक मौत हुई। साथ ही 4,94,624 लोग घायल भी हुए। मारे गए लोगों में से सर्वाधिक 38,076 यानी 25 फीसदी लोगों की उम्र 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच थी।
  • वहीं दोपहिया वाहनों की दुर्घटनाओं की बात करें तो वर्ष 2016 में कुल 4,80,652 वाहन दुर्घटनाओं में से 1,62,280 दोपहिया दुर्घटनाऐं यानी कुल दुर्घटनाओं की करीब 34 फीसदी दुर्घटनाएं दोपहिया वाहनों की एवं इसकी करीब दोगुनी-66 फीसद अन्य वाहनों की हुईं। अलग-अलग कर देखें तो कुल दर्घटनाओं में कार, जीप और टैक्सियों की दुर्घटनाओं की हिस्सेदारी 24 फीसदी (लगभग 1,13,267) और ट्रकों, टेम्पो, ट्रैक्टरों और अन्य व्यक्तिगत वाहनों की हिस्सेदारी 21 फीसदी (लगभग 1,01,085 ) रही है।
  • वर्ष 2016 में दोपहिया वाहनों की दुर्घटनाओं में 52,500 यानी रोजाना 144 या हर घंटे 6 मौतें हुईं। यह संख्या कुल सड़क दुर्घटनाओं में हुई 1,50,785 मौतों की 34 फीसदी है। इसमें से 19.3 फीसद लोगों ने हेलमेट नहीं पहना हुआ था। वहीं कारों, टैक्सियों, वैन और हल्के मोटर वाहनों की 26,923 दुर्घटनाएं हुईं, और इनमें मरने वाले 17.9 प्रतिशत लोग थे।
  • वर्ष 2016 में, हेलमेट न पहनने के कारण 10,135 यानी रोजाना 28 दोपहिया वाहन सवारों की मौत हुईं। जबकि सीट बेल्ट न पहनने के कारण 5,638 यानी हर रोज 15 लोगों की मौत हुई है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क दुर्घटनाओं का एक महत्वपर्ण कारण ‘चालकों का दोष’ है। वर्ष 2016 में सड़क पर हुई कुल दुर्घटनाओं में से 4,03,598 यानी 84 फीसदी दुर्घटनाएं चालकों के दोष के कारण ही हुईं। इनमें हुई 1,21,126 मौतें यानी सभी मौतों की 80 फीसदी मौतें गलत ड्राइविंग की वजह से हुई। लेकिन हमारे यहां चालक लाइसेंस बनाने के लिए चालकों की ड्राइविंग क्षमता जांचने का कोई पुख्ता प्रबंध नहीं है। घर बैठे भी लाइसेंस बन जाते रहे हैं।
  • चालकों की गलती के कारण हुईं कुल 4,03,598 दुर्घटनाओं में से 2,68,341 यानी 66 फीसद दुर्घटनाएं तेज गति के कारण हुईं। इन तेज गति के कारण हुई दुर्घटनाओं में कुल 1,21,126 मौतें हुई, और इनमें 73,896 यानी 61 फीसद मौतें तेज गति के कारण हुई हैं। लेकिन तेज गति पर नियंत्रण का देश में कोई प्रबंध नहीं है। उल्टे एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि उनमें कितने घंटों का सफर कितने मिनटों में किया जा सकता है।
  • दुर्घटनाओं का दूसरा बड़ा कारण ओवरटेकिंग है। 7.3 फीसदी दुर्घटनाओं और 7.8 फीसदी मौत की वजह ओवरटेकिंग रही है। साथ ही सड़क पर गलत तरफ गाड़ी चलाना भी अन्य मुख्य कारण रहा है। इससे 4.4 फीसदी दुर्घटनाएं और 4.7 फीसदी मौतें हुई हैं।
  • वर्ष 2016 में शराब-ड्रग्स का सेवन करके वाहन चलाए जाने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या 14,894 दर्ज की गई, जबकि इस कारण से हुई मृत्यु की संख्या 6,131 है। यानी इस कारण प्रतिदिन 41 दुर्घटनाएं और प्रतिदिन 17 लोगों की मृत्यु हुई है। गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल फोन का उपयोग करने के कारण 4,976 दुर्घटनाएं और 2,138 लोगों के मृत्यु के आंकड़े दर्ज किए गए हैं। या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मोबाइल फोन इस्तेमाल करने के कारण रोजाना 14 दुर्घटनाएं और 6 मौतें हुई हैं।
  • भारत में हुई कुल दुर्घटनाओं में से 85,834 दुर्घटनाएं यानी लगभग 18 फीसदी दोपहर के 3 बजे से रात के 9 बजे के बीच हुई हैं। वहीं शाम 6 से 9 बजे के घंटे दूसरे सबसे ज्यादा दुर्घटना होने वाले घंटे थे। इन घंटों में दुर्घटनाओं की संख्या 84,555 दर्ज की गई है। भारत में अधिकांश दुर्घटनाएं 3 बजे से 9 बजे के बीच हुई। वर्ष 2016 में सभी सड़क दुर्घटनाओं में से 35 फीसदी इन्हीं घंटों में दर्ज की गई।
  • दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में 2016 में सबसे अधिक 71,431 यानी प्रतिदिन 196 या हर घंटे 8 सड़क दुर्घटनाओं की सूचना है। वहीं मध्य प्रदेश में 53,972 और, कर्नाटक में 44,403 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। ये राज्य दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे हैं।
  • वहीं सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के मामले में वर्ष 2016 में सड़क दुर्घटनाओं के कारण देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा 19,320 यानी यानी रोजाना 53 या हर घंटे 2 मौतों की सूचना है। जबकि तमिलनाडु में 17,218, महाराष्ट्र में 12,935 और कर्नाटक में 1,113 मौतें दर्ज हुई हैं।
  • 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले करीब 50 शहरों में से 2016 में चेन्नई में सबसे ज्यादा 7,486 सड़क दुर्घटनाओं और 1,183 मौतों के मामले दर्ज किए गए।
  • वहीं दुर्घटना गंभीरता के मामले में (प्रति दुर्घटना पर सड़क दुर्घटना संबंधित मौत ) 69.9 फीसदी मामलों के साथ लुधियाना का प्रदर्शन सबसे बद्तर रहा है। 67.1 फीसदी के साथ अमृतसर, 58.4 फीसदी के साथ आसनसोल-दुर्गापुर का प्रदर्शन भी खराब रहा है। इस संबंध में कोच्चि के आंकड़े 6.6 फीसदी पर सबसे कम रहे हैं।
  • भारत ने वर्ष 2014 में प्रति 1,00,000 की आबादी पर 11 सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा दर्ज किया था और दूसरे स्थान पर रहा था जबकि इस संबंध में रूस के आंकड़े 19, अमेरिका के 10 और मॉरीशस के लिए 11 का आंकड़ा दर्ज किया गया था। वहीं चोट के मामले में भारत ने प्रति 1,00,000 की आबादी पर 39 का आंकड़ा दर्ज किया है, जबकि अमेरिका ने 526, जापान ने 451 और दक्षिण कोरिया ने 443 का आंकड़ा दर्ज किया है।
  • इनके साथ ही वर्ष 2016 में अनियंत्रित वाहनों के कारण 72.9 फीसद दुर्घटनाएं हुईं। वहीं अधिक गति के कारण हुई 3,33,446 दुर्घटनाओं में 89,141 मौतें, ओवरलोडिंग के कारण हुए 61,325 सड़क हादसों में 21,302 मौतें, वाहनों की सीधी टक्कर के कारण हुए 55,942 हादसों में 22,962 मौतें, ओवरटेकिंग से हुई 36,604 दुर्घटनाओं में 11,398 मौतें, शराब पीकर गाड़ी चलाने से 14,894 हादसे व इनमें 6,131 मौतें, गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल फोन का उपयोग करने से 4,976 दुर्घटनाएं व इनमें 2,138 लोगों की मौतें हुईं। वहीं 4 फीसद दुर्घटनाएं नाबालिग चालकों की वजह से भी हुईं।

अन्य रिपोर्टें :

नई दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ की जुलाई 2017 की रिपोर्ट, ‘रोड सेफ्टी इन इंडिया – पब्लिक पर्सेप्शन सर्वे’ के अनुसार सड़कों पर चलने वाले लगभग 80 फीसदी लोग खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, 10 शहरों के 2,166 उत्तरदाताओं में से 54 फीसदी ने महसूस किया कि सड़कों की खराब स्थिति और दोषपूर्ण डिजाइन दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते हैं। जबकि 74 फीसदी ने कहा कि मौतों और चोटों के लिए सड़क ठेकेदारों और इंजीनियरों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
वहीं भारत के पूर्व योजना आयोग की 2014 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ रिपोर्ट कहती है कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं की वार्षिक लागत देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 3 फीसदी है। रिपोर्ट कहती है, ‘2015-16 में भारत की जीडीपी की 136 लाख करोड़ रुपये (2,092 बिलियन) की धनराशि को दुघ्रटनाओं के कारण 4.07 लाख करोड़ रुपए (62.6 बिलियन) का मौद्रिक नुकसान होता है। विडंबना यह भी है कि यह धनराशि भारत में सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नोडल एजेंसी, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के बजट का पांच गुना है।’

दुर्घटनाएं घटीं, मौतें बढ़ीं:

रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में वर्ष 2016 में 4 लाख 81 हजार सड़क हादसे हुए, और इन हादसों में करीब 1 लाख 51 हजार लोगों ने अपनी जान गवाई। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि साल 2015 के मुकाबले सड़क दुर्घटनाओं में 4.1 फीसद की कमी आयी, लेकिन दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या में 3 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि पिछले साल सड़क दुर्घटनाएं कितनी भयानक रहीं।

ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए दिल्ली के पूर्व ट्रैफिक कमिश्नर मैक्सवेल परेरा की राय मायने रखती है। उनका कहना है कि सड़क दुर्घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए नागरिकों को ट्रैफिक नियमों का पालन करना होगा। दुपहिया वाहन चालकों का हेलमेट पहनना होगा, कार सवारों को सीट बेल्ट जरूर बांधनी चाहिए और अपनी लेन में ही गाडी चलानी चाहिए। साथ ही उनका कहना है कि भारत में सड़क हादसे रोड इंजीनियरिंग की खामी के चलते भी होते हैं। चालान और फाइन दुर्घटनाओं को कम करने में ज्यादा योगदान नहीं कर सकते। प्रत्येक वाहन चलाने वाला सजग होकर दुर्घटना को टाल सकता है। विदेशों में ट्रैफिक चालान से मिलने वाले पैसों को रोड सेफ्टी पर खर्च किया जाता है। भारत में भी ऐसा ही कुछ करने की जरूरत है। सरकार को भी रोड सेफ्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को जागरुक बनाने की जरूरत है।

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