Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

प्रमुख सचिव को हाई कोर्ट से राहत, जारी हुए थे वारंट…

Spread the love

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अप्रैल, 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खण्डपीठ ने प्रदेश के प्रमुख सचिव वन आनंद वर्धन के न्यायालय में पेश होने के बाद उनके खिलाफ जारी जमानती वारंट को वापस ले लिया है, और उन्हें आदेश दिए है कि केंद्र सरकार द्वारा 2007 में दिए गए बाघों के संरक्षण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देशों के पालन में की गयी कार्यवाही पर 23 अप्रैल तक जवाब पेश करें।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व बीती 9 अप्रैल को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बाघों के संरक्षण के मामले में शपथपत्र दाखिल न करने स्वयं न्यायालय में न आने पर प्रमुख सचिव वन के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया है। मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए एसएसपी देहरादून को निर्देश दिए हैं कि वह 22 अप्रैल को प्रमुख सचिव को कोर्ट में पेश करें। मामले के अनुसार ‘ऑपरेशन आई ऑफ टाइगर इंडिया’ द्वारा हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर न्यायालय ने पूर्व में केंद्र व राज्य सरकार को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए थे। इसे पेश करने प्रमुख सचिव स्वयं नहीं आये, बल्कि अपर सचिव को भेज दिया। वहीं केंद्र ने अपने शपथपत्र में कहा कि राज्यों को 2017 में ही टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स बनाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि केंद्र के सर्कुलर पर क्या कार्रवाई की गई। इस पर पहले पहली अप्रैल तक शपथपत्र दाखिल करने को कहा था। इस दौरान सरकार ने कोर्ट को बताया कि उनके द्वारा 20 मार्च को ही प्रमुख सचिव को पत्र भेज दिया था। जिसके बाद कोर्ट ने प्रमुख सचिव को नौ अप्रैल को कोर्ट में पेश होने को कहा था। सोमवार को प्रमुख सचिव पेश नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपर सचिव को भेज दिया। इस पर कोर्ट ने बिना हाजिर माफी का प्रार्थना पत्र दिए उनकी अनुपस्थिति को बेहद गंभीरता से लेते हुए प्रमुख सचिव के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया।

यह भी पढ़ें : हरिद्वार के डीएम को हाईकोर्ट से आपराधिक अवमानना का नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 10 अप्रैल 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने हरिद्वार में अतिक्रमण के नाम पर गलत तरीके से अतिक्रमण हटाने पर गम्भीर रुख अख्तियार करते हुए हरिद्वार के जिला अधिकारी व हरिद्वार नगर निगम के मुख्य नगर आयुक्त के खिलाफ स्वतः सज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी सुनीता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उनके पास अपनी दुकान की सिविल न्यायालय द्वारा पारित आदेश की डिक्री भी थी जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि उनको बिना सुने दुकान से हटाया नहीं जा सकता है। बावजूद हाई कोर्ट के पूर्व में एक आदेश, जिसमें कहा गया था कि हरिद्वार में अवैध रूप से बने अतिक्रमणों को हटाया जाये। परंतु जिला अधिकारी व नगर निगम ने इस आदेश की आड़ में नगर निगम द्वारा आवंटित दुकानों को भी अतिक्रमण मानकर उनका पूरा सामान गंगा नदी में फैंक दिया और उनको दुकानों से जबरदस्ती बेदखल कर दिया। इस याचिका पर ही आज हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह आदेश दिये।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट में व्यक्तिगत पेश हुए हरिद्वार के डीएम दीपक रावत, कोर्ट ने थमाया अवमानना का नोटिस

-हरिद्वार के शीशराम मेमोरियल ट्रस्ट की संपत्ति पर बने छात्रावास को अतिक्रमण मानते हुए बिना नोटिस दिये तोडने पर उच्च न्यायालय में दायर की गयी है याचिका
नवीन समाचार, नैनीताल, 2 अप्रैल 2019। बिना नोटिस दिए अतिक्रमण हटाने के मामले में हरिद्वार के जिलाधिकारी दीपक रावत मंगलवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष खंडपीठ के पिछली सुनवाई पर दिये गये आदेशों के तहत पेश हुए। इस दौरान खंडपीठ ने अपने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर उनको अवमानना का दोषी मानकर नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा।
मामले के अनुसार शीशराम मेमोरियल ट्रस्ट हरिद्वार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उनकी संस्था बालिका हित एवं शिक्षा के लिए कार्य कर रही है। डीएम हरिद्वार द्वारा ट्रस्ट की संपत्ति पर बने छात्रावास को अतिक्रमण मानते हुए बिना नोटिस दिये तोड़ दिया। याचिका में कहा कि हाईकोर्ट ने सरकारी भूमि पर काबिज अतिक्रमणकारियों को हटाने का आदेश पारित किया था। साथ ही सरकारी भूमि पर काबिज रजिस्ट्री वाले अतिक्रमणकारियों को चार सप्ताह का नोटिस देना था। वे 1950 से उक्त भूमि पर काबिज है उन्होंने कहीं पर भी अतिक्रमण नही किया है। बावजूद प्रशासन द्वारा उन्हें व्यक्तिगत नोटिस और सुनवाई का मौका नहीं दिया। सिर्फ नगर निगम द्वारा भूमि खाली करने के लिए एक विज्ञप्ति जारी कर दी गई थी।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : उत्तराखंड के राजकीय महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों के 837 रिक्त पदों पर जारी भर्ती प्रक्रिया पर रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 अप्रैल 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों के विभिन्न विषयों में 837 रिक्त पदों पर की जा रही भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। वहीं लोक सेवा आयोग को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने देहरादून निवासी रश्मि नौटियाल व अन्य की याचिका पर यह आदेश जारी किया। याची का कहना था कि महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों के विभिन्न विषयों में 837 रिक्त पदों पर लोक सेवा आयोग ने 17 अप्रैल 2017 को भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। आयोग ने यूजीसी के मानकों की अनदेखी करते हुए साक्षात्कार के आधार पर नियुक्तियां कीं। यूजीसी के नियमों के अनुसार लिखित परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों की स्क्रीनिंग के बाद 100 अंकों की जो मेरिट बनेगी उसमें साक्षात्कार का अधिमान केवल 20 प्रतिशत होगा। शैक्षिक योग्यता, शैक्षणिक अनुभव, शोध पत्र और एपीआई के आधार पर अंतिम चयन किया जाएगा। आयोग ने मात्र साक्षात्कार के आधार पर ही चयन किया। आयोग ने लंबे समय से संविदा पर अध्यापन कर रहे शिक्षकों को उनके सेवाकाल का भी लाभ नहीं दिया।

यह भी पढ़ें : दून विवि के कुलपति नौटियाल पर गलत तथ्यों से पद प्राप्त करने का आरोप, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्ययाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की संयुक्त खंडपीठ में दून विवि के कुलपति प्रो. चंद्रशेखर नौटियाल की नियुक्ति को देहरादून निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक यज्ञदत्त शर्मा के द्वारा याचिका के जरिये चुनौती दी गयी है। उन पर बायोडाटा में गलत तथ्य देने का आरोप लगाया गया है। याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कुलपति के साथ ही प्रदेश सरकार, यूजीसी और सीएसआईआर से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।
याचिका में कहा गया है कि देहरादून विवि के कुलपति नौटियाल ने अपनी नियुक्ति के लिए दिये बायोडाटा में गलत तथ्य दिए हैं। वे कुलपति पद के योग्य नहीं है। उन्हें शिक्षण का दस वर्ष का अनुभव तक नहीं है। लिहाजा उन्हें यूजीसी और सीएसआईआर के नियमों के विरुद्ध तत्कालीन शिक्षा सचिव डॉ. रणवीर सिंह की पहल पर कुलपति के पद पर नियुक्ति मिली है। सीएसआईआर ने इस मामले में छूट के कोई आदेश भी पारित नहीं किए हैं। कुलपति के चयन के लिए बनाई गई कमेटी भी नियमानुसार नहीं बनी थी।

उल्लेखनीय है कि प्रो. नौटियाल के बायोडाटा के अनुसार उनका जन्म 25 मई 1956 को दून में हुआ। उन्होंने 1975 में डीएसबी परिसर, नैनीताल से बीएससी व 1977 में लखनऊ विवि से एमएससी के बाद उन्होंने दस वर्ष तक कनाडा व यूएसए में बायोटेक्नालॉजी कंपनियों में विभिन्न पदों पर काम किया। 1994 में भारत लौट एनबीआरआई में वैज्ञानिक के रूप में सेवा शुरू की। वर्ष 2010 में एनबीआरआई के निदेशक बने और 2015 में सेवानिवृत हो गए। 2015 में ही उन्हें जेसी बोस नेशनल फेलोशिप मिली। ग्रामीण विकास पर शोध को सीएसआईआर अवार्ड, विज्ञान गौरव सम्मान,टाटा इनोवेशन फेलोशिप, आल इंडिया बायोटेक एसोसिएशन अवार्ड, विज्ञान भारती राष्ट्रीय पुरस्कार आदि सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। 

यह भी पढ़ें : 303 स्थायी कर्मियों की छंटनी पर हाईकोर्ट ने मांगा सरकार से जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिंह की एकलपीठ ने सिडकुल की एक कंपनी के द्वारा अपने स्थायी कर्मियों की छंटनी किये जाने पर उत्तराखंड के श्रम तथा उद्योग एवं औद्योगिक विकास विभागों के प्रमुख सचिव, श्रमायुक्त उत्तराखंड, उप श्रमायुक्त एवं ट्रेड यूनियन के उप रजिस्ट्रार, ऊधमसिंह नगर जिले के डीएम व एसएसपी एवं सिडकुल के महाप्रबंधक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। एकलपीठ ने पूछा है कि इस संबंध में सभी तरह की जानकारियों उपलब्ध होने के बाद भी सरकार के द्वारा क्या कार्रवाई की जा रही है।
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी पंत के द्वारा कहा गया है कि पंतनगर के सेक्टर नंबर 2 पर स्थित प्लॉट नंबर 10 पर स्थापित मैसर्स भगवती प्रोडक्ट्स लिमिटेड के द्वारा गत 27 दिसंबर 2018 के 303 स्थायी कर्मियों को गैर कानूनी तरीके से छंटनी की जा रही है और अवैध तरीके से फैक्टरी से मशीनों व सामान को राज्य से बाहर शिफ्ट करने व बिना अनुमति के फैक्टरी को बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। एकलपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई के बाद अगली तिथि चार अप्रैल की तय कर दी है।

यह भी पढ़ें : निचली अदालत से दोषमुक्त दहेज-हत्यारे को हाईकोर्ट से सात साल की सजा

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आलोक सिंह की एकलपीठ ने निचली अदालत से दहेज हत्या के मामले में दोषमुक्त अभियुक्त के खिलाफ सरकार की अपील पर अभियुक्त राजेन्द्र सिंह यादव को सात साल की सजा सुनाई है। कोर्ट ने अभियुक्त को निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने को भी कहा है।
मामले के अनुसार सुनील कुमार यादव निवासी शांतिनगर जिला रामपुर यूपी की छोटी बहिन ममता यादव का विवाह 19 जून 1998 को हिन्दू रीति रिवाज से हुआ था। शादी में अपनी हैसियत के हिसाब से दहेज भी दिया था किन्तु उसका पति शादी के बाद से ही उनसे 50 हजार रूपये की मांग करने लगा, और आखिर 30 जुलाई 2001 को रात को लगभग 10 किसी अन्य व्यक्ति द्वारा फोन करके बताया कि उनकी बहिन को राजेन्द्र सिंह यादव ने मिटटी का तेल डालकर जला दिया है। जिसके बाद मृतका के भाई ने अभियुक्त के खिलाफ आईपीसी की धारा 304बी और 3/4 दहेज निषेध अधिनियम में मुकदमा दर्ज किया। किंतु साक्ष्यो के एडिशनल सेशन जज एफटीसी ऊधमसिंह नगर ने अभियुक्त को 7 जुलाई 2002 को दोषमुक्त करार दे दिया। इस दोषमुक्ति आदेश के खिलाफ सरकार ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। इस पर शुक्रवार को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद निचली कोर्ट के आदेश को गलत करार करते हुए अभियुक्त को सात साल की सजा सुनाई है साथ में अभियुक्त से निचली अदालत में आत्म समपर्ण करने को कहा है। कोर्ट ने माना है कि मृतका की मौत मिटटी के तेल डालने से हुई है।

यह भी पढ़ें : देश में 65 हजार पेट्रोल पम्प खोलने के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट में आई जनहित याचिका, कोर्ट ने यह कहा…

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की ओर से देश भर में खोले जा रहे 65 हजार पेट्रोल पम्प के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता से अपनी सभी मांगों को प्रत्यावेदन केंद्रीय पेट्रोलियम सचिव को देने को कहा है।
बता दें कि देहरादून की संस्था सामाजिक एवं ग्रामीण विकास समिति ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि केंद्र सरकार पूरे देश में 65 हजार पेट्रोल पम्प खोल रही है। इनके खुलने से पर्यावरण प्रदूषण और अधिक बढ़ जाएगा। सरकार पेट्रोल पम्प खोलने की जगह सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, इलेक्ट्रिक कार चलाने, बिजली की क्षमता बढ़ाने आदि पर ऊर्जा के अन्य साधनों पर फोकस करे करे तो प्रदूषण की समस्या से निजात मिल सकती है। मामले को सुनने के बाद न्यायालय ने याचिकाकर्ता से कहा कि अपनी मांगो को केंद्र सरकार के पेट्रोलियम सचिव को दें।

यह भी पढ़ें : एक पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा बंगले का किराया देने में असमर्थ, कोर्ट ने कहा आपकी संपत्ति की जांच करा लें… सुनवाई पूरी

नवीन समाचार, 26 फरवरी 2019। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास मामले में सुनवाई पूरी हो गयी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की युगलपीठ ने इस मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया है। वहीं इस दौरान कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद भगत सिंह कोश्यारी द्वारा पेश उस जवाब को काफी गंभीरता से लिया, जिसमें कहा गया कि चूंकि बंगले का किराया करोड़ों में है, उनके पास किराया इतना किराया चुकाने के लिए धनराशि नहीं है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि क्यों न कोश्यारी जी की संपत्ति की जांच करा ली जाए।
इस दौरान कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व विजय बहुगुणा की ओर से बताया गया कि उन्होंने सरकार की ओर से निर्धारित धनराशि जमा कर दी है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के सांसद भगत सिंह कोश्यारी की ओर से धन के अभाव में निर्धारित राशि जमा करने में असमर्थता जतायी गयी। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से जोर दिया गया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को असंवैधानिक तरीके से आवासों का आवंटन किया गया है। उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियमावली 1997 को उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया है। बताया गया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों पर कुल 2.85 करोड़ रूपये की धनराशि बतौर किराया आंकी गयी थी। इनमें से पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर 4757758 रूपये, स्व0 श्री नारायण दत्त तिवारी पर 1,12,98182 रूपये, रमेश पोखरियाल निशंक पर 40,95,560 रूपये, भुवनचंद्र खंडूड़ी पर 46,59,776 रूपये व पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर 37,50,638 रूपये की बकायी राशि आंकी गयी है।

पूर्व समाचार : हाईकोर्ट की न सरकार ने सुनी-न पूर्व मुख्यमंत्रियों ने, अब भी लंबित है 2.85 करोड़, सुनवाई 18 को

नवीन समाचार, नैनीताल, 14 फरवरी 2019। पूर्व मुख्यमंत्रियों से उनके बंगलों का किराया बाजार दर से वसूलने संबंधी जनहित याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने सरकार से पूर्व मुख्यमंत्रियों की बकाया धनराशि के सम्बंध में कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णय की प्रति कोर्ट में पेश करने को कहा, जिसके लिए महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर ने सोमवार 18 फरवरी तक का समय मांगा। मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चन्द्र खुल्बे की खंडपीठ ने इसे मंजूर कर लिया। लिहाजा मामले की सुनवाई अब 18 फरवरी को होगी।
उल्लेखनीय है कि रुलक यानी रूरल लिटीगेशन एंड एनटाइटिलमेंट केंद्र संस्था के अध्यक्ष अवधेश कौशल की इस जनहित याचिका पर बुधवार को उच्च न्यायालय में राज्य के महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर द्वारा उच्च न्यायालय की संयुक्त खंडपीठ में रखे गये पूरक शपथ पत्र के जरिये बताया कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक पर 40.95 लाख, भुवन चंद्र खंडूड़ी पर 46.59 लाख, विजय बहुगुणा पर 37.50 लाख, भगत सिंह कोश्यारी पर 47.57 लाख तथा एनडी तिवारी पर सर्वाधिक 1.12 करोड़ रुपये किराया बकाया है। यह भी खुलासा हुआ कि राज्य सरकार तो पूर्व मुख्यमंत्रियों पर लंबित इस किराये को माफ करने का फैसला ले चुकी है, किंतु राज्य के न्याय व वित्त विभाग इस मामले में अपनी कोई राय यानी सहमति नहीं दी है। इस पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने सवाल उठाया कि सरकार ने शपथ पत्र में सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से कैबिनेट के नोट में किराया माफ करने संबंधी प्रार्थना करने का उल्लेख किया गया है, जबकि न्याय विभाग व वित्त विभाग ने राय देने से इन्कार किया है।

यह भी पढ़ें : पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे कैट के चेयरमैन को उत्तराखंड हाईकोर्ट से अवमानना का नोटिस, जानें वजह…

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 फरवरी 2019। रैमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त चर्चित आइएफएस संजीव चतुर्वेदी के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने आदेश का अनुपालन न करने पर कैट यानी केंद्रीय प्रशासनिक अभिकरण के चेयरमैन को अवमानना नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। यह पहला मौका बताया जा रहा है जब देश में किसी राज्य के उच्च न्यायालय ने किसी अभिकरण के चेयरमैन को अवमानना नोटिस जारी किया है। उल्लेखनीय बात है कि मौजूदा कैट के चेयरमैन एन रेड्डी पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। मामले की अगली सुनवाई अब 20 मार्च को होगी
उल्लेखनीय है कि 2015-16 में एम्स यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मुख्य सतर्कता अधिकारी के पद पर तैनाती के दौरान केंद्र सरकार द्वारा रैमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त करने के बावजूद आइएफएस संजीव चर्तुवेदी की एसीआर यानी चरित्र पंजिका में जीरो अंकन कर दिया था। जून 2017 में संजीव ने केंद्र के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। इधर कैट की नैनीताल बेंच ने केंद्र के आदेश पर स्थगनादेश पारित करते हुए कहा कि अंतिम आदेश तक केंद्र की कार्रवाई याचिकाकर्ता की पदोन्नति में बाधक नहीं होगी। वहीं जुलाई 2017 में ट्रिब्यूनल ने संजीव के पक्ष में आदेश पारित करते हुए केंद्र सरकार के एसीआर में शून्य अंकन करने के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि इसे सेवा का हिस्सा न माना जाए। दिसंबर 2017 में केंद्र ने कैट दिल्ली के चेयरमैन के समक्ष संजीव का केस ट्रांसफर करने की अर्जी दी। 27 जुलाई को कैट चेयरमैन ने केंद्र की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कैट की नैनीताल बेंच में चल रही सुनवाई पर रोक लगा दी। 13 अगस्त को संजीव ने कैट चेयरमैन के इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी तो हाई कोर्ट ने कैट चेयरमैन का आदेश निरस्त करते हुए केंद्र पर 25 हजार रुपये जुर्माना भी लगा दिया।
इधर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संजीव के मामले में नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कैट की याचिका को खारिज कर दिया था। कैट चेयरमैन ने याचिका मेें कहा था कि हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कैट से संबंधित नियम-25 का उल्लंघन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा था कि कैट चेयरमैन की न्यायिक शक्तियां अन्य न्यायाधीशों से अधिक हैं, लेकिन न्यायिक शक्तियां अन्य न्यायाधीशों के समान हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हाई कोर्ट का आदेश अनुपालन के लिए संजीव ने आठ फरवरी को अवमानना याचिका दायर की। न्यायाधीश न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद कैट चेयरमैन एन रेड्डी को अवमानना नोटिस जारी किया है।

यह भी पढ़ें : तकनीकी विवि के कुलपति व्यक्तिगत रूप से हाई कोर्ट में तलब, जानें वजह…

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 फरवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तकनीकी विवि के कुलपति प्रो. एनएस चौधरी को पांच मार्च को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की संयुक्त खंडपीठ ने तकनीकी विवि से जुड़े एसोसिएट प्रोफेसर पुनीत सिंह की याचिका पर सुनवाई के बाद बृहस्पतिवार को यह निर्देश दिये। पुनीत सिंह ने याचिका में कहा कि याची पहले विवि के टीएचडीसी परिसर में कार्यरत थे। उनका तबादला तकनीकी यूनिवर्सिटी में कर दिया गया। इसके बाद उन्हें वूमेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में भेज दिया गया, लेकिन याची को पहली नियुक्ति संस्थान टीएचडीसी के समान सेवा लाभ नहीं दिए जा रहे हैं। इस पर जवाब नहीं मिलने के बाद अदालत ने कुलपति को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई 5 मार्च को तय है।

यह भी पढ़ें : हल्द्वानी के मुखानी चौराहे पर फ्लाई ओवर निर्माण के लिए हाईकोर्ट ने फिर दिखाया गंभीर रुख

-डीएम से एक सप्ताह में मांगी आवश्यक बजट संबंधी पूरी रिपोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019।
उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए कालादूँगी रोड पर मुखानी चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाये जाने पर फिर गंभीर रुख दिखाया है। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सम्बंधित जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी को निर्देश दिए है कि समय से फ्लाई ओवर बनाने के लिए आवश्यक बजट की पूरी रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर कोर्ट में पेश करने को कहा है।
मंगलवार को छोटी मुखानी हल्द्वानी निवासी पूरन चन्द्र जोशी की संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जिला अधिकारी द्वारा दायर शपथपत्र पर सुनवाई हुई, जिसमे जिला अधिकारी ने कहा है कि फ्लाई ओवर बनाने के लिए उनको बजट का निर्धारण करना है। फ्लाई ओवर बनाने के लिए 71 अतिक्रमणकारी चिन्हित कर लिए है, और बिजली के पोल, ट्रांसफार्मर, टेलीफोन के तार अन्य जगह शिफ्ट करने है। उल्लेखनीय है कि जनहित याचिका में कहा गया है कि कालाढूंगी रोड पर खासकर मुखानी चौराहे के पास आये दिन जाम की स्थित बनी रहती है, जिससे स्कूल, ऑफिस या अन्य जरूरी कामों के लिए जाने वाले लोगों का अधिकांश समय जाम में ही बीत जाता है और वे समय पर अपना काम नही कर पाते हैं, लिहाजा इस जाम से निजात दिलाने के लिए कालाढूंगी रोड पर फ्लाई ओवर का निर्माण किया जाय।

यह भी पढ़ें : एक माह में बंद हो सकती हैं राज्य की 323 औद्योगिक इकाइयां !

नवीन समाचार, नैनीताल, 14 फरवरी 2019। उत्तराखंड में प्रदूषण फैला रही 323 औद्योगिक इकाइयों ने यदि स्थितियों को नहीं सुधारा तो वे एक माह के बाद बंद हो सकती हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेशों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राज्य की 793 औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण के मानकों की जांच की गई, जिसमें से 323 इकाइयां प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करती पाई गई हैं। अब न्यायालय ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से इन औद्योगिक इकाईयों की सूची राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को देने को एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एक माह के भीतर प्रदूषण फैला रही इन इकाइयों का निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं और इस महत्वपूर्ण मामले में अगली सुनवाई 25 मार्च के लिए नियत कर दी है।
उल्लेखनीय है कि ऊधमसिंह नगर निवासी अशोक कुमार व अन्य ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि पूरे राज्य में कई औद्योगिक इकाइयां मानकों के खिलाफ संचालित हो रही हैं। ये इकाइयां बिना शोधन के जहरीला रसायन नदी-नालों में बहा रही हैं, जिससे भूगर्भीय जल प्रदूषित हो रहा है। इसका दुष्परिणाम राज्य के नागरिकों पर गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। इस पर उच्च न्यायालय 17 अगस्त 2018 को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्थलीय निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश करने को कहा था। इधर बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा रिपोर्ट पेश की गई।

नवीन समाचार, देहरादून, 8 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक फैसले से उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद की बोर्ड परीक्षा में हिंदी जैसे ‘अस्पष्ट’ मूल्यांकन वाले विषय में पुर्नमूल्यांकन कर अंकों में वृद्धि मिलने का नजीर बन सकने वाला बड़ा फैसला आया है। उच्च न्यायालय मंे याचिका दायर करने पर इंटरमीडिएट की एक छात्रा के हिंदी विषय में 20 अंक बढ़ गए हैं। यह फैसला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस फैसले के बाद आगे भविष्य में अन्य छात्र भी अधिक हिम्मत के साथ पुर्नमूल्यांकन कराने के लिए आगे आ सकते हैं, तथा इसके बाद मूल्यांकनकर्ताओं को मूल्यांकन में अधिक जिम्मेदार होना होगा।
मामला रुद्रप्रयाग जिले के तिलपाड़ा की रहने वाली मानसी नाम की छात्रा है। मानसी ने वर्ष 2018 में इंटर की परीक्षा दी थी। इसमें उसे 500 में से 411 अंक मिले थे। वह मैरिट में आई, किंतु हिन्दी विषय में उसे 54 अंक ही मिले थे, जबकि उसे लगता था कि उसके कई सवाल सही थे और उसके अधिक अंक आने चाहिए थे। इस पर उसने पुनर्मूल्यांकन करवाया जिसमें उसके 12 अंक बढ़े। किंतु मानसी इससे भी संतुष्ट नहीं हुई, और उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कॉपी की सही जांच करवाने की मांग की। अदालत ने सुनवाई के बाद उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से कमेटी गठित कर 10 दिन के भीतर याची की उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन करवाया। पुर्नमूल्यांकन में छात्रा के साढ़े सात अंक और बढ़े यानी 8 अंक बढ़ गए। अब न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ फरवरी में मामले की अगली सुनवाई करेगी।

यह भी पढ़ें : आतंकवादी बताकर दर्ज कर दिया था फर्जी मुकदमा, हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने रुड़की पुलिस द्वारा फर्जी मुकदमा दर्ज करने पर सरकार से दो सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार रुड़की निवासी फिरोज ने अपनी याचिका में  कहा था है कि वे रुड़की  में वाटर स्पोर्ट क्लब चलाते है। 22 जुलाई 2018 को पुलिस ने बिना किसी कारण व अपराध के उनको घर से उठाकर थाने में बंद कर दिया और उनके खिलाफ झूठे मुकदमे चोरी, लूटपाट, आतंकवादी व षड्यंत्र रचने के आधार पर पुरानी तिथि में आईपीसी की धारा 151 के तहत चालान काटकर एफआईआर रुड़की थाने में दर्ज कर दी। 26 जुलाई 2018 को रिहा भी कर दिया और थाने में उनको कोतवाली इंचार्ज साधना त्यागी व एसएसआई हरपाल सिंह ने प्रताड़ित भी किया। इसकी शिकायत उन्होंने डीजीपी से की। डीजीपी ने इस मामले की जांच एसएसपी हरिद्वार से करने को कहा परन्तु कोई कार्यवाही न होने पर उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की जिसमे उन्होंने दोषी दोनों पुलिस वालो के खिलाफ सीबीआई की जांच करने की मांग की है । मामले को सुनने के कोर्ट ने सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : भारी पड़ी गुमशुदगी की अनदेखी, HC ने दिए सीबीआई जांच व जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड पुलिस को 8 तीर्थयात्रियों की गुमशुदगी को  गंभीरता से लेना भारी पड़ने वाला है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने 2017 में पंजाब से हेमकुंड साहिब में यात्रा के लिए आये आठ तीर्थ यात्रियों के अचानक लापता होने व पुलिस द्वारा मामले के सन्तोषजनक कार्यवाही न करने को गम्भीरता से लेते हुए मामले को सीबीआई से जाँच करने तथा  डीजीपी को जाँच करने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने के आदेश दिए है।
मामले के अनुसार पंजाब निवासी लखविंदर कौर व अन्य ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वर्ष 2017 में पंजाब के दो विदेशी सहित आठ श्रद्धालु हेमकुंड साहिब की यात्रा पूरी कर पंजाब के लिए लौट रहे थे। इसकी जानकारी उन्होंने फोन से अपने परिजनों की दी थी परन्तु वे लापता हो गए। जिनकी लापता होने की जानकारी कार के ड्राइवर ने गोविन्द घाट पुलिस को दी थी। उक्त लोगो के घर वापस न लौटने पर अमेरिका में रहने वाले उनके परिजनों ने भारत आ कर पुलिस से जानकारी चाही तो गोविंदघाट पुलिस ने उनको जाँच की रिपोर्ट नही दी। इससे मजबूर होकर याची के द्वारा इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने की मांग की गयी थी। जिस पर पूर्व में कोर्ट ने आइओ से रिपोर्ट मांगी थी परन्तु आइओ द्वारा सन्तोषजनक उत्तर नही देने पर 8 लोगो के लापता होने को कोर्ट ने गम्भीरता से लेते हुए मामले की सीबीआई से जाँच करने के आदेश दिए है और आइओ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने के आदेश भी दिए है।

यह भी पढ़ें : डीएम दीपक रावत को हाई कोर्ट का अवमानना नोटिस, नौ को कोर्ट में हाजिर हों…

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने के आदेश का अनुपालन नहीं करने के मामले में सुनवाई करते हुए हरिद्वार के डीएम दीपक रावत को अवमानना नोटिस जारी किया है, और उन्हें आगामी नौ जनवरी को कोर्ट में तलब किया है।
बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ में हरिद्वार निवासी परवेज आलम ने अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें याची ने जिलाधिकारी रावत पर अदालत के अवैध बूचड़खानों को बंद करने तथा सार्वजनिक स्थान पर जानवर के वध पर पाबंदी लगाने के आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। कहा है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी हरिद्वार में तमाम स्थानों पर सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कत्लेखानों का संचालन हो रहा है और जानवरों का वध किया जा रहा है। याची के अनुसार आदेश के क्रियान्वयन को लेकर बार-बार जिला मजिस्ट्रेट को प्रत्यावेदन दिया मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई। याची के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन में शासन की ओर से भी दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, मगर डीएम के द्वारा उनका अनुपालन नहीं किया गया। एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद डीएम को अवमानना नोटिस जारी करते हुए नौ जनवरी को कोर्ट में पेश होने के निर्देश दिए।

मर्चूला-भिकियासैण मोटर मार्ग का मलबा रामगंगा नदी में डाले जाने पर हाईकोर्ट ने किया सरकार का जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 2 जनवरी 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मर्चूला-भिकियासैण के बीच बन रहे 40 किलोमीटर मोटर मार्ग का मलबा रामगंगा नदी में डाले जाने को लेकर दायर जनहित याचिका में  मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन  व न्यायधीश  आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा है कि मोटर मार्ग निर्माण का कार्य कितना बचा है ? निर्माण कार्य कर रही कम्पनी ने निर्धारित जगह पर मलुआ डाला है या सारा मलुआ नदी में डाल दिया है ? और कम्पनी को कितना पेमेंट हो चूका है ? 
उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी निवासी मानवाअधिकार आयोग के कार्यकर्ता गुरविंदर चढ्ढा ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि मर्चूला-भिकियासैण के लिए 40 किलोमीटर मोटर मार्ग का निर्माण कार्य चल रहा है। पीडब्लूडी की मिलीभगत के कारण निर्माण कार्य कर रही कम्पनी के द्वारा मार्ग का सारा मलबा रामगंगा नदी में डाला जा रहा है, जबकि मोटर मार्ग के टेंडर के वक्त पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने इस मलबे को डालने के लिए 8 डम्पिंग जोन घोषित किये थे, परन्तु कम्पनी द्वारा मलबा वहां न डालकर रामगंगा नदी में डाला जा रहा है । रामगंगा नदी कार्बेट नेशनल पार्क का मुख्य जल स्रोत है। मलबा डाले जाने के कारण नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया है जिससे नदी में पाये जाने वाले जीवो खतरे में आ गए है और नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण कार्बेट नेशनल पार्क के आस पास रहने वाले लोगो व जीवो पर भी जल संकट का सामना करना पड रहा है। पूर्व में  कोर्ट ने गम्भीर रुख अपनाते हुए निर्माण कार्य कर रही एजेंसी को एक सप्ताह में पक्षकार बनाये जाने के आदेश याचिकर्ता को दिए थे।

यह भी पढ़ें : स्थानीय संपदाएं राष्ट्र एवं इसे बचाये रखने वाले लोगों की संपत्ति: हाईकोर्ट

      • उत्तराखंड उच्च न्यायालय से बाबा रामदेव की कंपनी को 20.4 मिलियन का झटका, स्थानीय किसानों के लिए खुशखबरी
    • स्थानीय जैविक संसाधनों को माना राष्ट्र एवं इसे बचाये रखने वाले लोगों की संपत्ति 
रवीन्द्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 27 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्थानीय संपदाओं को राष्ट्र एवं इसे बचाये रखने वाले स्थानीय लोगों की संपत्ति बताते हुए बड़ा व महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। मामले में योग गुरू बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी कंपनी को झटका मिला है। कोर्ट ने उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें बोर्ड ने जैव विधिधता अधिनियम 2002 के प्रावधानों के तहत कंपनी को होने वाले न्यायोचित लाभ का कुछ अंश किसानों के हित में अदा करने को कहा था। इस प्रकार यह फैसला किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी साबित हो सकता है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने विगत 7 सितम्बर को निर्णय सुरक्षित रख लिया था। गत 21 दिसंबर को कोर्ट ने अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया लेकिन आदेश की प्रतिलिपि गुरूवार को जारी हुई।
दिव्य फार्मेसी की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड (यूबीबी) ने जैव विविधता अधिनियम के प्रावधानों के तहत दिव्य फार्मेसी कंपनी को राज्य के जैविक संसाधनों के दोहन व उपयोग करने की खातिर 4.21 बिलियन यानी 421 करोड़ रुपये के राजस्व के बदले में 20.4 मिलियन यानी 2.04 करोड़ रुपये की राशि किसानों व स्थानीय समुदायों को अदा करने को कहा था। वहीं दिव्य फार्मेसी की ओर से कहा गया कि यूबीबी को ऐसी मांग करने को न तो कोई अधिकार है और न ही यह उसके क्षेत्राधिकार का मामला है। साथ ही याचिकाकर्ता ऐसी किसी राशि को अदा करने के लिये उत्तरदायी नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जैव विविधता अधिनियम भारतीय कंपनियों पर लागू नहीं होता है। साथ ही कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि देश के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से कंपनी को होने वाले लाभ को स्थानीय लोगों के साथ बांटने से उसके समानता के अधिकार का हनन होता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जैविक संसाधन राष्ट्र की सम्पत्ति है लेकिन यह उन स्वदेशी व स्थानीय समुदायों की भी संपत्ति है जिन्होंने इसे सदियों से संरक्षित रखा है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि उत्तराखंड में उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले समुदाय अपने जैविक संसाधन के पारंपरिक हकदार हैं। वे न केवल इसे संरक्षित रखते हैं बल्कि उसकी जानकारी को वे पीढी दर पीढी समाहित रखते हैं और बढ़ाते रहते हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि बेशक यह इन समुदायों का बौद्धिक संपदा अधिकार नहीं माना जा सकता है लेकिन सम्पत्ति  है।

यह भी पढ़ें :  तकनीकी शिक्षा सचिव ओम प्रकाश को बड़ी राहत

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने तकनीकी शिक्षा सचिव ओम प्रकाश को बड़ी राहत दी है। कोर्ट के आदेश ना मानने पर अवमानना में फंसे सचिव ओम प्रकाश के खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को न्यायालय वापस ले लिया है। एकलपीठ में आज अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश पेश हुए । उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया कि जो भी आदेश पूर्व में दिया था उसका पालन कर दिया गया है। इस दौरान कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य के अधिकारी क्यों हाई कोर्ट के आदेशों को नहीं मान रहे हैं।
मामले के अनुसार राजेंद्र सिंह निवासी देहरादून व 5 अन्य ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि 14 जून 2018 को खंडपीठ ने उन्हें राजकीय पॉलिटेक्निक में प्रवक्ता पद पर नियमित करने व नियमित कर्मचारियों की भाँति अन्य सुविधाए देने के आदेश दिए थे। इसके बजाय तकनीकी शिक्षा सचिव ने मौखिक तौर पर काम पर नही आने को कहा और बेतन भी नही दिया जा रहा। परंतु तकनीकी शिक्षा सचिव ओम प्रकाश द्वारा न तो उन्हें नियमित किया न ही न्यूनतम वेतनमान दिया। खंडपीठ के इस आदेश को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाई कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के आदेश दिए, लेकिन पुनर्विचार याचिका में कोई आदेश पारित न होने के कारण याचिकाकर्ताओं के द्वारा पूर्व के आदेश पर अवमानना याचिका दायर की गयी।

यह भी पढ़ें : पिछली सरकार ने कौड़ियों के भाव बेच दी थी सिडकुल की जमीनें, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सिडकुल हरिद्वार में पिछली सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2012 में सरकारी भूमि को कौड़ियो के दाम पर कंपनियो व रियल स्टेट को बेचे जाने के मामले में सुनवाई करते हुए सिडकुल से दस दिन के भीतर विस्तृत शपथपत्र पेश करने को कहा है। साथ ही खंडपीठ ने यह भी पूछा है कि औद्योगिक क्षेत्र की जमीन को इतने सस्ते दामों में कैसे बेचा जा सकता है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी दीपक आजाद ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सिडकुल हरिद्वार में सरकार की भूमि को सम्बंधित अधिकारियांे की मिलीभगत से कौड़ियों के दामों पर कम्पनियो व रियल स्टेट को बेच रही है। जिस जमीन के सर्किल रेट 2007 में 20,507 रुपये प्रति वर्ग मीटर थे, वही जमीन 2012 में 6500 रुपये प्रति वर्ग मीटर के दामों पर जमीन बेच दी गयी। लिहाजा मामले की जांच की जाये।

यह भी पढ़ें : हद है, उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध मंदिर दे दिया गया है किराये पर, हाईकोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव, मंदिर समिति व किरायेदार को भेजा नोटिस

-बद्रीनाथ मंदिर के महालक्ष्मी मंदिर को दिया गया है किराये पर
नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने बद्रीनाथ में महालक्ष्मी मंदिर को किराए में दिए जाने के मामले में उत्तराखंड के मुख्य सचिव, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति व महालक्ष्मी मंदिर को चलाने वाली संस्था को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह मे जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी राकेश कौशिक ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति ने बिना राज्य सरकार की अनुमति लिए बद्रीनाथ में स्थित महालक्ष्मी मंदिर को किसी अन्य संस्था को 35 हजार रुपये प्रतिवर्ष की दर पर किराए पर दे दिया है, साथ ही चरणामृत बेचने की अनुमति भी दे दी है। ऐसा करना गलत है। याची का यह भी कहना है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिरों की सम्पत्ति को बिना राज्य सरकार की अनुमति के किसी को भी हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने मुख्य सचिव ,बद्रीनाथ केदारनाथ समिति व महालक्ष्मी मंदिर को चलाने वाली संस्था को नोटिस जारी किए गए हैं साथ ही तीन सप्ताह मे जवाब पेश करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : एनआईटी श्रीनगर के मामले में राज्य , केंद्र व एनआईटी से दो सप्ताह में जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 10 दिसंबर 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने एनआईटी श्रीनगर के मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, केंद्र सरकार व एनआईटी से दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई दो सप्ताह के बाद नियत की है । जनहित याचिका में वहां के सुमाड़ी, नियाल गांव सहित अन्य दो गांवों द्वारा प्रार्थना पत्र देकर पक्षकार बनाने की मांग की थी। जिसे खंडपीठ ने स्वीकार कर लिया।

ग्रामीणों ने प्रार्थना पत्र में कहा है कि उन्होंने श्रीनगर में एनआईटी बनाने के लिए 120 हैक्टेयर जमीन दान में इसलिए दी है कि यहां का विकास हो, लोगों को रोजगार मिले, पलायन पर रोक लग सके। सरकार ने 2009 में वन विभाग से भूमि हस्तांतरण के लिए नौ करोड़ रुपये भी दे दिए और सरकार ने कैम्पस की चाहर दिवारी बनाने के लिए चार करोड़ रूपये भी खर्च कर दिए उसके बाद भी सरकार एनआईटी को मैदानी एरिया में बनाना चाहती है। पूर्व में आईआईटी रुड़की द्वारा भी इस भूमि का भूगर्भीय सर्वेक्षण किया गया था जिसकी अभी अंतिम रिपोर्ट नही आई है । काॅलेज के पुर्व छात्र जसवीर सिह ने नैनीताल हाईकोट में जनहित याचिका दायर कर कहा है की उनके काॅलेज को बने नौ साल हो गए है, इसके बाद भी उनको स्थाई कैम्पस नहीं मिला। जिसको लेकर छात्र काफी लंबे समय से स्थाई कैम्पस की माॅग कर रहे है मगर सरकार उनकी इन माॅगो की तरफ कोई घ्यान नही दे रही है। साथ ही वो अभी जिस जगह पढ रहे है वो बिल्डिंग भी जर्जर हालत में है। जहां कभी भी कोई हादसा हो सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है की कैम्पस की मांग करे रही एक छात्रा की सड़क हादसे में मौत तक हो गई जबकी एक का गंभीर स्थिति में उपचार चल रहा है, जिसका खर्च राज्य सरकार और एनआईटी वहन करे। सरकार स्थायी कैम्पस की जगह छात्रो को जयपुर राजस्थान कैम्पस में भेज रही है।

यह भी पढ़ें : 10 वर्षों से नियमितीकरण की बाट जोह रहे कर्मियों को झटका, नियमितीकरण नियमावली पर फिलहाल रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 दिसंबर 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की 2013 की नियमतिकरण नियमावली पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी है । न्यायालय ने सरकार को यह भी निर्देश दिए हैं कि नियमितीकरण नियमावली के अन्तर्गत विभागों, निगमों, परिषदों व अन्य सरकारी उपक्रमो में कर्मचारियों को नियमित न करें । मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। अगली सुनवाई दस दिन बाद की नियत की गई है।

मामले के अनुसार नैनीताल जिले के सौड़बगड़ निवासी नरेंद्र सिंह बिष्ट व अन्य ने याचिका दायर कर कहा था कि वे इंजनीयरिंग में डिप्लोमा होल्डर हैैं और सरकार के अधीन जेई पद के लिए नियुक्ति पाने की पूर्ण योग्यता रखते हैं। उन्होंने अपनी याचिका में सरकार की 2013 की नियमितीकरण नियमावली को चुनौती दी है। उनका कहना है कि उक्त नियमितीकरण नियमावली सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी व एमएल केसरी के निर्णय के विपरीत है। परन्तु सरकार उक्त निर्णयो के विपरीत निगमो, विभागों, परिषदों व अन्य सरकारी उपक्रमो में बिना किसी चयन प्रक्रिया के कर्मचारियों का नियमितीकरण कर रही है जो पूर्ण रूप से विधि विरुद्ध है । उक्त नियमावली को सरकार ने सन 2016 में संशोधित किया था । इस संशोधन नियमावली को हिमांशु जोशी द्वारा उच्च न्यायालय में पूर्व में चुनौती दी गई थी जिसे न्यायालय ने निस्तारित कर दिया था।

2016 की नियमावली भी हो चुकी है रद

हाई कोर्ट 2016 की नियमितीकरण नियमावली को भी निरस्त कर चुका है। 17 अप्रैल को हाई कोर्ट की एकलपीठ ने हिमांशु जोशी की याचिका पर सुनवाई करते हुए नियमितीकरण नियमावली-2016 निरस्त कर दी थी, जिसके बाद एकलपीठ के आदेश के खिलाफ विशेष अपील दायर की गई। 20 जुलाई को विशेष अपील भी खारिज हो चुकी है। याची के अधिवक्ता के अनुसार, ताजा फैसले के बाद दस अप्रैल 2006 के बाद दस साल पूरे कर नियमित हुए कार्मिकों का नियमितीकरण नियम विरुद्ध माना जाएगा। यहां बता दें कि राज्य के तमाम महकमों में हजारों संविदा, दैनिक, ठेका कर्मचारी कार्यरत हैं।

यह भी पढ़ें : हजारों एकड़ सरकारी भूमि खुदबुर्द, सचिव राजस्व, कुमाऊं आयुक्त व ऊधमसिंह नगर के डीएम से जवाब तलब

नैनीताल, 29 नवंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ऊधमसिंह नगर जिले के बाजपुर ब्लॉक अंतर्गत चकरपुर गांव में हजारों एकड़ सरकारी भूमि खुदबुर्द करने के मामले में सख्‍त रुख अपनाते हुए सचिव राजस्व, कुमाऊं आयुक्त व ऊधमसिंह नगर के डीएम को 4 सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने पूछा है कि अब तक कितनी भूमि बची है, जिसमें निर्माण नहीं हुआ है। उल्लेखनीय है कि  बाजपुर के किसान शेर सिंह ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि चक्करपुर गांव में 4805 एकड़ सरकारी भूमि को 1920 में सरकार द्वारा लाला खुशीराम को 90 साल के लिए लीज पर दिया गया था, 1960 में खुशीराम की मृत्यु के बाद उनकी पॉवर ऑफ अटार्नी सब लीज हो गई। भूमि के सब लीज होने के बाद राजस्व कर्मचारियों की मिलीभगत से भूमि का स्वरूप बदल दिया गया तो माफिया ने सरकारी भूमि को खुदबुर्द कर दिया। इसकी जांच जिलाधिकारी द्वारा की गई और जांच रिपोर्ट में सरकारी भूमि खुदबुर्द होने की पुष्टि हुई मगर इसके लिए जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने मामला सुनने के बाद सचिव राजस्व, कुमाऊं आयुक्त, डीएम ऊधमसिंह नगर को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : पहाड़ पर तैनात चिकित्सकों को नियमित कर्मियों की भांति मई से एरियर सहित वेतन व अन्य सुविधाएं देने के आदेश

नैनीताल, 22 नवंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पहाड़ पर नियुक्त चिकित्सकों को नियमित चिकित्सकों की तरह पिछले मई माह से एरियर सहित वेतन व अन्य सुविधाएं देने के आदेश दिये हैं। मामले के अनुसार देहरादन के चिकित्सक डा. अभिषेक बडोनी व अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा था कि उन्होंने एमबीबीएस की शिक्षा राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी से राजकीय मेडिकल कॉलेज के लिये तय सालाना शुल्क 15 हजार पर ली है। वहां प्रवेश के दौरान देहरादून, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार व नैनीताल के अलावा पर्वतीय जिलों के दुर्गम-अतिदुर्गम के चिकित्सालयों में पांच साल सेवा करने का बांड भरवाया गया था। बांड में साफ उल्लेख था कि उन्हें नियमित चिकित्सकों की तरह 55 हजार से एक लाख 75 हजार वेतनमान, साल भर में 13 दिन अवकाश सहित अन्य सुविधाएं दी जाएंगी, मगर सरकार द्वारा बांड के अनुसार सुविधाएं नहीं बल्कि मासिक तौर पर केवल 52 से 54 हजार रुपये मानदेय दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में आदेश पारित किया था, किंतु इसका आदेश अब जारी हुआ है। बताया गया है कि इस आदेश से पहाड़ में सेवाएं दे रहे 26 डॉक्टर सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड के सभी सरकारी चिकित्सालयों के दिन बहुरने की उम्मीद, हाईकोर्ट ने दिये ये बड़े निर्देश

-हाईकोर्ट ने सभी सरकारी अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा व डॉक्टरों के खाली पदों व भरने की जानकारी मांगी
नैनीताल, 12 सितंबर 2018। उत्तराखंड के सभी सरकारी चिकित्सालयों के दिन बहुरने की उम्मीद बनती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने सरकार को प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी, ओपीडी व पर्चा बनाने वाले कक्षों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा है, साथ ही सरकार से प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों के खाली पदों की जानकारी भी मांगी है। साथ ही रिक्त पदों को भरने के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयास को जानकारी शपथ पत्र पर मांगी है। मामले में अगली सुनवाई 25 सितम्बर को होगी। उल्लेखनीय है कि नरेश मंडोला नाम के याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज में चिकित्सकों के अभाव में तीन हफ्ते में नौ बच्चों की मौत हो गयी थी।

यह भी पढ़ें: पिथौरागढ़ के सीमावर्ती ग्रामीणों को 24 घंटे में आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराए सरकार

नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को पिथौरागढ़ जिले के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों को 24 घंटे में दैनिक आवश्यकता की घी, गेहूं, धान, आटा, सब्जी, मसाले, माचिस, पावडर दूध, कंबल और मिटटी का तेल आदि चीजें उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने इस आपूर्ति को पूरे शीतकाल में जारी रखने को कहा है। मामले में मुख्य सचिव को भारतीय वायु सेना से संपर्क कर और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के साथ समन्वय बनाकर इस आदेश का अनुपालन करने में मदद लेने को भी कहा है। साथ ही विपक्षियों से दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र देने को भी कहा है।
मामले के अनुसार धारचूला निवासी महेंद्र सिंह बुदियाल ने जनहित याचिका दायर कर न्यायालय से कहा था कि पिथौरागढ़ जिले के लमारी, बुंदी, गुंजी, चौयालेख, गर्ब्यांग, नपलच्यु नाबी, रोगकोंग, कुटी, कालापानी और नाभीढांग गावों की लगभग 9000 की आबादी के लिए कोई सड़क नहीं है। पगडंडियां ही यहां आनेजाने का एकमात्र रास्ता हैं। 1999 से 2000 के बीच केंद्र सरकार ने सीमांत क्षेत्रों में सड़कों के महत्व को देखते हुए घटियाबागढ़ से लिपुलेख तक चार किलोमीटर मोटर मार्ग का प्रस्ताव स्वीकृत किया था, जिसे बीआरओ द्वारा संचालित कराना था जो अभी तक लंबित है। बताया गया कि वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की गई थी लेकिन उसका किराया 3100 रुपए प्रति व्यक्ति यानी बहुत ज्यादा था, और उसे भी बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया है। संचार और हेलीकॉप्टर सेवा के अभाव में उनके क्षेत्र में अब खाद्य सामग्री और दूसरे रोजमर्रा के जरूरी सामान भी समाप्त हो गए हैं।

बड़ा फैसला: निचली अदालतों से भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत, नहीं आना पड़ेगा हाईकोर्ट

नैनीताल, 20 सितंबर 2018। उत्तराखंड में भी अब किसी भी अपराध के आरोपित को अंतरिम जमानत के लिए हाईकोर्ट नहीं आना पड़ेगा। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दूरगामी प्रभाव के एक फैसले में उत्तराखंड में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा 438 को प्रभावी करते हुए अग्रिम जमानत के प्रभाव को लागू कर दिया है। इस आदेश के बाद राज्य को निचली अदालतों को भी अंतरिम जमानत देने का अधिकार मिल गया है। इससे आरोपित को जेल जाने से पहले ही जमानत मिल जाएगी।
मामले के अनुसार याची विष्णु सहाय व मोहन कुमार मित्तल ने विशेष अपील दायर कर एकल पीठ के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता-उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 को चुनौती दी थी और कहा था कि उक्त प्राविधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 व 22 का उल्लंघन है। उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 16 के द्वारा अग्रिम जमानत के प्राविधान वाली भादंसं की धारा 438 को रिपिल कर दिया था। याची का कहना था कि उत्तर प्रदेश पुर्नगठन अधिनियम के तहत उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किये गये नियम उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दो वर्ष तक ही प्रभावी हो सकते थे। इधर उत्तराखंड सरकार ने न तो यूपी संशोधन अधिनियम को लागू किया है और न ही निरस्त किया है। इसलिये यूपी के उस कानून को यहां लागू नहीं किया जा सकता है। माना जा रहा है कि इस आदेश के बाद पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद कोई भी आरोपित निचली अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल कर अंतरिम जमानत ले सकता है, जबकि अब तक किसी भी प्रकृति के अपराध में आरोपित को गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत अर्जी लगानी पड़ती है।

यह भी पढ़ें : अब सभी धर्म पुरोहितों को 1,000 रुपए प्रतिमाह अनुरक्षण देगी राज्य सरकार

-निबंधन और शर्त के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को मिलेगा अनुरक्षण
-सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में 30 जून 2016 का शासनादेश किया गया पेश, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया
नैनीताल, 6 सितंबर 2018। उत्तराखंड सरकार निबंधन और शर्तों के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को प्रतिमाह 1000 रुपए का अनुरक्षण देगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ में राज्य सरकार ने 30 जून 2016 का शासनादेश पेश किया, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया है।
उल्लेखनीय है कि हरिद्वार निवासी सुभाष जोशी ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र लिखकर कहा था कि मंदिरो व श्मशानघाट के महापुरोहितो की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, इस काम से उनका ठीक से गुजारा तक नहीं चल पाता है लिहाजा उनको सरकार से आर्थिक सहायता दिलाई जाए। पूर्व में खंडपीठ ने इसको जनहित के रूप में स्वीकार किया था और सरकार से इसमें जवाब पेश करने को कहा था। बृहस्पतिवार को मामले की सुनवाई के दौरान महाअधिक्वता द्वारा कोर्ट को अवगत कराया कि सरकार ने इस सम्बन्ध में शासनादेश पूर्व में जारी किये है और इनकी सहायता के लिए सरकार आर्थिक मदद दे रही है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने सरकार की इस पहल को सराहनीय माना और सरकार से इसका व्यापक प्रचार प्रशार करने को कहा। साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

यह भी पढ़ें :  पहली बार किसी कोर्ट ने ब्राह्मणों के लिए कही इतनी बड़ी बात, पर उत्तराखंड सरकार नहीं कुछ करने के पक्ष में

नैनीताल, 29 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खण्डपीठ ने ब्राह्मणों-पंडितों, पुरोहितों के हितों पर बड़े निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने तीर्थो, मन्दिरों में पण्डितों और पुरोहितों की आर्थिक स्थिति ठीक नही होने पर हरिद्वार निवासी पण्डित सुभाष जोशी के पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर सुनवाई करते हुए सरकार से उन्हें जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान देने के लिए 6 सितम्बर तक वित्त सचिव से जानकारी लेकर कोर्ट में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि मामले में याची पण्डित सुभाष जोशी ने अपने पत्र में कहा है कि तीर्थो, मन्दिरों व श्मशान घाट में जो महा ब्राह्मण होते हैं उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति ठीक नहीं है, लिहाजा उनको सरकार जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान करे, जिससे उनकी आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा हो सके। इस मामले में खण्डपीठ ने अधिवक्ता एमसी पंत को न्यायमित्र नियुक्त किया है । पंत ने उनका पक्ष रखते हुए तीर्थो को वैष्णो देवी  और बालाजी की तर्ज पर श्राइन बोर्ड गठित करने की मांग भी की जिससे इनमें कार्य करने वाले लोगों को वेतन व अन्य लाभ दिए जा सकें। मामले में प्रदेश के महाधिवक्ता द्वारा सरकार का पक्ष रखते हुए कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25(जे) के अनुसार किसी भी धर्म विशेष के लिये इस तरह के सेवाएं देना उचित नहीं है। यह सविधान का उल्लंघन होगा। यह सम्भव भी नहीं है। खण्डपीठ ने इस मामले में महाहाधिवक्ता से कहा है कि वे इस सम्बन्ध में वित्त सचिव से वार्ता करें और 6 सितम्बर को स्थिति से कोर्ट को अवगत कराये। मामले की अगली सुनवाई 6 सितम्बर की तिथि नियत की है।

एससी-एसटी एक्ट में संशोधन असंवैधानिक ! उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को भेजा नोटिस

नैनीताल, 31 अगस्त 2018। केंद्र सरकार द्वारा एससी-एसटी एक्ट में किये गये संशोधन को उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने इस पर केंद्र सरकार से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
इस मामले में उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता सनप्रीत अजमानी ने जनहित याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार की 17 अगस्त 2018 को जारी एससीएसटी एक्ट की अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा है कि यह सर्वोच्च न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट पर आदेश के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया गया है। इस पर पुनर्विचार याचिका भी अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसलिये यह संविधान की धारा 14, 19 व 21 के तहत असंवैधानिक है।

यह भी पढ़ें : तत्काल बंद हो सकते हैं उत्तराखंड के सभी प्राइवेट अस्पताल और क्लीनिक

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 24 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में केंद्र सरकार के ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट-2010’ के अधीन पंजीकृत नहीं हुए अस्पतालों और क्लीनिकों को तत्काल बंद करने के आदेश दिये हैं। साथ ही इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों में इस एक्ट के प्राविधानों का पूर्णतया पालन कराने के आदेश दिये हैं। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों की संख्या नगण्य बताई जा रही है। यानी अधिकांश अस्पताल और क्लीनिक गैर पंजीकृत हैं। ऐसे में उत्तराखंड के कमोबेश सभी अस्पतालों और क्लीनिकों पर ताले लटकने की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। आगे देखने वाली बात होगी कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है। हाईकोर्ट के आदेश का पालन करती है, अथवा सर्वोच्च न्यायालय जाती है।
इसके अलावा न्यायाल ने राज्य सरकार को सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज, ऑपरेशन और परीक्षणों के लिए एक माह के भीतर फीस तय करने के भी आदेश दिए है। साथ ही न्यायालय ने प्रदेश के सभी अस्पतालों को आदेश दिए हैं कि वे बेवजह मरीजो का डायग्नोस्टिक टेस्ट न कराएं, तथा रोगियों को केवल जेनरिक दवा ही लिखें, ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए अनुचित दबाव ना बनाएं।

राज्य में एक्ट लागू ही नहीं, सभी प्राइवेट स्थानीय नगर निकायों से केवल एक संस्थान के रूप में हैं पंजीकृत

नैनीताल। इस बारे में प्रदेश की चिकित्सा नगरी के रूप में विकसित हो रही हल्द्वानी के कुछ बड़े चिकित्सालयों के मालिकों से बात की गयी तो उनका कहना है कि ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के बारे में पहले ही राज्य सरकार की चिकित्सकों के संगठन आईएमए की वार्ता चल रही है। यह एक्ट अभी राज्य में लागू नहीं है। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के दृष्टिगत इसे लागू करना आसान नहीं है। उनका कहना है कि यह लागू हुआ तो अस्पताल तो किसी तरह अपना पंजीकरण और इसके प्राविधानों का पालन कर लेंगे, परंतु इससे चिकित्सा सुविधाएं और अधिक महंगी हो जाएंगीं। अभी हल्द्वानी के केवल दो चिकित्सालय डा. खुराना का कृष्णा अस्पताल और बृज लाल हॉस्पिटल ही इस एक्ट नहीं वरन एक राष्ट्रीय उपक्रम से पंजीकृत हैं, जबकि अन्य सभी अस्पताल केवल नगर पालिका, नगर निगम में एक संस्थान के रूप में पंजीकृत हैं।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में पैरासिटामौल, सिट्राजिन सहित 434 दवाएं व हर नशीली वस्तु प्रतिबंधित

-राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों में उच्च शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश

प्रतिबंधित की गयी प्रमुख दवाइयां: बुखार की पैरासिटामौल, सिट्राजिन, टेराफिनाडीन, डीकोल्ड टोटल, सेराडॉन, फिंसाडीन, डोवर्स पावडर, दर्द की डाईक्लोफेन्स, पेरासिटामोल डोवोर्स टेबलेट व कोम्बिफ्लेम आदि।

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 13 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में 434 दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध राज्य के युवाओ का नशे की गर्त में जाने के खिलाफ दायर रामनगर नैनीताल निवासी श्वेता मासीवाल की जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने दिये। खंडपीठ ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 77 जे जे में विस्तार करते हुए 18 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रतिबंधित दवाइयां, मादक पदार्थ और नशा होने की आशंका वाली किसी भी दवा-चीज की बिक्री पर भी रोक लगा दी है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को केंद्रीय औषधि नियंत्रक बोर्ड द्वारा प्रतिबंधित की गयी सभी 434 दवाओं की बिक्री पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। पीठ ने कहा कि जिस किसी मेडिकल स्टोर में ये दवाईया उपलब्ध हैं उनको पुलिस की मदद से या तो नष्ट किया जाए, अथवा इन्हें इनकी कम्पनी को वापस किया जाए। इसके अलावा खंडपीठ ने राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश भी दिए हैं। इन क्लबों के अध्यक्ष उच्च शिक्षा निदेशक और नोडल अधिकारी विद्यालयी शिक्षा निदेशक होंगे। खण्डपीठ ने यह भी निर्देश दिए हैं कि जेलों से कैदियों को लाते व ले जाते वक्त नारकोटिक्स की जांच की जाये। राज्य व जनपदांे की सीमाओं पर ड्रग्स की जांच करने के लिए सरकार 3 सप्ताह में विशेष टीम गठित करे। प्रदेश के प्रत्येक जिले में नशा मुक्ति केंद्र खोले जाएं। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर ड्रग्स नारकोटिक्स स्क्वाड का गठन करने को भी कहा गया है। मामले के अनुसार याचिकर्ता ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश के युवा वर्ग दिन-प्रतिदिन नशे की गिरफ्त में डूब रहे हैं, लिहाजा नशे के कारोबारियों पर रोक लगाई जाये। उल्लेखनीय है कि पूर्व में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ ने भी इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रदेश का युवा वर्ग नशे की गर्त में डूब रहा है, तथा प्रदेश सरकार और पुलिस नशा रोकने में नाकाम हो रही है। पूर्व में इस मामले में एसएसपी एसटीएफ नारकोटिक्स एंड ड्रग्स कण्ट्रोल और क्षेत्रीय निदेशक कोर्ट में पेश हुए थे उन्होंने नशे को रोकने के लिए स्टाफ की कमी का हवाला दिया था, तथा माना था कि जो भी थोडा बहुत इसको रोकने के लिए केवल इलेक्ट्रानिक उपकरणों और एसएसबी की मदद से ही कार्रवाई की जाती है। बताया था कि उत्तराखंड में नशे का कारोबार बाहर के राज्यो से प्रमुख कोबरा गैंग के माध्यम से होता है। इस पर खंडपीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण मानते हुए पूर्व में ही राज्य के सभी 27 विश्वविद्यालयो, सभी एसएसपी और सभी जिला अधिकारियों को पक्षकार बनवाया था।

यह भी पढ़ें : हर दूसरी डिलीवरी पर मिलेगा मातृत्व अवकाश, चाहे पहले से 2 (जुड़वाँ) बच्चे ही क्यों ना हों…

  • तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को असंवैधानिक करार दिया

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 4 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीसरे बच्चे के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश नहीं दिए जाने के प्रावधान में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने संशोधित फैसला दिया है। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने धात्री महिला को तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को उस स्थिति में असंवैधानिक करार दिया है, जबकि उसके पहले से दो जुड़वां बच्चे हों। यानी अब हर दूसरी डिलीवरी पर मातृत्व अवकाश मिल सकेगा, चाहे महिला के पहले से 2 जुड़वाँ बच्चे ही क्यों ना हों।न्यायालय ने साफ कहा कि यह नियम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा-27 के प्रावधानों के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 42 की भावना के विपरीत है। मामले में सुनवाई के बाद यह फैसला दिया है।
उच्च न्यायालय का यह फैसला राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी की स्टाफ नर्स उर्मिला मैसी की ओर दायर याचिका पर आया है। सिस्टर मैसी ने उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उन्होंने पांच माह के लिए मातृत्व अवकाश को आवेदन किया था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए उनके आवेदन को निरस्त कर दिया कि उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 के तहत तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति देने का नियम नहीं है। जबकि उसके पहले से दो जुड़वाँ बच्चे हैं, और वह दूसरी बार ही माँ बन रही है।

रामनगर के दो पूर्व पालिकाध्यक्षों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश

नैनीताल, 16 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की खंडपीठ ने रामनगर नगर पालिका के अंतर्गत ट्रंचिंग ग्राउंड में हुए अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर वहां के पूर्व पालिकाध्यक्ष भगीरथ लाल चौधरी व उनके पालिकाध्यक्ष रही उनकी पत्नी उर्मिला चौधरी के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिये हैं। मामले के अनुसार रामनगर निवासी भूपेंद्र सिंह खाती व ललित पांडे ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 1979 में नगर पालिका रामनगर को 18 बीघा 76 बिश्वा भूमि पर ट्रंचिंग ग्राउंड भूमि की रजिस्ट्री कराRaयी गयी थी। पालिका ने इस भूमि पर अवैध कब्जे होने दिये। तत्कालीन कुमाऊं मंडलायुक्त ने अपनी जांच में इन कब्जों के लिए तत्कालीन नगर पालिकाध्यक्ष को दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिये थे। इसी रिपोर्ट के आधार पर खंडपीठ ने दोनों पालिकाध्यक्षों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये हैं।

यह भी पढ़ें : ठंडी सड़क हल्द्वानी के 43 लोगों पर हाईकोर्ट ने लगा दिया ₹ 25 हजार का जुर्माना

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 13 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने हल्द्वानी की ठंडी सड़क में दुपहिया वाहन चलाने की अनुमति देने व अपने पूर्व के आदेश में संशोधन करने के प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया है, साथ ही 43 याचिकर्ताओं पर ₹ 25 हजार का जुर्माना भी लगा दिया है।
मामले के अनुसार गुरु गोविंद सिंह चेरिटेबल सोसायटी हल्द्वानी के सचिव गुरुप्रीत सिंह ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हल्द्वानी की ठंडी सड़क में अवैध रूप से वाहन पार्क हो रहे हैं। साथ ही यहां स्थित रेस्टोरेंट, होटल व ढाबों के द्वारा नहर में गंदगी फैलाई जा रही है, जबकि पास के पार्कों में नसेड़ियो व मनचलो का बोलबाला है जो पार्कों में घूमने वाली युवतियो के साथ छेड़छाड़ करते हैं। पूर्व में खंडपीठ ने एसएसपी को निर्देश दिए है वे 24 घंटे के भीतर ठंडी सड़क पर खड़े अवैध वाहनों को हटायें, साथ ही नहर में गंदगी कर रहे ढाबों, होटलो व रेस्टोरेंटों को बंद करायें तथा ठंडी सड़क व पार्कों में पुलिस की गस्त बढ़ाई जाये। खंडपीठ के इस आदेश से प्रभावित ठंडी सड़क क्षेत्र के 43 लोगों ने खंडपीठ को अपने आदेश को संशोधित करने, उन्हें ठंडी सड़क में दोपहिया वाहन ले जाने देने की मांग की थी। खंडपीठ ने उनके प्रार्थना पत्र को निरस्त कर उन पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगा दिया है।

यह भी पढ़ें : खोदा पहाड़, निकला हल्द्वानी के कूड़ा निस्तारण के लिए पुराना ही डंपिंग ग्राउंड

    • हाईकोर्ट के आदेश: फिलहाल पुरानी जगह पर ही डाला जाएगा कूड़ा
    • छह महीने में मौजूदा डंपिंग के बगल में ही वन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई 6 हैक्टेयर भूमि पर 6 माह में बनेगा ट्रीटमेंट प्लांट,
    • फिलहाल कूड़े को फैलने से लगाई जाएगी डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर दीवार,
  • अधिकारी वर्ग उच्च न्यायालय के फैसले से नजर आ रहा है खुश, कूड़ा निस्तारण पर सप्ताह भर से लगी रोक भी हटी

नैनीताल, 18 जुलाई, 2018। हल्द्वानी एवं हल्द्वानी से जुड़े नैनीताल, भवाली, भीमताल, रुद्रपुर आदि क्लस्टर नगरों का कूड़ा फिलहाल पुराने जगह पर ही निस्तारित किया जायेगा। अलबत्ता डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाई जायेगी। मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने बुधवार को नगर निगम हल्द्वानी को छः माह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए समयबद्ध तरीके से कार्य करने के आदेश देते हुए 3 सप्ताह के भीतर वर्तमान डम्पिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाने व 8 सप्ताह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए निविदा आमन्त्रित करने के निर्देश दिये। इस दौरान खंडपीठ ने सरकार से यह भी पूछा कि नैनीताल व हल्द्वानी निकायों के ईओ का स्थानांतरण नियमों के अनुसार तीन साल में क्यों नहीं किया गया। जबकि ये पांच-छः साल से एक ही जगह पर कार्यरत हैं।

इधर बुधवार को उत्तराखंड सरकार ने हल्द्वानी में ट्रंचिंग ग्राउंड बनाने के मामले में उच्च न्यायालय में अपना जवाब पेश किया। बताया कि नगर निगम को कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हेक्टेयर जमीन आवंटित कर दी है। बताया गया है कि वन विभाग द्वारा उपलब्ध करायी गयी यह जगह मौजूदा डंपिंग ग्राउंड से ही तथा इसकी तरह ही गौलापार बाईपास से लगी हुई है।

हाईकोर्ट के ताजा फैसले से अधिकारी वर्ग खुश नजर आ रहा है। न्यायालय के फैसले से जहां कूड़ा निस्तारण पर पिछले सप्ताह भर से लगी रोक भी एक तरह से हट गयी है, सो कूड़ा निस्तारण की तात्कालिक समस्या समाप्त हो गयी है। वहीं कूड़ा निस्तारण के लिए, जैसी की अपेक्षा थी, कहीं सड़क से दूर जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। आगे देखने वाली बात होगी कि छः माह बाद भी प्रशासन व सरकार कूड़े का कैसा ट्रीटमेंट प्लांट बनाते हैं। इससे गौलापार बाईपास से गुजरने वाले और इंद्रा नगर में रहने वाले लोगों को दुर्गंध से निजात मिलती है अथवा नहीं।

यह भी पढ़ें : हल्द्वानी के ट्रंचिंग ग्राउंड के लिए जो सालों से नहीं हुआ, वह 4 घंटों में हो गया

    • हल्द्वानी-नैनीताल के कूड़ा निस्तारण को वन विभाग व सरकार से जवाब तलब करने के बाद विभाग ने निगम को हस्तांतरित की 4 हेक्टयर वन भूमि
    • अपर प्रमुख वन संरक्षक को 24 घंटे के भीतर कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हैक्टेयर जमीन नगर निगम को हस्तांतरित करने को कहा
    • सरकार से ठोस कूड़े को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने के लिए प्लान्ट लगाने के प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा
  • नैनीताल नगर पालिका के ईओ को हटाने को भी कहा

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने हल्द्वानी के वर्तमान ट्रंचिंग ग्राउंड में नगर निगम को कूड़ा डालने की अनुमति नही दी। अलबत्ता प्रदेश के अपर प्रमुख वन संरक्षक को 24 घंटे के भीतर कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हैक्टेयर जमीन नगर निगम को हस्तांतरित कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने तथा राज्य सरकार से ठोस कूड़े को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने के लिए प्लान्ट लगाने के प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। इसके अलावा न्यायालय की खंडपीठ ने कूड़ा निस्तारण पर यथोचित काम नहीं करने के लिए नैनीताल नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी को स्थानांतरित करने की बात भी कही।

इस आदेश के करीब 4 घंटे में ही हल्द्वानी-नैनीताल के कूड़ा निस्तारण को वन विभाग ने निगम को 4 हेक्टयर वन भूमि इसका केवल ठोस कूड़े का ही प्रबंधन करने सहित 20 शर्तों के साथ 30 वर्षों के लिये लीज पर हस्तांतरित कर दी है। उल्लेखनीय है कि पहले कई दशकों से गौला नदी में राजपुरा के पास और वहां विरोध के बाद इधर मार्च 2012 से गौलापार बाईपास पर हल्द्वानी का व इधर करीब 6 माह से नैनीताल, भवाली, भीमताल व रुद्रपुर का कूड़ा भी डाला जा रहा था।

उल्लेखनीय है कि नगर निगम हल्द्वानी ने सड़कों व गलियों में फैले कूड़े के निरस्ताण के लिए जनहित याचिका में रिकॉल प्रार्थना पत्र-पुर्नविचार याचिका देकर ट्रंचिंग ग्राउंड में कूड़ा डालने की अनुमति मांगी थी, परंतु खंडपीठ ने नगर निगम को कूड़ा निरस्तारण की अनुमति नही दी है। मामले के अनुसार हल्द्वानी के इंदिरा नगर जनविकास समिति ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमे कहा गया था कि नगर निगम हल्द्वानी शहर का समस्त एवं मेडिकल कूड़ा कूड़ा इंदिरा नगर व गौला नदी के पास डाला जा रहा है। इसके आस पास लगभग 3 हजार लोग निवास करते है। इससे कभी भी कोई महामारी होने की आशंका बनी रहती है। बस्ती में कूड़ा डाला जाना नियम विरुद्ध है। वर्ष 2017 में खंडपीठ ने इस क्षेत्र में कूड़ा डालने पर रोक लगा दी थी, फिर भी नगर निगम द्वारा हल्द्वानी, नैनीताल, भवाली व रुद्रपुर का कूड़ा यहां डम्प किया जा रहा है। 10 जुलाई 2018 को खंडपीठ ने इस क्षेत्र में कूड़ा डालने पर पुनः रोक लगा रखी है। वहीं नगर निगम ने अपने प्रार्थना पत्र में कहा है कि उन्होंने ट्रंचिंग ग्राउंड के लिये वन विभाग से अनुमति मांगी है, लेकिन वन विभाग से अभी तक अनुमति नही मिली है। जबकि उन्होंने इसके एवज में पेड़ लगाने के लिए वन विभाग को 15 लाख रूपये भी दे दिए है।

ठोस कूड़े के प्रबंधन पर हाईकोर्ट से हल्द्वानी, गरुड़, ऋषिकेश, मुनि की रेती स्वर्गाश्रम, नरेंद्र नगर व स्वर्गाश्रम के लिए आये बड़े फैसले

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हल्द्वानी नगर निगम को छह माह में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए डंपिंग ग्राउंड बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही गौला नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए निर्देश दिए हैं कि वर्तमान डंपिंग ग्राउंड में कूड़ा निस्तारित न करने के निर्देश दिए हैं।
हल्द्वानी की जन विकास समिति की ओर से कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। जिसमें कहा गया कि इंदिरानगर में मेडिकल वेस्ट फेंका जा रहा है और इससे लोगों को नुकसान हो रहा है। साथ ही इससे गौला नदी भी प्रदूषित हो रही है। वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। जिसे सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि सरकार छह माह में हल्द्वानी में डंपिंग ग्राउंड बनाए। यह भी कहा गया कि जब तक डंपिंग ग्राउंड स्थापित नहीं होता है तबतक वर्तमान जगह पर कूड़ा निस्तारित न किया जाए। इसके साथ ही पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सरकार बायो मेडिकल वेस्ट रूल्स के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे। ऐसे अस्पतालों, लेबोरेट्री और क्लीनिकों का पंजीकरण निरस्त करें। सरकार तीन माह में राज्य स्तरीय व जिलास्तरीय मॉनीटरिंग कमेटियों का गठन करे। इसके साथ ही उल्लंघन करने वालों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई करें। वहीं, हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी निकायों को निर्देश दिए कि गर्मियों में सुबह छह बजे और सर्दियों में सुबह सात बजे से पहले कूड़ादानों और डंपरों को खाली किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि कूड़ेदानों-डंपरों से कूड़ा बाहर न गिरे। खंडपीठ ने रात की अवधि में काम करने वाले कर्मचारियों को आवश्यक उपकरण भी उपलब्ध कराने को कहा है।

मेडिकल कॉलेजों पर फीस वृद्धि पर छात्र-छात्राओं को बड़ी राहत, कॉलेजों को झटका

<

p style=”text-align: justify;”>-80 हजार रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2.15 लाख रुपये कर दी गई थी फीस
नैनीताल, 9 जुलाई 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय से प्रदेश के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से बीएमएस कर रहे छात्र-छात्राओं को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने बीएमएस की फीस वृद्धि के शासनादेश को रद्द कर दिया है, वहीं कॉलेजों को जमा कराई गई बढ़ी फीस की राशि को 15 दिन में वापस करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की।
मामले के अनुसार हिमालयन आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज देहरादून के छात्र रजत राणा, यश सैनी व ललित तिवारी सहित 104 छात्र-छात्राओं ने इस मामले में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इसमें सरकार के फीस वृद्धि के 14 अक्तूबर 2015 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में फीस 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2.15 लाख रुपये कर दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि मेडिकल कॉलेज के प्रॉस्पेक्टस में 80 हजार रुपये सालाना फीस निर्धारित होने की जानकारी दी गई है। इधर सरकार ने फीस निर्धारण के लिए स्थायी कमेटी के गठन का ऐलान किया था, लेकिन कमेटी गठित नहीं की गई। इसके बावजूद फीस वृद्धि कर दी गई। बढ़ी हुई फीस नहीं देने पर जुर्माना भी लिया जा रहा है। इसके खिलाफ याचिका दायर करने वालों में वर्ष 2013-14, 14-15 व 15-16 बैच के मेडिकल छात्र शामिल थे। अदालत ने पहले हुई सुनवाई में अधिक फीस लेने पर रोक लगा रखी थी। इधर सोमवार को हुई सुनवाई के बाद सरकार के इस मामले में जारी शासनादेश को रद कर दिया है।

यह भी पढ़ें : मुर्दों का “शौच” भी खा गये ‘देवभूमि’ के “दानव” अधिकारी, एफआइआर होगी दर्ज

  • स्वच्छ भारत अभियान के तहत मृत व्यक्तियों और पहले से शौचालयों वाले परिवारों को आवंटित कर दिये शौचालय, तथा पूरा पैंसा भी नहीं दिया

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 22 जून 2018। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में देश में स्वच्छ भारत अभियान चलाया, और इसके तहत हर परिवार, खासकर गरीब-बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था भी की। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। लेकिन देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के कुछ, कुछ भी ‘खा’ सकने वाले दानव सदृश अधिकारी न केवल शौचालयों का पैंसा खा गये, वरन उन्होंने इसके लिये दानवों की तरह ही मृत लोगों का ‘शौच’ खाने से भी परहेज नहीं किया। डीएम के स्तर से जांच में इन तथ्यों की पुष्टि हुई किंतु इसके बाद भी दोषी दानव अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय में आया तो न्यायालय में प्रदेश के मुख्य सचिव को ऐसे दोषी अधिकारियों के खिलाफ एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने व एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये हैं।
मामले के अनुसार विकास नगर देहरादून निवासी व्यक्ति सुंदर लाल सैनी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में भारत को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान योजना चलाई थी जिसके तहत बीपीएल परिवारो के लिए सुलभ शौचालयों का निर्माण किया जाना था। योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार को सुलभ शौचालय बनाने के लिए बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था थी। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। याची का आरोप था कि सरकार के अधिकारियों ने शौचालय उन लोगो को आवंटित कर दिए, जिनके पास पहले से शौचालय थे। साथ ही ऐसे लोगों के नाम पर भी शौचालय आवंटित दर्शा दिये गये, जो कि मर चुके थे। तथा कई को पूरा पैसा नहीं दिया। इसकी शिकायत लोगों ने जिला अधिकारी देहरादून से की। जिलाधिकारी देहरादून ने इसकी जांच तहसीलदार विकास नगर से कराई। तहसीलदार ने शिकायत को सही मानते हुए जाँच रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौपी। इसके बावजूद कोई कार्यवाही नही होने के कारण याची ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। मामले को सुनने के बाद वरिष्ठ न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने जनता के पैसांे का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मुख्य सचिव को एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने, तथा एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये, तथा जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

यह भी पढ़ें : तीन माह के भीतर नैनीताल में खुलेगी कैट की स्थायी बैंच

उच्वन्यायालय ने दिए केंद्र सरकार को कैट की स्थाई बेंच स्थापित करने के निर्देश

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने केंद्र सरकार को उत्तराखंड में तीन माह के भीतर कैट यानी केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal) की स्थापना करने के निर्देश दिये हैं। उल्लेखनीय है कि नैनीताल जनपद के ओखलकांड़ा निवासी डाक विभाग से सेवानिवृत्त हरीश चन्द्र जोशी ने उच्च न्यायालय  में याचिका दायर कर कहा है कि उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन व अन्य लाभ नहीं दिए जा रहे हैं। एकलपीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान इस मामले को कैट को संदर्भित करने के आदेश दिये, साथ ही केंद्र सरकार से नैनीताल में कैट की स्थाई बैंच बनाने पर निर्णय लेने को भी कहा। सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने यह भी कहा कि राज्य में डाक विभाग, सर्वे आफ इंण्डिया, रेलवे व आइएमए सहित कई केंद्रीय विभाग स्थित हैं, जिनके मामलों की सुनवाई हेतु यहां कोई स्थायी बैंच नहीं है। इस कारण कई वर्षों से अनेक मामलों का निस्तारण नही हो पा रहा है। कैट की बैंच साल में तीन या चार बार ही आती है। जबकि अन्य समय में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए वादकरियों को दिल्ली या लखनऊ जाना पड़ता है, या कैट के बैंच के नैनीताल आने का इंतजार करना पड़ता है। इससे वादकरियों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है।

यह भी पढ़ें : प्रदेश के बाहर का डीएलएड भी होगा मान्य, सरकार की विशेष अपील खारिज

उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षक पद के लिए बाहरी राज्यों से किया गया दो वर्षीय डीएलएड डिप्लोमा भी मान्य होगा। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति शरद शर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने राज्य सरकार की एकलपीठ के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील को खारिज कर एकलपीठ के फैसले को सही ठहराया है।  उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी हरीश चन्द्र  ने राज्य सरकार के ‘प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती में प्रदेश के बाहर से डीएलएड को अमान्य करने के आदेश तथा शिक्षक सेवा नियमावली 2012 व संशोधन नियमावली 2013 को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याची का कहना था कि उसके पास दिल्ली के मान्यता प्राप्त संस्थान से प्राथमिक शिक्षा में दो वर्षीय डिप्लोमा है। साथ ही वह टीईटी भी उत्तीर्ण है। इधर जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक नैनीताल और उधमसिंह नगर ने शिक्षकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे हैं। जुलाई 2016 में प्रकाशित इस विज्ञप्ति में संबंधित जिले के डायट से डीएलएल अनिवार्य किया गया है जोकि न्याय संगत नहीं है। सरकार का यह कदम एनसीटीई के निर्धारित योग्यता के प्राविधान का भी उल्लंघन है। एकलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने के आदेश दिए थे। सितंबर 2017 के इस आदेश को सरकार ने स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी थी। संयुक्त खंडपीठ ने भी मामले की सुनवाई के बाद एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है और स्पेशल अपील खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद प्रदेश से बाहर से मान्यता प्राप्त संस्थानों से डीएलएल करने वाले अभ्यर्थी प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे।

कांग्रेस सरकार  में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 निरस्त

नैनीताल, 17 अप्रैल 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने सीधी भर्ती के पदों पर संविदा व अस्थायी कर्मचारियों की बजाय नियमित भर्ती करने के आदेश पारित किए हैं। न्यायालय के फैसले से राज्य के करीब 5000 से अधिक सरकारी नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों की नौकरी संकट में पड़ गई है। हालांकि सरकार के पास एकलपीठ के फैसले के खिलाफ अपील और नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों को नियमित भर्ती में अधिमान अंक देने के विकल्प मौजूद हैं।

उल्लेखनीय है कि 30 दिसंबर 2016 को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को मंजूरी प्रदान की थी। इसके तहत 2011 में नियुक्त हुए और 5 साल पूरे कर चुके अस्थायी व संविदा कर्मचारियों को नियमितीकरण का हकदार बना दिया गया। इस नियमावली के प्रभावी होने के बाद राज्य के तमाम विभागों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों को सीधी भर्ती वाले पदों पर नियमित कर दिया गया। इस नियमावली से करीब 5000 से अधिक कार्मिक लाभान्वित हुए।

सरकार की इस नियमावली को हल्द्वानी के बेरोजगार हिमांशु जोशी ने चुनौती दी। उनका कहना था कि सरकार अस्थायी कार्मिकों को सीधी भर्ती के पदों पर नियमित नहीं कर सकती। सीधी भर्ती के पदों पर नियमितीकरण से युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं, लिहाजा नियमावली को निरस्त किया जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार द्वारा 2013 और फिर 2016 में विनियमितीकरण सेवा नियमावली बनाई गई। यह सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ है। सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में दलील दी गई कि उमा देवी मामले से कहीं भी अस्थायी कार्मिकों का नियमितीकरण करने से रोक नहीं लगाई है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मंगलवार 17 अप्रैल 2018 को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सरकार की विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया।

अधिमान व आयु में छूट दे सकती है सरकार

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि नियमावली निरस्त होने से प्रभावित होने वाले कार्मिकों को सरकार सीधी भर्ती के पदों में नियुक्ति प्रक्रिया में अधिमान में तथा आयु में छूट दे सकती है।

यह है उमा देवी प्रकरण

2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी कर्मी उमा देवी से संबंधित मामले में अहम फैसला दिया था। इसमें कहा था कि दस अप्रैल 2006 तक जिन लोगों को अस्थायी तौर पर काम करते हुए दस साल हो चुके हैं, वह बिना न्यायालय के आदेश के यदि नियमित न हुए हों तो सरकार उन्हें नियमित करने के लिए एक बार नियम बना सकती है। मगर उत्तराखंड में 2011, 2013 फिर 2016 में विनियमितीकरण नियमावली को कैबिनेट ने मंजूरी प्रदान की।

पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी सरकार : कौशिक

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जहां राज्य में हजारों की संख्या में नियमित और नियमितीकरण की बाट जोह रहे कर्मचारियों को झटका लगा है, वहीं राज्य सरकार भी सकते में है। इस बारे में अग्रिम कानूनी विकल्प तलाशे जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह कर्मचारियों के साथ है और कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी। सरकार के प्रवक्ता एवं काबीना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। इसका अध्ययन कर आगे की तैयारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों के साथ है और इस आदेश के सिलसिले में रिव्यू में जाएगी।

पुलिस कर्मियों की तरह होमगार्डों को भी दैनिक भत्ते देने के आदेश 

-एकलपीठ का आदेश बरकरार, राज्य सरकार से आठ सप्ताह में इस पर विचार करने को कहा
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार से उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आधार पर होमगार्डो को पुलिस वालो की तरह दैनिक वेतन भत्ते के लिए 8 सप्ताह के भीतर विचार करने को कहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश केएम जोसफ व न्यायधीश शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ में हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी शिव प्रसाद एवं अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर होमगार्डों को भी पुलिस वालो की तरह वेतन भत्ते दिए जाय। इस पर पूर्व में उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि होमगार्डो को भी पुलिस के सामान वेतन व अन्य सुविधाए दिये जायें। इस आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। जिस पर आज सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है।

निलंबित सिविल जज दीपाली शर्मा की गिरफ्तारी पर रोक

<

p style=”text-align: justify;”>नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार की निलंबित सिविल जज दीपाली शर्मा की गिरफ्तारी से रोक सम्बंधित याचिका में सुनवाई करते हुए उनको फिलहाल राहत दी है और उनसे जाँच में सहयोग करने को कहा है। उल्लेखनीय है कि सुश्री शर्मा ने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद याची से सरकार के जवाब पर प्रतिशपथ पत्र पेश करने को कहा है, और अगली सुनवाई के लिए 6 अप्रैल की तिथि नियत की है।
बुधवार को मामले की जांच कर रहे जांच अधिकारी कोर्ट में पेश हुए। वहीं याची के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि दीपाली शर्मा के पिता का स्वास्थ्य ठीक नही होंने व दिल्ली के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती होने के कारण वे दो दिन जाँच में सहयोग नही कर सकतीं, लिहाज उनको समय दिया जाये। कोर्ट ने जांच अधिकारी को आदेश दिए कि उनके बयान एएसपी रैंक से ऊपर की महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में सूरज उगने के बाद व डूबने से पहले लिये जाएँ। उल्लेखनीय है सिविल जज सुश्री शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने नाबालिग लड़की को अपने पास रख कर प्रताड़ित किया व शाररिक चोट पहुचाई। मुख्य न्यायाधीश से शिकायत किये जाने पर मुख्य न्यायधीश ने जिला जज हरिद्वार को इस मामले जांच करने के लिए कहा गया था। जांच सही पाये जाने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए थे । 

एनएच 74 मामले में फंसे तहसीलदार ने कहा, अधिकारियों के आदेश पर किया

नैनीताल। एनएच 74 मामले में बड़े अधिकारी फंस सकते हैं। मामले में फंसे एक आरोपित काशीपुर के प्रभारी तहसीलदार मदन मोहन पलड़िया ने उच्च न्यायालय में बुधवार को कहा कि उन्होंने जो भी किया, वह अधिकारियों के आदेशों पर किया। उन्हें मामले में फंसाया जा रहा है। उत्तराखंड हाई कोर्ट में की जमानत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए इस मामले में सरकार से 2 अप्रैल तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बीके बिष्ट की एकलपीठ में हुई। अगली सुनवाई 2 अप्रैल की तिथि नियत की है। आरोपित का कहना था कि उन्होंने इस केस में अपने अधिकारियों के आदेशों का पालन किया है। उनको बेवजह फंसाया जा रहा है। इससे विपक्ष द्वारा राज्य सरकार पर बड़े अधिकारियों को बचाने के आरोपों की भी एक तरह से पुष्टि होती है।

Loading...

नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….।मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड