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देखें धरती पर स्वर्ग, जैसा पहले कभी न देखा हो, रहस्यमय दारमा-पंचाचूली वैली…

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-पर्यटको की पसंदीदा सैरगाह व पयर्टन स्थल के साथ ही ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी व साधकों की साधना स्थली भी है दारमा वैली
डॉ. एम0 एस0 दुग्ताल @ नवीन समाचार, 26 जुलाई 2019। पौराणिक अभिलेखों के अनुसार भारत के उत्तर में 75 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल तक फैला, तिब्बत के पश्चिम सीमा से लगा ‘उत्तर कुरू‘ नामक एक रहस्यमय प्रदेश जो कि प्रागैतिहासिक काल मे बोन राजा के अधीन था, आज उत्तराखंड प्रदेश के जनपद पिथौरागढ के धारचूला के पास ‘धरती पर स्वर्ग’ दारमा-पंचाचूली वैली के नाम से जाना जाता है।
देवभूमि उत्तराखंड के रमणीय स्थलो की बात की जाये और दारमा-पंचाचूली वैली का नाम ना आए, ऐसा नही हो सकता है। धारचूला से 54 किमी की दूरी पर स्थित दारमा घाटी में विभिन्न प्रकार के बुग्याल, झील, हिम शैल, हिम खंड पर्वतो पर प्राकृतिक रूप से निर्मित मनोरम आकृतियों फूलो की घाटी, जड़ी-बूटियों, धार्मिक पौराणिक स्थलों, गरम जल धाराओं, पार्वती कुंड, राम कुंड, प्राकृतिक शिव लिंग, महादेव गुफा, प्राकृतिक तौर पर ‘ऊं’ लिखे छोटा कैलाश, आचरी यानी परियों का स्नान ताल, पंच गंगा जल धारा, पांच पांडवों के प्रतीक स्वरूप 22260, 20700, 21114 व 19925 फीट ऊंचे पांच नुकीले शिखरों व दो छोटी माता कुन्ती व द्रौपदी की प्रतीक युक्त पंचाचूली पर्वतमाला सहित अनेकानेक विशेषताएं हैं। प्राचीन काल से ऐतिहासिक महत्व की राजा चरख्याह्या की कथा, राजुला-मालुशाही की कथा, महान महादानी स्वर्गीय राजुली बूढी की गाथा (जिनकी धर्मशाला आज भी उत्तराखंड व नेपाल में अनेक स्थानों पर विद्यमान हैं) किती फैलदार की कथा जैस अनेक गाथाओं का केंद्र भी देवभूमि की दारमा वैली रही है। अपने अन्दर प्रकृति के अनगिनत हसीन नजारे संजोये दारमा वैली का कोई भी व्यक्ति यदि एक बार भ्रमण कर लेता है वह दिल व दिमाग से वहीं का गुणगान गाता चला जाता है। प्राचीन काल से ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व रखने वाली दारमा वैली में अनेकानेक लोग देवदार व भोजपत्र के पेड़ों वाले पहाडों पर देश व विदेश से हजारांे की संख्या में यहां आकर प्रकृति की गोद में सुकून के दिन गुजारते हैं, और यहां के सुंदर गॉव दुग्तू, दातू, सोन, बौन, बालिग, गौ नागलिग, तिदाग व अन्तिम गॉव सीपू आकर यहां के लोगों का साधारण रहन-सहन व व्यवहार देख हैरत में पड़ जाते हैं। खासकर गर्मियों में यहां आकर सुकून व शान्ति से छुट्टियां बिताना यादगार बन सकता है।
महानगरों की भीड़-भाड़ से दूर रमणीय प्रकृति की गोद मे शांत और रोमांचक समय व्यतीत करना चाहने वाले पर्यटकों के लिए दारमा-पंचाचुली वैली में समुंद तल से 10500 फीट की ऊचाई पर धौली गंगा व (पंचाचूली से निकलने वाली) न्युला नदी के पास संसार की प्रमुख पर्वत श्रंृखलाआंे मेे पंचाचुली पर्वत शिखर की गोद मे बसा उत्तराखंड प्रदेश का करिश्माई दुग्दू गॉव पर्यटको के लिए धरती पर स्वर्ग जैसा है। इसकी प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि हर किसी का दिल इस पर आना तय है। यहां प्राकृतिक रूप से बने रास्ते ट्रेकिंग करने वाले सैलानियों को सहज ही भा जाते हैं। इन पैदल ट्रैक्स यानी रास्तों से गुजरते हुए विशाल जंगलों, फूलों, सीढ़ी दार बाग-बगीजों, जडी-बूटियों, चटटानों की ऊंची पहाडियांे पर फैले वन अतुलनीय जैव विवधता आदि हर किसी को अपने मोहपाश में बांध लेते हैं।

बाहर-भीतर हरियाली ही हरियाली
दुग्तू में हरी-भरी प्रकृति व वनों के साथ ही यहां के मूल निवासियों से मिलना भी अनोखा अनुभव होता है। उनसे बात करके लगता है कि जितनी हरियाली यहां बाहर है उतनी ही स्थानीय लोगों के मन व स्वभाव में भी है। जंगलो के बीच में बसा गााव उनके जीवन मे रोमांच दर्शाने के लिए भी पर्याप्त है। यहां रहकर उनके बीच जाकर उनके सदियों पुराने इतिहास से भी रूबरू हो सकते हैं।

शानदार है ट्रेकिंग
करिश्माई गॉव दूूग्तू के आस-पास घूमने और ट्रेकिंग के रोमांच की भरमार है। यहां के नीपा, गबे फाटफू, रामा, विरंग, ढावे, मंडप, बशु व नामा आदि स्थलों को प्रकृति ने घरेलू जानवरो के उत्तम चरागाह के साथ ही बड़ी फुर्सत से बनाया है।

बागानों की सैर
दुग्तू केवल जंगल के लिए ही नहीं बल्कि बागवानी व कृषि के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां सीढ़ीनुमा खेत खलिहानों में पलती, फाफर, आलू, मूली, गोभी व मटर आदि की मुख्य पैदावार गॉव की सुंदरता को भी बढ़ाती है। यहां के जैविक उत्पाद केवल देश-विदेश को लोगों को आकर्षित ही नही करते बल्कि इतिहास व धर्मिक आस्था से भी जोड देते हैं। जैसे-फाफर यानी कौंदू का आटा नवरात्रि या विशेष उपवास के दिन उपयोग किये जाते हैं।

धार्मिक स्थल
पंचाचूली को स्थानीय भाषा मे ‘न्यूला सै‘ के नाम से जाना जाता है। इसकी पूजा क्षेत्र के तीन गॉव-सोन, दुग्तू व दॉतू के निवासियों के द्वारा हर वर्ष की जाती है। पंचाचूली के करिश्माई दुग्दू गॉव से पश्चिम दिशा में दो किमी की दूरी पर स्थित सौंदर्यशील हिमच्छादित पंचाचूली की पांडवों की प्रतीक पांच अति सुन्दर नुकीली व कुन्ती मॉ व द्रोपती की प्रतीक दो छोटी चोटियांे की सुंदरता प्रातः सूर्य उदय एवं सायं सूर्य ढलने के समय अप्रतिम सोने की तरह दमकती हुई दिखाई देती हैं।

अनूठी होती है सुबह-शाम सोना, रात को चांदी युक्त पंचाचूली नाइट
दुग्तू पंचाचूली का बेस कैंप भी है। रात को भी यह बेस कैम्प दिन जैसा लगता है। चांदनी रात मंे बर्फ से ढके पंचाचूली शिखरों का चांदी की तरह चमकते हुए नजारा रात में बेहद खूबसूरती के साथ देखा जा सकता है। इन पर्वतो की खूबसुरती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सूर्योदय के वक्त बर्फ से ढके ये पर्वत सिंदूरी आभा लिए सोने से नजर आते हैं, तो चांदनी रात मे चांदनी की चमक के साथ चांदी जैसा अनुभव कराती हैं। इनके साथ कई मान्यताए, अनुभव, रोमांच और खूबसुरती भी जुड़ी हुई है।

पंचगंगा जल धारा
पंचाचूली के हिम खंड से निकलने वाली पंच गंगा जल धारा दर्शनीय व रोचक है। धार्मिक दृष्टि से पंच गंगा जल धारा को देखना व इसका सेवन करना प्राचीन काल से अत्यन्त पवित्र व उत्तम माना जाता है।

मिनी कैलाश-ऊं पर्वत, झील व शिलालेख के दर्शन
दुग्दू गांव से पश्चिम दिशा में पॉच किमी की चढ़ाई पर पैदल ट्रेकिंग करते हुए स्यागकुटी फाटफो, गबे, रामा व बिदांग नामक स्थान से प्राकृतिक ऊं पर्वत यानी छोटा कैलाश के दर्शन किये जाते हैं। वहीं दुग्दू गांव से दो किमी की ट्रेकिंग कर प्राचीन काल से एक रंजनती तालाब पहुंचा जाता है। यहां नाग देवता का वास माना जाता है। काफी ऊंचाई के कारण यह स्थान भी प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। वहीं गॉव से दो किमी पहले प्राचीन पैदल मार्ग में तिब्बती भाषा मे लिखे कई शिलालेख विद्यमान हैं। इसके अलावा मखमल की तरह प्राकृतिक रूप से बने धास के मैदान व जानवरों के चरागाह भी अप्रतिम सुंदरता युक्त है।

अन्य दार्शनिक स्थल
गब्बे ग्वार स्थल- यह दुग्तू गांव व र्फाट फू ग्वार चरागाह से काफी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। जहां ब्रहम कमल बहुतायत में पाये जाते है। यहां गांव के घरेलू जानवरांे को चरने के लिए भेजा जाता है। यहां तापमान कम होने के साथ ही हमेशा खूबसूरत कोहरा छाया रहता है।
स्यंगकुटी स्थल- प्राचीन काल से ही यह स्थल बकरियांे का ग्वार चरागाह स्थल रहा है। यहां से पंचाचूली का विहंगम दृश्य व कल-कल करती न्युला गंगा यांगती का सौंदर्य देखने लायक होता है। इसे पंचाचूली व्यू पॉईट कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा।

ऐतिहासिक महत्व
किंवदंतियों के अनुसार राजा चरख्हयॉ की कथा के स्थान दारमा वैली में कई सदियों पहले तिब्बत देश के राजघराने के खास लोग लामा सहित एक दल में आये थे। गबला देव (गोलू देवता) की पवित्र स्थली मंे स्थित ग्राम दॉतू मे जन्म लिए एक तेजस्वी बालक को तिब्बत के राजा लामा या गुरूदेव के अवतार मानते हुए अल्पायु में ही तिब्बत ले गये थे। वह बालक बाद में तिब्बत का राजा बना।
राजुली मालूशाही की कथा- 12वी शताब्दी में महाप्रतापी राजकुमार मालूशाही व दारमा वैली के सुनपति राजकुमार की रुपवती पुत्री राजुला की प्रसिद्ध प्रेम गाथा है।
महान दानवीर जसुली बूढ़ी की गाथा- कुमाऊं कमिश्नर सर हेनरी रैमजे की बातों से अत्यधिक प्रभावित हो कर दानवीर जसुली बूढ़ी ने पहाड़ के जटिल व दुर्गम पैदल मार्गों पर यात्रियांे के लिए जगह-जगह व प्राचीन आदि कैलाश मानसरोवर मार्ग पर विश्राम गृह/धर्मशाला बनवाईं, जो आज भी विद्यमान है। सबसे बड़ी धर्मशाला अल्मोड़ा शहर में है, आज भी यहां लोग विश्राम करते हैं।

कैसे पहुचें दारमा वैली –
1.रेल मार्ग- दिल्ली से हल्द्वानी-काठगोदाम रेल से, यहां से उत्तराखंड रोडवेज या टैक्सी द्वारा धारचूला होते हुए दारमा वैली।
2.सडक मार्ग-दिल्ली से राष्ट्रीय राज मार्ग टनकपुर-पिथौरागढ व धारचूला होते हुए दारमा वैली।
3.वायुमार्ग- दिल्ली से निकटतम हवाई अडडा पंतनगर, यहां से रोडवेज व टैक्सी से धारचूला होते हुए दारमा वैली।
कहां ठहरें- टी0 आर0 सी0 बेस कैम्प पंचाचूली, होम स्टे या होटल।
अधिक जानकारी संपादक जीवन सिंह दुग्ताल से उनके ई-मेल dugtal1264@rediffmail.com से प्राप्त कर सकते हैं।

(लेखक बीडी पांडे जिला चिकित्सालय में वरिष्ठ फिजीशियन के पद पर कार्यरत वरिष्ठ चिकित्सक हैं।)


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Panchachuli with Nanda Devi Temple1

नवीन जोशी नैनीताल । देवभूमि कुमाऊं में एक स्थान ऐसा भी है, जिसके बारे में कोई कहता है-‘सार संसार-एक मुनस्यार’, और कोई ‘सात संसार-एक मुनस्यार’ तो कोई ‘आध संसार-एक मुनस्यार’। लेकिन इन तीनों कहावतों का मूलतः एक ही अर्थ है सारे अथवा सारे अथवा आधे अथवा सात महाद्वीपों युक्त संसार एक ओर और मुन्स्यारी एक ओर। यानी आप पूरी दुनियां देख लें, लेकिन यदि आपने मुन्स्यारी नहीं देखा तो फिर पूरी दुनिया भी नहीं देखी। मुनस्यारी में कुदरत अपने आंचल में तमाम खूबसूरत नजारों के साथ अमूल्य पेड़-पौधे व तमाम जड़ी-बूटियों को छुपाए हुए बताती है कि वह उस पर खासतौर पर मेहरबान है। देशी-विदेशी सैलानियों को बेहद पसंद समुद्र सतह से 2,200 मीटर की ऊंचाई पर बसा मुन्स्यारी देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत और नेपाल सीमा से लगा हुआ एक छोटा का कस्बा है, किंतु इसकी पूरी खूबसूरती इसके सामने खड़ी हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं और नजदीकी खूबसूरत प्राकृतिक स्थलों और यहां की सांस्कृतिक खूबसूरती में निहित है। खासकर सामने की विस्मयकारी हिमालय की पांच चोटियांे वाली पंचाचूली पर्वतमाला, जिसे कोई पांच पांडवों के स्वर्गारोहण करने के दौरान प्रयोग की गई पांच चूलियां या रसोइयां कहते हैं तो कोई साक्षात हिमालय पर रहने वाले पंचमुखी देवाधिदेव महादेव। कहते हैं पांडवों ने स्वर्ग की ओर बढ़ने से पहले यहीं आखिरी बार खाना बनाया था। 

मुन्स्यारी पहुंचने के लिए 295 किमी की दूरी पर स्थित काठगोदाम और हल्द्वानी नजदीकी रेलवे स्टेशन तथा 330 किमी दूर पंतनगर नजदीकी हवाई अड्डा है। दिल्ली से मुन्स्यारी की सड़क मार्ग से दूरी 612 किमी, नैनीताल से 288 किमी और नए बन रहे पिथौरागढ़ के नैनी सैनी हवाई अड्डे से 128 किमी है। यहां पहुंचने के लिए अल्मोड़ा से आगे धौलछीना, सेराघाट, गणाई, बेरीनाग, चौकोड़ी से थल, नाचनी, टिमटिया, क्वीटी, बिर्थी, डोर, गिरगांव, रातापानी और कालामुनि होते हुए सड़क मार्ग से यहां पहुंचा जाता है। बिर्थी के पास सैकड़ों फीट की ऊंचाई से गिरने वाले दो बड़े झरने और एक लोहे के पुल के पास बाघ की तरह नजर आने वाला पत्थर-टाइगर स्टोन रोमांचित करते हैं। यहां से कठिन चढ़ाई वाली बेहद संकरी सड़क कालामुनि टॉप पर ले जाती है, जहां से पंचाचूली का दर्शन हर किसी की आंखें खुली की खुली रखने वाला होता है। लगता है मानो बांहें फैलाए विशाल हिमालय अपने पास बुला रहा हो, और आगे चलने पर नजर आता है पंचाचूली की गोद में बसा मुन्स्यारी। फरवरी से मई यानी बसंत और सितम्बर से नवम्बर यानी हेमंत ऋतुओं को यहां आने के सबसे उपयुक्त समय माना जाता है, इस दौरान यहां धुले-धुले से बेहद खुशनुमा प्राकृतिक नजारे दृष्टिगोचर होते हैं। साफ व सुहावने मौसम में यहां से सूर्याेदय, और खासकर सूर्यास्त के दौरान स्वर्णिम आभा के साथ दमकती पंचाचूली की चोटियांे का नजारा विस्मयकारी होता है। नवम्बर से फरवरी तक की सर्दियों में मुन्स्यारी कालामुनि से ही हिमाच्छादित रहती है, अक्सर होने वाली बर्फवारी के साथ इस दौरान यहां उत्तराखंड राज्य के राज्य वृक्ष बुरांश पर खिले लाल दमकते फूलों के नजारे तो स्वर्ग सरीखे दिव्य होते हैं, किन्तु पहुंचना थोड़ा कठिन होता है। वहीं गर्मियों के दिनों में मुन्स्यारी की शीतलता मानव में नए प्राण भर देती है। यह समय ट्रेकिंग के लिए सर्वश्रेष्ठ रहता है, लेकिन कई बार दूरी से पंचाचूली व अन्य खूबसूरत दृश्य धुंध की वजह से नहीं दिखाई देते हैं। वर्षाकाल में सड़कों के खराब रहने की संभावना रहती है। गर्मियों में होटल, लॉज और गेस्ट हाउसों के भरे होने की समस्या भी रहती है। आवासीय सुविधा के लिए कुमाऊं मंडल विकास निगम के शानदार रेस्ट हाउस के साथ ही लोक निर्माण विभाग का गेस्ट हाउस और कई प्राइवेट होटल भी हैं।

मुनस्यारी के कालामुनि व खलिया टॉप में स्कीइंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां की हल्की घुमावदार व सुरक्षित ढलानों के अंतराष्ट्रीय स्तर का स्कीइंग स्थल बनने की पूरी संभावनाएं हैं। यह पंचाचूली व मिलम के साथ ही नामिक और रालम ग्लेशियरों के लिए ट्रेकिंग का बेस कैंप भी है, खासकर विदेशी पर्यटक यहां ट्रेकिंग और माउंटेनियरिंग के लिए आते हैं। कालामुनि में स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र मां दुर्गा का प्रसिद्ध मंदिर भी है। नवरात्रों में यहां के उल्का देवी मंदिर में ढोल, वाद्य यंत्र व नगाड़ों की भक्तिमय गूंज के साथ ‘मिलकुटिया’ का बहुत बड़ा मेला लगता है। बेटुलीधार, डानाधार और खलिया टॉप नजदीकी खूबसूरत पिकनिक स्पॉट हैं। नीचे घाटी में कल-कल बहती गोरी गंगा में रिवर राफ्टिंग की रोमांचकारी सुविधा उपलब्ध है। गोरी घाटी को टेªकिंग का भी स्वर्ग कहा जाता है। यहां कई जगह औषधीय गुणों युक्त गंधक की मौजूदगी बताई जाती है, जिसके प्रभाव से गोरी गंगा के जल में कई त्वचा रोगों संबंधी औषधीय गुण बताए जाते हैं। इसके जलागम में शंखधुरा, नानासैंण, जेती, जल्थ, सुरंगी, शमेर्ली व गोड़ीपार जैसे छोटे-छोटे गांवों का नजारा भी आकर्षित करता है। इसके पास ही जोहार घाटी है, जो बीते समय में तिब्बत के साथ व्यापार करने का रूट हुआ करता था। बंगाल से लेकर कश्मीर व हिमांचल सहित पूरे देश भर से व्यापारी यहां नमक व ऊन के बने वस्त्रों की खरीद फरोख्त के लिए आया करते हैं। उस दौर की ऐतिहासिक यात्रा की ढेरों यादें यहां आज भी शेर सिंह पांगती द्वारा स्वयं के प्रयासों से तैयार बड़े संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इस संग्रहालय को देखना भी मुन्स्यारी यात्रा का एक बड़ा आकर्षण होता है। यहां के तिकसेन नाम के बाजार में उच्च हिमालयी क्षेत्रों की जंबू, गंधरैणी, काला जीरा आदि जड़ी-बूटियां, यहां की खास बड़े आकार की राजमा दाल तथा यहां घर-घर में पलने वाली भेड़ों का पश्मीना ऊन व उससे बनी चीजें खास आकर्षण होती हैं। मुन्स्यारी वाइल्डलाइफ व बर्ड वांचिंग का भी स्वर्ग है। इस विधा में दिलचस्पी रखने वालों को यहां विस्लिंग थ्रस, वेगटेल, हॉक कूकू, फॉल्कोन और सर्पेंट ईगल सहित सैकड़ों प्रकार की खूबसूरत पक्षियों की चहचहाहट और गुलदार, कस्तूरी मृग व पर्वतीय भालू आदि वन्य जीवों की गूंज आसानी से सुनाई दे जाती है, और बहुधा दर्शन भी हो जाते हैं।

मुन्स्यारी संबंधी अन्य चित्र:

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