दो देशों की साझा प्रतिनिधि थीं कुमाऊँ की ‘तीजनबाई’ कबूतरी दी

 

 

 

पहाड़ी सफर की तरह उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी जी कर उत्तराखंड की प्रथम लोकगायिका व कुमाऊँ की तीजनबाई भी कही जाने वाली कबूतरी देवी जी का 7 जुलाई 2018 को पिथौरागढ़ में निधन हो गया। नेपाल-भारत की सीमा के पास लगभग 1945 में पैदा हुई कबूतरी दी को संगीत की शिक्षा पुश्तैनी रूप में हस्तांतरित हुई। परम्परागत लोकसंगीत को उनके पुरखे अगली पीढ़ियों को सौंपते हुए आगे बढ़ाते गए। शादी के बाद कबूतरी देवी अपने ससुराल पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गांव क्वीतड़ (ब्लॉक मूनाकोट) आईं। उनके पति दीवानी राम सामाजिक रूप से सक्रिय थे और अपने इलाके में ‘नेताजी’ के नाम से जाने जाते थे। नेताजी ने अपनी निरक्षर पत्नी की प्रतिभा को निखारने और उन्हें मंच पर ले जाने का अनूठा काम किया। आज भी चूल्हे-चौके और खेती-बाड़ी के काम में उलझकर पहाड़ की न जाने कितनी महिलाओं की प्रतिभाएं दम तोड़ रही होंगी। लेकिन दीवानी राम जी निश्चय ही प्रगतिशील विचारधारा के मनुष्य रहे होंगे, जिन्होंने अपनी 70 के दशक में अपनी पत्नी में संगीत की रुचि को न केवल बढ़ावा दिया बल्कि उनको खुद लेकर आकाशवाणी नजीबाबाद और आकाशवाणी रामपुर पहुंचाया। क्वीतड़ से कई घण्टे पैदल चलकर बस पकड़ने के बाद नजीबाबाद पहुंचने के सफर की चुनौतियों का आज हम लोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। उस समय के प्रसिद्ध संगीतज्ञ और गीतकार भानुराम सुकौटी ने कबूतरी दी की प्रतिभा को निखारने का बेहतरीन काम किया।

कबूतरी दी ने शिखर पर पहुंचने का सफर शुरू कर दिया था। लगभग हर शाम रेडियो पर उनके गीतों को सुनने का जबरदस्त ‘क्रेज’ था। ‘पहाड़को ठंडो पानि’, ‘आज पानि झाऊ झाऊ’ व ‘आ लीली बाकरी लीली..’ जैसे कुछ गानों ने कबूतरी दी को उत्तराखंड के हर घर में पहुंचा दिया था। रेडियो स्टेशन में गानों पर मिलने वाली राशि बहुत कम होती थी, इसलिए घर चलाने के लिए खेती-मजदूरी के बीच ही उत्तराखंड की ये पहली लोकगायिका अभावों में रहते हुए अपने 3 बच्चों को भी पालती रही। उनकी आवाज में मौलिकता और भारत-नेपाल की मिली-जुली खनक तो थी ही, उनके गीतों में मधुरता के साथ-साथ दिल को छू लेने वाली ‘नराई’ भी होती थी। इसलिए जल्दी ही उनके गीत महिलाओं-पुरुषों और बच्चों के दिलों में बस गए। खासकर ऋतु गीत ‘रितुरैण’ गायन में उन्हें महारत हासिल थी।

1984-85 में कबूतरी देवी उत्तराखंड लोकसंगीत के क्षेत्र में एक बड़ा नाम बन चुकी थी, लेकिन परिवार का भरण-पोषण आर्थिक परेशानियों से गुजरते हुए बड़ी ही मुश्किल से हो पा रहा था। इसी बीच कबूतरी देवी जी के पति दीवानी राम जी का देहांत हो गया। छोटे बच्चों के बीच कबूतरी दी अकेली रह गईं। दीवानी राम जी के बिना कबूतरी दी असहाय थीं, और तीनों बच्चे अभी बहुत छोटे थे। कबूतरी दी इन पारिवारिक उलझनों में फंसकर रह गई और कुछ समय के लिए गुमनाम जैसी हो गई। कबूतरी दी की मधुर आवाज और उनके गीत लोगों के दिमाग में थे लेकिन कबूतरी दी की सुध लेने वाला कोई नहीं था। मजबूरी में कबूतरी दी ने बच्चों को पालने की खातिर एक बार फिर से खेती-मजदूरी करना शुरू कर दिया। वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल बताते हैं कि कई सालों के बाद पिथौरागढ़ शहर के कुछ जागरूक नागरिक, संस्कृतिकर्मी और पत्रकार क्वीतड़ जाकर उनसे मिले तो कबूतरी दी किसी के खेत में मजदूरी करती हुई बहुत ग़ुरबत में दिन काट रही थीं। कुछ संस्थाओं के प्रयास से कबूतरी दी को मंच पर आने का मौका मिला और कबूतरी दी फिर से अपने प्रशंसकों के बीच छा गईं। सरकार को भी कुछ होश आया और उन्हें सम्मानित किया गया। देशभर से कबूतरी देवी को सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया जाता था। उनकी छोटी बेटी हेमा देवी ने परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए कबूतरी दी का पूरा साथ दिया। कई मौकों पर जागरूक लोगों के संयुक्त प्रयासों से बीमारी की स्थिति में कबूतरी दी को इलाज के लिए AIIMS तक ले जाया गया। वहां से स्वस्थ होकर लौटने के बाद कबूतरी दी अपनी दो बेटियों के साथ कभी पिथौरागढ़, कभी खटीमा रहने लगीं और जब भी अवसर मिला उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों तक अपनी विरासत को पहुंचाने की भरसक कोशिश भी की। इधर अधिक उम्र और पुरानी बीमारी के कारण वो अक्सर बीमार रहने लगीं। परिवार की आर्थिक स्थिति कभी सुधर नहीं पाई। कई बार उन्हें मिलने वाली सरकारी पेंशन का महीनों तक इंतजार करना पड़ता था। इन आर्थिक-शारीरिक विषमताओं के बीच रहते हुए कबूतरी दी का सम्मान हर उत्तराखंडवासी के दिल में बना रहा।

उत्तराखंड राज्य, जिसकी स्थापना ही विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के नाम पर हुई थी, कबूतरी देवी जी उस पहचान का बहुत बड़ी प्रतीक थी। सौरयाली (भारत) और डोटी (नेपाल) के एक बड़े इलाके की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान दी और बहुत से लोक कलाकारों को आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी। अपने समाज और प्रशंसकों से कबूतरी दी को बहुत स्नेह और सम्मान मिला। उनके जीवन से उनके चाहने वालों को ये सीख भी मिली कि मनुष्य अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर जिंदगी के उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए भी अमर हो सकता है।

कबूतरी दी के गीत की कुछ पंक्तियां बार बार याद आ रही हैं : इस्टेसन सम्म पुजै दे मैं लई, पछिन बिराना ह्वै जौंला (मुझे स्टेशन तक पहुंचा दो, फिर हम अजनबी हो जाएंगे)

संघर्षमय यात्रा के बाद आखिर कबूतरी दी का स्टेशन आ ही गया, लेकिन उनके गीत हमेशा हमारे साथ बने रहेंगे।

*लेखक – हेम पन्त, मोबाइल : 9720454001

य लै पढ़ो : एक छी कपोतरी देवी

उत्तराखंडकि तीजन बाई, पिथौरागढ़क क्वीतड़ गौंक रौणी सुप्रसिद्ध लोकगायिका कुमाउनी गिदार कपोतरी (कबूतरी) देवीक लंबी बीमारीक बाद 6 जुलाई 2018 हुणि 73 वर्षकि उमर में निधन हैगो। ऊँ कभैं इस्कूल नि गाय और उनरि जन्मदिनकि लै के खबर न्हैति । 1970-80 क दौर में उनूल कुमाउनी में गीत गुनगुनाण शुरू करौ । उनार बौज्यू देवरामल जो एक मिरासी छी उनुकैं गीत – संगीत बचपन बटि सीखा । उनार मैंस दिवानी रामल लै उनुकैं गीत-गायन विधा में प्रोत्साहित करौ ।

कपोतरी ज्यूल हारमोनियम में आपण गीतों कैं संगत दी । आकाशवाणी लखनऊ और नजिमाबाद में लै उनार गीतों कि रिकार्डिंग हैछ । उनूल 100 है ज्यादै गीत प्रस्तुत करीं जमें बै ‘आज पनी जौं जौं… और पहाड़ो ठंडा पाणी… लोगों जुबान पर हमेशा रईं । उनार तीन नान छीं । च्यल पलायन करि बेर क्वे मैदानी क्षेत्र में छ । ठुलि चेलि मंजू और नानि हेमा छ । द्विनूं कैआपण परिवार छ ।

कपोतरी ज्यूक पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में इलाज चलि रौछी । उनुकैं भल इलाज करणक लिजी पिथौरागढ़ बै भ्यार नि भेजि सक । मरण तक उनरि सेवा उनरि 18 साल कि नातिणि रिंकूल करी । उनरि चिता कैं आग उनरि नानि चेलि हेमाल दे । हेमाल आपणि इज कि चिता कैं आग दी बेर समाज कैं य संदेश दे कि च्यल – चेलि एक समान छीं । कर्मकांडक ठेकेदारों कैं भलेही य बात नि पचा पर हेमाल एक भौत भल संदेश दे य दुनिय कैं। आपणि इजकि चिता कैं आग दीणक लिजी कैक ऐसान नि ल्हि ।

कपोतरी ज्यू कैं 2013 में संस्कृति सम्मान और 2016 में लाइफ अचीवमेंट सम्मान उत्तराखंड सरकारल दे । 22 नवंबर 2014 हुणि उनुकैं उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच दिल्ली (प्रयोजक DPMI) द्वारा कांस्टीट्यूसन क्लब नई दिल्ली में महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल सम्मानल सम्मानित करीगो जमें उनुकैं इक्कीस हजार रूपें और प्रसस्तिपत्र एवं अंगवस्त्र भेंट करीगो । य मौक पर कएक सहित्यकारों दगाड़ मी लै उ सभागार में मौजूद छी ।

कपोतरी ज्यू कैं विनम्रतापूर्वक श्रद्धाजंलि । दूर-दराज पहाड़ में एक गरीब मिरासी घर में पैद हई य सैणी मरण है पैली आपण हुनरल आपण नाम अमर करिगे । उनूल हमरि भाषा कि आपण गीत -संगीत और शब्द-सम्पदाल खूब स्याव करी । एक हजार रूपें मासिक पिलसनल गुजार करनै उनर जीवन कना में ई कटियौ । उत्तराखंड सरकारल कपोतरी ज्यूक नाम पर एक पुरस्कार स्थापित करण चैंछ । य ई उनुकैं सांचि श्रद्धांजलि ह्वलि ।

*पूरन चन्द्र काण्डपाल

यह भी पढ़ें : कबूतरी देवी के साथ ही लोकगायकी के स्वर्णिम अध्याय पर विराम

पांच दशक से दुनिया को सुनाती रही पहाड़ का दर्द और नैसर्गिक खूबसूरती
लोक परंपरा की ध्वजवाहक बनी, आर्थिक विपन्नता में कटा जीवन
हल्द्वानी। राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित, विख्यात लोक गायिका कबूतरी देवी के देहवसान के साथ ही कुमाऊं की परम्परागत लोक गायकी के एक स्वर्णिम अध्याय पर विराम लग गया है। अब नई पीढ़ी ठेठ पश्चिमी रंग में है। ऐसे में लोकगायकों को कबूतरी देवी की ज्यादा कमी खलेगी और इस शून्य को शायद कभी भी नहीं भरा जा सकेगा। इसके साथ ही दशकों पुराना स्वर्णिम अध्याय का एक पन्ना पूरा हो गया है। करीब पांच दशक से उत्तराखंड की लोक गायकी में कबूतरी देवी ने कुमाऊं को नई पहचान दी थी। लखनऊ और नजीबाबाद के आकाशवाणी केन्द्रों से ‘उत्तरायण’ व अन्य कार्यक्रमों में कबूतरी के गीतों ने लोक संगीत की दुनिया में एक खास पहचान बना ली थी। पारिवारिक विरासत में मिली लोक गायन की मामूली शिक्षा-दीक्षा के बावजूद भी कबूतरी देवी की गायन शैली में कई विशेषताएं मिलती हैं। उनके गायन शैली में पिथौरागढ़ की सौर्याली और काली पार डोटी अंचल की झलक मिलती है। ठेठ पहाड़ी राग में उनके गीतों के स्वर फूटने लगते हैं तो हर श्रोता खुद-ब-खुद मुरीद बन जाता है।

आकाशवाणी से प्रसारित उनके कई गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं। इनमें वह गीत तो लोगों के बीच में बेहद लोकप्रिय रहा, जिसमें रोजी रोटी के लिए पहाड़ से परदेश जा रहे व्यक्ति ने अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए अपने साथी से अनुरोध पूर्वक कहता है कि मुझे बस-स्टेशन तक पहुंचा कर विदा कर दो, दो-चार दिनों में ही मेरा अपना गांव मुझसे दूर हो जायेगा और मैं परदेश में विरान (अनजान) हो जाऊंगा। यह पहाड़ की बेरोजगारी, पलायन एवं आर्थिकी की तस्वीर पेश करती है।

‘आज पनि जांऊ जांऊ, भोल पनि जांऊ जांऊ

पोरखिन कै न्हैं जोंला।स्टेशन सम्म पुजाई दे मनलाई

पछिल विरान होये जौंला।स्टेशन जौंला टिकट ल्यौंला

गाड़ी में भैटि जौंलां स्टेशन सम्म पुजाई दे मनलाई, पछिल विरान होये जौंला।

परिजनों के अनुसार कबूतरी देवी का जन्म 1945 में चम्पावत के लेटी गांव के मिरासी परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम देवी राम और माता का नाम देवकी था। पिता देवीराम को गाने-बजाने में महारत हासिल थी। वे हुड़का और सारंगी के साथ ही तबला व हारमोनियम बहुत अच्छा बजाते थे। कबूतरी देवी की मां भी लोक गायन में निपुण थीं। स्थानीय इलाके में उस समय इनका खूब नाम था। परिवार में नौ बहिनें और एक भाई था। घर की गुजर-बसर छुटपुट खेती बाड़ी और अन्य कामों से किसी तरह चल ही जाती थी। स्कूल दूर होने के कारण गांव के लड़के बमुश्किल पांचवी तक ही पढ़ पाते थे। उस समय लड़कियों की पढ़ाई बहुत दूर की बात समझी जाती थी सो अन्य लड़कियों की तरह कबूतरी देवी की भी स्कूली पढ़ाई नहीं हो सकी। परिवार में गीत-संगीत का भरपूर माहौल था। इसका फायदा बालपन से ही कबूतरी देवी को मिला और वे गाने-बजाने में पारंगत हो गयी। माता-पिता द्वारा ने केवल चैदह साल की उम्र में शादी कर दी गयी और वे पिथौरागढ़ जिले में मूनाकोट के नजदीक क्वीतड़ गांव के दीवानी राम के साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत करने लगीं। उस समय इलाके में यातायात की पर्याप्त सुविधा उपलब नहीं थी। लोग-बाग पैदल ही चलते थे। कबूतरी देवी जब भी ससुराल (क्वीतड़) से मायके (लेटी) आती तो उन्हें पैदल पहुंचने में कम से कम डेढ़-दो दिन लग जाते। ससुराल के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे। पति दीवानी राम अपने फक्कड़ मिजाजी के चलते घर की जिम्मेदारियों की तरफ बहुत अािक यान नहीं दे पाते थे। गुजर-बसर के लिए परिवार के पास खेती की जमीन थी नहीं सो कबूतरी देवी दूसरों के खेतों में काम करके और किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके घर-परिवार का खर्च चलाती रहीं।विवाह के बाद पति दीवानी राम और सुपरिचित गायक भानुराम सुकोटी (जो कबूतरी देवी के ककिया ससुर भी थे) द्वारा संगीत के क्षेत्र में सही तरीके से मार्गदर्शन किया गया। हांलाकि कबूतरी देवी को ससुराल में गीत संगीत का मायके जैसा माहौल तो नहीं मिल पाया पर उनके गायन की कदर परिवार के लोग अवश्य करते थे। पति दीवानी राम ने उनके इस शौक को पूरा करने में भरपूर मदद की। दीवानी राम भले ही खुद गाना नहीं गाते थे पर जब-तब कबूतरी देवी के गायन को बढ़ावा दिया करते थे। कबूतरी देवी के साथ बैठकर वे बहुत शौक से नये गीतों को बनाने और उसको संवारने में अपना योगदान दिया करते। उनके पति को घूमने-फिरने का भी बहुत शौक था। कई बार वे कबूतरी देवी को भी अपने साथ ले जाया करते थे जिस वजह से गांव-शहर के समाज में दूर-दूर तक उनका परिचय होने के साथ ही अन्य नयी जानकारियां भी मिलती रहती थीं। इन्हीं दिनों एक बार पति दीवानी राम को आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले लोक गीतों के गायन प्रक्रिया की जानकारी मिली तो वे कबूतरी देवी को लखनऊ के आकाशवाणी केन्द्र में ले गये। इस तरह 28 मई, 1979 को उन्होंने आकाशवाणी की स्वर परीक्षा उत्तीर्ण कर अपना पहला गीत लखनऊ के आकाशवाणी केन्द्र में रिकार्ड करवाया। इस तरह आकाशवाणी के मायम से उनके गाये गीत लोगों के बीच लोकप्रिय होते चले गये। बाद में आकाशवाणी के नजीबाबाद, रामपुर समेत अन्य कई केन्द्रों में भी इनके गीतो की रिकाìडग हुई और उनके गीत वहां से प्रसारित भी हुए। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण उनदिनों पिथौरागढ़ से आकाशवाणी केन्द्रों तक आना-जाना भी मुश्किल भरा काम होता था। कबूतरी देवी को तब उस समय एक गीत को गाने का पारिश्रमिक केवल 50 रुपया ही मिलता था जो उनके आने-जाने के खर्च के हिसाब से कम हुआ करता था। इस बीच 1984 में अचानक पति दीवानी राम की भी मृत्यु हो गयी। पति की असमय मौत के बाद अब घर की पूरी जिम्मेदारी कबूतरी देवी सिर पर आ गयी।पारिवारिक जीवन पहले से कहीं अािक कष्टप्रद तरीके से बीतने लगा। जैसे-तैसे अपनी दो लड़कियों और एक लड़के की परवरिश की। बाद में लड़कियों की भी शादी कर दी। गुजर-बसर के सिलसिले में जब उनका लड़का मुम्बई चला गया तो कबूतरी देवी के गायन और संगीत का क्रम भी कुछ सालों तक छूट सा गया। आर्थिक अभाव के चलते मानसिक तौर पर परेशान रहने के कारण वे तकरीबन 10-12 सालों से अािक समय तक गुमनामी में जीती रहीं। बाद में पिथौरागढ़ के संस्कृति कर्मी हेमराज बिष्ट ने अपने खुद के प्रयासों से उनको फिर से गीत-संगीत के प्रति प्रोत्साहित किया। आर्थिक सहायता और पेंशन दिलाने की भी कोशिश की। कबूतरी के गानों में परदेश के एकाकीपन की टीस है, शिव के हिमालय में मन्द-मन्द झूलती हुई सन्या है, विरहिणी नारी की प्रतीक्षा है और तो और साथ में सोतों का मीठा पानी व लोगों की मीठी वाणी भी है। उनके गाये एक ऋतुरैण गीत में चैत की भिटौली और ईजू की नराई का बहुत ही मार्मिंक व सजीव चितण्रमिलता है-

बरस दिन को पैलो म्हैणा

आयो ईजू भिटौलिया म्हैणा

मैं बुलानि कन मेरि ईजू झुर झुरिये झन

आयो ईजू भिटौलिया म्हैणा

बरस दिन को पैलो म्हैणा।

पहाड़ के स्रतों का पानी कितना मीठा है और साथ ही यहां की बोली भी कितनी मीठी है। पर्वतीय परिवेश की इस खासियत को कबूतरी देवी ने गीत-संगीत में जिस सुन्दरता के साथ पिरोया है उसकी छाप लोगों के दिल में गहराई तक समायी हुई है। आज भी यह लोकगीत भी लोगों के बीच खासा लोकप्रिय है-पहाड़ को ठण्डो पाणि, के भली मीठी वाणीटौण लै नि लागनि, देव भूमि छोड़ि बेरजाण जस नि लागनि, पहाड़ को ठण्डो पाणि, के भली मीठी वाणी।पहाड़ की विशिष्ट गायन शैली की परम्परा को जीवित रखने में लोक गायिका कबूतरी देवी का बहुत बडा़ योगदान रहा है। अपने पुरखों से गीतों की एक लम्बी-चौड़ी विरासत की तस्वीर दिखाती है। 

ऋतु गीतों की विशेषज्ञ गायिका को मुख्यमंत्री ने भी दी श्रद्धांजलि 

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोकगायिका कबूतरी देवी के निधन पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि उत्तराखंड के लोक संगीत को बढ़ावा देने में स्व. कबूतरी देवी का योगदान अतुलनीय रहा है। उत्तराखंड के ऋतु आधारित गीतों की वे विशेषज्ञ गायिका थी। उनका जाना पर्वतीय लोक संगीत के लिए अपूरणीय क्षति है। कबूतरी देवी जैसे लोक संस्कृति के वाहक का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा तथा वे हर उत्तराखंडी के दिल में जीवित रहेंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्व. कबूतरी देवी हमारे पर्वतीय लोक संगीत एवं लोक संस्कृति की जीवंत प्रतिमूर्ति थी। 70 के दशक में उन्होंने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी। कबूतरी देवी ने आकाशवाणी के लिए करीब 100 से अधिक गीत गाए। उधर, प्रदेश कांगेस कमेटी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने स्व. कबूतरी देवी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उनके परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की है। उन्होंने कहा कि स्व. कबूतरी देवी ने लोक गायिका के रूप में केवल देश में ही नही बल्कि विदेशों में भी उत्तराखंड का नाम रोशन किया था। प्रदेश कांगेस कमेटी के मुख्य प्रचार समन्वयक धीरेंद्र प्रताप ने भी स्व. कबूतरी देवी के निधन पर शोक प्रकट करते हुए उन्हें एक महान गायिका बताया।

पंत, टम्टा व हृदयेश ने जताया गहरा शोक

पिथौरागढ़। लोक गायिका कबूतरी देवी के निधन पर वित्त व पेयजल मंत्री प्रकाश पंत ने कहा है कि कबूतरी देवी लोक संस्कृति की पारखी व उत्तराखंड की पहली प्रख्यात लोक गायिका थीं। निधन लोक गायन के क्षेत्र में एक रिक्त स्थान छोड़ गया है। गुंजी क्षेत्र से लौटे केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा ने जिला अस्पताल पहुंचकर लोक गायिका के निधन पर शोक जताया और श्रद्धांजलि दी। हल्द्वानी में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने भी कबूतरी देवी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि कबूतरी देवी के निधन से परंपरागत लोक गीत के गायकी में एक शून्यता की स्थिति आ गई है। इसकी भरपाई मुश्किल होगी। उन्होंने मृतक आत्म की शांति के लिए ईर से प्रार्थना की है। 

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

One thought on “दो देशों की साझा प्रतिनिधि थीं कुमाऊँ की ‘तीजनबाई’ कबूतरी दी

  • July 7, 2018 at 6:31 PM
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    Hardik Sradhanjali

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