खुशखबरी : कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर बहाल, 15वें-16वें दलों को हरी झंडी

नैनीताल। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम की खराबी व इस कारण पिथौरागढ़ से सेना के हेलीकॉप्टरों के गुंजी के लिए उड़ान न भर पाने के कारण अपने पौराणिक मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से बहाल होने जा रही है। यात्रा के स्थगित किये गये 4 में से 2 दलों को भारतीय विदेश मंत्रालय ने अनुमति दे दी है। यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम को ईमेल से भेजी गयी जानकारी के अनुसार यात्रा का 15वां दल आगामी मंगलवार 21 अगस्त को दिल्ली में एकत्र होगा, तथा विभिन्न औपचारिकताओं को पूरा कर 25 अगस्त को दिल्ली से चलकर काठगोदाम होते हुए अल्मोड़ा पहुंचेगा। वहीं 16वां दल 25 को दिल्ली में जुटेगा और 29 को यहां पहुंचेगा। उल्लेखनीय है कि मूल कार्यक्रम के तहत 15वें दल को सात अगस्त और 16वें दल को 11 अगस्त को अल्मोड़ा पहुंचना था, वहीं 15 को 17वां तथा 19 को 18वें दल का आगमन होना था। लेकिन आखिरी 4 दलों के यात्रा कार्यक्रम में 18 दिनों का विलंब हो गया है। निगम के जीएम त्रिलोक सिंह मर्तोलिया ने इस जानकारी की पुष्टि करने के साथ ही 16वें दल के कुछ सदस्यों द्वारा 26 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार होने के दृष्टिगत आशंकाएं व्यक्त करने की जानकारी दी है।

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खराब मौसम और अन्य दिक्कतों ने कैलास मानसरोवर यात्रियों को इस कदर परेशान कर दिया है कि अब वो यात्रा बीच में ही छोड़ने लगे हैं। 10वें दल के दो यात्रियों ने जहां 3 दिन पूर्व पिथौरागढ़ से ही यात्रा छोड़ दी थी। इस दल के तीन और यात्रियों ने वापसी कर ली है। इसके अलावा पिछले कई दिन से चौकोड़ी में रुक कर मौसम खुलने का इंतजार कर रहे 11वें दल के दो सदस्यों ने भी यात्रा बीच में छोड़ दी है। इस तरह कुल सात लोग यात्रा बीच में छोड़ चुके हैं। वहीं 10वें दल के पिथौरागढ़ में अटके हुए 19 सदस्य अब 11वें दल के साथ आगे की यात्रा करेंगे। इन 19 यात्रियों की वीजा अवधि बढ़ाने की नौबत आ गई है। 10वें दल के 25 यात्री चार-पांच दिन पूर्व ही गुंजी पहुंच चुके थे जबकि मौसम खराब होने से दल के 24 सदस्य उस दिन से गुंजी नहीं जा पाए। गुंजी जाने के लिए ये यात्री मौसम खुलने के इंतजार में रोज पिथौरागढ़ के नैनीसैनी एयरपोर्ट पहुंच रहे थे, मगर घंटों इंतजार के बाद भी मौसम इनकी राह में बाधा बना रहा। क्षुब्ध होकर इन यात्रियों ने बीते शनिवार को नैनीसैनी हवाई पट्टी पर धरना दिया और सरकार व वायुसेना अधिकारियों पर उनकी समस्या की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने लंबे समय से मौसम खराब होने के बावजूद छोटे हेलीकॉप्टर उपलब्ध नहीं कराने को लेकर भी रोष जताया। परेशान दो यात्रियों ने उसी दिन यात्रा बीच में छोड़ने का निर्णय लिया और वापस चले गए। 12 दिन से पिथौरागढ़ में ही फंसे होने और अन्य दिक्कतों के चलते इस दल के 3और सदस्यों ने भी यात्रा बीच में छोड़ दी है।

इन परेशानियों का कारण : विदेश मंत्रालय की ओर से यात्रा को पिथौरागढ़ से गुंजी के लिए वायु सेना के बड़े हेलीकॉप्टरों की व्यवस्था करना रहा है। विदेश मंत्रालय की ओर से भलमनसाहत में उठाया गया यह कदम उल्टा पड़ रहा है। क्योंकि सुबह की जिस अवधि में बड़े हेलीकॉप्टरों को उड़ने की अनुमति है, उस दौरान इस वर्ष ही नहीं हमेशा गुंजी जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बादल छाये रहते हैं, और दिन में 11-12 बजे जब बादल हटते हैं, उस समय के बाद बड़े हेलीकॉप्टरों को उड़ान भरने की अनुमति नहीं है। ऐसी स्थितियों से न केवल यात्री तंग आ चुके हैं, वरन पिथौरागढ़ जिला प्रशासन के साथ यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक केएमवीएन यानी कुमाऊं मंडल विकास निगम के समक्ष भी यात्रियों के राशन आदि की सामग्री आदि के मामले में समस्या आने लगी है। गत दिवस यात्रियों के एक शिष्टमंडल ने पिथौरागढ़ के डीएम से मिलकर इस समस्या से बाहर निकालने, उन्हें मौसम साफ होने पर गुंजी पहुंचाने अथवा वापस भेज देने का अनुरोध किया था। इस पर पिथौरागढ़ के डीएम ने यात्रा को देखने वाले विदेश मंत्रालय के पूर्वी एशिया विभाग को पत्र लिखकर छोटे हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने की मांग की।

केएमवीएन ने शुरू में ही दे दिया था धारचूला से बुदी हेली सेवा का विकल्प

नैनीताल। पिथौरागढ़ के डीएम ने शनिवार को यात्रियों के अनुरोध के बाद विदेश मंत्रालय से निजी कंपनियों के 5 छोटे 5-6 सीटर हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है, ताकि यात्रियों को धारचूला तक सड़क मार्ग से ले जा कर वहां से इन हेलीकॉप्टरों के जरिये बुदी तक भेजा जा सके। उल्लेखनीय है कि यात्रा के आयोजन का लंबा अनुभव रखने वाली केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने यात्रा के शुरू होने से पूर्व ही विदेश मंत्रालय को यही विकल्प सुझाया था। लेकिन तब संभवतया विदेश मंत्रालय ने इस विकल्प को दरकिनार तक सेना के सुरक्षित हेलीकॉप्टरों का बेहतर विकल्प स्वीकार किया होगा।

यह है समस्या का मूल कारण

नैनीताल। कैलाश मानसरोवर यात्रा के सुचारू न हो पाने के पीछे समस्या यह है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित गुंजी में अधिकांश समय बादल घिरे रहते हैं। इसलिए वहां अक्सर हेलीकॉप्टरों का उतरना कठिन होता है, जबकि अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित गुंजी में यह समस्या नहीं होती है। लेकिन गुंजी में छोटे हेलीकॉप्टर ही उतर सकते हैं। इधर यात्रियों को पिथौरागढ़ से गुंजी व गुंजी से पिथौरागढ़ लाने के लिए तैनात सेना के बड़े हेलीकॉप्टरों को 11 से 12 बजे के बीच उड़ान की अनुमति नहीं है, जबकि इसी समय के दौरान मौसम खुल रहा है। लेकिन अनुमति न होने के कारण वे उड़ नहीं पा रहे हैं, और नैनी सैनी हवाई अड्डे तक जाने के बाद यात्रियों को लौटना पड़ रहा है।

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  • तय समय पर नहीं आयेंगे 15वें से 18वें दल 
केएमवीएन के प्रबंध निदेशक श्री धीराज गर्ब्याल

नैनीताल, 2 अगस्त 2018। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुमाऊं मंडल विकास निगम के द्वारा कुमाऊं-उत्तराखंड के पौराणिक लिपुलेख दर्र के मार्ग से आयोजित की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा के आखिरी चार बैचों को ‘विलंबित’ कर दिया है। ऐसा यात्रा मार्ग पर मौसम की खराबी की वजह एवं निगम के अनुरोध पर किया गया है। आगे निगम के एमडी धीराज गर्ब्याल ने साफ़ किया कि यात्रा को रोका नहीं वरन विलंबित (Delayed) किया गया है।  बताया कि जैसे-जैसे यात्री दल आगे बढ़ेंगे, वैसे-वैसे विलंबित दलों के यात्रियों को यात्रा में लाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि यात्रा पर आ चुके कई दल पहले ही मौसमी दुश्वारियों के कारण पहले ही काफी विलंब से चल रहे हैं, व जगह-जगह फंसे हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि कैलाश यात्रा में कुल 18 दल शामिल होते हैं। 12 जून को पहले दल के अल्मोड़ा पहुंचने से इसकी औपचारिक शुरूआत हुई है। पहले छः दलों में कुल 343 यात्री यात्रा पूरी कर वापस जा चुके हैं। लेकिन इधर 7वां दल जिसे 26 जुलाई को दिल्ली वापस पहुंचना था अभी भी गुंजी में फंसा है। इसी तरह 8वें व 9वें दल के यात्री भी देरी से तिब्बत में हैं। यात्रा पर जा रहे 10वें दल के आधे यात्री पिथौरागढ़ व आधे गुंजी में हैं। वहीं 11वें दल के 43 यात्री चौकौड़ी, 12वें दल के यात्री अल्मोड़ा तथा 13वें दल के यात्री भीमताल में रोके गये हैं। तय समय सारिणी के अनुसार इन तीन दलों को क्रमशः चीन, नाबीढांग व गुंजी पहुंच जाना चाहिए था। जबकि 14 वें दल के यात्री दिल्ली में औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। इधर यात्रा में हो रही देरी को देखते हुए विदेश मंत्रालय ने सबंधित दलों को लाइजनिंग अधिकारियों को 15 से 18 तक के बैच के यात्रियों को फिलहाल यात्रा ‘विलंबित’ होने की जानकारी देने को कहा है। आगे मौसम में सुधार होने पर इन्हें बुलाया जाएगा।

आदि कैलाश यात्रा रोकी, 1 करोड़ का नुकसान
नैनीताल। कुमाऊं मंडल विकास निगम ने अपने स्तर से आयोजित की जाने वाली आदि कैलाश यात्रा को निरस्त कर दिया है। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष इस यात्रा में 424 यात्री गये थे, और इस वर्ष मार्च माह में ही 300 लोगों ने इस यात्रा के लिए बुकिंग करा दी थी। किंतु 1 व 2 जुलाई को यात्रा मार्ग पर नज्यंग व मालपा में हुए भूस्खलन के कारण यात्रा में व्यवधान आया और चार दलों में केवल 179 यात्री ही यात्रा कर पाये। इससे निगम को करीब 1 करोड़ का नुकसान हुआ है। निगम के एमडी धीराज गर्ब्याल ने कहा कि यात्रा मार्ग के दुरुस्त न होने और हेलीकॉप्टर न मिल पाने के कारण यात्रा को रोक दिया गया है।

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-कैलाश मानसरोवर यात्रा में यात्रियों को 9 दिन तक अतिरिक्त रुकाना पड़ गया
-आदि कैलाश यात्रा में यात्रियों के न जा पाने से हुआ करीब एक करोड़ रुपए का नुकसान
-आदि कैलाश यात्रियों के लिए छोटे हेलीकॉप्टर का प्रबंध करने जा रहा है केएमवीएन
नवीन जोशी, नैनीताल। खराब हुए मौसम ने कैलाश एवं आदि कैलाश यात्राओं की आयोजक केएमवीएन यानी कुमाऊं मंडल विकास निगम को करीब सवा करोड़ रुपए का नुकसान करा दिया है। इसमें से करीब एक करोड़ रुपए का नुकसान आदि कैलाश यात्रा के नज्यंग व मालपा में हुए भूस्खलन के कारण सुचारू न हो पाने के कारण हुआ है, जिससे प्राप्त आय से निगम को काफी हद तक कैलाश यात्रा में आने वाले अतिरिक्त खर्चों को वहन करने में मदद मिलती है। वहीं कैलाश यात्रा के यात्रियों को निगम को 8-9 दिनों तक भी बिना कोई अतिरिक्त किराया लिये टिकाना पड़ा है। इससे भी निगम को करीब 22 लाख रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में आदि कैलाश यात्रा को सुचारू करने के लिए निगम छोटे हेलीकॉप्टर का प्रबंध करने जा रहा है।
पहले आदि कैलाश यात्रा की करें। 2016 में 222 ओर पिछले वर्ष यानी 2017 में आदि कैलाश यात्रा पर 424 यात्री गये थे, और इस वर्ष की यात्रा के लिए भी मार्च माह में ही 300 यात्रियों ने बुकिंग करा ली थी। इससे इस वर्ष पिछले वर्ष से भी अधिक यात्रियों के यात्रा पर जाने की पूरी संभावना थी। किंतु इस वर्ष 1-2 जुलाई को नज्यंग व मालपा में हुए भूस्खलन के बाद पैदल मार्ग बंद होने से यात्रा को आगे संचालित करने में समस्या आ गयी। ऐसे में निगम बमुश्किल 7 बैचों में अब तक 179 यात्रियों को ही आदि कैलाश की यात्रा करा पाया है।यात्रा मार्ग में हुए भूस्खलन के कारण 8वें व 11वें बैच के 60 यात्रियों ने पहले बुकिंग करा चुके यात्रियों ने अपनी बुकिंग निरस्त करा दी। ऐसे में निगम को प्रति यात्री करीब 5000 रुपए जीएसटी यात्रियों को पूरी बुकिंग धनराशि लौटाने के बावजूद स्वयं वहन करनी पड़ी। इसके अलावा भी पिछले वर्ष जहां निगम को आदि कैलाश यात्रा से करीब पौने दो करोड़ रुपए की आय हुई थी, वहीं अब तक करीब 80 लाख रुपए की ही आय हुई है। इस प्रकार करीब 1 करोड़ की हानि हो गयी है। वहीं कैलाश यात्रा में 6 बैचों के यात्रियों को अतिरिक्त दिन ठहराने से भी निगम को करीब 22 लाख का नुकसान उठाना पड़ा है। इस संबंध में पूछे जाने पर नुकसान को स्वीकारते हुए निगम के एमडी धीराज गर्ब्याल ने कहा कि कैलाश यात्रा दो देशों के बीच होने व धार्मिक महत्व के कारण प्रतिष्ठित यात्रा है। इस यात्रा से निगम को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता है। बल्कि आदि कैलाश यात्रा से प्राप्त आय से निगम काफी हद तक कैलाश यात्रा के खर्चों को वहन करता रहा है। आगे आदि कैलाश यात्रा को सुचारू करने, यात्रियों को पैदल की जगह राज्य सरकार के छोटे हेलीकॉप्टर से बुदी तक ले जाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

कैलाश यात्रा के पूर्वाभ्यास के रूप में यात्री करते हैं आदि कैलाश की यात्रा
नैनीताल। कैलाश यात्रा में जिस तरह प्राकृतिक रूप से बने शिवलिंग के दर्शन होते हैं, उसी तरह आदि कैलाश यात्रा में यात्रियों को प्राकृतिक रूप से हिमालय पर बर्फ से बने ‘ऊं पर्वत’ के दर्शन होते हैं। आदि कैलाश यात्रा चूंकि पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में होती है, इसलिए इस यात्रा के लिए कैलाश यात्रा की तरह बीजा व पासपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे में अधिक दुर्गम कैलाश यात्रा पर जाने के इच्छुक देश भर के शिव के भक्त श्रद्धालु पहले आदि कैलाश यात्रा पर जाकर अपनी क्षमताओं को जानने के लिए भी आदि कैलाश यात्रा करते हैं। खासकर श्रावण के माह में आदि कैलाश जाने के लिए देश भर के शिव भक्तों की खासी इच्छा रहती है। आदि कैलाश यात्रा से स्थानीय पोनी-पोर्टरों को कैलाश यात्रा से भी अधिक लाभ इस रूप में मिलता है कि इस यात्रा में उन्हें यात्रा पर जाने से लेकर लौटने तक का पूरा किराया मिलता है, जबकि कैलाश यात्रा पर उन्हें यात्रियों को चीन सीमा तक छोड़ने के बाद कई बार बिना यात्रियों के भी वापस लौटना पड़ता है।

यात्रा मार्ग के व्यापारियों आदि को भी हो रहा है नुकसान
नैनीताल। इस वर्ष कैलाश यात्री भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टरों के जरिये पिथौरागढ़ से सीधे गुंजी जा रहे हैं। इससे यात्रा मौसम की दुश्वारियों के बावजूद पैदल चलने के लिहाज से काफी आसान तो हुई है, परंतु धारचूला से लेकर गुंजी तक के छोटे व्यवसायियों तथा पोनी-पोर्टरों को पूर्व में यात्रा के पैदल पौराणिक मार्ग से होने पर जो लाभ मिलता था, वह इस वर्ष नहीं मिल रहा है। केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि पिछले वर्षों में स्थानीय लोगों को कैलाश यात्रा करीब पौने चार करोड़ रुपए की आय दिलाती थी, जिसमें इस बार भारी कमी आयी है।

पूर्व समाचार : आखिर 10 दिनों के बाद सुचारु हुई कैलाश यात्रा, 12वां दल भी तय समय पर आएगा

-विदेश मंत्री की चिंता भी हुई दूर, सोमवार को संसद में भी दी गयी थी यात्रियों के फंसे होने की जानकारी, यात्रियों का चीन में वीजा भी एक सप्ताह के लिए आगे बढ़ाया गया

नैनीताल, 24 जुलाई 2018। आखिर मौसम मेहरबान हुआ, और कैलाश यात्रा मंगलवार को सुचारू हो गयी। मंगलवार सुबह गुंजी में पिछले 10 दिनों से फंसे 5वें दल के यात्रियों को भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से आया गया और पांचवे दल के यात्रियों को पिथौरागढ़ से गुंजी छोड़ दिया गया। आगे दिन तक छठे दल के 9 दिन से फंसे यात्रियों को भी पिथौरागढ़ ले आने तथा नौवें दल के यात्रियों को गुंजी पहुंच जाने की उम्मीद है। इसके साथ ही आज ही पांचवे दल के यात्रियों के शाम तक अल्मोड़ा और छठे दल के यात्रियों के चौकोड़ी आने तथा 10वें व 11वें दल के क्रमशः अल्मोड़ा व चौकोड़ी में फंसे यात्रियों के शाम तक पिथौरागढ़ पहुंच जाने की भी पूरी उम्मीद है। इस तरह एक-दिन में ही पिछले 10 दिनों से जारी गतिरोध के समाप्त होने व सुचारू होने की स्थितियां बन गयी हैं। उल्लेखनीय है कि सोमवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में भी कैलाश यात्रियों के यात्रा मार्ग में फंसे होने की जानकारी संसद में दी थी।

दो देशों की सीमा में होने वाली इस प्रतिष्ठित व पौराणिक काल से चली आ रही विश्व की अनूठी व लंबी यात्रा के भारत में आयोजक केएमवीएन के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल ने इसके साथ ही बताया कि आगे जा रहे आठवें, नौवें आदि दलों के यात्रियों का चीन में बीजा भी एक सप्ताह के लिए आगे बढ़ा दिया गया है। साथ ही पूर्व में किये गये अनुरोध के विपरीत 12वें दल के यात्रियों को अपने नियत समय पर ही भेजने के लिए पुनः विदेश मंत्रालय से अनुरोध कर दिया गया है। 

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कैलाश मानसरोवर यात्रा में आ रही समस्याओं के निदान व खास तौर पर यात्रियों को लाने-ले जाने के लिये कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल सोमवार को देहरादून में उत्तराखंड के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह से मिले। इस मुलाकात में उन्होंने रास्ते मे लंबे समय से फंसे 4 बैच के कैलाश यात्रियों को धारचूला से बुदी के बीच लाने-ले जाने के लिये 4 छोटे हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने की मांग की। गर्ब्याल ने कुमाऊं मंडलायुक्त राजीव रौतेला द्वारा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये ली गई बैठक में भी यह मांग की। इस पर आयुक्त ने मुख्य सचिव से स्वयं भी अनुरोध करने की बात कही। वही मुख्य सचिव सिंह ने भी विदेश मंत्रालय से इस बारे में बात कर 4 हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने की मांग की। उल्लेखनीय है कि मौसम की खराबी के कारण सेना के बड़े हेलीकॉप्टर पिछले 1 सप्ताह से पिथौरागढ़ से गुंजी के लिये उड़ान नहीं भर पा रहे हैं। इस कारण 4 दलों के 168 यात्री रास्ते में फंसे हुए हैं। इस कारण केएमवीएन ने विदेश मंत्रालय से 12वें दल के यात्रियों को दिल्ली में ही रोकने का अनुरोध भी किया है।

दुश्वारियां का असर आगे के बैचों में यात्रियों की संख्या पर

नैनीताल। कैलाश मानसरोवर यात्रा में पिथौरागढ़ से आगे हेलीकॉप्टरों की उड़ान में आ रही दिक्कतों का प्रभाव यात्रा पर जाने वाले यात्रियों की संख्या पर पड़ने लगा है। 10वें बैच में 11 महिलाओं सहित केवल 49 यात्री ही आये, जबकि अब 11वें दल में भी केवल 43 यात्री ही रविवार को दिल्ली से चलकर काठगोदाम पहुंचने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक यात्रा दल में 60 यात्री अपेक्षित होते हैं, और अत्यधिक संख्या में यात्रियों के आवेदनों के कारण यात्रियों का चयन लॉटरी के जरिये किया जाता है।

पूर्व समाचार : कैलाश मानसरोवर यात्रा हुई बिचौलिया मुक्त, हजारों स्थानीय लोग कमाएंगे करोड़ों, पलायन भी रुकेगा, जानें कैसे..

-पोनी-पोर्टरों का पहली बार निगम ने किया पंजीकरण व किया आपदा-बचाव को प्रशिक्षित
-यात्रियों को भी पोनी-पोर्टरों के बिचौलिये ठेकेदारों को दिया-जाने वाला 2-3 हजार का खर्च बचेगा
-नाबी गांव के 20 परिवारों के पास अनुकूलन के लिए एक रात्रि ‘होम स्टे’ भी करेंगे यात्री, सीमांत क्षेत्रों से व्यापक पैमाने पर पलायन पर भी लगेगी लगाम
-पहले दल के साथ मुख्यमंत्री रावत भी शामिल हो सकते हैं नाबी में होम स्टे में

राष्ट्रीय सहारा, 12 जून 2018

नवीन जोशी, नैनीताल। यात्रा मार्ग को लेकर रहे तमाम संशयों के बाद अपने परंपरागत मार्ग से ही मंगलवार से शुरू होने जा रही आदि कैलाश यात्रा में इस बार काफी कुछ नया होने जा रहा है। यात्रा जहां पहली बार धारचूला से 42 किमी आगे गर्बाधार तक छोटे वाहनों से जाएगी, और इस प्रकार यात्रियों को आने-जाने में कुल 84 किमी कम पैदल चलना पड़ेगा, वहीं दो पड़ाव सिरखा व गाला यात्रा से हट जाएंगे, तथा नाबी और कालापानी जुड़ जाएंगे। नाबी में यात्री पहली बार आगे की उच्च हिमालयी यात्रा के लिए ‘होम स्टे’ करेंगे। इस मौके पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी पहले दल के यात्रियों के साथ नाबी में हो सकते हैं। यात्रा में जाने वाले सभी यात्रियों का 5-5 लाख रुपए का बीमा होगा, और यात्रियों के साथ जाने वाले सभी 600 पोनी-पोर्टर आपदा की स्थितियों के लिए प्रशिक्षित होंगे। वहीं सबसे बड़ी बात, पहली बार यात्रा बिचौलियों से मुक्त होगी, तथा यात्रा के जरिये हजारों स्थानीय लोग 2 करोड से अधिक रुपए की सीधे एवं करीब एक करोड़ अपरोक्ष तौर पर अतिरिक्त आय भी प्राप्त करेंगे।

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यात्रा के भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल ने बताया कि पहली बार यात्रा से बिचौलियों को दूर कर दिया गया है, तथा यात्रा मार्ग के स्थानीय लोगों को सीधे लाभ दिया जा रहा है। पहली बार यात्रा में नाबी गांव का पड़ा जोड़ा गया है, जहां कैलाश के साथ ही आदि कैलाश यात्रा के यात्री स्थानीय मौसम व परिस्थितियों से साम्य-अनुकूलन बनाने के लिए एक रात्रि ‘होम स्टे’ करेंगे। इससे नाबी गांव के 20 होम स्टे के लिए प्रशिक्षित पूरी तरह आवश्यक सुविधाओं से युक्त किये गये परिवार सीधे तौर पर यात्रा में आने वाले यात्रियों से प्रति यात्री 800 रुपए की दर से प्राप्त करेंगे। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं अन्य गतिविधियों के जरिये भी स्थानीय लोगों को आय मिलेगी। इसके अलावा निगम ने पहली बार यात्रियों के साथ जाने वाले पोनी-पोर्टरों (घोड़े वाले व कुली) की व्यस्था अपने हाथ में लेते हुए 600 लोगों का पंजीकरण कराने के साथ उन्हें आपदा राहत का प्रशिक्षण दिलाया है। इससे हर यात्री से पोर्टरों को 15-16 हजार रुपए की आय प्राप्त हो सकती है। उल्लेखनीय है कि यात्रा पर अधिकतम 1080 यात्री जा सकते हैं, तथा अधिकांश यात्री इनकी सेवा लेते ही हैं। इस प्रकार केवल पोनी-पोर्टरों व होम-स्टे से ही स्थानीय लोगों को करीब पौने दो करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय हो सकती है। उल्लेखनीय है कि पहले पोनी-पोर्टरों की व्यवस्था सीधे निगम के बजाय बिचौलियों के माध्यम से यात्रियों को करनी पड़ती थी, जबकि इस बार बिचौलियों की भूमिका हटा दी गयी है। एमडी श्री गर्ब्याल ने बताया कि अब पोनी-पोर्टरों को उनके पंजीकरण के आधार पर नंबर से यात्रियों से सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इस प्रकार यात्रियों को भी बिचौलियों को दिया जाने वाले प्रति पोनी-पोर्टर करीब 2-3 हजार रुपए का अतिरिक्त हिस्सा बचेगा। इसके अलावा आदि कैलाश यात्रा के यात्रियों से भी स्थानीय लोगों को इसी तरह की करोड़ों रुपए की आय घर पर होने जा रही है। निगम की इस पहल से सीमांत क्षेत्रों से होने वाले पलायन पर भी लगाम लगने की उम्मीद की जा रही है। उल्लेखनीय है कि 1981 से चल रही कैलाश मानसरोवर यात्रा के तहत 2017 तक 442 दलों में कुल मिलाकर 15,952 यात्री यात्रा पर गये हैं। इनमें सर्वाधिक 921 यात्री वर्ष 2017 एवं 910 यात्री 2014 में 18-18 दलों में यात्रा में गये हैं।

आज से शुरू हो रही है यात्रा, पहले दल में रिकार्ड 59 यात्रियों के पहुंचने की संभावना

नैनीताल। तमाम किंतु-परंतुओं को नजरअंदाज करते हुए पूरे एक वर्ष के इंतजार के बाद दो देशों के रास्तों से होकर गुजरने वाली विश्व की अनूठी व सबसे बड़ी कैलाश मानसरोवर यात्रा मंगलवार 12 जून से शुरू होने जा रही है। यात्रा का पहला दल आज दिल्ली से चलकर कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम से कुमाऊं में प्रवेश करेगा। जहां यात्रा के भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल व महाप्रबंधक त्रिलोक सिंह मर्तोलिया सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी पहले दल के सदस्यों का औपचारिक स्वागत करेंगे। अधिकतम 60 सदस्यों के दल की इस यात्रा के पहले दल में रिकार्ड 59 यात्री शामिल हो रहे हैं। श्री गर्ब्याल ने बताया कि इस बार पिछले वर्षों से अलग पहली बार भारतीय विदेश मंत्रालय के स्तर से 60 के दल के लिए 8 अधिक यात्रियों को बुलाया गया, लेकिन 8 के स्वास्थ्य परीक्षण में सफल न होने एवं एक के आखिरी क्षणों में दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण 59 यात्री ही आ पा रहे हैं। आगे भी हर दल के अतिरिक्त यात्री बुलाए जाएंगे। ऐसे में इस बार पूरी यात्रा के दौरान भी रिकार्ड बन सकते हैं।

पहले दल में सर्वाधिक 14 यात्री दिल्ली व 11 यूपी के

नैनीताल। मंगलवार से शुरू होने जा रही कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले 59 सदस्यीय दल में 42 पुरुष एवं 17 महिला यात्री शामिल होंगे। वहीं यात्रियों में सर्वाधिक 14 यात्री दिल्ली, 11 उत्तर प्रदेश, 7 राजस्थान, 5 महाराष्ट्र, 4 हरियाणा, 3-3 मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व छत्तीसगढ़, 2-2 गुजरात, केरला व उत्तराखंड तथा चंडीगढ़, कर्नाटक व तेलंगाना से 1-1 यात्री शामिल हैं। उत्तराखंड के यात्रियों में अजबपुर कलां निवासी देवपाल सिंह व आदर्श कॉलोनी रुद्रपुर निवासी महेश कुमार पहले दल में महादेव के धाम के दर्शन करने जाने वाले पहले दल में शामिल होकर भाग्यशाली साबित हुए हैं।

लखनपुर-नज्यंग के बीच सड़क ठीक, पैदल ही होगी यात्रा, दो पड़ाव घटेंगे-दो ही बढ़ेंगे

नैनीताल। इस बार लखनपुर व नज्यंग के बीच सड़क निर्माण के दौरान भारी भूस्खलन हो जाने के कारण यात्रा मार्ग पर लगातार संशय बना रहा। किंतु इधर निगम के स्तर पर आयोजित होने वाली आदि कैलाश यात्रा के सफल संचालन के बाद अब साफ हो गया है कि मार्ग दुरुस्त हो गया है, तथा यात्रा पिथौरागढ़ से हेलीकॉप्टर से सीधे गुंजी जाने के बजाय दूसरे दिन धारचूला से पहली बार छोेटे वाहनों से 42 किमी आगे गर्बाधार तक तथा वहां से लखनपुर व नज्यंग होते हुए 15 किमी चलकर बुदी पहुंचेगी। अलबत्ता निगम के एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि गुंजी में हेलीकॉप्टरों के उतरने में छियालेख से ऊपर बादल आने और लखनपुर-नज्यंग के बीच बारिश होने पर मार्ग खराब होने की स्थितियों में राज्य सरकार के हेलीकॉप्टर से धारचूला से बुदी तक जाने का विकल्प भी रखा गया है। इस बार यात्रा में गर्बाधार तक सड़क बन जाने के कारण धारचूला से आगे के सिरखा व गाला पड़ावों पर यात्री नहीं रुकेंगे, यानी यह पड़ाव कम हो जाएंगे, वहीं यात्रियों को नये पड़ाव नाबी में होम स्टे कराया जाएगा तथा इसके साथ काली नदी का उद्गम स्थल कालापानी भी पहली बार यात्रा में नया पड़ाव होगा।

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-हर दल में यात्रियों की संख्या से दो गुनी संख्या में जाने वाले पोनी-पोर्टर आपदा राहत कार्यों के लिए किये गए प्रशिक्षित
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं मंडल के अंतर्गत कुमाऊं मंडल विकास निगम यानी केएमवीएन के द्वारा संचालित की जाने वाली प्रतिष्ठित कैलाश मानसरोवर यात्रा के साथा ही आदि कैलाश, पिंडारी, सुंदरढूंगा, मिलम व पंचाचूली आदि की सभी पैदल यात्राओं पर जाने वाले यात्रियों का अब 5 लाख रुपए का ग्रुप दुर्घटना बीमा कराया जाएगा। साथ ही सभी यात्रा मार्ग पर यात्रियों के साथ करीब दोगुनी संख्या में जाने वाले सभी पोनी-पोर्टर यानी कुली व घोड़े-खच्चर वाले आपदा राहत कार्यों के लिए प्रशिक्षित किये जा रहे हैं। इस प्रकार अब कुमाऊं मंडल के अंतर्गत होने वाली सभी पैदल-ट्रेकिंग यात्राएं पूरी तरह सुरक्षित कही जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि अब तक अत्यधिक महत्वपूर्ण व प्रतिष्ठित होने के साथ ही लिपुपास दर्रे के बेहद दुर्गम व कठिन तथा खतरनाक मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा में ही हर दल के साथ इधर कुछ वर्षो से करीब 5-6 एसडीआरएफ यानी राज्य आपदा मोचन दल के सदस्य शामिल होते हैं, जबकि इधर केएमवीएन ने यात्रा में यात्रियों के सामान लेकर चलने वाले करीब 350 पोनी-पोर्टरों को आपदा राहत का प्रशिक्षण दिला दिया है। ऐसे में हर यात्रा दल में करीब 50-50 पोनी व पोर्टर यानी कुल 100 अतिरिक्त लोग किसी तरह की आपदा आने की स्थिति में एसडीआरएफ के जवानों के सहायक के रूप में कैलाश यात्रियों को बचाने में अपना योगदान दे पाएंगे।

आदि कैलाश के सभी यात्रियों का भी होगा 5 लाख का बीमा

नैनीताल। कैलाश मानसरोवर यात्रियों का बीते कुछ वर्षों से 5 लाख रुपए का ग्रुप दुर्घटना बीमा कराया जाता है, वहीं इसी तर्ज पर आदि कैलाश के यात्रियों का भी बीते वर्ष से 5 लाख का बीमा कराना प्रारंभ हुआ है। केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि अब इसी तर्ज पर इस वर्ष से पिंडारी, सुंदरढूंगा, मिलम व पंचाचूली आदि सभी पैदल यात्राओं के ट्रेकिंग रूट्स पर जाने वाले यात्रियों का भी 5-5 लाख रुपए का ग्रुप दुर्घटना बीमा कराया जाएगा।

पोनी-पोर्टरों का भी होगा 2-2 लाख का बीमा
नैनीताल। केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि ट्रेकिंग रूट्स पर जाने वाले यात्रियों की तर्ज पर केएमवीएन सभी मार्गों पर यात्रियों के साथ जाने वाले पोनी-पोर्टरों का भी 2-2 लाख का ग्रुप दुर्घटना बीमा कराएगी।

कैलाश यात्रा के लिए 2290 ने कुमाऊं के रास्ते के लिए किया आवेदन
नैनीताल। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की समय सीमा बीतने तक कुल करीब 3800 आवेदन किये गए हैं। इनमें से 2290 आवेदन कुमाऊं के लिपुपास दर्रे के परंपरागत दुर्गम पैदल रास्ते से यात्रा करने के लिए और 1510 सिक्किम के नाथुला दर्रे के सुविधाजनक रास्ते के लिए किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि लिपुपास दर्रे से 18 दलों में अधिक से अधिक 60 यानी कुल 1080 और नाथुला से अधिकतम 50-50 के आठ दलों में अधिकतम 400 यात्री ही लॉटरी की पद्धति से चयनित होकर कैलाश जा पाएंगे।

कैलाश मानसरोवर यात्रा-2018: विदेश मंत्रालय की ताज़ा बैठक के बाद भी किन्तु-परन्तु…

घटेंगे नहीं दिन, 24 दिन में ही होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा

-भारतीय विदेश मंत्रालय ने बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित हुई बैठक में निगम से पूरे दिनों का ही प्रस्ताव तैयार करके लाने को कहा
-मौसम संबंधित अनिश्चितताओं के मद्देनजर लिया गया है निर्णय
नैनीताल, 4 अप्रैल 2018। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर विदेश मंत्रालय की ताज़ा बैठक के बाद भी किन्तु-परन्तु बरक़रार हैं। लगता है केंद्र सरकार मौसम संबंधी अनिश्चितताओं को भी दृष्टिगत रख रही है। इसलिए अब तय हुआ है कि यात्रा के समय में कमी न की जाए। पहले हेलीकॉप्टरों के माध्यम से यात्रा के होने पर यात्रा के लिए दोनों ओर दो-दो दिन कम करके प्रस्ताव तैयार किया गया था, परंतु भारतीय विदेश मंत्रालय ने अब यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम यानी केएमवीएन से दो-दो दिन कम करने की जगह पूरे दिनों का नये सिरे से प्रस्ताव तैयार करने को कहा है। इस प्रकार यात्रा के लिए उपलब्ध दो अतिरिक्त दिन इस दौरान किसी तरह की मौसम की दुश्वारियां आने पर उपयोग किये जाएंगे।
बुधवार को नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय की बैठक के बाद ‘राष्ट्रीय सहारा’ से बात करते हुए निगम के महाप्रबंधक त्रिलोक सिंह मर्तोलिया ने बताया कि यात्रा पहली प्राथमिकता में भारतीय सेना के हेलीकॉप्टरों के जरिये होगी। यात्री पिथौरागढ़ से एमआई-17 हेलीकॉप्टरों के जरिये गुंजी पहुचेंगे। किंतु गुंजी में सेना के इन बड़े हेलीकॉप्टरांे के उतरने में कई बार मौसम संबंधी समस्याएं रहती हैं। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार के हेलीकॉप्टरों की पिथौरागढ़ से बुदी तक सेवाएं लेने का विकल्प भी रखा गया है। इसके अलावा यदि यात्रा की अवधि तक पैदल मार्ग दुरुस्त हो जाता है तो तीसरा व अंतिम विकल्प यह भी है। लिहाजा यात्रा के बाबत अभी तक भी बनी इन अनिश्चितताओं के दृष्टिगत भारतीय विदेश मंत्रालय के निर्देशों पर यात्रा दलों को पूरा समय देते हुए नये सिरे से प्रस्ताव जल्द ही तैयार कर मंत्रालय को भेजा जाएगा।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये यहाँ क्लिक करके कर सकते हैं ऑनलाइन आवेदन

पैदल के लिए 12 और हेली के लिए 14 जून को कुमाऊँ पहुंचेगा पहला दल

-कुमाऊं मंडल विकास निगम ने विदेश मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव

-ग्रिफ के मई माह में मार्ग दुरुस्त कर लेने के विश्वास को जांचने मई के आखिर में आएगा विदेश मंत्रालय का दल

राष्ट्रीय सहारा, 10 मार्च 2018

नवीन जोशी, नैनीताल, 9 मार्च, 2018। दो देशों भारत एवं चीन के रास्ते एवं हिंदुओं के साथ ही जैन, बौद्ध एवं तिब्बती धर्मों की आस्था से जुड़ी देवों के देव महादेव के सबसे बड़े धाम कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर छाये संशय देर से सही, किंतु लगातार दूर होते जा रहे हैं। यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम ने शुक्रवार (9 मार्च) की शाम विदेश मंत्रालय के निर्देशों पर मंत्रालय को यात्रा के लिए प्रस्ताव भेज दिया है।
इस प्रस्ताव के अनुसार लखनपुर से नजंग के बीच के पैदल मार्ग के चलने योग्य नहीं होने की स्थिति में पहला दल 14 जून को दिल्ली से चलकर उत्तराखंड में कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम पहुंचेगा, और इस दिन अल्मोड़ा में रात्रि विश्राम करेगा। अगले दिन यानी 15 जून को यात्रा पिथौरागढ़ व 16 को सेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों से गुंजी पहुंचेगी। 17 जून को यात्रियों को आसपास के गांवों की सैर कराकर स्थानीय माहौल से अभ्यस्त एवं वहां की लोक संस्कृति से परिचित कराया जाएगा। इस हेतु यात्री पहले नपलच्यू गांव जाएंगे, और यहां से रौंगकॉंग जाकर वहां दिन का भोजन होगा, और यहां से नाभी गांव जाकर रात्रि विश्राम करेंगे। आगे 18 को यात्री वापस गुंजी आएंगे, और उनके मेडिकल टेस्ट होंगे। 19 को यात्री नाभीढांग पहुंचेंगे और 20 को लिपुपास दर्रा पार कर चीन के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। इस तरह यात्रा में धारचूला, सिरखा, गाला व बुदी के पड़ाव कम हो जाएंगे तथा यात्रा में एक ओर दो दिन कम लगेंगे। केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल एवं जीएम त्रिलोक सिंह मर्तोलिया ने बताया कि निगम हर तरह से यात्रा के लिए तैयार है।

मई में विदेश मंत्रालय का दल यात्रा मार्ग का निरीक्षण कर लेगा निर्णय
नैनीताल। गौरतलब है कि कैलाश यात्रा मार्ग पर सड़कों का निर्माण कर रही ग्रिफ ने मई माह तक लखनपुर से नजंग के बीच मार्ग को दुरुस्त कर लेने का विश्वास जताया। लिहाजा, यात्रा पैदल होगी अथवा हेली से, इसका निर्णय आगामी मई माह में विदेश मंत्रालय की टीम यात्रा मार्ग का निरीक्षण करने के बाद लेगी।

पैदल हुई तो 12 को आएगा पहला दल
नैनीताल। उल्लेखनीय है कि केएमवीएन ने पूर्व में विदेश मंत्रालय को पिछले वर्ष की तरह 12 जून से यात्रा कुमाऊं पहुंचकर आगे बढ़ने का प्रस्ताव भी भेजा है। अलबत्ता, यह प्रस्ताव तभी प्रभावी होगा जब मई माह के आखिर तक लखनपुर व नजंग के बीच यदि मार्ग दुरुस्त हो जाता है (जिसकी संभावना कम ही लगती है) तो यात्रा का पहला दल पिछले वर्ष की भांति ही 12 जून को दिल्ली से चलकर उत्तराखंड में कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम पहुंचेगा, और इस दिन अल्मोड़ा में रात्रि विश्राम करेगा। अगले दिन यानी 13 को यात्रा धारचूला, 14 को बुदी, 15 को गुंजी, 16 को गंुजी में मेडिकल, 17 को नाभीढांग एवं 18 को लिपुपास दर्रा पार कर चीन में प्रवेश करेगी।

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पूर्व आलेख : कैलाश मानसरोवर यात्रा पर संशय खत्म, सेना के हेलीकॉप्टरों से पिथौरागढ़ से सीधे गुंजी जाएंगे यात्री

राष्ट्रीय सहारा, 09 मार्च 2018

-करीब छह दिन छोटी हो जाएगी यात्रा, गुंजी में दो की जगह तीन दिन रहकर कराया जाएगा उच्च हिमालयी क्षेत्र में यात्रा के लिए अभ्यस्त
नवीन जोशी, नैनीताल, 8 मार्च, 2018। लखनपुर व नजंग के बीच पिछले पखवाड़े हुए भारी भूस्खलन के बाद कैलाश मानसरोवर पर छाये संशय के बादल छंट गये लगते हैं। हमने गत 28 फरवरी को इस बारे में ‘इतिहास में पहली बार कैलाश मानसरोवर यात्रा के पारंपरिक मार्ग पर संशय’ शीर्षक से प्रमुखता से आलेख प्रकाशित किया था, जिसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इस विषय को बेहद गंभीरता से लेते हुए बेहद सक्रियता दिखाते हुए यात्रा के होने पर छाये संशय को पूरी तरह खत्म कर दिया है। साथ ही इतिहास में पहली बार यात्रा शुरू होने से पूर्व ही यात्रा के लिए भारतीय सेना के हेलीकॉप्टरों के माध्यम से पिथौरागढ़ से यात्रियों को सीधे गुंजी ले जाने का कार्यक्रम तय कर दिया है। इस हेतु भारतीय सेना के दो एमआई-17 हेलीकॉप्टर पिथौरागढ़ में तैनात होंगे। इसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि इस बार अपने पारंपरिक मार्ग से कैलाश यात्रा सर्वाधिक सुगम तथा करीब छह दिन की कम अवधि में पूरी हो जाएगी।

भारतीय विदेश मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी शफीउर रब्बी की ओर से यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम यानी केएमवीएन के प्रबंध निदेशक को बृहस्पतिवार को भेजे गए पत्र में बताया गया है कि कैलाश यात्रियों को हेली सेवा के उपलब्ध कराने को ‘सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर’ पर रखा गया है। इस बाबत 5 मार्च को भारतीय सेना के साथ बैठक में सेना के हेलीकॉप्टरों के जरिये यात्रा कराने पर सहमति बन गयी है। इस संदर्भ में केएमवीएन को कहा गया है कि वह गुंजी में यात्रियों को यात्रा हेतु अभ्यस्त करने का प्रबंध करे। इस बारे में केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि गुंजी के उच्च हिमालयी क्षेत्र में होने के कारण यहां यात्रियों को पूर्व के दो के बजाय तीन दिन रोका जाएगा। इस दौरान यात्रियों को एक दिन निकट के किसी गांव में ले जाकर ‘होम-स्टे’ भी कराया जाएगा, तथा तीसरे दिन मेडिकल जांच कराने के बाद आगे की यात्रा पर भेजा जाएगा। गुंजी तक सीधे पहुंच जाने से यात्रियों को धारचूला से सिरखा तक 56 किमी सड़क पर वाहनों एवं आगे गुंजी तक 54 किमी पैदल यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। इससे धारचूला, सिरखा एवं बुदी में यात्रा के पड़ावों की जरूरत भी नहीं रह जाएगी, और इस तरह यात्रा में आते और जाते हुए तीन-तीन दिन यानी कुल छह दिन यात्रा छोटी हो सकती है। उल्लेखनीय है कि अभी यात्रा में करीब 24 दिन लगते हैं, जो कि 18 दिन में ही पूरी हो सकती है। अलबत्ता, यह भी बताया जा रहा है कि सेना के हेलीकॉप्टरों से यात्रा लखनपुर व नजंग के बीच सड़क न बनने की स्थिति में होगी। यदि यह पैदल रास्ता खुल जाता है, तो पैदल यात्रा भी करायी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि इस समस्या के समाधान के लिए दो दिन पूर्व पिथौरागढ़ जिला प्रशासन ने नेपाल की ओर दो लकड़ी के अस्थाई पुल बनाकर यात्रा कराने की भी तैयारी की थी। गौरतलब है कि यह मार्ग बंद हो जाने से कैलाश यात्रियों के साथ शीतकालीन प्रवास पर नीचे आए उच्च हिमालयी क्षेत्रों के हजारों लोगों का अपने घरों को लौटना भी शुरू नहीं हो पा रहा है।

आदि कैलाश यात्रा पर छाया संशय भी खत्म, राज्य के हेली या दारमा घाटी से होगी
नैनीताल। केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल ने आदि कैलाश यात्रा पर भी संशय समाप्त कर दिया है। उन्होंने कहा कि यात्रा अवश्य कराई जाएगी। श्री गर्ब्याल ने बताया कि इसके लिए एक ओर राज्य सरकार से हेलीकॉप्टरों की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की गयी है। दूसरे आईटीबीपी की ओर से सुझाये गये दारमा घाटी के मार्ग से यात्रा कराने की भी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। बताया कि इस ओर से बेदांग तक वाहनों से और वहां से 12 किमी की ट्रेकिंग कराई जा सकती है। बेदांग में निगम ने करीब 30 यात्रियों के ठहरने की सुविधा विकसित कर ली है, जिसे क्षेत्रीय गांवों में होम स्टे सुविधा का लाभ ग्रामीणों को देते हुए 60-70 तक बढ़ाया जा सकता है।

राज्य सरकार को भी तैयार रखने होंगे अपने हेलीकॉप्टर
नैनीताल। भारतीय सेना के बड़े एमआई-17 हेलीकॉप्टरों के जरिये पिथौरागढ़ से गुंजी तक यात्रा कराने में मौसम की समस्या बाधा खड़ी हो सकती है। क्षेत्रीय जानकारों को कहना है कि गुंजी में यात्रा के दौरान अक्सर बादल छाने की समस्या रहती है। ऐसे में सेना के हेलीकॉप्टरों के उतरने में दिक्कत आ सकती है। इस समस्या का समाधान यात्रा के लिए एक-दो दिन अतिरिक्त रखकर मौसम साफ होने का इंतजार करके किया जा सकता है। इससे बेहतर विकल्प छोटे हेलीकॉप्टरों से बुदी तक ही यात्रियों को ले जाने का भी है। बुदी तक यदि राज्य या केंद्र सरकार से हेली सुविधा मिलती है तो कैलाश के साथ ही आदि कैलाश यात्रियों एवं प्रवास पर नीचे आये हजारों क्षेत्रीय लोगों को भी लाभ मिल सकता है।

इस वर्ष नेपाल से भी होकर गुजरेगी पारंपरिक कैलाश मानसरोवर यात्रा

5 जनवरी को पिथौरागढ़ में आयोजित बैठक में मौजूद भारत व नेपाल के अधिकारी

नवीन जोशी, नैनीताल, 5 मार्च 2018। जी हां, इस बार लगता है कि अपने परंपरागत व पौराणिक लिपुपास मार्ग के रास्ते होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा लखनपुर व नजंग के बीच 2 किमी नेपाल के भीतर से भी गुजरेगी। इस बारे में सोमवार 5 मार्च 2018 को पिथौरागढ़ के वन सभागार मे हुई में हुई दोनों देशों के जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठक में सहमति बन गयी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर दोनों देशों के केंद्रीय स्तर से ही इस विषय में आखिरी फैसला होगा। बैठक में पिथौरागढ के जिलाधिकारी सी रविशंकर व नेपाल के सीमांत र्दाचुला जिले के प्रमुख जिल्लाधिकारी जर्नादन गौतम एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति में हुई बैठक में दोनों देशों के सामरिक महत्व के विभिन्न मुद्दों के अलावा तय हुआ कि लखनपुर व नजंग में काली नदी पर भारत-नेपाल के बीच लकड़ी के दो अस्थायी पुल बनाये जाएंगे, जिनसे कैलाश मानसरोवर यात्रियों के साथ ही भारत के सीमांत उच्च हिमालयी क्षेत्रों के हजारों निवासी भी निचले क्षेत्रों में किये जा रहे शीतकालीन प्रवास के बाद अपने घरों को लौट पाएंगे।

उल्लेखनीय है कि भारत में पिथौरागढ़ की व्यास घाटी के पौराणिक मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग गत दिनों लखनपुर और नजंग के बीच भूस्खलन होने के कारण बंद हो गया है। इसमें कई जेसीबी व अन्य वाहन भी दब गए हैं। था। बैठक मे इस क्षेत्र के लिये नेपाल होते हुये पैदल रास्ते के निर्माण और काली नदी मे बनाने पर सहमति हुई। इसके साथ ही बैठक मे काली नदी मे प्रस्तावित 6 अन्य पुलों को बनाने के लिये भी दोनों देशो की सरकारों को प्रस्ताव भेजने पर भी बात हुई है, तथा सीमा पर अवैध गतिविधियों, विशेष तौर पर मानव तस्करी व वन्य जीवों के अंगों की तस्करी पर मिलजुल कर कार्य करने पर भी फैसला भी लिया गया। इसके लिए दोनों देशों के प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच लगातार संवाद रखने, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने पर सहमति बनी है।

केएमवीएन के एमडी ने बूदी तक हेलीकॉप्टर सेवा लागू करने का दिया है सुझाव
नैनीताल। लखनपुर व नजंग के बीच नेपाल के रास्ते से होकर गुजरने के लिए लकड़ी के दो अस्थायी पुल बनाने के लिए की गयी पिथौरागढ़ जिला प्रशासन की पहल के इतर यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल ने बीती 3 मार्च को पिथौरागढ़ के डीएम को पत्र लिखकर धारचूला से बुदी तक कैलाश मानसरोवर यात्रियों और स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए केदारनाथ की तर्ज पर हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करना का सुझाव बेहतर बताया है। श्री गर्ब्याल ने बताया कि बुदी से आगे गुंजी में मौसमी दिक्कतों को देखते हुए बुदी में हेलीकॉप्टर सुविधा देने और यहां से कैलाश यात्रियों के लिए पोनी-पोर्टर की व्यवस्था किया जाना सबसे बेहतर सुझाव है।

कैलाश यात्रा मार्ग के लिए जवानों का प्रशिक्षण प्रारंभ
नैनीताल। कैलाश मानसरोवर यात्रा में यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात होने वाले पुलिस कर्मियों के लिए मुख्यालय स्थित रिजर्व पुलिस लाइन में सोमवार से 5 दिवसीय प्रशिक्षण प्रारंभ हो गया है। एसडीआरएफ के पूर्व कुमाऊं प्रभारी एएसपी नैनीताल की अगुवाई में इस दौरान नैनीताल पर्वतारोहण क्लब के प्रशिक्षक सुनील वैद्य एवं राजभवन स्थित एसडीआरएफ सब टीम के जवानों के द्वारा जनपद के सभी थाना-कोतवालियों के चयनित पुलिस कर्मियों को यात्रा के दौरान जरूरी मूलभूत प्रशिक्षण दिया जाएगा।

यह भी पढ़ें : इतिहास में पहली बार पारंपरिक-पौराणिक मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर संशय

  • हिंदुओं के साथ ही जैन, बौद्ध, सिक्ख और बोनपा धर्म के एवं तीन देशों (भारत, नेपाल और चीन) के श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी है कैलाश मानसरोवर यात्रा 
  • उत्तराखंड से शिव के धाम कैलाश मानसरोवर का मार्ग पौराणिक है, पांडवों के द्वारा भी इसी मार्ग से कैलाश जाने के पौराणिक संदर्भ मिलते हैं
  • विश्व की सबसे कठिनतम और प्राचीनतम पैदल यात्राओं में शुमार 1,700 किमी लंबी (230 किमी की पैदल दूरी) है कैलाश मानसरोवर की यात्रा 
कैलाश यात्रा मार्ग की स्थिति।

नवीन जोशी, नैनीताल, 28 फरवरी 2018। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन को साधते हुए नाथुला के रास्ते फिर से कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू कराने की उत्साहजनक खबर के बीच उत्तराखंड के लिपुपास दर्रे से 1981 से लगातार हो रही परंपरागत यात्रा के पारंपरिक व पौराणिक मार्ग पर इतिहास में पहली बार संशयपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गयी है। इस कारण पहली बार जून माह में शुरू होने वाली इस यात्रा के लिए फरवरी माह के बीतते भी कार्यक्रम तय नहीं किया जा सका है। इसका कारण चीन सीमा तक बन रहे लिपुपास राष्ट्रीय राजमार्ग पर लखनपुर से नजंग के बीच पैदल मार्ग के समानांतर ही बेहद कड़ी चट्टानों पर सीमा सड़क संगठन द्वारा किया जा रहा निर्माण है, जिस कारण चट्टानों के मलबे के बीच यात्रा के लिए पैदल मार्ग भी नहीं रह गया है। वहीं इसी पखवाड़े हुए भूस्थलन से लखनपुर से खांडेरा के बीच कार्यदायी संस्था की सड़क निर्माण में लगी मशीनें दब जाने के बाद कार्य रुक गया है।

इधर भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार सीमा सड़क संगठन ने अब तक भारतीय विदेश मंत्रालय को इस सड़क के जून में यात्रा शुरू तक पैदल मार्ग दुरुस्त होने के बारे में स्थिति साफ नहीं की है, जिस कारण भारतीय विदेश मंत्रालय भी गत 20 मार्च से यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन शुरू करने के बावजूद यात्रा का रूट एवं कार्यक्रम जारी नहीं कर पाया है, और आगे 1 मार्च को दिल्ली में होने वाली बैठक में भी इस बाबत स्थिति साफ होने की कम ही उम्मीद जताई जा रही है। बहरहाल, यात्रा की भारतीय क्षेत्र में आयोजक संस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीराज गर्ब्याल  ने कहा कि यह यात्रा निगम ही नहीं उत्तराखंड प्रदेश और देश की प्रतिष्ठा से जुड़ी है, इसलिए निगम हर स्थिति में यात्रा के आयोजन के लिए तैयार है।

आईटीबीपी ने दिया 19000 फिट ऊंचे सिनला पास के मार्ग का विकल्प
नैनीताल। भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के उपमहानिरीक्षक बरेली ने इसी सप्ताह 22 फरवरी को पिथौरागढ़ के डीएम को पत्र लिखकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए धारचूला से दारमा घाटी के तिदांग, बेदांग से 19000 फीट ऊंचाई पर स्थित सिनला पास के रास्ते जौलिंगकांग यानी आदि कैलाश-ऊं पर्वत होते हुए वापस नीचे कुट्टी आकर गुंजी से होते हुए 17000 फिट ऊंचाई के लिपुपास दर्रे से होते यात्रा पर जाने का विकल्प सुझाया है। हालांकि अत्यधिक दुरूह मार्ग से इतनी अधिक ऊंचाई से होकर गुजरने वाले इस मार्ग का विकल्प व्यवहारिक नहीं माना जा रहा है। इस मार्ग पर कुट्टी से गूंजी के 19 किमी के मार्ग में 9 किमी गाड़ी के मार्ग में बरसात के दिनों में सड़क खराब होने की स्थिति भी आ सकती है।

राष्ट्रीय सहारा 28 फरवरी 2018

नेपाल के रास्ते पुल बनाने का भी दिया जा रहा है विकल्प
नैनीताल। लखनपुर से आगे मार्ग की बाधा को देखते हुए काली नदी पर पुल बनाकर नेपाल की ओर से आगे बढ़ने का मार्ग भी सुझाया गया है। बताया गया है कि यहां यदि स्थानीय एनजीओ के माध्यम से पुल बनवाने पर डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक का खर्च आ सकता है। इसलिए ही आईटीबीपी की ओर दारमा घाटी का मार्ग सुझाया गया है।

बुदी तक हेलीकॉप्टर से यात्रियों को ले जाने का भी है विकल्प
नैनीताल। उल्लेखनीय है कि पिछली बार 13 अगस्त की रात्रि मांगती नाला के पास हुए भयानक भूस्खलन के बाद यात्रा बाधित हुई थी। इस आलोक में केएमवीएन ने इस बार बुदी तक यात्रियों को हेलीकॉप्टर से ले जाने, अथवा 46 किमी सड़क पर वाहनों एवं 12 किमी पैदल चलकर बुदी जाने का विकल्प सुझाया है। हेलीकॉप्टर की सुविधा राज्य सरकार की ओर से दी जा सकती है। इस विकल्प में जुलाई के बाद बरसात का मौसम शुरू होने पर कोहरे व बादलों तथा मौसम की खराबी से समस्या आ सकती है, बावजूद मौसम सही होने पर यात्रा जारी रखी जा सकती है।

आदि कैलाश यात्रा की बुकिंग भी प्रभावित
नैनीताल। कैलाश यात्रा का कार्यक्रम जारी न होने व मार्ग पर संशयपूर्ण स्थितियों के बीच केएमवीएन द्वारा अपने स्तर से आयोजित होने वाली आदि कैलाश-प्राकृतिक ऊं पर्वत के दर्शन कराने वाली यात्रा पर भी संशयपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गयी है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष मांगती नाले में आयी आपदा के कारण 3 दलों की यात्रा न हो पाने के बावजूद 12 दलों में 432 यात्री आदि कैलाश गये थे। इस वर्ष भी काफी यात्री इस हेतु निगम से जानकारी जुटा रहे हैं, किंतु निगम यात्रा के लिए तय जानकारी नहीं दे पा रहा है।

नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश-मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से वार्ता कर कैलाश मानसरोवर के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे का रास्ता खुलवा दिया है, लेकिन सार्वभौमिक तथ्य है कि कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग कुमाऊं-उत्तराखंड के परंपरागत लिपुलेख दर्रे से ही है। कहते हैं कि स्वयं भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ इसी मार्ग से कैलाश गए थे। उत्तराखंड के प्राचीन ‘कत्यूरी राजाओं’ के समय में भी यही मार्ग कैलाश मानसरोवर के तीर्थाटन के लिए प्रयोग किया जाता था। पांडवों ने भी इसी मार्ग से कैलाश की यात्रा की थी तथा महान घुमक्कड़ साहित्यकार व इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन व सुप्रसिद्ध यात्री स्वामी प्रणवानंद भी इसी मार्ग से कैलाश गए थे। कैलाश मानसरोवर के इस परंपरागत यात्रा मार्ग के साथ हिमालय की सांस्कृतिक अस्मिताओं और उससे जुड़ी हिन्दू जैन, बौद्ध तथा तिब्बती आदि विभिन्न धर्मों की गौरवशाली परंपराओं का इतिहास भी जुड़ा है। ऋग्वैदिक आर्यों का मूल निवास स्थान उत्तराखंड हिमालय होने के कारण उनके कैलाश मानसरोवर आवागमन का भी यही मार्ग था। जैन धर्म के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ‘कैलाश’ से ही मोक्ष सिधारे थे, तथा उनके पुत्र भरत कैलाश मानसरोवर जाने के लिए ‘कुमाऊं’ के परंपरागत मार्ग को ही प्रयोग करते थे।

कहते हैं कि आर्यों ने लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व कुमाऊं-उत्तराखंड के रास्ते हिमालय की अति दुर्गम पर्वत घाटियों का अन्वेषण करते हुए कैलाश मानसरोवर तक यात्रा की थी, और विभिन्न नदियों के मूल स्रोतों की भी खोज की। इसी दौर में भगीरथ ने गंगा के उद्गम को ढूंढा। वशिष्ठ ने सरयू की और कौशिक ऋषि ने कोसी की खोज की। वैदिक काल के चक्रवर्ती राजा मानधता ने यहां तप किया था। पांडवों के दिग्विजय प्रयाण के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न आदि उपहार भेंट किए थे। आदि शंकराचार्य ने कैलाश पर्वत के समीप ही अपना शरीर त्याग किया था। कैलाश मानसरोवर चार धर्मो-हिन्दू, बौद्ध, जैन और तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोगों के लिए बेहद पवित्र स्थान है। कैलाश मानसरोवर की परंपरागत यात्रा उत्तराखंड के सीमावर्ती स्थान पिथौरागढ़ के धारचूला से शुरू होती है, और लिपुलेख दर्रे के जरिये 28 से 30 दिनों में चीन की सीमा में स्थित कैलाश मानसरोवर पहुंचती है। हजारों वर्षो से यह परंपरागत मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा का शास्त्र सम्मत मार्ग भी माना जाता है। सदियों पुराने पुराणों में भी उत्तराखंड से होकर की जाने वाली कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा के इसी मार्ग को ही धार्मिक मान्यता दी गयी है। इसी मार्ग से भगवान शिव मां नंदा से मिलने आए थे तथा इस मार्ग से तीर्थ यात्रियों को छोटा कैलाश और ‘ऊं’ पर्वत आदि के दर्शन भी होते हैं। महान इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन ने भी काठमांडु की बजाय इसी मार्ग को मानसरोवर यात्रा के लिए चुना था। आज भी कैलाश और मानसरोवर यात्रा पर भारत से जाने के लिये अनेक रास्ते हैं परन्तु कैलाश मानसरोवर के सुप्रसिद्ध यात्री स्वामी प्रणवानंद इनमें से कुमाऊं में स्थित ‘‘लिपुलेख’ दर्रे को ही सबसे सुगम एवं सुरक्षित मार्ग मानते हैं। कूर्माचल पर्वत से शुरू पौराणिक ग्रथों में हिमालय यात्रा से जुड़े सभी तीर्थस्थान कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा का हिस्सा माने गए हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार कुमाऊं को ‘मानसखंड’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह क्षेत्रा कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा के अन्तर्गत आता है। ‘मानसखंड’ में कैलाश मानसरोवर को जाने और वापस आने दोनों यात्रा मागरे का जो भौगोलिक मानचित्र दिया गया है उसका शुभारम्भ उत्तराखंड में कुमाऊं स्थित कूर्मांचल पर्वत से ही होता है। धार्मिक दृष्टि से तीर्थस्थान की यात्रा वहीं से फलीभूत मानी जाती है जहां से उस यात्रा की सीमा शुरू होती है। ‘मानसखंड’ में कैलाश मानसरोवर की यात्रा का शुभारम्भ बताते हुए महर्षि दत्तात्रेय कहते हैं- उत्तराखंड में पर्वतराज हिमालय के पादतल में स्थित ‘कूर्मांचल’ नाम की पर्वतश्रेणी वाले मार्ग से ही तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू करनी चाहिए- ‘गन्तव्यं तत्रा राजर्षे ! यत्र कूर्मांचलो गिरिरू।’ उसके उपरान्त लोहाघाट स्थित कूर्मशिला का पूजन करके सरयू में स्नान करना चाहिए। उसके आगे जागेश्वर, पाताल भुवनेश्वर, रामगंगा, सीरा की पट्ठी स्थित पावन पर्वत, कनाली छीना के पास पताका पर्वत, काली गौरी संगम (जौलजीवी) चतुर्दंष्ट्र (चौंदास), व्यासाश्रम (ब्यांस), काली नदी का मूल, ब्यांस-चौंदास के बीच पुलोमन पर्वत आदि तीर्थस्थानों के दर्शन करते हुए गौरी पर्वत से नीचे उतर कर मानसरोवर के पवित्र जल में स्नान करना चाहिए। वापस लौटने के मार्ग को बताते हुए महर्षि दत्तात्रेय कहते हैं कि मानसरोवर की परिक्रमा करके रावणद (राक्षसताल) में स्नान करना चाहिए। तत्पश्चात् स्नेचरतीर्थ तथा ब्रताकपाल तीर्थ की पूजा-अर्चना करके निर्गमन करना चाहिए।
भारतीय परंपरा के अनुसार संसार में देवतात्मा हिमालय जैसा अन्य कोई पर्वत नहीं है क्योंकि यहां कैलाश पर्वत और मानसरोवर स्थित है। कैलाश पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 20 हजार फीट है। कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। यहां से कैलाश पर्वत के दर्शन ऐसे होते हैं, मानो भगवान शिव साक्षात् बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हों। कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क ) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। मान्यता है कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर बनाया है। पुराणों के अनुसार मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। समुद्रतल से 17 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित 120 किलोमीटर की परिधि तथा 300 फुट गहरे मीठे पानी की ऐसी अद्भुत प्राकृतिक झील इतनी ऊंचाई पर विश्व में किसी भी देश में नहीं है। शाक्त ग्रंथों के अनुसार, सती का हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह सरोवर बना। इसलिए 51 शक्तिपीठों में मानसरोवर की भी गणना की जाती है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर की धरती का स्पर्श कर लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति सरोवर का जल पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है। कैलाश पर्वत की परिक्रमा के दौरान एक किलोमीटर परिधि वाले गौरीकुंड के भी दर्शन होते हैं। इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां अन्य प्रसिद्ध सरोवर राक्षस ताल है। राक्षसों के राजा रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे रावणद भी कहते हैं।
शिव और शक्ति का धामकैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है जिसके प्रभाव से मन और हृदय दोनों निर्मल हो जाते हैं। स्थान-स्थान पर नदी प्रपातों के दूधिया झरने, हरियाली के अद्भुत नजारे तथा नवी ढांग में पर्वत शिर पर हिम नदियों से बने पर्वत जैसे प्राकृतिक चमत्कारों ने इस पावन स्थल को शिव और शक्ति का रहस्यमय लीला धाम बना दिया है। तीर्थयात्री जब पहली बार इन प्रकृति के अद्भुत दृश्यों का दर्शन करते हैं तो ऐसा लगता है कि वे प्रकृति और पुरु ष के रूप में शिव और उनकी अर्धागिनी पार्वती के साक्षात् दर्शन कर रहे हों। तब सहज ही भारतीय दर्शन के ब्रता और माया से जुड़े उन गूढ आध्यात्मिक और दार्शनिक सत्यों का उद्घाटन भी इस अनुपम कैलाश-मानसरोवर की यात्रा के दौरान होने लगता है जिसके अनुसार ‘ताश्वतरोपनिषद्’ में ‘माया’ को मूल प्रकृति और उसके अधिष्ठाता महेश्वर को ‘ब्रह्मा’ के रूप में निरूपित किया गया है ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’।
भारतीय परंपरा में पैदल मार्ग से कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा को पैदल करने का जो महात्म्य है वैसा महात्म्य वाहन से यात्रा करने का नहीं। धार्मिक दृष्टि से तीर्थयात्रा का प्रयोजन होता है अत्यन्त श्रद्धा भाव से प्रकृति परमेश्वरी की शरण में जाना। इसीलिए ये तीर्थस्थान सार्वजनिक स्थानों से दूर प्रदूषण फैलाने वाले मोटर वाहनों की पहुंच से बाहर ऊंचे पहाड़ों पर बने होते हैं ताकि श्रद्धालु जन पैदल चल कर प्राकृतिक वृक्षों-वनस्पतियों का निरीक्षण करते हुए मार्ग में पड़ने वाले सांस्कृतिक अवशेषों ऋषि-मुनियों के आश्रमों तपोवनों आदि के दर्शन कर सकें और नदी-सरोवरों में स्नान करके अपने आराध्य देवी-देवताओं के चरणों में आस्था के पुष्प चढ़ा सकें। शास्त्रों में कहा गया है कि जिनमें श्रद्धा नहीं है जो पाप कर्मो के लिए तीर्थसेवन करते हैं, जो नास्तिक हैं, जिनके मन में संदेह है, जो सैर-सपाटे और मौजमस्ती के लिए या किसी निहित स्वार्थ से तीर्थभ्रमण करते हैं- इन पांचों को तीर्थयात्रा का फल नहीं मिलता। सवारी तीर्थयात्रा का आधा फल हर लेती है। उसका आधा भाग छत्र और जूते इत्यादि धारण करने से समाप्त हो जाता है। व्यापार से तीन-चौथाई भाग नष्ट हो जाता है तथा प्रतिग्रह तीर्थयात्रा के सारे पुण्य को क्षीण कर देता है। पर चिन्ता का विषय है कि वर्तमान समय में तीर्थयात्रा के मायने ही बदलते जा रहे हैं। अब धार्मिक पर्यटन का मतलब हो गया है सैर-सपाटा या पिकनिक मनाना। धर्म के नाम पर उपभोक्तावादी बाजारवाद धार्मिक आस्था पर हावी हो चुका है।

कहीं से भी आएं, आना पड़ता है उत्तराखंड के ही करीब

नैनीताल। केएमवीएन के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन-डीके शर्मा कहते हैं कैलाश यात्रा के उत्तराखंड के अलावा अन्य भी कई मार्ग पहले से भी प्रचलित हैं। नेपाल के रास्ते भी वर्षों से बेहद आसान तरीके से महंगी लग्जरी-लैंड क्रूजर गाड़ियों और हवाई यात्रा के जरिए बेहद सुविधाजनक व आरामदेह तरीके से यात्रा होती है, लेकिन उत्तराखंड के रास्ते लिपुपास के मार्ग को ही पौराणिक मार्ग की मान्यता है। कहते हैं इसी रास्ते स्वयं महादेव शिव भी देवी पार्वती के साथ कैलाश गए थे। इस मार्ग से ही पैदल ट्रेकिंग करते हुए धार्मिक यात्रा का पूरा आनंद व दिव्य अनुभव प्राप्त होते हैं, साथ आदि या छोटा कैलाश कहे जाने वाले हिंदू धर्म के सबसे बड़े धार्मिक प्रतीक ‘ॐ” की बर्फ के पहाड़ पर प्राकृतिक रूप से बनी आकृति युक्त ॐ पर्वत के दर्शन भी होते हैं। श्री शर्मा इसके अलावा भी बताते हैं कि किसी भी अन्य मार्ग से यात्रा के आखिरी पड़ाव में उत्तराखंड के लिपुपास दर्रे के बेहद करीब चीन में पड़ने वाले तकलाकोट ही आना पड़ता है। नाथुला की यात्रा में भी यात्रियों को एक बार पूरा भारत देश हवाई मार्ग से पार कर पहले सुदूर अरुणांचल और वहां से कारों से पूरा नेपाल देश पार करते हुए तकलाकोट ही आना पड़ेगा, जो एक थकाने वाला अनुभव हो सकता है। इस लिहाज से भी उत्तराखंड के रास्ते होने वाली परंपरागत यात्रा को सर्वाधिक सरल माना जा रहा है।

चीन में भी बसता है एक भारत

-कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में मिलते हैं कई हिंदू धार्मिक स्थल
जी हां, भारत के धुर विरोधी और बड़ा खतरा बताये जाने वाले देश में भी एक भारत बसता है। देवों के देव कहे जाने वाले महादेव शिव के धाम कैलाश और मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन के क्षेत्र में ऐसे ही एक भारत के दर्शन श्रद्धालु तीर्थयात्रियों को अभिभूत कर देते हैं।
आज के एशिया महाद्वीप में जहां भारत एवं चीन आपस में प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं, लेकिन इससे इतर प्राचीन काल में दोनों के बीच काफी घनिष्ठ व प्रगाढ़ संबंध बताये जाते हैं। भारत के लुंबिनी (उप्र) में पैदा हुऐ गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित बौद्ध धर्म के श्रीलंका के साथ चीन में प्रसार इसका गवाह है। चीनी तीर्थयात्री फाह्यान ने भारत की सैर की। लेकिन इससे भी इतर चीन में हिंदू धर्म के सबसे बड़े आस्था केंद्र कैलाश-मानसरोवर के साथ ही और भी कई केंद्र मौजूद हैं, जिन्हें दो देशों में संयुक्त रूप से होने वाली और विश्व की सबसे पुरानी यात्राओं में शुमार कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान देखा जा सकता है। इस यात्रा की भारत में आयोजक संस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन एवं आधा दर्जन बार इस यात्रा पर तैयारियों का जायजा लेने जा चुके डीके शर्मा चीन में इस अनूठे भारत को याद कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं। श्री शर्मा बताते हैं कि चीन में यात्रियों को करीब आठ दिन बिताने होते हैं। भारत के अंतिम यात्रा पड़ाव लिपुपास से करीब तीन किमी आगे लिमिकारा या पांच किमी दूर पाला से चीनी वाहन यात्रियों को आगे की यात्रा कराते हैं। आगे पहला पड़ाव 14 किमी दूर तकलाकोट है, जहां चीन अब पॉली हाउस में भारतीय सब्जियां टमाटर, गोभी इत्यादि उगाता है। यह सब्जियां यात्रियों को घर जैसे भोजन का स्वाद तो दिलाती ही हैं, भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बहुतायत में पहुंचती और प्रयोग की जाती हैं। यहां चीन की नागरी टूरिस्ट कंपनी यात्रियों के आवास एवं भोजन का प्रबंध करती है। यात्रियों को भारतीय दाल, रोटी, सब्जी जैसे भोजन भी 80 के दशक से मिलने लगे हैं। आगे 80 किमी दूर कैलाश पर्वत के यात्रा पथ में दारचेन में तथा कीहू में मानसरोवर यात्रा पथ का अगला रात्रि विश्राम पड़ाव होता है। दारचेन से 22 किमी की दूरी पर स्थित डेराफू नाम के स्थान से कैलाश पर्वत के अलौकिक दर्शन होते हैं। खासकर चांदनी रात में श्वेत-धवल बर्फ से ढके विशाल कैलाश पर्वत का नजारा मनुष्य को किसी अन्य लोक जैसा पारलौकिक अनुभव कराता है। यहां से यात्री आठ-नौ किमी दूर 18,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित डोल्मा पास, छह किमी दूर जुटुल पुक व 15 किमी चलकर कुल 48 किमी का कैलाश पर्वत का चक्कर लगाकर वापस दारचेन पहुंचते हैं। डोल्मा पास में तारा देवी का पवित्र मंदिर है, जिसे नेपाल में उग्र तारा के रूप में पूजा जाता है, और उत्तराखंड में चंदवंशीय राजाओं की कुलदेवी नंदा देवी को कुछ मान्यताओं के अनुसार इस देवी से जोड़ा जाता है। डोल्मा पास में बौद्ध धर्मानुयायी तारा देवी के अनन्य भक्त हैं, वह बेहद ठंडे इस स्थान पर पैरों के बजाय लेट कर इस स्थान की यात्रा करते हैं। डोल्मा पास के पास ही गौरीकुंड तथा यमद्वार नाम के पवित्र धार्मिक स्थान भी हैं, जो हिंदूओं की धार्मिक आस्था के बड़े केंद्र हैं। यहां खुरजड़ या खोजड़नाथ नाम के स्थान पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं सीता का मंदिर भी है, मसमें भी बौद्ध धर्म के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। कैलाश पर्वत के आगे के हिस्से में अष्टपाद नाम का पर्वत भी है, कई तीर्थयात्री समय निकालकर यहां भी पहुंचते हैं। मानसरोवर से भी दिखाई देने वाले इस स्थान की भी बड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। यहां बौद्ध धर्म का मंदिर गोम्फा भी स्थित है। उधर मानसरोवर के यात्रा पथ में कीहू से कूहू होते हुऐ मानसरोवर का चक्कर लगाते हुऐ 74 किमी चलना होता है। यहां सरोवर में राजहंस बतखें बेहद सुंदर लगती हैं। श्री शर्मा बताते हैं कि पूरा कैलाश-मानसरोवर यात्रा पथ अपने आप में अलौकिक है। यहां जगह-जगह पर तीर्थयात्रियों को अलौकिक एवं दिव्य अनुभूतियां होती हैं, और तीर्थयात्रियों का मन मानो पूरी तरह धुल जाता है।

नाथुला जैसी ही आसान होगी उत्तराखंड के रास्ते भी कैलाश मानसरोवर यात्रा

अब यात्रियों को 43 किमी ही चलना होगा पैदल, पैदल यात्रा पथ पर भी गब्र्याग से गुंजी और गुंजी से कालापानी के बीच जीपों से होगी यात्रा

नवीन जोशी नैनीताल। केंद्र सरकार के अरुणांचल प्रदेश नाथुला दर्रे से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नया सुगम, वाहनों का यात्रा पथ खोल दिए जाने को उत्तराखंड ने चुनौती की तरह लिया है। राज्य के मौजूदा पौराणिक एवं परंपरागत मार्ग की प्रतिस्पर्धा में दुर्गम पैदल पथ के कारण की दुश्वारियों को दूर करने के बाबत उत्तराखंड ने प्रयत्न शुरू कर दिए हैं। अब इस यात्रा में यात्रियों को भारतीय भूभाग में 43 किमी ही पैदल चलना पड़ेगा, जबकि इस मार्ग पर 85 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की घोषणा के बाद कुमाऊं मंडल विकास निगम इस यात्रा की पैदल दूरी कम करने में जुट गया है।

उल्लेखनीय है कि यात्रा के पैदल मार्ग पर बन चुकी सड़क के हिस्सों पर जीप चलाने की भी योजना है। इस पर शासन व निगम स्तर पर पहल भी शुरू हो गई है। निगम ने बीच की सड़क के हिस्सों में हेलीकॉप्टर से जीपें उतारने के प्रयास भी शुरू कर दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि 1700 किमी लंबी कैलास मानसरोवर यात्रा देश ही नहीं दुनिया की प्राचीनतम और दो देशों की सीमाओं में होने वाली अनूठी धार्मिक यात्रा है। वर्ष 1981 से केएमवीएन द्वारा उत्तराखंड के रास्ते कराई जा रही यात्रा में अब तक 388 दलों में 13,533 तीर्थयात्री शिव के धाम जा चुके हैं। उधर, केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश के नाथुला दर्रे से कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए नया सुगम, वाहनों का यात्रा पथ खोले जाने को उत्तराखंड ने चुनौती की तरह लिया है। राज्य के मौजूदा पौराणिक व परंपरागत मार्ग की प्रतिस्पर्धा में दुर्गम पैदल पथ की दुश्वारियों को दूर करने के बाबत सरकार ने प्रयत्न शुरू कर दिये हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गत दिवस मुख्यालय में बताया था कि परंपरागत मार्ग के पैदल पथ में जहां-जहां संभव होगा, सड़क बनाने की कोशिश की जाएगी और जहां बीच-बीच में टुकड़ों में सड़क बन चुकी है, वहां जीपों से यात्रा कराई जाएगी। इस पर अमल करते हुए केएमवीएन ने जो होमवर्क शुरू किया है। उसके अनुसार अब यात्री शुरुआती यात्रा मार्ग पर नारायण आश्रम के बजाय 20 किमी आगे गाला तक वाहन से जा सकेंगे। आगे गाला से बूंदी 18 किमी और बूंदी से गर्ब्यांग आठ किमी पैदल चलने के बाद गर्ब्यांग से 11 किमी गुंजी तक एक जीप और गुंजी से कालापानी तक नौ किमी दूसरी जीप से पार कर पाएंगे। इससे करीब 40 किमी की पैदल दूरी कम हो जाएगी और आगे कालापानी से नाभीढांग नौ व नाभीढांग से भारतीय सीमा के आखिरी पड़ाव लिपूपास तक आठ किमी मिलाकर भारतीय क्षेत्र में कुल 43 किमी ही पैदल चलना पड़ेगा। इस यात्रा व पर्यटन पर फोकस कर चल रहे ने बताया कि सरकार से इस यात्रा मार्ग को और अधिक सरल व आसान बनाने के लिए 25 करोड़ रुपये मिले हैं, उसका भी सदुपयोग किया जा रहा है।

‘हाई टेक’ होते जमाने में भी आस्था का कोई विकल्प नहीं है। आज भी दुनिया में यह विश्वास कायम है कि ‘प्रभु’ के दर्शन करने हों तो कठिन परीक्षा देनी ही पड़ती है। ज्ञातव्य हो कि कैलाश मानसरोवर यात्रा तीन देशों (भारत, नेपाल और चीन) के श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी विश्व की एकमात्र व अनूठी पैदल यात्रा है। उत्तराखंड का मार्ग पौराणिक मार्ग है। कहते हैं इसी मार्ग से पांडव भी कैलाश गए थे। यात्रा मार्ग में पड़ने वाले पांडव व कुंती पर्वतों के साथ ही स्कंद पुराण के मानसखंड में इसकी पुष्टि होती है। इस यात्रा के दौरान करीब 230 किमी की पैदल दूरी (भारतीय क्षेत्र में 60 एवं चीनी क्षेत्र में करीब 150 किमी) चलनी पड़ती है, जिसमें से चीनी क्षेत्र के अधिकांश मार्ग में वाहन सुविधा भी उपलब्ध है। भारतीय क्षेत्र में भी करीब आधे मार्ग में बीआरओ के द्वारा सड़क बन चुकी है। इस पौराणिक मार्ग से तीर्थ यात्रियों को प्राकृतिक रूप से ‘ऊं पर्वत’ के दर्शन भी होते हैं, साथ ही हिमालय को करीब से निहारने यहां की जैव विविधता व सीमांत क्षेत्र के जनजीवन को जानने-समझने का मौका भी मिलता है। इस मार्ग को पास किया जाने वाला लिपुपास दर्रा भारत-चीन के बीच का सबसे आसान दर्रा भी माना जाता है।

2014 में सिक्किम के नाथुला दर्रे से नया मार्ग खुलने के बावजूद प्रकृति प्रेमी, पैदल ट्रेकिंग के इच्छुक युवा एवं धार्मिक, आध्यात्मिक भावना वाले यात्री अभी भी पौराणिक मार्ग से ही यात्रा करना पसंद करेंगे। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भी नेपाल के रास्ते हवाई सेवा के जरिए भी कैलाश के लिए अनेक मार्ग हैं, इनकी वजह से भी मौजूदा पौराणिक मार्ग की यात्रा को कोई नकारात्मक प्रभाव देखने को नहीं मिला है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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