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वाह जनाब ! हल्दी-अदरक से दे रहे पलायन को जवाब !! बंजर खेतों-भुतहा गांवों को बचाने का ढूंढ लिया उपाय…

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बागेश्वर, 24 सितंबर 2018। एक ओर उत्तराखंड के काफी गाँव हर साल खाली होकर ‘भुतहा गांव’ बनते जा रहे है, वहीं बागेश्वर जिला के जारती गांव के 2 युवाओं ने नई प्रेरणात्मक पहल की शुरुआत करते हुए अपने बंजर हो चुके खेतों में हल्दी व अदरक की बुआई कर उन लोगों को एक संदेश दिया है जो गॉव से रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। ये युवा हैं भूपेंद्र सिंह मेहता व जितेंद्र सिंह मेहता। भूपेंद्र सिंह मेहता ने कुमाऊँ विवि से M.Sc गणित व जितेंद्र ने LPU जालंधर से BSc एनीमेशन की शिक्षा प्राप्त की है। दोनों अपनी पैतृक जमीन की दशा देखकर काफी दुःखी थे। तब इन्होंने काफी विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय लिया कि जमीन से रोजगार के ऐसे अवसर तलाशे जाएं, जो कम लागत के हों व जंगली जानवरों के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से बच सकेें। तब इन दोनों ने हल्दी व अदरक की खेती हेतु उद्यान विभाग कपकोट से सम्पर्क किया। जहाँ इन्हें उद्यान अधिकारी श्री गढ़िया ने काफी सहयोग किया तथा विभाग से 7 कुंतल हल्दी व अदरक का बीज उपलब्ध कराया। उल्लेखनीय है कि कन्द वर्गीय फसल में आने वाले तथा मसाले, औषधि व सौंदर्य प्रसाधन के रूप में काम आने वाली यह दोनों फसलें वन्य जीवों से भी सुरक्षित हैं। लिहाजा इनके बीज को इन दोनों ने परिवार के सहयोग से 30 खेतों में हल्दी की सुवर्णा व 5 खेतों में पन्त पीताभ नाम की हल्दी की प्रजाति की बुआई तथा 4 खेतों में रियोडीजनेरिओ प्रजाति के अदरक की बुआई की। जिसका सुंदर परिणाम दिखने को मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि भूपेंद्र सिंह मेहता वर्तमान में मदरलैंड पब्लिक स्कूल बैडा मझेड़ा में बतौर प्रधानाचार्य कार्यरत हैं। उनके इस कार्य में उनकी पत्नी भगवती मेहता भी सहयोग करती हैं, जोकि उसी विद्यालय में शिक्षका भी हैं। जबकि जितेंद्र मेहता एमबी कालेज हल्द्वानी से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। बारी बारी से घर आकर ये अपने खेतों में काम करते हैं। उनका गांव से जुड़ाव सभी गांव वालों को प्रेरित कर रहा है। अपने इस कार्य को जन-जन तक पहुचाने के लिये उन्होंने फेसबुक पर ‘पहाड़ी किचन’ नाम से पेज भी बनाया है, जिसमें काफी रोचक जानकारी दी जाती है कि कैसे पहाड़ का पलायन रूक सकता है, और कैसे रोजगार के अवसर तलाशे जा सकते हैं। उनकी इस पहल को सोशल मीडिया में भी काफी सराहा जा रहा है। उनका कहना है कि कई ऑनलाइन कम्पनियां हल्दी के उत्पाद हेतु उनसे सम्पर्क कर रही हैं। इनका यह भी कहना है यदि सरकार विपणन पर प्रसंस्करण की व्यवस्था पहाडों में उपलब्ध करा दे तो पहाड़ में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, और यह प्रयास पलायन रोकने में कारगर हो सकता है। उनका यह भी कहना है कि पहाड़ के युवाओं में गजब का जोश व जज्बा है लेकिन जरूरत है तो उनके प्रतिभा को पहचाने की। उनकी यह पहल वास्तव में काबिले तारीफ है, औऱ युवाओं को प्रेरित करने वाली है।

यह भी पढ़ें : आया मोदी जैसा गेहूं ‘नरेंद्र-09’, देता है दो-तीन गुना अधिक उत्पादन

राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसंबर 2017

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 4 सितम्बर 2017, पेज-10

-नैनीताल जनपद के गौलापार खेड़ा निवासी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने की खोज, पेटेंट कराने की है तैयारी
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के किसानों व खेती को बढ़ावा देने के आह्वान के बीच उन्हीं के नाम पर ‘नरेंद्र-09’ नाम की गेहूं की एक ऐसी प्रजाति प्रकाश में आयी है, जो मोदी की तरह ही (जैसे मोदी नवरात्र में ब्रत करने के बावजूद दिन में 20 घंटे तक कार्य करते हैं) दो से तीन गुना अधिक उत्पादकता देती है। हालांकि गेहूं की इस प्रजाति के नाम और नरेंद्र मोदी में कोई संबंध नहीं है, लेकिन देश में ‘नमो-नमो’ की गूंज के बीच यह संयोग ही है कि इस प्रजाति को मोदी के ही हम नाम नरेंद्र मेहरा (आप चाहें तो उन्हें ‘नमे’ कह लें) ने खोजा है। और यह भी संयोग है कि नरेंद्र मेहरा करीब तीन दशक से यानी नरेंद्र मोदी की ही पार्टी भाजपा से जुड़े हैं, अलबत्ता उनकी इस खोज व नाम का पार्टी से कोई संबंध नहीं है। गेहूं की इस प्रजाति का नाम नरेंद्र-09 केवल इसलिये है कि इसे नरेंद्र मेहरा ने वर्ष 2009 में खोजा है।

अपने कार्य को गंभीरता व पूरी तन्मयता किसी को भी बड़ी उपलब्धि दिला सकती है। खेती-किसानी करते हुए अपने गेहूं के खेत में अन्य पौधों के साथ एक असामान्य रूप से अधिक विकसित हुए पौधे ने जनपद के गौलापार देवला मल्ला निवासी किसान नरेंद्र मेहरा को एक बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया है। नरेंद्र अब अपनी विकसित की गयी गेहूं की प्रजाति ‘नरेंद्र-09’ को पेटेंट कराने जा रहे हैं। जबकि उनकी प्रजाति को ‘फार्मर्स वैराइटी’ यानी किसानों द्वारा तैयार प्रजाति के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यदि उनकी यह खोज सही तरह से देश में प्रसारित होती है जो इससे बिना अतिरिक्त रसायनिक खाद व अन्य प्रयासों के लगातार घटती खेती की जमीनों व किसानों में खेती के प्रति लगातार घटते रुझान, खेती में नुकसान व लगातार आ रही किसानों की आत्महत्याओं की गंभीर चुनौतियों के दौर में खेती-किसानी को बेहतर उत्पादन के साथ नवजीवन मिल सकता है।

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राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसंबर 2017

नैनीताल जनपद के भूगोल में परास्नातक एवं पर्यटन में डिप्लोमाधारी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा की इस नयी खोज की कहानी वर्ष 2009 से प्रारंभ हुई। एक दिन वे अपने आरआर-21 प्रजाति के गेहूं के खेत का निरीक्षण कर रहे थे, तभी उनकी नजर एक अधिक विकसित हुए पौधे पर पड़ी, जिस पर उन्होंने पहचान चिन्ह लगा दिया, और आगे इसी पौधे से निकले बीजों को अगले वर्षों में अलग से उगाकर वर्ष 2013 तक इस एक पौधे के बीज से ही 80 किग्रा बीज उत्पन्न कर लिया। 2013 से ही उन्होंने अपनी इस खोज को केवल स्वयं के खेतों तक सीमित करने के बजाय आस-पड़ोस के आधा दर्जन अन्य किसानों को भी उगाने को दिया, साथ ही इसके वैज्ञानिक परीक्षण के लिये भी पंतनगर विवि से प्रयास शुरू किये, और अपनी प्रजाति को अपने नाम व इसे खोजे जाने के वर्ष के साथ नरेंद्र-09 नाम दिया। नरेंद्र ने बताया कि अब उनकी प्रजाति की ‘फार्मर्स वैराइटी’ के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। साथ ही वे इसे पेटेंट कराने की भी तैयारी में हैं। इसके अलावा वे इस प्रजाति को पूरी तरह जैविक तरीके से उगाकर इसका जैविक उत्पाद के रूप में पंजीकरण कराने के साथ ही इसकी गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिये भी प्रयासरत हैं। आगे वे सरकार से इसके गुणों का अन्य प्रजातियों से वैज्ञानिक तरीके से तुलनात्मक अध्ययन व जेनेटिक परीक्षण कराने के लिये मांग कर रहे हैं कि उनकी प्रजाति को प्रदेश के सभी जिलों में निःशुल्क तरीके से उगाकर परीक्षण करा लिये जाएं, ताकि प्रदेश के अधिक किसानों को इसका लाभ मिल पाए। उन्होंने बताया कि नरेंद्र-09 के लिये बिजाई का समय 20 नवंबर से 5 दिसंबर तक है, और इसकी फसल अप्रैल माह में अन्य प्रजातियों के साथ ही पकती है। अपनी इस उपलब्धि के लिये वे नैनीताल के जिला कृषि अधिकारी से वर्ष 2015-16 में ‘किसान श्री’ तथा मंडी समिति से ‘स्वतंत्रता दिवस कृषि सम्मान’ प्राप्त कर चुके हैं।

नरेंद्र-09 प्रजाति के गेहूं का अन्य प्रजातियों से तुलनात्मक विवरण

नैनीताल। प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा के अनुसार प्रदेश के भाबर क्षेत्र में जहां अन्य प्रजातियों के गेहूं के एक बीज से उगने वाले एक पौधे में जहां 3 से 8 तक कल्ले निकलते हैं, और हर कल्ले में एक के हिसाब से इतनी ही बालियां लगती हैं, वहीं नरेंद्र-09 में 40 कल्ले तक आते हैं, और हर कल्ले में 93 से 95 दाने तक आते हैं। जबकि अन्य प्रजातियों की एक बाली में केवल 55 से 60 दाने ही लगते हैं। इस प्रकार जहां एक एकड़ में अन्य प्रजातियों के गेहूं की उपज 12 से 16 कुंतल प्रति एकड तक होती है़, वहीं नरेंद्र-09 की पैदावार 18 से 26 प्रति एकड यानी करीब डेढ़़ से दो गुना तक होती है। जबकि जनपद के पर्वतीय क्षेत्र में किये गये एक प्रयोग के तहत नरेंद्र-09 के एक मुट्ठी बीज से हर पौधे में 19 से 22 कल्ले तक निकले और अन्य प्रजातियों के 1 मुट्ठी बीज से 3 से 3.5 नाली उत्पादन के मुकाबले 9 नाली यानी करीब तीन गुना तक गेहूं उत्पन्न हुआ है। इसके अलावा भी जहां कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार भाबर क्षेत्र में एक एकड़ में अल्स प्रजातियों का 40 किग्रा बीज बोने की सलाह दी जाती है, वहीं नरेंद्र-09 को 35 किग्रा बोने से ही काम चल जाता है। इसके अलावा एक पौधे में अधिक कल्ले होने की वजह से इसका पौधा अन्य प्रजातियों के मुकाबले अधिक मजबूत भी होता है, और आंधी-तूफान आने पर भी गिरता नहीं है। वहीं इसका पौधा अन्य प्रजातियों के पौधों के मुकाबले अधिक पुष्ट व मजबूत भी होता है, जिस कारण अधिक पकने के बावजूद इसकी बालियों से गेहूं खेत में गिरते नहीं हैं। इसका पौधा अधिक लंबा होता है, जिस कारण इससे बनने वाला भूसा भी 20 फीसद अधिक व अच्छा होता है। अधिक मात्रा में और जानवरों के लिये अधिक पौष्टिक होता है। स्वाद में भी इसके आटे की रोटियां अधिक स्वादिष्ट बताई गयी हैं।

पंतनगर विवि में शुक्रवार को जिले के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा को सम्मानित करते सीएम त्रिवेंद्र रावत।
‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले किसान नरेंद्र मेहरा को सीएम ने किया सम्मानित

नैनीताल। दो से तीन गुना तक पैदावार देने वाली गेहूं की नई किस्म ‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले जनपद के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा को शुक्रवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविश्वविद्यालय, पंतनगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस उपलब्धि के लिये सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि पंतनगर विवि इस संबंध में मेहरा की उपलब्धि को अन्य किसानों तक पहुंचाने में मदद करे। इस मौके पर पंतनगर विवि के कुलपति प्रो. ए के मिश्रा, विधायक राजेश शुक्ला व राजकुमार ठुकराल, तथा प्रसार निदेशक डा. वाईपीएस डबास आदि भी मौजूद थे।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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