News

बहुचर्चित भाजपा विधायक पर लटकी थी गिरफ्तारी की तलवार, हाईकोर्ट ने लगाई रोक

यहाँ से दोस्तों को भी शेयर करके पढ़ाइये
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

नवीन समाचार, नैनीताल, नैनीताल, 19 अक्टूबर 2020। यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म मामले में फंसे उत्तराखंड के द्वाराहाट से भाजपा विधायक महेश नेगी को उच्च न्यायालय से बड़ी राहत बहुचर्चित भाजपा विधायक पर लटकी थी गिरफ्तारी की तलवार, हाईकोर्ट ने लगाई रोकमिली है। न्यायमूर्ति एनएस धानिक की एकलपीठ ने पीड़ित महिला को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है, और विधायक की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट अब सभी मामलों की सुनवाई एक साथ करेगा।हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में फंसे भाजपा विधायक की गिरफ्तारी पर लगाई राेक।
उल्लेखनीय है कि इसी साल अगस्त माह में एक महिला ने विधायक महेश नेगी पर दुष्कर्म का आरोप लगाकर प्रदेश की सियासत को गर्मा दिया था। महिला ने गत पांच सितंबर को देहरादून में नेहरू कॉलोनी पुलिस थाने में दी अपनी तहरीर में आरोप लगाया था कि वह अपनी मां की बीमारी के इलाज के सिलसिले में विधायक से मिली थी। आगे विधायक ने साल 2016 से उसके साथ नैनीताल, दिल्ली, मसूरी तथा देहरादून आदि अलग-अलग स्थानों पर कथित तौर पर दुष्कर्म किया। महिला ने दावा किया था कि विधायक से उसकी एक बच्ची भी है और उसका डीएनए टेस्ट कर सत्यता का पता लगाया जा सकता है। इस पर विधायक के खिलाफ नेहरू कॉलोनी थाने में दुष्कर्म और धमकी के मामले में 376 और 506 पर मुकदमा दर्ज किया था। इस मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए नेगी हाईकोर्ट पहुंचे थे। उधर पीड़िता ने भी हाईकोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे के मामले में याचिका दायर की थी। जबकि विधायक की पत्नी रीता नेगी ने भी महिला पर अपने पति को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाते हुए नेहरू कॉलोनी पुलिस थाने में एक मुकदमा दर्ज कराया था। रीता ने आरोप लगाया है कि महिला उनके पति को बदनाम कर रही है और पांच करोड़ रुपए मांग रही है।

यह भी पढ़ें : हल्द्वानी की रामलीला का विवाद 10 सप्ताह में निस्तारित करने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 29 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने रामलीला कमेटी हल्द्वानी के चुनाव को लेकर दायर याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता से इस संदर्भ में सक्षम अधिकारी के समक्ष दो हफ्ते के भीतर प्रत्यावेदन देने तथा सक्षम अधिकारी से 10 हफ्ते के भीतर इस मामले में नियमानुसार निर्णय लेने को कहा है।
मामले के अनुसार देवलचौड़ खाम हल्द्वानी निवासी अमित कबडवाल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर जिलाधिकारी नैनीताल के सितंबर 2019 में पारित आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में जिलाधिकारी ने रामलीला कमेटी को भंग कर उसके अधिकार सिटी मजिस्ट्रेट हल्द्वानी को दे दिए थे। मामले में अधिक समय बीत जाने पर न्यायालय ने उक्त आदेश पर विचार नहीं किया। किंतु याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि रामलीला कमेटी के चुनाव 2016 से नहीं हुए हैं।

यह भी पढ़ें : शौचालयों में लाखों का घोटाला, हाईकोर्ट ने की रिपोर्ट तलब

-केंद्र सरकार की योजनाओं में लाखों के घोटाले के आरोप में राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब
नवीन समाचार, नैनीताल, 24 सितंबर 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सितारगंज में केंद्र सरकार के ‘स्वछ भारत अभियान’ और ‘स्वजल परियोजना’ का दुरुपयोग करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से एक सप्ताह में शपथ पत्र के साथ रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ में हुई।
मामले के अनुसार सितारगंज निवासी निखिलेश गिरामी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सितारगंज के ग्राम अरविंद नगर में 2014 से 2019 में सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय बनाने के लिए दी जाने वाली धनराशि सहित बोरिग करने की स्वीकृति दी थी। इस कार्य में ग्राम प्रधान और बीडीओ ने लाखों रुपए का घोटाला किया है। इस योजना में गरीब परिवारों के लिए 371 शौचालय व अन्य सुविधाएं स्वीकृत हुई थींे लेकिन दोनों की मिलीभगत से यह कार्य पूर्ण नही किया गया और अपने स्तर से कार्य पूर्ण होने का फर्जी सर्टिफिकेट दे दिया गया। याचिका में याचिकाकर्ता ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग की है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने फिर तलब की छात्रवृत्ति घोटाले की पूरी जांच रिपोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्रदेश के बहुचर्चित छात्रवृत्ति घोटाले के मुख्य आरोपी गीता राम नौटियाल की बहाली करने के बाद फिर उस आदेश को वापस लिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य सचिव को चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है। मामले मंे बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि छात्रवृत्ति घोटाले में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा रही है। इस पर पीठ ने पूरी जाँच रिपोर्ट के साथ जवाब पेश करने को कहा।
मामले के अनुसार गीताराम नौटियाल ने याचिका दायर कर कहा कि छात्रवृत्ति घोटाले में नाम आने के बाद विभाग ने उन्हें निलंबित कर दिया था और उच्च न्यायालय की ओर से 10 दिसंबर, 2019 को उन्हें जमानत मिल गई थी। इसके बाद उन्हें सेवा में बहाल कर दिया गया, लेकिन बहाली के कुछ दिन बाद सरकार की ओर से उन्हें फिर से निलंबित कर दिया गया। उनका कहना है कि बहाली के उपरांत बिना कारण बताये उनकी बहाली वापस ले ली गई, इस प्रकार उनके खिलाफ भेदभाव किया जा रहा है। उनका दावा है कि उच्च न्यायलय ने उन्हें दोष मुक्त किया है। इस आधार पर उनकी सेवा बहाली की जाये।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड शासन को झटका: आईएफएस अधिकारी का निलंबन आदेश निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 सितंबर 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने निलंबित किये गए आईएफएस व चम्पावत के पूर्व डीएफओ अशोक कुमार गुप्ता का निलंबन आदेश निरस्त कर दिया है।
आईएफएस गुप्ता का 2017 में लेनदेन के मामले का ऑडियो वायरल हुआ था। गुप्ता के भ्रष्टाचार, वित्तीय, प्रसाशनिक व अनियमितता की वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी द्वारा जांच की गई तो आरोप सही पाए गए। इसी साल सात फरवरी को प्रमुख सचिव वन आनंद वर्धन द्वारा जांच रिपोर्ट के आधार पर गुप्ता को निलंबित कर दिया था। गुप्ता ने एक माह में आरोप पत्र नहीं मिला तो बहाली के लिए प्रत्यावेदन दिया और इसके बावजूद बहाल नहीं किये जाने पर गत अगस्त माह में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा तो सरकार द्वारा बताया गया कि गुप्ता को अखिल भारतीय अनुशासन व अपील नियमावली 1969 के प्रावधान 3(3) के तहत निलंबित किया गया है। जबकि प्रमुख सचिव के आदेश में नियमावली के प्रावधान 3(1) के तहत कार्रवाई का उल्लेख था। इस आधार पर खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद निलंबन आदेश निरस्त कर दिया।

यह भी पढ़ें : अमेरिकी मां व उत्तराखंडी पिता के विवाद में उच्च न्यायालय ने दिये अंतरिम आदेश…

-कोरोना को देखते हुए दिसंबर तक पिता के साथ रहेगा बच्चा
नवीन समाचार, नैनीताल, 31 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की विशेष खंडपीठ ने अलग रह रहे देहरादून निवासी पति एवं अमेरिकी मूल की पत्नी के बीच बेटे को साथ रखने के विवाद में कोविड-19 को देखते हुए दिसंबर तक बच्चा पिता के साथ ही रखने और सप्ताह में कम से कम दो बार या संभव होने पर रोज बच्चे की मां से बात कराने के अंतरिम आदेश जारी किए हें। मामले में अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होगी। उल्लेखनीय है कि इस मामले में अमेरिकी महिला ने बेटे को अपने साथ अमेरिका ले जाने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।
मामले के अनुसार देहरादून में अर्पण मणि ने वर्ष 2011 में अमेरिकी मूल की महिला जुलिया माई सालो से शादी की, और दोनों थाईलैंड में रहते थे। बाद में दोनों में विवाद होने पर पति अपने बेटे को लेकर देहरादून लौट आया। इस पर महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और कोर्ट से मांग की उसको अपने बच्चे को अपने साथ अमेरिका ले जाने की अनुमति दी जाए। मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद दोनों पति-पत्नी अपने विवाद निपटाने की राह में भी आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : फर्जी दस्तावेजों से नौकरी पाये करीब साढ़े तीन हजार अध्यापकों पर फिर लटकी तलवार..

-हाईकोर्ट ने मामले में सरकार से दो दिन में जवाब तलब
नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमुर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने प्राइमरी व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति पाए करीब साढ़े तीन हजार अध्यापकों के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से दो दिन के भीतर जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त की तिथि नियत की है। उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने पिछली तिथि को सरकार से पूछा था कि कितने अध्यापकों के खिलाफ कार्यवाही की गई और वे कौन से अधिकारी हैं जिन्होंने यह कृत्य किया है। उनके खिलाफ सरकार ने क्या कार्यवाही की है। इस पर दो सप्ताह में इसका जवाब देने को कहा था।
मामले के अनुसार स्टूडेंट वेलफेयर सोसायटी हल्द्वानी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य के प्राइमरी व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में करीब साढ़े तीन हजार अध्यापक जाली दस्तावेजों के आधार पर फर्जी तरीके से नियुक्त किये गए हैं। जिनमें से कुछ अध्यापकों की एसआईटी जांच की गई जिनमंे खचेड़ू सिंह, ऋषिपाल व जयपाल के नाम सामने आए, परंतु विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इनको क्लीन चिट दी गयी और ये अभी भी कार्यरत हैं। संस्था ने इस प्रकरण की एसआईटी से जाँच करने को कहा है। पूर्व में राज्य सरकार ने अपने शपथपत्र पेश कर कहा था कि इस मामले की एसआईटी जांच चल रही है अभी तक 84 अध्यापक जाली दस्तावेजो के आधार पर फर्जी पाए गए हैं उन पर विभागीय कार्यवाही चल रही है।

यह भी पढ़ें : जनहित के नाम पर व्यक्तिगत हित की जनहित याचिका दायर करने पर याचिकाकर्ता को हो सकता है एक लाख का जुर्माना, 19 तक मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 06 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका को व्यक्तिगत हित के लिये दायर की गई मानते हुए याचिका कर्ता से पूछा है कि उनके इस कृत्य के लिए क्यों न उन पर एक लाख का जुर्माना लगाया जाए ? याचिकाकर्ता को इस सम्बन्ध में अगली सुनवाई की तिथि 19 अगस्त तक जबाव देने को कहा गया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकने की जिम्मेदारी भी न्यायालय की है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी दलवीर सिंह ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि मसूरी के मेसोनिक लॉज, कैम्पटी फॉल रोड में कार पार्किंग का कार्य 2011 से अब तक पूरा नहीं हुआ है। लेकिन याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट के संज्ञान में आया कि इस पार्किंग का कार्य आदेश 22 फरवरी 2020 को जारी हुआ है, और यह याचिका ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए दाखिल हुई है। लिहाजा इसमें कोई जनहित नहीं बल्कि याचिकाकर्ता का व्यक्तिगत हित है। इस पर खंडपीठ ने याचिका को व्यक्तिगत हित का मानते हुए याचिकाकर्ता से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : 400 करोड़ की चर्चित शाही शादी के मामले में आया हाईकोर्ट का फैसला

-औली में शीतकालीन खेलों के अलावा हर गतिविधि पर रोक लगाए सरकार: हाईकोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 27 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ती सुधांशू धूलिया व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने प्रदेश की सबसे बड़ी चर्चित शाही शादी के मामले में अहम फैसला सुनाते पर्यटन सचिव उत्तराखंड को एक कमेटी गठित कर पर्यावरण को हुए नुकसान को नियंत्रित करने के साथ औली में हो रही गतिविधियों पर नजर रखने के निर्देश दिये हैं। खंडपीठ ने यह भी साफ कहा है कि औली में सर्दियों में खेल गतिविधियों के अलावा किसी भी प्रकार की अन्य गतिविधियों पर सरकार रोक लगाए, ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
मामले के अनुसार काशीपुर निवासी अधिवक्ता रक्षित जोशी ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि उत्तराखंड के औली बुग्याल में 18 से 22 जून तक के बीच करीब 400 करोड़ रुपये से गुप्ता बंधुओं के बेटों की शादी का आयोजन हुआ, जिसमें मेहमानों को लाने ले जाने के लिए करीब 200 हेलीकॉप्टरों की व्यवस्था की गई और इन हेलीकॉप्टरों से पर्यावरण और बुग्यालों और क्षेत्र में रहने वाले जंगली जानवरों को भी खतरा होगा। याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि राज्य सरकार द्वारा नैनीताल हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा दिए गए पूर्व के आदेश की अनदेखी की जा रही है, जिसमें उच्च न्यायालय ने पहाड़ी क्षेत्रों व बुग्यालों आदि में किसी भी प्रकार की गतिविधि में प्रतिबंध लगाया गया था।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड सरकार को बडी राहत, भाजपा सांसद द्वारा दायर की गयी याचिका हाईकोर्ट से खारिज

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने उत्तराखंड सरकार के देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए निस्तारित कर दिया हैं। उल्लेखनीय है कि इस याचिका को दायर करते हुए स्वामी ने बाकायदा मुख्यालय में पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपनी पूर्व की ऐसी ही याचिकाओं पर न्यायालयों के आये आदेशों का हवाला देते हुए कहा था कि उच्च न्यायालय उत्तराखंड सरकार के इस अधिनियम को यूं ही खारिज कर देगा। लेकिन मामले में उल्टे स्वामी को उच्च न्यायालय से बड़ी मात और उत्तराखंड सरकार को बड़ी राहत मिली है। अलबत्ता तीर्थ पंडितों का रुख उच्च न्यायालय के इस फैसले पर क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी।
इस मामले में रूलक संस्था के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने बताया कि उच्च न्यायालय ने माना है कि राज्य सरकार के चार धाम प्रबंधन अधिनियम 2019 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 व 31ए का उल्लंघन नहीं माना है। वहीं उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिनियम में दो बदलाव करने को भी कहा है, जिसके अनुसार मंदिरों का स्वामित्व अधिनियम के तहत देवस्थानम बोर्ड में नहीं रहेगा, बल्कि चार धाम का होगा। बोर्ड मंदिरों का केवल प्रबंधन देखेगा। उन्होंने उच्च न्यायालय के इस फैसले को मील का पत्थर बताते हुए कहा कि पीठ ने यह भी कहा कि केरल सरकार एवं पद्मनाभ मंदिर के मामले से इस मामले में कोई समानता नहीं है।
मामले के अनुसार भाजपा के राज्य सभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा चारधाम के मंदिरों के प्रबंधन को लेकर लाया गया देवस्थानम् बोर्ड अधिनियम असंवैधानिक है। देवस्थानम् बोर्ड के माध्यम से सरकार द्वारा चारधाम व 51 अन्य मंदिरों का प्रबंधन लेना संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 का उल्लंघन है। पूर्व में तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल व महाराष्ट्र आदि राज्यों ने भी इस तरह के निर्णय लिए थे। जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णय पहले से ही आ चुके हैं। उन्होंने अपनी जनहित याचिका में यह भी प्रार्थना की है कि जब तक इसमें कोर्ट से कोई निर्णय नही आ जाता सरकार कोई अग्रिम कार्यवाही न करे। उल्लेखनीय है कि सरकार ने इस जनहित याचिका के दायर होने के कुछ ही समय बाद सीईओ नियुक्त कर दिया था। इस तरह इस मामले में भाजपा सांसद व भाजपा सरकार के बीच टकराव भी साफ नजर आता रहा है। कोर्ट ने पिछले छह जुलाई को मामलों को सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया था। 

यह भी पढ़ें : भाजपा सरकार व भाजपा सांसद के टकराव में अब अगले सप्ताह हो सकता है कुछ खास

-देव स्थानम बोर्ड मामले में अगली सुनवाई सप्ताह भर बाद
नवीन समाचार, नैनीताल, 22 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने भाजपा के राज्य सभा सांसद व सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रहमण्यम स्वामी द्वारा चारधाम देवस्थानम बोर्ड के गठन के खिलाफ दायर जनहित याचिका में सुनवाई की, और अगली सुनवाई के लिए एक सप्ताह के बाद की तिथि नियत कर दी है। इसके बाद माना जा रहा है कि भाजपा सरकार और एक भाजपा सांसद के बीच टकराव के इस मामले में अगले सप्ताह कुछ खास हो सकता है।

बिग ब्रेकिंग: एक कर्मी के कोरोना पॉजिटिव निकलने के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट बंद

यह भी पढ़ें : लॉक डाउन के दौरान विद्यालय में अतिक्रमण कर किया गया अवैध निर्माण, हाईकोर्ट हुआ सख्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 जून 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन ने न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने देहरादून के करनपुर में मंगला देवी कन्या इंटर कालेज और चिल्ड्रन एकेडमी के मध्य लॉक डाउन के दौरान स्कूल की पार्किंग में अतिक्रमण कर निर्माण कार्य किये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता से स्कूल प्रबंधक को पक्षकार बनाकर जिला अधिकारी व स्कूल प्रबंधक से चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार करनपुर निवासी मोहम्मद राशिद ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि स्कूल प्रबंधन की मिली भगत से लॉक डाउन का उल्लंघन करते हुए स्कूल की पार्किंग में अतिक्रमण कर निर्माण कार्य किया जा रहा है।यह भी कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन में साफ तौर से कहा है कि सार्वजनिक स्थानों, पार्किंग व स्कूलो में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य नही किये जायेंगे बावजूद स्कूल की पार्किंग पर अतिक्रमण कर नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किया गया है, लिहाजा सभी दोषियों पर कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।

यह भी पढ़ें : चिदानंद मुनि से सम्बंधित मामले में वन भूमि से अवैध कब्जाधारियों को हटाने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जून 2020। उत्तरखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने हरिद्वार से 14 किलोमीटर आगे राजाजी नेशनल पार्क के भीतर कुनाउ गाव में वन भूमि में हो रहे भारी निर्माण कार्य के सम्बन्ध में दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से वहाँ रह रहे अवैध कब्जाधारियों को हटाकर एक जुलाई तक रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने के आदेश दिये हैं। पीठ ने कहा कि वन भूमि में किसी भी तरह का कब्जा नहीं किया जा सकता है। आज सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि मुनि चिदानंद के नाम पर वहां की कोई भी भूमि रिकॉर्ड में नहीं है, तथा वहां रहने वाले 36 परिवारों की लीज भी पहले ही समाप्त हो चुकी
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हरिद्वार से 14 किलोमीटर आगे राजाजी नेशनल पार्क के कुनाउ गाव में वन भूमि पर चिदानंद मुनि द्वारा वन चौकी के आंखों के सामने 2006 से भारी निर्माण कार्य किया जा रहा है। इसके बावजूद वन विभाग कोई कार्यवाही नही कर रहा है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि इस निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाये और दोषी लोगों के खिलाफ कार्यवाही की जाये।

यह भी पढ़ें : चिदानंद मुनि से सम्बंधित मामले में 24 घंटे में रिपोर्ट हाईकोर्ट में तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 जून 2020। उत्तरखंड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने हरिद्वार से 14 किलोमीटर आगे राजाजी नेशनल पार्क के भीतर वन भूमि में हो रहे भारी निर्माण कार्य के सम्बन्ध में दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से वहाँ रह रहे समस्त लोगो की जानकारी 19 जून शुक्रवार को कोर्ट में पेश करने के आदेश दिये हैं। बृहस्पतिवार को सुनवाई पर राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया कि वहाँ पर 36 परिवार लीज समाप्त होने के बाद भी रह रहे हैं।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हरिद्वार से 14 किलोमीटर आगे राजाजी नेशनल पार्क के कुनाउ गाव में वन भूमि पर चिदानंद मुनि द्वारा वन चौकी के आंखों के सामने 2006 से भारी निर्माण कार्य किया जा रहा है। इसके बावजूद वन विभाग कोई कार्यवाही नही कर रहा है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि इस निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाये और दोषी लोगों के खिलाफ कार्यवाही की जाये।

एमकेपी में यूजीसी के 45 लाख रुपए के घोटाले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 जून 2020। उत्तराखण्ड हाइकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने महादेवी कन्या पाठशाला में यूजीसी के बजट के 45 लाख रुपये के गबन पर घोटाले की उच्च स्तरीय जांच करने हेतु राज्य सरकार को निर्देश देते हुए जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।
मामले के अनुसार एमकेपी की पूर्व छात्रा सोनिया बेनीवाल के द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 2012-2013 में हुए 45 लाख रुपए के गबन के मामले पर राज्य सरकार, यूजीसी और तत्कालीन सचिव जितेंद्र नेगी और प्राचार्य डॉ. किरन सूद को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिए थे। यूजीसी की यह 45 लाख रुपए की ग्रांट एमकेपी में छात्राओं की शिक्षा में सहूलियत के लिए जारी की गई थी। इसी ग्रांट से 2012-2013 के दौरान एप्पल के महंगे उपकरण खरीदने में दर्शाया गया परंतु ऐसे कई उपकरण 2019 तक के परीक्षण में पाए ही नहीं गए। इस तरह की कई अन्य अनियमितताएं भी प्रकाश में आईं।

यह भी पढ़ें : बिना अनुमति चल रहे प्लांट के निर्माण पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक, ग्रामीण ने परसों ही विरोध में की थी महासभा

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने हल्द्वानी के हल्दूचौड़ जयराम गांव में लग रहे स्क्रीनिंग संयंत्र के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बुधवार को संयंत्र के निर्माण पर रोक लगा दी है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में ग्रामीण और जनप्रतिनिधि विगत कई दिनों से विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। मंगललवार को भी ग्रामीणों ने इसके विरोध में महासभा की थी।
इस मामले में हल्दूचौड़ निवासी पूरन चंद्र दुम्का की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने यह निर्देश जारी किए हैं। सुनवाई के दौरान पीसीबी की ओर से अदालत को बताया गया कि प्लांट के निर्माण व संचालन को लेकर किसी प्रकार की कोई अनुमति जारी नहीं की गयी है। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि गांव में मानकों के विरुद्ध आबादी के बीच में स्क्रीनिंग प्लांट का निर्माण किया जा रहा है। प्लांट के निर्माण में निर्धारित मानकों का उल्लंघन किया जा रहा है। जबकि प्रतिवादी पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि वे निर्धारित मानकों के तहत प्लांट का निर्माण कर रहे हैं। हालांकि वे अदालत में प्लांट के निर्माण को लेकर पीसीबी की ओर से जारी अनुमति पत्र नहीं दिखा पाए। अलबत्ता उन्होंने कहा कि प्लांट के निर्माण व संचालन के लिए पीसीबी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया है।

यह भी पढ़ें : सरकार द्वारा प्रदेश की नदियों में नियम विरुद्ध मशीनों से खनन की अनुमति देने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार ने भी की ‘तौबा’

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 जून 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने प्रदेश के पर्वतीय व भाभर क्षेत्र-बाजपुर, कोटद्वार व विकास नगर में नदियों पर हो रहे जबरदस्त अवैध खनन तथा पर्यावरण मंत्रालय केंद्र सरकार की खनन नियंत्रण व खनन के इलेक्ट्रॉनिक सर्वेक्षण और मॉनिटरिंग गाइडलाइंस 2016 व 2020 का राज्य में अनुपालन न किए जाने और सरकार द्वारा मशीनों से खनन की अनुमति देने को लेकर गंभीरता से लिया है। प्रदेश के नदियों में मशीनों द्वारा किये जा रहे अनियंत्रित खनन के विरूद्ध दायर हल्द्वानी निवासी दिनेश चंदोला की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आज सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने अपर मुख्य सचिव खनन, निदेशक खनिकर्म, प्रबंध निदेशक उत्तराखंड वन विकास निगम, आयुक्त कुमाऊँ, आयुक्त गढ़वाल, जिलाधिकारी पौड़ी, जिलाधिकारी देहरादून, जिलाधिकारी नैनीताल, जिलाधिकारी यूएस नगर को नोटिस जारी कर अवैध खनन पर तीन सप्ताह में विस्तृत शपथपत्र दायर करने के लिए कहा है। साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय उपमहानिदेशक वन देहरादून तथा उपनिदेशक भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण उत्तर क्षेत्र को भी नोटिस जारी किया है और पूछा है कि राज्य की नदियों में अनियंत्रित खनन से पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में क्या सर्वे अपेक्षित हैं।
इधर आज राज्य सरकार द्वारा कोर्ट को बताया गया कि वह नदी तल क्षेत्रों के खनन पट्टों में मशीनों द्वारा खनन की दी गयी अनुमति को 15 जून के बाद बिल्कुल आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। याचिकाकर्ता का कहना है कि 13 मई 2020 को अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश द्वारा प्रदेश के नदियों में खनन हेतु मशीनों के प्रयोग हेतु अनुमति दी गयी है जो 2017 कि खनन नियमावली के विपरीत है। 2017 की नियमावली में कहा गया है कि नदियों में चुगान हेतु मशीनों के प्रयोग की अनुमति नही होगी परंतु सरकार ने इस नियमावली के विपरीत जाकर मशीनों के प्रयोग हेतु अनुमति दे दी जो नियमावली के विरुद्ध है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मशीनों का प्रयोग करने से नदियों के प्रवाह को मोड़ दिया गया है जिससे आबादी वाले क्षेत्रों में वरसात में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो रही है। पानी का स्तर नीचे चला गया है और पर्यावरण को भी भारी नुकसान हो रहा है। लिहाजा मशीनों के प्रयोग पर रोक लगाई जाये।

यह भी पढ़ें : ठेकेदारी और जनप्रतिनिधित्व साथ-साथ नहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष पर विभागीय कार्रवाई को हाईकोर्ट ने दी छूट

नवीन समाचार, नैनीताल, 09 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशू धुलिया की एकलपीठ ने बागेश्वर की जिला पंचायत अध्यक्ष बसंती देव की याचिका को खारिज करते हुए सरकार को उनके खिलाफ नियमानुसार कार्यवाही की छूट दे दी है। एकलपीठ उनकी गलत याचिका के लिये जुर्माना भी लगा रही थी किंतु याचिकाकर्ता के अनुरोध पर जुर्माना नहीं लगाया गया ।
मामले के अनुसार लोनिवि के मुख्य अभियंता देहरादून ने 15 मई 2020 को बसंती देव का ए श्रेणी के सरकारी ठेकेदारी पंजीकरण उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 के अनुसार रद्द किया था। बसंती देव ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर उनके ठेकेदारी के पंजीकरण को लोनिवि द्वारा रद्द करने के आदेश को चुनौती दी थी। इस अधिनियम में जिला पंचायत अध्यक्ष को लोक सेवक की श्रेणी में माना है जो सरकारी ठेके नहीं ले सकता। सुनवाई में एकलपीठ ने माना कि याचिकाकर्ता को जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाने के तुरंत बाद सरकारी ठेकेदार का रजिस्ट्रेशन रद्द किये जाने हेतु विभाग में आवेदन देना चाहिये था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और यदि जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने सरकारी कामों में ठेकेदारी जारी रखी है तो शासन उनके खिलाफ नियमानुसार कार्यवाही को स्वतंत्र है। कोर्ट ने उनकी याचिका जुर्माने के साथ खारिज की। लेकिन याचिकाकर्ता के अनुरोध पर कोर्ट ने जुर्माना नहीं लगाया।

यह भी पढ़ें : यूपी के बाहुबली विधायक सहित राज्य सरकार को हाईकोर्ट का नोटिस

नवीन समाचार, देहरादून, 28 मई 2020। यूपी के बहुचर्चित विधायक अमनमणि त्रिपाठी को लॉकडाउन के दौरान बद्रीनाथ व केदारनाथ जाने के लिये विशेष पास जारी किये जाने के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुवे राज्य सरकार, विधायक अमनमणि त्रिपाठी व उसके अन्य 10 साथियों को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा है कि भारत सरकार की ओर से राज्यों को लॉकडाउन का पूर्ण पालन कराने के आदेश के बावजूद किन परिस्तिथियों में विधायक को सरकार ने विशेष पास जारी किया।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की गई है, जबकि राज्य सरकार ने सीबीआई जांच की आवश्यकता से इंकार किया है।

यह भी पढ़ें : यूपी के बाहुबली विधायक के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट में CBI जांच की मांग, सरकार ने कहा-जरूरत नहीं

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 मई 2020। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी के विधायक पुत्र अमन मणि त्रिपाठी के लाकडाउन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिवंगत पिता के पितृकर्म के नाम पर बद्रीनाथ तक का पास जारी करने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। देहरादून के आलोक घिल्डियाल की पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग संबंधी याचिका पर शुक्रवार को उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश खुल्बे की खंडपीठ में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को याचिका में उन अधिकारियों को पक्षकार बनाने को कहा, जो इसमें शामिल रहे। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी।
आज सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से याचिका को खारिज करने योग्य करार देते हुए कहा कि इस मामले में उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में विधायक व उनके साथियों के खिलाफ मामला दर्ज हो चुका है और यह केस सीबीआई को सौंपे जाने योग्य नहीं है। विधायक व साथियों को चमोली जिले के कर्णप्रयाग से ही लौटा दिया गया था। उल्लेखनीय है कि विधायक अमनमणि व साथियों को दो से सात मई तक का पास जारी किया गया था और उनके पास बाकायदा उत्तराखंड के अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश और देहरादून के अपर जिलाधिकारी रामजी शरण के हस्ताक्षर से जारी अनुमति पत्र भी थे। उनके काफिले को चमोली जिले के कर्णप्रयाग में पुलिस ने रोका और कर्णप्रयाग के उप जिलाधिकारी ने नियम बताने की कोशिश की तो उनसे अभद्रता की गई। इस मामले में विपक्ष ने मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव और देहरादून के डीएम सहित कुछ और अफसरों पर अमनमणि त्रिपाठी को पास जारी करने को लेकर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड सरकार की खूब घेराबंदी की। वहीं उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते ही विधायक को साथियों समेत गिरफ्तार किया गया था।

यह भी पढ़ें : अधिवक्ताओं को कोरोना राहत के लिए चाहिए हर माह 10 हजार, किराये-बच्चों की फीस से छूट व आर्थिक पैकेज..

-अधिवक्ताओं की ओर से हाईकोर्ट में हुई याचिका दायर
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 अप्रैल 2020। देशव्यापी लॉकडाउन के कारण अधिवक्ताओं को हुए आर्थिक नुकसान से राहत पैकेज देने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई है।
देहरादून निवासी अधिवक्ता मनमोहन कंडवाल व अन्य ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि करीब एक माह से न्यायिक कार्य बंद होने से कई अधिवक्ताओं के सामने रोजी रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। इसलिये ऐसे अधिवक्ताओं को सरकार मार्च, अप्रैल व मई माह में दस हजार व पंजीकृत अधिवक्ता क्लर्कों को 5 हजार रुपए प्रति माह राहत राशि दी जाए। साथ ही याचिका में कहा गया है कि मकान मालिकों से किराया माफ कराया जाये और निजी स्कूलों से अधिवक्ताओं के बच्चों से तीन माह की फीस न लेने के आदेश दिए जाएं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं को कोर्ट आने जाने के लिए वाहन पास की सुविधा देने की भी अपील की गई है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार से पूछा-रबी की फसल के कटान के लिए क्या गाइड लाइन है ?

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को पहली बार वीडियो कांफ्रंेंसिंग के माध्यम से जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कोरोना की महामारी में किसानों को हो रही दिक्कतों से संबंधित जनहित याचिका पर केंद्र व राज्य सरकार से पूछा है कि रबी की फसल के कटान के लिए क्या गाइड लाइंन है। कोर्ट ने पूछा है कि किसानों की रबी की फसल की खरीद राज्य सरकार सामाजिक दूरी बनाते हुए कर सकती है। इस प्रकरण पर कोर्ट ने सरकार को 18 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार ‘इन री इन द मैटर आफ वेलफियर आफ पुअर फारमर’ के नाम से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने कहा है कि महामारी के दौरान किसानों की रबी की फसल पक चुकी है, लेकिन लॉकडाउन के कारण उनको इसकी कटाई व बेचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में कहा कि उनकी फसल बर्बाद हो रही है और उनको इस दौरान आर्थिक मंदी झेलनी पड़ रही है। याचिकाकर्ता की ओर से रबी की फसल के कटान व बेचने के लिए राज्य सरकार को उचित व्यवस्था करने हेतु निर्देशित किए जाने की मांग भी की गई है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को 18 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : चारधाम देवस्थानम बोर्ड में गंगोत्री धाम को भी शामिल करने पर सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। उत्तराखंड हाइकोर्ट ने चारधाम देवस्थानम बोर्ड में गंगोत्री धाम को भी शामिल करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते हुए बोर्ड के सीईओ को नोटिस जारी कर सरकार से चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है । मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमुर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। 
खण्डपीठ ने इस मामले को चारधाम देवस्थानम से जुड़ी सुब्रह्मण्यम की जनहित याचिका के साथ जोड़ दिया है। मामले के अनुसार मंदिर समिति गंगोत्री धाम ने  हाइकोर्ट ने याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने चारधामो के साथ गोंगोत्री धाम को भी सामील कर दिया है जो न्यायबिरुद्ध है क्योंकि यहाँ के पुजारी लोगो वर्षो से पूजा करते आये है और यह स्थानीय लोगो की आस्था के विरुद्ध है। इसे चारधाम देवस्थामन बोर्ड में शामिल नही किया जाय।

यह भी पढ़ें : मिलेगी राहत ! हाईकोर्ट ने कहा-वीआईपी दौरे के दौरान अधिक समय के लिए न करें यातायात व्यवस्था को बाधित…

नवीन समाचार, नैनीताल, 28 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने वीआईपी दौरे के दौरान पुलिस और प्रशासन की ओर से समय से काफी पूर्व यातायात व्यवस्था रोकने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एसएसपी नैनीताल को व्यवस्थाएं व्यवस्थित करने व कम समय के लिए यातायात व्यवस्था को बाधित करने के निर्देश दिए हैं, और जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट के अधिवक्ता डॉ. चंद्रशेखर जोशी ने कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि वीआईपी दौरे के दौरान पुलिस तथा प्रशासन की ओर से यातायात व्यवस्था को कई घंटे बाधित किया जाता है। इसके चलते कई जरूरी कार्य प्रभावित होते हैं। घंटों यातायात रोके जाने पर लोगों के जरूरी कामकाज बाधित होते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अनुरोध किया गया है कि वीआईपी दौरे पर कम से कम समय के लिए यातायात व्यवस्था को बाधित किया जाए। वहीं सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि देश में वीआईपी सेवा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री को दी जाती है। उनकी सुरक्षा को देखते हुए दौरे के दौरान कुछ समय के लिए यातायात व्यवस्था को बाधित किया जाता है। मामले को सुनने के बाद कोर्ट ने कम समय के लिए यातायात व्यवस्था को बाधित करने के निर्देश दिए। 

यह भी पढ़ें : न्याय देवता के मंदिर के पुजारी सहित अन्य को हाई कोर्ट से दस्ती नोटिस देने के निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने अल्मोड़ा के चितई के न्याय देवता-गोलू देवता के मंदिर में जागेश्वर की तर्ज पर प्रबंधन समिति या ट्रस्ट बनाए जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 मार्च की तिथि नियत करते हुए डीएम को से पूछा है कि वे ये बताएं कि इस संबंध में 2018 में जो जांच की गई है उस रिपोर्ट में क्या हुआ। पूर्व में कोर्ट ने पुजारियों को याचिका में पक्षकार बनाने के निर्देश दिए थे। जिसके क्रम में उन्हें पक्षकार बनाया गया। बृहस्पतिवार को सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को पुजारी संतोष पंत, हरि विनोद पंत, प्रकाश पंत व कमल पंत को दस्ती नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।
मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नैनीताल निवासी अधिवक्ता दीपक रूबाली ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहाथा कि चितई गोलज्यू के मंदिर में हर वर्ष लाखों का चढ़ावा आता है। याचिका में कहा कि मंदिर के पुजारी और उनका परिवार ही इस चढ़ावे की धनराशि लेते है। याचिकाकर्ता की ओर से चितई गोलज्यू के मंदिर को ट्रस्ट बनाने की मांग की थी। इसी प्रकरण पर पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में हस्तक्षेप प्रार्थना पत्र दायर कर कहा था कि वह गोलज्यू से संबंधित मामले में अपना पक्ष कोर्ट में रखेगें। उन्होंने कोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर कर अगल से खाता खुलवाने की मांग की है। दायर प्रार्थना पत्र में मंदिर में अनियमितताओं की जांच सहित चढ़ावे और दान की जांच कराने की मांग की थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 मार्च की तिथि नितय करते हुए याचिकाकर्ता को दस्ती नोटिस देने के निर्देश दिए।
हिन्दुस्थान समाचार/लता नेगी

यह भी पढ़ें : केंद्रीय अवर सचिव हाईकोर्ट में हुए पेश, कोर्ट नहीं हुई संतुष्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के क्रम में केंद्रीय अंडर सेक्रेटरी परिवहन सुदीप दत्ता सोमवार को कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उत्तराखंड परिवहन निगम के उत्तर प्रदेश पर बकाया करीब सात सौ करोड़ दिलाने के मामले में एक माह के भीतर दोनों राज्यों के सचिवों की बैठक बुलाएंगे। किंतु कोर्ट उनके इस जवाब पर पर संतुष्ट नहीं हुई और इस आशय का प्रार्थना पत्र पेश करने के निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 मार्च की तिथि नियत कर दी। उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने केंद्रीय अपर सचिव के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार एक ओर कर्मचारियों को समय पर वेतन-भत्ते न देकर हड़ताल करने पर मजबूर करती रही है। दूसरी ओर उनके खिलाफ एस्मा लगाने जा रही है। सरकार व परिवहन निगम न तो अस्थायी कर्मचारियों को नियमित कर रहै हैं और न ही उनको नियमित वेतन ही दिया जा रहा है। यदि सरकार उत्तर प्रदेश पर बकाया अपनी धनराशि ही वापस ले ले तो उनकी समस्याओं का समाधान हो जाये।

यह भी पढ़ें : ब्रेकिंग: केंद्रीय अंडर सेक्रेटरी के खिलाफ हाईकोर्ट ने जारी किया वारंट

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई की। मामले में आज केंद्रीय परिवहन अंडर सेकेट्री को व्यक्तितगत रूप से पेश होना था परन्तु वे पेश नही हुए इस पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया। कोर्ट ने उनसे 24 फरवरी को कोर्ट में सवा दस बजे पेश होने को कहा है साथ मे एसएसपी नैनीताल को कहा है कि कोर्ट के आदेश का पालन कराएं। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार उनके खिलाफ एस्मा लगाने जा रही है जो नियम विरुद्ध है। सरकार उन लोगों को हड़ताल करने पर मजबूर करती आई है। सरकार व परिवहन निगम न तो उनको नियमित कर रही है, न उनको नियमित वेतन दिया जा रहा है, न उनको पिछले चार साल से ओवर टाइम दिया जा रहा है। यूनियन की ओर से कहा गया है कि उनको समय पर वेतन नही दिया जा रहा है, सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनके देयक नहीं दिए जा रहे है। पिछले चार वर्षों से कर्मचारियो को ओवर टाइम काम नही दिया जा रहा है न ही उनको रेगुलर किया जा रहा है। सरकार व निगम हमेशा बजट का रोना रोते हैं जबकि स्थिति यह है कि निगम का 2002 से उत्तर प्रदेश पर 700 करोड़ और निगम का आपदा के समय का 69 करोड़ रुपया सरकार के पास बकाया है। फिर भी सरकार व निगम के पास अपने कर्मचारीयो को वेतन नही देने के लिए बजट नही है। मामले में सुनवाई 2 जुलाई को हो सकती है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने नियुक्ति के लिए जारी विज्ञप्ति पर लगाई रोक..

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ अल्मोड़ा के एडम्स गर्ल्स स्कूल के प्रधानाचार्य पद के लिए जारी विज्ञप्ति पर रोक लगाते हुए सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
मामले के अनुसार अल्मोड़ा निवासी प्रीति लाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विद्यालय प्रबंधन द्वारा प्रधानाचार्य पद के लिए जारी की गई विज्ञप्ति को चुनौती देते हुए कहा कि एडम्स गर्ल्स स्कूल प्रबंधन की ओर से प्रधानाचार्य पद के लिए 30 मार्च 2019 को विज्ञापन जारी किया था। इसमें प्रधानाचार्य पद के लिए उम्मीदवारी करने के लिए ईसाई महिला होने के साथ ही मेथोडिस्ट होने की अर्हता भी निर्धारित की गई थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता हरेंद्र बेलवाल ने कोर्ट को बताया कि इससे संबंधित नियमावली के अनुसार कहीं भी प्रधानाचार्य के लिए मेथोडिस्ट होने की अनिवार्यता नहीं है। इसलिए याचिकाकर्ता की ओर से जारी विज्ञप्ति को निरस्त करने की मांग की थी। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अल्मोड़ा के एडम्स गर्ल्स स्कूल के प्रधानाचार्य पद के लिए जारी विज्ञप्ति पर रोक लगाते हुए सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
https://navinsamachar.com

Leave a Reply

loading...