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इंतजार कीजिएगा, नैनीताल की फल पट्टी चखाने वाली है एक नये फल का स्वाद

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-अनार की खेती से बढ़ेगी मुक्तेश्वर के बागवानों की आय भी
-टेरी के सहयोग से लगाये गये अनार के पाँच सौ पौधे इसी वर्ष देने वाले हैं फल

सुनकिया गांव में फल देने को तैयार अनार का पौधा।

दानसिंह लोधियाल @ नवीन समाचार, धानाचूली। आड़ू, खुमानी, पुलम एवं सेब के बागानों के लिए मशहूर नैनीताल जनपद के बागान इस वर्ष एक नये फल का स्वाद देने को तैयार हैं। यहां पिछले 3-4 साल से किसानों ने टेरी यानी ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सेज’ के समहयोग से टिश्यू कल्चर तकनीक से विकसित किये गये अनार की सुपर भगवा प्रजाति के करीब 500 पौधे लगाए हैं जो अब इस वर्ष ही फल देने वाले हैं। यह स्थानीय किसानों की आय बढाने का एक महत्वपूर्ण पहल तो मानी ही जा रही है, साथ ही इससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व फलों के प्रेमियों को एक नया स्वाद भी मिलेगा। उन्हें अब बाहर से आने वाले और आने में ही पुराने हो जाने वाले अनार की जगह ताजा स्थानीय अनार के फलों का रसीला स्वाद मिल सकेगा।
आपको बताते चलें फल उत्पादन में मुक्तेश्वर, रामगढ़ विशेष स्थान रखता है। यहां दुनिया की अनेक विशेष फल प्रजातियों का उत्पादन किया जाता रहा है परंतु बढ़ते तापमान, उचित प्रसार एवं वैज्ञानिक ज्ञान की कमी के कारण पिछले एक दशक में उत्पादन धीरे-धीरे गिरता चला गया जिस कारणयहां के बागवान आडू़, पुलम एवं अन्य प्रकार के फलो को उगाने लगे। इधर मुक्तेश्वर के सुनकिया गांव में पिछले 3-4 साल से (टेरी) की मदद से बागवानों को अनार के पौधे वितरण किये गये जिनके इस वर्ष फल देना की उम्मीद की जा रही है। टेरी के डा. नारायण सिंह बताते है सुनकिया गांव के किसानों के लिए अनार की खेती की ओर ध्यान आकर्षित कर उनकी आजीविका बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। उन्होंने दावा किया कि 7 से 8 साल बाद एक पेड़ 25 से 30 किलो फल देगा। स्थानीय किसान बिशन सिंह कहते है टेरी अनार के अलावा कई अन्य नई प्रजातियों की खेती के बारे में भी लगातार प्रशिक्षण देती आ रही है।
डीएच 01। सुनकिया गांव अनार के लहलहाते पेड़।

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नवीन समाचार, पौड़ी, 7 जनवरी। पहले ही कर्ज माफी से इंकार कर चुके  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि किसानों को कृषि उपकरण खरीदने के लिए शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इस ब्याज की धनराशि भरपाई खनन, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र से हुए राजस्व से की जाएगी। इससे किसानों की आय दोगुनी करने में मदद मिलेगी। इससे पहले किसानों को यह ऋण दो प्रतिशत ब्याज दर पर दिया जाता था। उल्लेखनीय है कि आज ही केंद्र सरकार ने देश के 100 जिलों मे किसानोंं को कृषि से संबंधित विभिन्न प्रशिक्षण देने की योजना का भी ऐलान किया है। इन दोनों भाइयों को सकारात्मक माना जाा रहा है।

पौड़ी में अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना का शुभारंभ करते हुए सीएम ने कहा कि जब तक राज्य के प्रत्येक परिवार का योजना के तहत गोल्डन कार्ड नहीं बन जाता, तब तक आयुष्मान जैसी महत्वाकांक्षी योजना संचालित होती रहेगी।

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    • पहाड़पानी में कश्मीर के अखरोट के पौधे उगाने की तैयारी, जायका परियोजना द्वारा चल रही है योजना की तैयारी
    • लाखों रूपए की लागत से तैयार किया जा रहा मदर प्लांट पॉली हाउस, तापमान एवं आद्रता  का निर्धारण किया जा सकेगा पॉलीहाउस में
  • नैनीताल जिले के ओखलकांडा एवं धारी के अनेठी, खुजेठी, सलियाकोट तल्ला, लेटीबूँगा और कोटला गाँव में किसानों को बाटे गए हैं 500 पौधे
  • कश्मीर से यहां लाने का एक पौधे का खर्च है लगभग 540 रुपए, बिजली का भी अहम योगदान है मदर प्लांट में
नर्सरी में तैयार कश्मीरी अखरोट के पौधे।

मनोज कुमार जोशी @ नवीन समाचार, पहाड़पानी (नैनीताल)। राज्य के नैनीताल सहित कई अन्य जिलों में वन विभाग, भूमि संरक्षण एवं जायका परियोजना की ओर से किसानों को हिमांचली सेब के बाद अब कश्मीरी अखरोट के पेड़ उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। नैनीताल जिले में वन विभाग की ओर से किसानों तक कश्मीर से उच्च गुणवत्ता वाले अखरोट के पौधे लाकर कुल लागत के दस फीसदी अंशदान में बांटे गए हैं, और अब इन्हें यहां भी उगाने की तैयारी की जा रही है। नैनीताल जिले के पहाड़पानी के पास रतोडा (सेलालेख ) नर्सरी में नये पौध तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

जायका परियोजना के अंतर्गत भूमि संरक्षण के द्वारा जिलेभर में तीन मदर प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है। जिसमें से दो मुक्तेश्वर रेंज और एक चोगड़ रेंज में तैयार किया जा रहा है। पहाड़पानी में भी एक मदर प्लांट लगभग तैयार हो चुका है। इसमें तापमान एवं आर्द्रता बनाए रखने के लिए कूलर एवं हीटर जैसे दोनों तरह से पालीहाउस को तैयार किया गया है जिसके लिए पर्याप्त पानी एवं बिजली की आपूर्ति की भी व्यवस्था भी कर ली गई है।
भूमि संरक्षण के एसडीओ पूरन चन्द्र जोशी एवं वन क्षेत्राधिकारी मुक्तेश्वर रेंज के लक्ष्मण सिंह मर्तोलिया के मुताबिक जिलेभर में 500 पौधे कश्मीर से 540 रुपये की लागत से लाए गए हैं, और यह किसानों को 54 रुपए अंशदान में बांटे गए हैं, जिससे किसान उच्च गुणवत्ता के पौधे तैयार कर अच्छे अखरोट का लाभ ले सकें। खास बात यह भी है कि यह अंशदान भी किसानों के एसएचजी खाते में जमा किया गया है। इससे परियोजना का लाभ सीधे किसानों को होगा। इसके अलावा पहाड़पानी स्थित मदर प्लांट में स्थानीय अखरोट के 1600 पौधे रोप दिए गए हैं जिनमें फरवरी में कश्मीर से उच्च श्रेणी के पौधों की कटिंग चढ़ाई जाएगी, और इस तरह नए बेहतर प्रजाति के पौधे  जायेंगे।  दावा है कि इन पेड़ों में अगले चार सालों में अखरोट लगना शुरू हो जायेंगे। आगे भी लगातार इसप्रकिया के द्वारा कश्मीरी कटिंग रोपित की जाएगी और कश्मीरी अखरोट की प्रजाति इन मदर प्लांट में बनाई जाएगी।

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  • आलू का महँगा बीज और उत्पादन साल दर साल घटने एवं उचित दाम नहीं मिलने से पहाड के किसान परेशान ।
  • इस साल कम आलू की पैदावार की संभावना।
  • आलू के लिए प्रसिद्ध माना जाता है धारी ब्लॉक में मज्यूली न्याय पंचायत।

मनोज कुमार जोशी @ नवीन समाचार, पहाड़पानी (नैनीताल) 29 दिसंबर 2018। हर वर्ष आलू के बीज के दाम आसमान छूना व मौसम की मार झेल रहे किसानो का मन सब्जियों के राजा कहे जाने वाले पहाड़ी आलू के उत्पादन से अब उचटने लगा है। जहाँ दिसम्बर व जनवरी में खेतों में आलू की पैदावार के लिए गोबर की खाद के साथ जुताई को खेत खाली छोड़ दिये जाते थे लेकिन उनमें अब अन्य फसलों की पैदावार करने की तैयारियाँ जोरो पर है।

बताते चलें कि हर साल हजारों रुपये कुंटल के आलू बीज को बोने के बाद किसानों की फसल मूल रकम के भी बराबर नहीं हो पा रही है। जहां एक तरफ आलू के बीज के दाम आसमान छू रहे हैं वहीं दूसरी तरफ जंगली जानवरों के आतंक के साथ साथ मौसम की मार झेल रहे किसानों ने अब आलू से हटकर अन्य तरह की सब्जियों की पैदावार करने की भी ठान ली है। जिससे पहाड़ी आलू के लिये प्रसिद्ध नैनीताल जिले के पहाड़पानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में आलू के कम पैदावार की संभावना हो गई है। बताते चलें कि पहाड़ में आलू उत्पादन के लिए जिले में धारी ब्लॉक भी आलू के लिए प्रसिद्ध बताया जाता है। पहाड़ी क्षेत्र में ऊंचाई वाले इलाकों को विशेष तौर पर आलू के लिए जाना जाता है। पहाड़पानी और इसके आसपास के सभी गांवों में आलू की सब्जी की पैदावार आज तक लगातार होती आ रही है। लेकिन यह हर साल कम होती जा रही है इसका मुख्य कारण यह है कि काश्तकार आलू का महँगा बीज लगा रहे हैं और उपज कम होने के कारण वह हल्द्वानी मंडी से जुड़े आडतियो से मंगाते हैं जिसके कारण आलू के बीज का दाम खुला नहीं होता मनमाने रेट में तंग आकर किसानों ने खेती का तरीका भी बदल दिया है.।. किसानों का कहना है कि वह आलू की फसल उत्पादन करके दिन रात मेहनत कर सालभर का खर्चा पूरा नहीं कर पाता है और मंडी के आडतियो से दबा रहता है।

ये है मुख्य कारण – आलू के बीज मांगते समय उसका रेट नहीं खोला जाता है और पहाड़ के अधिकतर किसानों के पास नहीं होता है नगद रुपया कही भी बाहर से स्वयं बीज मगाँए। इसके अलावा फसल बेचकर भी मनमर्जी के रेट लिए जाते हैं बीज के दाम। पहाड़पानी में मुक्तेश्वर किसान प्रोड्यूसर कम्पनी ने लीज पर जमीन लेकर करीब पाँच सौ कट्टे आलू का बीज बोया था लेकिन जिसमें केवल 150 कट्टे की पैदावार कर बाजार में बेचा इसके अलावा उन्होंने मनाघेर फ़ार्म में भी करीब 35 कुटल आलू का बीज बोया लेकिन ठीक उसका आधा उत्पादन हुआ। प्रोड्यूसर कम्पनी के देवेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि उनके मजदूरों और बुआई की भी लागत वसूल नहीं हो पाई। लाखों रुपये का किसान कम्पनी को घाटा हुआ है।

इस बार लगने लगी है अब मटर, बहुत कम मात्रा में आलू बोए जाने की है संभावना
इस बार किसान आलू के बजाय मटर उगाने को है उत्सुक किसानों का कहना है कि हर साल आलू की फसल बेचकर हो रहा है घाटा।

पहाड़पानी के आसपास में अधिक होगी मटर की पैदावार…
पहाड़पानी उत्पादन एंव विपणन स्वायत सहकारिता चिया संस्था से जुड़े किसानों ने की फेडरेशन में मटर के बीज की माँग। फेडरेशन के सचिव पीताम्बर मेलकानी के मुताबिक इस बार जाड़ों में बोए जाने के लिए फेडरेशन से जुड़े 415 काश्त्कार ने फेडरेशन से लिया है अब तक करीब साढ़े नौ कुंटल बीज अंशदान जमा कर ले लिया है। इसके अलावा भी कुछ किसानों ने बाजार से बीज खरीदकर बोने की तैयारी शुरू कर दी है। पहाड़पानी के आसपास ही करीब बाहर कुटल मटर का बीज आ चुका है।

सहकारी समिति में भी मिलने लगा है आलू का बीज
साधन सहकारी समितियो में भी मनाली गोला आलू का बीज मिलने लगा है जिसका अभी निर्धारित मूल्य तय नहीं हुआ है। और अभी तक कम लोग यहाँ से बीज खरीद रहे हैं। जो किसान ले रहे हैं वह भी सीमित मात्रा में।

“लगातार एक ही फलस को बोने से मिट्टी की पोषण एंव उर्वरक क्षमता कम होती है। मिट्टी के पोषक तत्वों की लगातार एक ही फसल उगाने से कम हो सकती है। इसलिए किसानों को मिट्टी की जाच के आधार पर फ़सल उगानी चाहिये एंव जैविक खाद के भी उपयोग करने की आवश्यकता है। आलू की फसल के लिए खेतों के बदलाव की भी आवश्यकता है क्यूंकि हर फ़सल बोने के लिए बदलाव जरूरी है लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की पोषक क्षमता कम हो जाती है।
भावना जोशी, जिला उद्यान अधिकारी, नैनीताल

“किसानों को गुणवत्ता युक्त बीज नहीं मिल पाता है। किसान स्वयं बीज का चयन करें तो बेहतर होगा। आलू एवं टमाटर में अगेथी और पचेथी नाम रोग मुख्यतः इसके लिए हानिकारक होता है। मिट्टी की जाच एंव उचित दवा एवं रसायनिक खाद की भी जरूरत होती है।
विजय दोहरे, प्रभारी कृषि अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्यूलीकोट

यह भी पढ़ें : कौन सुने पहाड़ के किसानों की पीड़ा, इसलिए हैं पलायन को मजबूर

सरकार  व स्थानीय जनप्रतिनिधियों की  अनदेखी  से हुआ लाचार किसान
कई दशकों से नही खुल पाए कृषि विज्ञान केंद्र, मृदा परीक्षण कराए बीत गए सालों, पूरे क्षेत्र की 
एक जैसी रिपोर्ट, महंगे बीज  के साथ जंगली जानवर  बने मुसीबत, फसल का भाव लागत के बराबर भी नही मिलता
दानसिंह लोधियाल @ नवीन समाचार, धानाचूली, 28 दिसंबर 2018 । कई सालों से पहाड़ में लगातार गिरती फसल की पैदावार पर न तो सरकार गंभीर दिखाई दे रही है, ना ही जनप्रतिनिधि। हाल यह हो गया है कि किसान अपनी पीड़ा बतायें भी तो किसको। किसानों को बनियागिरी व बैकों के कर्ज से उबरने का मौका ही नही मिल पा रहा है। ऐसे में पहाड़ का किसान साल दर साल पीछे को जा रहा है। किसान जंगली जानवरों, महंगे बीज और खाद मृदा परीक्षण का नही होना, लागत के बराबर भाव नहीं मिलना न जाने कितनी समस्याओं से घिर गया है। वहीं सरकार का किसानों की दुगुनी आय करने की बात उनका मजाक सा उड़ा रही है। आलीशान कोठियों या आफिसों में बैठे जो नेता व अधिकारी जो किसानों के लिए उनकी आय दुगुनी करने की बात करते हैं, वे धरातल पर उतर कर पहाड़ के किसानों की स्थिति का जायजा लें तो हकीकत पता चले कि कैसे वह गुजारा कर रहे है। महंगा बीज, महंगी खाद का वास्तविक मूल्य भी वसूल नहीं हो पाना, जंगली जानवरों का फसल चौपट करना, जैसी समस्याओं से घिरा किसान आखिर अपना दुखड़ा रोये तो कहां रोये। इन स्थितियों के बावजूद सरकार न तो किसानों को सब्सिडी में बीज ही दिला पाई है और ना ही फसल का अच्छा भाव। घर से लेकर मंडी तक केवल बिचोलियों की पौ-बारह है।
आपको बताते चलें की नैनीताल के अधिकांश विकास खंडों में लोग खेतीबाड़ी व बागवानी से अपना जीवन यापन करते आ रहे है। पर आज तक यहां के किसानों के लिए सरकार या कोई भी जनप्रतिनिधि कोई ठोस कार्ययोजना नही बना पाया है। जिस कारण यहाँ का काश्तकार कर्ज में डूबता जा रहा है। कभी किसान मंडी की बात होती है तो कभी कृषि विज्ञान केंद्र स्थापना करने की, पर आज तक बात ही हुई है। काम कुछ नही हुआ। आलू के महंगे बीज के कारण सैकड़ों किसान इस आस में मटर लगा रहे है कि लागत तो कम होगी। मंडी में अच्छे दाम की आस में आज भी खेतों में बन्दगोभी पड़ी हुई है जिसे किसान अब मजबूरी में मवेशियों को खिला रहे हैं।
इस बारे में मुक्तेश्वर किसान प्रोड्यूसर कम्पनी के एमडी देवेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि रामगढ़, धारी व ओखलकांडा विकास खंड का अधिकांश भाग बागवानी और सब्जी-भाजी आलू उत्पादक क्षेत्र है। जहाँ पर लगभग 150 गाँवों के किसान नकदी फसल पैदा कर आजीविका चलाते हैं। हमारे पहाड़ों के नेताओं ने किसानों के नाम पर सिर्फ अपने घरों को भरा है। लेकिन किसी भी विकास खंड में ना तो कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना की, ना ही बीज उत्पादन की ओर ही ध्यान दिया। और भी जो भी बचा खुचा उद्यान विभाग के फार्म बीज उत्पादन करते थे उनको बंद कर किराये में लगा दिया। आज मजबूरी में किसानों को बाहरी प्रदेशों से मंहगा आलू का बीज लेना पड रहा है, जिसमें किसानों को बहुत नुकसान हो रहा है। देवेंद्र ने इन स्थितियों को पलायन का मुख्य कारण भी बताया। बताया कि सरकार व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते आने वाले समय मे पहाड़ में सारे खेत बंजर हो सकते हैं, और यह एक गंभीर मुद्दा बन सकता है। क्या सरकारें यही चाहती है कि पहाड़ों से किसान अपनी जमीनें बेचकर पलायन करें। उन्होंने यह भी बताया कि आज भी इसी क्षेत्र में सैकड़ों ऐसे किसान हैं जिनके नाम उनकी जमीन ही दर्ज नहीं है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार द्वारा भूमिधरी का अधिकार देने की कोशिश तक नही की गयी है। ऐसे में यहां की जनता पलायन नही करेगी तो क्या करेगी। ऐसे में जनता आने वाले चुनावो में चुनाव बहिष्कार या नोटा का बटन दबाने जैसा निर्णय भी ले सकती है। 

पॉलीथीन की पन्नी को बनाया गांवों में समृद्धि लौटाने-पलायन भगाने का हथियार

रामगढ़ विकास खंड में पॉलीथीन की पन्नी से जल संरक्षण करते ग्रामीण।

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p style=”text-align: justify;”>नवीन जोशी, नैनीताल। देश-दुनिया में पर्यावरण के लिए दुश्मन बताई जा रही पॉलीथीन की पन्नी उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों के किसानों की किस्मत बदलने का माध्यम बन रही है। अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी के बाद नैनीताल जनपद के दूरस्थ रामगढ़ और ओखलकांडा आदि विकास खंडों के ऊंचाई वाले वर्षा जल पर निर्भर गांवों के निवासी काश्तकारों ने पॉलीथीन की पन्नियों से अपने खेतों-बागों के साथ ही क्षेत्र में भी हरीतिमा फैला दी है, और अपनी आय बढ़ाकर पलायन की समस्या का हल भी तलाश लिया है। साथ ही वे अब अपनी तरह के अन्य पानी की कमी वाले गांवों के लिये भी मिसाल बन गये हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य में वर्षों से वन विभाग की चाल-खाल एवं सिचाई विभाग की योजनाएं संचालित हैं, किंतु इनका लाभ कहीं ग्रामीणों को मिल पा रहा हो, ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। ऐसे में राज्य के ऊंचाई वाले गांवों को सिचाई के लिए पानी नहीं मिल पाता है। पानी की कमी ग्रामीण काश्तकारों को खेती से दूर करने के साथ पलायन का कारण भी बन रही है। ऐसे में ग्रामीणों ने खुद ही पहल करते हुए पॉलीथीन की पन्नियों से जल संरक्षण की मुहिम शुरू की है। इस पहल में उन्हें भारत सरकार के राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन का साथ मिला है, जो राज्य के पिछड़े क्षेत्रों में पॉलीथीन की पन्नी के प्रयोग से पानी के संरक्षण की मुहिम चलाये हुए हैं। उत्तराखंड सेवा निधि, पर्यावरण शिक्षण संस्थान अल्मोड़ा आदि संस्थाओं ने अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी विकासखंड में जागेश्वर से आगे भगरतोला, चमुवा आदि गांवों में जल संरक्षण में पॉलीथीन का सफल प्रयोग किया है। इससे ही प्रेरित होकर इधर करीब दो वर्षों से नैनीताल जनपद में जनमैत्री संगठन के द्वारा भी ग्राम पाटा, धूरा, जयपुर, गल्ला, सूपी व बूड़ीबना में इस मुहिम को आगे बढाया जा रहा है। मुहिम के तहत पिछले एक वर्ष में पाटा नाम के गांव में 80 परिवारों के लिये 90 जल संचय टेंक बनाये गये हैं। और आगे इस वर्ष 210 टैंकों का निर्माण किया जा रहा है। इस कार्य में जन मैत्री संगठन के बची सिंह बिष्ट, गंगा सिंह गौड़, महेश नयाल, राजेश्वरी नयाल, मोहन राम, हेमा नयाल, मुन्नी देवी, भवानी देवी, कमला गौड़, हरीश नयाल, महेश सिंह गलिया व राधिका आदि लोग प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
क्षेत्र के ग्वाल सेवा संगठन के पंकज कुलौरा ने बताया कि इस कार्य में ग्रामीण बरसात के मौसम से पहले अपने खेतों से ऊपर के क्षेत्र में खुद बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर उन पर पॉलीथीन की पन्नी चढ़ा देते है।। बरसात के मौसम में पानी से यह गड्ढे भर जाते हैं, और पन्नी की वजह से पहले की तरह पानी जमीन में रिसकर बरबाद भी नहीं होता है। पानी वाष्पित होकर भी न उड़ जाये, इस हेतु गड्ढों में भरे पानी के ऊपर भी छाया करने के लिए पन्नी डाल दी जाती है। यह पानी कई महीनों तक सुरक्षित बना रहता है, और आगे खासकर शीतकाल में जब बारिश नहीं होती, फसलों में सिचाई के काम आता है। यह मुहिम इतनी अधिक सफल हो रही है कि राज्य के अधिकारियों के साथ ही और विदेशी शोधकर्ता भी इन गांवों में योजना का परीक्षण करने के लिए खिंचे चले आ रहे हैं, और इसकी सफलता से खुश हो अन्य स्थानों पर भी इस प्रयोग को करने की बात कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें : वाह जनाब ! हल्दी-अदरक से दे रहे पलायन को जवाब !! बंजर खेतों-भुतहा गांवों को बचाने का ढूंढ लिया उपाय…

बागेश्वर, 24 सितंबर 2018। एक ओर उत्तराखंड के काफी गाँव हर साल खाली होकर ‘भुतहा गांव’ बनते जा रहे है, वहीं बागेश्वर जिला के जारती गांव के 2 युवाओं ने नई प्रेरणात्मक पहल की शुरुआत करते हुए अपने बंजर हो चुके खेतों में हल्दी व अदरक की बुआई कर उन लोगों को एक संदेश दिया है जो गॉव से रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। ये युवा हैं भूपेंद्र सिंह मेहता व जितेंद्र सिंह मेहता। भूपेंद्र सिंह मेहता ने कुमाऊँ विवि से M.Sc गणित व जितेंद्र ने LPU जालंधर से BSc एनीमेशन की शिक्षा प्राप्त की है। दोनों अपनी पैतृक जमीन की दशा देखकर काफी दुःखी थे। तब इन्होंने काफी विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय लिया कि जमीन से रोजगार के ऐसे अवसर तलाशे जाएं, जो कम लागत के हों व जंगली जानवरों के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से बच सकेें। तब इन दोनों ने हल्दी व अदरक की खेती हेतु उद्यान विभाग कपकोट से सम्पर्क किया। जहाँ इन्हें उद्यान अधिकारी श्री गढ़िया ने काफी सहयोग किया तथा विभाग से 7 कुंतल हल्दी व अदरक का बीज उपलब्ध कराया। उल्लेखनीय है कि कन्द वर्गीय फसल में आने वाले तथा मसाले, औषधि व सौंदर्य प्रसाधन के रूप में काम आने वाली यह दोनों फसलें वन्य जीवों से भी सुरक्षित हैं। लिहाजा इनके बीज को इन दोनों ने परिवार के सहयोग से 30 खेतों में हल्दी की सुवर्णा व 5 खेतों में पन्त पीताभ नाम की हल्दी की प्रजाति की बुआई तथा 4 खेतों में रियोडीजनेरिओ प्रजाति के अदरक की बुआई की। जिसका सुंदर परिणाम दिखने को मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि भूपेंद्र सिंह मेहता वर्तमान में मदरलैंड पब्लिक स्कूल बैडा मझेड़ा में बतौर प्रधानाचार्य कार्यरत हैं। उनके इस कार्य में उनकी पत्नी भगवती मेहता भी सहयोग करती हैं, जोकि उसी विद्यालय में शिक्षका भी हैं। जबकि जितेंद्र मेहता एमबी कालेज हल्द्वानी से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। बारी बारी से घर आकर ये अपने खेतों में काम करते हैं। उनका गांव से जुड़ाव सभी गांव वालों को प्रेरित कर रहा है। अपने इस कार्य को जन-जन तक पहुचाने के लिये उन्होंने फेसबुक पर ‘पहाड़ी किचन’ नाम से पेज भी बनाया है, जिसमें काफी रोचक जानकारी दी जाती है कि कैसे पहाड़ का पलायन रूक सकता है, और कैसे रोजगार के अवसर तलाशे जा सकते हैं। उनकी इस पहल को सोशल मीडिया में भी काफी सराहा जा रहा है। उनका कहना है कि कई ऑनलाइन कम्पनियां हल्दी के उत्पाद हेतु उनसे सम्पर्क कर रही हैं। इनका यह भी कहना है यदि सरकार विपणन पर प्रसंस्करण की व्यवस्था पहाडों में उपलब्ध करा दे तो पहाड़ में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, और यह प्रयास पलायन रोकने में कारगर हो सकता है। उनका यह भी कहना है कि पहाड़ के युवाओं में गजब का जोश व जज्बा है लेकिन जरूरत है तो उनके प्रतिभा को पहचाने की। उनकी यह पहल वास्तव में काबिले तारीफ है, औऱ युवाओं को प्रेरित करने वाली है।

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राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसंबर 2017

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 4 सितम्बर 2017, पेज-10

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p style=”text-align: justify;”>-नैनीताल जनपद के गौलापार खेड़ा निवासी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने की खोज, पेटेंट कराने की है तैयारी
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के किसानों व खेती को बढ़ावा देने के आह्वान के बीच उन्हीं के नाम पर ‘नरेंद्र-09’ नाम की गेहूं की एक ऐसी प्रजाति प्रकाश में आयी है, जो मोदी की तरह ही (जैसे मोदी नवरात्र में ब्रत करने के बावजूद दिन में 20 घंटे तक कार्य करते हैं) दो से तीन गुना अधिक उत्पादकता देती है। हालांकि गेहूं की इस प्रजाति के नाम और नरेंद्र मोदी में कोई संबंध नहीं है, लेकिन देश में ‘नमो-नमो’ की गूंज के बीच यह संयोग ही है कि इस प्रजाति को मोदी के ही हम नाम नरेंद्र मेहरा (आप चाहें तो उन्हें ‘नमे’ कह लें) ने खोजा है। और यह भी संयोग है कि नरेंद्र मेहरा करीब तीन दशक से यानी नरेंद्र मोदी की ही पार्टी भाजपा से जुड़े हैं, अलबत्ता उनकी इस खोज व नाम का पार्टी से कोई संबंध नहीं है। गेहूं की इस प्रजाति का नाम नरेंद्र-09 केवल इसलिये है कि इसे नरेंद्र मेहरा ने वर्ष 2009 में खोजा है।

अपने कार्य को गंभीरता व पूरी तन्मयता किसी को भी बड़ी उपलब्धि दिला सकती है। खेती-किसानी करते हुए अपने गेहूं के खेत में अन्य पौधों के साथ एक असामान्य रूप से अधिक विकसित हुए पौधे ने जनपद के गौलापार देवला मल्ला निवासी किसान नरेंद्र मेहरा को एक बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया है। नरेंद्र अब अपनी विकसित की गयी गेहूं की प्रजाति ‘नरेंद्र-09’ को पेटेंट कराने जा रहे हैं। जबकि उनकी प्रजाति को ‘फार्मर्स वैराइटी’ यानी किसानों द्वारा तैयार प्रजाति के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यदि उनकी यह खोज सही तरह से देश में प्रसारित होती है जो इससे बिना अतिरिक्त रसायनिक खाद व अन्य प्रयासों के लगातार घटती खेती की जमीनों व किसानों में खेती के प्रति लगातार घटते रुझान, खेती में नुकसान व लगातार आ रही किसानों की आत्महत्याओं की गंभीर चुनौतियों के दौर में खेती-किसानी को बेहतर उत्पादन के साथ नवजीवन मिल सकता है।

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राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसंबर 2017

नैनीताल जनपद के भूगोल में परास्नातक एवं पर्यटन में डिप्लोमाधारी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा की इस नयी खोज की कहानी वर्ष 2009 से प्रारंभ हुई। एक दिन वे अपने आरआर-21 प्रजाति के गेहूं के खेत का निरीक्षण कर रहे थे, तभी उनकी नजर एक अधिक विकसित हुए पौधे पर पड़ी, जिस पर उन्होंने पहचान चिन्ह लगा दिया, और आगे इसी पौधे से निकले बीजों को अगले वर्षों में अलग से उगाकर वर्ष 2013 तक इस एक पौधे के बीज से ही 80 किग्रा बीज उत्पन्न कर लिया। 2013 से ही उन्होंने अपनी इस खोज को केवल स्वयं के खेतों तक सीमित करने के बजाय आस-पड़ोस के आधा दर्जन अन्य किसानों को भी उगाने को दिया, साथ ही इसके वैज्ञानिक परीक्षण के लिये भी पंतनगर विवि से प्रयास शुरू किये, और अपनी प्रजाति को अपने नाम व इसे खोजे जाने के वर्ष के साथ नरेंद्र-09 नाम दिया। नरेंद्र ने बताया कि अब उनकी प्रजाति की ‘फार्मर्स वैराइटी’ के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। साथ ही वे इसे पेटेंट कराने की भी तैयारी में हैं। इसके अलावा वे इस प्रजाति को पूरी तरह जैविक तरीके से उगाकर इसका जैविक उत्पाद के रूप में पंजीकरण कराने के साथ ही इसकी गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिये भी प्रयासरत हैं। आगे वे सरकार से इसके गुणों का अन्य प्रजातियों से वैज्ञानिक तरीके से तुलनात्मक अध्ययन व जेनेटिक परीक्षण कराने के लिये मांग कर रहे हैं कि उनकी प्रजाति को प्रदेश के सभी जिलों में निःशुल्क तरीके से उगाकर परीक्षण करा लिये जाएं, ताकि प्रदेश के अधिक किसानों को इसका लाभ मिल पाए। उन्होंने बताया कि नरेंद्र-09 के लिये बिजाई का समय 20 नवंबर से 5 दिसंबर तक है, और इसकी फसल अप्रैल माह में अन्य प्रजातियों के साथ ही पकती है। अपनी इस उपलब्धि के लिये वे नैनीताल के जिला कृषि अधिकारी से वर्ष 2015-16 में ‘किसान श्री’ तथा मंडी समिति से ‘स्वतंत्रता दिवस कृषि सम्मान’ प्राप्त कर चुके हैं।

नरेंद्र-09 प्रजाति के गेहूं का अन्य प्रजातियों से तुलनात्मक विवरण

नैनीताल। प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा के अनुसार प्रदेश के भाबर क्षेत्र में जहां अन्य प्रजातियों के गेहूं के एक बीज से उगने वाले एक पौधे में जहां 3 से 8 तक कल्ले निकलते हैं, और हर कल्ले में एक के हिसाब से इतनी ही बालियां लगती हैं, वहीं नरेंद्र-09 में 40 कल्ले तक आते हैं, और हर कल्ले में 93 से 95 दाने तक आते हैं। जबकि अन्य प्रजातियों की एक बाली में केवल 55 से 60 दाने ही लगते हैं। इस प्रकार जहां एक एकड़ में अन्य प्रजातियों के गेहूं की उपज 12 से 16 कुंतल प्रति एकड तक होती है़, वहीं नरेंद्र-09 की पैदावार 18 से 26 प्रति एकड यानी करीब डेढ़़ से दो गुना तक होती है। जबकि जनपद के पर्वतीय क्षेत्र में किये गये एक प्रयोग के तहत नरेंद्र-09 के एक मुट्ठी बीज से हर पौधे में 19 से 22 कल्ले तक निकले और अन्य प्रजातियों के 1 मुट्ठी बीज से 3 से 3.5 नाली उत्पादन के मुकाबले 9 नाली यानी करीब तीन गुना तक गेहूं उत्पन्न हुआ है। इसके अलावा भी जहां कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार भाबर क्षेत्र में एक एकड़ में अल्स प्रजातियों का 40 किग्रा बीज बोने की सलाह दी जाती है, वहीं नरेंद्र-09 को 35 किग्रा बोने से ही काम चल जाता है। इसके अलावा एक पौधे में अधिक कल्ले होने की वजह से इसका पौधा अन्य प्रजातियों के मुकाबले अधिक मजबूत भी होता है, और आंधी-तूफान आने पर भी गिरता नहीं है। वहीं इसका पौधा अन्य प्रजातियों के पौधों के मुकाबले अधिक पुष्ट व मजबूत भी होता है, जिस कारण अधिक पकने के बावजूद इसकी बालियों से गेहूं खेत में गिरते नहीं हैं। इसका पौधा अधिक लंबा होता है, जिस कारण इससे बनने वाला भूसा भी 20 फीसद अधिक व अच्छा होता है। अधिक मात्रा में और जानवरों के लिये अधिक पौष्टिक होता है। स्वाद में भी इसके आटे की रोटियां अधिक स्वादिष्ट बताई गयी हैं।

पंतनगर विवि में शुक्रवार को जिले के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा को सम्मानित करते सीएम त्रिवेंद्र रावत।
‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले किसान नरेंद्र मेहरा को सीएम ने किया सम्मानित

नैनीताल। दो से तीन गुना तक पैदावार देने वाली गेहूं की नई किस्म ‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले जनपद के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा को शुक्रवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविश्वविद्यालय, पंतनगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस उपलब्धि के लिये सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि पंतनगर विवि इस संबंध में मेहरा की उपलब्धि को अन्य किसानों तक पहुंचाने में मदद करे। इस मौके पर पंतनगर विवि के कुलपति प्रो. ए के मिश्रा, विधायक राजेश शुक्ला व राजकुमार ठुकराल, तथा प्रसार निदेशक डा. वाईपीएस डबास आदि भी मौजूद थे।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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