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प्रो. तिवारी की पहल पर 15 दृष्टिबाधित बच्चे देख सकेंगे दुनिया

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नवीन समाचार, हल्द्वानी, 6 जनवरी 2019। नैब यानी नेशनल एसोसिएशन फ़ॉर द ब्लाइंड्स के 15 दृष्टिबाधित बच्चों को नेत्र ज्योति मिल जाएगी और वे दुनिया को देखने के साथ ही स्वतंत्र रूप से जीवन यापन कर सकेंगे। रविवार को इन बच्चों के प्रारंभिक परीक्षण में चयन के बाद अब इनका दिल्ली में प्रख्यात नेत्र सर्जन ऑपरेशन करेंगे।
कुमाऊं विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रो. गिरीश रंजन तिवारी की पहल पर नयना ज्योति समिति तथा एलबी कृष्णा फाउंडेशन दिल्ली के सहयोग से नैब में वरिष्ठ चिकित्सक डा. वीके तिवारी, एम्स के पूर्व सीनियर रेजिडेंट डा. रुचिर तिवारी तथा बलरामपुर अस्पताल लखनऊ के सर्जन डा. संजय श्रीवास्तव ने कुल 95 बच्चों का परीक्षण किया। चिकत्सकों ने विश्वास जताया कि इनमें से 15 बच्चों को ऑपेरशन के बाद आंख की पूरी रोशनी मिल जाएगी। इसके अलावा 7 बच्चों को हाई पावर लेंस के चश्मे से लिखने-पढ़ने लायक ज्योति मिल जाएगी। चयनित 15 बच्चों का  इसी माह से नोएडा,  दिल्ली स्थित हाईटेक अस्पताल में ऑपेरशन किया जाएगा। नैब के संचालक श्याम धानिक ने बताया कि बच्चों का ऑपेरशन डा. तिवारी की टीम ने नि:शुल्क करने का आश्वासन दिया है जबकि लेंस व अन्य डिस्पोजेबल का खर्च प्रो. गिरीश रंजन तिवारी उपलब्ध करवाएंगे। इस हेतु उन्होंने इस शिविर के आयोजन तथा ऑपेरशन में सहयोग के लिए प्रो तिवारी, डा तिवारी की टीम का आभार जताते हुए कहा कि इस उपचार के बाद बच्चे आत्मनिर्भर बन कर जीवन जी सकेंगे। वहीं नैब में परीक्षण के दौरान बच्चों में नेत्र ज्योति पा कर अपने सपने पूरे करने को लेकर भारी उत्साह है। इस अवसर पर प्रो. तिवारी, कुसुम तिवारी, नयना ज्योति संस्था के अरुण रौतेला, योगेश साह, सुरेश खोलिया, गुलशन, नागेश दुबे, विजय पाल व अंकुर आदि उपस्थित रहे।

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डीएसबी परिसर में स्वैच्छिक रक्तदान करते छात्र।

नैनीताल। शनिवार 10 मार्च को मुख्यालय स्थित डीएसबी परिसर में छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर ‘सबसे बड़ा दान’ यानी रक्तदान किया। ‘बंदे मातरम् सेवा संस्थान’ के सहयोग से ओर छात्र संघ के उपाध्यक्ष ऋषभ जोशी की अगुवाई में आयोजित किये गये इस रक्तदान शिविर में 70 से 80 छात्र-छात्राओं ने रक्तदान किया। बड़ी बात यह रही कि इनमें 30 से अधिक छात्राएं भी शामिल रहीं, और खासकर छात्राओं में पहली बार रक्तदान करते हुए खासा जोश व उत्साह देखा गया। रक्तदान करने वालों में कुमाऊं विवि छात्र महासंघ के अध्यक्ष पुष्कर नैनवाल, नवीन भट्ट, सूरज पांडे, रवि बिष्ट, सौरभ रावत, नेहा कुरिया, शिखा, आरसी परवीन, सोनी जोशी आदि प्रमुख रहे।



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-रक्त मे 90 दिन पूर्व से हो रही केवल पांच बीमारियों की जांच ही है संभव
-स्वयं का अथवा नियमित स्वैच्छिक रक्तदाताओं से रक्त लेना ही सर्वाधिक सुरक्षित
-स्वैच्छिक रक्तदान ही नहीं हर 90 दिन में नियमित स्वैच्छिक रक्तदान है जरूरी
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, मनुष्य को बेहद जरूरी होने पर ही किसी दूसरे का रक्त चढ़ाना चाहिए। देश-प्रदेश में अभी तक चढ़ाए जाने वाले रक्त में 90 दिन से पुरानी और केवल पांच बीमारियों की ही जांच की व्यवस्था उपलब्ध है। यानी यदि रक्तदान करने वाले व्यक्ति को यदि 90 दिन से कम अवधि में किसी बीमारी का संक्रमण हुआ है तो रोगी को चढ़ाए जाने वाला रक्त भी उस बीमारी से संक्रमित हो सकता है। इस समस्या से बचाव के दो तरीके हैं। यदि संभव हो तो रक्त चढ़ाने की किसी संभावित स्थिति का पहले से पता हो तो स्वयं का रक्त भी 15 दिन पूर्व रक्त बैंक में जमा कराया जा सकता है। दूसरा तरीका नियमित रूप से स्वैच्छिक रक्तदाताओं के रक्त को लेना है। इसके लिए लोगों को नियमित रूप से रक्तदान के लिए प्रेरित किया जा रहा है। राज्य में कहीं-कहीं अब 15 दिन पुरानी बीमारियों का भी पता लगाने की व्यवस्था भी की जा रही है। लेकिन यह व्यवस्था भी केवल पांच बीमारियों-एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, मलेरिया तथा यौन गुप्त रोग संबंधी सिपलिस बीमारियों के लिए ही है।



सुरक्षित एवं असुरक्षित रक्त की इस पहेली को समझने से पहले जान लें कि रक्तदाता पांच तरह के होते हैं। पहला, व्यवसायिक तौर पर रक्तदान जो कि 1999 से प्रतिबंधित है। दूसरा, रोगी के परिजनों के द्वारा। इसे सुरक्षित नहीं माना जाता। क्योंकि अधिकांशतया अपने परिजनों को बचाने के लिए लोग अपनी बीमारियों व अन्य समस्याओं को छुपाकर रक्तदान कर देते हैं। तीसरे, स्वयं रक्तदाता। ऐसे सीमित रक्तदाता कई बार अपने एक माह बाद होने वाली किसी ऑपरेशन जैसी स्थितियों के लिए 15 दिन पहले ही स्वयं का रक्त, रक्तबैंक में सुरक्षित रखवा सकते हैं। यह तरीका रक्त लेने का सबसे सुरक्षित तरीका बताया जाता है। इसके अलावा जो स्वैच्छिक रक्तदाताओं वाले पांचवे तरीके का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार किया जाता है, इस वर्ग के रक्तदाताओं के भी पहले रक्तदान से मिले रक्त को चढ़ाने में भी कभी बड़ी समस्या आ सकती है। उत्तराखंड रक्त संचरण परिषद के राज्य नोडल प्रभारी एवं एनएसएस के पूर्व राज्य संपर्क अधिकारी डा. आनंद सिंह उनियाल ने बताया कि देश-प्रदेश में अब तक 90 दिन से (कुछ गिने-चुने केंद्रों में 15 दिन) पुरानी पांच बीमारियों- एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, मलेरिया तथा यौन गुप्त रोग संबंधी सिपलिस के टेस्ट ही उपलब्ध हैं। हमारे रक्त में मौजूद लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी) की उम्र 120 दिन की ही होती है। यानी हर 120 दिन में हमारे शरीर की आरबीसी मरती जाती हैं, और नया खून भी साथ-साथ बनता चला जाता है। इसीलिए हर व्यक्ति को 90 दिन में रक्तदान की सलाह दी जाती है। हर रक्तदान के दौरान रक्त की उपरोक्त पांच बीमारियों के लिए आवश्यक रूप से जांच होती है, लिहाजा पहली बार किसी व्यक्ति द्वारा दिए जाने वाले रक्त से बेशक उसकी नई बीमारियों का पता न चल पाए, लेकिन नियमित रूप से हर 90 दिन में रक्तदान करते जाने से उस व्यक्ति के इन बीमारियों से रहित होने की संभावना बढ़ जाती है। डा. उनियाल ने कहा कि इसीलिए अब स्वैच्छिक रक्तदान की जगह नियमित स्वैच्छिक रक्तदान करने का आह्वान किया जा रहा है। लिए लोगों को रक्तदान के प्रति ज्ञान देकर इस स्लोगन के साथ जागरूक किया जा रहा है कि रक्तदान से पहले रक्त का ज्ञान जरूरी है। यदि लोग रक्त व रक्तदान के प्रति ज्ञान रखने लगें तो इस समस्या का समाधान हो सकता है।

रक्त लेने में खतरे ही खतरे, रक्त देने में लाभ ही लाभ

नैनीताल। किसी अन्य का रक्त लेने में भले अनेक खतरे हों, लेकिन 18 से 65 वर्ष के लोगों द्वारा रक्तदान किए जाने के अनेकों लाभ हैं। हर 90 दिन के नियमित अंतराल में रक्तदान करने से व्यक्ति की मुफ्त में नियमित जांच हो जाती है, तथा कोई रोग होने पर जल्द पता लग जाता है। चूंकि आरबीसी की उम्र 120 दिन ही होती है, इसलिए रक्त का दान करना किसी तरह भी शरीर के लिए नुकसानदेह नहीं होता। रक्तदान के बाद शरीर में नया खून बनता है, जिससे शरीर में ताजगी आती है, हृदयाघात के खतरे नहीं रहते, और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। हमेशा नए युवा रक्त का संचार होता रहता है, इसलिए बुढ़ापा भी देरी से आता है। दूसरों को दान करने से मस्तिष्क में सकारात्मकता एवं धनात्मक ऊर्जा आती है, तथा स्मरण शक्ति बढ़ जाती है।

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