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हरिद्वार के जिपं अध्यक्ष को अयोग्य घोषित करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर हुई सुनवाई

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार के जिला पंचायत अध्यक्ष को अयोग्य घोषित करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की, और पिछली तिथि के आदेश के बावजूद जिला अधिकारी हरिद्वार द्वारा जवाब पेश नहीं करने पर नाराजगी जताते हुए अगली सुनवाई के लिए अगले सोमवार की तिथि नियत की। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ में हुई।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी अरविंद कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि जिला पंचायत अध्यक्ष सुभाष वर्मा का नाम आसफ नगर गांव की मतदाता सूची में दर्ज है। यह गांव नगर निगम हरिद्वार में शामिल किया जा चुका है। इसलिए उनकी अध्यक्षता निरस्त की जाये। हाईकोर्ट ने सरकार के हरिद्वार नगर निगम के विस्तार करने से संबंधित शासनादेश को पूर्व में ही निरस्त कर दिया था परंतु राज्य सरकार ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दायर कर चुनौती दी थी और सर्वोच्च न्यायलय ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने रामनगर-काशीपुर राष्ट्रीय राजमार्ग में सरकारी भूमि पर कब्जा करके बनाए जा रहे होटल के निर्माण पर अपने पूर्व के स्थगनादेश को बरकरार रखा है। इस मामले में पूर्व में उच्च न्यायालय ने होटल मालिक को उनके द्वारा किये जा रहे होटल निर्माण पर कोई राहत न देते हुए नैनीताल के जिला अधिकरी व नगर पालिका रामनगर को निर्देश दिए थे कि निर्माण कार्य पर रोक लगने के बाद भी अगर कोई निर्माण कार्य किया जाता है तो यह जिमेदारी जिला अधिकारी व नगर पालिका प्रशासन की होगी। इस आदेश के खिलाफ होटल मालिक ने पुनः उच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया था, जिसे पीठ ने खारिज कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में मामले के अनुसार रामनगर निवासी कुलदीप माहेश्वरी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि रामनगर काशीपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सरकारी भूमि पर कब्जा करके होटल का निर्माण किया जा रहा है। इस निर्माण पर जिला विकास प्राधिकरण ने पहले हो रोक लगा रखी थी परंतु प्राधिकरण कीे रोक को दरकिनार करते हुए होटल स्वामी द्वारा फिर से निर्माण कार्य किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अवैध रूप से बन रहे होटल के निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाये।

यह भी पढ़ें : स्टोन क्रेशरों के प्रदूषण पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 सितंबर 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से राज्य में स्थापित सभी स्टोन क्रेशरों के बारे में व्यापक जानकारी देने को कहा है। न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि प्रदेश में कितने स्टोन क्रेशर हैं और इनमें से कितने अवैध हैं। इस मामले में आगामी 8 अक्टूबर को सुनवाई होगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने यह निर्देश बाजपुर निवासी त्रिलोक चंद्र की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये हैं। याचिकाकर्ता की याचिका दायर कर कहा था कि प्रदेश में अधिकांश स्टोन क्रेशर मानकों के खिलाफ चल रहे हैं और इनसे भारी प्रदूषण हो रहा है। ऐसे स्टोन क्रेशरों को बंद किया जाये। इससे अवैध खनन पर भी रोक लगेगी। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी मांग की गयी थी कि प्रदेश में एक स्टोन क्रेशर जोन बनाया जाये और सभी स्टोन क्रेशर एक ही जोन में स्थापित किये जायें। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एसआरएस गिल ने बताया कि अदालत ने जनहित याचिका का दायरा व्यापक करते हुए सरकार व पीसीबी को निर्देश दिया है कि वह बताये कि प्रदेश के कितने स्टोन क्रेशर उपलब्ध हैं तथा वे किस नीति के तहत स्थापित हुए हैं। अदालत ने यह भी पूछा है कि कितने स्टोन क्रेशर मानकों का पालन करते हैं और कितने अवैध ढंग से संचालित हो रहे हैं। पीठ ने रजिस्ट्री को भी निर्देशित किया है कि स्टोन क्रेशरों से संबंधित सभी याचिकाओं को एक साथ सूचीबद्ध कर अगले तिथि को सुनवाई के लिये पेश किया जाए। इस मामलेे में आठ अक्टूबर को सुनवाई होगी।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 18 सितंबर 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट ने सार्वजनिक स्थानो व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारे व चर्चो को चिन्हित कर तीन सप्ताह के भीतर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर की तिथि नियत की है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में राज्य सरकार ने पूर्व में ही एक साल का समय मांगा था। परन्तु कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायलय का आदेश 29 सितम्बर 2009 का हवाला देते हुए 23 मार्च 2020 तक सभी अवैध रूप से बने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा व चर्च को हटाने के आदेश दिए थे। परन्तु अभी तक उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नही किया। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई।
मामले के अनुसार ‘इन द मैटर ऑफ रिमूवल आफ इल्लीगल रिलिजियस स्ट्रेक्चर ऑन द पब्लिक लैंड’ के रुप में कोर्ट ने जनहित याचिका का संज्ञान लिया है। जिसमे कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से बनाये गए मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारा को अभी तक नही हटाया गया है।

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सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा व चर्चो को 23 मार्च तक 2020 तक हटाने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 मार्च 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ ने सार्वजनिक स्थानो व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा व चर्चो के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए 23 मार्च तक 2020 तक हटाने के आदेश सरकार को दिए है। आज सरकार ने इनको हटाने के लिए कोर्ट से एक साल का समय मांगा परन्तु कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायलय का आदेश 29 सितम्बर 2009 का हवाला देते हुए 23 मार्च 2020 तक सभी अवैध रूप से बने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा व चर्च को हटाने के आदेश दिए है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितम्बर 2009 में एक आदेश जारी कर सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा और चर्च को हटाए परन्तु अभी तक उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नही किया। मामले के अनुसार ‘इन द मैटर ऑफ रिमूवल आफ इल्लीगल रिलिजियस स्ट्रेक्चर ऑन द पब्लिक लैंड’ के रुप में कोर्ट ने जनहित याचिका का संज्ञान लिया है। जिसमे कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक स्थानों पर अवैध रूप से बनाये गए मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारा को नही हटाया गया। सरकार की तरफ से दायर शपथपत्र में कहा गया कि कोर्ट के आदेश के बाद सभी 13 जिलों में अवैध रूप से बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व चर्च की जांच की गई जिसमें टिहरी गढ़वाल में 96, नैनीताल में 9, चंपावत में  23,चमोली में 3, बागेश्वरी में शून्य , पिथौरागढ़ में 6, पौड़ी गढ़वाल में 15, अल्मोड़ा में 5, उत्तरकाशी में 2, रुद्रप्रयाग में 7, उधम सिंह नगर में 412, हरिद्वार में 171 और देहरादून में 21 अवैध रूप से बने पाए गए है जिनमें से कुछो को प्रशाशन ने ध्वस्त कर दिया है। चर्च एक भी अवैध व सार्वजनिक भूमि पर नही पाए गए।

यह भी पढ़ें : आरोप लगाने वाली महिला अपनी गिरफ्तारी व FIR को निरस्त करने व विधायक के डीएनए टेस्ट के आदेश पारित करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट पहुंची..

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 अगस्त 2020। द्वाराहाट के विधायक पर शारीरिक शोषण का आरोप लगाने वाली पीड़िता अपनी गिरफ्तारी व एफआईआर को निरस्त करने को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गई है। पीड़िता ने उसकी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने व विधायक के डीएनए टेस्ट के आदेश पारित करने की मांग की है।  न्यायाधीश न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की एकलपीठ ने याचिका पर पीड़िता व विधायक के बीच हुए व्हाट्सएप चैट को कोर्ट में पेश करने को कहा है, और मामले को सुनने के बाद अगली तिथि एक सितम्बर की नियत की है।

पीड़िता व उसके दो अन्य सगे लोगों ने याचिका दायर कर उनके खिलाफ देहरादून के नेहरू काॅलोनी थाने में नौ अगस्त को दर्ज एफआईआर को निरस्त करने व अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की है । याचीकर्ताओं का कहना है कि देहरादून पुलिस ने उनकी शिकायत तो दर्ज नहीं कि लेकिन दबाब में आकर विधायक की पत्नी द्वारा दी गयी शिकायती पत्र पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। विधायक महेश नेगी की पत्नी रीता ने एफआईआर में कहा है कि द्वाराहाट में पीड़ित व उसके परिजन उनके पड़ोस में रहते हैं और वो अन्य लोगों की तरह अपनी समस्याएं लेकर अक्सर उनके घर आते रहते थे । महिला का चाल चलन ठीक नहीं होने के कारण उन्होंने उसे अपने घर आने पर रोक लगा दी थी। एफआईआर में यह भी कहा गया है कि महिला ने भागकर शादी की और उसका अपने पति के साथ कोर्ट में केश रहा है। विधायक की पत्नी ने यह भी आरोप लगाया है कि पीड़िता ने उन्हें फोन कर कहा था कि वो महेश के बच्चे की माँ है और उनकी पांच करोड़ रुपये की मांग नहीं मांगी गई तो नेगी का राजनीतिक कॅरियर बर्बाद करने के साथ परिवार को भी बदनाम कर देंगी ।

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-परेड ग्राउंड व तिब्बती मार्केट के सामने लगने वाले संडे बाजार का मामला
नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर देहरादून के परेड ग्राउंड व तिब्बती मार्केट के सामने लगने वाले संडे बाजार के मामले में सुनवाई करते हुए म्यूूनिसिपल कमिश्नर सुशील पांडे व जिलाधिकारी आशीष श्रीवास्तव को अवमानना नोटिस जारी कर दो सप्ताह में कारण सहित जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार देहरादून के वीकली सन्डे मार्किट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हीरा लाल ने अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि, वे देहरादून के परेड ग्राउंड के पीछे और तिबती मार्किट के सामने 2004 से प्रत्येक रविवार को बाजार आ रहे लगाते हैं, जिसमें करीब तीन सौ से अधिक लोग दुकान लगाते हैं, और हर माह नगर निगम को तीन सौ रूपये किराया भी देते आये हैं। 2004 में जिला अधिकारी द्वारा यह जगह उनको सन्डे बाजार लगाने के लिए दी थी। परन्तु नगर निगम द्वारा प्रशासन से मिलकर जनहित याचिका में पारित आदेश का हवाला देते हुए उनको हटा दिया गया है, और कुछ पहुंचे लोगों को नगर निगम द्वारा अन्य जगह दुकान भी दे दी।याचिका में यह कहा गया है कि सन्डे को पूरा बाजार बन्द रहता और ट्रैफिक भी कम रहता है, इसलिए वे सन्डे को परेड ग्राउंड के पीछे और तिब्बती बाजार के सामने दुकानें लगाते हैं, खुद ही वहाँ पर साफ सफाई भी करते आये हैं।सन्डे बाजार लगाने से गरीब लोगों को सस्ते में सामान मिल जाता है, और कई लोगों को रोजगार भी मिलता है वे महीने में चार दिन दुकान लगाते हैं। समिति का यह भी कहना है कि उनके नाम से एक अन्य समिति फर्जी तरीके से नगर निगम के अधिकारियों के साथ मिलकर चल रही है जिसकी जांच कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाय। पूर्व में उच्च न्यायालर्य की खण्डपीठ ने उनकी याचीका पर आदेश दिए थे कि उनके प्रत्यावेदन को नगर निगम व जिला अधिकारी दो माह में निस्तारित करे और यह भी जांच करे सही कमेटी कौन सी है परन्तु अभी तक उनके प्रत्यावेदन पर कोई भी निर्णय नही लिया गया।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 06 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने न्याय के देवता गोलज्यू के अल्मोड़ा के चितई मन्दिर के लिए डीएम अल्मोड़ा द्वारा गठित कमेटी की ओर से मन्दिर की समस्त गतिविधियों में हस्तक्षेप करने के खिलाफ दायर विशेष अपील पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए पर्यटन सचिव व अल्मोड़ा के डीएम को नोटिस जारी कर 2 सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी संध्या पंत ने हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर कर कहा है कि चितई गोल्ज्यू के मन्दिर मामले में पूर्व में कोर्ट के आदेश पर डीएम अल्मोड़ा ने कमेटी गठित की थी। जिसमें सभी सदस्य सरकारी अधिकारी नियुक्त किये गए। आरोप है कि अब यह कमेटी अपने कार्यक्षेत्र से बाहर मंदिर की अन्य गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रही है। जबकि पूर्व आदेश में कोर्ट ने कमेटी का गठन केवल गैर धार्मिक प्रबंधन से संबंधित गतिविधियों के लिए किया था, लेकिन कमेटी अब मन्दिर के पुजारियों की भी छंटनी कर रही है। याची ने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया। कहा कि कमेटी गठित करने का मुख्य उद्देश्य मन्दिर की गैर गतिविधियों का संचालन करने के लिए किया गया था न कि मंदिर की धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप के लिए।

यह भी पढ़ें : ब्रेकिंग: एक वर्ष के भीतर उत्तराखंड में ही स्थापित हो एनआईटी: हाईकोर्ट

-केंद्र सरकार को निर्माण के लिए तीन माह के भीतर धनराशि अवमुक्त करने के भी दिये आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 27 जुलाई 2020।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में सोमवार को एनआईटी श्रीनगर को अन्यत्र स्थानांतरित करने के मामले में लंबी सुनवाई के बाद एनआइटी को जयपुर शिफ्ट नहीं करने और इसका परिसर एक वर्ष के भीतर उत्तराखंड में ही स्थापित करने को आदेश दिये हैं। इसके साथ लंबे समय से एनआईटी के राज्य से बाहर जाने की संभावना पर पूर्ण विराम लग गया है। उच्च न्यायालय ने इसके साथ ही भारत सरकार से तीन माह में इसके निर्माण हेतु धनराशि अवमुक्त करने के निर्देश भी दिए हैं। इसके अलावा श्रीनगर में एनआईटी के स्थाई परिसर के निर्माण को लेकर आंदोलन के दौरान हुए हादसे में घायल हुए एनआईटी की छात्रों को मुआवजा देने के निर्देश भी दिए हैं। उच्च न्यायालय ने सरकार से कहा है कि वह सुमाड़ी में एनआईटी बनाने को लेकर पुनर्विचार करे।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के श्रीनगर जनपद के सुमाड़ी में वर्ष 2009 में एनआईटी स्वीकृत हुआ था। लेकिन अपना परिसर न होने के कारण इसे श्रीनगर के पॉलीटेक्निक और आईटीआई के भवनों में संचालित किया जा रहा था। इस लंबे समय से स्थायी भवन न बनने से यहां छात्र-छात्राओं के लिए पर्याप्त छात्रावास, कक्षा कक्ष और प्रयोगशालाओं का निर्माण नहीं हो पाने पर आंदोलन किये और मालला उच्च न्यायालय भी पहुंचा। इस बीच केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने एनआइटी के सुमाड़ी श्रीनगर में 1260 छात्रों की क्षमता युक्त स्थायी परिसर निर्माण के लिए 909.85 करोड़ एवं छात्रावास, प्रयोगशाला और कक्षा कक्ष बनाने के लिए 78.81 करोड़ रुपये के प्रस्तावों को स्वीकार कर दिया हैं। इस धनराशि में से 831.04 करोड़ रुपये सुमाड़ी में बनने वाले स्थाई परिसर के निर्माण पर खर्च किए जाएंगे। हालांकि बजट को अभी वित्त मंत्रालय ने स्वीकृति नहीं दी है।

उत्तराखंड में क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की मॉनिटरिंग के लिये हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

यह भी पढ़ें : रोडवेज बसों का किराया दो गुना करने पर सरकार को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, बढ़ा ही रहेगा किराया

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा रोडवेज की बसों व अन्य वाहनों में कोविड 19 के दौरान दोगुना किराया बढ़ाये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को सरकार व उत्तराखंड परिवहन निगम का पक्ष सुनने के बाद, उनके पक्ष से सहमत होते हुए निरस्त कर दिया है। मामले में राज्य सरकार व परिवहन निगम की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि कोविड 19 के चलते बसों में सोसियल डिस्टेंसिंग के मानकों के मुताबिक 50 फीसद यात्रियों को बैठाया जा रहा है। इसी वजह से किराया बढ़ाया गया है। बाद में यह किराया अपनी पुरानी दरों में आ जायेगा।
मामले के अनुसार उमेश शर्मा ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने इस महामारी में बसों का किराया दो गुना कर दिया है, जिसके कारण गरीब व आम लोगों का सफर करना मुश्किल हो गया है। इस बढ़े हुए किराये पर रोक लगाई जाये, जिससे यात्रियों को आने-जाने में असुविधा उत्पन्न न हो।

यह भी पढ़ें : धर्म नगरी में मीट की दुकानों के लाइसेंसों का नवीनीकरण करने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 जून 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने धर्म नगरी कहे जाने वाले ऋषिकेश में मीट की दुकानें सील करने के खिलाफ दायर याचिका पर याचिकाकर्ताओं को लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आवेदन करने और जिला प्रशासन को उनके लाइसेंसों के नवीनीकरण करने के निर्देश दिये।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता ऋषिकेश निवासी दीप कलमेठी की याचिका में कहा गया था कि जिला प्रशासन ने उनकी मीट की दुकानें सील कर दी हैं और अब मीट नहीं बेचने नहीं दिया जा रहा है। इससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मीट करोबारियों ने लाइसेंस का ऑनलाइन नवीनीकरण नहीं किया है, इसलिए प्रशासन ने लाइसेंस निरस्त कर दुकानों को सील किया है।

यह भी पढ़ें : बोर्ड परीक्षा तक हर दिन परीक्षा केंद्रों को सेनेटाइज करने के हाईकोर्ट के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जून 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली, हरिद्वार निवासी सच्चिदानंद डबराल व अन्य के द्वारा दायर जनहित याचिकाओं की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए है कि जब तक उत्तराखंड बोर्ड की सभी परीक्षाएं पूरी नहीं हो जाती हैं तब तक परीक्षा केंद्रों में स्कूल भवन, मेज-कुर्सी, शौचालय व वाटर फिल्टर आदि को हर दिन सेनेटाइज करें। यह भी कहा है कि प्रदेश के जिन ग्राम प्रधानों को कोरोना विषाणु से लड़ने के लिए अभी तक धनरािश नही दी गयी है, उनको अगली सुनवाई तक धनराशि अवमुक्त करें। मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया व न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई।
मामले में सच्चिदानंद डबराल की ओर से प्रार्थना पत्र देकर कहा गया है कि राज्य सरकार जिन केंद्रों में बोर्ड की शेष बची परीक्षाएं कराने जा रही है, उनमें अभी हाल में सरकार ने क्वारन्टाइन सेंटर बनाया था और इनमें प्रवासियों को ठहराया गया था। तब से इन केन्द्रों को सेनेटाइज तक नही किया गया है। वहीं अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि कोरोना विषाणु से बचने के लिए राज्य सरकार व केंद्र स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को लेकर उदासीन रही है। जो उपकरण मेडिकल कर्मियों को दिए गए हैं वे मानको के अनुरूप नहीं है। उनकी गुणवत्ता निम्न है। वहीं हरिद्वार निवासी सच्चिदानंद डबराल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार प्रदेश के प्रवासियों को उत्तराखंड में वापस ला रही है परंतु इनकी जांच सीमा पर नहीं की जा रही है और न ही सीमा पर इनकी खाने-पीने व रहने की कोई व्यवस्था की गई है।

यह भी पढ़ें : केदारनाथ आपदा में जमीन में दफन शवों को तलाशने के लिए वैज्ञानिक तरीके तलाशने में जुटा हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने 2013 में केदारनाथ में आई महाविनाशकारी आपदा के मामले में सुनवाई करते हुए वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून से पूछा है कि इस आपदा में लापता हुए लोगों के शवों को खोजने के लिए कौन-कौन से वैज्ञानिक तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इस संबंध में एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के आदेश दिए गये हैं।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली निवासी अजय गौतम की ओर से उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद केदारघाटी में करीब 4200 लोग लापता हुए। इनमें से 600 लोगों के कंकाल मिले। मगर आपदा के सात साल बाद भी केदारघाटी में 3600 लोग दफन हैं। इन शवों को निकालने के लिए राज्य सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से प्रार्थना की है कि सरकार मामले को गभीरता से ले और केदारघाटी से शवों को निकलवाकर अंतिम संस्कार कराए।

यह भी पढ़ें : बाण गंगा में अवैध खनन के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे सरकार: हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने हरिद्वार स्थित बाण गंगा में अवैध खनन के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि दस दिन के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही कर जवाब पेश करें। मामले की अगली सुनवाई हेतु 30 जून की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी मोहम्मद साजिद ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ग्राम प्रधान व उनके पति द्वारा खनन कारोबारियों के साथ मिलकर बाण गंगा में ग्राम निहंदपुर सुठारी लक्सर हरिद्वार में अवैध रूप से खनन कार्य किया जा रहा है। जबकि खनन कारोबारियों के पास अनापत्ति प्रमाण पत्र मौजूद नहीं है ओर केंद्र सरकार की अनुमति के बिना खनन नहीं हो सकता है। साथ ही यह जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 की धारा 132 का भी उल्लंघन है। खनन में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। इससे खनन से गांव में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। वहीं सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पीठ को बताया गया कि मौके पर जिला प्रशाशन की एक कमेटी बनाकर मुआयना करने के लिए भेजी गई। जांच में वहां अवैध खनन पाया गया। इस पर राज्य सरकार ने उक्त अवैध खनन पर रोक लगा दी है।

यह भी पढ़ें : आध्यात्मिक गुरु पर नाबालिक से दुष्कर्म के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, दिये विवेचना रिपोर्ट पेश करने के आदेश

Is Dr. Pranab Pandaya really a rapistनवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने 2010 से 2014 के बीच आध्यात्मिक गुरु, गायत्री परिवार के संचालक, देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक तथा अखंड ज्योति पत्रिका के सम्पादक डा. प्रणव पांड्या पर लगे छत्तीसगढ़ की नाबालिक के साथ दुराचार के आरोपों के मामले में सुनवाई करते हुए सीआरपीसी की धारा 161 व 164 में पीड़िता के बयान दर्ज कर रिपोर्ट के साथ ही विवेचना की प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 23 जून नियत की है।
बुधवार को मामले में अधिवक्ता विवेक शुक्ला की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। जिसमें कहा है कि वर्ष 2010 से 2014 में छत्तीसगढ़ के एक गरीब माता पिता ने अपनी 14 साल की पुत्री को डॉ. प्रणव पांड्या और उनकी पत्नी के यहां काम करने के लिए छोड़ा था। आरोप है कि डा. पांड्या ने इस नाबालिक के साथ दुराचार किया। इसकी शिकायत पीड़िता ने उनकी पत्नी से की तो उसने नाबालिक को उल्टे डरा-धमकाकर उसे चुप करा दिया। बाद में पीड़िता ने पांड्या के खिलाफ दिल्ली के विवेक विहार में जीरो एफआईआर दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता की मांग है कि आरोपी का खाता सील करने के साथ ही उत्तराखंड में इनके द्वारा संचालित की जा रही चार्टर्ड यूनिवर्सिटी पर भी कार्रवाई की जाए।

यह भी पढ़ें : अध्यापकों की प्रोन्नति पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक..

-समाज कल्याण विभाग का मामला
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकल पीठ ने समाज कल्याण विभाग के जनजाति विद्यालयों में राजपत्रिक अधिकारी स्तर के अधीक्षक के पद पर एलटी ग्रेड धारक अध्यापकों की पदोन्नति पर रोक लगा दी है। साथ ही मामले में सरकार एवं प्रोन्नत किये गये अभ्यर्थियों से जवाब मांगा है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी प्रेमलता सहगल एवं प्रीति द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि विभाग ने अधीक्षक-राजपत्रित के पद पर एलटी ग्रेड धारक अध्यापकों को प्रोन्नति दी गई है। याचिकाकर्ताओंका कहना था कि पूर्व में सीटी ग्रेड को एलटी ग्रेड में विलय कर दिया था। साथ ही एलटी ग्रेड अध्यापकों को उच्च वेतनवान दिया जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि एलटी ग्रेड का ग्रेड पे 4600 है, जबकि अधीक्षक का 4200 है। अतः एलटी ग्रेड वालों का डाउनग्रेड में प्रोन्नत नहीं किया जा सकता है। याचियों का यह भी कहना है कि वह मनोवैज्ञानिक के पद कार्यरत हैं तथा नियम के अनुसार वे अधीक्षक पद पर पदोन्नति के पात्र हैं। एकलपीठ ने याचियों के तर्कों से प्रथमदृष्टया सहमत होते हुए पदोन्नति पर रोक लगा दी है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 09 जून 2020। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रविकुमार मलिमथ की एकलपीठ ने काशीपुर के पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है ।
मामले के अनुसार काशीपुर के पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल के खिलाफ काशीपुर निवासी परविंदर सिंह ने बीती 27 मई 2020 को काशीपुर थाने में सिक्ख समाज के प्रति सोशल मीडिया में अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए धारा 153 ए व 295 ए के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया था। अपनी गिरफ्तारी पर रोक के लिये अग्रवाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस पर ही एकलपीठ ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 30 अप्रैल 2020। उत्तराखंड सरकार ने भोजन माताओं, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व सहायिकाओं को मार्च महीने का वेतन दे दिए जाने की रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश कर दी है। इसके बाद हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने इससे संबंधित जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।
मामले के अनुसार ललिता रावत ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि अभी तक सरकार ने भोजन माताओं व आगनबाडी कार्यकर्ताआंे को मार्च महीने का बेतन नही दिया गया है। न ही इस दौरान सरकार से उनको किसी प्रकार की अन्य सहायता दी गयी है। इसके चलते वे अपने परिवार का भरण पोषण नही कर पा रही हैं। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि भोजन माताओं व आंगनबाड़ी कार्य करताओ को मार्च महीने का बेतन दे दिया गया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने भोजन माताओं व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियांे को मार्च महीने का वेतन नही दिये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से 27 अप्रैल तक यह बताने को कहा है कि इनका मार्च महीने का वेतन दिया गया है या नही। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। आज सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि भोजन माताएं व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां केंद्र सरकार की योजना के तहत कार्यरत हैं। मार्च माह का वेतन केंद्र सरकार ने राज्य के खाते में डाल दिया है, जिसका भुगतान सोमवार तक भोजन माताओ और आंगगनबाडी कार्यकर्ताओ के खातों में डाल दिया जाएगा। इसकी जानकारी शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुदरम की ओर से सरकार के अधिवक्ता द्वारा खण्डपीठ को दी गयी है।
मामले के अनुसार ललिता रावत ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि अभी तक सरकार ने भोजन माताओं व आगनबाडी कार्यकत्रियों को मार्च महीने का वेतन नही दिया गया है। न ही इस दौरान सरकार से उनको किसी प्रकार की अन्य सहायता दी गयी है।

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-लोनिवि के प्रधान लिपिक को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर
-हाईकोर्ट में विडियो-कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनवाई में पहली अंतरिम जमानत मंजूर
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 अप्रैल 2020। हाईकोर्ट ने कोरोना महामारी के दौरान घर-परिवार की देखरेख करने के लिए कोई न होने की दलील के आधार पर रिश्वत लेने के मामले में छह माह से जेल में बंद लोक निर्माण विभाग के प्रधान लिपिक को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर कर ली है। हाईकोर्ट में विडियो-कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनवाई में पहली अंतरिम जमानत मंजूर हुई है। न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
मामले के अनुसार लोक निर्माण विभाग के प्रधान लिपिक प्रदीप पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि याचिकाकर्ता को विजिलेंस ने हल्द्वानी में अक्टूबर 2019 में पांच हजार रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इसके बाद उनको भ्रष्टाचार निवारण अदालत ने जेल भेज दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पीयूष गर्ग ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के परिवार की देखरेख करने वाला महामारी के दौर में कोई नहीं है। इस आधार पर न्यायालय ने आरोपित को अंतरिम जमानत मंजूर कर दी।
बता दें कि लोनिवि के एक पंजीकृत ठेकेदार ने हल्द्वानी स्थित विजिलेंस कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी। जिसमें कहा था कि उसने 2015 में लालकुआं तहसील भवन के निर्माण का ठेका लिया था। मगर विभाग में बजट न होने के कारण निर्माण कार्य बीच में ही रोकना पड़ा। ऐसे में निर्माण कार्य की अवधि बढ़ाने को लेकर उसने विभागीय प्रक्रिया के अनुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। इस संबंध में हुई कार्यवाही जानने के लिए जब शिकायतकर्ता ने नैनीताल के लोनिवि द्वितीय वृत्त के अधीक्षण अभियंता कार्यालय में संपर्क किया तो वहां के प्रधान सहायक प्रदीप चंद्र पांडे ने पत्रावली अधीक्षण अभियंता से मांग स्वीकृत कराने के बदले में दस हजार रुपये की डिमांड कर दी। शिकायतकर्ता ठेकेदार की ओर से कहा गया कि काम समय पर पूरा हो जाए। इसके लिए उसने तत्काल प्रधान सहायक को चार हजार रुपये दे दिए। 22 अक्टूबर को प्रधान सहायक ने पत्रावली स्वीकृत होने की सूचना दी व शेष कार्य कराने के बदले छह हजार रुपये और देने को कहा। बाद में प्रधान सहायक प्रदीप पांडे पांच हजार रुपये लेने को लेकर काम करने को तैयार हो गया। ठेकेदार की शिकायत की जांच के बाद तथ्य सही पाए जाने पर एसपी विजिलेंस अमित श्रीवास्तव के निर्देश पर निरीक्षक पीके उप्रेती के अगुवाई में एक ट्रैप टीम बनाई गई। जिसके बाद टीम ने सरस मार्केट के समीप प्रधान सहायक प्रदीप चंद्र पांडे निवासी जेके पुरम को पांच हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकडा गया। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत मंजूर कर ली।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से पहली बार वर्चुअल यानी आभासी तरीके से सुनवाई करते हुए कोरोना की वैश्विक महामारी से निपटने के लिए सरकारों द्वारा की जा रही तैयारियों पर केंद्र व राज्य सरकार से 18 अप्रैल तक विस्तृत जवाब देने को कहा है। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ केंद्र व राज्य सरकार से पूछा है कि कोरोना से बचाव को लेकर मुख्य अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों के सुरक्षा उपकरणों के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार और क्या किये जाने की जरूरत है। कोरोना से बचाव के लिए राज्य में कितने सुरक्षा उपकरण उपलब्ध हैं, कितने उपकरणों की जरुरत है और कितने उपकरणों का प्रयोग अभी तक किया गया है। इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार व रामनगर में कोरोना टेस्ट लैब बनाने को लेकर क्या संभावना है। क्या इन जगहों पर भी सरकार लैब बना सकती है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चिकित्सालयों में टेली मेडिसन की सुविधाएं उपलब्ध कराने पर गाइड लाइन बनाने को भी कहा है। उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन को पत्र लिखकर कोरोना के दृष्टिगत ‘मैटर ऑफ प्रोवाइडिंग सेक्यूरिटी टू डॉक्टर्स एंड पैरा मेडिकल’ के नाम से ईमेल से जनहित याचिका दायर कर राज्य में चिकित्सकों को उचित सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ ही उनको पूरी सुरक्षा दिये जाने की मांग की थी। जिस पर आज मामले की गंभीरता को देखते हुवे सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राजधानी के फ्लाईओवर पर दुर्घटनाओं व 14 मौतों पर सरकार से जबाव माँगा 

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ ने गलत डिजाइन से बने बल्लीवाला फ्लाईओवर देहरादून पर तीन वर्ष में 12 दुर्घटनाएं होने व इन घटनाओं में 14 लोंगों की मौत मामले में दायर जनहित याचिका पर सरकार से चार हफ्ते में जबाव दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 
उल्लेखनीय है कि एक पत्रकार ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर बताया कि देहरादून के बल्लीवाला में बनाए गए फ्लाईओवर का डिजाइन है। जिसके कारण अगस्त 2016 में इस फ्लाईओवर के उदघाटन के बाद से अब तक 12 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन हादसों में 14 लोगों की मौत हो चुकी है। इस पत्र में बताया गया है कि फ्लाईओवर का डिजाइन बनाने वाले लोनिवि डोईवाला के तत्कालीन अधिशासी अभियंता महिपाल सिंह रावत अकुशल इंजीनियर हैं । याचिका में उनके इंजीनियरिंग की डिग्री की जांच कराने की मांग भी गई है। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करते हुए सरकार से जबाव मांगा है।

यह भी पढ़ें : सार्वजनिक भूमि पर सड़क किनारे बने साईं मंदिर को हटाने के लिए मिला दो माह का अतिरिक्त समय !

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 मार्च 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सरकार को ऋषिकेश में सार्वजिनक भूमि पर सड़क किनारे बने साईं मंदिर को दो माह में हटाने के आदेश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने बीती 4 मार्च 2020 को हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च को 23 मार्च तक हटाने के आदेश दिए थे। इस आदेश के बाद सांई मंदिर को हटाने के लिए एक तरह से दो माह का अतिरिक्त समय मिल गया है।
मामले के अनुसार उच्च न्यायालय के चार मार्च के आदेश पर ऋषिकेश प्रशासन की ओर से ऋषिकेश की साईं सेवा समिति को भी सड़क के किनारे निर्मित साईं मंदिर हटाने का नोटिस दिया था। नोटिस पर रोक लगाने को समिति ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की है। जिस पर आज न्यायालय ने सांई मंदिर को दो माह में हटाने के आदेश दिए। 

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : कोरोना के दृष्टिगत उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई होगी

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। कोरोना के दृष्टिगत उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई होगी। इस बाबत उच्च न्यायालय के न्यायिक रजिस्ट्रार की ओर से सोमवार देर शाम नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। नोटिफिकेशन के अनुसार न्यायालय में अंतिम सुनवाई के अलावा आवश्यक मामलों की ही सुनवाई की जाएगी। संबंधित अधिवक्ता की अनुपस्थिति में मामले को निरस्त नहीं किया जाएगा। जब तक आवश्यक न हो, वादकारियों को उच्च न्यायालय परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। साथ ही अधिवक्ताओं से उम्मीद की गई है कि वे सभागार एवं कैंटीन में भीड़ बनाने से बचेंगे।

इससे पूर्व दिन में हाइकोर्ट बार एशोसिएशन ने सरकार व विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोरोना को महामारी घोषित करने का जिक्र करते हुए इससे बचने के लिए सोमवार को अपनी कार्यकारिणी की बैठक बुलाई, और बैठक में निर्णय लेकर मुख्य न्यायधीश को ज्ञापन दिया। मांग की कि जब तक कोरोना से निजात नही मिल जाती तब तक कोर्ट में अर्जेंट यानी अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई की जाय। इस पर मुख्य न्यायधीश ने देश के सर्वोच्च न्यायाधीश से दिन में वीडियो कॉन्फ्रेसिंग की और इसके बाद बार को अवगत कराया कि अधिवक्ता इसमें सहयोग करें और अत्यावश्यक मामले ही फाइल करें। यदि कोई अधिवक्ता इस दौरान कोर्ट से सुनवाई से अनुपस्थित रहता है तो उनके मामलों में एडवर्स आदेश पारित नही किये जायेंगे। बार के सचिव जयवर्धन कांडपाल ने यह जानकारी देने के साथ ही बताया कि अभी उत्तराखंड में कोरोना वायरस का केवल एक मामला ही सामने आया है, लिहाजा इससे डरने की जरूरत नही है, लेकिन जैसा कि सभी जानते है कि नैनीताल एक पर्यटन नगरी है, इसलिए यहां भी यह वायरस आ सकता है। इसके लिए सभी को मिलकर कार्य करना चाहिए। कांडपाल ने यह भी कहा है कि मुख्य न्यायाधीश से वार्ता के दौरान यह बात भी निकल कर आई है की तात्कालिक व अत्यावश्यक मामलों  को प्राथमिकता दी जाएगी जिसमें विशेषत: क्रिमिनल और सिविल के डिमोलिशन आदि के मामले प्राथमिकता पर सुने जाएंगे। इसलिए उन्होंने अधिवक्ताओं से अपेक्षा की गई है कि वे अत्यावश्यक मामले ही फाइल करें और सम्भव हो तो अनावश्यक गैदरिंग से भी बचें। बताया की उच्च न्यायालय में वादकारियों के प्रवेश पर भी रोक लग सकती है। अन्य  दिशा निर्देश कॉज लिस्ट के माध्यम से सबको प्राप्त होंगे।

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-जसपुर नगरपालिका अध्यक्ष को हाईकोर्ट से मिली राहत
नवीन समाचार, देहरादून, 3 मार्च 2020। हाईकोर्ट ने जसपुर नगरपालिका अध्यक्ष का नाम मतदाता सूची से हटाने के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी जिला ऊधमसिंह नगर को आदेशित किया है कि कोई भी अंतिम आदेश पारित करने से पूर्व याचिकाकर्ता को विधिवत सुनवाई का मौका दिया जाए।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नगरपालिका परिषद जसपुर की अध्यक्ष मुमताज बेगम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वह 20 नवंबर 2018 को बहुजन समाज पार्टी से निर्वाचित हुई थी। जिसके बाद एक व्यक्ति देहरादून निवासी नावेद आलम द्वारा उनकी शिकायत राज्य निर्वाचन आयोग से की गई। जिसमें कहा था कि उनका नाम नगर पंचायत इस्लामनगर बदायूं की मतदाता सूची में भी दर्ज है। इसलिए उनका नाम जसपुर की मतदाता सूची से हटाया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने अपना नाम वहां से हटाने के लिए 24 मार्च 2018 को प्रार्थना पत्र दे दिया था। जिसके बाद उनका नाम मतदाता सूची से विलोपित कर दिया था। याचिका में कहा कि इस प्रकरण की जांच तहसीलदार जसपुर की ओर से की गई तथा जांच में यह पाया गया कि आलम ने कोई भी प्रार्थना पत्र नहीं दिया है। जिसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अन्य तहसीलदार जसपुर से जांच कराकर  रिपोर्ट मांगी तथा राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 26 फरवरी 2020 को जिला निर्वाचन अधिकारी स्थानीय निकाय ऊधमसिंह नगर को आदेश दिया कि उनका नाम जसपुर की मतदाता सूची से हटा दिया जाए। इस आदेश को याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि इसमें उनको सुनवाई का ‌मौका दिए बिना ही यह आदेश पारित किया गया है जो नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों के विपरित है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने जिला निर्वाचन अधिकारी जिला ऊधमसिंह नगर को आदेशित किया है कि कोई भी अंतिम आदेश पारित करने से पूर्व याचिकाकर्ता को विधिवत सुनवाई का मौका दिया जाए।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 28 फरवरी 2020।उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सुधांशू धूलिया और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदेश में पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले वनों को वन श्रेणी से बाहर रखे जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में याचिकाकर्ता विनोद पांडे ने स्वयं बिना कोई अधिवक्ता रखे पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से प्रदेश के महाधिवक्ता ने पैरवी की। मामले के अनुसार प्रो. अजय रावत ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने 19 फरवरी 2020 को एक नया आदेश जारी किया है। इसमें 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वनों की श्रेणी से बाहर रखा गया है। इससे पूर्व भी सरकार ने 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वन श्रेणी में नहीं माना था। इस पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई तो सरकार ने आदेश में संशोधन कर 10 हेक्टयेर को 5 हेक्टेयर कर दिया। याचिकर्ता का यह भी कहना है कि फॉरेस्ट कंजरवेशन एक्ट 1980 के तहत प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित किया गया है। इसमें वनों की श्रेणी को विभाजित किया गया है। लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिन्हें किसी भी श्रेणी के तहत नहीं रखा गया है। याचिका में मांग की गई है कि संबंधित क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि इनके दोहन और कटान पर रोक लगाई जा सके। याचिकाकर्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के अपने आदेश गोडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार में कहा है कि किसी भी वनक्षेत्र को वन श्रेणी में रखा जाएगा। लिहाजा उसका मालिक कोई भी हो सकता है। स्पष्ट किया है कि वनों का अर्थ क्षेत्रफल और घनत्व से नहीं है। जहां भी 5 प्रतिशत क्षेत्र में पेड़ पौधे हैं, उनका घनत्व 10 प्रतिशत है तो उन्हें वनों की श्रेणी में रखा गया है। सरकार के इस आदेश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कहा है कि प्रदेश सरकार वनों की परिभाषा न बदले।

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-आदेश पर लगाई रोक, दो जनवरी तक जवाब मांगा
नवीन समाचार, नैनीताल, 10 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड हाइकोर्ट ने दस हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनो को वन नही मानने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार के 21 नवम्बर 2019 के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार से 2 जनवरी 2020 तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई।

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-नैनीताल निवासी विनोद पांडे ने दायर की है याचिका, आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध एवं अपने लोगों को लाभ पहुंचाने का उपक्रम बताया
-कहा-कार्यालयी आदेश होने के कारण यह लागू नहीं किया जा सकता है
-गैर श्रेणीगत वन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 6 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार के 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनों को वन नही मानने के ताजा-गत 21 नवंबर के आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य व के केंद्र सरकार से 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई दो जनवरी की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार नैनीताल निवासी विनोद कुमार पांडे ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 21 नवम्बर 2019 को उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण अनुभाग ने एक आदेश जारी कहा है कि उत्तराखंड में 10 हेक्टेयर से कम या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वन क्षेत्र वाले वनों को उत्तराखंड में लागू राज्य एवं केंद्र की वर्तमान विधियो के अनुसार वनों की श्रेणी में नही रखा जा सकता है या उनको वन नही माना जा सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह आदेश एक कार्यालयी आदेश है, इसलिए यह लागू नही किया जा सकता है। क्योंकि न ही यह शासनादेश है, और न ही यह राज्य मंत्रिमंडल से पारित है। सरकार ने इसे अपने लोगां को फायदा देने के लिए जारी किया है। उनका यह भी कहना है कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित है, जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया हुआ है। परंतु इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको किसी भी श्रेणी में घोषित नही किया गया है। याची ने इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग की है। याची का यह भी कहना है कि सर्वोच्च ने 1996 के गौडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार मामले में अपने आदेश में कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो, उनको वनों की क्षेत्र के श्रेणी में रखा जाएगा और वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं है। सरकार का यह आदेश इस और इंगित करता है कि ऐसे क्षेत्रों का दोहन कर अपने लोगों को लाभ पहुँच सके।

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-सार्वजनिक एवं सरकारी भूमि पर बने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्चों की सूची मांगी
नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव से पूछा है कि प्रदेश के सभी 13 जिलों में अभी तक कितने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बनाए गए हैं। कोर्ट ने इनकी सूची एक सप्ताह के भीतर पेश करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही ताकीद की है कि सूची पेश नहीं करने पर मुख्य सचिव चार मार्च को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होंगे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में एक आदेश जारी कर सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे सार्वजनिक स्थानों व सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाए गए मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा और चर्च को हटाएं लेकिन अभी तक उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।
उल्लेखनीय है कि न्यायालय में ‘इन द मैटर ऑफ रिमूवल आफ इललीगल रिलिजियस स्ट्रेक्चर ऑन द पब्लिक लैंड’ के रूप में दायर जनहित याचिका के रूप में सुनवाई चल रही है।याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध रूप से बनाए गए मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा को नहीं हटाया गया है।

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-राज्य में सभी तरह की भूमियों के हस्तांतरण पर रोक लगाने की की गई है याचिका में  मांग

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने भूमिधरी मालिकाना हक से सम्बंधित 2012 में पारित किए गए शासनादेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए है। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी सुरभि सक्सेना ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने 2012 के बाद कई सारे शासनादेश जारी किए। याचिका में कहा कि इसमे एक शासनादेश के तहत सरकारी भूमि पर कब्जाधारियों सहित किराएदारों को काबिज पट्टे की भूमि को मालिकाना हक के तहत खेती करने और रहने के लिए था। बाद में सरकार ने न्यूनतम मूल्य पर भूमि हस्तांतरित कर दी। याचिका में कहा मालिकाना हक के तहत मिली भूमि को भूमिधरियों द्वारा कई गुना ऊचे दामों में बेचा जा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से राज्य में सभी तरह की भूमि हस्तांतरण पर रोक लगाने की मांग की थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को  जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। 

यह भी पढ़ें : डीएम को राशन घोटाले के आरोपित सस्ता गल्ला दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खंडपीठ ने राशन घोटाला करने के आरोपित पांच सरकारी सस्ते गल्ले के राशन विक्रेताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि तीन माह के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही कर नई दुकानें आवंटित करें तब तक इन पांच दुकानों के राशन कार्डधारकों को दूसरी दुकानों से राशन उपलब्ध कराया जाये। इन निर्देशों के साथ ही कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी है।
मामले की सुनवाई के दौरान हरिद्वार के डीएम ने जांच रिपोर्ट पेश कर कहा कि लक्सर के आसपास 5 राशन की दुकानों में अनियमितताए पाई गई हैं। इन राशन विक्रेताओं के लाइसेंस निरस्त कर दिए हैं। कोर्ट ने राशन विक्रेताओं का भी पक्ष सुना जिसमें उन्होंने राशन कार्ड व कागजात खोने की जानकारी कोर्ट को दी थी। कोर्ट ने माना कि सभी आरोपित दुकानदारों के कागज एकसाथ खो जाना संदेहास्पद है।
मामले के अनुसार लक्सर निवासी रेनु ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि उनके क्षेत्र में सस्ते गल्ले के राशन विक्रेताओं द्वारा फर्जी राशन कार्ड बनाए गए हैं। सस्ते गल्ले की दुकानों में गरीब और जरूरतमंद लोगों को 35 किलो राशन मिलता है लेकिन राशन विक्रेता 6 किलो राशन ही देते हैं, बाकी 29 किलो राशन गबन कर कालाबाजारी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता द्वारा कहा गया की आरटीआई में सूचना मांगने पर राशन विक्रेता द्वारा रिकॉर्ड बुक उपलब्ध नहीं कराई और जानकारी दी गई कि रास्ते मे जाते समय रिकॉर्ड बुक खो गई है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने हरिद्वार जिला पंचायत सीट की खरजा कुतुबपुर सीट से 2016 में निर्वाचित हुए जिला पंचायत सदस्य के पद को रिक्त घोषित कर दुबारा से चुनाव कराने वाली जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार व जिला पंचायत सदस्य विजेंद्र को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 16 मार्च की तिथि निर्गत की है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी महेंद्र सिंह ने जनहित याचिका दायर कर कहां है कि खरजा कुतुबपुर जिला पंचायत सीट से 2016 में निर्वाचित हुए विजेंद्र सिंह का निवास स्थान अकोड़ा और राजेंद्रपुर ग्राम सभा के अंतर्गत शेखपुरी में है। 3 जनवरी 2017 को राज्य सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन से नगरी क्षेत्र लक्सर में मिला दिया गया पंचायती राज एक्ट की धारा 90 (4) के अंतर्गत नाम हट जाने के चलते जिला पंचायत सीट स्वतः ही सीज ऑफ हो जाएगी याचिकाकर्ता ने इस सीट को रिक्त घोषित करते हुए वहां पर दुबारा चुनाव कराए जाने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के प्राध्यापकों की नियुक्ति आदेश को किया निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 10 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के चार जनवरी 2019 के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश में राजकीय महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक चित्रकला के चार पदों पर नियुक्ति की गई थी।
बृहस्पतिवार को आयोग के आदेश को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति रमेश खुल्बे की संयुक्त खंडपीठ ने मधु बहुगुणा की याचिका की सुनवाई करते हुए निरस्त किया है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने शैक्षिक योग्यता, अनुभव को नजरअंदाज कर विधि विरुद्ध चयन किया है। साक्षात्कार बोर्ड के चार सदस्यों में एक सदस्य ने अपने अधीन पीएचडी कर रही अभ्यर्थी का पक्ष लेकर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया है। याचिका में तर्क दिया गया था कि सहायक प्राध्यापकों के पदों पर चयन के लिए साक्षात्कार के 100 अंक तय किए गए थे। यह निर्धारण उच्चतम न्यायालय के सर्वमान्य सिद्धांत के खिलाफ है। श्रेष्ठता के चयन की अवधारणा को नजरअंदाज करने का भी आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने लोक सेवा आयोग, चयनित अभ्यर्थियों के अधिवक्ताओं की दलील सुनने के बाद आयोग के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश से दो सामान्य एवं दो आरक्षित श्रेणी के चयनित सहायक प्राध्यापक चित्रकला के साथ आयोग एवं राज्य सरकार को करारा झटका लगा है। उल्लेखनीय है कि आयोग ने इन चार पदों पर नियुक्ति के लिए चार अगस्त 2017 को विज्ञापन जारी किया था। इसमें ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 25 अगस्त 2017 तय की गई थी। इसके बाद नियुक्ति आदेश जारी किया था।

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-नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राजस्व सचिव कोर्ट में पेश हों
नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पिछली हरीश रावत सरकार के दौरान बहुचर्चित रहे वर्ष 2015 के नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राज्य सरकार द्वारा अब तक जवाब न दिये जाने पर सख्त रुख दिखाते हुए प्रदेश के राजस्व सचिव को समस्त दस्तावेज लेकर 9 जनवरी 2020 को पेश होने के आदेश दिए हैं।

मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी बिशन सिंह व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के संस्थापक पीसी तिवाड़ी द्वारा नवंबर 2015 में उच्च न्यायालय जनहित याचिका दाखिल कर राज्य सरकार के द्वारा हिमांशु एजुकेशन सोसाइटी को बिना विधिक प्रावधानों का पालन किये रानीखेत तहसील के अंतर्गत ग्राम नैनीसार में 353 नाली भूमि 22 सितंबर 2015 को आवंटित किए जाने वाले आदेश को चुनौती दी गयी थी। कहा था कि सरकार ने अपने चहेतों को करोड़ो की भूमि कौड़ी के भाव आवंटित की है जो गैरकानूनी है लिहाजा आवंटन को रद्द किया जाना चाहिए। मामले में आज तक राज्य सरकार के द्वारा मामले में जबाब नही दाखिल किए जाने पर खंडपीठ ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को मात्र एक सप्ताह का समय देते हुए आदेश किया है कि यदि तय समय सीमा में जबाब दाखिल नही किया गया तो अगली सुनवाई की तिथिा 9 जनवरी 2020 को सचिव राजस्व हाई कोर्ट की खंडपीठ के समक्ष समस्त दस्तावेजों सहित पेश हों।

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