बड़ा समाचार : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के प्राध्यापकों की नियुक्ति आदेश को किया निरस्त

यहाँ से दोस्तों को भी शेयर करके पढ़ाइये
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

नवीन समाचार, नैनीताल, 10 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के चार जनवरी 2019 के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश में राजकीय महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक चित्रकला के चार पदों पर नियुक्ति की गई थी।
बृहस्पतिवार को आयोग के आदेश को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति रमेश खुल्बे की संयुक्त खंडपीठ ने मधु बहुगुणा की याचिका की सुनवाई करते हुए निरस्त किया है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने शैक्षिक योग्यता, अनुभव को नजरअंदाज कर विधि विरुद्ध चयन किया है। साक्षात्कार बोर्ड के चार सदस्यों में एक सदस्य ने अपने अधीन पीएचडी कर रही अभ्यर्थी का पक्ष लेकर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया है। याचिका में तर्क दिया गया था कि सहायक प्राध्यापकों के पदों पर चयन के लिए साक्षात्कार के 100 अंक तय किए गए थे। यह निर्धारण उच्चतम न्यायालय के सर्वमान्य सिद्धांत के खिलाफ है। श्रेष्ठता के चयन की अवधारणा को नजरअंदाज करने का भी आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने लोक सेवा आयोग, चयनित अभ्यर्थियों के अधिवक्ताओं की दलील सुनने के बाद आयोग के नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। इस आदेश से दो सामान्य एवं दो आरक्षित श्रेणी के चयनित सहायक प्राध्यापक चित्रकला के साथ आयोग एवं राज्य सरकार को करारा झटका लगा है। उल्लेखनीय है कि आयोग ने इन चार पदों पर नियुक्ति के लिए चार अगस्त 2017 को विज्ञापन जारी किया था। इसमें ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 25 अगस्त 2017 तय की गई थी। इसके बाद नियुक्ति आदेश जारी किया था।

यह भी पढ़ें : हरीश रावत सरकार के बहुचर्चित मामले में त्रिवेंद्र सरकार भी रही चुप ! हाईकोर्ट हुआ सख्त…

-नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राजस्व सचिव कोर्ट में पेश हों
नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पिछली हरीश रावत सरकार के दौरान बहुचर्चित रहे वर्ष 2015 के नैनीसार जमीन आवंटन मामले में राज्य सरकार द्वारा अब तक जवाब न दिये जाने पर सख्त रुख दिखाते हुए प्रदेश के राजस्व सचिव को समस्त दस्तावेज लेकर 9 जनवरी 2020 को पेश होने के आदेश दिए हैं।

नियमित रूप से नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड के समाचार अपने फोन पर प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारे टेलीग्राम ग्रुप में इस लिंक https://t.me/joinchat/NgtSoxbnPOLCH8bVufyiGQ से एवं ह्वाट्सएप ग्रुप से इस लिंक https://chat.whatsapp.com/ECouFBsgQEl5z5oH7FVYCO पर क्लिक करके जुड़ें।
मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी बिशन सिंह व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के संस्थापक पीसी तिवाड़ी द्वारा नवंबर 2015 में उच्च न्यायालय जनहित याचिका दाखिल कर राज्य सरकार के द्वारा हिमांशु एजुकेशन सोसाइटी को बिना विधिक प्रावधानों का पालन किये रानीखेत तहसील के अंतर्गत ग्राम नैनीसार में 353 नाली भूमि 22 सितंबर 2015 को आवंटित किए जाने वाले आदेश को चुनौती दी गयी थी। कहा था कि सरकार ने अपने चहेतों को करोड़ो की भूमि कौड़ी के भाव आवंटित की है जो गैरकानूनी है लिहाजा आवंटन को रद्द किया जाना चाहिए। मामले में आज तक राज्य सरकार के द्वारा मामले में जबाब नही दाखिल किए जाने पर खंडपीठ ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को मात्र एक सप्ताह का समय देते हुए आदेश किया है कि यदि तय समय सीमा में जबाब दाखिल नही किया गया तो अगली सुनवाई की तिथिा 9 जनवरी 2020 को सचिव राजस्व हाई कोर्ट की खंडपीठ के समक्ष समस्त दस्तावेजों सहित पेश हों।

यह भी पढ़ें : सिखों के पहले गुरु के पवित्र स्थान की स्थापना के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग, केंद्र, उत्तराखंड और यूपी सरकार को नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशू धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने हरिद्वार में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी की स्थापना के मामले में भारतीय पुरातत्व विभाग के निदेशक सहित केंद्र, उत्तराखंड और यूपी सरकार को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।
मामले के अनुसार उत्तराखंड सिख फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष गुरुदेव सिंह सहोता ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव के हरिद्वार में पहली बार आने पर तत्कालीन लंढौरा नरेश ने अपनी हवेली में ज्ञान गोदड़ी का आयोजन किया था। गुरु नानक के आगमन पर हरकी पैड़ी में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी के लिए जगह आवंटित की थी। 1976 तक गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी इसी स्थान पर थी। उस समय तत्कालीन सरकार ने हरकी पैड़ी के सौंदर्यीकरण के दौरान ज्ञान गोदड़ी को पुनः उसी स्थान पर स्थापित करने का आश्वासन देते हुए वहां से हटा दिया था। लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर व सिखों के पवित्र चिह्न को अभी तक वहां स्थापित नहीं किया जा सका। 2001 में मामले की शिकायत राष्ट्रीय अल्प संख्यक आयोग से की गई। आयोग के निर्देश पर हरिद्वार के तत्कालीन डीएम ने गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी की स्थापना के लिए जगह का चयन कर शासन को भेजा। जांच में यह स्थान यूपी सरकार के अधिकार क्षेत्र में पाया गया। इस संदर्भ में आयोग से दोबारा शिकायत करने पर आयोग ने दोनों सरकारों के मुख्य सचिवों को गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी के लिए भूमि आवंटित करने को कहा, लेकिन प्रकरण में अभी कार्रवाई नहीं हो पाई है। मामला अभी लंबित है। याचिकाकर्ता ने इस ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने को इसे करतारपुर कॉरिडोर की तर्ज पर विकसित करने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : अवमानना याचिका पर अल्मोड़ा के एक अधिकारी हाईकोर्ट में तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने अल्मोड़ा जनपद के जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक को न्यायालय के आदेशों का पालन न करने पर 18 दिसम्बर को न्यायालय में पेश होने के आदेश दिए हैं।

नियमित रूप से नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड के समाचार अपने फोन पर प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारे टेलीग्राम ग्रुप में इस लिंक https://t.me/joinchat/NgtSoxbnPOLCH8bVufyiGQ से एवं ह्वाट्सएप ग्रुप से इस लिंक https://chat.whatsapp.com/ECouFBsgQEl5z5oH7FVYCO पर क्लिक करके जुड़ें।

मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी 87 वर्षीय कमला देवी ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि फरवरी 2018 में उच्च न्यायालय ने जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक अल्मोड़ा को आदेश दिया था कि सहायक अध्यापक पद से 1985 में सेवानिवृत्त एवं 2010 में दिवंगत हुए उनके पति स्वर्गीय घनश्याम नेगी की बढ़ी हुई पेंशन का भुगतान वास्तविक तिथि से 9 फीसदी ब्याज सहित करें। उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग ने याची को बढ़ी हुई पेंशन का भुगतान तो किया लेकिन ब्याज का भुगतान नहीं किया। इसके खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई थी।

यह भी पढ़ें : 10 हैक्टेयर से कम क्षेत्रफल के वनों को वन न मानने के आदेश पर हाईकोर्ट ने सरकार को दिया झटका..

-आदेश पर लगाई रोक, दो जनवरी तक जवाब मांगा
नवीन समाचार, नैनीताल, 10 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड हाइकोर्ट ने दस हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनो को वन नही मानने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार के 21 नवम्बर 2019 के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार से 2 जनवरी 2020 तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : 10 हेक्टेयर से छोटे वन क्षेत्र को वन न मानने के आदेश पर केंद्र व राज्य सरकार को नोटिस

-नैनीताल निवासी विनोद पांडे ने दायर की है याचिका, आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध एवं अपने लोगों को लाभ पहुंचाने का उपक्रम बताया
-कहा-कार्यालयी आदेश होने के कारण यह लागू नहीं किया जा सकता है
-गैर श्रेणीगत वन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 6 दिसंबर 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन के न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार के 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनों को वन नही मानने के ताजा-गत 21 नवंबर के आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य व के केंद्र सरकार से 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई दो जनवरी की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार नैनीताल निवासी विनोद कुमार पांडे ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 21 नवम्बर 2019 को उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण अनुभाग ने एक आदेश जारी कहा है कि उत्तराखंड में 10 हेक्टेयर से कम या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वन क्षेत्र वाले वनों को उत्तराखंड में लागू राज्य एवं केंद्र की वर्तमान विधियो के अनुसार वनों की श्रेणी में नही रखा जा सकता है या उनको वन नही माना जा सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह आदेश एक कार्यालयी आदेश है, इसलिए यह लागू नही किया जा सकता है। क्योंकि न ही यह शासनादेश है, और न ही यह राज्य मंत्रिमंडल से पारित है। सरकार ने इसे अपने लोगां को फायदा देने के लिए जारी किया है। उनका यह भी कहना है कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित है, जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया हुआ है। परंतु इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको किसी भी श्रेणी में घोषित नही किया गया है। याची ने इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल करने और इनके दोहन या कटान पर भी रोक लगाने की मांग की है। याची का यह भी कहना है कि सर्वोच्च ने 1996 के गौडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार मामले में अपने आदेश में कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो, उनको वनों की क्षेत्र के श्रेणी में रखा जाएगा और वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं है। सरकार का यह आदेश इस और इंगित करता है कि ऐसे क्षेत्रों का दोहन कर अपने लोगों को लाभ पहुँच सके।

यह भी पढ़ें : सड़क चौड़ीकरण के लिए हाईकोर्ट के आदेश का भय दिखाकर भवनों को तोड़ने पर डीएम सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस

-याचिका में लगाया गया है उच्च न्यायालय के आदेशों के गलत तरीके से प्रयोग का आरोप
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शुधांशू धुलिया की एकलपीठ ने ऊधमसिंह नगर के डीएम नीरज खैरवाल, सितारगंज के एसडीएम निर्मल बिष्ट व अधिशाषी अभियंता केके तिलारा को न्यायालय के आदेश का गलत प्रयोग करने पर अवमानना का नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने उनसे सुनवाई की अगली तिथि 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार सितारगंज निवासी अधिवक्ता दयानंद व 2 अन्य ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि पूर्व में न्यायालय ने रुद्रपुर के रम्पुरा ग्राम सभा के प्रधान मनमोहन सिंह की जनहित याचिका में राज्य में सार्वजनिक स्थानों, गलियो व सड़कों में हुए अतिक्रमण को चिन्हित करने के लिए जिला स्तर पर कमेटियां गठित करने के निर्देश सभी जिला अधिकारियों को दिए थे। इन कमेटियो में राजस्व विभाग के अधिकारियों को भी शामिल करने तथा तीन माह के भीतर पूरे प्रदेश में हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा गया था। साथ ही याचिकाकर्ता को निर्देश दिए थे कि वह सभी जिला अधिकारियो को इसमें पक्षकार बनाए। परंतु ऊधमसिंह नगर प्रशासन द्वारा न्यायालय के आदेश की अनदेखी करके सितारगंज में रोड का चौड़ीकरण के नाम पर आवासीय व व्यवसायिक दुकानों को तोडा जा रहा है और इसका विरोध करने पर उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया जा रहा है। जबकि न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा है कि प्रदेश में कहीं भी अतिक्रमण हुआ है तो इसकी जांच करके रिपोर्ट न्यायालय में पेश की जाए। परंतु प्रशाशन के द्वारा इस आदेश का गलत प्रयोग किया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक कुलपति की नियुक्ति की निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने दून विश्वविद्यालय के कुलपति डा. सीएस नौटियाल की नियुक्ति को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने सरकार को जल्द नई सर्च कमेटी गठित कर नियमों के तहत नए कुलपति की नियुक्ति करने के आदेश भी दिए हैं। मामले की सुनवाई में हुई।

उल्लेखनीय है कि देहरादून निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक यज्ञ दत्त शर्मा ने इस मामले में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि देहरादून विवि के कुलपति डा. नौटियाल ने अपनी नियुक्ति के लिए तैयार किए गए बायोडाटा में गलत तथ्य दिए हैं। जबकि उनके पास शिक्षण का 10 वर्ष का अनुभव ही नहीं है। सीएसआईआर ने इस मामले में छूट के कोई आदेश भी पारित नहीं किए हैं। इसलिए वे कुलपति पद के योग्य नहीं हैं, और उनकी नियुक्ति यूजीसी और सीएसआईआर के नियमों के विरुद्ध है। बावजूद उन्हें तत्कालीन शिक्षा सचिव डा. रणवीर सिंह की पहल पर नियम विरुद्ध कुलपति के पद पर नियुक्ति मिली है। याचिका में कहा है कि कुलपति के चयन के लिए बनाई गई कमेटी भी नियमानुसार नहीं बनी है।

यह भी पढ़ें : ग्राम प्रधान पर 30 लाख के गबन का आरोप, हाई कोर्ट ने डीएम को दिये जांच के आदेश

-हरिद्वार डीएम को 9 दिसंबर तक जांच रिपोर्ट पेश करने के आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 18 नवंबर 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने रुड़की ग्राम पंचायत में विकास कार्यों में हुए घोटाले के मामले में सुनवाई करते हुए ग्राम प्रधान से 3 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने को कहा है साथ ही कोर्ट ने हरिद्वार के डीएम को मामले की निष्पक्ष जांच कर 9 दिसम्बर तक रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए है।
मामले के अनुसार रुड़की के सुल्तानपुर निवासी प्रमोद कुमार ने जनहित याचिका दायर कर रुड़की के साबतवाली तहसील की ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान द्वारा हैंडपम्प लगाने, स्ट्रीट लाइट, नालों की सफाई एवं खुदाई सहित अन्य विकास कार्यों के लिए जारी 30 लाख का गबन करने का आरोप लगाया है। साथ ही कहा है कि ग्राम प्रधान द्वारा जो विकास कार्य कराए गए है वह भी निम्न स्तर के हैं। लिहाजा याचिकाकर्ता ने सरकार द्वारा जारी वित्तीय बजट में हुए घोटाले की जांच कराने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड सरकार की डिजिटल कंपनी ने 14 हजार की जगह कर दिया 1 करोड़ का भुगतान

-इस कारण कई विभागों के कर्मचारियों का वेतन लटका, हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव से मांगा जवाब
नवीन समाचार, नैनीताल, 16 नवंबर 2019। उत्तराखंड राज्य में वित्तीय लेनदेन डिजिटल माध्यम से करने के लिये राज्य सरकार द्वारा अधिकृत की गई कम्पनी द्वारा वित्तीय अनियमितता किये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव से तीन हफ्ते के भीतर व्यक्तिगत शपथ पत्र पेश करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खण्डपीठ में हुई ।
मामले के अनुसार देहरादून की आरटीआई कार्यकर्ता सीमा भट्ट ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के निर्देशों के क्रम में राज्य सरकार ने शुरू में डिजिटल लेनदेन एनआईसी के माध्यम से किया। लेकिन बाद में इस कार्य हेतु टेंडर निकाला गया और जिस कम्पनी के नाम टेंडर हुआ वह ब्लैक लिस्ट हो गई। किंतु उसके बाद पुनः टेन्डर व अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बजाय सरकार ने एक अन्य कम्पनी को यह काम सौंप दिया। इस कम्पनी को पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों के लेनदेन की इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग करने का ज्ञान नहीं था। जिस कारण कम्पनी द्वारा बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार को एक व्यक्ति को 14 हजार का भुगतान करना था जिसे इस कम्पनी ने एक करोड़ का भुगतान कर दिया । इसी तरह कई विभागों के कर्मचारियों के खाते में एम माह के बजाय 3 माह का वेतन चले गया है।

यह भी पढ़ें : विद्युत विभागीय अधिकारियों-कर्मचारियों को अब नहीं मिलेगी मुफ्त की बिजली…

नवीन समाचार, नैनीताल, 14 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद यूपीसीएल यानी उत्तराखंड पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल अपने विभागीय कर्मचारियों व अधिकारियों को दी जाने वाली बिजली को सीमित करने जा रहा है। अब विद्युत विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों को फ्री में बिजली नहीं देगा। यूपीसीएल ने बृहस्पतिवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में शपथ पत्र के साथ यह जानकारी दी है। आगे उच्च न्यायालय ने सचिव ऊर्जा, पिटकुल व यूजेवीएनएल के अधिकारियों को बिजली के सभी ब्यौरे 25 नवम्बर तक पेश करने के आदेश दिए है।
उल्लेखनीय है कि मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में देहरादून के आरटीआई क्लब की जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। इसी मामले में बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट ने राज्य के ऊर्जा निगमों के अधिकारी और कर्मचारियों को सस्ती बिजली देने व आम जनता के लिए बिजली की दरों को बढ़ाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट में उत्तराखंड पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल ने शपथपत्र पेश कर कहा कि विभागीय कर्मचारियों व अधिकारियों को दी जाने वाली बिजली को सीमित किया जा रहा है और उनको अब फ्री में बिजली नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने पॉवर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड पिटकुल व यूपीसीएल के कार्मिकों को दी जा रही
वहीं याचिका में कहा गया है कि सरकार विद्युत विभाग में तैनात अधिकारियों से एक महीने का बिल मात्र 400 से 500 रुपए एवं अन्य कर्मचारियों से 100 रुपए ले रही है जबकि इनका बिल लाखों में आता है जिसका बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि तमाम अधिकारियों के घर बिजली के मीटर तक नहीं लगे हैं, जो लगे भी है, वह खराब स्थिति में हैं। उदारहण के तौर पर जनरल मैनेजर का 25 माह का बिजली का बिल 4 लाख 20 हजार आया था और उसके बिजली के मीटर की रीडिंग 2005 से 2016 तक नही ली गयी । कॉर्पोरेशन ने वर्तमान कर्मचारियों के अलावा रिटायर व उनके आश्रितों को भी बिजली मुफ्त में दी है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश घोषित है लेकिन यहां हिमांचल से महंगी बिजली है जबकि वहाँ बिजली का उत्पादन तक नही होता है।

यह भी पढ़ें : बिनसर वन्य जीव अभ्यारण्य के 7 होटलों-रेस्टोरेंटों के 13 को हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस..

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश के बिनसर वन्यजीव अभ्यारण अल्मोड़ा में सरकार की अनुमति के बिना चलाये जा रहे व निर्माणाधीन होटलों, रिजॉर्ट व रेस्टोरेंटो के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सिम्बा कैफे के मालिक सुरेंद्र सिंह मालिक, किरायेदार मुकेश भोज, हर्षवर्धन मेहरा व कमल सनवाल, कमल सनवाल-रेनबो रेस्टोरेंट, बिनसर फॉरेस्ट रिट्रीट के मालिक कुणाल सनवाल व प्रशांत सागर, राजेश ओझा, आदर्श पाम रिट्रीट के किरायेदार जी प्रीतम रेड्डी, मैरी बडन स्टेट के मालिक-साझेदार अश्विनी चोपड़ा व सीमा चोपड़ा, द ट्रीट आफ लाइफ ग्रांड ओक होटल की मालिक सिंधु गंगोला व प्रदीप गंगोला, खली स्टेट के मालिक हिमांशु पांडे, और नंदा देवी स्टेट के मालिक जोर्डन मिश्रा सहित 13 लोगों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी गौरव नैथानी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कुछ लोगो ने सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर प्रतिबंधित क्षेत्र विनसर वन्यजीव अभ्यारण अल्मोड़ा में अतिक्रमण कर होटल, रिसोर्ट व रेस्टोरेंट बना लिये है और कुछ बन रहे है इस पर रोक लगाई जाए। पूर्व में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से इनकी लिस्ट कोर्ट में देने को कहा था परंतु याचिकाकर्ता ने इनकी जानकारी नही होने पर कोर्ट ने सरकार से इनकी लिस्ट पेश करने को कहा था।

यह भी पढ़ें : नैनीताल के रैमजे अस्पताल की स्थिति पर स्पष्ट करे सरकार: हाईकोर्ट

Ramsey Hospital, Nainital

नवीन समाचार, नैनीताल, 8 नवंबर 2019। नैनीताल के मौजूदा जीबी पंत अस्पताल (ब्रिटिश कालीन अस्पताल रैमजे अस्पताल) के अस्तित्व को बचाने को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई है। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 नवम्बर को होगी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खण्डपीठ में हुई।
मामले के अनुसार तल्लीताल निवासी संतोष तिवारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि सरकार नैनीताल के ऐतिहासिक रैमजे अस्पताल के अस्तित्व को समाप्त करने जा रही है। इस अस्पताल के अधिकांश हिस्से में मुख्य चिकित्साधिकारी का कार्यालय बना दिया गया है। इधर सरकार ने अस्पताल में मरीजों की संख्या लगातार घटने पर इस अस्पताल को डिस्पेंसरी सेंटर बनाने का निर्णय लिया है। जबकि अस्पताल में मरीजों के घटने का कारण वहां डॉक्टरों का अभाव है। इस संदर्भ मे विभागीय अधिकारियों से पत्राचार किया गया। लेकिन उनकी ओर से इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं की गई। याचिकाकर्ता के अनुसार यह अस्पताल 1892 से संचालित है। जिसका हाल के वर्षों तक काफी नाम था। लेकिन सरकार ने इस अस्पताल को जानबूझकर बंदी की हालत में ला दिया है। हाईकोर्ट ने सरकार से इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनने वाले शौचालयों में मिलीं भारी अनियमितताएं, सरकार से जवाब तलब

-हरिद्वार के गांव में भ्रष्टाचार पर सरकार से जवाब तलब
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने हरिद्वार के रामबड़ेरी गांव में प्रधान और उनके पति द्वारा सरकार से आवंटित पैसों के खर्च में हुए भ्रष्टाचार के मामले में सरकार से सरकार से 15 नवंबर तक जवाब देने को कहा है। साथ ही पूछा है पुलिस द्वारा मामले कि जांच पर क्या कदम उठाए गए है। मामले की अगली सुनवाई 15 नवंबर को होगी।
मामले में मंगी राम सैनी ने उच्च न्यायालयमें जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हरिद्वार स्थित रामबड़ेरी राजपूताना के अंतर्गत 3 गांवों की प्रधान, उनके पति और गांव के पंचायत सदस्य द्वारा सरकार से आवंटित पैसों के खर्च में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार सामने आया है। इस संबंध में उन्होंने 2018 में प्रधान और प्रधान पति के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुआ। पता करने पर जानकारी मिली कि फाइल स्पेशल इन्वेस्टीगेशन स्कवॉड के दफ्तर में पड़ी है। उसके बाद जिलाधिकारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रत्यावेदन दिया और बताया कि हर व्यक्ति इससे प्रभावित हैं। जिलाधिकारी हरिद्वार ने एसएसपी हरिद्वार से किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मामले की जांच करने के लिए कहा। इसके बाद ममता बोरा ने सारे अभिलेखों का परीक्षण कर पाया कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनने वाले शौचालयों में भारी अनियमितताए की गईं और गाँव के कब्रिस्तान की दीवार की मरम्मत में भी निम्न स्तर की सामग्री लगायी गयी है। इसके साथ ग्राम प्रधान द्वारा चोरी से गांव की बिजली की लाइन से बिना अनुमति के कनेक्शन लिया गया।

यह भी पढ़ें : अच्छे चाल-चलन वाले कैदियों की सजा-मांफ रिहाई के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर

नवीन समाचार, नैनीताल, 5 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायाल ने हत्या के एक मामले में सितारगंज जेल में लगभग 16 वर्षों से आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीन कैदियों को अच्छा चाल-चलन होने पर उनकी सजा को माफ किए जाने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
मामले के अनुसार हत्या के मामले में लगभग 16 वर्ष से अधिक समय से सितारगंज जेल में बंद तीन आरोपी मोहम्मद उमर, सेवा सिंह व अमित राणा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उन्हें हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें 16 वर्ष से ज्यादा समय जेल में हो गए है और उनका चाल-चलन अच्छा है, इसलिए उनको जेल से मुक्त किया जाए। याचिका में कहा गया है कि सरकार की ओर से एक नीति भी बनाई जाए कि जिसमें उम्रकैद की सजा में 14 वर्षों से अधिक का समय जेल में बिताने वाले अच्छे चाल-चलन वाले कैदियों को जेल से रिलीज किया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि सीआरपीसी की धारा 432 और 433 में प्रावधान है कि यदि कैदियों का चाल-चलन अच्छा होगा तो उनके सजा को माफ कर दिया जाएगा। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

यह भी पढ़ें : EXCLUSIVE : ब्लॉक प्रमुख के संभावित प्रत्याशी की सीट से एक नामांकन का मामला हाईकोर्ट में, शुक्रवार को हो सकती है सुनवाई

याची गजेंद्र सिंह मेहरा

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 सितंबर 2019। नैनीताल जनपद के भीमताल विकास खंड के मंगोली-गहलना क्षेत्र पंचायत सीट के चुनाव का मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय के दर पर पहुच गया है। इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन कराने गए एक प्रत्याशी गजेंद्र सिंह महरा की याचिका को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। मामले की सुनवाई शुक्रवार को न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में दो नंबर पर सुनवाई के लिए लिस्ट भी हो गई है। बताया जा रहा है कि भीमताल ब्लॉक प्रमुख पद के एक प्रमुख प्रत्याशी इसी सीट से प्रत्याशी हैं।

नोट: पंचायत चुनाव में ‘सबसे सस्ते’ विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें हमारे मोबाइल-व्हाट्सएप नंबर 8077566792 अथवा 9412037779 पर

याची गजेंद्र सिंह मेहरा का कहना है कि वह मंगोली-गहलना क्षेत्र पंचायत सीट से नामांकन कराने के लिए आखिरी तिथि 24 सितंबर की निर्धारित समय सीमा के भीतर अपराह्न चार बजे से पहले निर्वाचन अधिकारी के कक्ष में अपना नामांकन कराने गए थे। उन्हें कक्ष के भीतर बुलाया भी गया। वहां उनसे निर्वाचन अधिकारी ने उनके नामांकन के प्रपत्र लिये और उनकी जांच की। इस दौरान भी याचिकाकर्ता कक्ष के भीतर था। लेकिन इसी बीच निर्वाचन अधिकारी ने चालाकी से याची को कक्ष से बाहर भेज दिया और दूसरे दरवाजे से बताया गया कि उनके नामांकन पर कार्रवाई चल रही है। बाद में उन्हें दुबारा कक्ष में बुलाया गया और उनसे नामांकन प्रपत्र फिर से लिये गये और उन पर ‘नॉट अलाउड 4.35’ यानी नामांकन प्रपत्र 4.35 बजे पहुंचने के लिए नामांकन पत्र अस्वीकार होना लिख दिया गया। उल्लेखनीय है कि याची भी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता है। उनका कहना है कि इस बाबत उनके पास वीडियो फुटेज भी मौजूद हैं कि निर्वाचन अधिकारी ने ही समय खर्च कर उनके नामांकन पत्र जमा करने के समय को निर्धारित 4 बजे से आगे बढ़ाया।

यह भी पढ़ें : विद्यालय प्रबंधन को सदस्य बनाने से इनकार करने पर नोटिस..

-आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली के प्रबंधन को नोटिस
नवीन समाचार, नैनीताल, 21 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट के अशासकीय विद्यालय आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली के प्रबंधन को याचिकाकर्ता को सदस्यता देने से इंकार करने के आदेश पर रोक लगाते हुए अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता जयप्रकाश कांडपाल ने आदर्श इंटर कॉलेज सुरईखेत बिठोली में प्रबंध समिति की साधारण सभा के सदस्य बनने हेतु आवेदन किया, जिसे अस्वीकार कर दिया। इस पर कांडपाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि उन्होंने विद्यालय प्रबन्ध समिति की साधारण सभा का सदस्य बनने हेतु आवेदन किया था और नियमानुसार विद्यालय में बैंक ड्राफ्ट भी जमा कराया था, जिसे प्रबन्ध समिति की बैठक में रखे बगैर एवं एजुकेशन एक्ट 2000 के तहत प्रक्रिया पूरी किये बिना याचिकाकर्ता को अवैधानिक रूप से लौटा दिया गया। इस पर न्यायालय ने याची के आवेदन को अस्वीकार करने वाले मैनेजर के पत्र को स्थगित करते हुए पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीसरे बच्चे पर मिलने वाले लाभों पर दिया बड़ा व दूरगामी महत्व का निर्णय

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 सितंबर 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए एकलपीठ के तीसरे बच्चे के लिये भी महिलाओं को मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत अवकाश देने के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत के आदेश के बाद अब राज्य की सेवाओं में कार्यरत महिलाओं को तीसरा बच्चा होने पर मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत अवकाश नहीं मिलेगा। मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी नर्स उर्मिला मसीह को तीसरी संतान पर मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत लाभ नहीं दिया गया तो उसने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में नियमों का हवाला देते हुए नर्स ने कहा कि सरकार का नियम संविधान के अनुच्छेद-42 के मूल-153 तथा मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा-27 का उल्लंघन करता है। वर्ष 2018 में एकलपीठ ने इस अधिनियम को अवैधानिक घोषित कर दिया था। एकलपीठ के इस आदेश को सरकार ने विशेष अपील दायर कर चुनौती दी। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में सरकार की ओर से सीएससी परेश त्रिपाठी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-42 भाग चार अर्थात नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है, जिसको लागू करने के लिए याचिका दायर नहीं की जा सकती। मातृत्व लाभ अधिनियम राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, जबकि निजी क्षेत्र तथा सरकार की कंपनियों में कार्यरत महिलाओं पर लागू होता है। खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद सरकार की विशेष अपील स्वीकार करते हुए एकलपीठ का आदेश निरस्त कर दिया।

पूर्व समाचार : अब तीसरे बच्चे पर भी मिलेगा मातृत्व अवकाश

-हाईकोर्ट ने सिर्फ दो बच्चों पर दिए जा रहे मातृत्व अवकाश का नियम किया खारिजनैनीताल: हाईकोर्ट ने दो से अधिक बच्चों के पैदा होने पर मातृत्व लाभ नहीं देने संबंधी प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद अब तीसरे बच्चे पर भी महिला को मातृत्व अवकाश दिया जाएगा। इस फैसले से राज्य की हजारों महिला कार्मिक लाभान्वित होंगी। सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) हल्द्वानी में कार्यरत स्टाफ नर्स उर्मिला मैसी ने 2015 में पांच माह के लिए मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया तो विभाग ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति देने का नियम नहीं है। इसके बाद उर्मिला ने याचिका के माध्यम से उत्तर प्रदेश मौलिक नियम-153 को चुनौती दी। इसी नियम को उत्तराखंड सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है। इस नियम के तहत दो से अधिक बच्चों वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित किया गया है। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने शुक्रवार को मामले को सुनने के बाद तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नियम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा-27 के प्रावधान के साथ ही संविधान के अनुच्छेद-42 की भावना के विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि जब कोई प्रावधान इस कानून के प्रावधानों से मेल नहीं खाता तो उस स्थिति में अधिनियम के प्रावधानों को तरजीह दी जाएगी। साथ ही कहा कि सरकार के प्रावधान अनुच्छेद-42 की भावना के खिलाफ नहीं होने चाहिए। कोर्ट ने रुकसाना बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने इसी तरह पंजाब सिविल सेवा नियम के एक नियम को खारिज कर दिया था, क्योंकि तीसरे बच्चे के होने पर मातृत्व लाभ देने से मना किया गया था। यहां बता दें कि राज्य में करीब डेढ़ लाख सरकारी कार्मिकों में 75 हजार के करीब महिलाएं हैं। विशेषकर स्वास्थ्य विभाग, बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग में महिला कार्मिक अधिक हैं। यह भी उल्लेख किया गया है कि मातृत्व अवकाश रेगुलर कर्मी के साथ ही संविदा, आउट सोर्स व दैनिक रूप से कार्यरत महिला को देय है।

यह भी पढ़ें : भाजपा विधायक कर्णवाल को जाति प्रमाण पत्र का मामला पूरी तरह से निस्तारित..

वीन समाचार, नैनीताल, 12 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्र के मामले में प्रस्तुत उनके सभी प्रमाण पत्रों में किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं होने की बात स्वीकार कर ली है और कह दिया है कि उनके सभी प्रमाण पत्र वैध हैं। यानी ही उनके जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देने वाली याचिका को निस्तारित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में न्यायालय ने उनके जाति प्रमाण पत्रों की जांच कराने के लिए एक कमेटी गठित कर उसकी जाँच कराने के आदेश राज्य सरकार को दिए थे। जिस पर आज सरकार ने जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश की।

यह भी पढ़ें : भाजपा विधायक का दावा-जाति प्रमाण पत्र मामले में उन्हे क्लीन चिट

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 सितंबर 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्रों को चुनौती देने वाली हरिद्वार के विपिन तोमर की जनहित याचिका में सुनवाई हुई और सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखी है। पूर्व में कोर्ट ने उनके जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए एक कमेटी गठित कर जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था। सरकार द्वारा कोर्ट को अवगत कराया गया कि उनके जाति से सम्बंधित प्रमाण पत्रों की जाँच पूरी हो चुकी है। इस सम्बन्ध में आज देशराज कर्णवाल ने प्रेस वार्ता में कहा कि शासन द्वारा इस संबंध में अपने आदेश दिनांकित 22 अगस्त 2019 के जरिए शासन स्तर पर अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जाति प्रमाण पत्र स्क्रुटनी कमेटी का गठन किया गया जिसने इस प्रकरण में गहनता से जांच की और सभी आरोपों पर दोनों पक्षों को विस्तार पूर्वक सुना गया।
शासन स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी की 7 सितंबर 2019 को हुई बैठक में इस प्रकरण में धैर्य पूर्वक दोनों पक्षों को विस्तार से सुना। शिकायतकर्ताओं द्वारा मुख्यतः यह आरोप लगाया गया कि कर्णवाल उत्तराखंड के मूल निवासी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के मूल निवासी हैं। वर्ष 2005 में उनको जारी जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने की मांग की गई। इन आरोपों के प्रत्युत्तर में श्री देशराज कर्णवाल के अधिवक्ता द्वारा स्क्रूटनी कमेटी को अवगत कराया गया कि श्री देशराज कर्णवाल वर्ष 1984 से ही अपनी माता व भाई के साथ वर्तमान हरिद्वार जिले में निवास करने लगे थे तथा तब से ही वह लगातार हरिद्वार जिले में रह रहे हैं, और अनेक वर्षों से सामाजिक व राजनीतिक रूप से हरिद्वार जिले में ही सक्रिय हैं। अपने तर्कों के समर्थन में उनके द्वारा वर्ष 1984 में कर्णवाल की माता के द्वारा किया गया किरायानामा प्रस्तुत किया गया तथा अन्य साक्ष्य इस संबंध में प्रस्तुत किए गए जिनमें मुख्यतः वर्ष 1997 में जिला सेवायोजन कार्यालय हरिद्वार में कराए गए पंजीकरण के साक्ष्य सम्मिलित हैं जिसमें स्पष्ट रूप से कर्णवाल का नाम अनुसूचित जाति के अभ्यर्थी के रूप में दर्ज है। जिला सेवायोजन कार्यालय द्वारा यह भी अवगत कराया गया है कि उनके कार्यालय में केवल उसी अभ्यार्थी का नाम पंजीकृत किया जा सकता है जो हरिद्वार जिले का स्थाई निवासी हो जिससे यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 1997 में भी कर्णवाल हरिद्वार जिले के स्थाई निवासी थे। इसके साथ ही कर्णवाल के अधिवक्ता द्वारा कमेटी को बताया गया कि प्रस्तुत प्रकरण पहले भी राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्णित किया जा चुका है जिसमें राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्र के संबंध में की गई शिकायतों को निराधार बलहीन पाया था । इन तथ्यों के साथ-साथ अन्य अनेक तथ्य भी कमेटी के सामने रखे गए जिनसे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि यह शिकायतें पूरी तरह निराधार हैं।
दिनांक 7 सितंबर 2019 को दोनों पक्षों को विस्तार पूर्वक सुनने के बाद स्कूटनी कमेटी द्वारा अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया गया था और कल दिनांक 9 सितंबर 2019 को शासन स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी द्वारा अपना निर्णय घोषित किया गया जिसमें कमेटी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि श्री देशराज कर्णवाल को वर्ष 2005 में जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध है, तथा उनके द्वारा इस जाति प्रमाण पत्र को प्राप्त करने में किसी तरह का कोई आपराधिक कृत्य नहीं किया गया है।

Leave a Reply

Loading...
loading...
google.com, pub-5887776798906288, DIRECT, f08c47fec0942fa0

ads

यह सामग्री कॉपी नहीं हो सकती है, फिर भी चाहिए तो व्हात्सएप से 9411591448 पर संपर्क करें..