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सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनी शेरवानी हिल टॉप की फूलों की बगिया

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नैनीताल। नगर के सर्वश्रेष्ठ होटलों में गिने जाने वाले और अपनी हर मौसम में खिलने वाले फूलों की बगिया के लिए प्रसिद्ध शेरवानी हिल टॉप इन में इन दिनों फूलों की महक व खूबसूरती सैलानियों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बनी हुई है।

यहां बगिया के साथ ही हर ओर पिटोनिया, एंट्रीनाम, सीटविलम, डॉग फ्लावर, कैरेंडोला, लैक्स पियर, फ्लॉक्स, डेन्थास, फासेलर, केली, कैनफ्लावर, ग्लाइडोला, डहेलिया, केरीहेप्स, टाइगर लिली, पॉपी, कैरोपॉपी, पेपरफ्लावर, पी क्रीपर, जिरेनियम, फियूशिया, डेजी, ऑर्कापेंथास, क्रीपर रोज व क्रीपर आदि देशी-विदेशी फूलों की ऐसी खूबसूरती बिखरी हुई है कि सैलानी इनके आकर्षण में खिंचे चले आ रहे हैं। गर्मियों के मौसम में फूलों की ऐसी बगिया के खिलने में प्रबंधक कमलेश सिंह, दिनेश पालीवाल, बची सिंह रावत, शिवानंद व मदन आदि लोगों की खासी मेहनत साफ नजर आ रही हैं।

राष्ट्रीय सहारा, 26 मई 2018

पहाड़ों में छाई रसबेरी-हिसालू की बहार

-कुमाउनी के साथ ही हिंदी के भी आदि कवि माने जाने वाले गुमानी ने भी लिखी थीं इस पहाड़ी फल पर कविता
नैनीताल। पहाड़ों पर मई यानी गर्मियों का महीना शुरू होते ही रसबेरी कहे जाने वाले जंगली फल हिसालू की बहार छाने लगी है। यह फल हिसालू कैसा होता हैं, इस बारे में कुमाउनी के साथ ही हिंदी के भी आदि कवि कहे जाने वाले लोक रत्न पन्त ‘गुमानी’ (जन्म 1791-मृत्यु 1846) जी की कविता बताती है – ‘हिसालू की जात बड़ी रिसालू , जाँ जाँ जाँछे उधेड़ि खाँछे, यो बात को क्वे गटो नी माननो, दुद्याल की लात सौणी पड़ंछ’ यानी हिसालू की नस्ल बड़ी नाराजगी भरी है, जहां-जहां जाता है, बुरी तरह खरोंच देता है, तो भी कोई इस बात का बुरा नहीं मानता, क्योंकि दूध देने वाली गाय की लातें खानी ही पड़ती हैं।

1815 में ही हिंदी के पितामह कहे जाने वाले भारतेदु हरिश्चंद्र के जन्म से कई दशक पूर्व हिंदी खड़ी बोली में हिंदी काव्य की रचना करने वाले गुमानी हिसालू पर आगे कहते हैं – ‘छनाई छन मेवा रत्न सगला पर्वतन में, हिसालू का तोपा छन बहुत तोफा जनन में, पहर चौथा ठंडा बखत जनरौ स्वाद लिंड़ में, अहो में समझछुं, अमृत लग वास्तु क्या हुनलो ?’ यानी पर्वतों में तरह-तरह के अनेक रत्न हैं, हिसालू के बूंदों से फल भी ऐसे ही तोहफे हैं, दिन के चौथे प्रहर में इनका स्वाद लेना चाहिए, वाह मैं समझता हूँ इसके सामने अमृत का स्वाद भी क्या होगा। बेहद सीमित मात्रा में मिलने वाले हिसालू के छोटे से फल अभी मुख्यालय में बाजारों में तो नहीं आये हैं, परंतु हल्द्वानी रोड सहित कई स्थानों पर इसके फल पकते दिखाई दे रहे है।

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ल़जीज कुमाउनी व्यंजन (कृपया फोटो को दो बार क्लिक करके देखें)

कुमाउनी रसोई के परंपरागत बर्तन (कृपया फोटो को दो बार क्लिक करके देखें)

कुमाऊं के खूबसूरत फल-फूल (कृपया फोटो को दो बार क्लिक करके देखें)

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