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खबर का असर : हिल्ट्रान के एमडी के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच की संस्तुति

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गणेश पाठक, हल्द्वानी। बीते 4 अप्रैल मई माह में प्रकाशित लंबी सीरीज की खबरों के बाद हरकत में आयी जीरो टॉलरेंस सरकार ने आखिरकार एक और बड़े भूमि घोटाले से जुड़े भीमताल इलेक्ट्रानिक सिटी में शराब बॉटलिंग प्लांट लगाने की अनुमति देने व जमीन की खरीद-फरोख्त के मामले में सीबीसीआईडी जांच की संस्तुति कर दी है। इस मामले की एनएच 74 घोटाले की तरह जांच होने पर कई बड़े नौकरशाहों की गर्दन नप सकती है। यही नहीं जीरो टॉलरेंस की सरकार में बैठे कुछ सफेदपोश चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि हमने पहले चरण में 4 अप्रैल को ‘‘ इलेक्ट्रॉनिक आस्थना में शराब बॉटलिंग प्लांट’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थीं। इसके बाद पूरे मामले की परत दर परत पूरी एक सीरीज प्रकाशित की थी। इस सीरीज की अंतिम किस्त 17 मई को ‘‘इलेक्ट्रॉनिक सिटी में वाइन प्लांट घोटाले में बैंक भी लपेटे में’ शीर्षक से छपी थी। इन तमाम खबरों के बाद पुलिस, प्रशासन, शासन एवं सरकार में जबरदस्त खलबली मची। इसके बाद सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास एवं सचिव सूचना प्रौद्योगिकी को जांच के लिए लिखा जबकि प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास ने सिडकुल को पृथक से जांच के आदेश दिए। करीब छह माह की पड़ताल के बाद अब जाकर सचिव सूचना प्रौद्योगिकी ने इस मामले में यूके हिल्ट्रान की संदेहास्पद भूमिका के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच की संस्तुति करते हुए पूरा मामला गृह विभाग को सौंप दिया है। इस आशय की पुष्टि सूचना प्रौद्योगिकी संयुक्त सचिव एसएस टोलिया ने बीती चार अक्टूबर के एक पत्र में की है। यह पत्र सूचनाधिकार कार्यकर्ता को भेजा गया है। चूंकि इस मामले में एक पीड़ित कार्मिक (एक्वामाल वॉटर सोल्यूशन प्रा.लि भीमताल) लीला सुनाल ने मुख्यमंत्री को कई शिकायती पत्र भेजे थे। इन शिकायती पत्रों के बाद राष्ट्रीय सहारा के खुलासे से सीएम ने पूरे मामले की जांच के निर्देश दिए थे। इसमें मां शीतला इंडस्ट्रीज पर नियमों के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक औद्योगिक आस्थान में बॉटलिंग प्लांट लगाने का आरोप लगाया गया था। चूंकि इस भूमि का स्वामित्व तो औद्योगिक विकास विभाग के पास था, जबकि चौकीदारी का काम हिल्ट्रान को दिया गया था। यह भी आरोप था कि मां शीतला इंडस्ट्रीज को बैंक लोन दिलाने के लिए हिल्ट्रान के एमडी ने कूटरचित दस्तावेजों (लीज डीड) के सहारे अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया और ओरियंटल बैंक आफ कामर्स की हल्द्वानी शाखा से 6.25 करोड़ Rs का ऋण दिलाने में मदद की थी। चूंकि बैंक ने एमडी के अनापत्ति प्रमाण पत्र के बाद ही इतनी बड़ी धनराशि बतौर ऋण दी गई। ऋण की यह धनराशि दिसम्बर 2017 में जारी की गई थी।इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता ने सीएम से एमडी हिल्ट्रान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का अनुरोध किया था। चूंकि शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि इस तरह के कूटरचित दस्तावेज तैयार करने में एक्वामॉल वाटर सोल्यूशन प्रा.लि भीमताल कंपनी भी शामिल है। इस तरह की जालसाजी श्रमिक शोषण की परिधि में आती है। शिकायतकर्ता श्रीमती सुनाल ने भीमताल में शीतला इंडस्ट्रीज प्रा.लि द्वारा बॉटलिंग प्लांट बंद करने, बैंक प्रबंधक ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स के विरुद्ध भी कार्रवाई की मांग की थीं। इन सभी पत्रों में सीएम के निर्देश के बाद अनुसचिव प्रदीप कुमार शुक्ल ने पृथक से आबकारी आयुक्त को कार्रवाई के लिए लिखा था। इन पत्रों पर भी कार्रवाई शुरू हो गई है।इस बीच लीज डीड के फर्जी एवं कूटरचित बनाए जाने के कारण एसआईटी के निर्देश के बाद थाना भीमताल ने भी नैनीताल जिला न्यायालय में पहले से ही चार्जशीट दाखिल कर दी है। इसकी पुष्टि आईजी कुमाऊं पूरन सिंह रावत ने की है। इसमें सहायक महाप्रबंधक हिल्ट्रान एवं निदेशक मां शीतला उद्योग प्रा.लि आरोपित हैं। माना जा रहा है कि सीबीसीआईडी जांच की संस्तुति के बाद इस मामले में कई बड़े नौकरशाहों के साथ ही कुछ चर्चित सफेदपोश भी लपेटे में आ सकते हैं। सिर्फ शर्त यही है कि सीबीसीआईडी पूरी निष्पक्षता से जांच करें। जीरो टॉलरेंस की सरकार से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है।

यह थी मूल खबर : उत्तराखंड की भीमताल ‘इलेक्ट्रॉनिक आस्थान’ से भी फुर्र हो चुके हैं कई ‘नीरव मोदी’

-उत्तराखंड में पूंजीपतियों का फंडा- पांच साल तक सरकारी अनुदान लो और कारखाना बेच कर चले जाओ
-एक्वामाल ही नहीं पिछले 17 साल में तीन दर्जन से ज्यादा कंपनियां भाग चुकीं
-एक भी कंपनी के खिलाफ नहीं हुई कार्रवाई, नाम बदलकर अनुदान लेने का भी चल रहा है खेल
गणेश पाठक, हल्द्वानी। अविभाजित यूपी के दौर में उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में सरकार के द्वारा भारी अनुदान देकर खोले गये इलेक्ट्रॉनिक आस्थानों में उद्योगों का जाल बिछाने के लिए सरकार ने नियम एवं कानून के इतर काफी उदारता दिखाई। इसका कई कंपनियों ने बेजा इस्तेमाल किया। नैनीताल जिले के भीमताल स्थित ‘इलेक्ट्रॉनिक आस्थान’ में यूरेका फोर्ब्स ग्रुप के साथ ही उस दौर में स्थापित कई कंपनियां उत्तराखंड सरकार का सैकड़ों हजार करोड़ रुपये का अनुदान हड़प कर ‘नीरव मोदी’ बन फुर्र हो गई हैं। ताजा जानकारी के अनुसार उत्तराखंड बनने के बाद पिछले 18 साल में अकेले भीमताल में तीन दर्जन से अधिक कम्पनियाँ करोड़ों रुपयों का अनुदान हड़प कर फरार हो गई हैं। जबकि फोर्ब्स ग्रुप ने तो एक ही परिसर में आधा दर्जन कंपनियां बनाकर सरकार की तिजोरी को अनुदान के रूप में जमकर लूटा है। एक अनुमान के अनुसार एक्वामाल ने अभी तक भीमताल में 12 हजार करोड़ का घोटाला कर दिया गया है।
इस बात का खुलासा सिडकुल के महाप्रबंधक जीएस रावत द्वारा एक्वामाल कंपनी की एक शिकायतकर्ता कर्मचारी को मांगने पर दी गई सूचना से हुआ है। सिडकुल ने यह सूचना आयोग की फटकार के बाद दी है। इस सूची के अनुसार राज्य गठन के बाद अब तक दो दर्जन कंपनियां अपना कारोबार बंद कर चुकी हैं। इसमें सीधे तौर पर 5000 से ज्यादा कर्मचारी बेरोजगार हुए हैं, जबकि 14 कंपनियों को प्लाट आवंटन का नोटिस जारी किया जा चुका है जबकि कई कंपनियां केवल सरकार द्वारा मिलने वाला अनुदान हड़पने के लिए बोर्ड लगाकर फरार हो गई हैं।
उद्योग विभाग के एक बड़े अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक अनुमान के तहत एक कंपनी को कारखाना लगाने के लिए सरकार ने 15 से लेकर 35 फीसदी अनुदान दिए जाने का प्रावधान तय किया था। इसके आधार पर सौ से ज्यादा कार्मिकों वाली कंपनी को राज्य सरकार की ओर से बैंक ऋण में 25 से 50 लाख तक की रियायत मिली है। इसके अलावा यातायात, बिजली, पानी, टेलीफोन संयोजनों में रियायतों के साथ ही उद्योगों को सड़क से जोड़ने में भी लाखों रुपए खर्च हुए हैं। मोटे तौर पर एक कंपनी को स्थापित करने में सरकार की तिजोरी पर 30 से 60 लाख का भार पड़ा है। चूंकि कंपनी बंद या दीवालिया होने पर यह सारा खर्च सरकार को ही भुगतना होता है। इसमे बैंकों का एनपीए तो बढ़ता ही है, बैंकों में राज्य का विकास पर खर्च होने वाला हिस्सा भी बरबाद हो जाता है। कुछ इसी तरह का खेल भीमताल इलेक्ट्रॉनिक स्टेट में चल रहा है।
उच्चपदस्थ सूत्रों के अनुसार राज्य में सरकार किसी की भी हो, नौकरशाह, नेता एवं कारोबारियों का गठजोड़ इस तरह के काम को काफी सफाई से अंजाम तक पहुंचाता रहा है। कुछ इसी तरह का खेल भीमताल इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में शराब के एक बॉटलिंग प्लांट खुलने तक की कहानी में भी हुआ है।

इस तरह फोर्ब्स ग्रुप ने कंपनियों के नाम बदलकर किया 12 हजार करोड़ का घोटाला

बताया गया है कि 1988 में अविभाजित यूपी में फोर्ब्स ग्रुप ने भीमताल में दो कंपनियां स्थापित कीं। इसमें एक कंपनी मेहरागांव तथा दूसरी इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में स्थापित की। इसमें मेहरागांव की कंपनी का नाम फैसिट एशिया लिमिटेड रखा गया। कुछ समय बाद इस कंपनी को बंद कर यूरेका फोर्ब्स कंपनी वजूद में आ गई। 2002 में यह कंपनी भी बंद हो गई। कंपनी ने अनुदान हड़पा लेकिन इसके खिलाफ आज तक उत्तराखंड सरकार ने कुछ भी नहीं किया। सूचनाधिकार से मिली जानकारी के अनुसार फोर्ब्स ग्रुप ने इसके अलावा 1989 में भीमताल में एपी इंडस्ट्रयिल कंपोनेंट के नाम से भी एक अन्य कंपनी स्थापित की, और 2003 में इसका नाम बदलकर एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लिमिटेड कर दिया। आगे 2007 में इस कंपनी को दो भागों में बांट दिया गया। इसमें एक का नाम फोर्ब्स एक्वामाल लिमिटेड कर दिया, जबकि दूसरी कंपनी एक्वामाल के नाम से ही चलती रही। यह कंपनी भी 8 मार्च 2008 को बंद हो गई। यही नहीं फोर्ब्स एक्वामाल लिमिटेड का नाम 2010 में ‘फॉल’ कर दिया गया। 2015 मंे यह कंपनी भी बंद हो गई। इन दोनों कंपनियों में 500 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे। इधर 5 मई 2017 को एक्वामाल ने दोनों कंपनियों को शराब बॉटलिंग प्लांट की कंपनी शीतला उद्योग इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेट को बेच दिया। बताया जाता है कि यह सारा खेल सरकारी अनुदान को हड़पने के लिए किया गया।

सरकारी अनुदान डकार कर अब तक फरार हुई कंपनियां

अलग राज्य के वजूद में आने के बाद उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन रोकने के लिए औद्योगिक विकास की रफ्तार शुरू के पांच साल में काफी तेजी से आगे बढ़ी। सिडकुल रुद्रपुर, सितारगंज, सेलाकुई व हरिद्वार सहित कई इलाकों में उद्योगों की स्थापना का काम चला, लेकिन इसके बावजूद राज्य गठन के बाद पहाड़ों से रोजगार के लिए पलायन की रफ्तार बेकाबू हुई है। कारण अब तक राज्य का अनुदान हजम करके मैसर्स केबीएम केबल्स, उषा रेक्टीफायर कारपोरेशन इंडिया, मैसर्स उषा मारकोनिक माइक्रो इलेक्ट्रानिक्स, उषा रेक्यूफायर, एक्वामाल, कोहली टाइलस्स इंडस्ट्रीज, प्रेमा इलेक्ट्रानिक्स प्रालि, ब्राइड ब्रदर्श, मैसर्स रावत इंजीनियर्स, सोलेशन बुमर्स, वींकर्स जनरल कार्बन लिमि, श्रीकोल उदयसिंह व एसएस प्रालि आदि कम्पनियां फरार हो चुकी हैं, और सरकार ने इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।

14 कंपनी मालिकों को प्लाट निरस्त करने का नोटिस

सिडकुल के क्षेत्रीय प्रबंधक जीपी दुर्गापाल एवं जीएस रावत ने विशाल कुमार सिन्हा, उषा सक्सेना, मैसर्स चौहान रेडीमेड गारमेंटस, बीपीएस सोलंकी, गोविंद सरन सिंह, अशोक कुमार, अनीता, वैद्यनाथ भवन, मैसर्स कैप्यो सोल्यूशन प्रालि, मनोज, विक्रम सिंह, निगम टंडन, एमएन शुक्ला को प्लॉट निरस्त करने के नोटिस दिये हैं।

पीएम मोदी तक पहुंची बात

इस घटनाक्रम की सारी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक पेज पर भी पोस्ट की गई हैं। साथ ही इस पोस्ट को पीएम मोदी के व्यक्तिगत विजीटर पोस्ट में भी एटैच किया गया है। जबकि सोशल मीडिया में यह मामला अभी तक दो लाख से ज्यादा लोगों तक पहुंच गया है। वहीं एक्वामाल के कर्मचारियों ने राज्य सरकार पर शराब माफिया के आगे नतमस्तक होने का आरोप भी लगाया है।

भीमताल इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में अरबों का घोटाला: सरकारी जमीन बेचकर बना दिया शराब बॉटलिंग प्लांट!

कुमाऊं एवं गढ़वाल के युवाओं को सम्मानजनक रोजगार के लिए अविभाजित उत्तर प्रदेश सरकार ने 1988 में मुनि की रेती, कोटद्वार, देहरादून, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा तथा भीमताल में औद्योगिक आस्थान खोले थे। इन इलाकों में इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों की स्थापना के लिए हिल्ट्रान को जिम्मेदारी दी गई। समय ने कुछ इस तरह से करवट बदली कि अब भीमताल इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में शराब का कारखाना खुल गया है जबकि यूपी में तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी ने ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन के बाद इन उद्योगों की स्थापना की थी। अब जबकि उत्तराखंड राज्य 18 साल का हो रहा है, तब भी ‘जीरो टॉलरेंस’ की सरकार भी इससे बेखबर है।
इस मामले की शुरुआत 2012 में हुई, जब शराब बनाने वाली कंपनी मैसर्स शीतला उद्योग प्रा. लि.ने तत्कालीन सीएस हरीश रावत पर डोरे डालकर भीमताल के निकट फरसौली में मंडी परिषद के माध्यम से जमीन अधिग्रहीत कर ली। भारी विरोध के बीच सरकार एवं शराब कंपनी को अपने पैर वापस खींचने पड़े। इसके बाद इस कंपनी की नजर एक्वामाल वाटर सोल्यूशन प्रा.लि. के कारखाने पर पड़ी। एक्वामाल के मालिकों ने भी इसमें रुचि दिखाई, जिसके बाद यह खेल आगे चलता रहा।
इधर पांच मई 2017 को हिल्ट्रॉन के सहायक महाप्रबंधक एके अहलुवालिया ने नैनीताल सब रजिस्ट्रार कार्यालय में हिल्ट्रॉन के एमडी के प्रतिनिधि के तौर पर मैसर्स शीतला उद्योग प्रा. लि. के साथ एक अनुबंध कर 40 नाली भूमि व भवन विक्रय कर दिए। इसी दौरान 2017 में भाजपा सरकार के आते ही शीतला उद्योग प्रा.लि. तथा शीतला इंडस्ट्रीज प्रा.लि. ने आबकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उद्योग विभाग तथा राज्यकर विभाग में अपनी ताकत का इस्तेमाल कर इलेक्ट्रॉनिक आस्थान स्थित एक्वामाल कंपनी में शराब बॉटलिंग प्लांट खोल दिया। इसके साथ ही शीतला उद्योग इसमें बियर का उत्पादन करने लगा। जबकि एक्वामाल कंपनी ने कारखाने में तालाबंदी कर दी। तालाबंदी के बाद कुछ कर्मचारियों की शिकायत के बाद सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की नींद खुली। इसके बाद हिल्ट्रॉन के महाप्रबंधक नंदन सिंह कार्की की एक टीम ने एक्वामाल का जायजा लिया। यहां शराब का बॉटलिंग प्लांट चलते देख वह दंग रह गए। एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लिमिटेड भीमताल के कारखाने में बीयर, ह्विस्की, रम समेत कई तरह की शराब की बोतलें तैयार होती मिलीं। उन्होंने एमडी से विचार-विमर्श करने के बाद हिल्ट्रान के सहायक महाप्रबंधक पीके आहलुवालिया तथा शीतला उद्योग एवं शीतला इंडस्ट्रीज के निदेशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। एफआईआर में भी इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में शराब बॉटलिंग प्लांट अवैध रूप से चलाने का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि आरोपितों द्वारा मूल ड्राफ्ट में छेड़खानी की गई है।

यह है पूरा मामला, ‘चौकीदार’ ने बेच डाली करोड़ों की जमीन, ‘मालिक’ को पता ही नहीं

भीमताल इलेक्ट्रॉनिक आस्थान की करोड़ों की बेशकीमती जमीन एवं भवन हिल्ट्रान के कुछ अधिकारियों ने एक साजिश के तहत शराब कारोबारी को बेच दिये हैं। सरकारी रिकार्ड में जमीन की खतौनी प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास के नाम दर्ज है और हिल्ट्रॉन केवल इस जमीन का कस्टोडियन (चौकीदार) है। इसमें करोड़ों का घोटाला किये जाने के साथ ही नैनीताल से लेकर दून सचिवालय एवं कुछ मंत्रियों की भी मिलीभगत होने का अंदेशा है। इससे यह मामला अभी तक पूरी तरह से दफन होता रहा है। अब जाकर सूचनाधिकार से इस घोटाले की पर्त-दर-पर्त खुल रही है। इससे सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ के नारे पर भी प्रश्न खड़े हो गए हैं।
उल्लेखनीय है कि 28 अप्रैल 1988 को अविभाजित यूपी सरकार में भीमताल के आणु गांव की 40 नाली भूमि सहित 250 नाली भूमि इलेक्ट्रॉनिक्स आस्थान के तौर पर अधिग्रहीत की गई। इसके साथ ही इसका मालिकाना हक यूपी हिल इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन (हिल्ट्रॉन) को दिया गया। कुछ साल बाद 2 अप्रैल 1993 को इलेक्ट्रॉनिक्स औद्योगिक आस्थानों का स्वामित्व बदल दिया गया। इसके लिए विशेष सचिव उत्तराखंड विकास विभाग प्रताप सिंह ने एक आदेश जारी कर इसका स्वामित्व यूपी सरकार एवं हिल्ट्रॉन को कस्टोडियन बनाया। राज्य गठन के बाद 19 जुलाई 2013 को प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास ने एक आदेश जारी कर इस जमीन का स्वामित्व औद्योगिक विकास विभाग-सिडकुल के नाम पर दर्ज कर दिया। इससे पहले अविभाजित यूपी में ही 1991 में एल-3, एल-4 के प्लाट हिल्ट्रॉन ने यूरेका फोर्ब्स (एक्वामाल वाटर सोल्यूशन प्रा. लि.) को सौंप दिये। तब से लेकर 2017 तक यह कंपनी अपना काम करती रही। अब इस कंपनी ने अपने अधीन जमीन को एक बियर बॉटलिंग प्लांट को बेचने की सहमति देते हुए हिल्ट्रॉन के माध्यम से बेच दी है। जबकि हिल्ट्रॉन इस जमीन का चौकीदार है, और जमीन को बेचने का अधिकार केवल प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास विभाग के पास है। इस बात का खुलासा एक सूचनाधिकार कार्यकर्ता की मांगी गई सूचना के बाद हुई है जबकि एक्वामॉल कंपनी के एक कमर्चारी ने इसकी शिकायत सीएम को की है। इस शिकायत पर अपर सचिव डा. आर राजेश कुमार ने 2 फरवरी 2018 को इस जमीन का मामला सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का बताया है। इसमें अपर सचिव को इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि 19 जुलाई 2013 के प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास विभाग के एक आदेश के आधार पर इस जमीन पर मालिकाना हक उनके विभाग का ही है। अभी सूचना प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास विभाग के बीच जमीन के मालिकाना हक की जंग चल रही है जबकि ‘‘चौकीदार’ अपना खेल कर चुका है। सूत्रों के अनुसार यह कराड़ों का घोटाला है।

हरीश रावत की करीबी है शीतला !

याद करें कि 2012 में शराब बनाने वाली कंपनी शीतला उद्योग कंपनी ने तत्कालीन सीएस हरीश रावत पर डोरे डालकर भीमताल के निकट फरसौली में मंडी परिषद के माध्यम से जमीन अधिग्रहीत कर ली थी। तब अत्यधिक चर्चा में रहने के बाद कांग्रेस सरकार फरसाली के लोगों के भारी विरोध के कारण भीमताल में बियर का प्लांट नहीं खोल पायी थी।

कमिश्नर का पत्र भी दबा गए एमडी सिडकुल

मुख्यमंत्री को शिकायत करने वाली आपरेटर ने कमिश्नर से भी शिकायत की थी। इस शिकायत को काफी गंभीरता से लेते हुए अपर आयुक्त संजय कुमार 6 अप्रैल 2017 को प्रबंध निदेशक सिडकुल को पत्र भेज चुके हैं। इस पत्र पर आज दिन तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

वैधानिक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में शराब का बॉटलिंग प्लांट खुल ही नहीं सकता

वैधानिक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक आस्थान में शराब का बॉटलिंग प्लांट खुल ही नहीं सकता है। उल्लेखनीय है कि पर्वतीय विकास अनुभाग-6 के संयुक्त सचिव नरेंद्र नाथ वर्मा के हस्ताक्षरों से दो दिसंबर 1988 को एक आदेश जारी किया गया। इस आदेश के तहत कुमाऊं एवं गढ़वाल में आधा दर्जन इलेक्ट्रॉनिक आस्थान खोले गए। इसकी जिम्मेदारी हिल्ट्रान को दी गई। तब स्वामित्व भी हिल्ट्रान को ही दिया गया। पांच साल बाद हिल्ट्रान की गंभीर शिकायतों को देखते हुए दो अप्रैल 1993 को पर्वतीय विकास अनुभाग-6 विशेष सचिव प्रताप सिंह ने एक आदेश जारी कर हिल्ट्रान से स्वामित्व वापस ले लिया और केवल चौकीदारी (कस्टोडियन) की जिम्मेदारी दी। इस आदेश में यह भी साफ कर दिया गया था कि पर्वतीय क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक आस्थानों में केवल इलेक्ट्रॉनिक से जुड़े उद्योग स्थापित किए जा सकेंगे। इसके साथ ही दो दिसंबर का शासनादेश भी मूल रूप से संशोधित कर दिया गया जबकि औद्योगिक विकास विभाग प्रमुख सचिव ने 13 जुलाई 2013 को यह जमीन पदनाम पर करवा दी।

नैनीताल जिला प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध

सीएम एवं तमाम नौकरशाहों को शिकायत करने वालों का कहना है कि मामले में नैनीताल जिला प्रशासन की भूमिका शुरू से लेकर अब तक संदिग्ध रही है। सूत्रों के अनुसार शराब कारोबारी शीतला उद्योग एवं इंडस्ट्रीज ने धन, बल एवं राजनीतिक पहुंच का भरपूर इस्तेमाल किया। इस कारण प्रदषूण नियंत्रण बोर्ड से लेकर तमाम संबंधित विभागों ने धड़ाधड़ अनापत्ति प्रमाण पत्र एवं लाइसेंस जारी कर दिये। इस पर संबंधित विभाग के अफसर कुछ भी बताने से इनकार कर रहे हैं। पुलिस के एक बड़े अफसर का कहना है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच में कई विभागों के बड़े अफसरों पर गाज गिर सकती है। यही नहीं कई नेताओं के चेहरों से नकाब हट सकता है।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में 15 नवंबर 2017 को एक्वामाल वाटर सोल्यूशन की सीनियर ऑपरेटर लीला सुनाल ने सीएम को एक शिकायती पत्र भेजा। 2 फरवरी 2018 को अपर सचिव औद्योगिक विकास विभाग-2 डा. आर राजेश कुमार ने प्रमुख सचिव से मिले। निर्देश के तहत इससे पल्ला झाड़ कर गेंद सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग के पाले में डाल दी। इसके बाद एक सूचनाधिकार कार्यकर्ता ने सारी कड़ियों को मिलाकर संबंधित विभागों से सूचना मांगी। इसके बाद पता चला कि इस मामले में नैनीताल से लेकर दून तक करोड़ों का खेल खेला गया है। शीतला इंडस्ट्रीज प्रा.लि. के कर्मचारियों ने बताया कि हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्टे मिलने तक प्लांट में काम बंद रहा। कर्मचारियों का कहना है कि अब काम सुचारु रूप से चल रहा है।

शुरूआती कंपनी यूरेका फार्ब्स की शुरू से रही संदिग्ध भूमिका

अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने यूरेका फार्ब्स प्रतिष्ठान को 99 साल की लीज पर आणु गांव की करीब 40 नाली भूमि प्यूरीफाई का उत्पादन करने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम के तहत दी। इस जमीन की कीमत अरबों रुपयों में है। बताया जा रहा है कि पांच साल फैक्ट्री संचालित करने के बाद यूरेका फार्ब्स ने इस प्रतिष्ठान को बंद कर नई कंपनी एपिक लांच कर दी। सरकार से लाखों का अनुदान हड़प पर इस कंपनी को भी बंद कर दिया गया। इसके साथ ही 2004 में एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लि. भीमताल के नाम से लांच की। 2014 में इस कारखाने के सभी कर्मचारियों को बाहर कर गेट में ताले लटका दिए।

अरबों की जमीन कौड़ियों में लुटायी

आणु गांव की करीब 40 नाली भूमि हिल्ट्रान सहायक महाप्रबंधक पीके आहलूवालिया ने शराब कंपनी शीतला उद्योग प्रा.लि. व शीतला इंडस्ट्रीज को कौड़ियों के भाव बेची है। इसमें एक हिस्से को मात्र 48 हजार में बेचा गया है जबकि दूसरे हिस्से को 26 हजार 400 में बेचा गया है। इस रकम का खुलासा लीज डीड से हुआ है। जबकि एक्वामाल कंपनी ने अपने करोड़ों के भवन आदि तीन लाख 70 हजार में विक्रय किये हैं। बाजार मूल्य की बात करें तो इस समय आणु गांव की एक नाली भूमि पचास लाख के आसपास है।

एक्वामाल श्रमायुक्त को भी करता रहा गुमराह

8 मार्च 2014 को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन एक्वामाल कंपनी ने 50 स्थायी एवं करीब 500 अस्थाई श्रमिकों को बाहर कर गेट में ताले लगा दिए जबकि इसमें स्थायी तौर पर करीब 35 महिलाएं थीं। इसी तरह से अस्थाई में भी अधिकतर महिलाएं कार्यरत थीं। कई दिनों की हड़ताल के बाद तत्कालीन सीएम ने कमिश्नर कुमाऊं को जांच सौंपी और मामला श्रमायुक्त कार्यालय पहुंचा। यहां 11 मार्च 2014 में कंपनी बंगलौर शिफ्ट करने की जानकारी दी गई। यह मामला अभी भी औद्योगिक न्यायाधिकरण में विचाराधीन है। मजेदार बात यह है कि राज्य कर विभाग को एक्वामाल ने उत्तराखंड में आज के दिन तीन कंपनी चालू हालत में होने की जानकारी दी है।

पहले ‘‘अपराध’ फिर दबाव पड़ने पर ‘‘एफआईआर’ दर्ज

भीमताल स्थित इलेक्ट्रॉनिक आस्थान की करोड़ों की बेशकीमती जमीन एवं भवन को एक शराब कारोबारी को बेचने के मामले में सिडकुल और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के बढ़ते दबाव के बाद पुलिस में एफआईआर दर्ज की गई है। एफआईआर की कई दिनों की जांच के बाद मामला एसआईटी को सौंपा गया। बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण एसआईटी ने जांच रिपोर्ट आईजी को सौंप दी है, जबकि इस मामले में अब तक जमीन बेचने वाले चौकीदार के खिलाफ कार्रवाई होने के साथ ही मामले में लिप्त सभी को जेल भेज दिया जाना चाहिए था। मामला हाइप्रोफाइल होने के कारण जीरो टॉलरेंस की सरकार किसी तरह से पूरे प्रकरण को दफन करने में लगी है। इस कारण आईजी को सौंपी गई रिपोर्ट का किसी को भी पता नहीं है। सूचनाधिकार के माध्यम से मामले के खुलासे के बाद सिडकुल मुख्यालय जीएम एसएल सेमवाल ने 26 दिसंबर 2017 को जीएम हिल्ट्रॉन से पूरी सूचना तलब की। इसके बाद भारी गड़बड़ी मिलने के कारण सहायक महाप्रबंधक पीके आहलुवालिया एवं शीतला उद्योग प्रा.लि. के निदेशक नवनीत के खिलाफ 9 फरवरी 2018 को भीमताल थाने में आईपीसी की धारा 420, 467 व 468 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इस एफआईआर के बाद पुलिस ने जांच में काफी उलझन मिलने पर एसएसपी की सिफारिश के बाद एसआईटी की जांच शुरू की गई। सूत्रों के अनुसार एसआईटी अपनी जांच पूरी कर आईजी को रिपोर्ट सौंप चुकी है, जबकि आरोपित नैनीताल उच्च न्यायालय से गिरफ्तारी के बचने के लिए स्टे ले आये हैं। इससे कानूनी तौर पर भी यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। जबकि इस मामले में राज्य सरकार को उच्च न्यायालय में मजबूत पैरवी करनी थीं। इसके साथ ही न्यायालय में आरोप पत्र भी पेश करने थे। यह मामला समय पर न किए जाने से आरोपित लाभ उठा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द करने में मुख्य भूमिका एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लि. भीमताल के मालिक एवं प्रबंधकों की मानी गई है। इसके पीछे सरकारी जमीन में एक्वामाल का करोड़ों के भवन आदि को बताया जा रहा है। कंपनी जमीन का सौदा कुछ इस तरह से कर अपने भवन आदि की कीमत वसूलना चाहती थीं। बताया जा रहा है कि एफआईआर में इन प्रभावशाली लोगों का नाम जान बूझकर नहीं डाला गया। इसमें ‘‘ चौकीदार’ ने एक्वामाल के मालिकों को बचाने की व्यूह रचना कुछ इस तरह से की है कि अब सरकार को पसीना छूटने लगा है।

शराब या कोई भी उद्योग लगाने से पहले किसी भी कारोबारी को जिला उद्योग केंद्र, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, आयकर, कारोबार की प्रकृति का विभाग एवं राज्य कर अधिकारी आदि के यहां पंजीकरण कराना होता है। इनसे अनापत्ति मिलने के बाद श्रमायुक्त के यहां उद्योग का पंजीकरण होता है। तब जाकर कोई उद्योग खोला जा सकता है। -स्मिता, डिप्टी कमिश्नर राज्य कर एवं लोक सूचनाधिकारी नैनीताल

मैंने अभी कार्यभार संभाला है। आप मामले को संज्ञान में लाये हैं। जांच की जाएगी। दोषी को नहीं बख्शा जाएगा। -विनोद कुमार सुमन, डीएम नैनीताल

‘‘इस पूरे मामले में एसआईटी की जांच रिपोर्ट के बाद एफआईआर दर्ज कर विवेचना का काम चल रहा है। मामले के हरेक पक्ष को देखने का प्रयास किया जा रहा है। विवेचना के बाद जरूरत पड़ने पर ठोस कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल भीमताल पुलिस मामले की गहन छानबीन कर रही है।’ -पूरन सिंह रावत, आईजी कुमाऊं

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देहरादून, 6 अक्टूबर 2018: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योगों के चढ़ने में बड़ी बाधा सरकार ने दूर कर दी। पर्वतीय क्षेत्रों में अब 12.5 एकड़ या उससे ज्यादा भूमि को औद्योगिक उपयोग के लिए खरीदा जा सकेगा। साथ ही औद्योगिक उपयोग के लिए भूमि खरीद का उद्देश्य जाहिर करते ही भू-उपयोग खुद-ब-खुद कृषि से अकृषि भूमि में परिवर्तित हो जाएगा। इसके लिए किसान और पूंजी निवेशक को सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। त्रिवेंद्र रावत मंत्रिमंडल ने शनिवार को इस अहम फैसले पर मुहर लगा दी है । इसके लिए उत्तरप्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 (अनूकूलन एवं उपांतरण आदेश 2001) (संशोधन 2018) अध्यादेश को मंजूरी दी गई।

रविवार सात अक्टूबर से प्रस्तावित दो दिनी इन्वेस्टर्स समिट की तैयारी में जुटी सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में जाने में उद्योगों की हिचक दूर करने को अहम कदम उठाया। सरकार के प्रवक्ता व काबीना मंत्री मदन कौशिक ने बताया कि मंत्रिमंडल ने पहाड़ी जिलों में औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए भूमि व्यवस्था की धारा 143 में संशोधन कर उसमें उपधारा 143-क जोड़ने का फैसला लिया है। नगर निगम, नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद और छावनी परिषद के तहत आने वाले क्षेत्रों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में कृषि भूमि को उद्योगों के उपयोग के लिए खरीदा जा सकेगा। किसी भी भूमिधर को औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमि की अनुमति मिलते ही भूमि का भू-उपयोग स्वत: ही कृषि से अकृषि में तब्दील हो जाएगा। इसके लिए संबंधित उपजिलाधिकारी की अनुमति जरूरी नहीं होगी। धारा 143-क का यह प्रतिबंध सिर्फ पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चंपावत, अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, नैनीताल जिले के सिर्फ पर्वतीय ब्लॉकों पर लागू रहेगा। यानी औद्योगिक उपयोग के लिए भूमि पर यह छूट सिर्फ उक्त क्षेत्रों पर ही लागू रहेगी। दो साल की अवधि में खरीदी गई या औद्योगिक उपयोग में दर्शाई गई भूमि का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तो यह सरकार में निहित हो जाएगी।

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-उद्योगों की वायु व जल प्रदूषण की जांच कर छह सप्ताह के भीतर सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के आदेश
नैनीताल, 17 अगस्त 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आदेशित किया है कि उत्तराखंड के सभी उद्योगों के द्वारा से किए जा रहे वायु व जल प्रदूषण की जांच कर छह सप्ताह के भीतर सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे। इस आदेश के बाद राज्य में लगे उद्योगों में हड़कंप मचना तय है। वहीं शुक्रवार को कोर्ट के पूर्व आदेशों के क्रम में उत्तराखंड इंवायरमेंट प्रोटेक्शन एंड पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मेंबर सेक्रेट्री डा. अंकुर कंसल कोर्ट में पेश हुए।
मामले के अनुसार राज्य के ऊधमसिंह नगर जनपद निवासी हिमांशु चंदोला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि ऊधमसिंह नगर में लगभग 27-28 उद्योगों के द्वारा वायु व जल प्रदूषण किया जा रहा है, जिससें कई लोगों की हेपेटाइटिस से मौत भी हो गई है। यही नहीं इससे वहां की कृषि भूमि भी कृषि लायक नहीं रह गई है। उद्योगों का सारा प्रदूषित पानी खेतों व नदियों में जा रहा है, इससे वहां की नदियां भी दूषित हो रही हैं। इस प्रकरण पर कोर्ट ने उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मेबर सेक्रेट्री को पूर्व में व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने केद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पक्षकार बनाते हुए सिडकुल में लगी फैक्ट्रियों के द्वारा प्रदूषण किए जाने के मामले में जांच कर रिपोर्ट छह सप्ताह में सील कवर में देने के निर्देश दिए हैं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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