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चांद की सतह पर मिला लैंडर विक्रम, अगले 12 दिन अहम, जानिए इसरो के सामने आगे क्या विकल्प

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बेंगलुरु। अब जब चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर द्वारा खींचे गए थर्मल इमेज से लैंडर विक्रम की लोकेशन का पता चल गया है तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसरो के पास आगे क्या विकल्प हैं। क्या लैंडर से दोबारा संपर्क हो सकेगा? विक्रम किस हाल में है? क्या उस पर लगे उपकरण सही सलामत हैं? इन सभी सवालों के जवाब के लिए अगले 12 दिन अहम साबित हो सकते हैं। इसरो चेयरमैन के. सिवन ने रविवार को बताया कि विक्रम की लोकेशन का पता चल गया है और उसने हार्ड-लैंडिंग की होगी क्योंकि जिस सॉफ्ट-लैंडिंग की योजना बनाई गई थी, वह सफल नहीं हो सकी।

क्या है हार्ड लैंडिंग?
आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि हार्ड लैंडिंग क्या है। दरअसल, हार्ड लैंडिंग टर्म का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई स्पेसक्राफ्ट या अंतरिक्ष संबंधी कोई विशेष उपकरण ज्यादा तेज वर्टिकल स्पीड यानी लंबवत गति और ताकत से सतह पर पहुंचा हो। सॉफ्ट-लैंडिंग या नॉर्मल लैंडिंग में स्पेसक्राफ्ट या उपकरण धीमी और नियंत्रित गति से सतह पर उतरता है ताकि उसे नुकसान न पहुंचे।

लोकेशन से बढ़ीं उम्मीदें, लोगों ने कहा- जादू होगा, लैंडर से संपर्क स्थापित करने की कोशिश जारी
इसरो चीफ सिवन ने पीटीआई को बताया कि लैंडर विक्रम ने हार्ड-लैंडिंग ही की होगी। उन्होंने कहा कि ऑर्बिटर पर लगे कैमरे से उसकी लोकेशन पता चली है। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या हार्ड-लैंडिंग के दौरान लैंडर को नुकसान पहुंचा है तो उन्होंने कहा, ‘अभी हमें यह नहीं पता चला है।’ इसरो चीफ ने कहा कि लैंडर से संपर्क स्थापित करने की कोशिश लगातार जारी है। सिवन ने बताया, ‘चांद की सतह से 2.1 किलोमीटर ऊंचाई तक विक्रम की लैंडिंग प्रकिया योजना के हिसाब से चल रही थी। उसके बाद लैंडर से ग्राउंड स्टेशन का संपर्क टूट गया।’ उन्होंने कहा कि डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है।

टूट गया होगा विक्रम तब… 
न्यूज एजेंसी आईएएनएस ने एक अधिकारी के हवाले से बताया है, ‘ऐसा लगता है कि लैंडर चांद की सतह से तेजी से टकराया है और इस कारण वह पलट गया है। अब उसकी स्थिति ऊपर की ओर बताई जा रही है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी संभावना भी है कि इससे लैंडर टूट गया हो। अगर हार्ड-लैंडिंग के दौरान लैंडर टूटकर कई टुकड़ों में बिखर गया है तब तो उससे संपर्क स्थापित करना नामुमकिन होगा।
उम्मीद अभी भी बाकी
लैंडर विक्रम का अभी तक लोकेशन ही पता चला है, उससे संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है। वह किस हाल में है, उसे नुकसान पहुंचा है या ठीक है, उल्टा है या सतह पर सीधा खड़ा है, इस बारे में पुख्ता तौर पर अभी कुछ पता नहीं चल पाया है। हालांकि, लैंडर से दोबारा संपर्क की उम्मीदें अभी भी जिंदा है। एक विशेषज्ञ ने बताया कि अगर हार्ड-लैंडिंग के बाद विक्रम चांद की सतह पर सीधा होगा और उसके उपकरणों को नुकसान नहीं पहुंचा होगा तो उससे दोबारा संपर्क स्थापित होने की उम्मीदें बरकरार रहेंगी। यानी चमत्कार की उम्मीद अभी भी है। लैंडर विक्रम के अंदर ही रोवर प्रज्ञान है, जिसे सॉफ्ट-लैंडिंग के बाद चांद की सतह पर उतरना था।

अगले 12 दिन क्यों अहम?
चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पूरी तरह ठीक है और वह करीब 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित अपनी कक्षा में चांद की परिक्रमा कर रहा है। वह साढ़े 7 साल तक ऐक्टिव रहेगा और धरती तक चांद की हाई रेजॉलूशन तस्वीरें और अहम डेटा भेजता रहेगा। उस पर कैमरे समेत 8 उपकरण लगे हुए हैं जो अत्याधुनिक है। ऑर्बिटर का कैमरा तो अबतक के मून मिशनों में इस्तेमाल हुए कैमरों में सबसे ज्यादा रेजॉलूशन वाला है। ऑर्बिटर अगले 2 दिनों में उसी लोकेशन से गुजरेगा, जहां लैंडर से संपर्क टूटा था। अब तो लैंडर की लोकेशन की जानकारी भी मिल गई है। ऐसे में ऑर्बिटर जब उस लोकेशन से गुजरेगा तो लैंडर की हाई रेजॉलूशन तस्वीरें ले सकता है। ऑर्बिटर द्वारा भेजे गए डेटा के विश्लेषण से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। अगले 12 दिनों में लैंडर की स्थिति से लेकर उससे जुड़े सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे। इसरो चीफ के. सिवन ने शनिवार को डीडी न्यूज से बातचीत में कहा था कि अगले 14 दिनों में लैंडर विक्रम को ढूंढा जा सकेगा।

पीएम की हौसलाफजाई, देश से मिले समर्थन से इसरो का मनोबल ऊंचा
लैंडर विक्रम से ग्राउंड स्टेशन का संपर्क टूटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह स्थिति को संभाला और वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाया, उससे इसरो का मनोबल ऊंचा बना हुआ है। इसरो चीफ के. सिवन ने कहा, ‘हम इससे (पीएम मोदी के संबोधन और पूरे देश की तरफ से इसरो को मिले समर्थन) बहुत खुश हैं। इससे हमारे लोगों का मनोबल ऊंचा हुआ है।’ उन्होंने कहा, ‘देश ने जिस तरह अच्छी और सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, उसने हमारा दिल छू लिया। प्रधानमंत्री तो कल (शनिवार) अविश्वसनीय थे।’

चंद्रयान-2 बड़ी उपलब्धि, नासा भी इसरो की मुरीद 
भले ही लैंडर की सॉफ्ट-लैंडिंग नहीं हो पाई लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी चंद्रयान-2 के लिए इसरो का लोहा माना है और उसे प्रेरणा का स्रोत बताया है। वैसे चांद पर सॉफ्ट-लैंडिंग का भारत का यह पहला प्रयास था। अब तक चांद की सतह पर उतरने से संबंधित जितने मून मिशन हुए हैं उनमें से आधे में ही कामयाबी मिली है। 1958 से कुल 109 मून मिशन संचालित किए गए, जिसमें 61 सफल रहे। करीब 46 मिशन चंद्रमा की सतह पर उतरने से जुड़े हुए थे जिनमें रोवर की ‘लैंडिंग’ और ‘सैंपल रिटर्न’ भी शामिल थे। इनमें से 21 सफल रहे जबकि दो को आंशिक रूप से सफलता मिली।
(एजेंसियों से इनपुट के साथ)

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