सीमांत की ‘रंङ’(रं) लोक संस्कृति में रमे देश भर से आये कैलाश यात्री

  • कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक श्री धीराज गर्ब्याल की अभिनव पहल है ‘होम-स्टे’ योजना
  • इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर उत्तराखंड की झांकी के रूप में भी बढ़ा चुकी है राज्य का मान

कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक श्री धिराज गर्ब्याल की अभिनव पहल है ‘होम-स्टे’ योजना इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर उत्तराखंड की झांकी के रूप में भी राज्य का मान बढ़ा चुकी है। योजना के तहत कैलाश मानसरोवर यात्रा का पहला दल सीमांत क्षेत्र के ग्राम नाबी पहुंचा, तो सीमांत की ‘रंङ’ (रं) लोक संस्कृति में रमकर एकाकार हो गया। गांव की पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने तीर्थ यात्रियों का तिलक लगाकर स्वागत किया, सांफा बांधा और उन्हें परंपरागत नमकीन चाय पिलाई, और मीठे चावल खिलाए। साथ ही अपने लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर उनका मनोरंजन करने के साथ लोक संस्कृति की झलक भी पेश की। इस पर तीर्थयात्री इतने प्रसन्न हुए कि वहीं के परंपरागत वस्त्र पहने और फोटो खिंचवाए।

केएमवीएन के प्रबंध निदेशक श्री धीराज गर्ब्याल

कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड की ‘होम-स्टे’ योजना के प्रणेता, निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल इन पलों पर कहते हैं, ‘जब कैलाश मानसरोवर व आदि कैलाश यात्रा के यात्रीगण होमस्टे के लिए नाबी गाँव पहुँचते हैं तो गाँव का वातावरण किसी उत्सव से कम नहीं होता। पारंपरिक परिधानों में गाँव के युवक-युवतियाँ व साथ में बच्चे ढोल नगाड़ों संग गाँव की सीमा में पहुँचकर यात्रियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं। गांव पहुँचकर फिर दौर शुरू होता है अपनी संस्कृति, खान-पान व पारंपरिक वेशभूषा से आगन्तुकों के परिचय का। सही मायने में नाबी गाँव देश के कोने-कोने में ‘रंङ’ संस्कृति के प्रचार प्रसार, स्वावलंबन व पलायन को रोकने के साथ ही देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हो रहा है।

69वें गणतंत्र दिवस पर उत्तराखंड के होम-स्टे/ग्रामीण पर्यटन की झांकी

उत्तराखंड द्वारा दिल्ली के राजपथ पर 2018 में 69वें गणतंत्र दिवस पर उत्तराखंड के होम-स्टे/ग्रामीण पर्यटन की झांकी प्रस्तुत की गयी, जबकि इससे पूर्व 2016 में रम्माण की झांकी, 2015 में `केदारनाथ`, 2014 में `जड़ी-बूटी`, 2010 में `कुंभ मेला`, 2009 में `साहसिक पर्यटन`, 2007 में `कार्बेट नेशनल पार्क`, 2006 में `फूलों की घाटी`, 2005 में `नंदा राजजात` और 2003 में `फृलदेई` को राजपथ पर दिखाया गया था।

क्रिकेटर उन्मुक्त व फिल्मकार कापड़ी ने सराही केएमवीएन की होमस्टे योजना

नैनीताल। अंडर-19 विश्व कप में देश की क्रिकेट टीम की कप्तानी करने वाले युवा क्रिकेटर उन्मुक्त चंद और फिल्मकार विनोद कापड़ी ने बीते तीन दिन कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा पंचाचूली बेस कैंप के गांवों में संचालित ‘होम-स्टे योजना’ का अनुभव लेने के बाद इस पहल की मुक्त कंठ से सराहना की है। मंगलवार को निगम के सूखाताल स्थित पर्यटक आवास गृह में उन्मुक्त ने कहा कि यह योजना अपनी मंशा के अनुरूप 5 स्टार होटलों से दूर शांति तलाश रहे सैलानियों के लिए वरदान है। इससे उन्हें ग्रामीण जनजीवन और प्रकृति से सीधे जुड़ने का तो लाभ मिलता ही है, वहीं ग्रामीणों को भी घर पर अच्छा रोजगार प्राप्त हो रहा है। इससे देश के सीमांत गांवों से पलायन रुकने और सीमाओं पर ग्रामीणों की रक्षापंक्ति के बने रहने का भी लाभ है। वहीं ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ जैसी चर्चित बॉलीवुड फिल्म के निर्देशक व पूर्व पत्रकार विनोद कापड़ी ने कहा कि उन्होंने पंचाचूली बेस कैंप जैसी लोकेशन आज तक नहीं देखी थीं। वे कोशिश करेंगे कि फिल्म यूनिट को यहां लाकर इस अनछुवी खूबसूरती को सुनहरे परदे पर ले जाएं। इस अवसर पर केएमवीएन के जीएम त्रिलोक सिंह मर्तोलिया व कबाड़खाना के चर्चित ब्लॉगर अशोक पांडे व करुणा अधिकारी आदि लोग मौजूद रहे।

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अब इंडिया-ए टीम में प्रवेश के लिए प्रयास करेंगे उन्मुक्त
नैनीताल। अंडर-19 विश्व कप में देश की क्रिकेट टीम की कप्तानी करने के बावजूद भारतीय टीम में स्थान बनाने के लिए तरस रहे प्रतिभावान क्रिकेटर उन्मुक्त चंद आईपीएल में भी नहीं खेल रहे हैं। अलबत्ता उन्होंने कहा कि आईपीएल के खत्म होते ही वे अभ्यास में जुट जाएंगे। उनका लक्ष्य इंडिया-ए टीम में स्थान बनाना है।

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-इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर उत्तराखंड की झांकी में भी शामिल हो चुकी है योजना

राष्ट्रीय सहारा, 29 मार्च 2018

-पलायन की समस्या का भी निकला समाधान, देश की सीमाओं की सुरक्षा में भी दिया जा रहा है योगदान
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं मंडल के सीमांत गांवों में विशिष्ट हरे रंग से रंगे घर केएमवीएन यानी कुमाऊं मंडल विकास निगम के तत्वावधान में चलाई जा रही प्रदेश सरकार की ‘होम स्टे’ योजना में शामिल होने के साथ ही खुशहाली का भी प्रतीक बन गए हैं। इन घरों से अब पलायन की बुरी तरह से मार झेल रहे इन गांवों के ग्रामीणों को घर पर रोजगार के रूप में पलायन का तोड़ भी मिल गया है, वहीं इन घरों के जरिये शहरी चकाचौंध से दूर भागकर शांति की तलाश में निकल रहे सैलानियों को भी मानो उनका अभीष्ट मिल रहा है। साथ ही इस तरह वे अनजाने में भी देश के इन सीमांत गांवों में स्वयं पहुंचकर और वहां के ग्रामीणों को वहीं रुकने का लाभप्रद उद्देश्य प्रदान कर देश की सीमाओं की सुरक्षा में अपना योगदान भी दे पा रहे हैं। इसलिए यदि आप भी बिना फ़ौज में गए देश की सीमाओं की सुरक्षा में अपना योगदान देना चाहते हैं तो यहाँ जरूर जाएँ। कोई समस्या आये तो केएमवीएन से मदद लें।

नाबी गाँव, जहां मिलेगी ‘होम स्टे’ की सुविधा

इस बहुआयामी व महत्वाकांक्षी योजना के प्रणेता केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्यांल बताते हैं कि योजना के तहत सैलानी अब कुमाऊं मंडल के चीन-तिब्बत सीमा से लगे प्राकृतिक सुंदरता से लबरेज हिमालय की गोद में बसे दारमा व ब्यांस घाटियों में जाकर वहां के गांवों में ग्रामीणों के साथ उनके घरों में रहकर न केवल वहां के जनजीवन का अनुभव व रोमांच ले पाएंगे। वरन इन सीमांत गांवों के ग्रामीणों की आर्थिकी में वृद्धि कर उनके समक्ष रोजगार के अभाव में खड़ी पलायन व बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर पाएंगे, जिससे अन्ततः यहां के ग्रामीण पलायन करने को मजबूर नहीं होंगे, और देश की सीमाओं पर सेना में रहे बिना भी मानव दीवार के रूप में सीमा के सशक्त प्रहरी की भूमिका का निर्वाह करते रहेंगे, और इसमें इन गांवों में जाने वाले सैलानियों का भी योगदान होगा। योजना के तहत सैलानी इन गांवों में आकर ग्रामीणों के साथ उनके घरों में सीमांत क्षेत्र की संस्कृति से जुड़ते हुए रहकर, उनके द्वारा ही तैयार परंपरागत व्यंजन व भोजन आदि का अनुभव ले पाएंगे, साथ ही योजना का पूरा लाभ केवल ग्रामीणों को मिलेगा, केएमवीएन की योजना केवल सहयोगी की रहेगी।

सीमान्त गांवों में होम स्टे के लिए तैयार घर

ग्रामीणों को आतिथ्य के प्रशिक्षण के साथ ही बिस्तर, बर्तन भी उपलब्ध कराये
नैनीताल। योजना को शुरू करने के लिए केएमवीएन के द्वारा गांवों के खंडहर में तब्दील होने जा रहे घरों की बाकायदा स्थानीय तरीके से ही मरम्मत कराई गयी है, और इन्हें पहचान के लिए अगल हरा रंग दिया गया है। साथ कुटी के के करीब 50 तथा दान्तू, दुग्तू, बालिंग व नागलिंग नाम के गांवों के करीब 50 से 75 परिवारों को निगम अच्छे बेड, बिस्तर, क्रॉकरी आदि सामग्री देकर तथा उनके घरों की साफ-सफाई, पुताई आदि कराने के साथ ही उनकी मार्केटिंग कर होम स्टे योजना से जोड़े हुए हैं। है। साथ ही साफ शौचालय व सौर ऊर्जा के जरिये प्रकाश की व्यवस्था भी की गयी है। आगे निगम का लक्ष्य पिंडारी, सुंदरढूंगा, नामिक व पंचाचूली आदि सभी ट्रेकिंग मार्गों के साथा ही दारमा घाटी के नाबी, सेला, चल, फिलम व सीपू में भी इस योजना का विस्तार करीब 250 गांवों में बढ़ाने जा रहा है। आगे ग्रामीणों को नेपाल एवं अल्मोड़ा में चल रही होम स्टे योजनाओं का भ्रमण-प्रशिक्षण कराने तथा आगे कैलाश व आदि कैलाश यात्राओं के यात्रियों को इन गांवों में ‘होम स्टे’ कराकर स्थानीय माहौल से ‘अभ्यस्त’ कराने की भी योजना है।

80 फीसद तक हो चुका है सीमांत क्षेत्र में पलायन
नैनीताल। देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिये दुःखद स्थिति है कि तिब्बत-चीन सीमा के इन गांवों में 70 से 80 फीसद तक पलायन हो चुका है। उदाहरण के लिये कभी 400 से 500 परिवारों के गांव रहे गर्ब्यांग गांव में अब 70-80 परिवार ही बचे हैं। नौकरी-रोजगार के लिये बाहर गये करीब इतने ही अन्य परिवार वर्ष में एकाध बार पूजा-पाठ के लिये गांव आ पाते हैं। ऐसे में उनके घर वर्ष भर खाली पड़े रहते हैं। होम-स्टे योजना से इन खाली पड़े घरों की भी देखभाल हो पायेगी, और वे ग्रामीणों के लिये लाभकारी साबित होंगे।

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  • -चीन सीमा पर स्थित कुटी गांव की सफलता के बाद अब केएमवीएन शुरू करने जा रहा है दार्मा और ब्यांस घाटियों में भी ‘होम स्टे’ की सुविधा
  • -ग्रामीणों के साथ घर पर रहकर सैलानी अनुभव कर सकेंगे वहां के जनजीवन का रोमांच
  • -सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन विस्तार के साथ ग्रामीणों का पलायन रोककर सीमाओं को सशक्त करने में भी होगी बड़ी भूमिका
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राष्ट्रीय सहारा, 25 अप्रैल 2017, देहरादून संस्करण।

नवीन जोशी, नैनीताल। क्या हम बिना भारतीय सेना में शामिल हुए देश की सीमाओं की रक्षा और सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं ? शायद इस प्रश्न का उत्तर हम ‘नां’ में दें, किंतु कुमाऊं मंडल विकास निगम इस प्रश्न का उत्तर हमारे मुंह से ‘हां’ में देने का प्रबंध करने जा रहा है। निगम के एमडी धीराज गर्ब्यांल अपनी महत्वाकांक्षी ‘सीमांत गांवों की होम स्टे’ योजना के तहत यह प्रबंध करने जा रहे हैं, जिसके तहत सैलानी अब कुमाऊं मंडल के तिब्बत सीमा से लगे प्राकृतिक सुंंदरता से लबरेज हिमालय की गोद में सजी दारमा व ब्यांस घाटियों में जाकर वहां के गांवों में ग्रामीणों के साथ उनके घरों में रहकर न केवल वहां के जनजीवन का अनुभव व रोमांच ले पाएंगे। वरन इन सीमांत गांवों के ग्रामीणों की आर्थिकी में वृद्धि कर उनके समक्ष रोजगार के अभाव में खड़ी पलायन व बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर पाएंगे, जिससे अन्तत: यहां के ग्रामीण पलायन करने को मजबूर नहीं होंगे, और देश की सीमाओं पर सेना में रहे बिना भी मानव दीवार के रूप में सीमा के सशक्त प्रहरी की भूमिका का निर्वाह करते रहेंगे, और इसमें इन गांवों में जाने वाले सैलानियों का भी योगदान होगा।

उल्लेखनीय है कि केएमवीएन ने पूर्व में निगम के एमडी धीराज गर्ब्यांल की अगुवाई में देश के कैलाश-मानसरोवर यात्रा के समानांतर चलने वाली आदि कैलाश यात्रा के मार्ग पर चीन-तिब्बत सीमा सीमा से लगे ब्यांस घाटी के कुटी गांव में दो वर्ष पूर्व सामुदायिक सहभागिता पर आधारित होम-स्टे की यह योजना शुरू की थी, जिसमें इस यात्रा पर पिछले दो वर्षों में गये 300 व 278 यानी कुल 578 यात्री आते व जाते हुए रुके, जिससे उन्हें घर पर ही रोजगार प्राप्त हुआ। योजना की सफलता से उत्साहित निगम अब इसी यात्रा मार्ग पर दारमा घाटी के नाबी, सेला, चल, नागलिंग, बालिंग, दुग्तू, दातू, फिलम व सीपू गांवों में इस योजना को लागू करने जा रही है। अच्छी बात यह है कि इन गांवों के पास तक सड़क भी पहुंच चुकी है।

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श्री गर्ब्यांल ने बताया कि इन सभी गांवों के 10 से 15 परिवारों के समूहों यानी करीब 100 परिवारों को निगम धारचूला में सैलानियों के आतिथ्य सत्कार का प्रशिक्षण देने जा रहा है। इन परिवारों से अपेक्षा होगी कि वे अपने घरों के यथा संभव एक-दो कक्ष सैलानियों के लिये साफ-सुथरा करके रखें। आगे आदि कैलाश यात्रा पर जाने वाले और अन्यथा भी यहां आने वाले सैलानी इन गांवों में आकर ग्रामीणों के साथ उनके घरों में सीमांत क्षेत्र की संस्कृति से जुड़ते हुए रहकर, उनके द्वारा ही तैयार परंपरागत व्यंजन व भोजन आदि का अनुभव ले पाएंगे। खास बात यह भी कि सैलानियों से मिलने वाली पूरी धनराशि ग्रामीणों को ही मिलेगी। श्री गर्ब्यांल ने कहा कि निगम का दायित्व पर्यटन विस्तार के साथ स्थानीय लोगों के उन्नयन का भी है। निगम को यह लाभ जरूर होगा कि उसके द्वारा अपने स्तर से शुरू की जा रही प्राकृतिक ‘ॐ पर्वत’ के दर्शन कराने वाली आदि कैलाश यात्रा के मार्ग पर इस तरह यात्रियों को रात्रि विश्राम की सुविधा मिल पायेगी। बताया कि अब तक करीब 300 यात्रियों की आदि कैलाश यात्रा के लिये बुकिंग हो चुकी हैं, जिनके जाते व लौटते इन गांवों में 600 होम-स्टे प्राप्त हो जाएंगे। आगे यह संख्या एक हजार होने की उम्मीद है।

होम स्टे के जरिये देश की सीमाओं की सुरक्षा में योगदान देने का आह्वान

-अब साहसिक पर्यटन-होम स्टे पर रहेगा केएमवीएन का फोकस
-कुटी व नाभी के बाद चार गांवों- दान्तू, दुग्तू, बालिंग व नागलिंग तथा आगे 250 परिवारों को योजना से जोड़ने की है योजना

राष्ट्रीय सहारा, 15 सितंबर 2017।

नैनीताल। प्रदेश के कुमाऊं मंडल में पर्यटकों को पर्यटन से संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली संस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम यानी केएमवीएन राष्ट्रीय महत्व की कैलास मानसरोवर यात्रा के सकुशल संपादन के उपरांत अब साहसिक पर्यटन तथा इसमें भी होम स्टे योजना पर फोकस करने जा रही है। निगम होम स्टे योजना के लिये देश भर के सैलानियों से इस तरह की भावनात्मक अपील भी करने जा रहा है कि लोग सीमांत क्षेत्रों में होम स्टे के लिये यहां आकर बिना सेना में गए देश की सीमाओं की सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं। निगम की होम स्टे की इस पहल को सराहा भी जा रहा है। कैलास मानसरोवर यात्रा के दौरान मालपा व मांगती में आपदा आने के दौरान आखिरी दलों के यात्रियों को सीमांत क्षेत्र के कुटी व नाभी गांवों में मिल रही होम स्टे योजना से रूबरू होने का मौका मिला, जिसे उन्होंने काफी सराहा और अगले वर्ष से हर यात्री दल को यात्रा के दौरान कम से कम दो गांवों में रहने की सुविधा शामिल करने की भी मांग की। इस पर निगम ने इस संबंध में यात्रा के आयोजक भारतीय विदेश मंत्रालय से इस संबंध में अनुमति लेने की बात कही।
केएमवीएन के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल ने बृहस्पतिवार को बताया कि निगम अभी पिथौरागढ़ जनपद के कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले सीमांत कुटी व नाभी गांवों में होम-स्टे की योजना चला रहा है। इन गांवों में करीब 50 परिवारों को निगम अच्छे बेड, बिस्तर, क्रॉकरी आदि सामग्री देकर तथा उनके घरों की साफ-सफाई, पुताई आदि कराने के साथ ही उनकी मार्केटिंग कर होम स्टे योजना से जोड़े हुए हैं। आगे अन्य चार गांवों दान्तू, दुग्तू, बालिंग व नागलिंग नाम के गांवों के करीब 50 से 75 गांवों को इस योजना से जोड़ा जा रहा है। जबकि निगम का लक्ष्य आगे पिंडारी, सुंदरढूंगा व नामिक, पंचाचूली आदि सभी ट्रेकिंग मार्गों में भी इस योजना का विस्तार करीब 250 गांवों में करने का है। इस क्षेत्र से आत्मिक लगाव रखने वाले श्री गर्ब्याल कहते हैं कि सड़क के करीब के गांवों को इस योजना से जोड़ना आसान है, परंतु सीमांत के गांवों को योजना से जोड़ने का लाभ यह है कि वहां के लोगों को यदि घर पर ही रोजगार प्राप्त होगा तो वे पलायन को मजबूर नहीं होंगे, और अपने गांवों में ही रहेंगे, और इससे सीमांत क्षेत्र में देश की आबादी की मौजूदगी सुरक्षा दीवार के रूप में मौजूद रहेगी। योजना को उत्तराखंड सरकार की ‘अभिनय प्रयोग योजना’ के तौर पर भी देखा जा रहा है।

New Doc 2017-04-25_2
राष्ट्रीय सहारा, 26 अप्रैल 2017।
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नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

2 thoughts on “सीमांत की ‘रंङ’(रं) लोक संस्कृति में रमे देश भर से आये कैलाश यात्री

  • April 25, 2017 at 3:43 PM
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    निश्चय ही केएमवीएन का यह प्रयास सराहनीय हैं और सीमांत वासियों के सर्वान्गीय विकास के लिये एक अवसर। सभी ग्रामवासियों को आगे आकर इसका लाभ उठाना चाहिए । केएमवीएन तथा इसके प्रमुख को क्षेत्र के जनता का साधुवाद !

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    • April 25, 2017 at 10:24 PM
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      जरूर नबियाल जी। अन्य पोस्ट्स भी देखियेगा।

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