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अपडेट : अंतिम दर्शनों के बाद पंचतत्व में विलीन हुए पर्वत पुत्र-विकास पुरुष

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नारायण दत्त तिवारी

नैनीताल, 20 अक्तूबर 2018। ‘पर्वत पुत्र-विकास पुरुष’ पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री नारायण दत्त तिवारी जी की पार्थिव देह के आज अंतिम दर्शनों के बाद पंचतत्व में विलीन हो गयी। पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ 21 तोपों की सलामी देते हुए रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर उनकी अंत्येष्टि की गई। उनकी चिता को मुखाग्नि उनके पुत्र रोहित शेखर तिवारी ने दी। इस अवसर पर माहौल अत्यंत गमगीन दिखाई दिया। लोग ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, एनडी तेरा नाम रहेगा’ जैसे नारे लगा रहे थे।

अंत्येष्टि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल, कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत, यशपाल आर्य, सांसद रमेश पोखरियाल निशंक, सांसद अजय टम्टा, पूर्व सांसद बलराज पासी, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, वित्त मंत्री प्रकाश पंत, कृषि मंत्री सुबोध उनियाल, प्रदीप टम्टा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, विधायक बंशीधर भगत, पुष्कर सिंह धामी, राजेश शुक्ला, राम सिंह कैड़ा, संजीव आर्य, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री बची सिंह रावत व जितिन प्रसाद, नारायण सिंह जंतवाल, कांग्रेस राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी  आदि भी शामिल रहे।

इससे पूर्व 18 अक्तूबर की रात्रि 1 बजे से नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास ‘स्वतंत्रता सदन, C-1/9 तिलक लेन में एवं शनिवार 20 अक्तूबर को विधान भवन लखनऊ तथा इसी शाम 5 बजे उन्हें एयर एंबुलेंस से पंतनगर एयरपोर्ट और वहां से फूलों से सजी गाड़ी में हल्द्वानी होते हुए काठगोदाम स्थित सर्किट हाउस लाया गया, तथा शाम से ही अंतिम दर्शनार्थ रखा गया। 21 अक्तूबर को भी अपराह्न 1 बजे तक उनकी पार्थिव देव हल्द्वानी में अंतिम दर्शनों के लिये उपलब्ध रहेगी। इसके बाद 21 अक्तूबर को ही रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

पंचतत्व में विलीन हुए नारायण, सीएम समेत राजनीतिक हस्तियों ने दी श्रद्धांजलि

जानें कितना शुभ-अशुभ है जन्म दिन को ही मृत्यु

नैनीताल। जन्म दिन को ही मृत्यु लाखों लोगों में से किसी एक विरले व्यक्ति को ही होती है। ऐसे में उनकी जयंती व पुण्यतिथि एक ही मनाई जाती है। लेकिन ज्योतिष शास्त्र में जन्म दिन को ही मृत्यु का कोई खास शुभ-अशुभ फल नहीं बताया गया है। अलबत्ता किसी त्योहार पर मृत्यु होने से
परिवार पर उस त्योहार का ‘दोष सिद्ध’ होना माना जाता है। इसके बाद परिवार उस त्योहार को तब के बाद ही मना सकता है, जब उसी त्योहार पर उस परिवार में कोई बच्चा जन्म ले अथवा गाय ब्याये। उल्लेखनीय है कि तिवारी जी की मृत्यु नवरात्र में हुई है।

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नई दिल्ली, 18 अक्टूबर 2018। दिग्गज कांग्रेसी नेता और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तथा विदेश, वित्त, उद्योग, वाणिज्य, पेट्रोलियम, श्रम एवं योजना विभागों के पूर्व केंद्रीय मंत्री, भारतीय युवा कांग्रेस के पहले अध्यक्ष, स्वतंत्रता सेनानी और महान गांधीवादी नेता नारायण दत्त तिवारी गुरुवार को लंबी बीमारी के बाद देह-मुक्त हो गए। वह 93 साल के थे। आपको बता दें कि आंध्र प्रदेश के गवर्नर रह चुके एनडी तिवारी आज ही के दिन यानी 18 अक्टूबर 1925 को पैदा हुए थे। उल्लेखनीय है कि श्री तिवारी को ब्रेन-स्ट्रोक आने के कारण 20.09.2017 को दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स में भर्ती कराया गया था, और यहां 1 वर्ष से अधिक समय से भर्ती रहने के बाद पिछले कई महीनों से उनकी हालत काफी बिगड़ती जा रही थी, और आज अपराह्न करीब 3 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने राजनीतिक शुरुवात प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से करने के बाद अपने सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में कांग्रेस और बीच में तिवारी कांग्रेस बनाने के बाद इधर 2017 के उत्तराखंड विधान सभा चुनावों के दौरान भाजपा देने की घोषणा कर दी थी। 

पंडित तिवारी के देहावसान पर उत्तराखंड सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा कर दी है। इस दौरान राज्य में राष्ट्रीय ध्वज झुका रहेगा, तथा कोई भी शासकीय मनोरंजन के कार्यक्रम भी नहीं होंगे।
वहीं पंडित तिवारी का अंतिम संस्कार उनके पैतृक रानीबाग स्थित श्मशान घाट पर शनिवार को किये जाने की सूचना आ रही है। बताया जा रहा है कि शुक्रवार सुबह उनका पार्थिव शरीर दिल्ली में और अपराह्न में लखनऊ स्थित आवास पर अंतिम दर्शनों के लिये रखा जाएगा। आगे शनिवार को उनका शरीर हल्द्वानी लाया जाएगा और यहां भी उन्हें लोगों के लिये अंतिम दर्शनों के लिए रखा जाएगा।

स्वर्गीय तिवारी के निधन पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ट्वीट करके श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए लिखा है :

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं. नारायण दत्त तिवारी जी के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करता हूं। ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति व परिजनों को दुःख सहने की प्रार्थना करता हूं। तिवारी जी का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है, विरोधी दल में होने के बावजूद उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर रहकर सदैव अपना स्नेह बनाये रखा। श्री तिवारी के जाने से भारत की राजनीति में जो शून्य उभरा है, उसकी भरपाई कर पाना मुश्किल है। तिवारी जी देश के वित्त मंत्री, उद्योग मंत्री और विदेशमंत्री जैसी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। उत्तराखंड श्री तिवारी जी के योगदान को कभी नहीं भुला पाएगा, नवोदित राज्य उत्तराखंड को आर्थिक और औद्योगिक विकास की रफ़्तार से अपने पैरों पर खड़ा करने में तिवारी जी ने अहम भूमिका निभाई।

नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस से भारत वर्ष, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व आंध्र प्रदेश तक की राजनीति में रहे सक्रिय

नैनीताल। 18 अक्तूबर 1925 को तत्काल नार्थ-वेस्ट प्रोविंस के नैनीताल जिले के सुदूर पदमपुरी के एक छोटे से पहाड़ी गांव में जन्म लेकर देश के विदेश व उद्योग सहित मंत्रालयों को संभाल चुके एनडी तिवारी का जीवन सफर 17 साल की उम्र में ही एक बाल स्वतंत्रा संग्राम सेनानी के रूप में जेल जाने, अपने शुरुआती दौर में डा. राम मनोहर लोहिया जैसे राष्ट्रीय नेताओं को अपने गांव के लिए सड़क बनाने के आंदोलन में पहाड़ पर बुलाने और चीड़ की लकड़ियों-छ्यूलों को जलाकर चुनाव प्रचार करने से लेकर आज के दौर की उत्तराखंड की राजनीति तक बेहद उतार-चढ़ाव वाला रहा। लेकिन इस सब के बीच उनके मन में हमेशा पहाड़ और पहाड़ का विकास रहा। इसीलिए उन्हें ‘विकास पुरुष’ की संज्ञा भी मिली। उन्होंने राजनीतिक शुरुवात प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से करने के बाद अपने दीर्घ राजनीतिक जीवन में कांग्रेस और बीच में तिवारी कांग्रेस बनाने के बाद इधर 2017 के उत्तराखंड विधान सभा चुनावों के दौरान भाजपा देने की घोषणा कर दी थी। 
उनका बचपन अपने जन्म व पैत्रिक स्थान पदमपुरी से इतर नैनीताल जिले के ही बल्यूटी गांव स्थित अपनी ननिहाल में बीता था। उनके पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अधिकारी थे, लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर पूर्णानंद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 1942 में वह अपने पिता की राह पर चलते हुए मात्र 17 वर्ष की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए, और ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ नारे वाले पोस्टर और पंपलेट छापने और उसमें सहयोग के आरोप में पकड़े गए। इस पर उन्हें 14 दिसंबर 1942 को अंग्रेजी सरकार विरोधी पर्चे लिखने के आरोप में बरेली के बाल सुधार गृह भेजा गया और वह यहीं नाबालिग से बालिग हुए और बरेली के सेंट्रल जेल में स्थानांतरित किए गए थे। गौरतलब है की इस दौरान उनके पिता बरेली जिला जेल में थे। 15 महीने की जेल काटने के बाद वह 1944 में आजाद हुए। इस दौरान ही उन्होंने ‘खुट खुटानी, सुट विनायक’ (यानी खुटानी में पैर रखो और तत्काल (अच्छी सड़क-गाड़ी से) विनायक पहुँचो) तथा ‘एक घंटा देश के लिए और बाकी पेट के लिए’ का नारा देते हुए स्थानीय लोगों को अपने गांव पदमपुरी, विनायक से खुटानी तक के लिए श्रमदान कर सड़क का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया, और करीब 10 किमी सड़क बना भी दी।
उत्तराखंड विधानसभा में उनके मुख्यमंत्री रहते विधायक रहे उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष डा. नारायण सिंह जंतवाल ने बताया कि इस दौरान वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में थे, और इस आंदोलन में शामिल होने के लिए डा. राम मनोहर लोहिया जैसे नेता भी पहुंचे थे। डा. जंतवाल ने तिवारी के निधन को क्षेत्र व प्रदेश के साथ ही देश-दुनिया के लिए अपनी तरह के नेताओं के एक युग का अंत करार देते हुए बताया कि वे अपने कार्यक्षेत्र के लिए शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, रोजगार व उद्योग लगाने के लिए सर्वाधिक प्रयासरत रहते थे। उनके कार्यकाल में ही नैनीताल, ऊधमसिंह नगर व हरिद्वार जिलों के मैदानी क्षेत्रों में एचएमटी फैक्टरी रानीबाग सरीखे उद्योगों के साथ सिडकुल व भीमताल में औद्योगिक क्षेत्र तथा अनेक स्कूल, कॉलेज, महाविद्यालयों के साथ ही आईटीआई व पॉलीटेक्निक स्थापित हुए और सड़कों का जाल फैला। उनका लोकतंत्र में गजब का विश्वास था। उत्तराखंड विस में बसपा द्वारा अपनी सरकार के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर तत्काल ही बहस और मतविभाजन कराना हो अथवा विपक्षी नेताओं को पूरा सम्मान देना, यह उनकी विशेषता थी। वह खासकर युवा विधायकों को अपने क्षेत्रों से बाहर देश-दुनिया पर नजर रखने को भी प्रोत्साहित करते थे। जंतवाल ने बताया कि तिवारी ने उन्हें विदेश भेजने के लिए स्वयं लिखा था, हालांकि वे गये नहीं थे। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता पूरन मेहरा कहते हैं कि तिवारी के नाम से देश और लखनऊ में उत्तराखंडवासियों को सम्मान मिलता था। वहां उत्तराखंड के आम व्यक्ति को भी तिवारी के नाम के साथ वीआईपी-वीवीआईपी का दर्जा मिलता था।

…जब उद्योगपति को काशीपुर में बंदरगाह लगाने को कहा था

कहा जाता है कि जब वे देश के उद्योग मंत्री थे, तब उद्योगपति उनके समक्ष जो भी उद्योग लगाने की अनुमति लेने आते थे, वे उनसे एक उद्योग उत्तराखंड में लगाने को भी कहते थे। इस तरह उन्होंने तत्कालीन नैनीताल जिले के मैदानी क्षेत्रों में खासकर काशीपुर, खटीमा आदि में कई उद्योग स्थापित करवाए। उस दौर का एक किस्सा है कि किसी उद्योगपति ने उनसे बंदरगाह स्थापित करने की अनुमति मांगी थी तो उन्होंने नैनीताल, काशीपुर में भी एक बंदरगाह स्थापित करने को कह दिया था, जबकि बंदरगाह केवल समुद्रतटीय क्षेत्रों में ही स्थापित हो सकते थे।

सीआरएसी इंटर कॉलेज में एनडी तिवारी के टीसी के प्रपत्र

पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी का जन्म नैनीताल जिले के पदमपुरी में हुआ था। उनका काफी बचपन यहां पदमपुरी सहित अपनी ननिहाल बल्यूटी में भी बीता। इंटर की पढ़ाई के दौरान ही वे स्वत्रंता आंदोलन में कूद पड़े थे, और 17 साल की उम्र में ही जेल चले गए थे। बताया जाता है कि देश के आजाद होने के बाद पंडित तिवारी ने ही दिल्ली के लाल किले से ब्रिटिश सरकार के झंडे को उतारा था। वे तभी से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के करीबी माने जाते थे। वे इलाहबाद छात्र संघ के अध्यक्ष भी बने और और वापस अपने गृह क्षेत्र लौटकर राज्य व देश की राजनीति प्रारंभ की, तथा कई ऊंचाइयों को छुआ। वे 3 बार उत्तर प्रदेश के और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने, साथ ही केंद्र सरकार में उद्योग, वित्त और विदेश मंत्री तथा आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। वे भारत के एक मात्र ऐसे नेता हैं जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे। आजादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनावों में तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) से सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा था और कांग्रेस के खिलाफ जीत हासिल की थी। तिवारी ने 1963 में कांग्रेस ज्वाइन की थी। 1965 में तिवारी पहली बार मंत्री बने थे। नारायण दत्त तिवारी एक जनवरी 1976 को पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने। 1977 में हुए जेपी आंदोलन की वजह से 30 अप्रैल को उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। एन डी तिवारी तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हत्या के बाद कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के लिए तिवारी का नाम भी चर्चा में आया था। हालांकि नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव वो जीत नहीं सके, जिसके चलते वो प्रधानमंत्री बनने से महरूम रह गए थे। इसके बाद वीपी नरसिम्हा राव पीएम बनने में सफल रहे। हालांकि कांग्रेस पार्टी की कमान जब गांधी परिवार के हाथों से निकली तो वह पार्टी में अलग थलग पड़ गए थे। इसी का नतीजा था कि तिवारी ने 1995 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, लेक‍िन सफल नहीं रहे। कांग्रेस की कमान जब सोनिया के हाथों में आई तो पार्टी बनाने के दो साल बाद ही उन्होंने घर वापसी की, लेकिन इन दो वर्षों के दौरान कांग्रेस में उनके लिए कोई केंद्रीय भूमिका नहीं रह गई थी। हालांकि बाद में उन्हें राष्ट्रपति का दावेदार माना जाता रहा, लेकिन नहीं बनाया गया। फिर कहा गया हो सकता है उपराष्ट्रपति बना दें, लेकिन इनके विवादों की वजह से उनको कांग्रेस पार्टी ने बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया।

सोनिया ने ऐसे किया उनका पुर्नवास

कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अलग ढंग से उनका पुनर्वास किया. पहले उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनाकर भेजा. फिर 2007 में पार्टी चुनाव हारी तो तिवारी का पुनर्वास आंध्रप्रदेश के राज्यपाल के रूप में कर दिया गया. लेकिन सेक्स सीडी सामने आने के बाद कांग्रेस ने उन्हें राज्यपाल के पद से हटा दिया था.

दिलीप कुमार, जगदंबिका पाल की वजह से नहीं बन पाये थे पीएम, आखिरी दम तक रहा मलाल

नवीन जोशी, नैनीताल। दो प्रदेशों-यूपी (1976-1977, 1984-1985, 1988-1989) एवं उत्तराखंड (2002-2007) का मुख्यमंत्री रहने के रिकार्डधारक एवं देश की राजनीति में विदेश (1986-87) व उद्योग सहित अनेक मंत्रालयों में मंत्री तथा आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल (22 अगस्त 2007 – 26 दिसम्बर 2009) रहे पंडित नारायण दत्त तिवारी का बुधवार को ठीक 92वें जन्म दिन के दिन देहावसान हो गया। पंडित तिवाड़ी ने जिंदगी में अनेक चुनाव जीते और हारे भी, लेकिन 1991 का चुनाव हारने की टीस मृत्यु शैया तक उनके मन में गहरे तक पैठी रही। वे अक्सर खुले तोर पर इस दर्द को स्वीकारते थे। 24 अक्टूबर 2015 को नैनीताल में अपने विद्यालय सीआरएसटी इंटर कॉलेज पहुंचने के दौरान भी उन्होंने यह दर्द बयां किया था। उन्होंने 1991 के चुनाव की पूरी कहानी बयां करते हुए कहा कि दिलीप कुमार की वजह से वह यह चुनाव हारे और प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, जबकि हैदराबाद के लिए अपना (राजनीतिक तौर पर) ‘बोरिया-बिस्तर’ बांध चुके पीवी नरसिम्हाराव अपनी किस्मत से प्रधानमंत्री बन गए। उनके सामने बिना मेहनत थाली में सजा हुआ सा प्रधानमंत्री का पद आ गया। यह संयोग ही रहा कि तिवारी की राजनीतिक पारी का अंतिम पद हैदराबाद राजभवन में राज्यपाल के रूप में ही रहा।

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1991 के लोक सभा चुनाव को याद करते हुए पंडित तिवारी ने बताया था, ‘दिलीप साहब उन्हें चुनाव प्रचार के लिए बहेड़ी ले गए, (तब बरेली जिले की यह विधानसभा नैनीताल लोक सभा सीट का हिस्सा थी।) बहेड़ी में उर्दू व फारसी बोलने वाले लोगों की अधिकता है। दिलीप साहब ने उनसे (तिवारी से) मंच पर अरबी व फारसी में आजादी और आजादी की लड़ाई का मतलब पूछा, जिसका उन्होंने सही जवाब दे दिया। इस दौरान दिलीप साहब ने तिवारी को जिताने की जनता से अपील भी की।’ बकौल तिवारी उन्हें पता नहीं था कि दिलीप साहब का असली नाम ‘यूसुफ खान’ था। यही बात उनके खिलाफ गई। बहेड़ी की जनता में यह संदेश गया कि यूसुफ मियां उनकी सिफारिश कर रहे हैं, और उन्होंने करीब साढ़े 11 हजार वोटों से तिवारी को चुनाव हरा दिया। उल्लेखनीय है कि यह वह दौर था, जब देश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तूती बोलती थी, और 21 मई 1991 को चुनाव प्रचार के दौरान ही श्रीपेरुमबुदूर में हुए एक आत्मघाती बम विस्फोट में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मृत्यु हो गई थी, और कांग्रेस के प्रति देश भर में एक तरह की सहानुभूति भी थी, बावजूद भाजपा की ओर से बिल्कुल नए चेहरे बलराज पासी से उन्हें लोक सभा की अन्य सभी विस क्षेत्रों में अधिक मत प्राप्त होने के बावजूद बहेड़ी विस में पड़े विरोधी मतों की वजह से हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन कांग्रेस को बहुमत मिला था, और इतिहास में दूसरी बार (लाल बहादुर शास्त्री के बाद) कांग्रेस पार्टी की ओर से किसी गैर गांधी-नेहरू परिवार के व्यक्ति के लिए प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलना था। तिवारी का अपनी वरिष्ठता के चलते दावा सर्वाधिक मजबूत था, लेकिन उनकी हार की वजह से पीवी नरसिम्हाराव को यह मौका मिला।
हालांकि 1998 के चुनाव में हार के लिए तिवारी के जगदंबिका पाल संबंधी बयान को भी जिम्मेदार माना जाता है। वहीं 1998 के चुनाव में वह भाजपा की इला पंत (पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. कृष्ण चंद्र पंत की धर्मपत्नी) से लोस चुनाव हार गये थे। यह चुनाव 22 फरवरी का हुआ था। इससे ठीक एक दिन पहले कांग्रेसी नेता (वर्तमान में भाजपा में) जगदंबिका पाल सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की मदद से भाजपा के कल्याण सिंह को हटाकर केवल तीन दिन के लिए (21 फरवरी 1998-23 फरवरी 1998) यूपी के मुख्यमंत्री बने थे। इसे मुलायम की संभल में लोस चुनाव हारने की संभावना के मद्देनजर हुआ जोड़-तोड़ माना जा रहा था। इस दौर में उत्तराखंड में राज्य आंदोलन भी आरक्षण आंदोलन के रूप में आगे बढ़ रहा था। मुलायम सिंह यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में पहाड़ विरोधी माने जाते थे। इन परिस्थितियों के बीच में 22 फरवरी 1998 के समाचार पत्रों में पंडित तिवारी का बयान छपा था कि पाल के सीएम बनने से देश में धर्म निरपेक्ष ताकतें मजबूत होंगी। उनके इस बयान को क्षेत्रीय जनता ने मुलायम सिंह का समर्थन करने के रूप में लिया, जिसका खामियाजा भी तिवारी को भाजपा से पहली बार चुनाव लड़ीं इला पंत हार के रूप में भुगतना पड़ा। हालांकि तिवारी के करीबी कहते हैं कि वास्तव में पाल के मुख्यमंत्री बनने की खबर आते ही उनकी पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी-पाल की अति महत्वाकांक्षा उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।

पंडित तिवारी का आजादी के दौर का एक पसंदीदा गीत:

बाग से सरसर का झोंका आशियाना ले गया,
भारतीयों को कफस में आबोदाना ले गया।
क्यों पड़ी अंधकार की छाया न जाने हिंद पर,
लूट कर योरोप सब मालो-खजाना ले गया।
गुनगुने गुंची का शिकवा बुलबुले भारत न कर,
तुझको पिंजड़े में तेरा चहचहाना ले गया।
कौर कहता है जबरदस्ती से हम पकड़े गये,
हमको शौके जेलखाना जेलखाना ले गया।
पंडित तिवाड़ी का लोक सभा में चुनावी लेखा जोखा:

काम नहीं आयी जन्मदिन पर दीर्घायु की कामना

नैनीताल। बुधवार को जन्मदिन पर मारुति नंदन साह, त्रिभुवन फर्त्याल, मुन्नी तिवारी व मनमोहन कनवाल आदि कांग्रेस नेताओं ने सुबह मुख्यालय स्थित बीडी पांडे जिला चिकित्सालय में पंडित तिवारी की दीर्घायु की कामना के लिए मरीजों को फल वितरित किये। हालांकि उनकी यह कामना पूरी नहीं हो पायी और अपराह्न में उनके देहावसान की खबर आ गयी। इससे कांग्रेस के साथ ही भाजपा-उक्रांद सहित अन्य दलों के नेता भी दुःखी नजर आये।

पिछले 1 वर्ष से अस्पताल में हैं भर्ती, पिछले 2-3 सप्ताह से उनके स्वास्थ्य में  आई है ‘बहुत अधिक गिरावट’ 

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। पिछले 10 माह से अस्पताल में भर्ती उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा विदेश, वित्त, उद्योग, वाणिज्य, पेट्रोलियम, श्रम एवं योजना विभागों के पूर्व केंद्रीय मंत्री व आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित नारायण दत्त तिवारी की हालत ‘बहुत गंभीर’ बनी  है। उनकी किडनी ने पिछले 48 घण्टों से काम करना बंद कर दिया है वह इस वक़्त किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं व अर्धमूर्छित अवस्था में बने हुए हैं । उनके पीएस आक्रोश निगम की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार उनका Blood Transfusion भी अभी जारी है।
1-Kidney failure के लिए उन्हें Dialysis दिया गया है ।
2- Acute Infection के लिए उन्हें Antibiotics और Antifungal Medicine दी जा रही हैं।
3- 9 जुलाई की सुबह से Blood-Pressure बहुत अधिक नीचे चला गया था, जिसे नियंत्रित करने के लिए दवा दी जा रही है।
4- उन्हें बाएँ पैर में DVT (Deep Vain Thrombosis) भी है जिसके उपचार के लिए अभी Doctor विचार कर रहे हैं ।
कुल मिलाकर पंडित जी की स्थिति ‘बहुत गंभीर’ है।
उनकी धर्मपत्नी डॉ. श्रीमती उज्ज्वला तिवारी व पुत्र रोहित शेखर तिवारी लगातार उनकी सेवा में लगे हुए हैं। Dr. Col. J.D. Mukherjee (Neurologist) व आई.सी.यू. के डॉक्टर्स लगातार माननीय पंडित जी की देखभाल कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व उन्हें गत 7 जुलाई को किडनी में इंफेक्शन व ब्लड-प्रेशर बहुत अधिक नीचे गिर जाने के कारण उन्हें तत्काल निजी कमरे से आईसीयू में शिफ्ट किया गया है, जहाँ कि उनकी पत्नी डॉ. श्रीमती उज्ज्वला तिवारी व सुपुत्र रोहित शेखर तिवारी जी भी उपस्थित हैं।

उल्लेखनीय है कि श्री तिवारी को ब्रेन-स्ट्रोक आने के कारण 20.09.2017 को दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स में भर्ती कराया गया था आज इस अस्पताल में माननीय तिवारी जी को लगभग दस महीने हो गए हैं। बताया गया है कि उनके स्वास्थ्य में पिछले 2-3 सप्ताह से ‘बहुत अधिक गिरावट’ आई है। इसका संज्ञान लेते हुए चिकित्सकों ने उनके बलगम तथा सीने की एक्स-रे जांचें कराई हैं।

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अपने स्कूल और कक्षा में लौटकर भाव-विभोर हुए थे एनडी

अपने स्कूल (और नैनीताल के सबसे पुराने) सीआरएसटी इंटर कॉलेज की कक्षा में पत्नी-पुत्र व प्रशंषकों के साथ एनडी तिवारी
अपने स्कूल (और नैनीताल के सबसे पुराने) सीआरएसटी इंटर कॉलेज की कक्षा में पत्नी-पुत्र व प्रशंषकों के साथ एनडी तिवारी

नैनीताल। शनिवार को यूपी व उत्तराखंड के पूर्व सीएम रहे एनडी तिवारी अपनी पत्नी उज्जवला शर्मा व जैविक पुत्र रोहित शेखर तथा समर्थकों के साथ व उनकी मदद से अपने तथा नगर के सबसे पहले स्थापित विद्यालय सीआरएसटी पहुंचे, तथा अपनी कक्षा में बैठे। इस मौके पर विद्यालय के छात्र रहे तथा पूर्व विधायक व उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष डा. नारायण सिंह जंतवाल ने उनका स्वागत किया। इस दौरान तिवारी पुरानी यादों में खो गए कि किस तरह उनके (रिस्ते के) सजवाणी वाले बड़बाज्यू (दादाजी) हरी दत्त जोशी ने उन्हें 1936 में जबकि वह केवल 11 वर्ष के थे (जन्म 18 अक्टूबर, 1925) और कद में भी काफी छोटे थे, यहां भर्ती कराया था। सामान्य ज्ञान के शिक्षक फ्रेंक रावत व इंसपेक्टर हरीश चंद्र ने उनसे अंग्रेजी शब्द ‘स्नेल’ (Snail) का अर्थ पूछा था, जिसका उन्होंने अपने पिता पूर्णानंद तिवारी द्वारा घर पर पढ़ाई गई ग्रामर के आधार पर ‘गनेल’ (घोंघा के लिए प्रयुक्त कुमाउनी शब्द) जवाब दिया था। इस उत्तर से उनकी विद्वता देखकर उन्हें एक आगे की कक्षा में प्रवेश दे दिया। उन्होंने बताया कि यहां से आगे वह इलाहाबाद विवि गए और वहां लाइब्रेरी में लगातार 10-10 घंटे पढ़कर बीए में प्रथम रहे, तथा एमए में उन्होंने नया विषय-‘डिप्लोमैसी इन इंटरनेशनल अफेयर्स’ लेकर ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ में उत्तीर्ण किया।

ब्लेक बोर्ड में अपना बचपन का सन्देश 'खुट खुटानी-सूट विनायक' लिखते एनडी तिवारी
ब्लेक बोर्ड में अपना बचपन का सन्देश ‘खुट खुटानी-सूट विनायक’ लिखते एनडी तिवारी

आगे अपने जीवन के कुछ अनछुवे रहस्यों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वह 1942 के भाारत छोड़ो आंदोलन में बचपन से ही कूद पड़े थे। इस पर उन्हें 14 दिसंबर 1942 को अंग्रेजी सरकार विरोधी पर्चे लिखने के आरोप में बरेली के बाल सुधार गृह भेजा गया और वह यहीं नाबालिग से बालिग हुए थे, और बरेली के सेंट्रल जेल में स्थानांतरित किए गए थे। गौरतलब है की इस दौरान उनके पिता बरेली जिला जेल में थे। इस दौरान ही उन्होंने ‘खुट खुटानी, सुट विनायक’ (यानी खुटानी में पैर रखो और तत्काल (अच्छी सड़क-गाड़ी से) विनायक पहुँचो) तथा ‘एक घंटा देश के लिए और बाकी पेट के लिए” का नारा देते हुए स्थानीय लोगों को अपने गांव पदमपुरी, विनायक से खुटानी तक के लिए श्रमदान कर सड़क का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया, और करीब 10 किमी सड़क बना भी दी। बकौल तिवारी उनकी यही डिग्री देखकर बाद में उन्हें विदेशी मंत्री का पद मिला। इस मौके पर उन्होंने प्रधानाचार्य मनोज पांडे से तत्कालीन प्रधानाचार्य पीडी सनवाल के चित्र के बारे में भी पूछा तथा अन्य जानकारियां भी लीं और उनका हाथ चूमकर आशीर्वाद भी दिया। आगे तिवारी भवाली स्थित टीबी सेनिटोरियम तथा घोड़ाखाल स्थित ग्वेल देवता के मंदिर भी गए।

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नैनीताल लोक सभा सीट का चुनावी इतिहासः

वर्ष    जीते प्रत्यासी (पार्टी)              मत         हारे प्रत्यासी                               मत                 अंतर

1951  सीडी पांडे (कांग्रेस)                    74314     दान सिंह                                  54828           19486
1957  सीडी पांडे (कांग्रेस)                    79221     सैबिल खान (निर्दलीय)            49734            29487
1962  केसी पंत (कांग्रेस)                     113083  सैबिल खान (पीएसपी)             48440           64643
1967  केसी पंत (कांग्रेस)                      91048   डीके पांडे (निर्दलीय)                  57189           33859
1971  केसी पंत (कांग्रेस)                       159937  दया किशन (एनसीओ)             59940          99997
1977  भारत भूषण (भारतीय लोक दल) 196304 केसी पंत (कांग्रेस)                    111659          84645
1980  एनडी तिवारी (कांग्रेस-इ)            163117   भारत भूषण (जेएनपी)             58695          104422
1984  सत्येंद्र चंद्र गुड़िया (कांग्रेस)         274557 अकबर अहमद डंपी (निर्दलीय) 107897        166660(III)लाखन सिंह (भाजपा) 16276
1989  महेंद्र सिंह पाल (जनता दल)        185006 गुड़िया (कांग्रेस)                       161490        23516
1991  बलराज पासी (भाजपा)                167509  एनडी तिवारी (कांग्रेस)             156080        11429   (III)महेंद्र पाल (जद) 81936
1996  एनडी तिवारी (कांग्रेस-तिवारी )    307449  बलराज पासी (भाजपा)            151604         155845
1998  इला पंत (भाजपा)                       292761   एनडी तिवारी (कांग्रेस)             277184         15577
1999  एनडी तिवारी (कांग्रेस)                350381   बलराज पासी (भाजपा)            237974         112407
2004  केसी बाबा (कांग्रेस)                   275658    विजय बंसल (भाजपा)             226474         49184
2009  केसी सिंह बाबा (कांग्रेस)            321377    बची सिंह रावत (भाजपा)         232965          88412
2014  भगत सिंह कोश्यारी (भाजपा)     636769   केसी सिंह बाबा (कांग्रेस)          3,52,052       285717

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नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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