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June 16, 2024

प्रतिष्ठित विद्यालय के विवाद में लखनऊ डायेसिस भी कूदी, दूसरे प्रतिष्ठित विद्यालय पर भी उठाए सवाल

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नवीन समाचार, नैनीताल, 16 दिसम्बर 2020। नगर के प्रतिष्ठित विद्यालय के विवाद में अब लखनऊ डायेसिस भी कूद गई है। लखनऊ डायेसिस ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में इंटरवेंशन यायिका दाखिल कर उनका पक्ष भी सुने जाने का अनुरोध किया है। साथ ही पत्रकार वार्ता में इस प्रतिष्ठित विद्यालय के साथ ही आगरा डायेसिस एवं उसके द्वारा संचालित दूसरे प्रतिष्ठित विद्यालय व अन्य संपत्तियों पर अपना मालिका हक होने का दावा किया है। साथ ही पत्रकार वार्ता कर कहा कि आगरा डायेसिस तथा उसके द्वारा की गई अंतरिम प्रधानाचार्य की नियुक्ति गलत हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं है। वास्तव में लखनऊ डायेसिस इस संपत्ति का मालिक है।

बृहस्पतिवार को पत्रकार वार्ता करते लखनऊ डायेसिस के अधिकारी।

बृहस्पतिवार को इस संबंध में चर्च ऑफ इंडिया के लखनऊ डायेसिस के बिशप व संबंधित विद्यालयों की प्रबंधन समिति के चेयरमैन होने का दावा करने वाले विजय मंटोडे के विधि सलाहकार राकेश सोबती व सोशल एडवाइजर राकेश मिश्रा ने कहा कि शुरुआत से ही इन दोनों विद्यालय एवं चर्च की अन्य संपत्तियां लखनऊ डायेसिस की मिल्कियत रही हैं। 1976 में सीएनआई यानी चर्च ऑफ नार्थ इंडिया ने अवैधानिक रूप से डायेसिस व संपत्तियों का बंटवारा किया। जिसके बाद से ही न्यायालयों में डायेसिसों के विवाद न्यायालय में चल रहे हैं। अलबत्ता 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ डायेसिस के पक्ष में अंतिम निर्णय दे दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अपना दावा कर रहे आगरा डायेसिस का नगर के प्रतिष्ठित विद्यालय का प्रबंधन करने वाली सोसायटी में पंजीकरण भी नहीं है, बल्कि यह लखनऊ डायेसिस के नाम पर है। इसलिए आगरा डायेसिस को अंतरिम प्रधानाचार्य नियुक्त करने का अधिकार नहीं है। यह भी कहा कि स्कूल के काबिज एवं अंतरिम दोनों प्रधानाचार्य उनके प्रतिनिधि नहीं हैं एवं अवैध हैं। यह भी बताया कि विवाद आगरा व लखनऊ डायेसिस सहित चार पक्षों के बीच चल रहा है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आपसी विवाद निचली अदालत में निपटाने को कहा है। यह भी दावा किया कि सवोच्च न्यायालय ने याचिका संख्या 8800 व 8801 में लखनऊ डायेसिस के पक्ष में अंतिम रूप से निर्णय दे दिया है।उल्लेखनीय है कि आगरा डायेसिस के अधिकारियों के अनुसार 1976 तक स्वामित्व के विवाद में आए नगर के दोनों प्रतिष्ठित विद्यालय लखनऊ डायेसिस के अंतर्गत ही आते थे। इसके बाद उत्तराखंड-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र आगरा डायेसिस के अधिकार में आ गए थे। लेकिन 2004 में लखनऊ डायेसिस के बिशप ने पुनः इन विद्यालयों पर अपना अधिकार बताते हुए इन विद्यालयों के स्वामित्व को विवादित बना दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि इन विद्यालयों को शिक्षा के मंदिर नहीं वरन ‘प्रॉपर्टी’ बताकर पर कब्जा करने के लिए जरूर दोनों डायेसिस व अन्य लोग बर्चस्व की जंग लड़ रहे हैं, किंतु इन विद्यालयों की छवि खराब होने पर किसी को चिंता नहीं है। दोनों विद्यालयों का नाम उछाल रहे हैं। हमारा मानना है कि दोनों विद्यालय नगर की पहचान हैं। इसलिए हम इस पूरे विवाद में किसी भी विद्यालय का नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें : हरक सिंह रावत नहीं लड़ेंगे 2022 का उत्तराखंड विधानसभा चुनाव

नवीन समाचार, देहरादून, 24 अक्टूबर 2020। उत्तराखंड के मंत्री हरक सिंह रावत ने कहा है कि वह 2022 में होने वाला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। रावत ने शुक्रवार को यहां अपने निवास में संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को सूचित कर दिया है कि वह 2022 में होने वाला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। रावत के इस फैसले को उन्हें राज्य श्रम कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष पद से हाल में हटाए जाने से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारे में इस प्रकार की अटकलें लगाई जा रही हैं कि राज्य के वन मंत्री को पहले से बताए बिना बोर्ड के अध्यक्ष पद से जिस प्रकार हटाया गया, उसे लेकर नाराजगी जताने के लिए उन्होंने अचानक यह घोषणा की। इस संबंध में पूछे जाने पर रावत ने कहा कि किसी पद पर नियुक्ति करना मुख्यमंत्री का अधिकार है, लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि वह इस बारे में उनसे बात करेंगे। तीन बार कैबिनेट मंत्री रहे रावत ने 1989 में भाजपा के साथ अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, लेकिन बाद में वह बसपा और फिर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वह 2016 में फिर से भाजपा में शामिल हो गए थे।

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