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लगातार जमीन खो रहा है उत्तराखंड का यह सबसे पुराना क्षेत्रीय दल, जानें क्या हैं कारण…

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-नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से घोषित प्रत्याशी नहीं करा पाये नामांकन
-अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से घोषित व नामांकन कराने वाले नैनीताल निवासी प्रत्याशी उक्रांद के कार्यकर्ता ही नहीं
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 26 मार्च 2019। राज्य का सबसे पुराना व राज्य निर्माण की अवधारणा से जुड़ा क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल यानी उक्रांद लगातार जमीन खोता जा रहा है। दल ने इधर लोक सभा चुनाव से पूर्व अपने चुनाव चिन्ह कुर्सी को प्राप्त करने से मिली मनोवैज्ञानिक बढ़त को भी खासकर कुमाऊं मंडल में जानबूझकर खो दिया है। पहले नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट से पार्टी के वरिष्ठ व संस्थापक नेता काशी सिंह ऐरी को प्रत्याशी बनाने की बात कही गयी थी, लेकिन घोषणा नैनीताल निवासी विजय पाल सिंह चौधरी के नाम की हुई, और वे भी देर से पहुंचने के कारण नामांकन ही नहीं करा पाये। जबकि अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से पार्टी ने नैनीताल निवासी केएल आर्य को टिकट दिया है, जो कि कभी भी उक्रांद के कार्यकर्ता नहीं रहे, बल्कि कांग्रेस के करीब रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में आर्य ने कांग्रेस से टिकट मांगा था, लेकिन बाद में निर्दलीय चुनाव लड़े थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में नैनीताल सीट से उक्रांद के घोषित उम्मीदवार तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष श्याम नारायण भी नामांकन पत्र खरीदने के बाद भी नामांकन नहीं कर पाये, बावजूद केएल आर्य उक्रांद से चुनाव लड़ने के बजाय निर्दलीय चुनाव लड़े थे। खास बात यह भी है कि अल्मोड़ा में जिन अन्य 6 प्रत्याशियों से उनका मुकाबला है उनमें उक्रांद-डी गुट की प्रत्याशी भी अभी मैदान में हैं।

गलतियों से भरा है उक्रांद का राजनीतिक इतिहास

नैनीताल। 25 जुलाई 1979 को कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. डीडी पंत, उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बड़ौनी व विपिन त्रिपाठी सरीखे नेताओं के द्वारा उक्रांद की स्थापना की गयी थी। राज्य बनने से पूर्व प्रभावी भूमिका में रहे दल के प्रमुख चेहरे काशी सिंह ऐरी उत्तर प्रदेश विधानसभा में 1985, 1989 व 1993 में यानी लगातार तीन बार चुनाव जीतकर विधायक रहे। लेकिन 1994 के राज्य आंदोलन के चरम के दौर में 1996 का लोक सभा चुनाव का बहिस्कार करने का बड़ा दाग भी उक्रांद पर लगा। इस बीच 1995 में यह दल पहली बार दो हिस्सों में भी बंटा और विघटन का सिलसिला आगे भी जारी रहा। उक्रांद में वर्तमान राजनीति के लिहाज से राजनीतिक चातुर्य या तिकड़मों की कमी मानें या कुछ और पर सच्चाई यह है कि वह अपने गठन से ही गलतियों पर गलतियां करता जा रहा है, और इन्हीं गलतियों का ही परिणाम कहा जाऐगा कि वह दशकों तक प्रदेश का एकमात्र क्षेत्रीय दल होने के बावजूद अब राज्य विधानसभा में शून्य पर पहुंच गया है। राज्य गठन के पूर्व उक्रांद के नेता सपा से सांठ-गांठ करते दिखे और अलग राज्य का विरोध कर रहे कांग्रेस-भाजपा जैसी राज्य विरोधी ताकतों को संघर्ष समिति की कमान सोंपकर हावी होने का मौका दिया। और राज्य बनने के बाद भी 2007 में उसने भाजपा सरकार को समर्थन दिया और फिर समर्थन वापस लेकर तथा और 2012 में कांग्रेस सरकार को कमोबेश बिन मांगे समर्थन देकर अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता का ही परिचय दिया। इस कवायद में दल दो टुकड़े भी हो गया। शायद यही कारण रहे कि राज्य बनने के बाद वह लगातार अपनी शक्ति खोता रहा।
राज्य बनने के बाद पहली निर्वाचित विधान सभा में उक्रांद के चार विधायक-ऐरी, जंतवाल, विपिन त्रिपाठी (उनकी मृत्यु के बाद उपचुनाव में पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी) और त्रिवेंद्र पवार (बाद में अलग गुट बना लिया), 2007 में तीन विधायक-पुष्पेश, दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल (दिवाकर और ओमगोपाल 2012 के चुनाव में भाजपा से और 2017 का चुनाव निर्दलीय लड़ें) और 2012 में केवल एक विधायक प्रीतम सिंह पवार (कांग्रेस सरकार में मंत्री रहेे) जीते, यानी लगातार उसकी विधायक संख्या एक-एक कर विधानसभा में भी घटती चली गयी। यह भी रहा कि तीन में से दो बार दल ने वैचारिक भिन्नता के बावजूद कमोबेश बिना समर्थन मांगे भी सत्तारूढ़ दलों से हाथ मिलाया, और उसके निर्वाचित विधायक अपने नेतृत्व के प्रति कमोबेश बेलगाम हुए, और पार्टी से अलग चलते रहे।
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उत्तराखंड क्रांति दल से चुनाव चिन्ह व प्रत्याशियों पर बड़ी खबर, नैनीताल से दो प्रत्याशी घोषित…

नवीन समाचार, देहरादून, 25 मार्च 2019। उत्तराखंड क्रांति दल ने प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। वहीं पार्टी को उनका चुनाव चिह्न कुर्सी भी वापस मिल गया है। घोषित प्रत्याशियों में शांति भट्ट ने पौड़ी सीट से नामांकन कर लिया है। जबकि चार सीटों पर उसके प्रत्याशी सोमवार को नामांकन करेंगे। पार्टी ने नैनीताल से पूर्व में घोषित काशी सिंह ऐरी की जगह पहले भी पार्टी से चुनाव लड़े नैनीताल निवासी चौधरी विजय पाल को, जबकि अल्मोड़ा से नैनीताल निवासी व पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट मांग रहे व न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़े उत्तराखंड देवभूमि क्रांतिकारी मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष केएल आर्य को टिकट दिया है। आर्य ने गत दिवस अल्मोड़ा से टिकट न मिलने पर नैनीताल से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी।

पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष दिवाकर भट्ट ने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की। इसमें पौड़ी से शांति भट्ट, टिहरी से डीडी शर्मा, हरिद्वार से सुरेंद्र कुमार, अल्मोड़ा से केएल आर्य, नैनीताल से चौधरी विजय पाल को चुनाव मैदान में उतारा है। पार्टी के संरक्षक काशी सिंह एरी, पुष्पेश त्रिपाठी, दिवाकर भट्ट, बीडी रतूड़ी, त्रिवेंद्र पंवार को पार्टी ने स्टार प्रचारक बनाया है। भट्ट ने कहा कि जिस मकसद से राज्य गठन की लड़ाई लड़ी गई थी, वह पूरे नहीं हुए हैं।

यह भी पढ़ें : अब भाजपा-कांग्रेस की राह पर मंदिर-मस्जिद की ओर चला उत्तराखंड का यह क्षेत्रीय दल

नवीन समाचार, नैनीताल, 2 फरवरी 2019। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद अपनी स्थापना का लक्ष्य प्राप्त कर अपनी आगे की राजनीति के लिए रीति-नीति खो चुका उत्तराखंड का सबसे पुराना राजनीतिक दल अब उन भाजपा-कांग्रेस की राह पर आ गया लगता है, जिनके विरोध का वह दंभ भरता है। सत्ता के लिए बिन मांगे भी इन दोनों ही दलों की गोद में बैठ चुके उक्रांद कार्यकर्ता शनिवार को चाहे-अनचाहे अपने प्रदेश नेतृत्व के तय कार्यक्रम पर मंदिर-मस्जिद की दौड़ लगाते दिखे।

नैना देवी मंदिर के पास उक्रांद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष डा. जंतवाल।

भाजपा सरकार पर राज्य में उद्योगों के बहाने पहाड़ की बेशकीमती जमीनों को औने-पौने दाम पर लुटाने तथा राज्य की नौकरियों में आवेदन के लिए रोजगार कार्यालय में पंजीकरण की अनिवार्यता को समाप्त करने के फैसले के विरोध में उक्रांद संभवतया अपनी स्थापना के बाद के इतिहास में पहली बार देवी-देवताओं ही नहीं दरगाह भी पहुंच गया। शनिवार को पूरे प्रदेश में धार्मिक केंद्रों के पास उक्रांद कार्यकर्ताओं ने एक दिवसीय उपवास कार्यक्रम के जरिये विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान नैनीताल मुख्यालय में जिले भर से आये कार्यकर्ताओं मल्लीताल स्थिर नगर की आराध्य नयना देवी के मंदिर के बाहर पूर्व केंद्रीय जिलाध्यक्ष व पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया। डा. जंतवाल ने इस मौके पर कहा कि भाजपा सरकार को इन स्थितियों पर सद्बुद्धि आये, इस उद्देश्य से यह प्रदर्शन पूरे प्रदेश में किया जा रहा है। प्रदर्शन में जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट, डा. सुरेश डालाकोटी, प्रकाश पांडे, मोहन चमियाल, विनोद कुमार, प्रेम कुल्याल, इंद्र नेगी, हरेन्द्र बिष्ट, रघुबीर जंतवाल, दीवान सिंह खनी, पान सिंह खनी व अम्बा दत्त बवाड़ी व लीला बोरा सहित बड़ी संख्या में उक्रांद कार्यकर्ता मौजूद रहे। वहीं पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डीके पाल ने ‘नवीन समाचार’ को बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने इसी कार्यक्रम के तहत शनिवार को पिरान कलियर शरीफ में साबरी साहब की दरगाह पर एक दिवसीय उपवास का आयोजन किया और चादर चढ़ाकर उत्तराखंड की भाजपा सरकार की बुद्धि-शुद्धि की दुवा मांगी। कहा कि राज्य की भाजपा सरकार दिल्ली के नेताओं की सुनने के स्थान पर उत्तराखंड की जनता के लिए कार्य करे और उत्तराखंड की जनता को नशा नहीं रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य की स्थानीय स्तर पर व्यवस्था करे।

पूर्व आलेख : हमेशा गलतियों का इतिहास दोहराता रहा है उक्रांद

पार्टी के बिन मांगे कांग्रेस को समर्थन देने से आश्चर्यचकित नहीं राज्य आंदोलनकारी, भाजपा-कांग्रेस की तरह ही कुर्सी प्रेमी साबित हुई उक्रांद

नवीन जोशी, नैनीताल, 14 मार्च 2012। कहते हैं इतिहास स्वयं को दोराता है, साथ ही यह ही एक सच्चाई है कि इतिहास से मिले सबकों से कोई सबक नहीं सीखता। राज्य के एकमात्र क्षेत्रीय दल बताये जाने वाले उत्तराखंड क्रांति दल यानी उक्रांद ने इतिहास को इसी रूप में सही साबित करते हुऐ अपनी गलती का इतिहास दोहरा दिया है। ऐसे में ऐसी कल्पना तक की जाने लगी है कि पिछली बार की तरह सरकार को समर्थन देने वाला उक्रांद इस बार भी एक दिन सरकार से समर्थन वापस लेगा और सत्ता सुख भोग रहे उसके एकमात्र विधायक पिछली सरकार के दो विधायकों की तरह इस फैसले को अस्वीकार करते  हुऐ अलग उक्रांद बना लेंगे और फिर अगले चुनावों में कांग्रेस के चुनाव पर टिकट ल़कर इस बार पार्टी का अस्तित्व ही शून्य कर देंगे। (उल्लखनीय है कि यह आशंकाएं बाद में शब्दशः सही भी साबित हुईं )

यह आशंकाऐं उक्रांद के कांग्रेस सरकार को बिना मांगे और बिना अपनी शर्तें बताऐ समर्थन देने के बाद उठ खड़ी हुई हैं। और बसपा के भी सरकार को समर्थन की घोषणा करने  के बाद तो सरकार बनने से पले ही उक्रांद की स्थिति सरकार को समर्थन दे रहे निर्दल विधायकों से भी बदतर होने की चर्चाऐं होने लगी हैं। ऐसा लगने लगा है कि अपने हालिया राजनीतिक निर्णयों से उक्रांद ने न केवल राज्य की जनता वरन राज्य की आंदोलनकारी शक्तियों का विश्वास भी खो दिया है। राज्य आंदोलन से गहरे जु़ड़े वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम कहते हैं, उन्हें उक्रांद के हालिया कदमों से कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। इस पार्टी ने राज्य बनने से पूर्व ही प्रदेश की सबसे बड़ी दुश्मन बताई जाने वाली सपा से सांठ-गांठ कर अपने कुर्सी से जु़ड़े रहने के मंसूबे जाहिर कर दिये थे। यही उसके दो विधायकों ने पिछली भाजपा सरकार को और अब जनता से और भी बुरी तरह ठुकराये जाने के बाद एकमात्र विधायक के भरोसे कांग्रेस सरकार को अपनी अस्मिता को भुलाते हुऐ समर्थन देकर प्रदर्शित किया है। उक्रांद को यदि समर्थन देना ही था तो राज्य की अवधारणा से जु़ड़े मुद्दों को शर्तों में आगे रखना चाहिऐ था। उन्होंने कहा कि वास्तव में अब उक्रांद किसी राजनीतिक विचारधारा वाला दल नहीं वरन कुछ सत्ता लोलुप लोगों का जेबी संगठन बनकर रह गया है। राज्य आंदोलनकारी एवं गत विस चुनावों में उक्रांद क¢ स्टार प्रचारक घोषित किये गये वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक समालोचक राजीव लोचन साह की राय भी इससे जुदा नहीं है। उनका कहना है बसपा के समर्थन देने से पूर्व उक्रांद के पास एकमात्र विधायक होने के बावजूद अपनी मांगें रखने का बेहतरीन मौका था। उक्रांद के कदम को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि जो पिछली बार दिवाकर भट्ट या तत्कालीन अध्यक्ष ने जो किया था, वही इस बार त्रिवेंद्र पंवार ने कर दिया। पूरी आशंका है कि इतिहास स्वयं को दोहराये और उक्राद अपनी शक्ति तीन विधायकों से एक करने के बाद आगे शून्य न हो जाऐ। इससे बेतहर होता कि वह आगामी पंचायत तथा अन्य चुनावों के साथ अपने संगठन और शक्ति का विस्तार करता। पद्मश्री शेखर पाठक ने भी उक्रांद  के हालिया कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुऐ कहा कि उक्रांद ने अपने इन कदमों से स्वयं के साथ ही उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी व उत्तराखंड रक्षा मोर्चा जैसे से जैसे अन्य क्षेत्रीय दलों की भी जनता के बीच विश्वसनीयता क्षींण कर दी है। उन्होंने कहा कि पहले दिवाकर भट्ट ने उत्तराखंड की जनता से दगा किया, और अब फिर यही दोहराया गया है। बेहतर होता कि वह अगले पांच वर्ष मेहनत कर भाजपा-कांग्रेस से स्वयं को बेहतर विकल्प बनाने की शक्ति हासिल करते।

अपने गठन से गलती दर गलती करता रहा है उक्रांद 

नैनीताल। उक्रांद में वर्तमान राजनीति के लिहाज से राजनीतिक चातुर्य या तिक़ड़मों की कमी मानें या कुछ और पर सच्चाई यह है कि वह अपने गठन से ही गलतियों पर गलतियां करता जा रहा है, और इन्हीं गलतियों का ही परिणाम कहा जाऐगा कि वह प्रदेश का एकमात्र क्षेत्रीय दल होने के बावजूद अब निर्दलीयों की भांति एक विधायक पर सिमट गया है। इसके अलावा केवल एक अन्य सीट द्वाराहाट में ही व मुख्य मुकाबले में रहा, जबकि उसके पूर्व  केंद्रीय अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी व डा. नारायण सिंह जंतवाल चौथे स्थान पर रहे। 25 जुलाई 1979 को अलग उत्तराखंड राज्य की अवधारणा के साथ कुमाऊं विवि के संस्थापक कुलपति प्रो. डीडी पंत, उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बड़ौनी व विपिन त्रिपाठी सरीखे नेताओं द्वारा स्थापित इस दल ने 1994 में विस चुनावों का बहिस्कार कर अपनी पहली राजनीतिक गलती की थी। राज्य गठन के पूर्व उक्रांद के नेता सपा से सांठ-गांठ करते दिखे और अलग राज्य का विरोध कर रहे कांग्रेस-भाजपा जैसी राज्य विरोधी ताकतों को संघर्ष समिति की कमान सोंपकर हावी होने का मौका दिया। शायद यही कारण रहे कि राज्य बनने के बाद वह लगातार अपनी शक्ति खोता रहा। 2002 के पहले विस चुनावों में उसे चार सीटें मिलीं, जो 2007 में तीन और 2012 में मात्र एक रह गई है। 2007 में उसने भाजपा सरकार को समर्थन दिया और फिर समर्थन वापस लेकर अपनी राजनीतिक अनुभव हीनता का ही परिचय दिया। इस कवायद में दल दो टुकड़े भी हो गया। इस के बावजूद उसने पिछली गलती से सबक न लेकर एक बार फिर आत्मघाती कदम ही उठाया है। ऐसे ही अतिवादी रवैये के कारण वह 1995 में भी टूटा, और लगातार टूटना ही शायद उसकी नियति बन गया है।

राज्य के राजनीतिक दल की मान्यता खो देगा उक्रांद

नैनीताल। भारत निर्वाचन आयोग के नये प्राविधानों के अनुसार किसी पार्टी के लिये किसी राज्य की राज्य स्तरीय राजनीतिक पार्टी होने के लिये हर 3 सीटों में से एक सीट जीतनी आवश्यक है तथा प्रदेश में पड़े कुल वैध मतों का छः फीसद हिस्सा भी उसे हासिल होना चाहिऐ। इस आधार पर 70 विस सीटों वाले उत्तराखंड में किसी राजनीतिक दल को राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिये दो से अधिक यानी तीन विधायक जीतने चाहिऐ। जो उक्रांद नहीं कर पाया है। इस आधार पर उससे राज्य की राजनीतिक पार्टी का तमगा छिनना कमोबेश तय है।

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