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बलियानाला में भूस्खलनों का 1898 से जारी है लंबा इतिहास, तब 28 ने गंवाई थी जान, जानें यहां भूस्खलनों का पूरा इतिहास

-1934-35, 1972 व 2004 में भी हुए बड़े भूस्खलन, अंग्रेजों के दौर के हुए बचाव कार्य अभी भी सुरक्षित, पर हालिया 2005 के कार्य पूरी तरह क्षतिग्रस्त
-इधर 2018 व 2021 में भी हुए बड़े भूस्खलन
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 3 अगस्त 2022। नैनीताल भूकंपीय संवेदनशीलता के दृष्टिकोण से जोन-4 में आता है, जैसे जिस तरह शहर के आधार बलियानाला से लेकर नगर के मुकुट आल्मा व नैना पहाड़ियों पर बड़े भूस्खलन लगातार होते रहे हैं, उससे नगर की भूगर्भीय संवेदनशीलता अपने जोन के दूसरे शहरों के मुकाबले कहीं अधिक है। नैनीताल में 1841 में बसासत के बाद से ही भूस्खलनों के साथ मानो चोली-दामन का साथ रहा है। यहां 1866 व 1879 में आल्मा पहाड़ी में बड़े भूस्खलनों से इनकी आहट शुरू हुई और 18 सितंबर 1880 को वर्तमान रोपवे के पास आए महाविनाशकारी भूस्खलन ने उस दौर के केवल ढाई हजार की जनसंख्या वाले नगर में 108 भारतीयों व 41 ब्रितानी नागरिकों सहित 151 लोगों को जिंदा दफन कर दिया था।

वहीं 17 अगस्त 1898 को बलियानाला क्षेत्र में आया भूस्खलन नगर के भूस्खलनों से संबंधित इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी दुर्घटना बनी। इस दुर्घटना में 27 भारतीयों व एक अंग्रेज सहित कुल 28 लोग मारे गए थे। इधर बलियानाला में बीती 2 अगस्त 2022 की रात्रि तथा इससे पहले 12 सितंबर 2017, 20 अक्टूबर 2021 व 23 अक्टूबर 2021 को हुए ताजा भूस्खलनों के बाद यहां पूर्व में हुए और कमोबेश हर वर्ष होने वाले भूस्खलनों की कड़वी यादें फिर हरी हो गयी हैं। देखें बलियानाला में 2 अगस्त 2022 को हुए भूस्खलन की ताजा वीडियो:

देखें 23 अक्टूबर 2021 हुए भूस्खलन की ताजा वीडियो:

देखें इससे पहले 20 अक्टूबर 2021 को हुए भूस्खलन का विडियो : 

नगर को इन भूस्खलनों के खतरों से बचाने के लिए बनी हिल साइड सेफ्टी कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 1898 के भूस्खलन की घटना की पृष्ठभूमि में नौ अगस्त से 17 अगस्त तक नगर में हुई 91 सेमी बारिश कारण बनी थी। बारिश का बड़ी मात्रा में पानी यहां की चट्टानों में फंस गया था। आज भी इस क्षेत्र में भारी बसासत और नैनी झील के पानी के किसी न किसी रूप में रिसकर यहां जलश्रोत फूटने के रूप् में जारी है, जिसकी पुष्टि यहां खुले अनेक बड़े जल श्रोतों से होती है। 1898 के बाद भी बलियानाला क्षेत्र में 1935 तथा 1972 में बड़े भूस्खलन हुए, तथा इनके अलावा भी यह क्षेत्र लगातार बिना रुके धंसता ही जा रहा है। 1972 में हुआ भूस्खलन हरिनगर के तत्कालीन बाल्मीकि मंदिर के पास आया था।

स्थानीय पूर्व सभासद डीएन भट्ट बताते हैं कि इस घटना के बाद यूपी के तत्कालीन वित्त मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सुधार कार्यों के लिए 95 लाख रुपए स्वीकृत किए थे, तथा पूरे क्षेत्र को ‘स्लिप जोन’ घोषित कर दिया था। लेकिन गलती यह हुई कि उन्होंने इसकी डीपीआर बनाने का काम सिचाई विभाग को और बचाव कार्यों को लोनिवि को दिया। सिचाई विभाग ने डीपीआर बनाने में करी ब 30 वर्ष लगा दिए। 2004-05 में जब तक डीपीआर बनी और करीब 15 करोड़ रुपए आए, तब तक बलियानाला का घाव नासूर बन चुका था।

1972 की घटना के बाद गठित हुई ‘हाई लेवल एक्सपर्ट कमेटी’ ने बलियानाला को चैनल नंबर एक से दुर्गापुर-बीरभट्टी तक आरसीसी का आधार बनाकर इसे चैनल के रूप में विकसित करने की संस्तुति भी की थी। किंतु काम न होने से पैंसा आकर लैप्स हो गया। वहीं यूपी सरकार ने 2004-05 में बनी अपनी डीपीआर में 95 लाख की जगह तब तक बढ़ चुकी लागत के नुसार 26-27 करोड़ के प्रस्ताव बनाए, लेकिन इसके सापेक्ष उत्तराखंड बनने के बाद दो ‘बेड-बार’ व अन्य सुधारात्मक कार्यों के लिए करीब 15 करोड़ रुपए स्वीकृत व अमुक्त हुए, पर सिंचाई विभाग के द्वारा किए गए यह कार्य बिल्कुल भी नहीं टिके और ध्वस्त हो गए।

इधर 2004 में पुनः यहां बड़ा भूस्खलन हुआ तथा इसके बाद छोटे-बड़े अनेक भूस्खलन होते रहे। यह कार्य और भ्रष्टाचार को लेकर इन कार्यों की अब तक ठंडे बस्ते में पड़ी उच्च स्तरीय जांच भी हुई। अब मौजूदा हालात यह हैं कि अंग्रेजी दौर के बने ‘बेड-बार’ आज भी सुरक्षित हैं, जबकि बाद में बने 8 ‘बेड-बार’ व अन्य सुधानात्मक कार्यों के कहीं निशान ढूंढना भी मुश्किल है।

एमबीटी सहित कई भूगर्भीय भ्रंश बनाते हैं नैनीताल को खतरनाक
नैनीताल। नैनीताल के भूगर्भीय दृष्टिकोण से बेहद कमजोर होने के पीछे हिमालयी क्षेत्र के सबसे बड़े मेन बाउंड्री थ्रस्ट यानी एमबीटी सहित कई भ्रंश भूमिका निभाते हैं। एमबीटी नैनीताल के पास ही बल्दियाखान, ज्योलीकोट के पास नैनीताल के आधार बलियानाले से होता हुआ अमृतपुर की ओर गुजरता है। वहीं नैनीताल लेक थ्रस्ट सत्यनारायण मंदिर, सूखाताल से होता हुआ और नैनी झील के बीचों-बीच से गुजरकर शहर को दो भागों में बांटते हुए गुजरने वाला नैनीताल लेक थ्रस्ट तल्लीताल डांठ से ठीक बलियानाले से गुजरता है।

यूजीसी के वैज्ञानिक डा.बहादुर सिंह कोटलिया के अनुसार यह थ्रस्ट इतना अधिक सक्रिय है कि ज्योलीकोट के पास एमबीटी को काटते हुए उसे भी प्रभावित करता है। इसके अलावा एक छोटा मनोरा थ्रस्ट भी बलियानाला की संवेदनशीलता को बढ़ाता है। वहीं भूवैज्ञानिक डॉ. सीसी पंत के अनुसार नैना पीक तथा आल्मा पहाड़ी पर सात नंबर से बिड़ला तक का थ्रस्ट भी सक्रिय है। वहीं अन्य सक्रिय थ्रस्ट की वजह से गत 29 जुलाई को भवाली रोड पर भूस्खलन हुआ और यह सड़क बंद हो गई।

इस दशक में लगातार जारी हैं बलियानाला में भूस्खलन
नैनीताल। बलियानाला में 10 सितंबर 2014 को हुए भूस्खलन से जीआईसी से ब्रेवरी को जाने वाला सीसी पैदल मार्ग ध्वस्त हो गया था। आगे 10 सितंबर 2018 से इस क्षेत्र के रईश होटल व हरीनगर मोहल्लों में जबर्दस्त भूस्खलन हुआ, जिसके कारण 25 परिवारों के करीब 90 सदस्यों को जीआईसी, जीजीआईसी व जूनियर हाईस्कूल में अस्थाई तौर पर विस्थापित किया गया। इस बीच 30 सितंबर को सुबह करीब 11 बजे जीआईसी के खेल मैदान का एक हिस्सा भी भूस्खलन की भेंट चढ़कर बलियानाला में समा गया।

भूस्खलन का यह सिलसिला 2 अक्टूबर तक भी जारी रहा। आगे 22 अगस्त 2021 के आसपास भी यहां रईश होटल के मोड़ के पास सिपाही धारे के रास्ते के नीचे बड़ा और जीआईसी के फील्ड के पास छोटा भूस्खलन हुआ। इसके बाद 21 अक्टूबर तथा 23 अक्टूबर 2021 को दोपहर करीब 12 बजे से करीब 15-20 मिनट के अंतर में, खिली धूप के बीच पुराने रईश होटल के पास भूस्खलन हुआ है। इस दौरान पहले से ध्वस्त किए गए कई घर भी भरभराकर बलियानाले में समा गए थे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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नैनीताल में है अमेरिकी मिशनरियों द्वारा बनाया गया एशिया का पहला मैथोडिस्ट चर्च

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 नवंबर 2021। सरोवरनगरी को सर्वधर्म की नगरी भी कहा जाता है। यहां मल्लीताल स्थित ऐतिहासिक फ्लैट्स मैदान के चारों ओर सभी धर्मों के धार्मिक स्थल एक तरह से एक-दूसरे की बांहें थामे साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दिखाई देते हैं। यह स्थल हैं नगर की आराध्य देवी माता नयना का मंदिर, गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा, जामा मस्जिद, आर्य समाज मंदिर और मैथोडिस्ट चर्च।

इनमें खास है मैथोडिस्ट चर्च, जिसके बारे में बाहर के कम ही लोग जानते होंगे कि देश-प्रदेश के इस छोटे से पर्वतीय नगर में देश ही नहीं एशिया का पहला अमेरिकी मिशनरियों द्वारा निर्मित मैथोडिस्ट चर्च स्थित है। नगर के मल्लीताल में बोट हाउस क्लब के पास माल रोड स्थित मैथोडिस्ट चर्च को यह गौरव हासिल है। इस चर्च की स्थापना और इसके अमेरिकी मिशनरियों द्वारा एशिया में सबसे पहले स्थापित किए जाने की कहानी भी बड़ी रोचक है।

8 Best Places In Nainital From The Colonial Period | So Nainitalयह वह दौर था जब देश में 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम की क्रांति हो रही थी। मेरठ अमर सेनानी मंगल पांडे के नेतृत्व में इस क्रांति का अगुवा था, जबकि समूचे रुहेलखंड क्षेत्र में रुहेले सरदार अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हो रहे थे। इसी दौर में बरेली में शिक्षा के उन्नयन के उद्देश्य से अमेरिकी मिशनरी रेवरन बटलर पहुंचे। कहा जाता है कि रुहेले सरदारों ने उन्हें भी देश पर राज करने की नीयत से आए अंग्रेज समझकर उनके परिवार पर जुल्म ढाने शुरू किये। इससे बचकर बटलर अपनी पत्नी क्लेमेंटीना बटलर के साथ 1841 से शहर के रूप में विकसित होना प्रारंभ हो रहे नैनीताल आ गये। और यहां उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिये 1858 में नगर के पहले स्कूल के रूप में हम्फ्री कालेज (वर्तमान सीआरएसटी स्कूल) की स्थापना की, और इसके परिसर में ही बच्चों एवं स्कूल कर्मियों के लिये प्रार्थनाघर के रूप में चर्च की स्थापना की। तब तक अमेरिकी मिशनरी एशिया में कहीं और इस तरह चर्च की स्थापना नहीं कर पाऐ थे। इसलिए यह एशिया का पहला अमेरिकी मिशनरियों द्वारा स्थापित किया गया चर्च हो पाया।

बताते हैं कि तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नरी हेनरी रैमजे ने 20 अगस्त 1858 को चर्च के निर्माण हेेतु एक दर्जन अंग्रेज अधिकारियों के साथ बैठक की थी। चर्च हेतु हेनरी रैमजे के साथ रेवरन बटलर व हैम्फ्री ने मिलकर 1650 डॉलर में 25 एकड़ जमीन खरीदी, तथा इस पर 25 दिसंबर 1858 को चर्च की नींव रखी गई। चर्च का निर्माण अक्टूबर 1860 में पूर्ण हुआ। इसके साथ ही नैनीताल उस दौर में देश में ईसाई मिशनरियों के शिक्षा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र बन गया। अंग्रेजी लेखक जॉन एन शालिस्टर की 1956 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक ‘द सेंचुरी ऑफ मैथोडिस्ट चर्च इन सदर्न एशिया’ में भी नैनीताल के इस चर्च को एशिया का पहला चर्च कहा गया है। बताया जाता है कि रेवरन बटलर ने नैनीताल के बाद पहले यूपी के बदायूं तथा फिर बरेली में 1870 में चर्च की स्थापना की। उनका बरेली स्थित आवास बटलर हाउस वर्तमान में बटलर प्लाजा के रूप में बड़ा बाजार बन चुका है, जबकि देरादून का क्लेमेंट टाउन क्षेत्र का नाम भी संभवतया उनकी पत्नी क्लेमेंटीना के नाम पर ही है।

सेंट जॉन्स इन द विल्डरनेस: नैनीताल का सबसे पुराना चर्च

White Christmas @ St. Johns in the Wilderness (Protestant Church)

सेंट जॉन्स इन द विल्डरनेस चर्च नैनीताल का सबसे पुराना सूखाताल क्षेत्र में स्थित चर्च है। 1841 में नैनीताल में बसासत से शुरू होते ही नगर में अंग्रेजों के पूजास्थल के रूप में इस चर्च की स्थापना के प्रयास प्रारंभ हो गए थे। इस हेतु कुमाऊं के वरिष्ठ सहायक कमिश्नर जॉन हैलिट बैटन ने चर्च बनाने के लिए सूखाताल के पास इस स्थान को चुना। मार्च 1844 में कोलकाता के बिशप डेनियल विल्सन एक पादरी के साथ नैनीताल आए। विशप को चर्च के लिए चुनी गई इस जगह पर ले जाया गया तो उन्हें पहली नजर में यह जगह इतनी पसंद आ गई कि उन्हें यह जगह जन्नत जैसी लगी, इसलिए बिशप ने इस चर्च को नाम दिया ‘सेंट जॉन इन द विल्डरनेस, यानी ‘जंगल के बीच ईश्वर का घर’।

सेंट जोन्स इन द विल्डरनेस, नैनीताल

कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर जीटी लूसिंगटन के आदेश पर अधिशासी अभियंता कैप्टन यंग ने चर्च की इमारत का नक्शा बनाया। अक्टूबर 1846 में चर्च का नक्शा पास हुआ और विशप के कार्यकाल के 13 वर्ष पूरे होने के मौके पर 13 अक्टूबर 1846 को चर्च की इमारत का शिलान्यास हुआ। चर्च के शिलान्यास की पूरी कहानी एक कांच की बोतल में लिखकर बोतल को इमारत की बुनियाद में रख दिया गया। आगे चर्च की इमारत तो दिसंबर 1856 में बन कर तैयार हुई, परंतु इससे पहले ही 2 अप्रैल 1848 को निर्माणाधीन चर्च को पहले ही प्रार्थना के लिए खोल दिया गया। चर्च के निर्माण में 15 हजार रुपए खर्च हुए।

1860

यह धनराशि 1807 में चंदे के रूप में जुटाई गई वहां मौजूद कमरों के किराए से जुटाई गई। चंदे से जुटाए गए 360 रुपए से रुड़की के कैनाल फाउंड्री से चर्च के लिए पीतल का घंटा भी बनवाया गया, जिसमें लिखा गया-एक आवाज-शून्य में चिल्लाना। 18 सितंबर 1880 को नैनीताल में हुए प्रलयंकारी भूस्खलन में 43 यूरोपियन सहित 151 लोग मारे गए। इनमें से कुछ को चर्च में लगे कब्रिस्तान में दफनाया गया और इस भूस्खलन में मौत के मुंह में समा गए यूरोपियन नागरिकों की याद में चर्च मे एक पीतल की पट्टी पर सभी यूरोपियन मृतकों के नामों का उल्लेख किया गया, जिसे आज भी यहां देखा जा सकता है।

नैनीताल का पौराणिक संदर्भः 

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 नवंबर 2021। पौराणिक इतिहासकारों के अनुसार मानसखंड के अध्याय 40 से 51 तक नैनीताल क्षेत्र के पुण्य स्थलों, नदी, नालों और पर्वत श्रृंखलाओं का 219 श्लोकों में वर्णन मिलता है। मानसखंड में नैनीताल और कोटाबाग के बीच के पर्वत को शेषगिरि पर्वत कहा गया है, जिसके एक छोर पर सीतावनी स्थित है। कहा जाता है कि सीतावनी में भगवान राम व सीता जी ने कुछ समय बिताया है। जनश्रुति है कि सीता सीतावनी में ही अपने पुत्रों लव व कुश के साथ राम द्वारा वनवास दिये जाने के दिनों में रही थीं। सीतावनी के आगे देवकी नदी बताई गई है, जिसे वर्तमान में दाबका नदी कहा जाता है। महाभारत वन पर्व में इसे आपगा नदी कहा गया है। आगे बताया गया है कि गर्गांचल (वर्तमान गागर) पर्वतमाला के आसपास 66 ताल थे। इन्हीं में से एक त्रिऋषि सरोवर (वर्तमान नैनीताल) कहा जाता था, जिसे भद्रवट (चित्रशिला घाट-रानीबाग) से कैलास मानसरोवर की ओर जाते समय चढ़ाई चढ़ने में थके अत्रि, पुलह व पुलस्त्य नाम के तीन ऋषियों ने मानसरोवर का ध्यान कर उत्पन्न किया था। इस सरोवर में महेंद्र परमेश्वरी (नैना देवी) का वास था।

सरोवर के बगल में सुभद्रा नाला (बलिया नाला) बताया गया है, इसी तरह भीमताल के पास के नाले को पुष्पभद्रा नाला कहा गया है, दोनों नाले भद्रवट यानी रानीबाग में मिलते थे। कहा गया है कि सुतपा ऋषि के अनुग्रह पर त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व महेश चित्रशिला पर आकर बैठ गये और प्रसन्नतापूर्वक ऋषि को विमान में बैठाकर स्वर्ग ले गये। गौला को गार्गी नदी कहा गया है। भीम सरोवर (भीमताल) महाबली भीम के गदा के प्रहार तथा उनके द्वारा अंजलि से भरे गंगा जल से उत्पन्न हुआ था। पास की कोसी नदी को कौशिकी, नौकुचियाताल को नवकोण सरोवर, गरुड़ताल को सिद्ध सरोवर व नल सरोवर आदि का भी उल्लेख है। क्षेत्र का छःखाता या शष्ठिखाता भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है, यहां 60 ताल थे। मानसखंड में कहा गया है कि यह सभी सरोवर कीट-पतंगों, मच्छरों आदि तक को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। इतिहासकार एवं लोक चित्रकार पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल मानसखंड को पूर्व मान्यताओं के अनुसार स्कंद पुराण का हिस्सा तो नहीं मानते, अलबत्ता मानते हैं कि मानसखंड करीब 10वीं-11वीं सदी के आसपास लिखा गया एक धार्मिक ग्रंथ है।

कहते हैं कि नैनीताल नगर का पहला उल्लेख त्रिषि-सरोवर (त्रि-ऋृषि सरोवर के नाम से स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया जाता है। कहा जाता है कि अत्रि, पुलस्त्य व पुलह नाम के तीन ऋृषि कैलास मानसरोवर झील की यात्रा के मार्ग में इस स्थान से गुजर रहे थे कि उन्हें जोरों की प्यास लग गयी। इस पर उन्होंने अपने तपोबल से यहीं मानसरोवर का स्मरण करते हुए एक गड्ढा खोदा और उसमें मानसरोवर झील का पवित्र जल भर दिया। इस प्रकार नैनी झील का धार्मिक महात्म्य मानसरोवर झील के तुल्य ही माना जाता है। वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार नैनी झील को देश के 64 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब माता सती के दग्ध शरीर को आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत की ओर ले जा रहे थे, इस दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को विभक्त कर दिया था। तभी माता सती की बांयी आँख (नैन या नयन) यहाँ (तथा दांयी आँख हिमांचल प्रदेश के नैना देवी नाम के स्थान पर) गिरी थी, जिस कारण इसे नयनताल, नयनीताल व कालान्तर में नैनीताल कहा गया। यहाँ नयना देवी का पवित्र मंदिर स्थित है।

नैनीताल में अंग्रेज :

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 नवंबर 2021। नैनीताल की वर्तमान रूप में खोज करने का श्रेय पीटर बैरन को जाता है, कहा जाता है कि उन्होंने 18 नवम्बर 1841 को नगर की खोज की थी। नैनीताल की खोज यूं ही नहीं, वरन तत्कालीन विश्व राजनीति की रणनीति के तहत सोची-समझी रणनीति एवं तत्कालीन विश्व राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण थी। 1842 में सर्वप्रथम आगरा अखबार में बैरन के हवाले से इस नगर के बारे में समाचार छपा, जिसके बाद 1850 तक यह नगर “छोटी बिलायत” के रूप में देश-दुनियां में प्रसिद्ध हो गया। 1843 में ही  नैनीताल जिमखाना की स्थापना के साथ यहाँ खेलों की शुरुआत हो गयी थी, जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने लगा।  1844 में नगर में पहले “सेंट जोन्स इन विल्डरनेस” चर्च की स्थापना और 1847 में यहाँ पुलिस व्यस्था शुरू हुई। 1854 में कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय बना और 1862 में यह नगर गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया था, और तत्कालीन (उत्तर प्रान्त) नोर्थ प्रोविंस की ग्रीष्मकालीन राजधानी के  साथ ही लार्ड साहब का मुख्यालय भी बना दिया गया। साथ ही 1896 में सेना की उत्तरी कमांड का एवं 1906 से 1926 तक पश्चिमी कमांड का मुख्यालय रहा। 1881 में यहाँ ग्रामीणों को बेहतर शिक्षा के लिए डिस्ट्रिक्ट बोर्ड व 1892 में रेगुलर इलेक्टेड बोर्ड बनाए गए । 1872 में नैनीताल सेटलमेंट किया गया। 1880 में ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया।

1892 में ही विद्युत् चालित स्वचालित पम्पों की मदद से यहाँ पेयजल आपूर्ति होने लगी. 1889 में 300 रुपये प्रतिमाह के डोनेशन से नगर में पहला भारतीय कॉल्विन क्लब राजा बलरामपुर ने शुरू किया। कुमाऊँ में कुली बेगार आन्दोलनों के दिनों में 1921 में इसे पुलिस मुख्यालय भी बनाया गया। वर्तमान में यह  कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय है, साथ ही यहीं उत्तराखंड राज्य का उच्च न्यायालय भी है। एक खोजकर्ता Lynne Williams के अनुसार 1823 में सर्वप्रथम नैनीताल पहुंचे पहले अंग्रेज कुमाऊं के दूसरे कमिशनर जॉर्ज विलियम ट्रेल ने 1828  में इस स्थान के लिए बेहद पवित्र नागनी ताल (Nagni Tal) शब्द का प्रयोग किया था। यह भी एक रोचक तथ्य है कि अपनी स्थापना के समय सरकारी दस्तावेजों में 1841 से यह नगर नायनीटाल (Nynee Tal)आगे Nynee और Nainee दोनों तथा 1881 से NAINI TAL (नैनीताल) तथा इससे पूर्व 1823 में यहाँ सर्वप्रथम पहुंचे पहले कुमाऊं कमिश्नर जी डब्लू ट्रेल द्वारा 1828 में नागनी ताल (Nagni Tal) भी लिखा गया।

यूं ही नहीं, तत्कालीन विश्व राजनीति की रणनीति के तहत अंग्रेजों ने बसासा था नैनीताल

रूस को भारत आने से रोकने और पहले स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल फूंक चुके रुहेलों से बचने के लिए अंग्रेजों ने बसाया था नैनीताल
नैनीताल के प्राकृतिक सौंदर्य ने भी खूब लुभाया था अंग्रेजों को
डॉ. नवीन जोशी / नवीन समाचार, नैनीताल, 22 दिसंबर 2021। ऐसा माना जाता है कि 18 नवम्बर 1841 को एक अंग्रेज शराब व्यवसायी पीटर बैरन नैनीताल आया और उसने इस स्थान के थोकदार नर सिंह को नाव से झील के बीच ले जाकर डुबो देने की धमकी दी और शहर को कंपनीबहादुर के नाम करवा दिया था। यह अनायास नहीं था कि एक अंग्रेज इस स्थान पर आया और उसकी खूबसूरती पर फिदा होने के बाद इस शहर को ‘छोटी विलायत’ के रूप में बसाया। साथ ही शहर को अब तक सुरक्षित रखे नाले और अब भी मौजूद राजभवन, कलेक्ट्रेट, कमिश्नरी, सचिवालय (वर्तमान उत्तराखंड हाईकोर्ट) तथा सेंट जॉन्स, मैथोडिस्ट, सेंट निकोलस व लेक र्चच सहित अनेकों मजबूत व खूबसूरत इमारतों के तोहफे भी दिए। सर्वविदित है कि नैनीताल अनादिकाल काल से त्रिऋषि सरोवर के रूप में अस्तित्व में रहा स्थान है। अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व यह स्थान थोकदार नर सिंह की मिल्कियत थी। तब निचले क्षेत्रों से ग्रामीण इस स्थान को बेहद पवित्र मानते थे, लिहाजा सूर्य की पौ फटने के बाद ही यहां आने और शाम को सूर्यास्त से पहले यहां से लौट जाने की धार्मिक मान्यता थी।

कहते हैं 1815 से 1830 के बीच कुमाऊं के दूसरे कमिश्नर रहे जीडब्ल्यू ट्रेल यहां से होकर ही अल्मोड़ा के लिए गुजरे और उनके मन में भी इस शहर की खूबसूरत छवि बैठ गई, लेकिन उन्होंने इस स्थान की धार्मिक मान्यताओं की मर्यादा का सम्मान रखा। दिसम्बर 1839 में पीटर बैरन यहां आया और इसके सम्मोहन से बच न सका। व्यवसायी होने की वजह से उसके भीतर इस स्थान को अपना बनाने और अंग्रेजी उपनिवेश बनाने की हसरत भी जागी और 18 नवम्बर 1841 को वह पूरी तैयारी के साथ यहां आया। वह औपनिवेशिक वैश्विकवाद व साम्राज्यवाद का दौर था। नए उपनिवेशों की तलाश व वहां साम्राज्य फैलाने के लिए फ्रांस, इंग्लैंड व पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश समुद्री मार्ग से भारत आ चुके थे, जबकि रूस स्वयं को इस दौड़ में पीछे महसूस कर रहा था। कारण, उसकी उत्तरी समुद्री सीमा में स्थित वाल्टिक सागर व उत्तरी महासागर सर्दियों में जम जाते थे। तब स्वेज नहर भी नहीं थी। ऐसे में उसने काला सागर या भूमध्य सागर के रास्ते भारत आने के प्रयास किये, जिसका फ्रांस व तुर्की ने विरोध किया। इस कारण 1854 से 1856 तक दोनों खेमों के बीच क्रोमिया का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस पराजित हुआ, जिसके फलस्वरूप 1856 में हुई पेरिस की संधि में यूरोपीय देशों ने रूस पर काला सागर व भूमध्य सागर की ओर से सामरिक विस्तार न करने का प्रतिबंध लगा दिया। ऐसे में रूस के भारत आने के अन्य मार्ग बंद हो गऐ थे और वह केवल तिब्बत की ओर के मागरे से ही भारत आ सकता था। तिब्बत से उत्तराखंड के लिपुलेख, नीति, माणा व जौहार घाटी के पहाड़ी दरे से आने के मार्ग बहुत पहले से प्रचलित थे। ऐसे में अंग्रेज रूस को यहां आने से रोकने के लिए पर्वतीय क्षेत्र में अपनी सुरक्षित बस्ती बसाना चाहते थे। दूसरी ओर भारत में पहले स्वाधीनता संग्राम की शुरूआत हो रही थी। मैदानों में खासकर रुहेले सरदार अंग्रेजों के दुश्मन बने हुऐ थे। मेरठ गदर का गढ़ था ही। ऐसे में मैदानों के सबसे करीब और कठिन दरे के संकरे मार्ग से आगे का बेहद सुंदर स्थान नैनीताल ही नजर आया, जहां वह अपने परिवारों के साथ अपने घर की तरह सुरक्षित रह सकते थे। ऐसा हुआ भी। हल्द्वानी में अंग्रेजों व रुहेलों के बीच संघर्ष हुआ, जिसके खिलाफ तत्कालीन कमिश्नर रैमजे नैनीताल से रणनीति बनाते हुए हल्द्वानी में हुऐ संघर्ष में 100 से अधिक रुहेले सरदारों को मार गिराने में सफल रहे। रुहेले दर्रे पार कर नैनीताल नहीं पहुंच पाये और यहां अंग्रेजों के परिवार सुरक्षित रहे।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार
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