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रोडवेज बसों का किराया दो गुना करने पर सरकार को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, बढ़ा ही रहेगा किराया

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नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा रोडवेज की बसों व अन्य वाहनों में कोविड 19 के दौरान दोगुना किराया बढ़ाये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को सरकार व उत्तराखंड परिवहन निगम का पक्ष सुनने के बाद, उनके पक्ष से सहमत होते हुए निरस्त कर दिया है। मामले में राज्य सरकार व परिवहन निगम की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि कोविड 19 के चलते बसों में सोसियल डिस्टेंसिंग के मानकों के मुताबिक 50 फीसद यात्रियों को बैठाया जा रहा है। इसी वजह से किराया बढ़ाया गया है। बाद में यह किराया अपनी पुरानी दरों में आ जायेगा।
मामले के अनुसार उमेश शर्मा ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने इस महामारी में बसों का किराया दो गुना कर दिया है, जिसके कारण गरीब व आम लोगों का सफर करना मुश्किल हो गया है। इस बढ़े हुए किराये पर रोक लगाई जाये, जिससे यात्रियों को आने-जाने में असुविधा उत्पन्न न हो।

यह भी पढ़ें : धर्म नगरी में मीट की दुकानों के लाइसेंसों का नवीनीकरण करने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 जून 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने धर्म नगरी कहे जाने वाले ऋषिकेश में मीट की दुकानें सील करने के खिलाफ दायर याचिका पर याचिकाकर्ताओं को लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आवेदन करने और जिला प्रशासन को उनके लाइसेंसों के नवीनीकरण करने के निर्देश दिये।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता ऋषिकेश निवासी दीप कलमेठी की याचिका में कहा गया था कि जिला प्रशासन ने उनकी मीट की दुकानें सील कर दी हैं और अब मीट नहीं बेचने नहीं दिया जा रहा है। इससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मीट करोबारियों ने लाइसेंस का ऑनलाइन नवीनीकरण नहीं किया है, इसलिए प्रशासन ने लाइसेंस निरस्त कर दुकानों को सील किया है।

यह भी पढ़ें : बोर्ड परीक्षा तक हर दिन परीक्षा केंद्रों को सेनेटाइज करने के हाईकोर्ट के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जून 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली, हरिद्वार निवासी सच्चिदानंद डबराल व अन्य के द्वारा दायर जनहित याचिकाओं की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए है कि जब तक उत्तराखंड बोर्ड की सभी परीक्षाएं पूरी नहीं हो जाती हैं तब तक परीक्षा केंद्रों में स्कूल भवन, मेज-कुर्सी, शौचालय व वाटर फिल्टर आदि को हर दिन सेनेटाइज करें। यह भी कहा है कि प्रदेश के जिन ग्राम प्रधानों को कोरोना विषाणु से लड़ने के लिए अभी तक धनरािश नही दी गयी है, उनको अगली सुनवाई तक धनराशि अवमुक्त करें। मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया व न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई।
मामले में सच्चिदानंद डबराल की ओर से प्रार्थना पत्र देकर कहा गया है कि राज्य सरकार जिन केंद्रों में बोर्ड की शेष बची परीक्षाएं कराने जा रही है, उनमें अभी हाल में सरकार ने क्वारन्टाइन सेंटर बनाया था और इनमें प्रवासियों को ठहराया गया था। तब से इन केन्द्रों को सेनेटाइज तक नही किया गया है। वहीं अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि कोरोना विषाणु से बचने के लिए राज्य सरकार व केंद्र स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को लेकर उदासीन रही है। जो उपकरण मेडिकल कर्मियों को दिए गए हैं वे मानको के अनुरूप नहीं है। उनकी गुणवत्ता निम्न है। वहीं हरिद्वार निवासी सच्चिदानंद डबराल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार प्रदेश के प्रवासियों को उत्तराखंड में वापस ला रही है परंतु इनकी जांच सीमा पर नहीं की जा रही है और न ही सीमा पर इनकी खाने-पीने व रहने की कोई व्यवस्था की गई है।

यह भी पढ़ें : केदारनाथ आपदा में जमीन में दफन शवों को तलाशने के लिए वैज्ञानिक तरीके तलाशने में जुटा हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने 2013 में केदारनाथ में आई महाविनाशकारी आपदा के मामले में सुनवाई करते हुए वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून से पूछा है कि इस आपदा में लापता हुए लोगों के शवों को खोजने के लिए कौन-कौन से वैज्ञानिक तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इस संबंध में एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के आदेश दिए गये हैं।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली निवासी अजय गौतम की ओर से उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद केदारघाटी में करीब 4200 लोग लापता हुए। इनमें से 600 लोगों के कंकाल मिले। मगर आपदा के सात साल बाद भी केदारघाटी में 3600 लोग दफन हैं। इन शवों को निकालने के लिए राज्य सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से प्रार्थना की है कि सरकार मामले को गभीरता से ले और केदारघाटी से शवों को निकलवाकर अंतिम संस्कार कराए।

यह भी पढ़ें : बाण गंगा में अवैध खनन के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे सरकार: हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने हरिद्वार स्थित बाण गंगा में अवैध खनन के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि दस दिन के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही कर जवाब पेश करें। मामले की अगली सुनवाई हेतु 30 जून की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी मोहम्मद साजिद ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ग्राम प्रधान व उनके पति द्वारा खनन कारोबारियों के साथ मिलकर बाण गंगा में ग्राम निहंदपुर सुठारी लक्सर हरिद्वार में अवैध रूप से खनन कार्य किया जा रहा है। जबकि खनन कारोबारियों के पास अनापत्ति प्रमाण पत्र मौजूद नहीं है ओर केंद्र सरकार की अनुमति के बिना खनन नहीं हो सकता है। साथ ही यह जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 की धारा 132 का भी उल्लंघन है। खनन में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। इससे खनन से गांव में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। वहीं सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पीठ को बताया गया कि मौके पर जिला प्रशाशन की एक कमेटी बनाकर मुआयना करने के लिए भेजी गई। जांच में वहां अवैध खनन पाया गया। इस पर राज्य सरकार ने उक्त अवैध खनन पर रोक लगा दी है।

यह भी पढ़ें : आध्यात्मिक गुरु पर नाबालिक से दुष्कर्म के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, दिये विवेचना रिपोर्ट पेश करने के आदेश

Is Dr. Pranab Pandaya really a rapistनवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने 2010 से 2014 के बीच आध्यात्मिक गुरु, गायत्री परिवार के संचालक, देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक तथा अखंड ज्योति पत्रिका के सम्पादक डा. प्रणव पांड्या पर लगे छत्तीसगढ़ की नाबालिक के साथ दुराचार के आरोपों के मामले में सुनवाई करते हुए सीआरपीसी की धारा 161 व 164 में पीड़िता के बयान दर्ज कर रिपोर्ट के साथ ही विवेचना की प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 23 जून नियत की है।
बुधवार को मामले में अधिवक्ता विवेक शुक्ला की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। जिसमें कहा है कि वर्ष 2010 से 2014 में छत्तीसगढ़ के एक गरीब माता पिता ने अपनी 14 साल की पुत्री को डॉ. प्रणव पांड्या और उनकी पत्नी के यहां काम करने के लिए छोड़ा था। आरोप है कि डा. पांड्या ने इस नाबालिक के साथ दुराचार किया। इसकी शिकायत पीड़िता ने उनकी पत्नी से की तो उसने नाबालिक को उल्टे डरा-धमकाकर उसे चुप करा दिया। बाद में पीड़िता ने पांड्या के खिलाफ दिल्ली के विवेक विहार में जीरो एफआईआर दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता की मांग है कि आरोपी का खाता सील करने के साथ ही उत्तराखंड में इनके द्वारा संचालित की जा रही चार्टर्ड यूनिवर्सिटी पर भी कार्रवाई की जाए।

यह भी पढ़ें : अध्यापकों की प्रोन्नति पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक..

-समाज कल्याण विभाग का मामला
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकल पीठ ने समाज कल्याण विभाग के जनजाति विद्यालयों में राजपत्रिक अधिकारी स्तर के अधीक्षक के पद पर एलटी ग्रेड धारक अध्यापकों की पदोन्नति पर रोक लगा दी है। साथ ही मामले में सरकार एवं प्रोन्नत किये गये अभ्यर्थियों से जवाब मांगा है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी प्रेमलता सहगल एवं प्रीति द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि विभाग ने अधीक्षक-राजपत्रित के पद पर एलटी ग्रेड धारक अध्यापकों को प्रोन्नति दी गई है। याचिकाकर्ताओंका कहना था कि पूर्व में सीटी ग्रेड को एलटी ग्रेड में विलय कर दिया था। साथ ही एलटी ग्रेड अध्यापकों को उच्च वेतनवान दिया जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि एलटी ग्रेड का ग्रेड पे 4600 है, जबकि अधीक्षक का 4200 है। अतः एलटी ग्रेड वालों का डाउनग्रेड में प्रोन्नत नहीं किया जा सकता है। याचियों का यह भी कहना है कि वह मनोवैज्ञानिक के पद कार्यरत हैं तथा नियम के अनुसार वे अधीक्षक पद पर पदोन्नति के पात्र हैं। एकलपीठ ने याचियों के तर्कों से प्रथमदृष्टया सहमत होते हुए पदोन्नति पर रोक लगा दी है।

यह भी पढ़ें : पूर्व विधायक की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 09 जून 2020। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रविकुमार मलिमथ की एकलपीठ ने काशीपुर के पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है ।
मामले के अनुसार काशीपुर के पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल के खिलाफ काशीपुर निवासी परविंदर सिंह ने बीती 27 मई 2020 को काशीपुर थाने में सिक्ख समाज के प्रति सोशल मीडिया में अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए धारा 153 ए व 295 ए के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया था। अपनी गिरफ्तारी पर रोक के लिये अग्रवाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस पर ही एकलपीठ ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने दिया वेतन, याचिका निस्तारित

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 अप्रैल 2020। उत्तराखंड सरकार ने भोजन माताओं, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व सहायिकाओं को मार्च महीने का वेतन दे दिए जाने की रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश कर दी है। इसके बाद हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने इससे संबंधित जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।
मामले के अनुसार ललिता रावत ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि अभी तक सरकार ने भोजन माताओं व आगनबाडी कार्यकर्ताआंे को मार्च महीने का बेतन नही दिया गया है। न ही इस दौरान सरकार से उनको किसी प्रकार की अन्य सहायता दी गयी है। इसके चलते वे अपने परिवार का भरण पोषण नही कर पा रही हैं। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि भोजन माताओं व आंगनबाड़ी कार्य करताओ को मार्च महीने का बेतन दे दिया गया है।

यह भी पढ़ें : सोमवार तक मिल जाएगा भोजन माताओं व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियो को मार्च महीने का वेतन

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने भोजन माताओं व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियांे को मार्च महीने का वेतन नही दिये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से 27 अप्रैल तक यह बताने को कहा है कि इनका मार्च महीने का वेतन दिया गया है या नही। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। आज सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि भोजन माताएं व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां केंद्र सरकार की योजना के तहत कार्यरत हैं। मार्च माह का वेतन केंद्र सरकार ने राज्य के खाते में डाल दिया है, जिसका भुगतान सोमवार तक भोजन माताओ और आंगगनबाडी कार्यकर्ताओ के खातों में डाल दिया जाएगा। इसकी जानकारी शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुदरम की ओर से सरकार के अधिवक्ता द्वारा खण्डपीठ को दी गयी है।
मामले के अनुसार ललिता रावत ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि अभी तक सरकार ने भोजन माताओं व आगनबाडी कार्यकत्रियों को मार्च महीने का वेतन नही दिया गया है। न ही इस दौरान सरकार से उनको किसी प्रकार की अन्य सहायता दी गयी है।

यह भी पढ़ें :लॉक डाउन के दौरान परिवार की देखरेख की दलील पर मिली भ्रष्टाचार के आरोपित को अंतरिम जमानत

-लोनिवि के प्रधान लिपिक को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर
-हाईकोर्ट में विडियो-कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनवाई में पहली अंतरिम जमानत मंजूर
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 अप्रैल 2020। हाईकोर्ट ने कोरोना महामारी के दौरान घर-परिवार की देखरेख करने के लिए कोई न होने की दलील के आधार पर रिश्वत लेने के मामले में छह माह से जेल में बंद लोक निर्माण विभाग के प्रधान लिपिक को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर कर ली है। हाईकोर्ट में विडियो-कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनवाई में पहली अंतरिम जमानत मंजूर हुई है। न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
मामले के अनुसार लोक निर्माण विभाग के प्रधान लिपिक प्रदीप पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि याचिकाकर्ता को विजिलेंस ने हल्द्वानी में अक्टूबर 2019 में पांच हजार रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इसके बाद उनको भ्रष्टाचार निवारण अदालत ने जेल भेज दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पीयूष गर्ग ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के परिवार की देखरेख करने वाला महामारी के दौर में कोई नहीं है। इस आधार पर न्यायालय ने आरोपित को अंतरिम जमानत मंजूर कर दी।
बता दें कि लोनिवि के एक पंजीकृत ठेकेदार ने हल्द्वानी स्थित विजिलेंस कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी। जिसमें कहा था कि उसने 2015 में लालकुआं तहसील भवन के निर्माण का ठेका लिया था। मगर विभाग में बजट न होने के कारण निर्माण कार्य बीच में ही रोकना पड़ा। ऐसे में निर्माण कार्य की अवधि बढ़ाने को लेकर उसने विभागीय प्रक्रिया के अनुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। इस संबंध में हुई कार्यवाही जानने के लिए जब शिकायतकर्ता ने नैनीताल के लोनिवि द्वितीय वृत्त के अधीक्षण अभियंता कार्यालय में संपर्क किया तो वहां के प्रधान सहायक प्रदीप चंद्र पांडे ने पत्रावली अधीक्षण अभियंता से मांग स्वीकृत कराने के बदले में दस हजार रुपये की डिमांड कर दी। शिकायतकर्ता ठेकेदार की ओर से कहा गया कि काम समय पर पूरा हो जाए। इसके लिए उसने तत्काल प्रधान सहायक को चार हजार रुपये दे दिए। 22 अक्टूबर को प्रधान सहायक ने पत्रावली स्वीकृत होने की सूचना दी व शेष कार्य कराने के बदले छह हजार रुपये और देने को कहा। बाद में प्रधान सहायक प्रदीप पांडे पांच हजार रुपये लेने को लेकर काम करने को तैयार हो गया। ठेकेदार की शिकायत की जांच के बाद तथ्य सही पाए जाने पर एसपी विजिलेंस अमित श्रीवास्तव के निर्देश पर निरीक्षक पीके उप्रेती के अगुवाई में एक ट्रैप टीम बनाई गई। जिसके बाद टीम ने सरस मार्केट के समीप प्रधान सहायक प्रदीप चंद्र पांडे निवासी जेके पुरम को पांच हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकडा गया। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर कर ली।

यह भी पढ़ें : वीडियो कांफ्रेंस से हुई ऐतिहासिक सुनवाई: कोरोना पर केंद्र व राज्य सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से पहली बार वर्चुअल यानी आभासी तरीके से सुनवाई करते हुए कोरोना की वैश्विक महामारी से निपटने के लिए सरकारों द्वारा की जा रही तैयारियों पर केंद्र व राज्य सरकार से 18 अप्रैल तक विस्तृत जवाब देने को कहा है। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ केंद्र व राज्य सरकार से पूछा है कि कोरोना से बचाव को लेकर मुख्य अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों के सुरक्षा उपकरणों के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार और क्या किये जाने की जरूरत है। कोरोना से बचाव के लिए राज्य में कितने सुरक्षा उपकरण उपलब्ध हैं, कितने उपकरणों की जरुरत है और कितने उपकरणों का प्रयोग अभी तक किया गया है। इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार व रामनगर में कोरोना टेस्ट लैब बनाने को लेकर क्या संभावना है। क्या इन जगहों पर भी सरकार लैब बना सकती है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चिकित्सालयों में टेली मेडिसन की सुविधाएं उपलब्ध कराने पर गाइड लाइन बनाने को भी कहा है। उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन को पत्र लिखकर कोरोना के दृष्टिगत ‘मैटर ऑफ प्रोवाइडिंग सेक्यूरिटी टू डॉक्टर्स एंड पैरा मेडिकल’ के नाम से ईमेल से जनहित याचिका दायर कर राज्य में चिकित्सकों को उचित सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ ही उनको पूरी सुरक्षा दिये जाने की मांग की थी। जिस पर आज मामले की गंभीरता को देखते हुवे सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राजधानी के फ्लाईओवर पर दुर्घटनाओं व 14 मौतों पर सरकार से जबाव माँगा 

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ ने गलत डिजाइन से बने बल्लीवाला फ्लाईओवर देहरादून पर तीन वर्ष में 12 दुर्घटनाएं होने व इन घटनाओं में 14 लोंगों की मौत मामले में दायर जनहित याचिका पर सरकार से चार हफ्ते में जबाव दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 
उल्लेखनीय है कि एक पत्रकार ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर बताया कि देहरादून के बल्लीवाला में बनाए गए फ्लाईओवर का डिजाइन है। जिसके कारण अगस्त 2016 में इस फ्लाईओवर के उदघाटन के बाद से अब तक 12 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन हादसों में 14 लोगों की मौत हो चुकी है। इस पत्र में बताया गया है कि फ्लाईओवर का डिजाइन बनाने वाले लोनिवि डोईवाला के तत्कालीन अधिशासी अभियंता महिपाल सिंह रावत अकुशल इंजीनियर हैं । याचिका में उनके इंजीनियरिंग की डिग्री की जांच कराने की मांग भी गई है। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करते हुए सरकार से जबाव मांगा है।

यह भी पढ़ें : सार्वजनिक भूमि पर सड़क किनारे बने साईं मंदिर को हटाने के लिए मिला दो माह का अतिरिक्त समय !

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 मार्च 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सरकार को ऋषिकेश में सार्वजिनक भूमि पर सड़क किनारे बने साईं मंदिर को दो माह में हटाने के आदेश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने बीती 4 मार्च 2020 को हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च को 23 मार्च तक हटाने के आदेश दिए थे। इस आदेश के बाद सांई मंदिर को हटाने के लिए एक तरह से दो माह का अतिरिक्त समय मिल गया है।
मामले के अनुसार उच्च न्यायालय के चार मार्च के आदेश पर ऋषिकेश प्रशासन की ओर से ऋषिकेश की साईं सेवा समिति को भी सड़क के किनारे निर्मित साईं मंदिर हटाने का नोटिस दिया था। नोटिस पर रोक लगाने को समिति ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की है। जिस पर आज न्यायालय ने सांई मंदिर को दो माह में हटाने के आदेश दिए। 

यह भी पढ़ें : सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बने इतने सारे मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारों को हटाने के लिए दी डेटलाइन…

सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा व चर्चो को 23 मार्च तक 2020 तक हटाने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 मार्च 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ ने सार्वजनिक स्थानो व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा व चर्चो के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए 23 मार्च तक 2020 तक हटाने के आदेश सरकार को दिए है। आज सरकार ने इनको हटाने के लिए कोर्ट से एक साल का समय मांगा परन्तु कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायलय का आदेश 29 सितम्बर 2009 का हवाला देते हुए 23 मार्च 2020 तक सभी अवैध रूप से बने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा व चर्च को हटाने के आदेश दिए है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितम्बर 2009 में एक आदेश जारी कर सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा और चर्च को हटाए परन्तु अभी तक उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नही किया। मामले के अनुसार ‘इन द मैटर ऑफ रिमूवल आफ इल्लीगल रिलिजियस स्ट्रेक्चर ऑन द पब्लिक लैंड’ के रुप में कोर्ट ने जनहित याचिका का संज्ञान लिया है। जिसमे कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक स्थानों पर अवैध रूप से बनाये गए मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारा को नही हटाया गया। सरकार की तरफ से दायर शपथपत्र में कहा गया कि कोर्ट के आदेश के बाद सभी 13 जिलों में अवैध रूप से बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व चर्च की जांच की गई जिसमें टिहरी गढ़वाल में 96, नैनीताल में 9, चंपावत में  23,चमोली में 3, बागेश्वरी में शून्य , पिथौरागढ़ में 6, पौड़ी गढ़वाल में 15, अल्मोड़ा में 5, उत्तरकाशी में 2, रुद्रप्रयाग में 7, उधम सिंह नगर में 412, हरिद्वार में 171 और देहरादून में 21 अवैध रूप से बने पाए गए है जिनमें से कुछो को प्रशाशन ने ध्वस्त कर दिया है। चर्च एक भी अवैध व सार्वजनिक भूमि पर नही पाए गए।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : कोरोना के दृष्टिगत उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई होगी

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। कोरोना के दृष्टिगत उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई होगी। इस बाबत उच्च न्यायालय के न्यायिक रजिस्ट्रार की ओर से सोमवार देर शाम नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। नोटिफिकेशन के अनुसार न्यायालय में अंतिम सुनवाई के अलावा आवश्यक मामलों की ही सुनवाई की जाएगी। संबंधित अधिवक्ता की अनुपस्थिति में मामले को निरस्त नहीं किया जाएगा। जब तक आवश्यक न हो, वादकारियों को उच्च न्यायालय परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। साथ ही अधिवक्ताओं से उम्मीद की गई है कि वे सभागार एवं कैंटीन में भीड़ बनाने से बचेंगे।

इससे पूर्व दिन में हाइकोर्ट बार एशोसिएशन ने सरकार व विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोरोना को महामारी घोषित करने का जिक्र करते हुए इससे बचने के लिए सोमवार को अपनी कार्यकारिणी की बैठक बुलाई, और बैठक में निर्णय लेकर मुख्य न्यायधीश को ज्ञापन दिया। मांग की कि जब तक कोरोना से निजात नही मिल जाती तब तक कोर्ट में अर्जेंट यानी अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई की जाय। इस पर मुख्य न्यायधीश ने देश के सर्वोच्च न्यायाधीश से दिन में वीडियो कॉन्फ्रेसिंग की और इसके बाद बार को अवगत कराया कि अधिवक्ता इसमें सहयोग करें और अत्यावश्यक मामले ही फाइल करें। यदि कोई अधिवक्ता इस दौरान कोर्ट से सुनवाई से अनुपस्थित रहता है तो उनके मामलों में एडवर्स आदेश पारित नही किये जायेंगे। बार के सचिव जयवर्धन कांडपाल ने यह जानकारी देने के साथ ही बताया कि अभी उत्तराखंड में कोरोना वायरस का केवल एक मामला ही सामने आया है, लिहाजा इससे डरने की जरूरत नही है, लेकिन जैसा कि सभी जानते है कि नैनीताल एक पर्यटन नगरी है, इसलिए यहां भी यह वायरस आ सकता है। इसके लिए सभी को मिलकर कार्य करना चाहिए। कांडपाल ने यह भी कहा है कि मुख्य न्यायाधीश से वार्ता के दौरान यह बात भी निकल कर आई है की तात्कालिक व अत्यावश्यक मामलों  को प्राथमिकता दी जाएगी जिसमें विशेषत: क्रिमिनल और सिविल के डिमोलिशन आदि के मामले प्राथमिकता पर सुने जाएंगे। इसलिए उन्होंने अधिवक्ताओं से अपेक्षा की गई है कि वे अत्यावश्यक मामले ही फाइल करें और सम्भव हो तो अनावश्यक गैदरिंग से भी बचें। बताया की उच्च न्यायालय में वादकारियों के प्रवेश पर भी रोक लग सकती है। अन्य  दिशा निर्देश कॉज लिस्ट के माध्यम से सबको प्राप्त होंगे।

यह भी पढ़ें : नगर पालिका अध्यक्ष के सर पर लटकी बर्खास्तगी की तलवार पर फौरी राहत…

-जसपुर नगरपालिका अध्यक्ष को हाईकोर्ट से मिली राहत
नवीन समाचार, देहरादून, 3 मार्च 2020। हाईकोर्ट ने जसपुर नगरपालिका अध्यक्ष का नाम मतदाता सूची से हटाने के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी जिला ऊधमसिंह नगर को आदेशित किया है कि कोई भी अंतिम आदेश पारित करने से पूर्व याचिकाकर्ता को विधिवत सुनवाई का मौका दिया जाए।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नगरपालिका परिषद जसपुर की अध्यक्ष मुमताज बेगम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वह 20 नवंबर 2018 को बहुजन समाज पार्टी से निर्वाचित हुई थी। जिसके बाद एक व्यक्ति देहरादून निवासी नावेद आलम द्वारा उनकी शिकायत राज्य निर्वाचन आयोग से की गई। जिसमें कहा था कि उनका नाम नगर पंचायत इस्लामनगर बदायूं की मतदाता सूची में भी दर्ज है। इसलिए उनका नाम जसपुर की मतदाता सूची से हटाया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने अपना नाम वहां से हटाने के लिए 24 मार्च 2018 को प्रार्थना पत्र दे दिया था। जिसके बाद उनका नाम मतदाता सूची से विलोपित कर दिया था। याचिका में कहा कि इस प्रकरण की जांच तहसीलदार जसपुर की ओर से की गई तथा जांच में यह पाया गया कि आलम ने कोई भी प्रार्थना पत्र नहीं दिया है। जिसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अन्य तहसीलदार जसपुर से जांच कराकर  रिपोर्ट मांगी तथा राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 26 फरवरी 2020 को जिला निर्वाचन अधिकारी स्थानीय निकाय ऊधमसिंह नगर को आदेश दिया कि उनका नाम जसपुर की मतदाता सूची से हटा दिया जाए। इस आदेश को याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि इसमें उनको सुनवाई का ‌मौका दिए बिना ही यह आदेश पारित किया गया है जो नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों के विपरित है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने जिला निर्वाचन अधिकारी जिला ऊधमसिंह नगर को आदेशित किया है कि कोई भी अंतिम आदेश पारित करने से पूर्व याचिकाकर्ता को विधिवत सुनवाई का मौका दिया जाए।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 28 फरवरी 2020।उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सुधांशू धूलिया और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदेश में पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले वनों को वन श्रेणी से बाहर रखे जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में याचिकाकर्ता विनोद पांडे ने स्वयं बिना कोई अधिवक्ता रखे पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से प्रदेश के महाधिवक्ता ने पैरवी की। मामले के अनुसार प्रो. अजय रावत ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने 19 फरवरी 2020 को एक नया आदेश जारी किया है। इसमें 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वनों की श्रेणी से बाहर रखा गया है। इससे पूर्व भी सरकार ने 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वन श्रेणी में नहीं माना था। इस पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई तो सरकार ने आदेश में संशोधन कर 10 हेक्टयेर को 5 हेक्टेयर कर दिया। याचिकर्ता का यह भी कहना है कि फॉरेस्ट कंजरवेशन एक्ट 1980 के तहत प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित किया गया है। इसमें वनों की श्रेणी को विभाजित किया गया है। लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिन्हें किसी भी श्रेणी के तहत नहीं रखा गया है। याचिका में मांग की गई है कि संबंधित क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि इनके दोहन और कटान पर रोक लगाई जा सके। याचिकाकर्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के अपने आदेश गोडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार में कहा है कि किसी भी वनक्षेत्र को वन श्रेणी में रखा जाएगा। लिहाजा उसका मालिक कोई भी हो सकता है। स्पष्ट किया है कि वनों का अर्थ क्षेत्रफल और घनत्व से नहीं है। जहां भी 5 प्रतिशत क्षेत्र में पेड़ पौधे हैं, उनका घनत्व 10 प्रतिशत है तो उन्हें वनों की श्रेणी में रखा गया है। सरकार के इस आदेश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कहा है कि प्रदेश सरकार वनों की परिभाषा न बदले।

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-आदेश पर लगाई रोक, दो जनवरी तक जवाब मांगा
नवीन समाचार, नैनीताल, 10 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड हाइकोर्ट ने दस हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनो को वन नही मानने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार के 21 नवम्बर 2019 के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार से 2 जनवरी 2020 तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई।

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-नैनीताल निवासी विनोद पांडे ने दायर की है याचिका, आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध एवं अपने लोगों को लाभ पहुंचाने का उपक्रम बताया
-कहा-कार्यालयी आदेश होने के कारण यह लागू नहीं किया जा सकता है
-गैर श्रेणीगत वन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 6 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार के 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनों को वन नही मानने के ताजा-गत 21 नवंबर के आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य व के केंद्र सरकार से 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई दो जनवरी की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार नैनीताल निवासी विनोद कुमार पांडे ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 21 नवम्बर 2019 को उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण अनुभाग ने एक आदेश जारी कहा है कि उत्तराखंड में 10 हेक्टेयर से कम या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वन क्षेत्र वाले वनों को उत्तराखंड में लागू राज्य एवं केंद्र की वर्तमान विधियो के अनुसार वनों की श्रेणी में नही रखा जा सकता है या उनको वन नही माना जा सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह आदेश एक कार्यालयी आदेश है, इसलिए यह लागू नही किया जा सकता है। क्योंकि न ही यह शासनादेश है, और न ही यह राज्य मंत्रिमंडल से पारित है। सरकार ने इसे अपने लोगां को फायदा देने के लिए जारी किया है। उनका यह भी कहना है कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित है, जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया हुआ है। परंतु इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको किसी भी श्रेणी में घोषित नही किया गया है। याची ने इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग की है। याची का यह भी कहना है कि सर्वोच्च ने 1996 के गौडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार मामले में अपने आदेश में कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो, उनको वनों की क्षेत्र के श्रेणी में रखा जाएगा और वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं है। सरकार का यह आदेश इस और इंगित करता है कि ऐसे क्षेत्रों का दोहन कर अपने लोगों को लाभ पहुँच सके।

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-सार्वजनिक एवं सरकारी भूमि पर बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्चों की सूची मांगी
नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव से पूछा है कि प्रदेश के सभी 13 जिलों में अभी तक कितने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बनाए गए हैं। कोर्ट ने इनकी सूची एक सप्ताह के भीतर पेश करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही ताकीद की है कि सूची पेश नहीं करने पर मुख्य सचिव चार मार्च को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होंगे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में एक आदेश जारी कर सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाए गए मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा और चर्च को हटाएं लेकिन अभी तक उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।
उल्लेखनीय है कि न्यायालय में ‘इन द मैटर ऑफ रिमूवल आफ इललीगल रिलिजियस स्ट्रेक्चर ऑन द पब्लिक लैंड’ के रूप में दायर जनहित याचिका के रूप में सुनवाई चल रही है।याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध रूप से बनाए गए मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा को नहीं हटाया गया है।

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-राज्य में सभी तरह की भूमियों के हस्तांतरण पर रोक लगाने की की गई है याचिका में  मांग

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने भूमिधरी मालिकाना हक से सम्बंधित 2012 में पारित किए गए शासनादेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए है। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी सुरभि सक्सेना ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने 2012 के बाद कई सारे शासनादेश जारी किए। याचिका में कहा कि इसमे एक शासनादेश के तहत सरकारी भूमि पर कब्जाधारियों सहित किराएदारों को काबिज पट्टे की भूमि को मालिकाना हक के तहत खेती करने और रहने के लिए था। बाद में सरकार ने न्यूनतम मूल्य पर भूमि हस्तांतरित कर दी। याचिका में कहा मालिकाना हक के तहत मिली भूमि को भूमिधरियों द्वारा कई गुना ऊचे दामों में बेचा जा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से राज्य में सभी तरह की भूमि हस्तांतरण पर रोक लगाने की मांग की थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को  जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। 

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खंडपीठ ने राशन घोटाला करने के आरोपित पांच सरकारी सस्ते गल्ले के राशन विक्रेताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि तीन माह के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही कर नई दुकानें आवंटित करें तब तक इन पांच दुकानों के राशन कार्डधारकों को दूसरी दुकानों से राशन उपलब्ध कराया जाये। इन निर्देशों के साथ ही कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी है।
मामले की सुनवाई के दौरान हरिद्वार के डीएम ने जांच रिपोर्ट पेश कर कहा कि लक्सर के आसपास 5 राशन की दुकानों में अनियमितताए पाई गई हैं। इन राशन विक्रेताओं के लाइसेंस निरस्त कर दिए हैं। कोर्ट ने राशन विक्रेताओं का भी पक्ष सुना जिसमें उन्होंने राशन कार्ड व कागजात खोने की जानकारी कोर्ट को दी थी। कोर्ट ने माना कि सभी आरोपित दुकानदारों के कागज एकसाथ खो जाना संदेहास्पद है।
मामले के अनुसार लक्सर निवासी रेनु ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि उनके क्षेत्र में सस्ते गल्ले के राशन विक्रेताओं द्वारा फर्जी राशन कार्ड बनाए गए हैं। सस्ते गल्ले की दुकानों में गरीब और जरूरतमंद लोगों को 35 किलो राशन मिलता है लेकिन राशन विक्रेता 6 किलो राशन ही देते हैं, बाकी 29 किलो राशन गबन कर कालाबाजारी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता द्वारा कहा गया की आरटीआई में सूचना मांगने पर राशन विक्रेता द्वारा रिकॉर्ड बुक उपलब्ध नहीं कराई और जानकारी दी गई कि रास्ते मे जाते समय रिकॉर्ड बुक खो गई है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने हरिद्वार जिला पंचायत सीट की खरजा कुतुबपुर सीट से 2016 में निर्वाचित हुए जिला पंचायत सदस्य के पद को रिक्त घोषित कर दुबारा से चुनाव कराने वाली जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार व जिला पंचायत सदस्य विजेंद्र को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 16 मार्च की तिथि निर्गत की है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी महेंद्र सिंह ने जनहित याचिका दायर कर कहां है कि खरजा कुतुबपुर जिला पंचायत सीट से 2016 में निर्वाचित हुए विजेंद्र सिंह का निवास स्थान अकोड़ा और राजेंद्रपुर ग्राम सभा के अंतर्गत शेखपुरी में है। 3 जनवरी 2017 को राज्य सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन से नगरी क्षेत्र लक्सर में मिला दिया गया पंचायती राज एक्ट की धारा 90 (4) के अंतर्गत नाम हट जाने के चलते जिला पंचायत सीट स्वतः ही सीज ऑफ हो जाएगी याचिकाकर्ता ने इस सीट को रिक्त घोषित करते हुए वहां पर दुबारा चुनाव कराए जाने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के प्राध्यापकों की नियुक्ति आदेश को किया निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 10 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के चार जनवरी 2019 के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश में राजकीय महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक चित्रकला के चार पदों पर नियुक्ति की गई थी।
बृहस्पतिवार को आयोग के आदेश को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति रमेश खुल्बे की संयुक्त खंडपीठ ने मधु बहुगुणा की याचिका की सुनवाई करते हुए निरस्त किया है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने शैक्षिक योग्यता, अनुभव को नजरअंदाज कर विधि विरुद्ध चयन किया है। साक्षात्कार बोर्ड के चार सदस्यों में एक सदस्य ने अपने अधीन पीएचडी कर रही अभ्यर्थी का पक्ष लेकर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया है। याचिका में तर्क दिया गया था कि सहायक प्राध्यापकों के पदों पर चयन के लिए साक्षात्कार के 100 अंक तय किए गए थे। यह निर्धारण उच्चतम न्यायालय के सर्वमान्य सिद्धांत के खिलाफ है। श्रेष्ठता के चयन की अवधारणा को नजरअंदाज करने का भी आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने लोक सेवा आयोग, चयनित अभ्यर्थियों के अधिवक्ताओं की दलील सुनने के बाद आयोग के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश से दो सामान्य एवं दो आरक्षित श्रेणी के चयनित सहायक प्राध्यापक चित्रकला के साथ आयोग एवं राज्य सरकार को करारा झटका लगा है। उल्लेखनीय है कि आयोग ने इन चार पदों पर नियुक्ति के लिए चार अगस्त 2017 को विज्ञापन जारी किया था। इसमें ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 25 अगस्त 2017 तय की गई थी। इसके बाद नियुक्ति आदेश जारी किया था।

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-नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राजस्व सचिव कोर्ट में पेश हों
नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पिछली हरीश रावत सरकार के दौरान बहुचर्चित रहे वर्ष 2015 के नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राज्य सरकार द्वारा अब तक जवाब न दिये जाने पर सख्त रुख दिखाते हुए प्रदेश के राजस्व सचिव को समस्त दस्तावेज लेकर 9 जनवरी 2020 को पेश होने के आदेश दिए हैं।

मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी बिशन सिंह व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के संस्थापक पीसी तिवाड़ी द्वारा नवंबर 2015 में उच्च न्यायालय जनहित याचिका दाखिल कर राज्य सरकार के द्वारा हिमांशु एजुकेशन सोसाइटी को बिना विधिक प्रावधानों का पालन किये रानीखेत तहसील के अंतर्गत ग्राम नैनीसार में 353 नाली भूमि 22 सितंबर 2015 को आवंटित किए जाने वाले आदेश को चुनौती दी गयी थी। कहा था कि सरकार ने अपने चहेतों को करोड़ो की भूमि कौड़ी के भाव आवंटित की है जो गैरकानूनी है लिहाजा आवंटन को रद्द किया जाना चाहिए। मामले में आज तक राज्य सरकार के द्वारा मामले में जबाब नही दाखिल किए जाने पर खंडपीठ ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को मात्र एक सप्ताह का समय देते हुए आदेश किया है कि यदि तय समय सीमा में जबाब दाखिल नही किया गया तो अगली सुनवाई की तिथिा 9 जनवरी 2020 को सचिव राजस्व हाई कोर्ट की खंडपीठ के समक्ष समस्त दस्तावेजों सहित पेश हों।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशू धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने हरिद्वार में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी की स्थापना के मामले में भारतीय पुरातत्व विभाग के निदेशक सहित केंद्र, उत्तराखंड और यूपी सरकार को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।
मामले के अनुसार उत्तराखंड सिख फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष गुरुदेव सिंह सहोता ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव के हरिद्वार में पहली बार आने पर तत्कालीन लंढौरा नरेश ने अपनी हवेली में ज्ञान गोदड़ी का आयोजन किया था। गुरु नानक के आगमन पर हरकी पैड़ी में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी के लिए जगह आवंटित की थी। 1976 तक गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी इसी स्थान पर थी। उस समय तत्कालीन सरकार ने हरकी पैड़ी के सौंदर्यीकरण के दौरान ज्ञान गोदड़ी को पुनः उसी स्थान पर स्थापित करने का आश्वासन देते हुए वहां से हटा दिया था। लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर व सिखों के पवित्र चिह्न को अभी तक वहां स्थापित नहीं किया जा सका। 2001 में मामले की शिकायत राष्ट्रीय अल्प संख्यक आयोग से की गई। आयोग के निर्देश पर हरिद्वार के तत्कालीन डीएम ने गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी की स्थापना के लिए जगह का चयन कर शासन को भेजा। जांच में यह स्थान यूपी सरकार के अधिकार क्षेत्र में पाया गया। इस संदर्भ में आयोग से दोबारा शिकायत करने पर आयोग ने दोनों सरकारों के मुख्य सचिवों को गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी के लिए भूमि आवंटित करने को कहा, लेकिन प्रकरण में अभी कार्रवाई नहीं हो पाई है। मामला अभी लंबित है। याचिकाकर्ता ने इस ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने को इसे करतारपुर कॉरिडोर की तर्ज पर विकसित करने की मांग की है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 12 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने अल्मोड़ा जनपद के जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक को न्यायालय के आदेशों का पालन न करने पर 18 दिसम्बर को न्यायालय में पेश होने के आदेश दिए हैं।

मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी 87 वर्षीय कमला देवी ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि फरवरी 2018 में उच्च न्यायालय ने जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक अल्मोड़ा को आदेश दिया था कि सहायक अध्यापक पद से 1985 में सेवानिवृत्त एवं 2010 में दिवंगत हुए उनके पति स्वर्गीय घनश्याम नेगी की बढ़ी हुई पेंशन का भुगतान वास्तविक तिथि से 9 फीसदी ब्याज सहित करें। उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग ने याची को बढ़ी हुई पेंशन का भुगतान तो किया लेकिन ब्याज का भुगतान नहीं किया। इसके खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई थी।

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-याचिका में लगाया गया है उच्च न्यायालय के आदेशों के गलत तरीके से प्रयोग का आरोप
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शुधांशू धुलिया की एकलपीठ ने ऊधमसिंह नगर के डीएम नीरज खैरवाल, सितारगंज के एसडीएम निर्मल बिष्ट व अधिशाषी अभियंता केके तिलारा को न्यायालय के आदेश का गलत प्रयोग करने पर अवमानना का नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने उनसे सुनवाई की अगली तिथि 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार सितारगंज निवासी अधिवक्ता दयानंद व 2 अन्य ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि पूर्व में न्यायालय ने रुद्रपुर के रम्पुरा ग्राम सभा के प्रधान मनमोहन सिंह की जनहित याचिका में राज्य में सार्वजनिक स्थानों, गलियो व सड़कों में हुए अतिक्रमण को चिन्हित करने के लिए जिला स्तर पर कमेटियां गठित करने के निर्देश सभी जिला अधिकारियों को दिए थे। इन कमेटियो में राजस्व विभाग के अधिकारियों को भी शामिल करने तथा तीन माह के भीतर पूरे प्रदेश में हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा गया था। साथ ही याचिकाकर्ता को निर्देश दिए थे कि वह सभी जिला अधिकारियो को इसमें पक्षकार बनाए। परंतु ऊधमसिंह नगर प्रशासन द्वारा न्यायालय के आदेश की अनदेखी करके सितारगंज में रोड का चौड़ीकरण के नाम पर आवासीय व व्यवसायिक दुकानों को तोडा जा रहा है और इसका विरोध करने पर उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया जा रहा है। जबकि न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा है कि प्रदेश में कहीं भी अतिक्रमण हुआ है तो इसकी जांच करके रिपोर्ट न्यायालय में पेश की जाए। परंतु प्रशाशन के द्वारा इस आदेश का गलत प्रयोग किया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक कुलपति की नियुक्ति की निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने दून विश्वविद्यालय के कुलपति डा. सीएस नौटियाल की नियुक्ति को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने सरकार को जल्द नई सर्च कमेटी गठित कर नियमों के तहत नए कुलपति की नियुक्ति करने के आदेश भी दिए हैं। मामले की सुनवाई में हुई।

उल्लेखनीय है कि देहरादून निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक यज्ञ दत्त शर्मा ने इस मामले में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि देहरादून विवि के कुलपति डा. नौटियाल ने अपनी नियुक्ति के लिए तैयार किए गए बायोडाटा में गलत तथ्य दिए हैं। जबकि उनके पास शिक्षण का 10 वर्ष का अनुभव ही नहीं है। सीएसआईआर ने इस मामले में छूट के कोई आदेश भी पारित नहीं किए हैं। इसलिए वे कुलपति पद के योग्य नहीं हैं, और उनकी नियुक्ति यूजीसी और सीएसआईआर के नियमों के विरुद्ध है। बावजूद उन्हें तत्कालीन शिक्षा सचिव डा. रणवीर सिंह की पहल पर नियम विरुद्ध कुलपति के पद पर नियुक्ति मिली है। याचिका में कहा है कि कुलपति के चयन के लिए बनाई गई कमेटी भी नियमानुसार नहीं बनी है।

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-हरिद्वार डीएम को 9 दिसंबर तक जांच रिपोर्ट पेश करने के आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 18 नवंबर 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने रुड़की ग्राम पंचायत में विकास कार्यों में हुए घोटाले के मामले में सुनवाई करते हुए ग्राम प्रधान से 3 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने को कहा है साथ ही कोर्ट ने हरिद्वार के डीएम को मामले की निष्पक्ष जांच कर 9 दिसम्बर तक रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए है।
मामले के अनुसार रुड़की के सुल्तानपुर निवासी प्रमोद कुमार ने जनहित याचिका दायर कर रुड़की के साबतवाली तहसील की ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान द्वारा हैंडपम्प लगाने, स्ट्रीट लाइट, नालों की सफाई एवं खुदाई सहित अन्य विकास कार्यों के लिए जारी 30 लाख का गबन करने का आरोप लगाया है। साथ ही कहा है कि ग्राम प्रधान द्वारा जो विकास कार्य कराए गए है वह भी निम्न स्तर के हैं। लिहाजा याचिकाकर्ता ने सरकार द्वारा जारी वित्तीय बजट में हुए घोटाले की जांच कराने की मांग की है।

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-इस कारण कई विभागों के कर्मचारियों का वेतन लटका, हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव से मांगा जवाब
नवीन समाचार, नैनीताल, 16 नवंबर 2019। उत्तराखंड राज्य में वित्तीय लेनदेन डिजिटल माध्यम से करने के लिये राज्य सरकार द्वारा अधिकृत की गई कम्पनी द्वारा वित्तीय अनियमितता किये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव से तीन हफ्ते के भीतर व्यक्तिगत शपथ पत्र पेश करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खण्डपीठ में हुई ।
मामले के अनुसार देहरादून की आरटीआई कार्यकर्ता सीमा भट्ट ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के निर्देशों के क्रम में राज्य सरकार ने शुरू में डिजिटल लेनदेन एनआईसी के माध्यम से किया। लेकिन बाद में इस कार्य हेतु टेंडर निकाला गया और जिस कम्पनी के नाम टेंडर हुआ वह ब्लैक लिस्ट हो गई। किंतु उसके बाद पुनः टेन्डर व अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बजाय सरकार ने एक अन्य कम्पनी को यह काम सौंप दिया। इस कम्पनी को पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों के लेनदेन की इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग करने का ज्ञान नहीं था। जिस कारण कम्पनी द्वारा बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार को एक व्यक्ति को 14 हजार का भुगतान करना था जिसे इस कम्पनी ने एक करोड़ का भुगतान कर दिया । इसी तरह कई विभागों के कर्मचारियों के खाते में एम माह के बजाय 3 माह का वेतन चले गया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 14 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद यूपीसीएल यानी उत्तराखंड पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल अपने विभागीय कर्मचारियों व अधिकारियों को दी जाने वाली बिजली को सीमित करने जा रहा है। अब विद्युत विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों को फ्री में बिजली नहीं देगा। यूपीसीएल ने बृहस्पतिवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में शपथ पत्र के साथ यह जानकारी दी है। आगे उच्च न्यायालय ने सचिव ऊर्जा, पिटकुल व यूजेवीएनएल के अधिकारियों को बिजली के सभी ब्यौरे 25 नवम्बर तक पेश करने के आदेश दिए है।
उल्लेखनीय है कि मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में देहरादून के आरटीआई क्लब की जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। इसी मामले में बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट ने राज्य के ऊर्जा निगमों के अधिकारी और कर्मचारियों को सस्ती बिजली देने व आम जनता के लिए बिजली की दरों को बढ़ाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट में उत्तराखंड पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल ने शपथपत्र पेश कर कहा कि विभागीय कर्मचारियों व अधिकारियों को दी जाने वाली बिजली को सीमित किया जा रहा है और उनको अब फ्री में बिजली नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने पॉवर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड पिटकुल व यूपीसीएल के कार्मिकों को दी जा रही
वहीं याचिका में कहा गया है कि सरकार विद्युत विभाग में तैनात अधिकारियों से एक महीने का बिल मात्र 400 से 500 रुपए एवं अन्य कर्मचारियों से 100 रुपए ले रही है जबकि इनका बिल लाखों में आता है जिसका बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि तमाम अधिकारियों के घर बिजली के मीटर तक नहीं लगे हैं, जो लगे भी है, वह खराब स्थिति में हैं। उदारहण के तौर पर जनरल मैनेजर का 25 माह का बिजली का बिल 4 लाख 20 हजार आया था और उसके बिजली के मीटर की रीडिंग 2005 से 2016 तक नही ली गयी । कॉर्पोरेशन ने वर्तमान कर्मचारियों के अलावा रिटायर व उनके आश्रितों को भी बिजली मुफ्त में दी है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश घोषित है लेकिन यहां हिमांचल से महंगी बिजली है जबकि वहाँ बिजली का उत्पादन तक नही होता है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 13 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश के बिनसर वन्यजीव अभ्यारण अल्मोड़ा में सरकार की अनुमति के बिना चलाये जा रहे व निर्माणाधीन होटलों, रिजॉर्ट व रेस्टोरेंटो के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सिम्बा कैफे के मालिक सुरेंद्र सिंह मालिक, किरायेदार मुकेश भोज, हर्षवर्धन मेहरा व कमल सनवाल, कमल सनवाल-रेनबो रेस्टोरेंट, बिनसर फॉरेस्ट रिट्रीट के मालिक कुणाल सनवाल व प्रशांत सागर, राजेश ओझा, आदर्श पाम रिट्रीट के किरायेदार जी प्रीतम रेड्डी, मैरी बडन स्टेट के मालिक-साझेदार अश्विनी चोपड़ा व सीमा चोपड़ा, द ट्रीट आफ लाइफ ग्रांड ओक होटल की मालिक सिंधु गंगोला व प्रदीप गंगोला, खली स्टेट के मालिक हिमांशु पांडे, और नंदा देवी स्टेट के मालिक जोर्डन मिश्रा सहित 13 लोगों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी गौरव नैथानी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कुछ लोगो ने सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर प्रतिबंधित क्षेत्र विनसर वन्यजीव अभ्यारण अल्मोड़ा में अतिक्रमण कर होटल, रिसोर्ट व रेस्टोरेंट बना लिये है और कुछ बन रहे है इस पर रोक लगाई जाए। पूर्व में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से इनकी लिस्ट कोर्ट में देने को कहा था परंतु याचिकाकर्ता ने इनकी जानकारी नही होने पर कोर्ट ने सरकार से इनकी लिस्ट पेश करने को कहा था।

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Ramsey Hospital, Nainital

नवीन समाचार, नैनीताल, 8 नवंबर 2019। नैनीताल के मौजूदा जीबी पंत अस्पताल (ब्रिटिश कालीन अस्पताल रैमजे अस्पताल) के अस्तित्व को बचाने को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई है। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 नवम्बर को होगी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खण्डपीठ में हुई।
मामले के अनुसार तल्लीताल निवासी संतोष तिवारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि सरकार नैनीताल के ऐतिहासिक रैमजे अस्पताल के अस्तित्व को समाप्त करने जा रही है। इस अस्पताल के अधिकांश हिस्से में मुख्य चिकित्साधिकारी का कार्यालय बना दिया गया है। इधर सरकार ने अस्पताल में मरीजों की संख्या लगातार घटने पर इस अस्पताल को डिस्पेंसरी सेंटर बनाने का निर्णय लिया है। जबकि अस्पताल में मरीजों के घटने का कारण वहां डॉक्टरों का अभाव है। इस संदर्भ मे विभागीय अधिकारियों से पत्राचार किया गया। लेकिन उनकी ओर से इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं की गई। याचिकाकर्ता के अनुसार यह अस्पताल 1892 से संचालित है। जिसका हाल के वर्षों तक काफी नाम था। लेकिन सरकार ने इस अस्पताल को जानबूझकर बंदी की हालत में ला दिया है। हाईकोर्ट ने सरकार से इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

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-हरिद्वार के गांव में भ्रष्टाचार पर सरकार से जवाब तलब
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने हरिद्वार के रामबड़ेरी गांव में प्रधान और उनके पति द्वारा सरकार से आवंटित पैसों के खर्च में हुए भ्रष्टाचार के मामले में सरकार से सरकार से 15 नवंबर तक जवाब देने को कहा है। साथ ही पूछा है पुलिस द्वारा मामले कि जांच पर क्या कदम उठाए गए है। मामले की अगली सुनवाई 15 नवंबर को होगी।
मामले में मंगी राम सैनी ने उच्च न्यायालयमें जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हरिद्वार स्थित रामबड़ेरी राजपूताना के अंतर्गत 3 गांवों की प्रधान, उनके पति और गांव के पंचायत सदस्य द्वारा सरकार से आवंटित पैसों के खर्च में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार सामने आया है। इस संबंध में उन्होंने 2018 में प्रधान और प्रधान पति के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुआ। पता करने पर जानकारी मिली कि फाइल स्पेशल इन्वेस्टीगेशन स्कवॉड के दफ्तर में पड़ी है। उसके बाद जिलाधिकारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रत्यावेदन दिया और बताया कि हर व्यक्ति इससे प्रभावित हैं। जिलाधिकारी हरिद्वार ने एसएसपी हरिद्वार से किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मामले की जांच करने के लिए कहा। इसके बाद ममता बोरा ने सारे अभिलेखों का परीक्षण कर पाया कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनने वाले शौचालयों में भारी अनियमितताए की गईं और गाँव के कब्रिस्तान की दीवार की मरम्मत में भी निम्न स्तर की सामग्री लगायी गयी है। इसके साथ ग्राम प्रधान द्वारा चोरी से गांव की बिजली की लाइन से बिना अनुमति के कनेक्शन लिया गया।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 5 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायाल ने हत्या के एक मामले में सितारगंज जेल में लगभग 16 वर्षों से आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीन कैदियों को अच्छा चाल-चलन होने पर उनकी सजा को माफ किए जाने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
मामले के अनुसार हत्या के मामले में लगभग 16 वर्ष से अधिक समय से सितारगंज जेल में बंद तीन आरोपी मोहम्मद उमर, सेवा सिंह व अमित राणा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उन्हें हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें 16 वर्ष से ज्यादा समय जेल में हो गए है और उनका चाल-चलन अच्छा है, इसलिए उनको जेल से मुक्त किया जाए। याचिका में कहा गया है कि सरकार की ओर से एक नीति भी बनाई जाए कि जिसमें उम्रकैद की सजा में 14 वर्षों से अधिक का समय जेल में बिताने वाले अच्छे चाल-चलन वाले कैदियों को जेल से रिलीज किया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि सीआरपीसी की धारा 432 और 433 में प्रावधान है कि यदि कैदियों का चाल-चलन अच्छा होगा तो उनके सजा को माफ कर दिया जाएगा। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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याची गजेंद्र सिंह मेहरा

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 सितंबर 2019। नैनीताल जनपद के भीमताल विकास खंड के मंगोली-गहलना क्षेत्र पंचायत सीट के चुनाव का मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय के दर पर पहुच गया है। इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन कराने गए एक प्रत्याशी गजेंद्र सिंह महरा की याचिका को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। मामले की सुनवाई शुक्रवार को न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में दो नंबर पर सुनवाई के लिए लिस्ट भी हो गई है। बताया जा रहा है कि भीमताल ब्लॉक प्रमुख पद के एक प्रमुख प्रत्याशी इसी सीट से प्रत्याशी हैं।

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याची गजेंद्र सिंह मेहरा का कहना है कि वह मंगोली-गहलना क्षेत्र पंचायत सीट से नामांकन कराने के लिए आखिरी तिथि 24 सितंबर की निर्धारित समय सीमा के भीतर अपराह्न चार बजे से पहले निर्वाचन अधिकारी के कक्ष में अपना नामांकन कराने गए थे। उन्हें कक्ष के भीतर बुलाया भी गया। वहां उनसे निर्वाचन अधिकारी ने उनके नामांकन के प्रपत्र लिये और उनकी जांच की। इस दौरान भी याचिकाकर्ता कक्ष के भीतर था। लेकिन इसी बीच निर्वाचन अधिकारी ने चालाकी से याची को कक्ष से बाहर भेज दिया और दूसरे दरवाजे से बताया गया कि उनके नामांकन पर कार्रवाई चल रही है। बाद में उन्हें दुबारा कक्ष में बुलाया गया और उनसे नामांकन प्रपत्र फिर से लिये गये और उन पर ‘नॉट अलाउड 4.35’ यानी नामांकन प्रपत्र 4.35 बजे पहुंचने के लिए नामांकन पत्र अस्वीकार होना लिख दिया गया। उल्लेखनीय है कि याची भी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता है। उनका कहना है कि इस बाबत उनके पास वीडियो फुटेज भी मौजूद हैं कि निर्वाचन अधिकारी ने ही समय खर्च कर उनके नामांकन पत्र जमा करने के समय को निर्धारित 4 बजे से आगे बढ़ाया।

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-आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली के प्रबंधन को नोटिस
नवीन समाचार, नैनीताल, 21 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट के अशासकीय विद्यालय आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली के प्रबंधन को याचिकाकर्ता को सदस्यता देने से इंकार करने के आदेश पर रोक लगाते हुए अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता जयप्रकाश कांडपाल ने आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली में प्रबंध समिति की साधारण सभा के सदस्य बनने हेतु आवेदन किया, जिसे अस्वीकार कर दिया। इस पर कांडपाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि उन्होंने विद्यालय प्रबन्ध समिति की साधारण सभा का सदस्य बनने हेतु आवेदन किया था और नियमानुसार विद्यालय में बैंक ड्राफ्ट भी जमा कराया था, जिसे प्रबन्ध समिति की बैठक में रखे बगैर एवं एजुकेशन एक्ट 2000 के तहत प्रक्रिया पूरी किये बिना याचिकाकर्ता को अवैधानिक रूप से लौटा दिया गया। इस पर न्यायालय ने याची के आवेदन को अस्वीकार करने वाले मैनेजर के पत्र को स्थगित करते हुए पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीसरे बच्चे पर मिलने वाले लाभों पर दिया बड़ा व दूरगामी महत्व का निर्णय

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 सितंबर 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए एकलपीठ के तीसरे बच्चे के लिये भी महिलाओं को मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत अवकाश देने के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत के आदेश के बाद अब राज्य की सेवाओं में कार्यरत महिलाओं को तीसरा बच्चा होने पर मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत अवकाश नहीं मिलेगा। मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी नर्स उर्मिला मसीह को तीसरी संतान पर मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत लाभ नहीं दिया गया तो उसने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में नियमों का हवाला देते हुए नर्स ने कहा कि सरकार का नियम संविधान के अनुच्छेद-42 के मूल-153 तथा मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा-27 का उल्लंघन करता है। वर्ष 2018 में एकलपीठ ने इस अधिनियम को अवैधानिक घोषित कर दिया था। एकलपीठ के इस आदेश को सरकार ने विशेष अपील दायर कर चुनौती दी। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में सरकार की ओर से सीएससी परेश त्रिपाठी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-42 भाग चार अर्थात नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है, जिसको लागू करने के लिए याचिका दायर नहीं की जा सकती। मातृत्व लाभ अधिनियम राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, जबकि निजी क्षेत्र तथा सरकार की कंपनियों में कार्यरत महिलाओं पर लागू होता है। खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद सरकार की विशेष अपील स्वीकार करते हुए एकलपीठ का आदेश निरस्त कर दिया।

पूर्व समाचार : अब तीसरे बच्चे पर भी मिलेगा मातृत्व अवकाश

-हाईकोर्ट ने सिर्फ दो बच्चों पर दिए जा रहे मातृत्व अवकाश का नियम किया खारिजनैनीताल: हाईकोर्ट ने दो से अधिक बच्चों के पैदा होने पर मातृत्व लाभ नहीं देने संबंधी प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद अब तीसरे बच्चे पर भी महिला को मातृत्व अवकाश दिया जाएगा। इस फैसले से राज्य की हजारों महिला कार्मिक लाभान्वित होंगी। सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) हल्द्वानी में कार्यरत स्टाफ नर्स उर्मिला मैसी ने 2015 में पांच माह के लिए मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया तो विभाग ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति देने का नियम नहीं है। इसके बाद उर्मिला ने याचिका के माध्यम से उत्तर प्रदेश मौलिक नियम-153 को चुनौती दी। इसी नियम को उत्तराखंड सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है। इस नियम के तहत दो से अधिक बच्चों वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित किया गया है। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने शुक्रवार को मामले को सुनने के बाद तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नियम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा-27 के प्रावधान के साथ ही संविधान के अनुच्छेद-42 की भावना के विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि जब कोई प्रावधान इस कानून के प्रावधानों से मेल नहीं खाता तो उस स्थिति में अधिनियम के प्रावधानों को तरजीह दी जाएगी। साथ ही कहा कि सरकार के प्रावधान अनुच्छेद-42 की भावना के खिलाफ नहीं होने चाहिए। कोर्ट ने रुकसाना बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने इसी तरह पंजाब सिविल सेवा नियम के एक नियम को खारिज कर दिया था, क्योंकि तीसरे बच्चे के होने पर मातृत्व लाभ देने से मना किया गया था। यहां बता दें कि राज्य में करीब डेढ़ लाख सरकारी कार्मिकों में 75 हजार के करीब महिलाएं हैं। विशेषकर स्वास्थ्य विभाग, बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग में महिला कार्मिक अधिक हैं। यह भी उल्लेख किया गया है कि मातृत्व अवकाश रेगुलर कर्मी के साथ ही संविदा, आउट सोर्स व दैनिक रूप से कार्यरत महिला को देय है।

यह भी पढ़ें : भाजपा विधायक कर्णवाल को जाति प्रमाण पत्र का मामला पूरी तरह से निस्तारित..

वीन समाचार, नैनीताल, 12 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्र के मामले में प्रस्तुत उनके सभी प्रमाण पत्रों में किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं होने की बात स्वीकार कर ली है और कह दिया है कि उनके सभी प्रमाण पत्र वैध हैं। यानी ही उनके जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देने वाली याचिका को निस्तारित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में न्यायालय ने उनके जाति प्रमाण पत्रों की जांच कराने के लिए एक कमेटी गठित कर उसकी जाँच कराने के आदेश राज्य सरकार को दिए थे। जिस पर आज सरकार ने जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश की।

यह भी पढ़ें : भाजपा विधायक का दावा-जाति प्रमाण पत्र मामले में उन्हे क्लीन चिट

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 सितंबर 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्रों को चुनौती देने वाली हरिद्वार के विपिन तोमर की जनहित याचिका में सुनवाई हुई और सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखी है। पूर्व में कोर्ट ने उनके जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए एक कमेटी गठित कर जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था। सरकार द्वारा कोर्ट को अवगत कराया गया कि उनके जाति से सम्बंधित प्रमाण पत्रों की जाँच पूरी हो चुकी है। इस सम्बन्ध में आज देशराज कर्णवाल ने प्रेस वार्ता में कहा कि शासन द्वारा इस संबंध में अपने आदेश दिनांकित 22 अगस्त 2019 के जरिए शासन स्तर पर अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जाति प्रमाण पत्र स्क्रुटनी कमेटी का गठन किया गया जिसने इस प्रकरण में गहनता से जांच की और सभी आरोपों पर दोनों पक्षों को विस्तार पूर्वक सुना गया।
शासन स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी की 7 सितंबर 2019 को हुई बैठक में इस प्रकरण में धैर्य पूर्वक दोनों पक्षों को विस्तार से सुना। शिकायतकर्ताओं द्वारा मुख्यतः यह आरोप लगाया गया कि कर्णवाल उत्तराखंड के मूल निवासी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के मूल निवासी हैं। वर्ष 2005 में उनको जारी जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने की मांग की गई। इन आरोपों के प्रत्युत्तर में श्री देशराज कर्णवाल के अधिवक्ता द्वारा स्क्रूटनी कमेटी को अवगत कराया गया कि श्री देशराज कर्णवाल वर्ष 1984 से ही अपनी माता व भाई के साथ वर्तमान हरिद्वार जिले में निवास करने लगे थे तथा तब से ही वह लगातार हरिद्वार जिले में रह रहे हैं, और अनेक वर्षों से सामाजिक व राजनीतिक रूप से हरिद्वार जिले में ही सक्रिय हैं। अपने तर्कों के समर्थन में उनके द्वारा वर्ष 1984 में कर्णवाल की माता के द्वारा किया गया किरायानामा प्रस्तुत किया गया तथा अन्य साक्ष्य इस संबंध में प्रस्तुत किए गए जिनमें मुख्यतः वर्ष 1997 में जिला सेवायोजन कार्यालय हरिद्वार में कराए गए पंजीकरण के साक्ष्य सम्मिलित हैं जिसमें स्पष्ट रूप से कर्णवाल का नाम अनुसूचित जाति के अभ्यर्थी के रूप में दर्ज है। जिला सेवायोजन कार्यालय द्वारा यह भी अवगत कराया गया है कि उनके कार्यालय में केवल उसी अभ्यार्थी का नाम पंजीकृत किया जा सकता है जो हरिद्वार जिले का स्थाई निवासी हो जिससे यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 1997 में भी कर्णवाल हरिद्वार जिले के स्थाई निवासी थे। इसके साथ ही कर्णवाल के अधिवक्ता द्वारा कमेटी को बताया गया कि प्रस्तुत प्रकरण पहले भी राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्णित किया जा चुका है जिसमें राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्र के संबंध में की गई शिकायतों को निराधार बलहीन पाया था । इन तथ्यों के साथ-साथ अन्य अनेक तथ्य भी कमेटी के सामने रखे गए जिनसे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि यह शिकायतें पूरी तरह निराधार हैं।
दिनांक 7 सितंबर 2019 को दोनों पक्षों को विस्तार पूर्वक सुनने के बाद स्कूटनी कमेटी द्वारा अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया गया था और कल दिनांक 9 सितंबर 2019 को शासन स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी द्वारा अपना निर्णय घोषित किया गया जिसमें कमेटी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि श्री देशराज कर्णवाल को वर्ष 2005 में जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध है, तथा उनके द्वारा इस जाति प्रमाण पत्र को प्राप्त करने में किसी तरह का कोई आपराधिक कृत्य नहीं किया गया है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड
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