23 साल बाद राज्य आंदोलन के शहीदों-महिलाओं के लिए उत्तराखंड हाइकोर्ट से जगी न्याय की उम्मीद

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-कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जनहित याचिका के रूप में किया स्वीकार

-राज्य आंदोलनकारियों और महिलाओं के साथ हुई बर्बरता के मामले में सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड सरकार से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के आदेश पारित

नैनीताल, 8 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दो अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड में पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिलने व फायरिंग के आरोपितों पर कार्रवाई नहीं होने के मामले का हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने 23 साल बाद कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार सूचीबद्ध किया है।  इससे शहीद, घायल आंदोलकारियों के साथ ही अस्मत लुटा चुकी महिलाओं को न्याय की उम्मीद जगी है।

मामले की सुनवाई करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने राज्य आंदोलन के दौरान एक अक्टूबर 1994 की रात राज्य आंदोलनकारियों और महिलाओं के साथ हुई बर्बरता के मामले में सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड सरकार से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के आदेश पारित किए हैं। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को याचिका में पक्षकार बनाते हुए पूछा है इस मामले के जिम्मेदार पुलिस व प्रशासनिक अफसरों पर क्या कार्रवाई हुई और तमाम अदालतों में रामपुर तिराहा कांड से संबंधित मुकदमों की स्थिति क्या है।

उल्लेखनीय है कि रामपुर तिराहा पर पुलिस ने दिल्‍ली जा रहे उत्‍तराखंड राज्‍य आंदोलनकारियों पर कहर ढाया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट में राज्य आंदोलन के दौरान खटीमा, मसूरी, मुजफ्फरनगर कांड के मामले में पांच-अलग जनहित याचिकाएं दायर की गईं तो सीबीआइ को जांच के आदेश दिए गए। सीबीआइ ने पांच आरोप पत्र सीबीआइ मजिस्ट्रेट मुजफ्फरनगर, दो सीबीआइ जज मुजफ्फरनगर तथा पांच सीबीआइ देहरादून में दाखिल किए। इसमें आरोपी तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह, आइजी नसीम, डीआइजी बुआ सिंह तथा दो दर्जन अन्य पुलिस अफसर शामिल थे। छह अप्रैल 1996 को देहरादून में सीबीआइ ने पांच केस दर्ज किए। इसमें डीएम अनंत कुमार सिंह, एसपी राजपाल सिंह, एएसपी एनके मिश्रा, सीओ जगदीश सिंह व सीओ का गनर सुभाष गिरी के खिलाफ धारा-304, 307, 324 व 326 के तहत केस दर्ज किया गया। सीबीआइ देहरादून ने 22 अप्रैल 1996 को इस मुकदमे में हत्या की धारा जोड़ दी। छह मई को पांचों आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद निजी मुचलके में रिहा कर दिया गया। राज्य आंदोलन में खटीमा, मसूरी, मुजफ्फरनगर व अन्य स्थानों पर 35 आंदोलनकारियों ने शहादत दी थी।

अब तक यह है मामले की स्थिति :

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  • 20 वर्ष पूर्व बेकाबू आरएएफ की गोलियों ने आज बरपाया था कहर, प्रताप सिंह हुआ था शहीद
  • राम देव, देवेंद्र व राम सिंह को भी लगी थीं गोलियां
  • कूड़ेदान से सटाकर बनाया गया शहीद स्मारक
नवीन जोशी, नैनीताल। वह 20 वर्ष पूर्व तीन अक्टूबर 1994 का दिन था, जिसे याद कर आज भी नैनीताल वासियों की रूहें कांप जाती हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती के अगले ही दिन बेकाबू, बदहवास हुऐ रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने अमानवीयता और हिंसा का यहां नंगा नाच किया था। आरएएफ की गोलियों से एक आंदोलनकारी प्रताप सिंह शहीद हो गया, जबकि तीन अन्य लोग रामदेव, देवेंद्र व राम सिंह गोलियों से गंभीर घायल रूप से घायल हुए। लेकिन अफसोस कि आज तक आंदोलनकारियों की मांग के अनुरूप मामले की सीबीआई जांच में दोषी पाये गये शहीद के हत्यारों को कोई सजा मिली। बमुश्किल बीते वर्ष चिड़ियाघर रोड पर शहीद स्मारक बना भी है तो शहीदों को मुंह चिढ़ाते हुऐ बिल्कुल कूड़ा घर से सटा कर बनाया गया। कूड़ा घर यहां से कब हटेगा, यह बड़ा यक्ष प्रश्न है।

(पृथक उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल में शहीद हुए प्रताप सिंह का परिवार)
(पृथक उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल में शहीद हुए प्रताप सिंह का परिवार)

दो अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा और मुजफ्फरनगर में दिल्ली कूच करते राज्य आंदोलनकारियों के साथ हुऐ पुलिस के दुव्र्यवहार की खबर जैसे ही नैनीताल पहुंची थी, लोग आक्रोशित हो सड़कों पर उतर पड़े थे। नगर में आरएएफ की उपस्थिति ने माहौल को बेहद तनाव पूर्ण बना दिया था। दोपहर बाद ढाई बजे तल्लीताल डांठ पर लोग पुलिस के दमन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। एक ओर रैफ, और दूसरी ओर तीन चार सौ प्रदर्शनकारी। रैफ ने उकसाया तो प्रदर्शनकारियों ने पथराव से इसका जवाब दिया। फिर दोनों ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। रैफ ने रबर की गोलियां भीड़ की ओर चलाईं। यहां तक तो ठीक था, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसे नगर के डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में नगरवासियों ने अपनी सुरक्षा के लिए तैनात सिपाहियों को करते पहली बार देखा। अचानक रैफ ने हवा में गोलियां दागनीं प्रारंभ कर दीं। इस पर भीड़ तितर-बितर हो गई, लेकिन फौजी बूट अराजक होकर मानवता को कुचलते चले गऐ। जवान कई किमी तक नगर में आंदोलनकारियों के पीछे जानवरों की तरह दौड़े। महिलाओं, छात्रों को घरों से निकाल-निकाल कर मारा गया। घटनास्थल से करीब एक किमी दूर और डेढ़ घंटे बाद चिडि़याघर रोड पर अल्मोड़ा जनपद के मिरौली ग्राम निवासी 33 वर्षीय होटल कर्मी प्रताप सिंह को रैफ के दरिंदों ने गोली मार दी। शहीद के खून से लतपथ शरीर को जीवन बचाने की प्रत्याशा में प्रशांत होटल के स्वामी अतुल साह नजदीकी जिला अस्पताल लेकर दौड़े। उधर तीन किमी दूर मल्लीताल में पोस्ट आफिस रोड व अन्य जगह राम देव, देवेंद्र व राम सिंह को गोलियां लगीं। इसके बाद जनांदोलन और तेज हुआ, जिसके दबाव में सरकार मामले की सीबीआई जांच कराने को मजबूर हुई, लेकिन जांच बेनतीजा समाप्त हुई। कारण हर व्यक्ति जहां आंदोलनकारी था, वहीं नेतृत्वकारी नेता एक भी नहीं था। सीबीआई के अफसरों के समक्ष किसी भी व्यक्ति ने गवाही नहीं दी, और शहीद के हत्यारे आजाद घूमते रहे। तब से आज तक चिडि़याघर रोड पर तमाम नेताओं के आश्वासनों के बाद ‘कूड़ेदान” से सटे और इसी तिथि को पुतने वाले शहीद स्थल पर आज सुबह से ही शहीद को श्रद्धांजलि देने वालों का मेला लगता है। इस वर्ष शहीद स्थल पर शहीद स्मारक भी स्थापित कर दिया गया, लेकिन गंदगी से बजबजाता कूड़ेदान नहीं हटाया गया है।

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दो अक्टूबर: विश्व के लिए अहिंसा दिवस, देश के लिए गाँधी जयंती, पर उत्तराखंड के लिए ‘काला दिन’

-उत्तराखंड आंदोलन के दौरान इस दिन छह शहीद, 60 से अधिक हुए थे घायल, कई महिलाओं को गंवानी पड़ी थी अस्मत

नवीन जोशी, नैनीताल। दो अक्टूबर का दिन जहां देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी की 150वीं जयंती के रूप में एवं दुनिया में विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जा रहा  है, वहीं उत्तराखंड राज्य इससे इतर इस दिन को ‘काले दिन’ के रूप में मनाता है। इस दिन से उत्तराखंड वासियों की बेहद काली व डरावनी यादें जुड़ी हुई हैं। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान इस दिन छह आंदोलनकारी शहीद हुए थे, जबकि 60 से अधिक घायल हुए थे, और कई महिलाओं को अपनी अस्मत गंवानी पड़ी थी।उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दो अक्टूबर 1994 को राज्य आंदोलनकारियों ने दिल्ली कूच का ऐलान किया था। लाल किले के पीछे स्थित पुराने किले के मैदान में राज्य आंदोलनकारियों को आमंत्रित किया गया था। सभा में केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजेश पायलट सहित कई वरिष्ठ नेताओं के आने और सरकार की ओर से उत्तराखंड राज्य का गठन किए जाने की घोषणा होने की चर्चा थी। इसलिए पूरे प्रदेश से उत्तराखंडी बसों के जत्थों के जत्थों में एक अक्टूबर को रवाना हो गए थे। लेकिन यूपी की मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सपा सरकार इससे खार खाई थी। उनकी कोशिश थी-उत्तराखंडी दिल्ली न पहुंच पाएं। इसी कोशिश में कुमाऊं से दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुरादाबाद और गढ़वाल की ओर से आ रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर से पहले पड़ने वाले नारसन चौराहे व रामपुर तिराहे पर तलाशी के बहाने रोका गया। इसी दौरान यूपी की रक्षक कही जाने वाली पुलिस बेकाबू हो कर मानो भक्षक बन गई और फिर वह हुआ, जिसे उत्तराखंड के इतिहास में सबसे काले दिन और जलियावाला कांड की संज्ञा दी जाती है। इस घटना में देहरादून के नेहरू कालोनी के रविंद्र रावत उर्फ पोलू, भाववाला के सतेंद्र चौहान, बद्रीपुर निवासी गिरीश भद्री, अजबपुर निवासी राजेश लखेड़ा, ऋषिकेश के सूर्यप्रकाश थपलियाल और उखीमठ रुद्रप्रयाग निवासी अशोक केशिव शहीद हुए जबकि पांच दर्जन से अधिक लोग घायल हुए और अनेक महिलाओं की अस्मत पर हमला हुआ।

एक सितंबर से ही हिंसक हो उठा था उत्तराखंड आंदोलन

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि दो अक्टूबर से पूर्व पृथक उत्तराखण्ड राज्य का आन्दोलन पहली बार एक सितम्बर 1994 को तब हिंसक हो उठा था, जब खटीमा में स्थानीय लोग राज्य की मांग पर शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे थे। जलियांवाला बाग की घटना से भी अधिक वीभत्स कृत्य करते हुए तत्कालीन यूपी की अपनी सरकार ने केवल घंटे भर के जुलूस के दौरान जल्दबाजी और गैरजिम्मेदाराना तरीके से जुलूस पर गोलियां चला दीं, जिसमें सर्वधर्म के प्रतीक प्रताप सिंह, भुवन सिंह, सलीम और परमजीत सिंह शहीद हो गए। यहीं नहीं उनकी लाशें भी सम्भवतया इतिहास में पहली बार परिजनों को सौंपने की बजाय पुलिस ने ‘बुक’ कर दीं। यह राज्य आन्दोलन का पहला शहीदी दिवस था। इसके ठीक एक दिन बाद मसूरी में यही कहानी दोहराई गई, जिसमें महिला आन्दोलनकारियों हंसा धनाई व बेलमती चौहान के अलावा अन्य चार लोग राम सिंह बंगारी, धनपत सिंह, मदन मोहन ममंगई तथा बलबीर सिंह शहीद हुए। एक पुलिस अधिकारी उमा शंकर त्रिपाठी को भी जान गंवानी पड़ी। इससे यहां नैनीताल में भी आन्दोलन उग्र हो उठा। यहां प्रतिदिन शाम को आन्दोलनात्मक गतिविधियों को ‘नैनीताल बुलेटिन” जारी होने लगा। नैनीताल में दो अक्टूबर के कांड के प्रतिरोध में तीन अक्टूबर 1994 को विरोध जता रहे लोगों पर रैपिड एक्शन चढ़ बैठी, और एक होटल कर्मी प्रताप सिंह बेमौत मारा गया। उनका शहीदी दिवस यहां हर वर्ष तीन अक्टूबर को चिड़ियाघर रोड स्थित शहीद स्थल में मनाया जाता है।

कुमाऊं से जुडी गाँधी जी की यादें

Mahatma Gandhi’s Anasakti Ashram, Kausani (Bageshwar)

नैनीताल एवं कुमाऊं के लोग इस बात पर फख्र कर सकते हैं कि महात्मा गांधी जी ने यहां अपने जीवन के 21 खास दिन बिताऐ थे। वह अपने इस खास प्रवास के दौरान 13 जून 1929 से तीन जुलाई तक 21 दिन के कुमाऊं प्रवास पर रहे थे। इस दौरान वह 14 जून को नैनीताल, 15 को भवाली, 16 को ताड़ीखेत तथा इसके बाद 18 को अल्मोड़ा, बागेश्वर व कौसानी होते हुए हरिद्वार, दून व मसूरी गए थे, और इस दौरान उन्होंने यहां 26 जनसभाएं की थीं। कुमाऊं के लोगों ने भी अपने प्यारे बापू को उनके ‘हरिजन उद्धार’ के मिशन के लिए 24 हजार रुपए दान एकत्र कर दिये थे। तब इतनी धनराशि आज के करोड़ों रुपऐ से भी अधिक थी। इस पर गदगद् गांधीजी ने कहा था विपन्न आर्थिक स्थिति के बावजूद कुमाऊं के लोगों ने उन्हें जो मान और सम्मान दिया है, यह उनके जीवन की अमूल्य पूंजी होगी। 14 जून का नैनीताल में सभा के दौरान उन्होंने निकटवर्ती ताकुला गांव में स्व. गोबिन्द लाल साह के मोती भवन में रात्रि विश्राम किया था। इस स्थान पर उन्होंने गांधी आश्रम की स्थापना की, यहाँ आज भी उनकी कई यादें संग्रहीत हैं। इसी दिन शाम और 15 को पुनः उन्होंने नैनीताल में सभा की। यहाँ उन्होंने कहा, ‘‘मैंने आप लोगों के कष्टों की गाथा यहां आने से पहले से सुन रखी थी। किंतु उसका उपाय तो आप लोगों के हाथ में है। यह उपाय है आत्म शुद्धि।’’ यह भाषण उन्होंने ताड़ीखेत में भी दिया था। 15 को ही उन्होंने भवाली में भी सभा कर खादी अपनाने पर जोर दिया। 16 को वह ताड़ीखेत के प्रेम विद्यालय पहुंचे और वहां भी एक बड़ी सभा में आत्म शुद्धि व खादी का संदेश दिया। 18 को वह अल्मोड़ा पहुंचे, जहां नगर पालिका की ओर से उन्हें सम्मान पत्र दिया गया। इसके बाद उन्होंने 15 दिन कौसानी में बिताए। कौसानी की खूबसूरती से मुग्ध होकर उसे भारत का स्विट्जरलैंड नाम दिया। 22 जून को कुली उतार आन्दोलन में अग्रणी रहे बागेश्वर का भ्रमण किया। यहां स्वतन्त्रता सेनानी शांति लाल त्रिवेद्वी, बद्रीदत्त पांडे, देवदास गांधी, देवकीनदंन पांडे व मोहन जोशी से मंत्रणा की। 15 दिन प्रवास के दौरान उन्होंने कौसानी में गीता का अनुवाद भी किया। गांधी जी दूसरी बार 18 जून 1931 को नैनीताल पहुंचे और पांच दिन के प्रवास के दौरान उन्होंने कई सभाएं की। इस दौरान उन्होंने संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर मेलकम हैली से राजभवन में मुलाकात कर जनता की समस्याओं का निराकरण कराया। उनसे प्रांत के जमीदार व ताल्लुकेदारों ने भी मुलाकात की और गांधी के समक्ष अपना पक्ष रखा। इस यात्रा के बाद उत्तर प्रदेश व कुमाऊं में आन्दोलन तेज हो गया।

राज्य आंदोलन में उत्तराखंड के शहीद

मसूरी काण्ड के शहीद

मसूरी काण्ड के शहीद

खटीमा काण्ड के शहीद
खटीमा काण्ड के शहीद

नैनीताल। एक सितम्बर 1994 का दिन राज्य आंदोलन का पहला शहीदी दिवस साबित हुआ। इस दिन खटीमा में शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों पर यूपी पुलिस द्वारा चलाई गई गोलियों से भगवान सिंह सिरौला, प्रताप सिंह, सलीम अहमद, गोपीचन्द, धर्मानन्द भट्ट, परमजीत सिंह, रामपाल शहीद हुए, वहीं दो अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा व मुजफ्फरनगर के काले कांडों के विरोध में अगले दिन यानी तीन अक्टूबर को हो रहे प्रदर्शन के दौरान नैनीताल में एक 33 वर्षीय होटलकर्मी प्रताप सिंह शहीद हुए।

उत्तराखंड : सर्वप्रथम 1897 में उठी थी अलग राज्य की मांग

दो अक्टूबर 1994 को दिल्ली रैली में उमड़ा राज्य आन्दोलनकारियों का रेला, काशी सिंह ऐरी (लाल घेरे में)

-एक शताब्दी से अधिक लम्बे संघर्ष से नसीब हुआ उत्तराखंड राज्य

-सर्वप्रथम 1897 में इंग्लेंड की महारानी विक्टोरिया के समक्ष रखी गई थी कुमाऊं को प्रांत का दर्जा देने की मांग

नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य में पृथक राज्य की मांग एक सदी से भी अधिक पुरानी थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सर्वप्रथम जून 1897 में रानी विक्टोरिया को शर्तें याद दिलाते हुए तत्कालीन ब्रिटिश कुमाऊं (जिसमें प्रदेश के वर्तमान गढ़वाल मंडल का भी अलकनंदा नदी के पूर्वी ओर का पूरा सहित तत्कालीन टिहरी रियासत को छोड़कर अधिकांश क्षेत्र शामिल था) को अलग प्रान्त के रूप में रखने को प्रत्यावेदन भेजा था। हरी दत्त पांडे, ज्याला दत्त जोशी, रायबहादुर बद्री दत्त जोशी, रायबहादुर दुर्गा दत्त जोशी (जज)व गोपाल दत्त जोशी द्वारा इंग्लेंड की महारानी विक्टोरिया को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को जीता नहीं था, वरन 1815 में स्वयं अपनी मर्जी से अपने आप को ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण में रखा था, इसलिए उनकी वफादारी के बदले उनकी मातृभूमि को अलग प्रांत का दर्जा दें।

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राष्ट्रीय सहारा 2 अक्टूबर 2015 (पेज-1)

आगे दूूसरा प्रयास 1916 में उत्तराखंड की प्रथम संस्था-कुमाऊं परिषद के गठन के रूप में हुआ। इसके बाद तीसरा प्रयास सात नवंबर 1929 को हुआ, जब राजा आनंद सिंह, त्रिलोक सिंह रौतेला, ठाकुर जंग बहादुर बिष्ट, एफ रिच, डेनियल पंत, गोविंद लाल साह, नित्यानंद जोशी, खुशाल सिंह, उत्तम सिंह रावत व हाजी नियाज मोहम्मत आदि कई लोगों ने तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर से भेंट कर ज्ञापन सोंपा और कुमाऊं के प्राचीन समय से एक पृथक इकाई होने और उसे विशेषाधिकार मिले होने का हवाला देते हुए पृथक राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता देने, ब्रिटिश संसद के लिए कुमाउनीं प्रतिनिधियों को सम्मिलित कर उन्हें अलग संविधान देने के लिए एक समिति का गठन करने आदि की मांगें कीं। इस पर गवर्नर ने उन्हें साइमन कमीशन के समक्ष अपना पक्ष रखने की सलाह दी।

जंतर-मंतर दिल्ली में उत्तराखंड आन्दोलनकारी

आगे 1938 में प्रदेश के बुद्धिजीवियों में गढ़वाल मंडल की ओर से भी यह मांग उठनी शुरू हुई। इसी साल 5-6 मई को कांग्रेस के श्रीनगर सम्मेलन में प्रथक प्रशासनिक व्यवस्था की मांग की गई। इस सम्मलेन में प्रताप सिह नेगी, जवाहर लाल नेहरू और विजयलक्ष्मी पंडित भी शामिल हुए थे। सम्मेलन में स्थानीय जनता की मांग को देखकर जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी विशेष परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करने का अधिकार मिलना चाहिए।’वहीं आजादी मिलने की सुगबुगाहट के बीच तत्कालीन संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री (प्रधानमंत्री) गोविंद बल्लभ पंत (भारत रत्न) ने पहले 1946 में हल्द्वानी में हुए सम्मेलन में और आगे आजादी के बाद 1952 में जब राज्यों के पुर्नगठन के लिए पणिकर आयोग के अध्यक्ष केएम पणिकर ने उत्तराखंड राज्य की मांग का समर्थन किया था, किन्तु स्वर्गीय पंत ने पर्वतीय क्षेत्र में एक राज्य के लिए जरूरी संसाधनों व रोजगार के साधनों की कमी बताकर इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया था। वर्तमान कुमाऊं कमिश्नर अवनेंद्र सिंह नयाल के पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इंद्र सिंह नयाल ने इस तथ्य का जिक्र अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में कुमाऊं का योगदान’ में किया है। आगे भाकपा के सचिव कॉमरेड पीसी जोशी ने 1952 में भारत सरकार को पृथक पर्वतीय राज्य के गठन के लिए एक ज्ञापन भेजकर यह मांग प्रमुखता से उठाई थी। इसके साथ ही यह मांग मुखर होने लगी थी। पेशावर कांड के नायक और स्वतंत्रता सेनानी चंद्र सिह गढ़वाली ने भी पीएम जवाहर लाल नेहरू को राज्य की मांग का ज्ञापन दिया। 22 मई 1955 को नई दिल्ली में पर्वतीय जन विकास समिति की आम सभा में उत्तराखंड क्षेत्र को प्रस्तावित हिमाचल में मिलाने की मांग की।

जंतर-मंतर दिल्ली में उत्तराखंड आन्दोलनकारी

1956 में पृथक हिमाचल बनाने की राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा ठुकराने के बाद भी तत्कालीन गृह मंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर हिमाचल की मांग को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया, किंतु उत्तराखंड के बारे में कुछ नहीं किया। इस पर अगस्त 1966 में पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने पुनः पीएम को अलग राज्य की मांग का ज्ञापन भेजा। 10-11 जून 1966 को जगमोहन सिंह नेगी एवं चंद्रभानु गुप्त की अगुवाई में रामनगर में आयोजित कांग्रेस के सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए पृथक प्रशासनिक आयोग का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, तथा 24-25 जून को नैनीताल में दयाकृष्ण पांडेय की अध्यक्षता में ऋषिबल्लभ सुन्दरियाल, गोविंद सिंह मेहरा आदि को शामिल करते हुए आठ पर्वतीय जिलों के ‘पर्वतीय राज्य परिषद’ का गठन किया गया। इसी वर्ष दिल्ली के बोट क्लब में इस मांग के लिए ऋषि बल्लभ सुंदरियाल ने प्रवासियों को साथ लेकर प्रदर्शन किया। इसी वर्ष 14-15 अक्टूबर को दिल्ली में उत्तराखंड विकास संगोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसका उदघाटन तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अशोक मेहता ने किया। इसमें सांसद एवं टिहरी नरेश मानवेंद्र शाह ने इस क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केंद्र शासित प्रदेश की मांग की।  

1968 में लोकसभा में सांसद शाह के प्रस्ताव के आधार पर योजना आयोग ने पर्वतीय नियोजन प्रकोष्ठ खोला। 12 मई 1970 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान प्राथमिकता से करने की घोषणा की। 1971 में मानवेंद्र शाह, नरेंद्र सिंह बिष्ट, इंद्रमणि बड़ोनी और लक्ष्मण सिंह ने अलग राज्य के लिए कई जगह आंदोलन किए। 1972 में ऋषिबल्लभ सुंदरियाल व पूरन सिंह डंगवाल सहित 21 लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर वोट क्लब पर गिरफ़्तारी दी।23-24 अक्टूबर 1971 में प्रताप बिष्ट ने उत्तराखंड वासियों से आजादी के लिए दी गई जीवन की कुर्बानी की तर्ज पर आर्थिक आजादी के लिए कुर्बानी देने का आह्वान किया। 1973 में ‘पर्वतीय राज्य परिषद’ का नाम ‘उत्तराखंड राज्य परिषद’ किया गया। सांसद प्रताप सिंह बिष्ट अध्यक्ष, मोहन उप्रेती, नारायण सुंदरियाल इसके सदस्य बने। 1978 में चमोली के विधायक प्रताप सिंह की अगुवाई में बदरीनाथ से दिल्ली वोट क्लब तक पदयात्रा और संसद का घेराव का प्रयास किया गया। दिसंबर 1978 में राष्ट्रपति को ज्ञापन देते समय 19 महिलाओं सहित 71 लोगों को तिहाड़ भेजा गया। 1979 में सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में उत्तराखंड राज्य परिषद का गठन करके 31 जनवरी को दिल्ली में 15 हजार से भी अधिक लोगों ने पृथक राज्य के लिये मार्च किया। आगे 24-25 जुलाई 1979 में 24-15 जुलाई 1979 को मंसूरी में  ‘पर्वतीय जन विकास सम्मेलन’ में इसी मांग पर प्रदेश के पहले क्षेत्रीय दल-उत्तराखंड क्रांति दल का जन्म हुआ। 1980 में यूकेडी ने घोषणा की कि उत्तराखंड भारतीय संघ का एक शोषण विहीन, वर्ग विहीन और धर्म निरपेक्ष राज्य होगा। मई 1982 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने बद्रीनाथ मे यूकेडी के प्रतिनिधि मंडल के साथ 45 मिनट बातचीत की। 20 जून 1983 को दिल्ली में चौधरी चरण सिंह ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उत्तराखंड की मांग राष्ट्र हित में नही है। सितंबर-अक्टूबर 1984 में आल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ने पर्वतीय राज्य के मांग को लेकर गढ़वाल क्षेत्र में 900 किमी. साइकिल यात्रा की। 23 अप्रैल को उक्रांद ने पीएम राजीव गांधी के नैनीताल आगमन पर पृथक राज्य के समर्थन में प्रदर्शन किया। 1987 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अटल विहारी वाजपेयी ने उत्तराखण्ड राज्य की मांग को पृथकतावादी करार दिया। नौ अगस्त को वोट क्लब पर अखिल भारतीय प्रवासी उक्रांद ने सांकेतिक भूख हड़ताल की और पीएम को ज्ञापन दिया। 23 नवंबर को युवा नेता धीरेंद्र प्रताप भदोला ने लोकसभा में दर्शक दीर्घा में राज्य निर्माण के समर्थन में नारेबाजी की। 23 फरवरी 1988 को अनेक लोगों ने असहयोग आंदोलन किया और गिरफ़्तारियां दी। 21 जून को अल्मोड़ा में ‘नए भारत में नया उत्तराखंड’ नारे के साथ ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन हुआ। 23 अक्टूबर को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हिमालयन कार रैली का उत्तराखंड समर्थकों ने विरोध किया, जिस पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया। 17 नवंबर को पिथौरागढ़ में नारायण आश्रम से देहारादून तक पैदल यात्रा हुई। 1989 में यूपी के सीएम मुलायम सिह यादव ने उत्तराखंड को यूपी का ताज बता कर अलग राज्य बनाने से इंकार किया। लेकिन अलग राज्य के लिए दबाव बनता देख 10 अप्रैल 1990 को दिल्ली के वोट क्लब पर उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के तत्वावधान में भाजपा ने उत्तराखण्ड के समर्थन में रैली की, और 30 अगस्त 1991 को कांग्रेस नेताओं ने ‘वृहद उत्तराखंड’ राज्य बनाने का नया शिगूफा छोड़ा। इसी साल यूपी की भाजपा सरकार ने प्रथक राज्य संबंधी प्रस्ताव संस्तुति के साथ केंद्र को भेजा तो भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी पृथक राज्य का वायदा किया। इसी साल दिसंबर  1991 में एनडी तिवारी ने राज्य की मांग का विरोध करते हुए कथित तौर पर कहा कि ‘उत्तराखण्ड उनकी लाश पर बनेगा’ । इधर भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के उत्तर प्रदेश सम्मेलन में राज्य की मांग का समर्थन किया गया। सम्मेलन की समाप्ति पर सांसद डा० जयन्त रैंगती ने कहा ‘छोटे और कमजोर समूहों को राजनैतिक सत्ता में भागीदार बनाने का काम कभी पूरा नहीं किया गया’। इसी दौरान यूपी की भाजपानीत कल्याण सिंह सरकार ने केंद्र सरकार को याद दिलाया कि राज्य की मांग स्वीकार न होने से कारण पर्वतीय क्षेत्र की जनता में असंतोष पनप रहा है। मार्च 1992 में एनडी तिवारी ने राज्य का पुन: विरोध किया। 27 मार्च 1992 को मुक्ति मोर्चा ने बंद का आहवान किया और 30 अप्रैल को उत्तरांचल संघर्ष समिति ने जंतर मंतर पर रैली निकाली। पांच अगस्त 1993 को लोकसभा में उत्तराखंड राज्य के मुद्दे पर मतदान हुआ तो 98 सदस्यों ने पक्ष में और 152 ने विपक्ष में मतदान किया। 23 नवंबर 1993 को ‘उत्तराखण्ड जनमोर्चा’ का गठन हुआ। इसमें जगदीश नेगी, देब सिंह रावत, राजपाल बिष्ट व बीडी थपलियाल आदि शामिल थे। 1993 में हुए यूपी विधानसभा के मध्यावधि चुनावों में विजयी हुए मुलायम सिंह यादव ने पृथक उत्तराखंड की मांग का जायज बताते हुए 21 जून को अपने मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में उत्तराखंड राज्य गठन का खाका खींचने के लिए एक उपसमिति गठित की, जिसने पांच मई 1994 को पेश की गई अपनी 356 पेज की रिपोर्ट में आठ पर्वतीय जनपदों को मिलाकर एक पृथक उत्तराखंड राज्य बनाने और गैरसेंण को प्रस्तावित उत्तराखंड प्रदेश की राजधानी के रूप में प्रस्तुत किया। 24 अप्रैल 1994 को दिल्ली के पूर्व निगमायुक्त बहादुर राम टम्टा के नेतृत्व में रामलीला मैदान से संसद मार्ग थाने तक विशाल प्रदर्शन किया गया। किंतु इसी बीच मुलायम सरकार द्वारा 11 दिसंबर 1993 को शासकीय सेवाओं में ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के लिए 27 फीसद आरक्षण देने की व्यवस्था लागू करने का उत्तराखंड में इस आधार पर भारी विरोध हुआ कि यहां इन जातियों की आबादी मात्र डेढ़ फीसद थी। इस आंदोलन ने निरंतर व्यापक होते हुए आगे निर्णायक उत्तराखंड आंदोलन का स्वरूप ग्रहण किया, और इसके परिणामस्वरूप 22 जून 1994 को मुलायम सरकार ने उत्तराखंड के लिए अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त करने की घोषणा की। 11 जुलाई को पौड़ी में उक्रांद ने प्रदर्शन करके 791 लोगों ने गिरफ़्तारी दी। दो अगस्त को पौड़ी में वयोवृद्ध नेता इंद्रमणि बड़ोनी के नेतृत्व में आमरण अनशन शुरु किया गया। 7-8 और नौ अगस्त को पुलिस का लाठी चार्ज के साथ ही पूरे उत्तराखंड में प्रखर राज्य जनांदोलन का बिगुल बज गया। 10 अगस्त को श्रीनगर में ‘उत्तराखण्ड छात्र संघर्ष समिति’ का गठन हुआ और 16 अगस्त को संसद एवं जंतर-मंतर पर आंदोलनकारी संगठनों का धरना शुरू हुआ, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तमाम आंदोलनकारी संगठन जुड़े। 24 अगस्त-94 को यूपी विधानसभा में दूसरी बार अलग राज्य का प्रस्ताव पारित हुआ। इसी बीच छात्र नेता मोहन पाठक और मनमोहन तिवारी ने राज्य के समर्थन में नारेबाजी करते हुए संसद में छलांग लगाई। 30 अगस्त को पूरे देश से आए हजारों उत्तराखंडियों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया।, जिस पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। दो सितंबर 1994 को खटीमा में जुलूस निकाल रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने फ़ायरिंग की, यह उत्तराखण्ड आन्दोलन का पहला गोलीकांड था। इसमें आठ आंदोलनकारी शहीद हुए, और हल्द्वानी और खटीमा में कर्फ़्यू लगा। दो सितंबर को मसूरी में आंदोलनकारियों पर पुलिसिया कहर बरपा, जिसमें पुलिस उपाधीक्षक सहित आठ आंदोलनकारी शहीद हो गए। इसके विरोध में दिल्ली सहित पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया। आठ सितंबर को छात्रों के आहवान पर 48 घंटे उत्तराखंड बंद रहा। 20 सितंबर को ‘पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन’ के बैनर तले राज्य कर्मचारी बेमियादी हड़ताल पर चले गए। दो अक्टूबर 1994 को लाल किले के पीछे के मैदान में आयोजित रैली के लिए लाखों उत्तराखंडी शांतिपूर्वक दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे। यूपी पुलिस ने इस दौरान मुजफ्फरनगर व रामपुर तिराहा में महिलाओं के साथ हुए अमानवीय दुर्व्यवहार किया। यहां आठ आंदोलनकारी शहीद हुए। पुलिस की बर्बरता से समूचे उत्तराखंड में व्यापक आक्रोश फ़ैल गया। घिनौनी करतूत पर शर्मिंदा होने की बजाय यूपी पुलिस ने फ़िर तांडव किया। देहरादून और कोटद्वार मे दो-दो और नैनीताल में एक आंदोलनकारी प्रताप सिंह शहीद हुए।

स्व. मैनाली लाल घेरे में

इस पर नैनीताल में माधवानंद मैनाली (देहावसान 20 सितम्बर 2017) के नेतृत्व में ही ‘नागरिक संघर्ष समिति’ के बैनर तले 54 दिनों तक लंबा धरना कार्यक्रम चला। उधर 13 अक्टूबर को आंदोलन के चलते देहरादून में कर्फ़्यू लगा दिया गया। यहीं पर एक और आंदोलनकारी ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अक्टूबर में सतपाल महाराज ने ’संयुक्त संघर्ष समिति’ के संरक्षक के रूप में बद्रीनाथ से नारसन तक जनजागरण पदयात्रा की। सात दिसंबर को बीसी खंडूड़ी के नेतृत्व में लालकिला मैदान पर भाजपा की रैली में अटल विहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती व कल्याण सिंह आदि ने भी शिरकत की। उत्तराखंड आंदोलन संचालन समिति के आहवान पर संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान जेल भरो आंदोलन में 4612 लोगों ने गिरफ़्तारी दी। 22 दिसंबर को हड़ताली कर्मचारी ‘काम के साथ संघर्ष’ का नारा देते हुए काम पर लौटे, जबकि छात्रों ने ‘पढाई के साथ लड़ाई’ का नारा बुलंद किया। 25 फरवरी 1995 को प्रमुख आंदोलनकारी संगठनों का दो दिवसीय प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन जवाहरलाल नेहरू विवि के सिटी सेंटर में डा. कर्ण सिंह के उदघाटन संबोधन के साथ शुरू हुआ। 23 मार्च को शहीद भगत सिंह आजाद के शहादत दिवस पर  ले.जन. गजेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व में पूर्व सैन्य अधिकारियों व पूर्व सैनिकों ने अन्य आंदोलनकारियों के साथ मिलकर विशाल प्रदर्शन किया। 30 दिसंबर को मुजफ़्फ़रनगर कांड के अपराधियों को तत्काल दंडित करने की मांग को लेकरसैकड़ों महिलाओं ने गृह मंत्री के आवास पर प्रदर्शन किया। आठ अक्टूबर को अलकनंदा की जलधारा के बीच स्थित श्रीयंत्र टापू पर यूकेडी (डंगवाल) ने आमरण अनशन शुरू किया। पांच नवंबर को पुलिस का दमन चक्र फ़िर चला, जिसमें पुलिस ने दो आंदोलनकारियों को अलकनंदा की तेज जलधारा में बहा दिया, साथ ही अनेक आंदोलनकारियों को सहारनपुर जेल भेज दिया गया। 12 अक्टूबर को दिवाकर भट्ट ने खैट पर्वत पर पुन: आमरण अनशन शुरू किया। जनवरी 1996 में केंद्र और आंदोलनकारियों के बीच वार्ता शुरू हुई। 26 जनवरी को दिल्ली के विजय चौक पर परेड के दौरान ही संयुक्त महिला संघर्ष समिति की 44 महिलाओं और 18 नवयुवकों ने संसद की वीआईपी गैलरी में राज्य के समर्थन में जोरदार नारेबाजी की।, इस पर आन्दोलनकारी उषा नेगी को गिरफ़्तार किया गया। परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लालकिले की प्राचीर से उत्तराखंड राज्य बनाने की ऐतिहासिक घोषणा की, अगले साल पीएम इंद्र कुमार गुजराल ने भी लाल किले इस संकल्प को दोहराया। 1998 में अटल बिहारी के नेतृत्त्व वाली भाजपा की गठ्बंधन सरकार ने राष्ट्रपति के माध्यम से उत्तराखंड राज्य संबंधी उत्तर प्रदेश पुर्नगठन विधेयक यूपी विधानसभा को भेजा। इस बीच, दिल्ली में जन्तर मन्तर पर आंदोलनकारियों का धरना जारी था। नौ अगस्त को भारी पुलिस बल ने धावा बोलकर उन्हें भगा दिया। इसपर आंदोलनकारी मंदिर मार्ग पर धरना करने लगे और बाद में पुन: जंतर मंतर पर आ गये। 1999 में कांग्रेस नेता हरीश रावत पहली बार संघर्ष में कूदे। 20 जुलाई 2000 को उत्तर प्रदेश पुर्नगठन विधेयक तत्कालीन अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के द्वारा लोकसभा में पेश किया गया, तथा एक अगस्त को लोकसभा और 10 अगस्त को राज्यसभा ने इसे मंजूरी दी। 15 अगस्त को लालकिले की प्रचीर से पीएम अटल बिहारी ने उत्तराखंड गठन की घोषणा की। 16 अगस्त को जंतर-मंतर पर छह सालों से चल रहे धरने का समापन करने में सभी आंदोलनकारियों, संगठनों और दलों ने भाग लिया। 28 अगस्त को राष्ट्रपति केआर नारायणन ने भी राज्य गठन विधेयक को मंजूरी दे दी। और आखिर नौ नवंबर को ‘उत्तरांचल’ राज्य अस्तित्व में आया, तथा नित्यानंद स्वामी ने पहले मुख्यमंत्री  के रूप में शपथ ली। जनवरी 2007 में एनडी तिवारी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राज्य का नाम ‘उत्तराँचल’ से बदलकर ‘उत्तराखण्ड’ कर लिया।

राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र ही नहीं था शुरुआती याचिका में

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के मामले में शुक्रवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ में एक राय नहीं बनी। ऐसे में इस संबंध में आये दोनों पक्षों को समझना भी एक दिलचस्प कहानी है। खास बात यह भी है कि यह मामला शुरू से राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाले आरक्षण से संबंधित कहा जा रहा है, जबकि खास बात यह है कि मामले में आरक्षण पर सुनवाई ही कई वर्षो के बाद हुई है।इस मामले की शुरुआत 11 अगस्त 2004 को आये उत्तराखंड सरकार के शासनादेश संख्या 1269 से हुई। जिसके आधार पर कम से कम सात दिन जेल में रहे राज्य आंदोलनकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार समूह ‘ग’ व ‘घ’ में सीधी भर्ती से नियुक्तियां दी गयीं। खास बात यह भी थी कि इस शासनादेश में कहीं भी राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र नहीं था, अलबत्ता इसके साथ ही एक अन्य शासनादेश संख्या 1270 भी जारी हुआ था जिसमें उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत सभी सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने का प्राविधान किया गया था।बहरहाल, हल्द्वानी निवासी एक राज्य आंदोलनकारी करुणेश जोशी ने नौकरी की मांग करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। बताया गया है कि करुणेश के पास सरकारी के बजाय निजी चिकित्सक का राज्य आंदोलन के दौरान घायल होने का प्रमाण पत्र था। इसी आधार पर उसे इस शासनादेश का लाभ नहीं मिला था। उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकल पीठ ने शासनादेश संख्या 1269 के बाबत राज्य सरकार की कोई नियमावली न होने की बात कहते हुए इस शासनादेश को असंवैधानिक करार देते हुए करुणोश की याचिका को खारिज कर दिया। इस पर राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में सेवायोजन नियमावली बनाते हुए उसमें शासनादेश संख्या 1269 के प्राविधानों को यथावत रख लिया। इस पर करुणोश ने पुन: उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर अब नियमावली होने का तर्क देते हुए उसे शासनादेश संख्या 1269 के तहत नियुक्ति देने की मांग की। इस बार न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की खंड ने याचिका के साथ ही शासनादेश संख्या 1269 को भी खारिज के साथ ही कर दिया, साथ ही मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले को जनहित याचिका के रूप में लेने एवं राज्य सरकार की नियमावली की वैधानिकता की जांच करने की संस्तुति की। इस पर 26 अगस्त 2013 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति एसके गुप्ता की खंडपीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य आंदोलनकारियों के लिए अंग्रेजी के ‘राउडी’ यानी अराजक तत्व शब्द का प्रयोग किया, साथ ही आगे से राज्य आंदोलनकारियों का आरक्षण देने पर रोक लगा दी। इस बीच एक अप्रैल 2014 को एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने पर भी रोक लगा दी। राज्य आंदोलनकारी एवं अधिवक्ता रमन साह ने वर्ष 2015 में इस शब्द पर आपत्ति जताते हुए और इस शब्द को हटाने और आरक्षण पर आये स्थगनादेश को निरस्त करने की मांग की। उनका कहना था कि राज्य आंदोलनकारी कभी भी अराजक नहीं हुए, उन्होंने सरकारी संपत्तियों को नुकसान भी नही पहुंचाया। इस बीच खंड पीठ में अलग-अलग न्यायाधीशगण आते रहे। आखिर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ ने ‘‘राउडी’ शब्द को हटा दिया, अलबत्ता आरक्षण पर स्थगनादेश और मामले पर सुनवाई जारी रही। साह का कहना था कि राज्य आंदोलनकारी ‘‘पीड़ित’ हैं। उन्होंने राज्य के लिए अनेक शहादतें और माताओं-बहनों के साथ अमानवीय कृत्य झेले हैं। लिहाजा उन्हें संविधान की धारा 16 (4) के तहत तथा इंदिरा सावनी मामले में संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन न करते हुए, यानी अधिकतम 50 फीसद आरक्षण के दायरे में ही जातिगत आरक्षण के इतर, संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत बाढ़, भूस्खलन व दंगा प्रभावित आदि कमजोर वगरे को मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर मिलने वाले आरक्षण की तर्ज पर सामान्य वर्ग के अंतर्गत ही क्षैतिज आधार पर सामाजिक आरक्षण दिया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने गत 18 मार्च को सुनवाई पूरी कर इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था और शुक्रवार को फैसला सुनाया। फैसले में खंडपीठ के दोनों न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने शासनादेश संख्या 1269 की वैधता के संबंध में अलग-अलग फैसले देते हुए मामले को बड़ी पीठ को संदर्भित करने की संस्तुति की। आगे संविधान विशेषज्ञों के अनुसार मामले में मुख्य न्यायाधीश की ओर से इन दो न्यायाधीशों को छोड़कर अन्य तीन अथवा अधिक न्यायाशीशों की खंडपीठ गठित कर मामले की सुनवाई किया जाना तय माना जा रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे

नैनीताल। शुक्रवार को उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद राज्य आंदोलनकारियों ने महेंद्र रावत के नेतृत्व में प्रदेश के महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर से मुलाकात की, एवं उनसे मामले में प्रदेश सरकार की ओर से मजबूती से पक्ष रखने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के संविधान विशेषज्ञ अधिवक्ताओं की सेवा लिये जाने की मांग की। बताया कि महाधिवक्ता ने इस पर अपनी सहमति दे दी है। शिष्टमंडल में कोटद्वार के राज्य आंदोलनकारी क्रांति कुकरेती, देहरादून के सूर्यकांत बमराड़ा व मनोज कुमार तथा खटीमा के भगवान जोशी वे धम्रेद्र बिष्ट आदि शामिल रहे।नैनीताल। मामले में राज्य आंदोलनकारी क्रांति कुकरेती ने कहा मामले में राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण की बात कहे-सुने से शुरू हुई। पहला फैसला राज्य आंदोलनकारियों की सीधी भर्ती से संबंधित आया, किंतु इसकी मीडिया में ब्रीफिंग आरक्षण का जिक्र करते हुए हुई, और मीडिया की सुर्खियां भी आरक्षण पर रोक को लेकर बनीं, और आगे न्यायालय में भी यह मामला राज्य आंदोलनकारियों के आरक्षण से ही संबोधित किया गया।

आरक्षण सबको मिले : पंत

नैनीताल। मामले में एक और पक्षकार भवाली निवासी अधिवक्ता महेश चंद्र पंत का कहना है कि राज्य आंदोलन एक जनांदोलन था। लिहाजा इसमें राज्य की तत्कालीन 75-80 लाख की पूरी जनसंख्या शामिल रही। इसलिये कुछ लोगों को चिन्हित कर राज्य आंदोलनकारी मानने और उन्हें आरक्षण का लाभ देने की कोई तुक नहीं है। इसलिये या तो तत्कालीन पूरी जनता के साथ ही आंदोलन में मदद करने वाले देश-विदेश में रहे हर व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, अथवा किसी को भी नहीं।

पृथक राज्य आंदोलन में महिलाओं की भी रही प्रमुख भूमिका

उत्तराखण्ड आन्दोलन में महिलाओं की उमड़ी भीड़
उत्तराखण्ड आन्दोलन में महिलाओं की उमड़ी भीड़

नैनीताल। पृथक राज्य आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर विस्तृत शोध करने वाली कुमाऊं विश्व विद्यालय के इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डा. सावित्री कैड़ा जंतवाल बताती हैं कि उत्तराखंड आंदोलन के दौरान पुलिस के दमन का शिकार होने वाली पहली महिला के रूप में आंदोलनकारी जगदंबा देवी रतूड़ी का नाम आता है, जिन्हें दो अगस्त 1994 को पौड़ी में आमरण अनशन पर बैठे वयोवृद्ध नेता इंद्रमणि बड़ोनी व उनके साथियों के साथ हुए संघर्ष का विरोध करने पर पुलिस कर्मी द्वारा सड़क पर गिराकर जमकर मारा-पीटा गया। देहरादून में सुशीला बलूनी कचहरी परि‍सर में अनशन पर बैठी, उधर कमला पंत ने प्रगतिशील महिला मंच के द्वारा अन्य महिलाओं के साथ मिल कर एक नारा प्रचलित किया, “आरक्षण का एक इलाज-पृथक राज्य पृथक राज्य”। इस दौरान पुष्पा चौहान सहित कई अन्य महिला आंदोलनकारी को भी पीटा गया और बदसलूकी हुई। इस दौरान  17 अगस्त 1994 को अलग राज्य की मांग लेकर महिलाओं की पहली विशाल रैली निकली, जिस कारण पुष्पलता सिलमान, भुवनेश्वरी देवी, पार्वती नेगी, कमला पंत व निर्मला बिष्ट सहित डेढ़ दर्जन से अधिक महिला आंदोलकारी गिरफ्तार की गईं। इस घटना के विरोध में नैनीताल में 20 अगस्त को आमरण अनशन पर बैठे राज्य आंदोलनकारियों के समर्थन में नैनीताल में पहली बार कुंती वर्मा, देवकी चौनियाल, जानकी देवी व भगवती वर्मा धरने पर बैठीं। उधर दो सितंबर 1994 को खटीमा में हुए प्रथम गोलीकांड के विरोध में मंसूरी में जुलूस निकालने के लिए हंसा धनाई और बेलमती चौहान शहीद हो गईं, जो उत्तराखंड आंदोलन में शहीद होने वाली प्रथम महिला आंदोलनकारी थीं। वहीं दो अक्टूबर 1994 को रात्रि में मुजफ्फरनगर व रामपुर तिराहा में दिल्ली कूच के दौरान अनेक महिला आंदोलनकारी पुलिस के क्रूर व अमानवीय दमनचक्र का शिकार हुईं, जबकि दर्जनों महिलाएं गिरफ्तार हुईं। आगे महिलाओं ने दिसंबर 1994 में राज्य आंदोलन में राज्य आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए डा. धनेश्वरी तोमर के संयोजकत्व में ‘उत्तराखंड महिला मंच’ का गठन किया।

चिपको से रहा है उत्तराखण्ड की महिलाओं के आन्दोलन का इतिहास

गौरा देवी

महिलाएं उत्तराखंड की दैनिक काम-काज से लेकर हर क्षेत्र में धूरी हैं। कदाचित वह पुरुषों के नौकरी हेतु पलायन के बाद पूरे पहाड़ का बोझ अपने ऊपर ढोती हैं। विश्व विख्यात चि‍पको आंदोलन और शराब विरोधी आंदोलनों से उनका आन्दोलनों का इतिहास रहा है। वनों को बचाने हेतु रैणी गांव की एक साधारण परंतु असाधारण साहस वाली महिला ‘गौरा देवी ने 21 मार्च 1974 को अपने गांव के पुरुषों की अनपुस्थिति में जिस सूझबूझ व साहस का परि‍चय दिया, वह चिपको आंदोलन के रूप में इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होने के साथ ही अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। जब उन्होंने व विभाग के कर्मचारि‍यों ने पेड़ों को काटने का वि‍रोध किया और न मानने पर वो तकरीबन 30 अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों पर चि‍पक गई जिससे पेड़ काटने वालों को उल्टे पैर वापस जाना पड़ा। इस घटना के बाद 1975 में गोपेश्‍वर व 1978 में बद्रीनाथ समेत अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने वि‍रोध कर जंगलों को काटने से बचाया।

टिंचरी माई
टिंचरी माई

वहीं उत्तराखंड में शराब के खिलाफ 1962 से आंदोलन की शुरू हुयी। इसके फलस्वरूप 1970 में टि‍हरी तथा पौड़ी में शराब बंद की गई। बाद में 1977 में मोरारजी देसांई की सरकार ने जब शराब पर प्रतिबंध लगया तो शराब माफियाओं द्वारा एक नए तरीके को ईजाद किया और दवाईयों की शीशी में शराब पहुंचाई जाने लगी। 1983 तक आते-आते यहां के युवा व बच्चे भी दवाइयों की शीशियों में शराब पीते देखे गए। जहां सड़क, बिजली, पानी नहीं पहुंचा वहां भी शराब बड़ी सुगमता से पहुंचने लगी। ऐसी स्थिति में महिलाओं ने शराब वि‍रोधी आंदोलन के साथ ही ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन की शुरुआत की। ऐसे में एक माई ने एक शराब व्यापारी की दुकान में टिंचर (स्प्रिट) पिये एक आदमी को दयनीय एवं वीभत्स अवस्था में देखा तो आहत होकर उस शराब की दुकान में आग लगा दी और खुद को कमिश्नर के हवाले कर दिया। उसने कहा ‘मैं हमेशा ऐसा ही कदम उठाऊंगी।’ तब से उन्हें टिंचरी माई के नाम से जाना जाने लगा।

अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड

-अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी थी अस्तित्व की तलाश -सिगौली की संधि में किया गया था उत्तराखंड को अपने परंपरागत कानूनों के साथ अलग इकाई के रूप में माने जाने की शर्तluchacontinua

नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य का गठन बहुत लंबे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। क्षेत्रीय जनता ने अंग्रेजों को 1815 में सिगौली की संधि के साथ इसी शर्त के साथ अपनी जमीन पर पांव रखने दिये थे कि वह उनके परंपरागत कानूनों के साथ उन्हें अलग इकाई के रूप में रखेंगे।ब्रिटिश कुमाऊं के पहले कमिश्नर बने ई गार्डनर के बीच 27 अप्रैल 1815 को हुई सिगौली की संधि में इस भूभाग को अलग प्रशासनिक अधिकार दिये जाने की शर्त रखी गई थी, जिसे अलग पटवारी व्यवस्था जैसे कुछ प्रावधानों के साथ कुछ हद तक मानते हुए अंग्रेजी दौर से ही प्रशासनिक व्यवस्था उनके हक-हकूकों पर पाबंदी लगाती रही। इसी कारण कभी यहां विश्व को वनों के संरक्षण का संदेश देने वाला ‘मैती आंदोलन’ तो कभी देश को नया वन अधिनियम देने वाला ‘वनांदोलन’ लड़ा गया। सितम्बर 1916 में, बाद में स्वतंत्र भारत के दूसरे गृह मंत्री बने गोविन्द बल्लभ पंत, ‘कुमाऊं केसरी’ बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, इंद्र लाल साह, मोहन सिंह दड़मवाल, चन्द्र लाल साह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोला दत्त पांडे व लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि के द्वारा ‘कुमाऊं परिषद्’ की स्थापना की गई, जो कि 1926 में स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए कांग्रेस में समाहित हो गई। 27 नवम्बर 1923 को संयुक्त प्रांत के गवर्नर को ज्ञापन देकर पूर्व की तरह अलग इकाई बनाए रखने की मांग की। आगे वर्ष 1940 में कांग्रेस के हल्द्वानी सम्मेलन में बद्री दत्त पांडे ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमाऊं-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन करने की मांगें रखीं। 1952 में सीपीआई नेता कामरेड पीसी जोशी ने अलग राज्य की मांग उठाई। 1954 में विधान परिषद के सदस्य इंद्र सिंह नयाल (वर्तमान कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल के पिता) ने यूपी के मुख्यमंत्री बने गोविंद बल्लभ पंत के समक्ष विधान परिषद में पर्वतीय क्षेत्र के लिए पृथक विकास योजना बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसके फलस्वरूप 1955 में फजल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की। वर्ष 1973 से यूपी में उत्तराखंडवासियों को कुछ दिलासा देने को पर्वतीय विकास विभाग का गठन कर दिया गया, लेकिन बात नहीं बनी। 24 जुलाई 1979 को पृथक राज्य के गठन के लिए मसूरी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के भौतिकी वैज्ञानिक एवं गांधीवादी विचारक कुमाऊं विवि के कुलपति डा. डीडी पंत की अगुवाई में हुई बुद्धिजीवियों की बैठक में उत्तराखंड क्रांति दल नाम से राजनीतिक दल का गठन किया गया। नवम्बर 1987 में पृथक राज्य के गठन के लिए नई दिल्ली में प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में सम्मिलित करने की मांग की गई। आगे 1994 में यूपी में अन्य पिछड़ी जातियों को 27 फीसद आरक्षण देने के विरोध में सुलगे आरक्षण आंदोलन की चिनगारी राज्य आंदोलन की मशाल बन उठी। इस आंदोलन के छह वर्ष बाद उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया। राज्य गठन के बाद इन 14 वर्षो में प्रदेश अपनी स्थायी राजधानी भी तय नहीं कर पाया। कुछ हुआ तो पहाड़, मैदान के बीच की खाई और अधिक चौड़ी हुई। सारे उद्योग-धंधे, बड़े शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल मैदानी भाग में ही अटक गए। शिक्षक-डॉक्टर भी पहाड़ नहीं चढ़ पाए और पहाड़ यूपी की तरह ही मैदानों को देखता और खुद भी पानी और जवानी के साथ पलायन कर उसमें समाता चला गया, और नए परिसीमन से राज्य विधानसभा में उसकी भागेदारी भी घटकर निष्प्रभावी हो गई।

गैर ही रहा गैरसैंण

देश में उत्तराखण्ड ऐसा अभागा प्रदेश है, जिसकी स्थायी राजधानी राज्य बनने के 17 साल बाद भी तय नहीं हो पाई है। वर्ष 1994 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तराखंड राज्य गठन हेतु रमा शंकर कौशिक समिति का गठन किया गया और इस समिति ने उत्तराखंड राज्य का समर्थन करते हुए 5 मई 1994 को कुमाऊँ एवं गढ़वाल के मध्य स्थित गैरसैंण (चंद्रनगर) नामक स्थान पर राजधानी बनाने की संस्तुति दी। उस समिति की रिपोर्ट के मुताबिक गैरसैंण को 60.21 फीसदी अंक मिले थे, जबकि नैनीताल को 3.40, देहरादून को 2.88, रामनगर-कालागढ़ को 9.95, श्रीनगर गढ़वाल को 3.40, अल्मोड़ा को 2.09, नरेंद्रनगर को 0.79, हल्द्वानी को 1.05, काशीपुर को 1.31, बैजनाथ-ग्वालदम को 0.79, हरिद्वार को 0.52, गौचर को 0.26, पौड़ी को 0.26, रानीखेत-द्वाराहाट को 0.52 फीसद अंक मिलने के साथ ही किसी केंद्रीय स्थल को 7.25 फीसद अन्य को 0.79 प्रतिशत ने अपनी सहमति दी थी। गैरसैंण के साथ ही केंद्रीय स्थल के नाम पर राजधानी बनाने के पक्षधर लोग 68.85 फीसद थे। कौशिक समिति की संस्तुति पर 24 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने उत्तराखंड राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। आगे उत्तराखंड की नित्यानंद स्वामी की अगुवाई में बनी प्रथम सरकार ने राजधानी गैरसैण (चंद्रनगर) के नाम पर एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत दीक्षित आयोग नाम की एक समिति गठित कर हमारे ऊपर थोप दिया और दीक्षित आयोग ने 11 बार अपना कार्यकाल बढ़ने के बाद वही रिपोर्ट दी जिसकी वहां की जनता को पहले ही आशंका थी।

राष्ट्रीय सहारा

असल में दीक्षित आयोग का गठन ही गैरसैण को राजधानी न बनाने के लिए किया गया था। इसके साथ ही राष्ट्रीय दलों ने गैरसैण का विरोध शुरू किया। गैरसैंण के विरोध में वे लोग हैं, जो न आन्दोलन में थे और न उनकी कही आन्दोलन में भूमिका रही थी। राज्य के लिए 42 लोगों की शहादत और राजधानी गैरसैण (चंद्रनगर) के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी 38 दिनों तक आमरण अनशन करने के बाद बाबा मोहन उत्तराखंडी शहीद हुए थे। और छात्र कठैत ने भी शहादत दी थी। गैरसैंण केवल स्थान हीं नहीं अपितु उत्तराखण्ड में लोकशाही के प्रतीक का भी केन्द्र बिंदु है, जबकि राज्य के एक कोने पर स्थित देहरादून उत्तराखण्डियों के लिए लखनऊ से बदतर साबित हो रहा है।

क्यों गैरसैंण  : पंकज सिंह महर

बहुत दिनों से गैरसैण को राजधानी बनाने वाले युवा लोगों का उत्साह देख रहा था, और इसको ना चाहने वाले लोगों के कुतर्क भी। कुतर्कों से दुख तो हुआ लेकिन पहले तो सोचा कि छोड़ो भैंस के आगे बीन बजाने से क्या होगा। लेकिन जब हमारे युवा-उत्तराखंड के तथाकथित उत्तराखंड प्रेमी लोग अपने कुतर्कों को इस इंटरनैट युग में इधर उधर फैलाने लगे और उनके पीछे पीछे कुछ लोग “हम तुम्हारे साथ हैं” की तरह पर हुवां-हुवां चिल्लाने लगे तो लगा कि मुझे भी अपनी भावनायें व्यक्त कर ही देनी चाहिये।

वे कहते हैं कि गैरसैण क्यों? मैं कहता हूँ ‘ उत्तराखंड क्यों’ फिर ‘भारत क्यों’। अग्रेजों के जमाने में भी ऐसे कुछ लोग रायबहादुर का खिताब लेकर अंग्रेजों के जूते चाटते थे और कहते थे कि हमें आजादी क्यों चाहिये। लेकिन एक आम आदमी के लिये आजादी अस्मिता का सवाल था, खुली हवा में सांस लेना वही समझ सकता है जिसने बदबूदार, सीलन युक्त कोठरी में दिन बितायें हैं। जिन लोगों ने ना पहाड़ के उस दर्द को देखा है जो धीरे धीरे पहाड़ को उजाड़ रहा है और ना आज की उसकी वास्तविकता से वाकिफ हैं वो तो कहेंगे ही गैरसैण क्यों। यदि ए.सी. चैम्बर में बैठकर इंटरनैट पर धकापेल करने से ही उत्तराखंड का विकास होना होता तो उत्तराखंड आज सबसे अच्छा राज्य होता। उत्तरप्रदेश के वे अधिकारी क्या बुरे थे जो लखनऊ में बैठकर पहाड़ के भाग्य का फैसला करते थे। ऐसे लोगों के लिये पहाड़ केवल साल में एक बार छुट्टी बिताने के लिये जाने वाला स्थान है, और फिर अपने लेटेस्ट कैमरे से फोटो खींच कर इंटरनैट पर साझा करके अपने को तीसमारखां समझने का माध्यम भी ।

पहाड़ का आदमी आज पहाड़ से क्यों भागने को मजबूर है, इसीलिये क्योंकि पहाड़ को पहाड़ के ऐसे नैनिहालों ने बिसरा दिया है। दिल्ली, मुम्बई, लंदन, कनाडा, दुबई में बैठकर पहाड़ी गीत गाना, पहाड़ी नाइट आयोजित करना और हो हो करते हुए हँसते हुए पहाड़ की दुर्दशा का दुखड़ा रोना, यह सब बहुत आसान है। कठिन है तो पहाड़ में बैठकर एक आम पहाड़ी के दर्द को महसूस कर उसके लिये चुपचाप कुछ करते जाना।

लेकिन जब तक पहाड़ के लिये कुछ करने के नाम पर अपने नाम को आगे करने, कोई संस्था बनाकर उसके लिये चंदा उगाहने और पहाड़ के हालात बदलने के नाम पर साल में एक दो बार पहाड़ के प्रायोजित टूर करने की प्रवृति सामने रहेगी तब तक पहाड़ का भला होने वाला नहीं। गैरसैण के नाम पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले कितने लोग उत्तराखंड के मानचित्र पर गैरसैंण को पहचान सकते हैं। उनमें से कितने लोगों को उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति की सही सही जानकारी है। लेकिन नहीं उन्हें बिना जाने समझे सिर्फ विरोध करना है तो करेंगे।

आज राजधानी बदलने से पहाड़ के बुनियादी विकास की नींव पड़ेगी। उन अधिकारियों, नेताओं को भी उन्ही सब असुविधाओं से दो चार होना पड़ेगा जिन्हेंएक आम उत्तराखंडी हर दिन झेलता है। यह लोकतंत्र है कोई राजशाही तो नहीं कि प्रजा परेशान और राजा महान। यदि उत्तराखंड भूकंप प्रभावित क्षेत्र है तो क्या, राजधानी भी ऐसे ही जगह में हो तो क्या बुरा है। आप राजधानी को ऐसे क्षेत्र से निकालकर अलग बनाना चाहते हैं ताकि जनता मरे और आप राहत कार्यों का हवाई सर्वेक्षण करने पहुंच जायें। नीरो ऐसे ही तो बंशी बजा रहा था जब रोम जल रहा था।

सुदूर क्षेत्र में बैठे एक आम उत्तराखंडी को किसी भी काम के लिये राजधानी जाने के लिये कितना समय लगता है उससे आपको क्या मतलब। आपके पास जहाज है, गाड़ी है पहुंच जाइए देहरादून, हल्द्वानी या नैनीताल। आपको इससे क्या कि एक पहाड़ी को 2 मील दूर से हर रोज पीने का पानी लाना पड़ता है। आप कहेंगे इसकी क्या जरूरत है मिनरल वाटर क्यों नहीं खरीद लेता। पढ़ाई के लिये पांच मील दूर स्कूल जाना होता है जिसमें साल के आधे से ज्यादा दिन पढ़ाई नहीं होती। आप कहेंगे घर बैठे ई-लर्निंग क्यों नहीं कर लेता। अस्पताल जाने के लिये 15 मील चलना पड़ता है। मेडिकल इंस्योरेंस नहीं है क्या?

जब पहाड़ से निकले लोग ही बड़े शहरों में जाकर पहाड़ के असली दुख दर्दों को भूल जाते हैं और सिर्फ फैशन के लिये उत्तराखंड प्रेम की दुहाई देते हैं और खुद को पहाड़ी कहलाने में शर्म महसूस करते हैं तो उन देहरादून में बैठे शहरों में पले बड़े अधिकारियों का क्या दोष। “गैरसैण क्यों “यह सवाल ही एक बहुत बड़ा तमाचा है उन लोगों पर जिन्होंने पहले उत्तराखंड का सपना देखा और अब राजधानी परिवर्तन की जिद पाले बैठे हैं। यह तमाचा है हर उस पहाड़ में रहने वाले उत्तराखंडी पर जो आज भी अपने दैनिक सुख सुविधाओं के लिये जूझ रहा है। पहाड़ में शराब घर घर पहुंच गयी है, ऐसा कहने वाले लोग बहुत मिलेंगे, लेकिन उसका समाधान क्या है यह कोई नहीं बतायेगा। इसके जिम्मेवार भी वही लोग हैं जो पूछते हैं गैरसैण क्यों?
हाँ तो कुछ तथाकथित उत्तराखंड प्रेमी कह रहे हैं कि यह केवल भावनात्मक मुद्दा है। कह रहे हैं आप लोग पागल हो जो केवल भावनाओं के वशीभूत होकर काम करते हो। हमें देखो हमने अपनी भावनाओं को काबू में किया इसलिये आज सब कुछ छोड़छाड़कर दिल्ली, मुम्बई, लंदन, दुबई ना जाने कहाँ कहाँ बैठे हैं। ऐसे ही लोग होते हैं जो भावनाओं की परवाह नहीं करते और अपने माँ-बाप और कम पढे लिखे भाई-बहनों को पहाड़ की कठिन भूमि में छोड़कर उड़ंछू हो जाते हैं। लेकिन यही लोग यह भी कहते हैं हम उत्तराखंड के नाम को बेचेंगे, लोगों को भावनात्मक रूप से मजबूर करेंगे कि वह हमसे जुडें और बदले में हम नाम, दाम कमायेंगे। यदि गैरसैंण की रट लगाने वाले पगले लोग भावनात्मक मुद्दे पर उछ्ल रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं आप भी तो लोगों को भावनात्मक रूप से मजबूर कर रहे हैं। आप उत्तराखंड के नाम पर ग्रुप बना रहे हैं, एन जी ओ बना रहे हैं, ट्र्स्ट बना रहे हैं, साहित्य लिख रहे हैं, कविता कहानी लिख रहे हैं..क्यों भला। खुद ही ना जाने क्या क्या अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, संचालक, प्रवर्तक बन बैठे हैं, क्यों? व्हाई…क्यों आप लोगों को उत्तराखंड के नाम पर भावनात्मक रूप से भड़का रहे हैं। आप भावनात्मक रूप से करें तो ठीक और हम करें तो गलत. क़्यों? व्हाई…..

लेकिन इसे केवल भावनात्मक मुद्दा बताने वाले उस अधजल गगरी की तरह हैं जो छलकती रहती है। कहते हैं ना A Little Knowledge is a Dangerous Thing ठीक वही बात है। या तो ये कुछ ना जानते होते, तो चुप रहते और केवल अपनी परेशानियों का हल ढूंढने के लिये ही सही गैरसैण को राजधानी बनाने की बात कहते। एक आम उत्तराखंडी इसीलिये ही तो जुड़ा है इस आन्दोलन से। या फिर यह जानकार ही होते, पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की तरह। उत्तराखंड का यही वर्ग तो है जो गैरसैण को समर्थन दे रहा है। प्रेमियों को शायद यह भी नहीं मालूम कि यह राजनीतिक मुद्दा है ही नहीं क्योंकि इस पर किसी भी पार्टी ने अपना मत साफ नहीं किया है। इसको उत्तराखंड के बुद्धिजीवी वर्ग ने समर्थन दिया है और दे रहे हैं। यदि हमारे प्रेमी लोग जानते हों तो कौशिक समिति की रिपोर्ट में 60 % लोगों ने गैरसैण को सीधे और 8% ने केन्द्रीय स्थान के बहाने गैरसैण को ही चुना था। अब कौशिक समिति क्या थी किससे इसने बात की थी वह मैं यहाँ नही बताने जा रहा। यह लोग तो चार किताबें पढ़ लिये और अच्छी अंग्रेजी लिखना सीख गये यह तो कहेंगे ही व्हाई गैरसैण… पद्म श्री शेखर पाठक हों या गैरसैण के लिये शहादत देने वाले बाबा उत्तराखंडी या बुद्धिजीवी वर्ग के अन्य लोग, सभी दिलो जान से गैरसैण के लिये समर्थन में..व्हाई मेरे भाई। क्योंकि यह केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं है इसके पीछे वैज्ञानिक, सामाजिक , आर्थिक, भौगोलिक आधार हैं।

तो अब आते हैं कि क्या गैरसैण केवल कुछ पगलाये लोगों का भावनात्मक मुद्दा ही है या इसके पीछे कोई अन्य कारण भी है। लेकिन पहले मैं कुछ खाये,पीये अघाये लोगों यह बता दूँ कि उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन भी कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं था। इसकी संकल्पना को बनने, पकने और आन्दोलन का रूप लेने में पर्याप्त समय लगा। यह केवल एक राज्य के भौगोलिक धरातल को कम कर अपने लिये जमीन छांट लेने की लड़ाई नहीं थी बल्कि हिमालय के समाजों की अलग भौगोलिक परिवेश में जीने वाले लोगों की परेशानियों को समझने में सक्षम सरकार की स्थापना करने की लड़ाई थी। हिमाचल हो या मेघालय सभी हिमालयी समाजों ने अपने अपने हिस्से के राज्य हमसे पहले प्राप्त कर लिये।

अब चुंकि व्हाई गैरसैण कहने वाले उत्तराखंड प्रेमी लोग पढ़े-लिखे हैं और अंग्रेजी बोलना बेहतर समझते हैं तो उनके लिये कुछ अंग्रेजी सन्दर्भ देने की कोशिश कर रहा हूँ। जीन-जैकस रूसो एक दार्शनिक हुआ करते थे।

रूसे साहब मानते थे कि विज्ञान व कला के विस्तार से नैतिक गुणों का ह्रास होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और इंसान स्वभावत: अच्छे ही होते हैं लेकिन घटनायें या दुर्घटनायें या परिस्थितियां उन्हें बुरा बना देती हैं, ऐसे ही लोग समाज-निर्माण करते हैं। उन्होने यह भी कहा कि

एक संगठित राज्य एक मानव शरीर की तरह है, जिस तरह शरीर के प्रत्येक हिस्से का अपना एक कार्य होता है उसी तरह राज्य के अलग अलग हिस्से अलग अलग कार्य करते हैं और एक अच्छे राज्य के लिये भी इसके सभी भागों का सुचारु रूप से कार्य करना आवश्यक है। उन्होने यह भी कहा कि यदि राजनैतिक सत्ता , जन भावनाओं के अनुसार काम नहीं करती तो राज्य में विवाद होना अवश्यम्भावी है।

ऐसे ही एक भूगोलवेत्ता थे कार्ल रिटर जिन्होने राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत को फ्रेडरिक रैटजल, हॉसहॉफ़र और रुडोल्फ जैसे कई लोगों ने माना और आगे बढ़ाया।

राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत के अनुसार जिस प्रकार शरीर कोशिकाओं का बना होता है वैसे ही राज्य का हर स्थान मानव शरीर की एक कोशिका की तरह काम करता है। यही कोशिकायें समान इच्छा शक्ति, समान आकांक्षा, समान गुण-धर्म वाले लोगों के आवास में बदल जाती हैं और राज्य के गुण-धर्म को प्रभावित करती हैं। तो एक राज्य का गुण-धर्म उनमें स्थित स्थानों और उन स्थानों में रहने वाले व्यक्तियों की भावना का प्रतिरूप होता है। डार्विन नें लगभग यही सिद्धांत जीव-विकास के लिये प्रतिपादित किया था।

अमरीकी भूगोलविज्ञानी स्टीलसी ने माना की किसी भी राज्य में एक ऐसा ऊर्जा केन्द्र होता है जो राज्य को जीवित रखता है। स्टीलसी नें एक नाभिस्थल की संकल्पना की और कहा किसी भी राज्य के भविष्य का निर्धारण उसके नाभि-स्थल (महत्वपूर्ण स्थल) से होता है। हाँलाकि स्टीलसी ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि यह नाभिस्थल ही राजधानी का स्थान है लेकिन कई विद्वानों नाभि-स्थल को राजधानी के रूप में प्रतिपादित किया।

अब यदि उत्तराखंड राज्य हिमालय समाज को एक अलग परिप्रेक्ष्य में रखकर उसका योजनाबद्ध विकास करने के लिये बना है और इसका मूल गुण-धर्म पहाड़ी है तो इसकी राजधानी पहाड़ में होनी चाहिये ना कि मैदानी इलाके में, और यह स्थान नाभि की तरह राज्य के मध्य भाग के आसपास होना चाहिये। इस स्थिति में गैरसैण एक उपयुक्त स्थान बैठता है।
कुछ लोगों का कहना है कि यदि गैरसैण में राजधानी बनेगी तो इसमें बहुत खर्चा होगा। तो इसमें बुराई क्या है? यदि पहाड़ के विकास के लिये खर्चा हो रहा तो अच्छा ही तो है। क्या आप चाहते हैं कि यह खर्चा केवल देहरादून जैसे बड़े शहरों तक ही सीमित रह जाये। कुछ कहते हैं कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार है इसलिये अधिकतर पैसा भ्रष्ट लोग खा जायेंगे। तो यह तो देहरादून पर होने वाले खर्चे के लिये भी सही है, वहाँ भी तो लोग पैसा खायेंगे तो ना करें कुछ भी खर्चा। अरे भ्रष्टाचार तो सारे भारत में हैं तो क्या सारे नये निर्माण रोक दिये जाने चाहिये। भ्रष्टाचार एक समस्या है हमें उसके भी समाधान की जरूरत है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब तक वह समस्या हल नहीं हो जाती तब तक हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। कई लोगों ने कहा है कि सरकारी योजनाओं का केवल 10 से 15 प्रतिशत ही इसके सही हकदार के पास पहुँचता है और यह केवल उत्तराखंड के लिये ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिये सत्य है। एक और जहाँ हमें इसके खिलाफ लड़ना है वहीं विकास को जारी रखना जरूरी है नहीं तो जो दस या पन्द्रह पैसा पहुंच रहा है वह भी नहीं पहुँचेगा।

अब आते हैं कुछ और विद्वानों के उदाहरणों पर। कई लोगों ने राजधानियों पर शोध किया और अपनी पुस्तकें प्रकाशित की। डेविड गौर्डन, थामस हॉल जैसे विद्वानों ने 19 वीं व बीसवीं सदी की युरोप की राजधानियों का अध्ययन किया। इसके अलावा सर पीटर हॉल ने 7 प्रकार की राजधानियों को चिन्हित किया। कई विद्वानों के अध्ययन से यह बात सामने आयी है कि राजधानी ही राज्य की दशा व दिशा को निर्धारित करती है। यूरोप के अधिकाश देशों की राजधानियाँ उसके नाभि स्थल में स्थित रही हैं। जिन देशों में ऐसा नहीं है उनमे से अधिकांश देश एक से अधिक राजधानियों का भार ढो रहे हैं। विद्वानों का यह भी मानना है कि सोवियत संघ के विघटन व जर्मनी के एकीकरण दोनों उदाहरण यह साबित करते हैं राजधानियाँ देश के भविष्य को प्रभावित करती हैं और यह करती रही हैं।

तो यह रही वैज्ञानिक व अध्ययन आधारित सोच जो यह बताती है कि गैरसैण या उसके आसपास की जगह राजधानी के लिये उपयुक्त है ।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड