तब ‘ब्रूटस’ ने भी ऐसे ही आंख दबाई थी…!!

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“एक प्रिया प्रकाश थीं, जिन्होंने आंख मारकर नाम कमा लिया था और एक राहुल गांधी हैं, जिन्होंने आंख मारकर गले लगने और अपने ‘दम’दार कहे जा रहे भाषण से कमाया भी सब गंवा दिया….” 

नवीन जोशी, नैनीताल। यह वह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो मोदी सरकार के खिलाफ आये पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान लोक सभा में हुई बहस, खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों, क्रिया-प्रतिक्रियाओं के बाद आती है। इस बात में कोई शक नहीं कि राहुल ने अपनी पूर्व घोषणा के अनुरूप संसद में बोलने पर ‘भूकंप’ आने की जो ‘चेतावनी’ दी थी, राफेल डील को उठाकर वह ऐसा करने में सफल रहे। इस पर उनकी पार्टी के सांसद ने भाजपाई सांसदों के ‘भूकंप कब आएगा’ पूछे जाने पर कहा भी कि ‘लो भूकंप आ गया’। मौजूदा दौर में लगने-लगाये जाने वाले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के स्तर को देखते हुए यदि इस आरोप पर भारत व फ्रांस सरकारों द्वारा खंडन किये जाने की बात को छोड़ भी दिया जाये, और आरोपों को सही मान लिया जाये तो इन्हें पूर्व में कई बार उनके द्वारा उद्घाटित किये जाने के बावजूद, उनके पिता राजीव गांधी को सत्ता से दूर करने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा लगाये गये ‘बोफोर्स घोटाले’ के आरोपों की श्रेणी का भूकंप लाने वाला आरोप माना जा सकता है। राहुल ने मोदी सरकार को रोजगार देने के मोर्चे पर विफल बताया, और उनके दावों को ‘जुमला स्ट्राइक’ कहकर मखौल उड़ाया। इस दौरान राहुल अपने भाषण से अपने पार्टी कैडर और प्रशंसकों को विश्वास जताते प्रतीत भी हुए कि उनमें मोदी विरोध की क्षमता है। आखिर में उन्होंने मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ की तर्ज पर अपने विरोधियों को भी ‘कांग्रेस’ बना देने की बात की। कांग्रेस का मतलब अपने विरोधियों के प्रति भी किसी तरह का द्वेष भाव न रखने की बात कहते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को गले भी लगा लिया। इस पर उन्होंने विपक्षी बेंचों से खूब तालियां भी बटोरीं। साथ ही सत्तापक्ष सहित प्रधानमंत्री मोदी को भी निश्चित ही हतप्रभ, हैरान सा भी कर दिया। यहां तक उनकी हर बात एक नेता, विपक्ष के नेता व एक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के तौर पर उनकी जिम्मेदारियों के लिहाज से कहीं से भी गलत नहीं ठहराई जा सकतीं।
लेकिन कुछ ही पलों के बाद जब उनके भाषण और उनकी क्रियाओं का विश्लेषण प्रारंभ हुआ, उनका न केवल बचकानापन, बल्कि झूठा दंभ व दिखावटीपन भी बाहर आ गया। यह छोटी बात नहीं कि उनके भाषण के कुछ ही मिनट बाद पहले देश की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और फिर भारत व फ्रांस की सरकारों को उनके आरोपों का खंडन करना पड़ा। उनके वह बयान भी सामने आ गये जब फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों से मिलने के बाद कहा गया कि राफेल डील पर कोई बात नहीं हुई थी। जबकि संसद में राहुल ने कहा कि उनकी मैक्रों से बात हुई थी और राफेल डील को सार्वजनिक करने में कोई समस्या नहीं थी। राहुल यह भी याद न रख पाये कि फ्रांस के साथ गोपनीयता का समझौता मोदी सरकार ने नहीं, बल्कि यूपीए सरकार ने किया था।
यह बात राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के आज के स्तर को देखते हुए छोड़ भी दी जाये तो इससे साबित हुआ कि उनके संसद में बोलने से भूकंप आने के बावजूद स्वयं की शर्मिंदगी के अलावा कोई असर नहीं छूटा। बल्कि लगता है कि इस मुद्दे पर हुई छीछालेदर के बाद राहुल व कांग्रेस ने हमेशा के लिए इस मुद्दे को खो दिया है।
बहरहाल, अब बात करते हैं राहुल की मोदी को ‘प्यार वाली झप्पी’ देने की। निस्संदेह शायद यह इतिहास हो कि विपक्ष के किसी नेता ने नेता सदन को इस तरह गले लगाया हो। ऐसे उदाहरण के तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा तब के युवा सांसद अटल बिहारी बाजपेई को उनके प्रभावशाली भाषण के बाद सबसे पीछे की सीट पर जाकर बधाई और एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनने की शुभकामनाएं देने की घटना जरूर स्मरण आती है। लेकिन झप्पी देने से पहले राहुल एक बहुत बड़ी चूक कर गये। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को एक-दो नहीं तीन बार अपनी सीट से उठने का इशारा किया। उनकी यह चूक कई इशारे करती है। एक-उन्हें संसदीय परंपराओं व पद की गरिमा के साथ ही भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का भी ज्ञान नहीं है। हम जब किसी को प्यार से गले मिलते हैं तब या तो वह व्यक्ति पहले से खड़ा होता है, या खडा हो जाता है। बुजुर्गों के मामले में जब गले मिलने वालों में उम्र के लिहाज से पीढ़ियों का अंतर हो, उन्हें उठाने का प्रयास नहीं किया जाता है। वहीं संसद में प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह उठाने का प्रयत्न करने वाली शायद यह विश्व इतिहास की पहली घटना भी हो। सो, इस तरह राहुल ने न केवल बचकानी हरकत की, बल्कि इससे उनका दंभ भी प्रदर्शित हुआ कि वह उसी गांधी-नेहरू परंपरा के वंशज हैं, जिनके इशारों पर कई मुख्यमंत्री व राज्यपालों के साथ ही कुछ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी हाथ जोड़ी मुद्रा में खड़े नजर आये हैं।
राहुल की इस गलती को कुछ देर के लिए, उनके मन से स्वाभाविक स्तर पर आई, बिना सोचे-समझे हो गयी क्रिया अथवा नासमझी-नादानी समझ कर भुला भी दिया जा सकता था, और माफ भी किया जा सकता था। लेकिन इसके बाद उन्होंने जो किया उससे साफ हो गया कि यह सब कुछ उन्होंने नासमझी-नादानी में नहीं वरन सोच-समझकर, अथवा पहले से लिखी स्क्रिप्ट के अनुसार किया। उन्होंने एक आंख दबाकर अपने साथियों को बताया कि जो स्क्रिप्ट में था वह वह कर आये हैं। यह उन्होंने दिल से नहीं किया है। इससे उनके द्वारा उम्र से बुजुर्ग और देश के गरिमामय सर्वोच्च पद को संभाल रहे प्रधानमंत्री के पद का मखौल उड़ाना ही नहीं ‘प्यार के नाम पर पीठ में छुरा भोंकना’ भी प्रकट हुआ है। ब्रूटस ने भी शायद इसी तरह से जूलियस सीजर के पीठ में छुरा भोंकने के बाद आंख दबाई हो। लेकिन इसे भी राहुल का बचकानापन ही कहेंगे कि उनकी पोल उनके कुछ बड़ा करने से पहले ही खुल गयी है। ऐसे में शायद ही वह वह कर पायें, वह लक्ष्य प्राप्त कर पायें, जिसकी आशा-अपेक्षा में उन्होंने यह सब किया है।

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लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी के नुक्कड़छाप भाषण के बाद जो हुआ, वह लोकतंत्र को कलंकित करने वाला है! यह तो हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करना चाहिए कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद के रुतबे को झुकने नहीं दिया, अन्यथा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो पूरी कोशिश की थी कि उन्हें अपने इशारे पर सीट से उठाकर देश को यह संदेश दे कि प्रधानमंत्री कोई भी बन जाए, आदेश तो गांधी परिवार का ही चलेगा! लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री ने राजतंत्र के अहंकारी युवराज को झुका दिया!

झूठ के आधार पर गढ़े हुए अपने भाषण के बाद राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर बढ़े, इसे सभी ने लोकसभा चैनल पर देखा। लेकिन जनता और तथाकथित मीडिया बुद्धिजीवियों ने एक बार नोट नहीं किया, या फिर जानबूझ कर उसकी उपेक्षा की। वह एक क्षण था, जिसने साफ-साफ लोकतंत्र और राजतंत्र की मानसिकता के बीच के अंतर को स्पष्ट कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास पहुंच कर राहुल गांधी ने हाथ से बार-बार इशारा कर उन्हें अपनी सीट से उठने को कहा। एक नहीं, दो नहीं, तीन बार उन्होंने हाथ दिखाकर प्रधानमंत्री को अपनी सीट से उठने को कहा! आश्चर्य कि किसी ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? प्रधानमंत्री पद इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा पद है। राजसत्ता की मानसिकता वाला कोई गांधी इसका अपमान नहीं कर सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जिस तरह से सोनिया-राहुल उठ-बैठ कराते थे, वही कोशिश राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी से कराना चाहा, लेकिन यह मोदी हैं, जिन्होंने सदन में प्रवेश करने के बाद उसे लोकतंत्र का मंदिर कहा था, उसकी चौखट को चूमा था।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी इशारा किया कि किसलिए उठूं? और क्यों उठूं? मोदी के चेहरे पर उस वक्त की कठोरता नोट करने लायक थी और वह कठोरता प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बनाए रखने के कारण उत्पन्न हुई थी। राहुल को समझ में आ गया कि यह व्यक्ति मनमोहन सिंह नहीं है जो उसके कहने पर किसी ‘नट’ की तरह नाचे। थक-हार कर राहुल गांधी झुका और जबरदस्ती पीएम मोदी के गले पड़ गया। इसके बाद फिर वह अहंकार पीछे मुड़ कर चलने लगा। गले मिलना उसे कहते हैं, जिसमें सदाशयता हो, उसे नहीं, जिसमें अहंकार हो। अहंकार से गले मिलने को गले पड़ना कहते हैं। राहुल गांधी पीएम से गले नहीं मिला, बल्कि उनक गले पड़ा!

पीएम के गले पड़कर वह मुड़ा और जाने लगा। पीएम मोदी ने उसे आवाज देकर बुलाया और सीट पर बैठे-बैठे ही उससे हाथ मिलाया, मुस्कुराए, उसकी पीठ ठोंकी, उसे शाबासी दी! बिल्कुल एक अभिभावक की तरह!
राहुल गांधी पीएम मोदी से गले मिलने नहीं, बल्कि वह गले पड़ने गया था। उन्हें आदेश देकर अपनी सीट से उठने के लिए कहने गया था। मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी के अलावा खुद भाजपा का भी कोई दूसरा नेता होता तो गांधी परिवार के इस अहंकार उद्दंड राजनेता के कहने पर उठ कर खड़ा हो गया होता! देखा नहीं आपने, जब राहुल गांधी पीएम मोदी के पास आए तो पिछली सीट पर बैठे कितने ही सारे भाजपाई नेता उठ कर खड़े हो गये थे, ताली बजा रहे थे! दरअसल यह सब पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर जीत कर आए हैं, लेकिन बीमारी तो वही कांग्रेस वाली लगी है, किसी वंश या परिवार के चाकरी की!

इस मामले को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी नोट किया कि राहुल गांधी ने सदन और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का हनन करने का प्रयास किया है। सुमित्रा महाजन ने बाद में सदन में कहा, “जिस तरह राहुल गांधी प्रधानमंत्री के पास पहुंचे, उन्हें उठने को कहा, वह अशोभनीय था। प्रधानमंत्री अपनी सीट पर बैठे थे। वह कोई नरेंद्र मोदी नहीं हैं, बल्कि देश के प्रधानमंत्री हैं। उस पद की अपनी गरिमा है। इसके बाद राहुल उनके पास से जाकर अपनी सीट पर फिर से भाषण देने लगे और आंख मारा, यह पूरे सदन की गरिमा के खिलाफ था।”

अपने अध्यक्ष की अशोभनीय आचरण को ढंकने के लिए एक गुलाम की भांति कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा अध्यक्ष के कहे पर आपत्ति दर्ज कराना चाहा। इस पर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा, “मैं किसी को गले मिलने से थोड़े न रोक रहीं हूं। मैं भी एक मां हूं। मेरे लिए तो राहुल एक बेटे के समान ही हैं। लेकिन एक मां के नाते उसकी कमजोरियों को ठीक करना भी मेरा दायित्व है। सदन की गरिमा को हम सबको ही बनाए रखनी है।”

इसके उपरांत गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने थोड़ा दार्शनिक अंदाज में राहुल की हरकतों पर कटाक्ष कहते हुए कहा, “जिसकी आत्मा संशय में घिर जाती है, उसके अंदर अहंकार पैदा हो जाता है। यही आज सदन में देखने को मिला है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यह लोकतंत्र आपका आभारी है कि आप अपनी सीट पर बैठे रहे। यह हमारे वोट का सम्मान है। हमने लोकतंत्र के लिए अपना प्रधानमंत्री चुना है, कोई कठपुतली नहीं। कोई प्रधानमंत्री यदि राजशाही के अहंकार वाले किसी व्यक्ति के लिए अपनी सीट से उठ जाए तो यह न केवल प्रधानमंत्री पद के सम्मान का और सदन की गरिमा का अपमान होगा, बल्कि देश की उन सभी जनता का अपमान होगा, जिसे लोकतंत्र में आस्था है और जिसने अपने प्रधानमंत्री के लिए मतदान किया है। धन्यवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, एक अहंकारी उद्दंड को उसकी औकात दिखाने के लिए ! पुनः धन्यवाद! (Copy paste)

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Rs 3/kg: Rahul Gandhi Lands in a Potatoe Soup

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले हैं। इस पर धारचूला के कांग्रेस पार्टी के विधायक हरीश धामी ने राहुल गांधी से कैलाश यात्रा के लिये उत्तराखंड के लिपूलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर यात्रा करने की मांग की है।

विधायक धामी का कहना है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा का पौराणिक यात्रा मार्ग उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के लिपूलेख दर्रे से ही माना जाता है। लिहाजा राहुल गांधी को कैलाश मानसरोवर की यात्रा इसी मार्ग से करनी चाहिये।धामी ने अपनी मांग के समर्थन में दो तर्क देते हुए कहा है कि, पहला तो यह मार्ग पौराणिक है। दूसरा इस मार्ग से यात्रा पूरी करने के बाद राहुल गांधी देश को सच्चाई बता सकेंगे कि देश डिजीटल इंडिया से कितना जुडा़ है। जब वे इस इलाके का भम्रण करेंगे तो केन्द्र सरकार के दावों की जमीनी हकीकत से खुद रुबरु होकर देश की जनता को भी सरकार के दावों की जमीनी हकीकत से रुबरु करा सकेंगे। धामी ने कहा कि वे जल्द ही राहुल गांधी से मिलकर अपनी इस इच्छा से उनको अवगत कराएंगे। आगे देखने वाली बात होगी कि राहुल अपनी पार्टी के विधायक की इस सलाह, मांग, चुनौती को किस तरह से लेते हैं।

अब सत्ता ‘ज़हर’ नहीं रही मि. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ?

आखिर GDP का विरोध करते, GDP को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ बताने वाले राहुल गांधी पहले न केवल स्वयं ‘GDP के नए अवतार’ – ‘जनेऊ धारी हिन्दू’ बने, बल्कि उनकी पार्टी की ओर से यह साबित करने के प्रयास चल रहे हैं कि वे और उनकी पार्टी बड़ी ‘प्रो हिंदूवादी’ पार्टी है। अब उनमें उन हिन्दू मंदिरों में अधिक से अधिक जाने की होड़ दिख रही है, जहाँ बकौल उनके लोग ‘लड़कियां छेड़ने’ जाते थे।
अब राहुल “सत्ता ज़हर है” कहते हुए कांग्रेस अध्यक्ष बन गए हैं। इस तरह सत्ता से दूर रहने की बात करते-करते हुए वे पार्टी के अध्यक्ष बनने के साथ बहुमत मिलने पर ‘सत्ता प्रमुख’ बनने की राह पर भी चल पड़े हैं। और इस तरह वे सत्ता रूपी “ज़हर” की प्राप्ति के लिए भी तमाम प्रयास करते नजर आ रहे हैं।
पेश है राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने के दौरान का एक पुराना विश्लेषण, जो आज की परिस्थितियों में भी सटीक बैठता है :
राहुल की ‘साफगोई’ के मायने
जनवरी 2013 में जयपुर में कांग्रेस पार्टी की चिंतन बैठक में चाहे जो और जितना नाटकीय तरीके से हुआ हो, लेकिन काफी कुछ हुआ वही, जिसकी उम्मीद कमोबेश हर कांग्रेसी कर रहा था, और बाकी देशवासियों को भी उसका अंदाजा था। यानी राहुल गांधी को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिलना, और उन्हें उपाध्यक्ष बना भी दिया गया। चिंतन शिविर से यही सबसे बड़ी खबर आई, यानी चिंतिन शिविर आयोजित ही इस लिए किया गया था कि इसके बाद राहुल को पार्टी का नंबर दो यानी सोनिया गांधी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाए।
राहुल को उपाध्यक्ष घोषित कर दिया गया, किंतु यह भी बहुत बड़ी घटना नहीं क्योंकि वह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए भी गांधी-नेहरू परिवार से होने और सोनिया गांधी के पुत्र होने के नाते पार्टी के नंबर दो तथा सोनिया के निर्विवाद तौर पर उत्तराधिकारी ही थे। लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि नई जिम्मेदारी देने के साथ यह संदेश साफ कर देने की कोशिश की गई है कि वह आगामी लोक सभा चुनावों में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे।
गौर कीजिए, राहुल और सोनिया गांधी दोनों इस बात को मानते हैं, इसलिए ‘पार्टी’ की एक बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर दोनों के मन में पार्टी से पहले ‘सत्ता’ का खयाल आता है। यह खयाल आते ही सोनिया बेहद डर जाती हैं। वह रात्रि में ही राहुल के कक्ष में जाती हैं, और पुत्र को गले लगाकर रोते हुए याद दिलाती है, “सत्ता जहर है।” इस जहर ने उनकी ‘आइरन लेडी’ कही जाने वाली दादी और मजबूत पिता को उनसे छीन लिया था। पुत्र को भी डर सताता है, उनके साथ बैडमिंटन खेलने वाले दो पुलिस कर्मी कैसे गोलियों से भूनकर उनकी दादी की हत्या कर देते हैं। यहां किस पर विश्वास किया जाए, किस पर नहीं ! कहीं सत्ता उन्हें भी…..! भगवान करे ऐसा कभी ना हो।
बहरहाल, टीवी पर आने वाले एक विज्ञापन की तर्ज पर डर सभी को लगता है, गला सभी का सूखता है। मां-पुत्र भी इसके अपवाद नहीं हो सकते। दोनों बेहद डरे हुए हैं। लेकिन उनके समक्ष क्या मजबूरी है सत्ता रूपी जहर को पीने की। यह जहर उनके परिवार को इतने बड़े घाव पहले ही दे चुका है, तो उसे जानते-बूझते फिर से क्यों गटका जाए। किसी और के लिए हो सकता है, पर गांधी-नेहरू परिवार के लिए तो सत्ता कभी ‘शादी के लड्डू’ की तरह अनजानी वस्तु भी नहीं हो सकती कि उसे बिना खाए पछताने से बेहतर एक बार खा ही लिया जाए। उनके लिए यह स्वाद कोई नया नही।
फिर क्या मजबूरी है कि राहुल अपने इस डर को पार्टी की भरी चिंतन सभा में उजागर कर देते हैं। क्या केवल ‘साफगोई’ का तमगा हासिल करने के लिए। और यह भी ‘साफ’ किए बगैर कि आखिर उनके समक्ष इतने बड़े डर के बावजूद विषपान करने की इतनी बड़ी मजबूरी क्या है। क्या वह पार्टी की चिंतन बैठक में देशवासियों के दुःखों पर चिंता कर रहे हैं, और देशवासियों के दुःख उनसे देखे नहीं जा रहे और वह उनके दुःखों को दूर करने के लिए उनके हिस्से के ‘विष’ को पीकर ‘शिव’ बनना चाहते हैं। ऐसा ही मौका सोनिया के पास भी तो आया था, और उन्होंने यह विष क्या पी न लिया होता, यदि उन पर ‘विदेशी’ होने का दाग न लगता ?
राहुल जानते हैं, वह नेहरू-गांधी परिवार के चश्मो-चिराग हैं, जिसका नाम अपने नाम से जोड़ देने भर से उन्हें बिना किसी अन्य विशेषता के मां से उत्तराधिकार में कांग्रेस के नंबर दो की कुर्सी के साथ ही आगे पार्टी को सत्ता मिलने पर देश की नंबर एक की कुर्सी भी कमोबेस बिना प्रयास के मिलनी तय है। वह देश की सत्ता के इतने बड़े नाम हैं कि चाहें तो विपक्षी पार्टियों की सत्ता रहते भी लोकहित के जो मर्जी कार्य करवा सकते हैं। फिर क्या मजबूरी है कि वह सत्ता को जहर होने के बावजूद भी पीना ही चाहते हैं ?
यहां राहुल के एक वक्तव्य से दो चीजें साफ़ हो जाती हैं। एक, देश का भावी प्रधानमंत्री होने के बावजूद वह इस कथित ‘साफगोई’ के फेर में स्वयं के डर के साथ अपनी कमजोरी भी प्रकट कर देते हैं। दूसरे, ‘पालने’ से ही सत्ता शीर्ष पर होने के बावजूद स्वयं का जहर जैसी सत्ता से न छूट पा रहा मोह भी उनकी इस ‘साफगोई’ से उजागर हो जाता है।
राहुल की यह ‘साफगोई’ अनायास नहीं है, वरन सोची समझी रणनीति के तहत हैं। वह अभी भी अपना ‘चेहरा’ विकसित करने के दौर में ही हैं। कभी दाड़ी वाले बेफुरसत युवा, कभी यूपी की चुनावी सभा में पर्चा फाड़ते एंग्री यंग मैन तो कभी गरीब की झोपड़ी में रात बिताते गरीब-गुरबा के मसीहा, और अब साफगोई दिखाते, देश के दिलों को छूते नेता। उनकी पार्टी यूपी, गुजरात जैसे राज्य हारते जा रही है। उत्तर पूर्व के तीन राज्यों में भी उनकी पार्टी के लिए जीत की कम ही संभावनाएं हैं। 2014 भागा हुआ आ रहा है। जनता भ्रष्टाचार, महंगाई, सब्सिडी वापस लिए जाने, डीजल-पेट्रोल को तेल कंपनियों के हाथ में दे दिए जाने और जन लोकपाल, बलात्कार पर कड़े कानून बनाने का शोर मचाए हुए है। वह क्या करें, कौन सा रूप धरें। कौन सा चमत्कार करें कि इस सबके बावजूद सत्ता वापस कदमों में आ जाए। यह बड़ी चिंता है उनकी भी, और कांग्रेस के नेताओं की भी, जिन्हें पता है कि यही नेहरू-गांधी का नाम है जिसके बल पर वह जनता को तमाम अन्य मुद्दे भुलाकर सत्ता हासिल कर सकते हैं। और मां सोनिया की भी, बेटे के लिए दुल्हन भी तलाशें तो पूछते हैं, लड़का करता क्या है। सचमुच बड़ी मजबूरी है।
लेकिन राहुल को घबराने या जल्दबाजी की जरूरत नहीं, उन्हें समझना होगा, वह अकेले दौड़ने के बाद भी पार्टी के ‘नंबर दो’ बने हैं। ऐसे ही जब चाहें नंबर -1 भी बन जायेंगे। इस पद के लिए उनके अलावा कोई और दूसरा प्रत्याशी नहीं है। वह कभी देश के प्रधानमंत्री भी बनेंगे तो ऐसी ही स्थिति में, जहां कोई दूसरा उनका प्रतिद्वंद्वी नहीं होगा या ऐसी स्थितियां बना दी जाएंगी कि कोई दूसरा उनके बराबर में खड़ा ही नहीं हो सकता। उन्हें यह प्रमोशन तब मिला है, जबकि उनके नेतृत्व में लड़े राज्यों में भी कांग्रेस लगातार हारती रही है। उनका ‘नेता बनो या नेता चुनो’ का मॉडल युवा कांग्रेस में भी फेल हो चुका है। वह न पार्टी की युवा ब्रिगेड को सुधार पाए हैं, और न ही अपनी पार्टी को अपने दम पर किसी राज्य में ही जीत दिला पाए हैं।
बावजूद वह जानते हैं, कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के बाद एक वे ही हैं, जिनकी छांव तले कांग्रेसी एक छत के तले खड़े हो सकते हैं। राहुल भले कहें कि उन्हें नहीं पता कि कांग्रेस में आज के कारपोरेट प्रबंधन के दौर में भी (कमोबेस देश की तरह ही) कोई सिस्टम ही नहीं हैं, बावजूद (देश की तरह भगवान भरोसे नहीं) विपक्षी दलों की राजनीतिक अपरिपक्वता और राजनीतिक दांवपेंच में कहीं न ठहरने जैसे अनेक कारणों से वह चुनाव जीत ही जाते हैं।
तो क्या, यह जल्दबाजी, यह विषपान की मजबूरी इसलिए है कि उन्हें लगने लगा है, गांधी-नेहरू जाति नाम भले कांग्रेस पार्टी में अब भी चलता हो पर देश में यह तिलिस्म लगातार टूटता जा रहा है। युवा कांग्रेस के साथ ही यूपी में ‘बदलाव’ की कोशिश कर वह थक हार चुके हैं। उनके हाथों में युवा कांग्रेस की कमान थी। उन्होंने वहां जमीनी स्तर से ‘नेता बनो या नेता चुनो’ का नारा दिया, लेकिन वह नारा भी नहीं चल पाया। कमोबेश सभी जगह वही युवा आगे आ पाए, जिनके पिता या गुट के नेता मुख्य पार्टी में बड़े ओहदे पर थे। जो भी जीता, उसने नीचे से लेकर ऊपर तक कार्यकर्ताओं को मैनेज किया। अपने सदस्य बनाए, फिर अपने लोगों को जितवाया और आखिर में अपने पक्ष में लॉबिंग की। लेकिन राहुल की सोच के मुताबिक ऐसा कुछ नहीं हुआ कि अनजान चेहरे युकां के प्रदेश अध्यक्ष बन गए।
तो क्या राहुल अपनी इस साफगोई से मात्र पार्टी जनों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखने का ही प्रयास नहीं कर रहे हैं। इसके साथ ही कहीं वह कार्यकर्ताओं को स्वयं शीर्ष पर जगह बनाने के बाद परोक्ष तौर पर चेतावनी तो नहीं दे रहे कि यह बहुत खतरनाक जगह है। यहां आने की भी न सोचें। हम बहुत बड़ी कुरबानी देने वाले लोग हैं, इसलिए यहां हैं।
इससे बेहतर क्या यह न होता कि वह अपना डर दिखाने के बजाए देश की बड़ी समस्याओं, भ्रष्टाचार, महंगाई, सब्सिडी को खत्म करने, जन लोकपाल, पदोन्नति में आरक्षण जैसे विषयों पर बोलने का साहस दिखाते। देश की जनता की नब्ज, उसकी समस्याओं को समझते, और अपनी युवा ऊर्जा का इस्तेमाल पर उनका स्थाई समाधान तलाशते।
राहुल को जानना होगा उन्हें प्रधानमंत्री बनना है तो उन्हें केवल कांग्रेस पार्टी का नहीं पूरे देश का नेता बनना होगा। और ऐसा केवल भावनात्मक तरीके के बजाए कुछ करके बेहतर किया सकता है। उन्हें इस पद पर आरूढ़ होने से पूर्व कुछ और समय लेना होगा। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने की जल्दबाजी उनके कॅरियर पर भी भारी पड़ सकती है। इस पद के लिए स्वयं को तैयार भी करना होगा। उन्हें स्वयं में गंभीरता लानी होगी। केवल कांग्रेस के गैर गांधी प्रधानमंत्रियों की तरह ‘मौनी बाबा’ बनने अथवा अपने पिता के ‘हमने देखा है, हम देखेंगे’ की तरह ही ऐसा या वैसा होना चाहिए के बजाय कुछ करके दिखाने का साहस और होंसला स्वयं में विकसित करना होगा। अभी वह युवा हैं, उनकी उम्र भागी नहीं जा रही। निस्संदेह उन्हें एक न एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनना है।
इस आलेख पर कुछ प्रतिक्रियाएं :
  1. 2004 में सोनिया ने कहा था की अन्तरात्मा की आवाज पर पीएम नहीं बनीं। बाद में पता चला की वो बनने तो गयीं थीं पर भारतीय संविधान ने रोक लगा दी।

    अब राहुल कागज पर पढ़कर अपनी माँ के आँसू और दर्द बयाँ कर रहे हैं। ‘सत्ता जहर है’ क्योंकि राहुल और पीएम की कुर्सी के बीच भी संविधान खड़ा हो गया है शायद!

    सही कहा… बल्कि राहुल को पता है कि कांग्रेसी गांधी परिवार के नाम पर ही थोडा-बहुत एकजुट और वोट खरीदने/माँगने लायक हो पाते हैं…. यह कांग्रेस और राहुल दोनों की मजबूरी है.

     3. Anonymous, February 11, 2013 at 2:24 AM

    जोशी जी बहुत बढिया विश्लेषन किया है ! लेकिन सत्ता का जहर पीने के पीछे एक ही कारण दिखता है लालच ! एसा लालच जो स्वर्ग मे देवराज इन्द्र को भी शायद नसीब ना हो ? सोनिया जी और राहुल के साथ साथ कॉंग्रेसी जनो के राष्‍ट्रीय दामाद और उनके बच्चों की देख रेख मे 121 करोड़ लोगों का परधानमंत्री इतनी बड़ी हुई उम्र मे सेवा कर रहा है 24 घंटे नतमस्तक हो हाजिर रहता है केंदिय मंत्री जिनके प्राइवेट नौकर तुल्य हों ! चंदे की ऊगाही के पैसों और भ्रष्ट्राचार मे घूस के तहत अरबो रुपये की कमाई और उसके ब्याज से ही 400 करोड़ का उड़नखटोला जिसको दिया जाता हो ! यदि कोई युवक प्रश्न पूछने के लिये राहुल से मिलने के लिये हेलीपेड पर जाता हो तो खानदानी सेवक और मंत्री पोस्ट पर बैठे जितेन प्रसाद और प्रमोद तिवारी सरीखे लोग युवक को केमेरे के सामने लात घूंसे बरसाते हों सुरक्षा की दुहाई देके , आखिर सत्ता के इस जहर को जहर के बजाय अमृत कहना क्या ऊचित नही होगा ? शायद कहीं नौकरों को भान ना हो जाये इसलिये सोनिया ने उसे सत्ता का अमृत कहने के बजाय जहर कह दिया ! और रही बात अमृत से मरने की तो इसमे कौन सी बड़ी बात है मरना तो एक दिन सभी को है !!! बहरहाल कई जन्म के पूनियों का फल है सोनिया जी और उनके रिश्ते नातेदारों का उसे तो वे भोगेंगे ही और जन्म जन्मान्तर से जिन्होने सोनिया परिवार के चरणों मे प्रीति रखी है अगर वो इतनी प्रीति अपने कर्म से रखते या कह लो भगवान से रखते तो क्या पता इनका उद्धार भी हो जाता ! पर शायद असली पापी तो जनता है जो कभी अपने को सामान्य और कभी आम कहती है ! और ईर्ष्या और जलन के कारण वो जातिवादी मानसिकता मे आज तक ऊलझी है ! और छोड़िये इसे अपने उत्तराखंड का क्या हाल है कभी इस पर भी लिख डालिये ! पिछली बार आया था तो मुझे लगा कि उत्तराखंड दिनो दिन गर्त मे जा रहा है सड़क, बिजली मे बिहार बन गया है ! अब तो हर जगह मुल्ले बागलदेशी ही बसे दिखे जो कॉंग्रेस का वोट बैंक ही बन रहा है ! काठगोदाम से पंतनगर रेलवे स्टेशन तक रेलवे किनारे झुग्गी देखकर मन बड़ा दुखी हुआ आखिर वोट बैंक के लिये हरे झंडे वालों को बसा दिया गया है !! बहुगुणा जी भी विकास ना कर पा रहे है सिर्फ मुस्लिम वोट बनाने मे लगे है और अब लग रहा है की शायद अंतिम पहाड़ी मुख्यमंत्री बहुगुणा जी है इसके बाद सपा और बसपा के साथ कॉंग्रेस !!!

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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