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नैनीताल: भाजपा-कांग्रेस से ‘भगत-सिंह’ को टिकट मिलना तय !

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नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 9 फरवरी 2019। तय खाकों में सिमट चुकी राजनीति में, जबकि अभी लोक सभा चुनाव की रणभेरी बजी भी नहीं है, और केवल कयास ही लगाये जा सकते हैं, बावजूद आम जनता में यह बात दावे के साथ कही जा रही है कि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोक सभा सीट से भाजपा व कांग्रेस से ‘भगत-सिंह’ को टिकट मिलना तय है। कारण, प्रत्याशी की गुण-क्षमताओं से इतर टिकट मिलने का एकमात्र. मानक जीत का हो जाना है, और जीत के लिए जातिगत समीकरण बैठाना राजनीतिक शगल बन गया है। उल्लेखनीय है कि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोक सभा सीट के साथ यह बड़ा संयोग भी जुड़ा है कि एक-दो मौकों को छोड़कर जिस पार्टी का प्रत्याशी इस सीट से जीतता है, उसी पार्टी की देश में भी सरकार बनती है।
जब हम भाजपा व कांग्रेस दोनों से ‘भगत-सिंह’ को टिकट मिलने की बात कर रहे हैं तो कई लोग चौंक सकते हैं। भाजपा से तो मौजूदा सांसद भगत सिंह कोश्यारी को टिकट मिलने की बात कही जा सकती है, पर कांग्रेस से कैसे ? जबकि जाहिर तौर पर स्थिति यह भी है कि कोश्यारी कई सार्वजनिक मंचों पर चुनाव ही न लड़ने की बात कह चुके हैं। साथ ही उनकी 75 पार की उम्र भी उनकी पार्टी भाजपा के पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान तय मानकों के अनुसार चुनाव लड़ने की नहीं वरन ‘मार्गदर्शक मंडल’ अथवा ‘राजनीतिक पुर्नवास’ पर जाने की हो चुकी है।
सबसे पहले भाजपा की बात करते हैं। भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व के पिछले लोक सभा चुनाव के दौर में अपनाये गये आयु संबंधी अघोषित प्रतिबंध को देखकर नैनीताल के मौजूदा सांसद कोश्यारी कई बार सार्वजनिक तौर पर चुनाव लड़ने से मना कर चुके हैं, किंतु ऐसा नहीं है कि यह उनके भीतर की आवाज हो। ऐसा कुछ हालिया घटनाओं से जाहिर हो जाता है। बीते कुछ समय से कुछ शारीरिक समस्याओं के बावजूद उनकी क्षेत्र में दौड़ बढ़ गयी है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि पूरे पांच वर्ष नजर न आये कोश्यारी अब दिखने लगे हैं। बीते कुछ दिनों में ही वह नैनीताल से लेकर बेतालघाट और ओखलकांडा तक के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों का चक्कर लगा आये हैं। दूसरी ओर उन्होंने अपने ऐसे कुछ सिपहसालार भी मैदान में आगे कर दिये हैं, जिनका कहना है कि यदि कोश्यारी चुनाव न लड़े तो वे दावेदार हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस तरह कोश्यारी स्वयं को ‘जरूरी’ बताने का दांव चल रहे हैं, और वे इस कोशिश में काफी हद तक सफल भी रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में किसी अन्य भाजपा नेता के द्वारा स्वयं को नैनीताल लोकसभा के लिये तैयार न कर पाना और उनका पिछले लोक सभा चुनाव में राज्य में सर्वाधिक 2.84 लाख से भी अधिक सीटों से चुनाव जीतना भी उन्हें टिकट मिलने की संभावना को सबसे ऊपर रखने वाला रहा है। लेकिन यह भी सही है कि कोश्यारी के पास जनता को अपनी पांच वर्ष की उपलब्धियां बताने के लिए कुछ भी खास नहीं है। ना ही वे पांच वर्षों में जमरानी बांध बना पाये हैं, ना नैनीताल मुख्यालय को एक अदद पार्किंग दिला पाये हैं, ना ही उनके कार्यकाल में हल्द्वानी में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम और अन्य स्टेडियम आकार ले पाये हैं, और आईएसबीटी तो अपने तय स्थान से ही गायब हो गया है। यहां तक कि अपने गोद लिये गांव को ‘आदर्श गांव’ बनाने का दावा करने की स्थिति में भी वे नहीं हैं। ऐसे में यह भी साफ है कि अगर वे फिर से दावेदार होंगे तो उन्हें खुद से अधिक ‘मोदी’ नाम का ही सहारा लेना होगा।
ऐसे में भाजपा से ‘कोश्यारी नहीं तो मैं’ कहने वाले दावेदारों से इतर जो एक अन्य दावेदार उभर कर आते और क्षेत्र की दौड़ लगाते दिख रहे हैं, वे हैं यूपी व उत्तराखंड सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे बंशीधर भगत। भगत सिंह कोश्यारी के नाम से अपने जाति नाम की साम्यता वाले बंशीधर नैनीताल लोकसभा के लिए कोश्यारी की तरह बाहरी भी नहीं हैं। किसी दौर में आज के नैनीताल जनपद के बड़े हिस्से को समाने वाली नैनीताल विधानसभा के भी विधायक रहे बंशी तभी से घर-घर से जुड़ाव भी रखते हैं। कहा जाता है बंशी दूरस्थ गांवो तक हर जन्म के बाद होने वाले नामकरण के साथ ही पशुओं की नयी संतति पर होने वाली बौधांण पूजा में भी शामिल होने पहुंचते रहे हैं। यूपी के दौर से मंत्री रहने के बावजूद मौजूदा उत्तराखंड सरकार में किसी कारण मंत्री न बन पाये बंशीधर को इधर हाल में हल्द्वानी नगर निगम एवं हल्द्वानी विकास खंड में कांग्रेस की कद्दावर मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश को सीधी मात देने का भी श्रेय दिया जा रहा है। हालिया कार्यक्रमों में प्रदेश के मुख्यमंत्री भी इन कारणों से उनकी क्षमता के कायल दिखे हैं। ऐसे में कोश्यारी को टिकट न मिलने की स्थिति में बंशीधर भाजपा की दूसरी पसंद या ‘छुपे रुस्तम’ हो सकते हैं।

अब बात कांग्रेस पार्टी की। कांग्रेस पार्टी पूरे प्रदेश के साथ ही नैनीताल लोकसभा में भी साफ तौर पर दो ध्रुव़ों में बंटी हुई नजर आती है। इन दो ध्रुवों की रहनुमाई पूर्व मुख्यमंत्री हरीश चंद्र सिंह रावत यानी हरीश रावत और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश करते हैं। इन दोनों धु्रवों में पूर्व में खुद का अधिक बड़ा जनाधार दिखाने की होड़ दिखती थी किंतु पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से यह होड़ खुद की हार को छोटा दिखाने में सीमित हो गयी है। विधानसभा चुनावों में हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते दो चुनाव लड़े और नैनीताल विधानसभा के अंतर्गत आने वाली किच्छा सहित दोनों हार गये, जबकि इंदिरा अपनी सीट बचाने में सफल रही। ऐसे में इंदिरा को हरीश पर हमलावर होने का मौका मिल गया। उन्हें प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की बुरी हार के बावजूद नेता प्रतिपक्ष के रूप में कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिल गया।

28 जून को अजय भट्ट के हाथ थामे डा. इंदिरा हृदयेश.

लेकिन इधर हाल में प्रदेश में हुए निकाय चुनाव में इंदिरा भी हरीश की अपनी पत्नी को टिकट दिलाने व पुत्र-पुत्री को अपनी राजनीतिक विरासत सोंपने की कोशिश करने की गलती दोहराते हुए ‘अंधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने दे..’ की तर्ज पर अपने पुत्र सौरभ को हल्द्वानी के महापौर पर टिकट क्या दे बैठीं, पूरा प्रदेश छोड़ पुत्र की जीत के लिए हर हथकंडा अपनाने के बावजूद हार मिलने से हारे हुए हरीश के स्तर पर ही पहुंच गयीं। इससे उनका नैनीताल लोक सभा से चुनाव लड़ने का दावा भी ठंडा पड़ गया। उधर हरीश भी जाहिर तौर पर अपनी दावेदारी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, किंतु हरिद्वार के साथ नैनीताल सीट से चुनाव लड़ने की उनकी आतुरता किसी से छिपी नहीं है। राजनीतिक तौर पर गांधी परिवार से संजय गांधी के दौर से करीबी रखने वाले रावत के लिए अपनी मनचाही सीट से टिकट लाना अधिक कठिन नहीं होगा। ऐसे में वे स्वयंभू तरीके से कांग्रेस से सबसे सशक्त उम्मीदवार बताये जा रहे हैं।

नये वर्ष पर लगी डा. पाल की होर्डिंग।

वहीं राजपरिवार से आने वाले इस लोकसभा के दो बार के पूर्व सांसद एवं 2014 में कोश्यारी से हारे केसी सिंह बाबा किसी राजपरिवार के व्यक्ति को ही अपनी राजनीतिक विरासत सोंपने के हामी हैं। ऐसे में उन्होंने जनता दल व कांग्रेस से एक-एक बार सांसद रहे डा. महेंद्र सिंह पाल का नाम टिकट के लिए आगे कर दिया है। वहीं सूत्रों की मानें तो पाल के नाम पर डा. इंदिरा हृदयेश ने भी पूर्व के मतभेदों को भुलाकर अपनी सहमति दे दी है, क्योंकि वे हरीश रावत को किसी कीमत पर यहां नहीं आने देना चाहती हैं। ऐसे में साफ है कि नैनीताल सीट से भाजपा किसी ‘भगत’ (भगत सिंह कोश्यारी अथवा बंशीधर भगत) तथा कांग्रेस किसी ‘सिंह’ (हरीश चंद्र सिंह रावत अथवा डा. महेंद्र सिंह पाल) को ही टिकट दे सकते हैं। वहीं दोनों पार्टियों से किसी ‘सिंह’ यानी श्रत्रिय को ही टिकट दिये जाने के पीछे विधानसभा में श्रत्रियों की सबसे बड़ी संख्या होने का कारण भी मूल में है।

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-योगी का 9 को हल्द्वानी आगमन स्थगित, 14 को रुद्रपुर आयेंगे मोदी 

नवीन समाचार, रुद्रपुर 7 फरवरी 2019। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व आरएसएस के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 फरवरी को उत्तराखंड के रुद्रपुर पहुँच रहे हैं। इस दौरान वे सहकारिता विभाग की 3400 करोड़ रुपयों की योजना का शुभारंभ करेंगे, जो बेरोजगारों के लिए बड़ी सौगात होगी। 

वहीँ इस कारण यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हल्द्वानी में 9 फरवरी को प्रस्तावित त्रिशक्ति सम्मेलन स्थगित कर दिया गया है। सम्मेलन के लिए एमबी इंटर कॉलेज में मंच लगभग तैयार कर दिया गया था, कहा जा रहा है कि चूंकि रुद्रपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 14 फरवरी को सभा हैं, इस कारण पार्टी के लोग रुद्रपुर की सभा की तैयारी करेंगे। प्रधानमंत्री की सभा के बाद त्रिशक्ति सम्मेलन के लिए आगे की तिथि निर्धारित की जाएगी। 

उधर प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता भी अपने स्तर से जुट गए हैं।

रुद्रपुर के विधायक राजकुमार ठुकराल ठुकराल ने वर्ष 2014 की विधानसभा चुनाव से पूर्व प्रधानमंत्री मोदी की रूद्रपुर में हुई जनसभा का जिक्र करते हुए बताया कि जिस तरह तब मोदी की रुद्रपुर की जनसभा ने भाजपा को पूरे कुमाऊं मंडल एवं प्रदेश में एकतरफा जीत दिलाई थी। इसी तरह लोकसभा चुनाव से पहले मोदी का आगमन भी भाजपा के लिए वैसे ही यानी 5 में से 5 सीटें दिलाने वाला और कांग्रेस के लिए वाटर लू साबित होगा । रुद्रपुर में प्रधानमंत्री मोदी की जनसभा ऐतिहासिक होगी।

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पत्रकार वार्ता करते डा. महेंद्र पाल।

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 फरवरी 2019। कांग्रेस पार्टी से नैनीताल लोक सभा से चुनाव लड़ने के लिये आवेदन कर चुके पूर्व जनता दल व कांग्रेस सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डा. महेंद्र पाल ने अपनी दावेदारी के साथ बरसों बाद पत्रकार वार्ता करते हुए कहा कि 2004 में सर्वाधिक मतों से जीतने के बाद भी उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं मिला। इस बार चुनाव के लिए पूरी तैयारी है। उन्होंने केंद्र सरकार के अंतरिम बजट को कांग्रेस व राहुल गांधी की पहलों का प्रभाव बताया तथा राज्य व केंद्र सरकार पर अपने घोषणा पत्र पर फेल होने का आरोप लगाया। कहा कि भाजपा के राज्य में पांचों सांसद और 57 सांसद हैं। इसलिये आगामी चुनावों में कांग्रेस के पास खोने को कुछ भी नहीं है, और अब खोने की बारी भाजपा की है व कांग्रेस के लिये चढ़ने का समय है।

पूछा-उत्तराखंड भाजपा को इतना ही प्यारा है तो उपेक्षा क्यों ?

पाल ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बयान पर तंज कसते हुए पूछा कि यह भाजपा व मोदी को बकौल शाह उत्तराखंड इतना ही प्यारा है तो उत्तराखंड की डबल इंजन में भी क्यों उपेक्षा हो रही है। देश में अभी हाल में 13 केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा हुई है, लेकिन राज्य के कुमाऊं मंडल में एक केंद्रीय विवि की स्थापना क्यों नहीं की जा रही है। उन्होंने राज्य सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ पर भी तंज कसा और कहा कि खुद की जांच एजेंसियों से जांच कराकर जीरो भ्रष्टाचार बताने की कोई तुक नहीं है। एनएच-74 घोटाले में करीब तीन दर्जन किसानों पर चार्जशीट दाखिल होने व समाज कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति में 500 करोड़ रुपये का घोटाला बताते पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने इन दोनों के साथ ही सिडकुल घोटाले में सरकार को सीबीआई जांच कराने को कहा। पत्रकार वार्ता में पूर्व दायित्वधारी रईश भाई, जेके शर्मा, मनमोहन कनवाल, सूरप पांडे व गोपाल बिष्ट सहित कई कांग्रेस कार्यकर्ता भी मौजूद रहे।

लोग कह रहे लोक पाल नहीं ला सकते तो महेंद्र पाल को लाओ…

नैनीताल। डा. महेंद्र पाल ने प्रदेश में लोकपाल के लागू न होने पर भाजपा सरकार के साथ ही कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार को भी घेरा। कहा कि खंडूड़ी सरकार द्वारा लाये गये लोकपाल की अन्ना हजारे ने भी तारीफ की थी किंतु इसे न ही भाजपा न पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने लागू किया। यह लागू होता, तभी भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड की कल्पना की जा सकती थी। कहा कि इन स्थितियों पर लोग कहने लगे हैं, लोकपाल नहीं ला सकते तो महेंद्र पाल को लाओ।
पत्रकार वार्ता करते डा. महेंद्र पाल।

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8 जुलाई 2018 को अपने हाथों से त्रिवेन्द्र रावत को आम खिलाते हरीश रावत.

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 जनवरी, 2019। उत्तराखंड में भाजपा-कांग्रेस नेता लोक सभा चुनाव का बिगुल बजाने पर आतुर नजर आ रहे हैं। इस कोशिश में अपनी ओर हाईकमान का ध्यान आकृष्ट करने के लिए कुछ खुलकर अपनी दावेदारी जाहिर कर रहे हैं तो अन्य अन्यान्य तरीके आजमा रहे हैं। इसी कड़ी में एक पूर्व सीएम हरीश रावत द्वारा पार्टी में अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए ईजाद किया ‘पार्टियां’ करने का तरीका लगता है उनके पूर्व से ही प्रतिद्धंद्वी रहे एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री को भा गया लगता है।
पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व वरिष्ठ कांग्रेस व अब भाजपा नेता विजय बहुगुणा ने कहने को नगर निकाय के नव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए ‘डिनर पार्टी’ रखी, लेकिन इस पार्टी के समय को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर आरंभ हो गया है। माना जा रहा है कि बहुगुणा लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। उल्लेखनीय है कि बहुगुणा मार्च 2016 में कांग्रेस में हुई टूट के सूत्रधार रहे हैं। उनके ही नेतृत्व में तब नौ विधायकों ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा था। हालांकि बाद में दो और विधायक रेखा आर्य और यशपाल आर्य भी भाजपा से जुड़े। भाजपा ने इन सभी को पूरा सम्मान दिया। अधिकांश ने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन विजय बहुगुणा और पूर्व मंत्री अमृता रावत चुनावी दावेदारी से दूर रहे। विजय बहुगुणा की जगह उनके पुत्र सौरभ बहुगुणा और अमृता की जगह उनके पति सतपाल महाराज चुनाव लड़े और विधायक चुन लिए गए। बहुगुणा के विधानसभा चुनाव न लड़ने पर माना गया कि वह राज्यसभा या लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन पिछले साल राज्य की एक राज्यसभा सीट के लिए हुए चुनाव में बहुगुणा को मौका नहीं मिला। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विजय बहुगुणा पिछले दो साल के दौरान सूबे की सियासत में बहुत ज्यादा सक्रिय भी नहीं दिखे। अब लोकसभा चुनाव नजदीक हैं, तो अचानक बहुगुणा ने राजधानी देहरादून में रात्रिभोज का आयोजन करने का फैसला किया। इसके निमंत्रण पत्र बंटते ही चर्चाओं का दौर भी शुरू हो गया। दरअसल, भाजपा में पौने तीन साल पहले ही शामिल होने के बावजूद मौजूदा समय में विजय बहुगुणा खेमे के विधायकों की संख्या भाजपा में ठीकठाक है। यानी, भाजपा में नए होने के बावजूद उनकी कद्दावर सियासी शख्सियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सियासी हलकों में माना जा रहा है कि बहुगुणा की अचानक सक्रियता का कारण आगामी लोकसभा चुनाव ही हैं। हालांकि उन्होंने अभी स्वयं लोकसभा चुनाव लड़ने का दावा तो नहीं पेश किया है, लेकिन अगर बहुगुणा अपनी दावेदारी पेश करें तो भाजपा को उन्हें दरकिनार करना मुश्किल होगा। वैसे भी बहुगुणा टिहरी संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व पूर्व में कर चुके हैं। अलबत्ता बहुगुणा के करीबी माने जाने वाले राज्य के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि बहुगुणा हर साल ही नववर्ष के मौके पर दावत देते हैं। इस बार निकायों के नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ ही अन्य लोगों को उन्होंने आमंत्रित किया है। लिहाजा इस दावत को लेकर सियासी निहितार्थ नहीं निकाले जाने चाहिए।

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नैनीताल में मोदी को माता नंदा-सुनंदा के चित्र युक्त प्रतीक चिन्ह भेंट करते बची सिंह रावत, बलराज पासी व अन्य स्थानीय नेता। 

नवीन समाचार, देहरादून, 14 जनवरी 2019। उत्तराखंड में सत्तारूढ़ लोकसभा की चुनाव की तैयारियों को गति प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उत्तराखंड पर खास फोकस करने जा रहे हैं। शाह उत्तराखंड में भाजपा के चुनाव अभियान का शंखनाद आगामी दो फरवरी को भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह देहरादून में आयोजित होने जा रहे त्रिशक्ति सम्मेलन को संबोधित करके करेंगे। वहीं प्रधानमंत्री मोदी मार्च माह से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। मोदी के प्रशंसकों के लिए अच्छी खबर यह भी है कि उन्हें मोदी को देखने व सुनने के लिए अधिक दूर नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि वे प्रदेश के हर जिले में आकर चुनावी सभा करेंगे।
यूपी में हुए सपा-बसपा के चुनावी गठबंधन के बाद भाजपा की कोशिश उन राज्यों पर फोकस करने की है, जहां भाजपा सत्ता में है, और मजबूत है, अथवा जहां उसका प्रदर्शन 2014 के लोक सभा चुनावों में अच्छा नहीं रहा, परंतु इस बीच वहां उसने अपनी ताकत बढ़ा ली है। भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों सीटों पर फिर से परचम फहराने के लिए भाजपा कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। इन्हें बरकरार रखने पर पार्टी ने ध्यान केंद्रित किया हुआ है। चुनाव के मद्देनजर पार्टी ने मार्च तक के कार्यक्रम पहले ही तय कर दिए हैं। दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति से भाग लेकर लौटे प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे के बाद मार्च में प्रधानमंत्री यहां आने की संभावना जताई है, जबकि काबीना मंत्री प्रकाश पंत ने हर जनपद में मोदी के आने की बात कही है।

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नये वर्ष पर लगी डा. पाल की होर्डिंग।

-अब पूर्व सांसद़ डा. महेंद्र पाल ने मुख्यालय में लगाये शुभकामना संदेशों के होर्डिंग
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जनवरी 2019। नव वर्ष, लोहड़ी, गणतंत्र दिवस व मकर संक्रांति की शुभकामनाओं के बहाने मुख्यालय में कांग्रेस के एक और दावेदार की होर्डिंग के जरिये इंट्री हो गयी है। नगर के साथ ही निकटवर्ती भवाली-भीमताल आदि में भी पूर्व सांसद डा. महेंद पाल ने बड़ी होर्डिंग लगाकर क्षेत्रवासियों को बधाइयां दी हैं। इसे भी साफ तौर पर उनकी दावेदारी से जोड़ा जा रहा है। पाल ने अपनी होर्डिंग में राहुल गांधी की खुद के बराबर ही फोटो लगाई है, साथ ही केंद्र से लेकर राज्य के बड़े कांग्रेसी नेताओं को भी अपनी होर्डिंग में जगह दी है। माना जा रहा है कि आने वाले समय पर कांग्रेस में होर्डिंग व दावेदारी-वार और अधिक तेज हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि दो दिन पूर्व जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रुद्रपुर में वहां के पूर्व विधायक व मंत्री रहे तिलक राज बेहड़ के साथ सने हुए नींबू एवं गुड़ की चाय की पार्टी दे रहे थे, उसी दिन राज्य के राजघरानों से आने वाले दो पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा और डा. महेंद्र पाल की मुलाकात भी हुई थी, और बाबा ने स्वयं की उम्र अधिक होने का हवाला देते हुए पाल का नाम सांसद पद के लिए आगे किया था। उल्लेखनीय है कि रावत एवं बेहड़ पहले ही अपनी दावेदारी जता चुके हैं, ऐसे में इसी दिन बाबा व पाल की जुगलबंदी को इसके काउंटर के रूप में देखा जा सकता है। गौरतलब है कि नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले प्रकाश जोशी भी सांसद पद के लिए दावेदारी कर चुके हैं।

-अब पूर्व सांसद़ डा. महेंद्र पाल ने मुख्यालय में लगाये शुभकामना संदेशों के होर्डिंग
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जनवरी 2019। नव वर्ष, लोहड़ी, गणतंत्र दिवस व मकर संक्रांति की शुभकामनाओं के बहाने मुख्यालय में कांग्रेस के एक और दावेदार की होर्डिंग के जरिये इंट्री हो गयी है। नगर के साथ ही निकटवर्ती भवाली-भीमताल आदि में भी पूर्व सांसद डा. महेंद पाल ने बड़ी होर्डिंग लगाकर क्षेत्रवासियों को बधाइयां दी हैं। इसे भी साफ तौर पर उनकी दावेदारी से जोड़ा जा रहा है। पाल ने अपनी होर्डिंग में राहुल गांधी की खुद के बराबर ही फोटो लगाई है, साथ ही केंद्र से लेकर राज्य के बड़े कांग्रेसी नेताओं को भी अपनी होर्डिंग में जगह दी है। माना जा रहा है कि आने वाले समय पर कांग्रेस में होर्डिंग व दावेदारी-वार और अधिक तेज हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि दो दिन पूर्व जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रुद्रपुर में वहां के पूर्व विधायक व मंत्री रहे तिलक राज बेहड़ के साथ सने हुए नींबू एवं गुड़ की चाय की पार्टी दे रहे थे, उसी दिन राज्य के राजघरानों से आने वाले दो पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा और डा. महेंद्र पाल की मुलाकात भी हुई थी, और बाबा ने स्वयं की उम्र अधिक होने का हवाला देते हुए पाल का नाम सांसद पद के लिए आगे किया था। उल्लेखनीय है कि रावत एवं बेहड़ पहले ही अपनी दावेदारी जता चुके हैं, ऐसे में इसी दिन बाबा व पाल की जुगलबंदी को इसके काउंटर के रूप में देखा जा सकता है। गौरतलब है कि नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले प्रकाश जोशी भी सांसद पद के लिए दावेदारी कर चुके हैं।

पूर्व समाचार : पूर्व रुद्रपुर विधायक तिलक राज बेहड़ ने मुख्यालय में होर्डिंग लगाकर गर्माया माहौल

  • नये वर्ष में और तेज होगा कांग्रेस में लोस चुनाव के लिए संघर्ष

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 दिसंबर 2018। राजनेता त्योहारों की बधाइयां भी यूं ही नहीं देते हैं, बल्कि इसमें भी उनका राजनीतिक स्वार्थ छुपा होता है। नगर में ताजा व अनपेक्षित तौर पर लगे प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री एवं रुद्रपुर के पूर्व विधायक तिलक राज बेहड़ के नव वर्ष, लोहड़ी, गणतंत्र दिवस व मकर संक्रांति की शुभकामनाएं देते होर्डिंग भी साफ तौर पर इसी कड़ी का हिस्सा नजर आ रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही यह संकेत भी दे रहे हैं कि कांग्रेस में नये वर्ष में लोक सभा चुनाव के लिए टिकट प्राप्त करने का संघर्ष और अधिक तेज होना तय है।


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उल्लेखनीय है कि बेहड़ ने नगर वासियों को इस तरह की त्योहारों की शुभकामनाएं पहले कभी नहीं दी हैं। जबकि इस बार उन्होंने नगर ही नहीं, आसपास के भवाली-भीमताल, ज्योलीकोट आदि छोटे-बड़े पहाड़ी कस्बों में भी होर्डिंग लगाकर एक तरह से साफ तौर पर आगामी लोक सभा चुनावों के लिए अपनी दावेदारी ठोक दी है। पूर्व में भाजपा नेता व पूर्व सांसद बलराज पासी भी पिछले वर्ष के कैंची मेले व हरेला के मौके पर यही कर चुके है। हालांकि बेहड़ ने अपने होर्डिंग में स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के फोटो लगाने से भी गुरेज नहीं किया है और केंद्रीय नेताओं के साथ प्रदेश के हरीश रावत, इंदिरा, प्रीतम से लेकर स्थानीय विधायक सरिता आर्य व पूर्व सांसद डा. महेंद्र पाल आदि के फोटो लगाकर स्वयं को गुटीय राजनीति से अलग रखने की कोशिश भी की है। किंतु रविवार को वे रुद्रपुर में पूर्व सीएम हरीश रावत द्वारा आहूत की गयी ‘पहाड़ी सने नीबू व गुड़ की चाय’ की पार्टी में भी प्रमुख रूप से शामिल रहे हैं। इस प्रकार उन्होंने चाहे-अनचाहे यह भी संकेत दे दिया है कि किसके इशारे पर उन्होंने यह होर्डिंग लगाये हैं। उल्लेखनीय है कि नैनीताल लोक सभा सीट पर हरीश रावत एवं नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश की आपसी रार एवं लोक सभा के टिकट के लिए संघर्ष किसी से छुपा नहीं है। यह दोनों नेता पहले ही अपनी दावेदारी खुलकर व्यक्त करने के साथ ही एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने में भी कभी परदा नहीं कर रहे। ऐसे में बेहड़ की दावेदारी को हरीश रावत खेमे की ओर से एक और नाम आगे करने का उपक्रम माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इसी बीच राजपरिवारों से जुड़े दो पूर्व कांग्रेसी सांसद केसी सिंह बाबा व डा. महेंद्र पाल भी लोस की दावेदारी के मुद्दे पर आगे आ चुके हैं। बाबा ने स्वयं की उम्र का हवाला देकर पाल का नाम आगे बढ़ाया है। वहीं राहुल गांधी के करीबी प्रकाश जोशी की भी इस सीट के लिए दावेदारी बताई जा रही है। ऐसे में आने वाले नये वर्ष में कांग्रेस में लोक सभा टिकट के लिए संघर्ष तेज होने व सिर-फुटौव्वल के स्तर तक जाने की भी उम्मीद की जा रही है।

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बदलाव की हर बयार में नैनीताल ने भी बदली है करवट, कइयों को राजनीति का ककहरा सीखते ही दिल्ली पहुंचाया है नैनीताल ने -1971 के बाद नैनीताल से दूसरी बार नहीं जीता कोई भी सांसद -भारत रत्न पं. गोविंद बल्लभ पंत व एनडी तिवारी की परंपरागत सीट रही है नैनीताल नवीन जोशी, नैनीताल। देश की सर्वाधिक शिक्षित संसदीय क्षेत्रों में शुमार एवं भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के परिवार एवं पं.एनडी तिवारी की परंपरागत सीट माने जाने नैनीताल ने देश में चल रही हर बदलाव की बयार में खुद भी करवट बदली है। देश में अच्छी सरकार चलती रही तो यहां के मतदाताओं ने सत्तारूढ़ पार्टी के प्रत्याशी को ही सिर-माथे पर बिठाया है, लेकिन जहां सत्तारूढ़ पार्टी ने चूक की और नैनीताल को अपनी परम्परागत सीट मानकर गुमान में रही, तो उसे यहां के मतदाताओं ने जमीन दिखाने से भी गुरेज नहीं किया। इसके साथ ही नैनीताल संसदीय सीट के साथ यह संयोग भी स्थापित होता चला गया है कि नैनीताल से जिस पार्टी का प्रत्याशी जीता, उसी पार्टी की देश में सरकार भी बनती रही। साथ ही पिछली करीब आधी सदी में यह संयोग भी बनता चला गया है कि नैनीताल ने अपने किसी प्रत्याशी को दुबारा दुबारा संसद पहुंचने का मौका नहीं दिया। इन संयोगों के साथ नैनीताल सीट पर भाजपा-कांग्रेस दोनों राजनीतिक दलों की नजर है। नैनीताल लोकसभा सीट के अतीत के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि नैनीताल देश की आजादी के बाद भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के परिवार और बाद में एनडी तिवारी सरीखे नेताओं की परंपरागत सीट रही है। साथ ही दोनों को ही संसद पहुंचने की सीढ़ी चढ़ने का ककहरा भी नैनीताल ने ही सिखाया है। मगर यह भी मानना होगा कि यहां के मतदाताओं की मंशा को कोई नेता ठीक से नहीं समझ पाया। इसीलिये एनडी भी यहां से हारे और पं. पंत के पुत्र केसी पंत भी। इसी तरह कांग्रेस की परंपरागत सीट माने जाने के बावजूद कांग्रेस के नेता भी हर चुनाव में यहां असमंजस के दौर से ही गुजरते रहे हैं, जबकि देश की सत्ता संभाल रही भाजपा यहां से वर्तमान सहित सिर्फ तीन बार ही जीत हासिल कर पाई है। वहीं जनता पार्टी और जनता दल के नेताओं को भी नैनीताल ने अपना प्रतिनिधित्व करने का मौका देने से गुरेज नहीं किया। वर्ष 1971 के चुनाव तक यहां के मतदाताओं ने कुछ खास नेताओं को ही गले लगाया, पर इसके बाद उन्होंने अपने किसी भी प्रतिनिधि को दुबारा नहीं जिताया। इसके साथ ही देश में चल रही राजनीतिक हवा का असर नैनीताल सीट पर भी सीधा पड़ता रहा है। देश के शुरुआती 1951 व 1957 तक के लोक सभा चुनावों में पंडित गोविंद बल्लभ पंत के दामाद सीडी पांडे और 1962 से 1971 तक के तीन चुनावों में पं. पंत के पुत्र केसी पंत कांग्रेस के टिकट पर नैनीताल से सांसद रहे, और देश में कांग्रेस की सरकारें भी बनती रहीं। मगर 1977 के चुनाव में आपातकाल के दौर में तीन बार के सांसद केसी पंत को भारतीय लोकदल के नए चेहरे भारत भूषण ने पराजित कर दिया। तब देश में पहली बार विपक्ष की सरकार बनी। लेकिन विपक्ष का प्रयोग विफल रहने पर 1980 में एनडी तिवारी को उनके पहले संसदीय चुनाव में ही नैनीताल ने दिल्ली पहुंचा दिया। लेकिन अपने कार्यकाल के बीच ही 1984 में तिवारी सांसदी छोड़ यूपी का सीएम बनने चले तो उनके शागिर्द सतेंद्र चंद्र गुड़िया को भी जनता ने जीत का सम्मान दिया। 1989 के चुनाव में देश भर में मंडल आयोग की हवा चली तो जनता दल के नए चेहरे डा. महेंद्र पाल नैनीताल से चुनाव जीत गए और जनता दल की ही केंद्र में सरकार बनी। 1991 के चुनाव में नैनीताल के मतदाता देश में चल रही राम लहर की हवा में बहे और बलराज पासी ने भाजपा के टिकट पर जीतकर इतिहास रच दिया। तब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। 1998 में बीच में एचडी देवगौड़ा और आरके गुजराल के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार की विफलता के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा की इला पंत ने एनडी तिवारी को पटखनी दी और दुबारा केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। इसके बाद से 2004 व 2009 के चुनावों में कांग्रेस के केसी सिंह बाबा यहां से सांसद बने और दोनों मौकों पर कांग्रेस की सरकार ही देश में बनी। वहीं इधर 2014 में भाजपा के टिकट पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी नैनीताल से सांसद बने तो देश में फिर से भाजपा की सरकार भी बनने से यहां से जीतने वाले दल की ही दिल्ली में सरकार बनने का मिथक पूरी तरह से स्थापित हो गया।

एनडी ने दो बार तोड़ा था मिथक नैनीताल में जीतने वाली पार्टी की ही केंद्र में सरकार बनने के मिथक को एनडी तिवारी 1996 और 1999 में विरोधी पार्टियों की लहर में भी नैनीताल से चुनाव जीतने के साथ तोड़ने में सफल रहे। 1996 में एनडी ने कांग्रेस से नाराज होकर सतपाल महाराज शीशराम ओला व अन्य के साथ मिलकर कांग्रेस (तिवारी) बनाई और चुनाव जीतने में सफल रहे। लेकिन इस चुनाव के बाद केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी। इसी तरह 1999 के चुनाव में भी एनडी तिवारी ने फिर अपवाद दोहराया, जब कांग्रेस से तिवारी तीसरी बार सांसद बने, लेकिन फिर केंद्र में भाजपा की ही सरकार बनी। वर्ष 2002 में उनके उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने पर हुए उपचुनाव में जनता दल से कांग्रेस में आए डा. महेंद्र पाल भी उनकी सीट बचाने में सफल रहे।

कांग्रेस में दूसरे की बड़ी हार में खुद का टिकट देख रहे नेता उत्तराखंड में निकाय चुनावों एवं मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के निपटने के साथ ही लोक सभा चुनावों की तैयारियां भी शुरू हो गयी हैं। नैनीताल सीट पर भाजपा-कांग्रेस दोनों खेमों से टिकट पाने की होड़ शुरू हो गयी है। पिछले विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री रहते नैनीताल लोक सभा की किच्छा विधानसभा सहित दो सीटों से चुनाव लड़ने के बाद दोनों सीटों से चुनाव हारने वाले हरीश रावत का दावा कांग्रेस की ओर से टिकट पाने में मजबूत बताया जा रहा है। जबकि अब तक दो सीटों की हार पर हरीश रावत को मुंह चिढ़ा रही कांग्रेस की दिग्गज नेत्री डा. इंदिरा हृदयेश हाल में हुए निकाय चुनाव में पूरे प्रदेश को छोड़ हल्द्वानी नगर निगम की महापौर सीट पर अपनी पार्टी के नेताओं की हर स्तर की नाराजगी मोल लेने के बावजू अपने पुत्र सुमित हृदयेश को न जिता पाने के बाद से हर ओर से हमले झेलने को मजबूर हैं। उनका मुख्यमंत्री के परिवार की स्टिंग सीडी से लेकर चुनाव में ‘हल्का हाथ’ रखने के कथित बयान सहित हर दांव इन दियों उल्टे बैठ रहे हैं। बावजूद वे भी टिकट की प्रमुख दावेदार बतायी जा रही हैं।

भाजपा में नैनीताल से टिकट के लिए हल्द्वानी में घर बनाने की होड़ नैनीताल। भाजपा में नैनीताल से टिकट पाने के लिए हल्द्वानी में घर बनाने की जबर्दस्त होड़ दिखाई दे रही है। काबीना मंत्री प्रकाश पंत से लेकर पूर्व सांसद बलराज पासी और खटीमा के विधायक पुष्कर धामी तक नैनीताल में घर बना चुके हैं, जबकि हल्द्वानी में पहले से घर वाले पूर्व काबीना मंत्री बंशीधर भगत ने खुलकर अपनी दावेदारी ठोक दी है। जबकि वर्तमान सांसद कोश्यारी पहले ही हल्द्वानी में घर बना चुके हैं, अलबत्ता भाजपा हाईकमान के 75 वर्ष से ऊपर के नेताओं को सक्रिय राजनीति से बाहर करने का इशारा देखकर भीतर से चुनाव लड़ने की उत्कठ इच्छा के बावजूद बाहर से चुनाव न लड़ने की बात कर रहे हैं।

संजीव के साथ बेतालघाट साधने निकले भगत

नैनीताल, 30 सितंबर 2018। आगामी लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा से टिकट हेतु अपनी दावेदारी जता चुके पूर्व मंत्री और इन दिनों पार्टी के नेपथ्य में चल रहे कालाढुंगी विधायक बंशीधर भगत ने रविवार को जनपद के दूरस्थ बेतालघाट में कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए मिशन-2019 का मंत्र फूका। इस दौरान भगत ने क्षेत्रीय विधायक संजीव आर्य द्वारा कराए जा रहे विकास कार्यों की सराहना करते हुए उनके कार्यों को इन्हें क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर बताया। संजीव भी इस दौरान उनके साथ कार्यक्रम में रहे। इस दौरान लंबे समय बाद क्षेत्र में आगमन पर भगत के स्वागत के लिए जनता में भी जोश देखा गया।
इस दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए विधायक संजीव आर्य ने विधानसभा क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाईं, वही बंशीधर भगत ने मोदी सरकार को देश हित में वरदान बताते हुए केंद्र सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखा। भगत ने कहा कि 2019 में भले ही टिकट किसी को भी मिले सबने साथ मिलकर मोदी को मजबूत करना है। चुनावी चुटकी लेते हुए भगत ने यह भी कहा कि वह भी टिकट की दौड़ में हैं, और इसी के चलते मुझे अपने पुराने क्षेत्र के साथियो से मिलने आये हैं। इस अवसर पर जिला प्रभारी कमल नारायण जोशी, अरविंद पडियार, संजय वर्मा, जिपं सदस्य पीसी गोरखा, मंजू पंत, लक्ष्मण महरा, धीरज, दलीप सिंह, दीवानी राम, राजेंद्र जैड़ा, माया बोरा, अम्बा दरमाल सहित दर्जनों पदाधिकारी एवं सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित रहे ।
महरा को कराई भाजपा में वापसी
बेतालघाट। विगत विधानसभा चुनावों से पार्टी से नाराज चल रहे सहकारी समिति हल्द्यानी के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह महरा ने रविवार को भाजपा में वापसी कर ली। पूर्व मंत्री बंशीधर भगत एवं संजीव आर्य ने माल्यार्पण कर उनकी पार्टी में वापसी कराई।

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नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा छोड़ी गयी गोरखपुर और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर लोक सभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी जीते हैं। इस जीत के तरह-तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। कहीं इसे भारतीय राजनीति में ‘मोदी की अगुवाई वाले भाजपा युग’ के तिलिस्म का टूटना माना जा रहा है, तो कहीं इसे मोदी को 2019 में हटाने का ख्वाब पाल रहे विपक्ष के लिए जीत का मंत्र माना जा रहा है। राजनीति में कुछ भी चिरस्थायी नहीं होता। न नेता, और न उनके फॉर्मूले। यह भी होता है कि कई बार एक का फॉर्मूला दूसरे के लिए सफलता की राह खोल देता है। लेकिन इस जीत-हार का असल मूल मंत्र उभर कर आ रहा है ‘संघे-शक्तिः’। जिस ‘सबका साथ-सबका विकास’ के फॉर्मूले से मोदी एक के बाद एक राज्य जीतते जा रहे हैं, वही फॉर्मूला इस बार ‘बुआ-बबुआ’ यानी बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के प्रत्याशियों के लिए काम कर गया है। इस जीत को बिहार के विधानसभा चुनावों में लालू एवं नितीश के गठबंधन और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के ‘झाड़ू’ की ‘क्लीन स्वीप’ जीत से जोड़कर भी देखा जा सकता है। लेकिन यह जीत कितनी स्थायी होगी, इसके लिए ‘जंगल बुक’ के उस दृश्य का दृष्टांत उपयुक्त होगा, जिसमें सूखा पड़ने की स्थिति में नदी में ‘शांति शिला’ उभर आती है, और जंगल के सभी हिंसक-अहिंसक, शिकारी-शिकार जानवर ‘शांति काल’ की घोषणा कर एक घाट से पानी पीने लगते हैं, किंतु प्यास बुझते ही फिर एक-दूसरे की जान के प्यासे हो जाते हैं। बिहार का उदाहरण अधिक पुराना नहीं है, जहां जीत आधे कार्यकाल की भी नहीं रही, और अब लालू-नितीश अलग-अलग खेमों में खड़े अपने ‘चुनावी साथ’ को ‘सबसे बड़ी भूल’ करार दे चुके हैं। जरूर 1993 में सपा-बसपा के इसी तरह के गठबंधन को मिली जीत के केवल दो वर्ष बाद 2 जून 1995 को हुए लखनऊ के ‘गेस्ट हाउस कांड’ के बाद गोमती में बहुत पानी बह चुका है, सपा तब के मुलायम के हाथों से छिनकर ‘टीपू’ के हाथों में आ चुकी है, पर मायावती वही हैं। उन्हें इस कांड में बचाने वाले ‘संघी पंडित भाई’ की पार्टी उनके लिए आज भी सबसे बड़ी ‘मनुवादी-अछूत’ है। जीत के बाद बधाई देने गये सपा नेताआंे को बसपाइयों की तरह खड़े रखकर उन्होंने फिर बता दिया है वे मनुवाद को लाख गलियाने के बावजूद आज भी अपने खेमे की ‘मनुवादी दौर की पंडित’ ही हैं, जहां उनसे ऊपर कोई नहीं हो सकता।
बहरहाल, गोरखपुर व फूलपुर में चुनाव परिणाम उसी फॉर्मूले पर आये हैं, जिसके तहत मोदी भाजपा को जिताते आए हैं, यानी सबका साथ…, इस फॉर्मूले के पार्श्व में मोदी चाहे जो भी राजनीतिक दांव-पेंच चलते रहे हों, लेकिन मूल में यही मंत्र रहता है कि अधिकाधिक वोटों का ध्रुवीकरण कैसे भाजपा के पक्ष में हो। इस ध्रुवीकरण के साथ विपक्ष का आपस में बंटा होना भी भाजपा की जीत में निर्विवाद तौर पर बड़ी भूमिका निभाता रहा है। लेकिन जहां भी विपक्ष का बिखराव ‘जंगल बुक’ की स्थितियों में एका में बदलता है, मोदी हार जाते हैं। बिहार में भी यही हुआ, दिल्ली में भी और अब यूपी के गोरखपुर व फूलपुर में भी। इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है।
लेकिन बात यहां से आगे 2019 में जाने, भविष्य की करें तो ‘बुआ-बबुआ’ के कोष्ठों में इकट्ठा हुआ विपक्ष आगे स्थायी एकता के प्रति आश्वस्त नहीं करता। अनुभवी सोनिया गांधी के हाथों से युवा राहुल के हाथों में आ चुकी ‘कांग्रेसी छतरी’ भी विपक्ष को राजनीतिक सुरक्षा दिलाने के प्रति भरोसा नहीं दिलाती। राहुल अभी भी चुनाव के समय-बेसमय ननिहाल जाने का बचपना नहीं छोड़ पा रहे। नितीश राजग में आ चुके हैं, लालू जेल में हैं, ममता की अपनी सीमाएं हैं। बुआ-बबुआ एक ही राज्य से आते हैं। बुआ को 2019 के लोस चुनावों में 60 सीटें चाहिए। बाम किला त्रिपुरा में भी ध्वस्त हो चुका है, और केरल के प्रति भी सशंकित है। बावजूद विपक्ष यदि 2019 को ‘शांति काल’ घोषित कर एक हो जाए तो मोदी का तिलिस्म टूटना नामुमकिन नहीं है, पर ‘हो पाएगा ?’ इस प्रश्न में ही 2019 का चुनाव परिणाम निहित है।

बीएसपी का वोट एसपी को ट्रांसपर

यूपी उपचुनाव में जीत इस जीत में एक बात साफ नजर आई की कि बीएसपी अपना वोट एसपी को पूरी तरह ट्रांसफर करने में सफल रही। इस जीत के बात ऐसी सुगबुगाहट होने लगी है कि दोनों दल 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के साथ उतर सकते हैं। गोरखपुर चुनाव में हार यूपी के सीएम आदित्यनाथ के लिए निजी तौर पर काफी मुश्किलों वाला है। आदित्यनाथ 1998 से यहां से लगातार 5 बार सांसद रह चुके हैं।

उपचुनाव में यह रहा वोटों का गणित

बिहार के अररिया में आरजेडी को 49 फीसदी वोट मिले और 2014 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 7 फीसदी ज्यादा रहा। वहीं, एनडीए को यहां 43 फीसदी वोट मिले और 2014 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 16 फीसदी बढ़ा। जहानाबाद विधानसभा उपचुनाव में महागठबंधन को 55 फीसदी वोट मिले जो 2015 की तुलना में 4 फीसदी ज्यादा रहा। वहीं एनडीए को 30 फीसदी वोट मिले। भभुआ विधानसभा में एनडीए को कुल 48 फीसदी वोट मिले और 2015 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 13 प्रतिशत बढ़ा जबकि महागठबंधन को यहां 37 फीसदी वोट प्राप्त हुए जो 2015 विधानसभा चुनाव की तुलना में 8 प्रतिशत ज्यादा था।

2019 के लिए बढ़ी चिंता
एसपी की गोरखपुर और फूलपुर में जीत ने सत्तारूढ़ बीजेपी के माथे पर शिकन ला दिया है। 2019 लोकसभा चुनाव में करीब एक साल का वक्त शेष है और विपक्ष की इस जीत ने भगवा पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। मुस्लिमों का वोट बीजेपी को हराने वाली पार्टी के लिए गया है। गोरखपुर में कांग्रेस की मुस्लिम उम्मीदवार को केवल 2 फीसदी वोट मिले वहीं, फूलपुर में स्वतंत्र उम्मीदवार अतीक अहमद केवल 6.5 फीसदी वोट ही पा सके हैं। 2014 की तुलना में गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी का वोट शेयर गिरा है। एसपी की जीत में मुस्लिमों की भूमिका अहम रही है। बीजेपी चीफ अमित शाह केंद्र और राज्य सरकार पर वादे पूरे करने का दबाव बनाए हुए हैं। यूपी में दो लोकसभा सीट पर हार के बाद लोकसभा में बीजेपी के एमपी की संख्या घटकर 275 हो गई है। बीजेपी को अलवर, अजमेर, रतलाम और गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा था।

बिहार उपचुनाव के नतीजे भी इसी तरफ इशारा करते हैं कि यहां भी अंकगणित सत्तारूढ़ पार्टी के लिए सही नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में अररिया में बीजेपी को 2.6 लाख वोट मिले थे जबकि जेडीयू को 2.2 लाख वोट। दोनों पार्टियों का वोट मिला ले तो आंकड़ा 4.8 लाख वोटों का बनता है और यह आरजेडी (4.1 लाख वोट) को हराने के लिए काफी था। बावजूद इसके आरजेडी ने यह सीट करीब 62 हजार के अंतर से जीत लिया। मतलब साफ है एनडीए गठबंधन से वोट छिटका है।

2014 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट का हाल

समझें 2018 उपचुनाव के वोटों का गणित
2018 के उपचुनाव में यूपी में दोनों लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी के वोट प्रतिशत में कमी आई है। बीजेपी ने गोरखपुर में 2014 में जहां 52 फीसदी वोट पाए थे वहीं, उपचुनाव में उसे 47 फीसदी वोट ही मिले, यानी 5 फीसदी वोट का नुकसान। फूलपुर में 2014 के चुनाव में बीजेपी को 52 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि उपचुनाव में उसका प्रतिशत 13 प्रतिशत घटकर 39 प्रतिशत पहुंच गया।

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d9125मीडिया में बहुप्रचारित हो रहा है-‘महागठबंधन की महाजीत, महानायक बने नितीश’। मानो एक प्रांत बिहार जीते नितीश में मोदी से खार खाए लोगों को उनके खिलाफ मोहरा मिल गया है। नितीश बाबू भी राष्ट्रीय चैनलों पर राष्ट्रीय नेता बनने के दिवास्वप्न देखते दिखाए जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि चुनाव परिणाम की रात नितीश सो नहीं पाए हैं। सच है कि उन्हें महागठबंधन ने अपने नेता के रूप में पेश किया था, इसलिए उनकीं तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी तय है। लेकिन भीतर का मन सवाल कर कचोट रहा है, पिछली बार के मुकाबले सीटें और वोट दोनों कम मिले हैं। गठबंधन में ‘छोटे भाई’ लालू, अधिक सीटों (80)के साथ ‘बड़े भाई’ बनकर उभरे हैं। पीछे से मन कह रहा है, जिस भाजपा को पिटा हुआ बता रहे हैं, वह तो 24.8 फीसद वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। मीडिया कह रहा है, उन (नितीश) का जादू चला है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें लोक सभा चुनाव (16.04फीसद)  से महज 0.76 फीसद अधिक ही और भाजपा से आठ फीसद से भी कम, महज 16.8 फीसद वोट मिले हैं, और उनके सहयोगी लालू व कांग्रेस को मिलाकर पूरे महागठबंधन का वोट प्रतिशत भी लोक सभा चुनाव के मुकाबले करीब पांच फीसद गिरा है। लोक सभा चुनाव में जहां लालू को 20.46 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबकी 18.4 फीसद मिले हैं। चार से 27 सीटों पर पहुंचकर ‘बाल सुलभ’ बल्लियां उछल रही राहुल बाबा की कांग्रेस को भी लोक सभा के 8.56 फीसद के बजाय 6.7 फीसद वोट ही मिले हैं और कुल मिलाकर महागठबंधन को भी जहां लोक सभा चुनाव में 46.28 फीसद वोट मिले थे, वहीं इस बार महज 41.9 फीसद वोट ही मिले हैं।

वहीँ, 2010 के वोटों से तुलना करने पर भी नितीश की पार्टी जदयू सबसेे कमजोर प्रदर्शन कर पाई है, जबकि भाजपा का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। भाजपा को जहां 2010 में 16.49 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबके करीब आठ फीसद की बढ़ोत्तरी के साथ 24.8 फीसद वोट मिले हैं, और वोटों में बढ़ोत्तरी वाली वह इकलौती पार्टी है। उसके उलट नितीश बाबू की जदयू 5.78 फीसद के सबसे बड़े घाटे में रही है। उसे तब 22.58 फीसद वोट मिले थे, और अबकी महज 16.8 फीसद। लालू का राजद भी सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद पिछली बार के मुकाबले 0.44 फीसद की मामूली ही सही लेकिन वोट फीसद के मामले में नुकसान में रहा है। वहीं कांग्रेस को 1.67 फीसद का नुकसान हुआ है। उसे 2010 में 8.3 फीसद और अब 6.7 फीसद वोट मिले हैं, जबकि राम विलास पासवान की लोजपा का नुकसान 1.94 फीसद का है। लोजपा को 2010 में 6.74 फीसद वोट मिले थे और अब 2014 में 4.8 फीसद वोट मिले हैं। इस प्रकार कह सकते हैं बिहार में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार आंकड़ों की सच्चाई के लिहाज से किसी भी खेमे के लिए खुश होने का कारण नहीं है।

चुुनावी ‘जीत’ के लिए देश को ना हराएं

बिहार में हुई चुनावी जंग के बाद से देश में ना तो ‘बीफ’ की कोई बात सुनाई दी है, और ना ही ‘असहिष्णुता’ की। ‘अखलाक-कलबुर्गी’ तो सपने में भी नहीं आ रहे हैं, और पुरस्कार लौटाने की ‘आंधी’ भी पूरी तरह से रुक गई है। लिहाजा लग रहा है मानो देश अचानक फिर से वापस ‘सहिष्णु’ हो गया है। दाल की कीमतें भी जैसे अचानक नीचे लौट आई हैं, ‘ओआरओपी’ पर लौटने वाले पुरस्कार भी थम गए हैं। लगता है देश में सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, या कि ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं !
चुनाव बीत गया है सो समय है कुछ पीछे जाने का, कि किस तरह सरकार की कथित असहिष्णुता के खिलाफ हमारे साहित्यकारों ने अपनी ओर से ‘अपनी तरह की क्या खूब सहिष्णुता’ दिखाते हुए पुरस्कार लौटाए। शायद इससे पूर्व वह साबित कर चुके थे कि एक दक्षिणपंथी दल की सरकार के प्रति वे एक-डेढ़ वर्ष ‘सहिष्णु’ रह चुके हैं, और इससे अधिक समय नहीं रह (झेल) सकते। आखिर वह कैसे उनके साथ कदम से कदम मिलाकर ‘लेफ्ट-राइट’ कर सकते हैं। दिल्ली में वह बड़ी चालाकी से ‘आम आदमी’ के साथ हो गए थे, और उसके (आम आदमी के) ‘हाथ’ को साथ लेकर दक्षिण पंथ को धूल चटा दी थी। बिहार में कोई ‘चारा’ नहीं था, इसलिए यह सब किया-कराया, और चुनाव जीत भी गए। लेकिन इस ‘जीत’ की कोशिश में देश को दुनिया के समक्ष कितना ‘हरा’ दिया, क्या वे सोचेंगे भी ?

भारत में जीत का फार्मूलाः ज्यादा गाली खाओ-जीत पाओ

जी हां, भारतीय राजनीति में जीत का यह फार्मूला अब से नहीं पिछले करीब ढाई दशक से लगातार मजबूत होता जा रहा है। बिहार चुनावों से यह फार्मूला राज्यों की ओर भी जाता और सही साबित होता नजर आ रहा है। याद कीजिए, 1998 का लोक सभा चुनाव, जब भाजपा अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में दूसरी बार चुनाव लड़ रही थी, और विपक्ष सांप्रदायिकता के नाम पर बाजपेयी के खिलाफ जमकर विष वमन कर रहा था। नतीजा भाजपा व एनडीए को सत्ता प्राप्ति के रूप् में मिला। 2004 के चुनावों में जहां बाजपेयी आत्ममुग्धता के साथ ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ ही सोनिया गांधी पर ‘विदेशी मूल’ का ठप्पा लगाकर चुनाव मैदान में गए थे, कांग्रेस की 13 वर्ष के बनवास के बाद सत्ता में वापसी हुई थी। सोनिया की जगह प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह की सरकार 2009 के चुनाव में बहुत सुविधाजनक स्थिति में नहीं गई थी, लेकिन भाजपा की ओर से लाल कृष्ण आडवाणी और तब उनके सारथी की भूमिका में रहे नरेंद्र मोदी ने मनमोहन को ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कह कर जमकर हमला किया था। नतीजा मनमोहन को और मजबूत कर सत्ता में वापसी करा गया। इधर 2014 के चुनावों में हर किसी के निशाने पर नरेंद्र मोदी थे, और वह पहली सबसे बड़े बहुमत की गैर भाजपाई सरकार के करिश्मे के साथ दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए। दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कुछ ऐसे ही निसाने पर केजरीवाल रहे थे, और उन्हें भी एक तरफा जीत मिली, और अब यही कहानी ‘जंगलराज पार्ट-टू’ के लिए कुप्रचारित लालू के बिहार विधान सभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के रूप में दिखाई दे रही है। यानी यदि आप यदि सत्ता में वापसी के लिए चुनाव में हैं तो आत्ममुग्धता में स्वयं ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’ बनते हुए शेखी न बघारें और हर स्थिति में दूसरे प्रत्याशी पर कमर से नीचे वार करते हुए हमला न बोलें, यह भारतीय चुनाव में जीत की गारंटी हो सकता है। 

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नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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