खुसुर-पुसुर…ऑफ द रिकॉर्ड : मेयर के लिए मशक्कत

ये उन दिनों की बात है शैपो, जब मेयर प्रत्याशी की सीट को लेकर असमंजस बना ठैरा कि सीट सामान्य होगी, आरक्षित होगी या फिर महिला सीट होगी। अब तो सामान्य सीट हो गयी है बल। तब की गणित किसने कैसे लगाई ठैरी। क्योंकि इसी सीट के प्रत्याशी की बदौलत वर्ष 2019 में संसद का बीजगणित लगाया गया था।
हुआ ये कि पूर्व मुख्यमंत्री और अपनी दीदी के बीच भौती कलेश ठैरा बल। दोनो सांसद बनने को सो नीं पारे ठैरे रात – रात भर। एक आयोजन में पूर्व मुख्यमंत्री और यहां का पुराना छात्र नेता मिले। ये छात्र नेता भी औरी बात महत्वाकांक्षी हुआ बल। आयोजन से पहले ही छात्र नेता पूर्व के कान में कुछ गुनगुना दिया बल। दीदी की तिगड़मों के बारे में । जो भी गुनगुनाया हो। पर वो पूर्व के समझ आ गया और आयोजन खत्म होते ही पूर्व छात्र नेता से फिर मिले और पीठ पर हाथ रख कर बोले कि तुम्हारी बात ठीक हो सकती है। ये बात हमारी समझ भी तब आयी जब सारा शहर पूर्व की बेटी के होर्ड़िग से पट गया ठैरा।
ऐसे में हमारा भी दिमाग ठनका और लगे जानने कि जुगत में कि छात्र नेता ने पूर्व के कान में ऐसा क्या गुनगुना दिया होगा। भौति परेशानी के बाद पता चल पाया हो, कि छात्र नेता ने पूर्व के कान में कहा बल, भगवान जाने सच्ची था या झूठी। पर कहा ये बल कि सांसद का चुनाव दीदी अपने भौ को लड़ाएगी देख लेना। इधर मेयर सीट महिला होने का डर भी ठैरा, तभी तो पूर्व ने अपना गणित लगाकर बेटी के होर्डिग से पाट दिया ठैरा।
हमारी समझ में तो नीं आने वाली ठैरी ये गणित पर छात्र नेता ने जो पूर्व के कान में गुनगुनाया उसके रिजल्ट होल्डिंग के रूप में दिखे ही ठैरे। ये भी बोला छात्र नेता ने कि अपने भौ को तो दीदी मेयर का नहीं लड़ाएगी। क्योकिं मेयर प्रत्याशियो का इतिहास इसकी इजाजत नीं देने वाला ठैरा बल। खैर छोड़ो हो, अब छात्र नेता तो दीदी पसंद करती नीं है तो उसे टिकट मिलता है नीं मिलता है भगवान जाने। पर जिसको दीदी टिकट दिलाना चाहती है उसका प्रतिद्वन्द्वी पार्टी की केन्द्र कार्यकारणी में है। इसलिए दीदी चाहकर भी उसे टिकट नहीं दिला पाएगी और दिला दिया तो देख लेना । केन्द्रीय कार्यकारिणी वाला बन्दा भविष्य में दीदी के भौ का टिकट नीं कटने देगा कभी।

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सुणो हो सैपो! हमारा राज्य जैसे भी बना, बनी गया ठैरा। मेन बात ये ठैरी कि मुख्यमंत्री हमेशा ही पैरासूट ही मिला हमें। किस्सी को भी देख लो। चाहे पंडित ज्यूु हों, ठाकुर सैप हों, कवि हों या फिर मूंछें आकास को मरोड़े सैनिक हों, छोटी आंत वाले धोती धारी हों या न्याय के देवता।

सभी पैरासूट मुख्यमंत्री रहे और ठग खाया ठैरा सारा पहाड़। इन सबने अपने-अपने गुसांइयों को भौत बड़े -बड़े टारगेट दिए बल, हजारों-सैकड़ों करोड़ के। जब-जब ये टारगेट पूरा नीं कर पाते तो गुसांई नाजाज होकर दूसरे को इनकी जगह पैरासूट से उतार देने वाले हुए। तभी तो 17 बरस में 10 मुख्यमंत्री बने बल यहां। नीं तो कायदे में 4 ही नीं होते अब तक।

लेकिन पिछले चुनाव में अजीबी था मुखिया चुनने का पैमाना, मुखिया के लिए लालायित ग्याडुओं को गुंसाईं का बुलावा आया बल। सब झोला-झमटी टांगे पहुंच गए गुसांई दरवार में। गुसांई से मिलना इतना आसान कहां हुआ बल। अध्यक्ष ने ही अपने कक्ष में घंटों बैठाकर हंफा दिया। जब ग्याडुओं की उबासी रुकना मुश्किल हो गया और हाथ-पैर में खवाई ने बैचेन कर दिया तो, ऐलान हुआ कि गुंसाई निकल चुके हैं और आधे घंटे में पहुंच कर पहाड़ का मुखिया तय किया जाएगा।

ग्याडू जन जब पस्त पड़ गए तो अध्यक्ष ने बड़े स्नेह से कहा कि देश को नई दिशा देने में व्यस्त गुसांई अब आप लोगो को भौती कम समय पे पाइंगे। ग्याडू इतने पस्त पड़ चुके थे कि सोचने लगे कि आ जाएं गुसांई। देखी जाएगी बल। गुंसाई के आने का पता तब जान पाए ग्याडू-जन जब अध्यक्ष खड़े होकर जी- सर, जी- सर करने लगा बल फोन पर और सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। जैसे राष्ट्रगान बज रहा हो बल।

इतने में गुसांई की इंट्री हो गयी, तब तक ग्याडुओं में खड़े रहने की हिम्मत भी खर्च हो गई बल। खैर गुसांई आए और अध्यक्ष से बोले समय कम है सभी से माफी चाहता हूं, आप लोग चाय-पानी लें। मुझे जल्दी निकलना होगा। अब पस्त ग्याडू क्या बोलते।

गुसांई ने कहा पहाड़ की समृद्वि के लिए हम सबको कंधे से कंधा मिलाकर काम करना है। मैं सोच रहा हूं कि वो जो क्या नाम है उसका, जो संटी में झंडा टांग कर आधी पैंट में बच्चों को पी टी करता था। मुखिया के लिए तो मुझे वोई जंचरा है। क्या आप लोग सहमत हैं मेरे ख्याल से। पस्त ग्याडू जी- सर के अलावा क्या बोल पाते बल। सबकी रजामंदी से हमें नया मुखिया ऐसे मिला बल।

हमारा तो जो हुआ सो हुआ। अब मुखिया बनने को लालायित ग्याडू भी रोज पी टी कर रहे बल।

साभार : शिल्पकार टाइम्स

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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