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‘लंदन फॉग’ से दिलकश-रुमानी हुआ नैनीताल का मौसम

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-पर्यटन एवं पैदल घूमने के लिए बेहतर होता है यह मौसम
नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2019। प्रदेश में मानसून के आगमन एवं मौसम विभाग द्वारा जनपद में मानसूनी वर्षा की चेतावनी पर बृहस्पतिवार को मुख्यालय एवं आसपास के क्षेत्रों में बारिश तो नहीं हुई, अलबत्ता ‘लंदन फॉग’ कहे जाने वाले मानसूनी कोहरे से नगर का मौसम दिलकश व रुमानी हो गया। इस दौरान नगर में दोपहर से पहले वालों को हेड लाइट जलाकर गुजरना पड़ा। जुलाई माह में इस तरह का अनुभव खासकर मैदानी क्षेत्रों से आये सैलानियों के लिए रोमांचक रहा, जो ऐसी स्थितियों की अपेक्षा केवल सर्दियों के दिनों में करते हैं।

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नैनीताल में लंदन फॉग का सुंदर वीडियो देखें :

उल्लेखनीय है कि नगर के जुलाई-अगस्त माह में मानसूनी मौसम में इस कोहरे को अंग्रेजी दौर से लंदन में लगने वाले कोहरे ‘लंदन फॉग’ की संज्ञा प्राप्त है। इस दौरान कोहरे से हल्की बूंदों का झरना पैदल घूमने वाले सैलानियों को अद्भुत अनुभूति देता है। इस मौसम को नगर में रंग-बिरंगी छतरियां लेकर पैदल घूमने वाले लोग भी खासा पसंद करते हैं। उल्लेखनीय है कि पर्यटन के लिहाज से भी यह मौसम सैलानियों के खासा लाभप्रद होता है, जब शहर में अधिक भीड़भाड़ नहीं होती है। होटलों में कमरे एवं अन्य सुख-सुविधाएं अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाती हैं।

यह भी पढ़ें : नैनीताल में ‘लंदन फॉग’ संग मानो आसमां झुक जाता हो जमीं पर

नवीन जोशी नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल को यूं ही प्रकृति का स्वर्ग नहीं कहा जाता है। हर मौसम में यह शहर विश्वस्तर के एक नये आकर्षण को लेकर आता है, और छा जाता है। ग्रीष्मकालीन पर्यटन सीजन में तो यहां देश-दुनिया से सैलानी प्राकृतिक एयरकंडीशनर (नेचुरल एसी) सरीखे मौसम का आनंद ले ही पाते हैं, लेकिन इसके बाद भी, जब देश मानसून का इंतजार कर रहा होता है, यहां लोकल मानसून झूम के बरसने लगता है। इस दौरान यहां एक नया आकर्षण नजर आता है, जिसे नगर के अंग्रेज निर्माताओं ने अपने घर इंग्लैंड को याद कर ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ नाम दिये थे।

नगर की विश्व प्रसिद्ध नैनी सरोवर के ऊपर उठता और सरोवर को छूने के लिए नीचे उतरते खूबसूरत बादलों को ‘लंदन फॉग’ कहा जाता है। इन्हें देखकर हर दिल अनायास ही गा उठता है-‘आसमां जमीं पर झुक रहा है जमीं पर’, और ‘लो झुक गया आसमां भी…’।

नगर के पूर्व म्युनिसिपल कमिश्नर स्वर्गीय गंगा प्रसाद साह बताते थे, 1841 में जब अंग्रेज निर्माताओं ने इस शहर में बसना शुरू किया होगा तो उन्हें यहां बरसात के दिनों में उठने वाले कोहरे और धरती पर उतरते बादलों ने इस शहर के प्राकृतिक सौंदर्य और हरीतिमा की परिपूर्णता के साथ उनके घर ‘बिलायत’ की याद दिला दी होगी। तभी उन्होंने इस शहर को अपने घर की तर्ज पर ‘छोटी बिलायत’ नाम और यहां के कोहरे को ‘लंदन फॉग’ नाम दिया होगा। साह बताते थे कि नगर में कोहरे के लिए ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ नाम सामान्य तौर पर प्रयोग किये जाते हैं, और इस एक अनूठी खूबसूरती के लिए भी नगर की वैश्विक पहचान है।

इस मौसम में यहां बादलों के फाहों का पल भर में दूर से पास तक आना, और पास की प्रकृति के साथ खुद को भी छुपा लेना, तथा खासकर नैनी झील को मानो छूने को आतुर होते हुए आना और फिर एकाएक गायब भी हो जाना बेहद दिलकश तो लगता ही है, दिल को सुकून भी दे जाता है। लगता है घंटों ऐसे स्वर्ग सरीखे प्राकृतिक दृश्यों को देखा जाए।

वहीं इस दौरान होने वाली बारिस भी बड़ी मनमोहक होती है। बारिस की बूंदें दूर से हवाओं के साथ आती हुई नजर आती हैं। कई बार पास आकर तन के साथ मन को भी भिगो जाती हैं, तो कई बार करीब से भी यूं तरसा कर दूर निकल जाती हैं, मानो कहती हों-“मुझे चाहते हो तो मेरे पास आओ भी। मुझे छूने को कुछ तो यत्न करो।”

इंग्लैंड में प्रदूषित धुएं को कहते हैं ‘लंदन फॉग’

नैनीताल। भले अंग्रेजों ने नैनीताल के कोहरे को अपने घर के ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ नाम दिये हों, लेकिन यह भी तथ्य है कि लंदन में ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ प्राकृतिक सुंदरता के नहीं वरन प्रदूषित धुंए के नाम हैं। बताया जाता है कि 19वीं सदी के मध्य तक इंग्लैंड में तेजी से औद्योगिकीकरण हुआ और इस दौरान उद्योगों और घरों में ईधन के लिए लकड़ी व कोयले को ही प्रयोग किया जाता था। ऐसे में इंग्लैंड की पहचान दूर से देखने पर फैक्टरियों व घरों की चिमनियों से भारी मात्रा में उठने वाले धुंए के भूरे बवंडर से होती थी, इसे ही ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ तथा लंदन को ‘फॉग सिटी’ भी कहा जाता था। हाल के वर्षों में लंदन ने खुद से ‘फॉग सिटी’ नाम की पहचान हटा ली है।

नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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