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June 20, 2024

भारत के इतिहास में पहला जौहर दिखाने वाली, ‘उत्तराखंड की झांसी की रानी-जिया रानी’ की कहानी

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 28 मई 2024 (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)। देवभूमि उत्तराखंड में गौरवशाली सांस्कृतिक-धार्मिक इतिहास की अनेकों कथाएं प्रसिद्ध हैं। आज हम आपको उत्तराखंड के एक ऐतिहासिक प्रसिद्ध चरित्र ‘जनदेवी’ जिया रानी की कथा पढ़ाने जा रहे हैं, जिनके हरिद्वार के मायापुर से लेकर नैनीताल के रानीबाग तक आज भी स्पष्ट उपस्थिति नजर आती हैं और जो उत्तराखंड की लोककथाओं में रची बसी हैं।

उन्हें भारत के इतिहास में पहला जौहर दिखाने वाली रानी भी माना जाता है। इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के मुताबिक जिया रानी प्रख्यात उत्तराखंडी प्रेमकथा के नायक मालूशाही की दादी थीं। उन्होंने अपने अल्पायु पुत्र धामदेव की जगह मुगलों व तुर्कों की सेना का सामना किया इसलिये उन्हें उत्तराखंड की ‘झांसी की रानी’ भी कहा जाता है। देखें रानीबाग में उत्तरायणी पर कत्यूरी वंशजों द्वारा किया जाने वाला जियारानी का जागर :

देश की तत्कालीन परिस्थितियाँ (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

उस दौरान दिल्ली में तुगलक वंश के फिरोज शाह तुगलक के निर्बल वंशज शासन कर रहे थे। मध्य एशिया के लूटेरे शासक तैमूर लंग ने भारत की महान समृद्धि और वैभव के बारे में बहुत बातें सुनी थीं। उसे जब इस बात का पता चला कि दिल्ली में तुगलक वंश के निर्बल वंशज शासन कर रहे थे। उसने भारत की दौलत लूटने के मकसद से आक्रमण की योजना भी बनाई और दिल्ली की कमजोर स्थितियों का फायदा उठाकर भारत पर चढ़ाई कर दी। इससे भारत में तुर्कों का शासन स्थापित हो गया।

उत्तराखंड की तत्कालीन परिस्थितियाँ (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

पुंडीर क्षत्रिय राजपूत Pundir Kshatriya Rajput - #पुंडीर_रानी इतिहास में  कुछ ऐसे अनछुए व्यक्तित्व होते हैं जिनके बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते मगर  एक ...इस दौरान हरिद्वार के मायापुर में पुंडीरों का राज्य था। अमरदेव पुंडीर राजा थे। अमरदेव की पुत्री थीं मौला देवी, जो बाद में जिया रानी के राम से विख्यात हुईं। पुंडीर राज्य के साथ ही उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ में भी तुर्कों व मुगलों के हमले लगातार होते रहते थे। ऐसे ही एक हमले में कुमाऊँ के पिथौरागढ़ के कत्यूरी राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा जिसके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमाऊँ के कत्यूरी राजवंश के राजा प्रीतमदेव उर्फ पृथ्वीपाल से कर दिया।

मौला देवी, राजा प्रीतमपाल की दूसरी रानी थी। मौला रानी से 3 पुत्र धामदेव, दुला व ब्रह्मदेव हुए, जिनमें ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतम देव की पहली पत्नी से जन्मा भी मानते हैं। मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला। उन दिनों माता को ‘जिया’ कहा जाता था इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया।

वर्ष 1398 में समरकंद का लूटेरा शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने और रौंदने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था। उस समय वहाँ वत्सराजदेव पुंडीर शासन कर रहे थे। उन्होंने वीरता से तैमूर का सामना किया मगर शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उत्तर भारत में गंगा, जमुना, रामगंगा के क्षेत्र में तुर्कों का राज स्थापित हो चुका था। इन तुर्कों को ‘रुहेले’ यारी रुहेलखंडी भी कहां जाता था। रुहेले राज्य विस्तार या लूटपाट के इरादे से पर्वतों की ओर गौला नदी के किनारे बढ़ रहे थे।

कहा जाता है कि इस दौरान इन्होंने हरिद्वार क्षेत्र में भयानक नरसंहार किया। जबरन बड़े स्तर पर मतपरिवर्तन हुआ और तत्कालीन पुंडीर राजपरिवार को भी उत्तराखंड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी जहाँ उनके वंशज आज भी रहते हैं और ‘मखलोगा पुंडीर’ के नाम से जाने जाते हैं।

जिया रानी ने किया कुमाऊँ के राजपूतों की सेना का गठन (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

भारत के इतिहास में पहला जौहर करने वाली उत्तराखंड की जिया रानीलूटेरे तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने के लिए भेजी। जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने फौरन इसका सामना करने के लिए कुमाऊँ के राजपूतों की एक सेना का गठन किया। तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच नैनीताल के रानीबाग क्षेत्र में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें तुर्क सेना की जबरदस्त हार हुई।

इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गए लेकिन दूसरी तरफ से अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुँची और इस हमले में जिया रानी की सेना की हार हुई। जिया रानी एक बेहद खूबसूरत महिला थी इसलिए हमलावरों ने उनका पीछा किया और वह अपने सतीत्व की रक्षा करते हुऐ रानीबाग की एक गुफा के गुप्त मार्ग से सीधे हरिद्वार निकल गयीं। यह गुफा आज भी रानीबाग में बतायी जाती है।

जब राजा प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो जिया रानी से चल रहे मनमुटाव के बावजूद स्वयं सेना लेकर आए और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया। इसके बाद वो जिया रानी को अपने साथ पिथौरागढ़ ले गए। इस बीच प्रीतमदेव की असामयिक मृत्यु हो गयी।

बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन किया (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

राजा प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद जियारानी के पुत्र धामदेव को राज्य का कार्यभार दिया गया किन्तु धामदेव की अल्पायु की वजह से जिया रानी को उनका संरक्षक बनाया गया। इस दौरान मौला देवी (जियारानी) ने बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन किया, रानी स्वयं शासन संबंधी निर्णय लेती थी और राजमाता होने के चलते उन्हें जिया रानी भी कहा जाने लगा। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

ऐतिहासिक मान्यताएं (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

(Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand) कहानी ऐसी पहाड़ी वीरांगना की जो कहलाई उत्तराखंड की लक्ष्मीबाई, तुर्कों को किया था चित, होती है घरों में पूजाकुछ इतिहासकार बताते हैं कि जिया रानी के पिता ने उनकी शादी राजा प्रीतम देव के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध की थी जबकि कुछ कथाओं के आधार पर मान्यता है कि राजा प्रीतमदेव ने बुढ़ापे में जिया से दूसरी शादी की। विवाह के कुछ समय बाद जिया रानी की प्रीतम देव से अनबन हो गयी और वह अपने पुत्र के साथ गौला नदी के घाट यानी किनारे चली गई, जहाँ उन्होंने एक खूबसूरत बाग बनाया, जिसे आज रानीबाग कहा जाता है। इस जगह पर जिया रानी 12 साल तक रही थीं। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

इतिहासकारों के अनुसार जिया रानी बेहद खूबसूरत और सुनहरे केशों वाली सुन्दर महिला थीं। नदी के जल में उसके सुनहरे बालों को पहचानकर तुर्क उन्हें खोजते हुए आए और जिया रानी को घेरकर उन्हें समर्पण के लिए मजबूर किया लेकिन रानी ने समर्पण करने से मना कर दिया। दूसरे इतिहासकारों के अनुसार एक दिन जैसे ही रानी जिया नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही उन्हें तुर्कों ने घेर लिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थीं। उन्होंने अपने ईष्ट देवता का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

रंगीन ‘चित्र शिला’ के रूप में आज भी मौजूद (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

लूटेरे तुर्कों ने उन्हें बहुत ढूंढा लेकिन उन्हें जिया रानी कहीं नहीं मिली। कहते हैं उन्होंने अपने आपको अपने लहँगे में छिपा लिया था और वे उस रंग-बिरंगे रत्नजड़ित लहँगे के आकार में ही शिला बन गई थीं।  यह भी कहते हैं कि रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही तुर्क सेना ने उन्हें घेर दिया। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है जिसका आकार कुमाउनी पहनावे वाले रंगबिरंगे लहंगे के समान हैं। उस शिला पर रंगीन पत्थर ऐसे लगते हैं मानो किसी ने रंगीन लहँगा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी का स्मृति चिन्ह ‘चित्र शिला’ भी मानी जाती है, और रानीबाग के गौला नदी के घाट को ‘चित्रशिला’ घाट भी कहा जाता है। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

इस रंगीन शिला को जिया रानी का स्वरुप माना जाता है और कहा जाता है कि जिया रानी ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए इस शिला का ही रूप ले लिया था। रानी जिया को यह स्थान बेहद प्रिय था, और यहीं उन्होंने अपने जीवन की आखिरी साँस भी ली थी। रानी जिया के कारण ही यह बाग आज रानीबाग नाम से मशहूर है। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

रानी जिया हमेशा के लिए चली गई लेकिन उन्होंने वीरांगना की तरह लड़कर आखिरी वक्त तक तुर्क आक्रान्ताओं से अपने सतीत्व की रक्षा की। वर्तमान में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर 14 जनवरी को चित्रशिला में हजारों लोग व खासकर कत्यूरी शासकों के वंशज अपने परिवार के साथ आते हैं और ‘जागर’ गाते हैं। इस दौरान यहाँ पर ‘जय जिया-जय जिया’ के स्वर गूंजते हैं। लोग रानी जिया को पूजते हैं और उन्हें ‘जनदेवी’ और न्याय की देवी भी माना जाता है। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

रानी जिया उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की एक प्रमुख सांस्कृतिक विरासत बन चुकी हैं। अलबत्ता यह भी है कि जिया रानी अपने जिस शौर्य, बलिदान और त्याग की पराकाष्ठाओं की उदाहरण हैं, उन्हें उस स्तर की पहचान नहीं मिल पाई है, जिसकी वह हकदार हैं। (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)

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