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11वीं सदी में चढ़े, 19वीं में उतरने लगे, 21वीं में खाली ही कर दिए पहाड़

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उत्तराखंड का पहाड़ी इलाका देश का वह इलाका है, जहां 11वीं और 12वीं सदी में देशभर से लोग विभिन्न राजनीतिक उथल पुथलों के कारण मैदानी क्षेत्रों से पलायन कर पहुंचे, लेकिन 19वीं सदी में अंग्रेजों के आते-आते यानी करीब आठ सदी बाद वे पहाड़ से उतर कर यानी पलायन कर मैदान की ओर उतरने लगे। लेकिन अब भौतिकवाद की 21वीं सदी में पलायन की गति सर्वाधिक बढ़ीं है। यहाँ तक कि अब तो पहाड़ खाली और गाँव ‘भुतहा’ ही होने लगे हैं, यहां तक कि पलायन उत्तराखंड की एक ज्वलंत समस्या के रूप में जाना जाने लगा है।

ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की प्रथम रिपोर्ट (उत्तराखंड के ग्राम पंचायतों में पलायन की स्थिति पर अंतरिम रिपोर्ट) एटकिंसन (1892) और वॉल्टन (1910) की रिपोर्टों के हवाले से बताती है कि 11वीं सदी से पहले ये इलाके खानाबदोश लोगों द्वारा चारागाह के रूप में इस्तेमाल होते थे। 11वीं और 12वीं सदी के दौरान भारत के अन्य हिस्सों से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भारी पलायन हुआ। यह पलायन संभवत: तीर्थयात्रा के लिए आने वाले यात्रियों के स्थायी तौर पर उत्तराखंड में बस जाने के कारण या आक्रमणकारियों से बचने के लिए लोगों के लिए उत्तराखंड जैसे दुर्गम पहाड़ी इलाके मुफीद साबित होने से हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक उस दौर में लोगों ने कठिन श्रम के बाद जंगल के इलाकों व पहाड़ों को खेतों में तब्दील किया।  देश के दूसरे हिस्सों से पलायन कर आये लोगों के समय ही खेती का तेजी से विस्तार भी हुआ। 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश शासन मजबूत हुआ तो स्थितियां बदलने लगीं। ब्रिटिश फौज में कुमाऊं व गढ़वाल रेजिमेंटों के गठन से लोगों को फौज और पुलिस में रोजगार के लिए जाना शुरू हो गया। स्थानीय लोगों को अब सरकारी सेवाओं में स्थायी रोजगार मिलने लगा तो लोगों का पलायन हुआ लेकिन इनमें से अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद पहाड़ लौट आये। कई लोगों के परिवार तो खेती के लिए पहाड़ में ही रहे। वाल्टन भी इस बारे में उल्लेख करते हैं कि आजीविका की खोज में पहाड़ से मैदान में मौसमी पलायन भी हुए हैं।

1921 में 1.23 फीसद घटी, 1981 में 27.45 फीसद बढ़ी उत्तराखंड की आबादी

जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 1911 से 21 का अकेला दशक था जब उत्तरखंड की जनसंख्या में 1.23 फीसद की कमी हो गई थी। वहीं 1981 की जनगणना में उत्तराखंड में जनसंख्या में सबसे ज्यादा 27.45 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। 1901 से 2011 की जनगणना के आंकड़े साफ करते हैं कि उत्तराखंड की जनसंख्या 1911 में 8.20 फीसद बढ़ी पर 1921 में 1.23 फीसद कम हो गई। उत्तराखंड की आबादी 1931 में 8.74, 1941 में 13.63, 1951 में 12.67, 1961 में 22.57 , 1971 में 24.42 , 1981 में 27.45,1991 में 23.13, 2001 में 20.41 और 2011 में 18.81 फीसद बढ़ी। 

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ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की 7950 ग्राम पंचायतों के 16500 गांवों के सर्वेक्षण के उपरांत तैयार व 5 मई 2018 को जारी पिछले 10 वर्षों की रिपोर्ट के अनुसार प्रकृति व पर्यावरण के ‘स्वर्ग’ कहे जाने वाले उत्तराखंड से पलायन के आंकड़े:

  • 6,368 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने पिछले 10 वर्षों में किया अस्थायी पलायन, यानी ये लोग गांव आते-जाते भी रहते हैं।
  • 3986 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोग स्थायी तौर पर कर चुके हैं पलायन
  • इस प्रकार कुल 5,02,707 लोग पिछले 10 वर्षों में कर चुके हैं पलायन
  • हर रोज करीब 138 लोग कर रहे हैं पलायन, इनमें से 106 अस्थाई तौर पर जबकि 32 स्थायी तौर पर कर रहे हैं पलायन
  • इनमें से 19.46 फीसद ने नजदीकी कस्बों, 15.18 फीसद ने अपने जिला मुख्यालय, 35.69 फीसद ने अन्य जिलों, 26.72 फीसद ने उत्तराखंड से बाहर और 0.96 फीसद ने देश के बाहर किया है पलायन
  • सर्वाधिक 50.16 फीसद ने रोजगार के लिए, 15.21 ने शिक्षा, 8.83 फीसद ने चिकित्सा, 5.61 फीसद ने वन्य जीवों से फसलों को हो रही क्षति, 5.44 फीसद ने कृषि पैदावार में कमी, 3.74 फीसद ने सड़क बिजली पानी आदि मूलभूत सुविधाओं के अभाव , 2.52 ने परिवार या संबंधियों की देखादेखी एवं 8.68 फीसद ने अन्य कारणों से किया है पलायन
  • पलायन करने वालों में सर्वाधिक 42 फीसद लोग 26 से 35 की उम्र के, 29 फीसद 35 से अधिक उम्र के युवा और 28 फीसद 25 से कम उम्र के शामिल
  • राज्य में पलायन की दर 36.02 फीसद, राष्ट्रीय औसत 30.6 फीसद से अधिक, समान प्रकृति के हिमाचल में भी 36.01 फीसद की पलायन दर के साथ अधिक बेहतर नहीं हालात, सिक्किम में पलायन की दर 34.06 व जम्मू कश्मीर में 17.8 है क्योंकि वहां के कानून कठोर हैं और कश्मीर छोड़ने वाले की नागरिकता रद्द हो जाती है।
  • वर्ष 2011 तक उत्तराखंड में 968 गांव आबाद थे। 2011 के बाद सर्वाधिक बढ़ी गांवों के गैर आबाद होने की गति, इसके बाद 734 गांव हुए गैर आबाद, इनमें चीन सीमा के 84 गांव भी शामिल, बढ़कर 1702 हुई गैर आबाद गांवों की संख्या
  • 2011 के बाद 565 गांवों की आबादी 50 फीसद तक घटी, इनमें 6 गांव चीन सीमा के भी शामिल
  • पूरी रिपोर्ट में एकमात्र अच्छी खबर: 850 गांवों में रिवर्स माइग्रेशन भी हुआ, यानी इन गांवों में बाहर से आकर भी बसे हैं लोग

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पलायन आयोग ने सीएम को सौंपी रिपोर्ट, राज्य में 70 फीसद राज्य के भीतर जबकि 29 प्रतिशत राज्य के बाहर हुआ है पलायन

उत्तराखंड में पलायन के कारण भुतहा गांव यानी वीरान हो चुके गांव की संख्या बढ़कर अब 1668 पहुंच गई है। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की आयोग के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री का अनुमोदन मिलने के बाद चार या पांच मई को सार्वजनिक की जाने वाली  रिपोर्ट पर गौर करें तो पिछले सात सालों में 700 गांव वीरान हो गए है। इससे पहले साल 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में घोस्ट विलेज की संख्या 968 थी। यही नहीं रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि राज्य के पांच पहाड़ी जिलों रूद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी पिथौरागढ़ व अल्मोड़ा में पलायन की चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है। यहां के गांवों में पलायन राज्य औसत से कहीं अधिक है।

प्रदेश के 7950 गांवों के सर्वे के आधार पर पलायन को लेकर तैयार की गई एक रिपोर्ट में यह बात सांने आई कि प्रदेश के सभी गांवों से पलायन हो रहा है लेकिन छह पहाड़ी जिलों में औसत से अधिक पलायन हुआ है। वहीं सुकून की बात यह है कि राज्य के गांवों से 70 फीसदी पलायन राज्य में ही हुआ। इससे छोटे-छोटे कस्बों में बसासत तेजी से बढ़ी है। प्रदेश में 900 गांव ऐसे भी है जहां रिवर्स माइग्रेशन हुआ है। जबकि 29 फीसद लोग ऐसे हैं जिन्होंने राज्य से बाहर पलायन किया है। वहीं रिपोर्ट के अनुसार 50 फीसद लोगों ने आजीविका के लिए गांव छोड़ा जबकि 73 फीसद ने बेहतर सुविधा के अभाव चलते करीब 10 फीसद लोग पलायन को विवश हुए।

प्रदेश के छह पर्वतीय जिलों के तीस विकास खंडों में सबसे अधिक पलायन हुआ है। उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की प्रदेश सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में यह तय सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 70 फीसद राज्य के भीतर ही है जबकि 29 प्रतिशत राज्य के बाहर है और एक प्रतिशत लोग विदेश जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जल्द ही रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से जारी करेंगे। यही नहीं प्रदेश सरकार इन 30 विकासखंडों में पलायन की रफ्तार थामने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाएगी। बता दें कि प्रदेश सरकार ने पिछले साल सितंबर में भारतीय वन सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ. शरत सिंह नेगी के नेतृत्व में पलायन आयोग का गठन किया था। विवाद के बाद आयोग का कार्यालय पौड़ी स्थित ग्राम विकास आयुक्त मुख्यालय में बनाया गया। गठन के करीब छह महीने बाद आयोग ने अब सरकार को अपनी 84 पन्नों की रिपोर्ट सौंप दी है। 7950 ग्राम पंचायतों के सव्रेक्षण के बाद तैयार रिपोर्ट में बताया गया है कि पहाड़ के 1000 से कुछ कम गांव निर्जन हो चुके हैं। रिपोर्ट बताती है कि जिन जिलों में प्रतिव्यक्ति आय कम है, वहां ज्यादा पलायन हुआ है। पलायन आयोग ने 2001 व 2011 की जनसंख्या और सरकार के सामाजिक आर्थिक आंकड़ों की तुलना से पलायन के कारणों की पड़ताल की है। वहीं कई जगह रिवर्स पलायन की बात भी कही गई है। आयोग ने प्रदेश भर में सौ से अधिक ऐसे लोगों व संस्थाओं को भी चिह्नित किया है जिन्होंने पहाड़ लौटकर आकर नए सिरे से पर्यटन, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग, उद्यान और खेती में सफल कारोबार खड़ा किया है। रिपोर्ट में नैनीताल जिले के बेतालघाट में काम कर रहे रूरल बीपीओ बीटूआर का विशेष तौर पर उल्लेख किया है। रिपोर्ट में पलायन के चलते पहाड़ में डेमोग्राफिक बदलाव का भी उल्लेख किया गया है।

बढ़ रही बिहारियों व नेपालियों की तादाद 
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में बिहारियों व नेपालियों की तादाद बढ़ रही है। उत्तराखंड से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से भी बड़ी संख्या में लोग पहाड़ों में रहने लगे हैं। जबकि यहां के मूल निवासी लगातार पलायन कर रहे हैं। पिथौरागढ़, चंपावत जैसे जिलों में हाल के समय नेपाल से आये लोगों की संख्या काफी बढ़ रही है। जहां पहाड़ के लोग खेती छोड़ रहे हैं वहीं नेपाली मजदूर अब स्थायी रूप से पहाड़ों में रहकर खेतीबाड़ी को अपनी आजीविका का साधन बना रहे हैं।

उत्तराखंड के छह फीसद गांव हो गये ‘भुतहा’, नेताओं, देवी-देवताओं ने भी कर दिया पलायन

-60 लाख पर्वतीय आबादी में से 32 लाख लोगों ने किया पलायन, 17,793 गांवों में 1,053 गांव हो गये खाली

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये 409 अरब रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17,793 गांवों में 1,053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। प्रदेश के अधिकांश बड़े राजनेताओं (कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, यशपाल आर्य) ने भी अपने लिये मैदानी क्षेत्रों की सीटें तलाश ली हैं, वहीं भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई देवताओं ने भी पहाड़ों से मैदानों में पलायन कर दिया है।

प्रदेश के खासकर सीमांत क्षेत्रों उत्तरकाशी से लेकर चंपावत तक नेपाल-तिब्बत (चीन) से जुड़ी सरहद मानव विहीन होने की स्थिति में पहुंच गई है और यह इलाका एक बार फिर इतिहास दोहराने की स्थिति में आ गया है। कई सौ साल पहले मुगल और दूसरे राजाओं के उत्पीड़न से नेपाल समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से लोगों ने कुमाऊं और गढ़वाल की शांत वादियों में बसेरा बनाया था। लेकिन आजादी के बाद सरकारें इन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रहीं, जिस कारण पलायन ने गति पकड़ी, और सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही पहाड़ के 1,053 पर्वतीय गांव खाली हो गये। जबकि वास्तविकता यह है कि अकेले कुमाऊं में ही पांच हजार से अधिक गांव वीरान हो गये हैं। खासतौर पर नेपाल और तिब्बत सीमा से लगे गांवों से अधिक पलायन हुआ है, और हजारों एकड़ भूमि बंजर हो गई है। पलायन की गति 1980 के दशक से बढ़ी मानी जाती है। उस दौर में शहरों की ओर निकले लोग अब वृद्ध होने की स्थिति में स्वयं को पहाड़ की बजाय मैदानों में ही स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं, और वे हर साल पहाड़ आने से बचने के लिये अपने ग्राम व ईष्ट देवी-देवताओं को भी साथ मैदानों की ओर ले गये हैं।

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-भारत सरकार के नेशनल काउंसिल ऑफ रूरल इंस्टिट्यूट के तत्वावधान में प्रोफेसरों के लिए शुरू हुई दो दिवसीय कार्यशाला
नैनीताल, 19 अप्रैल 2018। कुमाऊं विश्वविद्यालय के हरमिटेज परिसर स्थित आईपीएसडीआर संस्थान में दो वर्ष का ग्रामीण प्रबंधन मे एमबीए एवं छह माह का ग्रामीण संबद्धता में डिप्लोमा कोर्स इसी सत्र से प्रारंभ होंगे। इन कोर्सों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने हेतु विवि के प्रोफेसरों के लिए नेशनल काउंसिल ऑफ रूरल इंस्टिट्यूट यानी एनसीआरआई के तत्वावधान में दो दिवसीय कार्यशाला बुधवार को हरमिटेज परिसर में प्रारंभ हुई। इस मौके पर एनसीआरआई हैदराबाद की निदेशक डा. श्रवणी पांडे ने कहा कि गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन की समस्या के निदान के लिए देश भर के विश्वविद्यालयों में इस तरह के पाठ्यक्रम शुरू किये जा रहे हैं। उत्तराखंड में यह जिम्मा कुमाऊं विश्वविद्यालय के आईपीएसडीआर को दिया गया है। इन पाठ्यक्रमों के लिए उत्तराखंड की खासकर पहाड़ों से हो रहे पलायन की समस्या के निदान के लिए पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा। इन पाठ्यक्रमों के जरिये कोशिश की जाएगी कि छात्र अपने गांव व राज्य में ही नौकरी करने के बजाय नौकरी देने वाले बनें। इन पाठ्यक्रमों में स्थानीय बोली-भाषा का भी प्रयोग किया जाएगा।
कुविवि के कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल एवं आईपीएसडीआर के निदेशक प्रो. अतुल जोशी व विभागाध्यक्ष डा. बीडी कविदयाल ने विश्वास जताया कि इसी सत्र से यह पाठ्यक्रम शुरू कर राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने में योगदान देंगे। प्रो. अतुल जोशी ने दावा किया कि राज्य के पहाड़ों से पूरे ऊधमसिंह नगर जिले की जनसँख्या के बराबर पलायन हो चुका है। इस अवसर पर यूजीसी एचआरडीसी के निदेशक प्रो. बीएल साह व विधान चौधरी के अलावा डा. बीना पांडे, डा. ललित तिवारी, डा. पीसी पांडे, डा. एके पंत, डा. विजय कुमार, डा. राकेश शर्मा, डा. मनोज पांडे, डा. रमेश जोशी, डा. अमित जोशी, डा. आशीष तिवारी सहित अन्य प्रतिभागी प्राध्यापक मौजूद रहे। संचालन डा. प्रदीप जोशी ने किया।

नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर में सामने आया कड़वा सच

नाबार्ड ने वार्षिक स्टेट फोकस पेपर में राज्य की स्थिति को लेकर काफी भयावह तथ्य सामने आये हैं। 24 जनवरी 2018 को जारी फोकस पेपर के अनुसार उत्तराखंड के 968 गांव पूरी तरह खाली होकर भूतगांव (घोस्ट विलेज) बन गये हैं, वहीं राज्य गठन के बाद के इन वर्षो में एक लाख हेक्टेयर कृषि भूमि भी बंजर हो गयी है। पर्वतीय क्षेत्र की छोटी जोतों को समय रहते नहीं बचाया गया तो सरकारी प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे। समाधान के तौर पर नाबार्ड ने आने वाले वित्त वर्ष के लिए उत्तराखंड के किसानों को 20301.87 करोड़ ऋण देने की सिफारिश की है।

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राज्य बनने के बाद पलायन पहाड़ से पलायन अपने ही राज्य में तराई-भावर की ओर अधिक हुआ है। राज्य बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं, और यहीं तीन से चार हजार तक विभिन्न पर्वतीय देवी-देवताओं नामों के देवी देवताओं के मंदिर भी बन गये हैं। पलायन के कारणों की पड़ताल करें तो पहाड़ों में 0.68 हेक्टेयर औसत भूमि स्वामित्व है, जो कि बहुत कम है। वहीं कभी कभी 60 फीसद से अधिक ग्रामीण रोजगार देने वाली पहाड़ की खेती जंगली जानवरों के प्रकोप, घर के पुरुषों के पलायन से हल जोतने वाले हाथों के अभाव जैसे कारणों से बंजर हो चुकी है, फलस्वरूप खाली हो चुके गांवों में लेंटाना (कुरी) घास की झाडि़यां और बंजर हो चुके उपजाऊ खेत ही देखने को मिलते हैं। सशस्त्र सुरक्षा बल के आंकड़ों के अनुसार अब लोग खेती के लिए नेपाली मजदूरों को भूमि सौंपने लगे है। 128 नेपाली परिवार दोहरी नागरिकता लेकर पहाड़ी किसान बन चुके हैं। वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 7,69,944 हेक्टेयर कृषि भूमि में से खेती घटकर 2014-15 तक मात्र 7,01,030 हेक्टेयर में सिमट गयी है। ग्रामीण अब कृषि की जगह मनरेगा से रोजगार प्राप्त करते हुए मजदूर बन गये हैं। सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना के अनुसार एक से तीन रूपये की कीमत पर राशन मिल जाने से भी उनमें मेहनत करने की भावना खत्म हो रही है।

जहां सबसे पहले सड़क आयी, वहीं सबसे अधिक पलायन

नैनीताल। संगोष्ठी में श्रमयोग्य पत्र के संपादक अजय कुमार ने दिलचस्प तथ्य पेश करते हुए बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी व अल्मोड़ा जिलों में जनसंख्या 2001 के मुकाबले घटी है, और इन जिलों के नैनीडांडा और सल्ट ब्लॉकों से सर्वाधिक पलायन हुआ है। अब यह संयोग है अथवा कुछ और कि इन्हीं दो ब्लॉकों में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के लिहाज से सबसे पहले सड़क आयीं। यानी सड़कें विकास को गांवों में लाने का माध्यम बनने की जगह ग्रामीणों को पलायन कर शहर ले जाने का माध्यम भी अधिक बनी हैं।

वहीं पलायन कर दूर देश में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों की भूमिका दूर बैठकर ‘नराई’ लगाने या दूर से ही ‘उपदेश’ देने तक ही सीमित हो गयी है। किसी में वहां के ‘सुख’ छोड़कर पहाड़ आने, अपनी म्हणत से दूसरों के बजाय अपना घर सजाने-संवारने का साहस नहीं है…. है क्या ???

पहाड़ के पलायन पर एक कविता (साभार गूगल से)

मैंने देखा है अपने आँगन में
तेरे दादा और परदादा को भी,
तुतलाते,अलमस्त बचपन बिताते,
तख्ती पे घोटा लगाते,कलम बनाते….
मुस्कराते,गुनगुनाते और खिलखिलाते,
जब अ से अनार सीखते थे तेरे बूबू…..
       मैं  तब भी थी , मैं आज भी हूँ,

    मैं बाखली हूँ……..

खेले हैं मैंने होली के रंग ,तेरे पुरखों के संग ,
ना जाने कितनी दिवालियों में सजी हूँ,
सुनी है मैंने वो “काले-कव्वा काले ” की पुकार
जब घूघूते की माला ले के दौड़ते थे तेरे बाज्यू…
           मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ……
गवाह हूँ मैं कितनी डोलियों की याद नहीं,
कितनी बेटियों की विदाई में बहे आंसू मेरे
कितनी बहुवों की द्वारपूजा की साक्षी हूँ….
जब चाँद सी सजके आई थी तेरी ईजा ……
              मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
               मैं बाखली हूँ……….
फिर तेरे नामकरण की वो दावत
कितनी लम्बी पंगतों को जिमाया मैंने….
तेरा बचपन, तेरी शिक्षा,तेरा संघर्ष,
कितना फूला था मेरा सीना ,जब आया तू
पहली बार मेरे आँगन में ठुल सैप बनके
                 मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ…
                  मैं बाखली हूँ……
पर शायद मेरा आँगन छोटा हो गया ,
तेरे सपनो  के लम्बे सफर के लिए…
तुझे पूरा हक है, जीने का नई जिंदगी।
शायद समय की दौड़ में मैं ही पिछड़ गई हूँ…
याद है वो भी जब आखिरी बार कांपते हाथों से 
सांकल चड़ाई थी तूने………………
            मैं तब भी थी,मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ…………..
अब शायद और ना झेल पाऊं वक्त की मार,
अकेलेपन ने हिला दिया है मेरी बुनियादों को….
अब तो दरवाजों पे लगे तालों पे भी जंक आ गया
पर मेरा रिश्ता तेरी बागुड़ी से आज भी वही है।
लेके खड़ी  मीठी यादें,ढेरों आशीर्वाद……
                   मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
                    मैं बाखली हूँ………

पलायन की दुखती रग

पहाड़ दूर से बहुत सुंदर लगते हैं। करीब जाइए तो उनकी हकीकत समझ में आती है। अपनी आंखों के सैलानीपन से बाहर आकर आप देखेंगे तो पाएंगे कि पहाड़ की जिंदगी कितने तरह के इम्तिहान लेती है। यह बदकिस्मती नहीं, विकास की बदनीयती है कि इन दिनों पहाड़ के संकट और बढ़ गए हैं। पहाड़ आज की तारीख में बेदखली, विस्थापन और सन्नाटे का नाम है। घरों पर ताले पड़े हुए हैं, दिलों में उदासी है, थके हुए पांव राहत नाम के किसी बुलावे की उम्मीद में पहाड़ों से उतरते हैं। आज पलायन उत्तराखंड के लिए एक गम्भीर प्रश्न बन गया है। हमें पलायन को रोकने के लिए कारणों का निवारण करना होगा। उच्च शिक्षा की बात करें तो देहरादून के अलावा उंगलियों में गिनने लायक ही अच्छे शिक्षा संस्थान हैं। कृषि योग्य भूमि का कम होना और साथ में परम्परागत अनाज को उसका उचित स्थान न मिलना भी पलायन का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। उत्तराखंड के उन किसानों पर किसी का ध्यान नहीं जाता जो कभी जौ, बाजरा, कोदा, झंगोरा उगाते थे और उस खेती का सही लागत मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने इसे उगाना ही छोड़ दिया। सरकार चाहे तो यहां के परम्परागत अनाज का सही लागत मूल्य जारी कर पलायन रोकने के लिए एक अच्छा कदम उठा सकती है। वर्ष 2011 की जनगणना में कहा गया था कि 2001 में पहाड़ी इलाकों में 53 प्रतिशत लोग थे। लेकिन 2011 में इन पहाड़ी इलाकों मात्र 48 प्रतिशत ही लोग रह गए। एनएसएसओ का 70वां सव्रे बताता है कि उत्तराखंड में कृषि उपज की कीमत राष्ट्रीय औसत से 3.4 गुना कम है। उत्तराखंड में औसत कृषि उपज कीमत 10,752 रुपये प्रति परिवार थी। जबकि कृषि उपज कीमत का राष्ट्रीय औसत 36,696 रुपये। अगर पड़ोसी राज्य हिमाचल की बात की जाए तो खेतिहर परिवार की आय हिमाचल से लगभग आधी है। उत्तराखंड में एक खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 4,701 रुपये थी। जबकि हिमाचल में खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 8,777 रुपये थी। कृषि प्रधान देश होने के नाते कई सीखें विरासत में हमें मिलीं, पर हम उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमारे खेत छोटे हैं, बिखरे पड़े हैं और जहां गांवों में पलायन हो चुका है वहां खेत बंजर और खाली पड़े हैं। पाली हाउस तकनीक से ज्यादा-से-ज्यादा सब्जियां उगाने पर ध्यान दिया जा सकता है। हिमाचल हमारे लिए एक उदाहरण है कि कैसे वहां कृषि को फलों की तरफ मोड़कर समृद्धि हासिल की गई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की 5.1 प्रतिशत आबादी घटी है। पहले कुल जनसंख्या का ज्यादातर अनुपात गांवों में रहता था, लेकिन पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो गए हैं। ग्रामीण आबादी शहरी क्षेत्र की तरफ सिमट रही है। स्वास्य की समस्या से पहाड़ जूझ रहा है। डॉक्टर तो हैं नहीं साथ ही पैरामेडिकल और फाम्रेसी स्टाफ की भी बेहद कमी है। 108 एंबुलेंस हमारे लिए जीवनदायनी जरूर साबित हुई पर पीपीपी मॉडल का यह खेल बहुत से सवाल भी छोड़ता है। तीर्थ स्थल गौरवान्वित महसूस कराते हैं, मगर यह पूरा सिस्टम इतना अव्यवस्थित है कि इससे अच्छा रोजगार नहीं जुटाया जा सका है। युवा पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाती है और वहीं की होकर रह जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 17793 गांवों में से 1053 गांव पूरी तरह से वीरान हो चुके हैं। अन्य 405 गांवों में लगभग 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। 2013 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से गांवों से पलायन का ग्राफ बढ़ गया है। सरकार की योजना जुलाई अंत तक पर्वतीय क्षेत्रों में डक्टरों की तैनाती सुनिचित करने के लिए उत्तराखंड में 2700 डक्टर लाने की है। इसके लिए तमिलनाडु, उड़ीसा व महाराष्ट्र आदि राज्यों से डॉक्टर लेने की तैयारी चल रही है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए 13 नये क्षेत्र खोले जा रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि बहुत ही कम युवा आज की तारीख में गांवों की तरफ रुख कर रहे हैं?
राज्य सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है, जिसके तहत यहां का युवा पहाड़ के विकास के लिए काम करे। आज उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कठिन जिंदगी से मुक्ति की जिंदगी को पलायन का नाम दिया जाता है। यदि इसी प्रकार पलायन बढ़ता गया तो गांवों में इंसान नहीं जानवर देखने को मिलेंगे। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गढ़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन।                                                                ♦♦♦ आशीष रावत

छोटे उद्योग भी नहीं चढ़ पाए पहाड़, 5 पहाड़ी जिलों में सिर्फ 21 उद्योग

  • चंपावत में तो सिर्फ एक ही उद्योग है, जिसमें छह लोग काम करते हैं
  • बहुत छोटी श्रेणी के उद्योग भी हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर व देहरादून तक सिमटे, यही हाल रहा तो पहाड़ से नहीं रुक पाएगा पलायन

उद्योगों में निवेश होने की बातें करते-करते कई साल गुजर गये। बड़े उद्योग तो स्वाभाविक है मैदानी इलाकों में ही निवेश को प्राथमिकता देंगे, लेकिन बड़ी चिंता का विषय यह है कि लघु, मध्यम व छोटे (एमएसएमई) उद्योग भी पहाड़ से मुंह फेर रहे हैं, ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर पहाड़ से पलायन रुके भी तो कैसे। प्रदेश भर में लघु, मध्यम व सूक्ष्म श्रेणी के उद्योगों की संख्या 3268 है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि तीनों श्रेणियों के इन उद्योगों में 1,38,605 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। रोजगार को देखते हुए लगता है कि उद्योगों ने बेरोजगारों की बड़ी फौज को संभाल रखा है, मगर हकीकत यह है कि इन उद्योगों में काम करने वाले इन सवा लाख से अधिक कामगारों को बहुत मामूली वेतन पर काम करना पड़ रहा है।

सूक्ष्म, लघु व मध्यम श्रेणी के इन उद्योगों की स्थिति पर नजर डाली जाए तो यह बात साफ हो जाती है कि प्रदेश की सभी सरकारें इन छोटे-छोटे उद्योगों को भी पहाड़ की पगडंडियां नहीं चढ़ा पायी। जिसका नतीजा यह हुआ कि पर्वतीय क्षेत्र के बड़ी संख्या में बेरोजगार मैदान क्षेत्र में स्थापित इन उद्योगों में 12-12 घंटे काम करके अपना गुजर बसर कर रहे हैं। उद्योगों के ये आंकड़े गुजरे वित्त वर्ष के हैं, इन्हें सरकार की ओर से भराड़ीसैंण विधानसभा में सवालों के जवाब में सामने रखा। ये ऐसे उद्योग हैं, जिनमें पांच से लेकर 20-25 तक लोग काम करते हैं। इस श्रेणी के कुल 3268 उद्योगों में से हरिद्वार में सबसे अधिक 1383 उद्योग हैं, जबकि दूसरे नंबर पर ऊधमसिंहनगर है, यहां 923 और देहरादून में 618 उद्योग हैं, जिनमें 16,123 बेरोजगार नौकरी कर रहे हैं। उसके बाद पौड़ी है, यहां 140 उद्योगों में 3422 रोजगार हैं चौथे नंबर पर नैनीताल है, यहां भी ज्यादातर उद्योग मैदानी भूभाग में स्थित हैं। नैनीताल में 78 उद्योग हैं, जिनमें 1688 उद्योग हैं। शेष पर्वतीय जिलों की स्थिति उद्योगों के मामले में बहुत पतली है। ऐसे में सहज ही समझा जा सकता है कि मैदानी क्षेत्र में स्थित उद्योगों में रोजगार के नाम पर पर्वतीय क्षेत्र के बेरोजगार भी बड़ी संख्या में मैदानी इलाकों में समय काट रहे हैं। इसका सीधा असर पहाड़ की खेती-बाड़ी पर पड़ रहा है। इन छोटे उद्योगों को भी यदि पहाड़ नहीं चढ़ा पाये तो भविष्य में पलायन की स्थिति कितनी भयावह होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। (अर्जुन बिष्ट)

उत्तराखंड में हैं इतने पंजीकृत बेरोजगार

सूचना के अधिकार के माध्यम से श्रम एव रोज़गार मंत्रालय से अप्रैल 2018 में मिली जानकारी के अनुसार उत्तराखंड के सेवायोजन कार्यालयों में अभी तक 5,31,174 पुरुष और 3,38,588 महिलाओं यानी  कुल 8,69,762 बेरोज़गारों ने पंजीकरण कराया है । इनमें स्नातक पुरुषों की संख्या 1,08,248 व महिला की संख्या 1,11, 521 तथा  स्नातकोत्तर पुरुषों की संख्या 41628 व स्नातकोत्तर महिलाओं की संख्या 61054 है ।जबकि  इनके अलावा कई ऐसे बेरोज़गार भी होंगे  जिन्होंने पंजीकरण नहीं कराया होगा ।

तीन करोड़ प्रवासी उत्तराखंडियों की ‘घर वापसी’ कराएगा आरएसएस !

-प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विदेशों में बसे भारतवंशियों से किए जा रहे आह्वान की तर्ज पर उत्तराखंडियों से किया जाएगा वर्ष में एक सप्ताह अपने गांव आने का आह्वान करते हुए शुरू की ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना
-संघ ने इस कार्य हेतु 670 गांवों में तैनात कर दिए हैं संयोजक
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य की वर्ष 2011 में हुई जनगणना में आबादी एक करोड़ एक लाख 16 हजार 752 है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि इससे तीन गुना उत्तराखंडी पलायन कर चुके हैं। इनमें से 30-35 लाख उत्तराखंडी प्रवासी तो अकेले दिल्ली में ही हैं, जबकि अमेरिका, जापान, यूएई सहित दुनिया भर में फैले हुए हैं। जापान जैसे छोटे देश में भी संघ के अनुसार करीब 35 हजार उत्तराखंडी रहते हैं। संघ अब इन लोगों को वर्ष में कम से कम एक बार सप्ताह भर के लिए अपने मूल गांव वापस लाने का खाका बुन रहा है। इस हेतु संघ ने ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना शुरू की है। योजना के तहत प्रदेश की 670 न्याय पंचायतों में संयोजक तैनात कर दिए हैं, जिन्हें प्रवासियों को गाँव लौटाने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रचारक डा. हरीश कहते हैं कि पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है। इसकी वजह से इस सीमांत राज्य के गांव के गांव खाली हो रहे हैं। इससे देश की सीमाएं भी खाली और सामरिक दृष्टिकोण से कमजोर होती जा रही हैं। पहाड़ को पलायन के अभिशाप से मुक्त कराने के लिए यह पहल की जा रही है। गत दिनों दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना की शुरुआत की है। खास बात यह भी है डा। हरीश ही इस योजना के योजनाकार हैं, और उत्तराखंड से हैं, लिहाजा उत्तराखंड पर इस योजना का सबसे ज्यादा फोकस है। योजना के तहत उत्तराखंड के तीन करोड़ प्रवासियों को पीएम मोदी के भारतवंशियों से अपने विदेश दौरों में किए जा रहे आह्वान की तरह एक सप्ताह के लिए अपने घर आने का आह्वान किया जाएगा। प्रवासी घर आएंगे तो अपने गांव, घर, क्षेत्र को कुछ तो देकर जाएंगे। इससे एक ओर उनके गांवों में पसरा सन्नाटा टूटेगा, और इस पहल के तहत यदि पांच हजार प्रवासी भी गांवों में आए तो उनकी आवाजाही से 10 से 15 करोड़ रुपये की आर्थिकी विकसित होगी। साथ ही वह यहां से कोंदो, झंगोरा, गहत, राजमा, काला भट्ट, मसूर सरीखी पहाड़ी दालों जैसी गांव की वनस्पतियों, दाल, फल, सब्जियों को वापस ले जाएंगे। इन स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ेगी तो लोग उसका और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित होंगे, और स्थानीय लोगों का भी गांवों के प्रति लगाव बढ़ेगा।

विकट है उत्तराखंड में पलायन की स्थिति

नैनीताल। वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार पिछले एक दशक में 78 गांव गैर-आबाद हो चुके हैं, और यह संख्या 1143 तक पहुंच गई है। वहीं इस दौरान राज्य के दो जनपदों, अल्मोड़ा की आबादी 1.73 फीसद और पौड़ी की 1.51 फीसद बढ़ने के बजाए घट गई है, जबकि अन्य पहाड़ी जिलों चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर की आबादी भी पांच फीसद से भी कम की रफ्तार से बढ़ी है, वहीं इसके उल्टे राज्य के मैदानी जिलों, ऊधम सिंह नगर की आबादी 33.40, हरिद्वार 33.16 की, देहरादून की 32 और नैनीताल की आबादी 25 फीसद की रफ्तार से बढ़ी है। जबकि प्रदेश की आबादी के बढ़ने की औसत दशकीय दर 16 और देश की 17 फीसद है। वहीं योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार करीब 9 .3 फीसद की विकास दर वाले राज्य में पहाड़ के करीब 32.8 9 लाख ग्रामीण 17 रुपए से कम में दिन का गुजारा करने को मजबूर हैं। वहीं स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो मैदान में आपातकाल में रोगी के डॉक्टर तक पहुंचने के 20 मिनट के औसत समय के मुकाबले पहाड़ पर यह समय 4 घंटा 48 मिनट है। वहीं राज्य के करीब 16 हजार गांवों में 45 हजार से अधिक स्वयं सेवी संस्थाएं कहने भर को कार्य कर रहे हैं।

पलायन : वर्ष 2017 में 7,000 भारतीय करोड़पति हो गए विदेशों में शिफ्ट
नयी दिल्ली, 04 फरवरी (एएनएस)। देश से बाहर जाने वाले करोड़पतियों की संख्या में 2017 में 16% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान 7,000 ऊंची नेटवर्थ वाले भारतीयों ने अपना स्थायी निवास (डोमिसाइल) बदल लिया। यह चीन के बाद विदेश चले जाने वाले करोड़पतियों की दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रपट के अनुसार 2017 में 7,000 करोड़पतियों ने अपना स्थायी निवास किसी और देश को बना लिया। वर्ष 2016 में यह संख्या 6,000 और 2015 में 4,000 थी। वैश्विक स्तर पर 2017 में 10,000 चीनी करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला था। अन्य देशों के अमीरों का अपने देश से दूसरे देश में बस जाने की संख्या में तुर्की के 6,000, ब्रिटेन के 4,000, फ्रांस के 4,000 और रुस के 3,000 करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला है। स्थायी निवास बदलने के रुख के मुताबिक भारत के करोड़पति अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड गए हैं जबकि चीनी करोड़पतियों का रुख अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की ओर है।

पहाड़ के नेता भी मैदानों को कर गये ‘पलायन’

-मौजूदा विस चुनाव में ‘रणछोड़’ नेताओं में सीएम हरीश रावत, किशोर उपाध्याय  और मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत प्रमुख रूप से शामिल -कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, हरक, अमृता भी कर चुके हैं अपनी पर्वतीय सीटों से मैदानों की ओर पलायन -एक दौर में यूपी के सीएम चंद्रभान गुप्ता ने पहाड़ की रानीखेत विधानसभा से लड़ा था चुनाव -अब जनता पर कि ‘रणछोड़” नेताओं को सबक सिखाती है कि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल उच्च न्यायालय में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में 12 नवंबर 2014 को अधिवक्ताओं के बीच पलायन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए कहा था, ‘तो क्या पहाड़ पर बुल्डोजर चला दूं। प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ पर तैनाती के आदेशों पर ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं, मानो किसी ने उनके मुंह में नींबू डाल दिया हो…” उनका तात्पर्य पहाड़ों पर बुल्डोजर चलाकर उन्हें मैदान कर देने से था, ताकि पहाड़-मैदान में असुविधाओं का भेद मिट जाये। लेकिन इस वक्तव्य के करीब सवा दो वर्ष बाद ही उनकी अगुवाई में ही जब उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो स्वयं रावत ही अपनी धारचूला सीट छोड़कर दो-दो मैदानी सीटों-किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण सीटों पर पलायन कर गये हैं। यही नहीं उनकी पार्टी के प्रमुख किशोर उपाध्याय भी अपनी, दो बार 2002 व 2007 में विजय दिलाने वाली पहाड़ की परंपरागत टिहरी सीट छोड़कर सहसपुर उतरते हुए पहाड़ों के ‘रणछोड़’ साबित हुये हैं। साथ ही मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत भी अपनी परंपरागत साल्ट सीट छोड़कर रामनगर उतर आये हैं। जबकि एक दौर में पूर्ववर्ती राज्य यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता (1967 में) पहाड़ की रानीखेत सीट से चुनाव लड़े और जीते थे, और अकबर अहमद डम्पी जैसी मैदानी नेता भी राज्य बनने से पूर्व पहाड़ से चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं करते थे। जबकि अपने गोविन्द बल्लभ पन्त बरेली,  हेमवती नन्दन बहुगुणा बारा और नारायण दत्त तिवारी काशीपुर की मैदानी सीटों से चुनाव लड़ते रहे।

गौरतलब है कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में जनाक्रोश भड़कने और लोगों के आंदोलित होने में पलायन की गंभीर समस्या सर्वप्रमुख थी। लेकिन पलायन का मुद्दा राज्य बनने के बाद पहली बार 2001 में हुई जनगणना में ही पहाड़ की जनसंख्या के बड़े पैमाने पर मैदानों की ओर पलायन करने से हाशिये पर आना शुरू गया। यहां तक कि राज्य में 2002 के बाद पांच वर्ष के भीतर ही 2007 में दूसरी बार विस सीटों का परिसीमन न केवल बिना किसी खास विरोध के हो गया, वरन नेता मौका देख कर स्वयं ही नीचे मैदानों की ओर सीटें तलाशने लगे। 2007 के नये परिसीमन के तहत पहाड़ों का पिछड़ेपन, भौगोलिक व सामाजिक स्थिति की वजह से मिली छूटें छीन ली गयीं, और पहाड़ की छह विस सीटें घटाकर मैदान की बढ़ा दी गयीं। पहली बार नये परिसीमन पर हुए 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (अब भाजपा) नेता डा. हरक सिंह रावत व अमृता रावत सहित कई नेता पहाड़ छोड़कर मैदानी सीटों पर ‘भाग’ आये।

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इस सूची में यशपाल आर्य भी शामिल हो मुक्तेश्वर छोड़ बाजपुर आ गये, अलबत्ता इस बार पुत्र संजीव आर्य को नैनीताल भेजकर उन्होंने एक तरह से पहाड़ के प्रति कुछ हद तक सम्मान का परिचय दिया है। अमृता के पति सतपाल महाराज भी कुछ इसी तरह पहाड चढ़ गये हैं। इस बीच भाजपा नेता प्रकाश पंत भी पिथौरागढ़ के साथ मैदान पर उतरे तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा से भिड़ने के नाम पर सितारगंज उतर आये थे, और आगे लालकुआ में भी करीब दो वर्ष ‘राजनीतिक जमीन’ तलाशने में नाकामी के बाद वापस पिथौरागढ़ लौटने को मजबूर हुए हैं, जबकि बहुगुणा ने बेटे सौरभ के साथ सितारगंज में ही जड़े गहरी करने की ठानी है। बहरहाल, अब जनता को तय करना है कि वे अपने पहाड़ के इन ‘रणछोड़’ नेताओं का क्या भविश्य तय करती है। याकि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है।

बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे पहाड़ की उपेक्षा करने में

नैनीताल। पहाड़ की उपेक्षा करने में पहाड़ के बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे। यहां तक कहा जाता है कि पहाड़ के कई बड़े नेता अलग पर्वतीय राज्य का इसलिये विरोध करते थे कि इससे कहीं उनकी पहचान भी छोटे राज्य की तरह सिमट न जाये। वहीं लोक सभा चुनावों में भी कांग्रेस के बड़े हरीश रावत से लेकर दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अपनी परंपरागत सीट छोड़कर हरिद्वार तो भाजपा के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत को नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट पर उतरने से कोई गुरेज नहीं रहा। वहीं एक अन्य पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी पहाड़ के होते हुए भी कमोबेश हमेशा ही मैदानी सीटों से चुनाव लड़े। कुछ इसी तरह पर्वत पुत्र कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को भी पहाड़ की बजाय मैदानी सीटें ही अधिक रास आर्इं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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