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उत्तराखंड में क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की मॉनिटरिंग के लिये हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

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-राज्य के सभी जिलों के जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग कमेटी होंगी गठित
-कमेटी में जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव भी होंगे सदस्य
नवीन समाचार, नैनीताल, 23 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने राज्य के क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की मॉनिटरिंग के लिये राज्य के सभी जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। इस कमेटी में सम्बंधित जिले के जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव भी सदस्य होंगे। इस कमेटी की पहली बैठक आगामी 26 सितंबर शनिवार को अनिवार्य रूप से होगी। यह कमेटी निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेगी साथ ही याचिकाकर्ताओं से भी सम्पर्क बनाये रखेगी। मामले की सुनवाई अगले बुधवार को होगी।
मामले के अनुसार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने राज्य में क्वारन्टाइन सेंटरों व कोविड अस्पतालों की बदहाली और उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अलग अलग जनहित याचिकायें दायर की थीं। इन याचिकाओं पर पूर्व में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर माना कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। बुधवार को पीठ ने इन अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग के लिये जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने के आदेश दिए।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 06 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदेश के बदहाल क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की बदहाली के मामले को लेकर दायर याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई की। मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि कोरोना मरीजों के इलाज में डब्ल्यूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों का कितना अनुपालन किया जा रहा है। उसकी विस्तृत रिपोर्ट 17 सितंबर तक कोर्ट में शपथपत्र के माध्यम से पेश की जाए।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका कर कहा है कि राज्य सरकार ने प्रदेश के छह अस्पतालों को कोविड-19 के रूप में स्थापित किया है। लेकिन इन अस्पतालों में कोई भी आधारभूत सुविधा नहीं है। जिसके बाद देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने भी उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। बदहाल क्वारंटाइन सेंटरों के मामले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश करते हुए माना है कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। न ही ग्राम प्रधानों के पास कोई फंड उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाईकोर्ट ने सरकार और स्वास्थ्य सचिव को जवाब पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश के तहत जिला विधिक प्राधिकरण की रिपोर्ट के आधार पर क्वारंटाइन सेंटरों की कमियों को 14 दिन के अंदर दूर कर विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 07 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने बाबा रामदेव द्वारा कोरोना वायरस से निजात दिलाने की बनाई गई दवा ‘कोरोनिल’ को लांच किए जाने के खिलाफ मणि कुमार की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गलत तथ्य पेश करने पर याचिकाकर्ता पर न्यायालय का समय बरबाद करने के लिए 25 हजार का जुर्माना लगाते हुए जनहित याचिका को खारीज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका को वापस लेने हेतु कोर्ट से प्रार्थना भी की, परंतु खंडपीठ ने कहा कि इससे न्यायालय का अमूल्य समय बरबाद हुआ है तथा गलत तथ्य पेश करने पर समाज मे इसका गलत प्रभाव भी पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में ऊधमसिंह नगर जनपद के अधिवक्ता मणि कुमार ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि बाबा रामदेव व उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पिछले मंगलवार को हरिद्वार में कोरोना वायरस से निजात दिलाने के लिए पतंजलि योगपीठ के दिव्य फॉर्मेसी द्वारा निर्मित कोरोनिल दवा लांच की। इसमें आईसीएमआर द्वारा जारी गाइड लाइनों का पालन नहीं किया गया है और आयुष मंत्रालय भारत सरकार की अनुमति भी नही ली गई है। केवल आयुष विभाग उत्तराखंड से रोग प्रतिरोधक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लाइसेंस लिया गया और दवा कोरोना के इलाज के नाम पर बना दी गई। इसके साथ ही कंपनी ने दावा किया कि निम्स विश्विद्यालय राजस्थान द्वारा दवा का परीक्षण किया गया है, जबकि निम्स का कहना है कि उन्होंने ऐसी किसी भी दवा का कोई क्लीनिकल परीक्षण नहीं किया है। उनका यह भी कहना है कि बाबा रामदेव लोगों में अपनी इस दवा का भ्रामक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। यह दवा न ही आईसीएमआर से प्रमाणित है न ही उनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। इस दवा का अभी तक क्लीनिकल परीक्षण तक नहीं किया गया है। इसके उपयोग से शरीर मे क्या साइड इफेक्ट होंगे इसका कोई इतिहास नहीं है, इसलिए दवा पर पूर्ण रोक लगाई जाए और आईसीएमआर द्वारा जारी गाइड लाइनों के आधार पर भ्रामक प्रचार हेतु कानूनी कार्यवाही की जाए। खंडपीठ के एक आदेश से बाबा रामदेव को उनकी कोरोनिल दवा पर मुंह चिढ़ा रहे विरोधियों को करारा झटका लगने की उम्मीद है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने बाबा रामदेव की कोरोना विषाणु की दवा कोरोनिल लांच किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर विपक्षियों से अगली सुनवाई की तिथि 27 जुलाई तक जवाब मांगा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2020। बाबा रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण के लिए उनके पतंजलि योगपीठ द्वारा कथित तौर पर कोरोना के उपचार के लिए ‘कोरोनिल’ नाम की दवा बनाने का मामला गले की हड्डी बन गया है, जो न अब उगलते बन रहा है और न उगलते। वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट भी मामले में सख्त हो गया है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते बुधवार को लगातार इस मामले में सुनवाई की और केंद्र व राज्य सरकार के साथ ही पतंजलि, आयुष उत्तराखंड के निदेशक, आईसीएमआर के साथ कोरोनिल का कथित तौर पर परीक्षण करने वाले निम्स विवि राजस्थान को भी नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने राज्य में हो रही कोरोना जांच की संख्या को कम मानते हुए जांच की क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिये हैं, और इस संबंध में सरकार से 13 जुलाई तक रिपोर्ट देने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली, हरिद्वार के सच्चिदानंद डबराल व अन्य की जनहित याचिका में शुक्रवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि कोरोना की महामारी व लॉकडाउन के दौरान राज्य में तीन लाख से अधिक प्रवासी लौट चुके हैं मगर अब तक प्रवासियों सहित राज्य वासियों के करीब 65 हजार ही कोरोना टेस्ट हुए हैं। वहीं सरकार की ओर से पीठ को बताया गया कि नैनीताल के मुक्तेश्वर में आईवीआरआई में कोरोना जांच की लैब ने काम करना आरंभ कर दिया है। साथ ही प्राइवेट लैबों में भी जांच के लिए निविदा जारी की जा चुकी है।

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-बरिंदरजीत सिंह के मामले की अगली सुनवाई 25 को होगी
IPS Barinderjit Singh reached High Court against DGPनवीन समाचार, नैनीताल, 21 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आईपीएस बरिंदरजीत सिंह के एसएसपी ऊधमसिंह नगर पद से आईआरबी बैलपडाव रामनगर स्थानांतरण किए जाने के आदेश व उच्चाधिकारियों पर प्रताडना का आरोप लगाने वाली याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई की और अगली सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तिथि नियत कर दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविकुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान आईपीएस बरिंदरजीत सिंह ने पिछली सुनवाई की तरह इस बार भी स्वयं ही अपने मामले की पैरवी की।
मामले के अनुसार एसएसपी बरिंदरजीत सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उसका स्थानांतरण आईआरबी कमांडेंट बैलपड़ाव के पद पर कर दिया गया। उन्होंने याचिका में प्रदेश के डीजीपी अनिल रतूडी, डीजी-कानून व्यवस्था अशोक कुमार, सेवानिवृत्त आईजी जगत राम जोशी पर महत्वपूर्ण मामलों में निष्पक्ष जांच में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया था। याचिका में कहा कि उन्हें इसके लिए चेतावनी भी दी गई। जब उन्होंने पत्राचार किया तब चेतावनी वापस ली गई मगर उत्पीड़न जारी रहा। याचिका में कहा कि 12 वर्ष की सेवा में ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठ होने का ईनाम आठ बार तबादला कर दिया गया। पूर्व में कोर्ट ने मामले में डीजीपी, डीजी लॉ एंड ऑर्डर व पूर्व आईजी को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने इस प्रकरण पर सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तिथि नियत की है।

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-याची ने जल्द सुनवाई हेतु दिया प्रार्थना पत्र, पीठ ने 14 अगस्त की तिथि लगाई
नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमुर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने प्रदेश में बिजली विभाग में तैनात अधिकारियों, कर्मचारियों व रिटायर कर्मचारियों को पावर कारपोरेशन द्वारा सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। मामले में आज संस्था की ओर से याचिका पर जल्द सुनवाई हेतु प्रार्थना पत्र पेश किया, जिस पर न्यायालय ने सुनवाई करते हेतु अगली सुनवाई हेतु 14 अगस्त की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार देहरादून के आरटीआई क्लब ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार विद्युत विभाग में तैनात अधिकारियों व कर्मचारियों से एक माह का बिल मात्र 100 रुपये वसूल रही है, जबकि आम लोगो से 400 से 500 रुपए ले रही है। जबकि इनका बिल लाखांे में आता है, लेकिन इसका बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदेश में कई अधिकारियों के घर बिजली के मीटर तक नहीं लगे हैं, और जो लगे भी है वे खराब स्थिति में हैं। कारपोरेशन ने वर्तमान कर्मचारियों के अलावा सेवानिवृत्त व उनके आश्रितों को भी बिजली मुफ्त में दी है, जिसका सीधा भार आम जनता की जेब पर पड़ रहा है। याची का कहना है कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश घोषित है, लेकिन यहां हिमांचल से अधिक मंहगी बिजली है, जबकि वहाँ बिजली का उत्पादन तक नही होता है। याची का यह भी कहना है कि घरों में लगे मीटरों का किराया पावर कारपोरेशन कब का वसूल कर चुका है परंतु हर माह के बिल के साथ जुडकर आता है जो गलत है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 10 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियांे द्वारा उत्पाद से जुड़ी जानकारियां उत्पाद में नहीं दिखाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए याची से अपनी शिकायत केंद्र सरकार को दर्ज कराने को कहा है। इसके साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका को इस आधार पर निरस्त कर दिया है कि याची ने अपनी शिकायत केंद्र सरकार को नही भेजी थी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि अगर उनकी शिकायत पर केंद्र सरकार सम्बंधित कम्पनी पर कोई दण्डात्मक कार्यवाही नही करती है तो याचिकर्ता दुबारा याचिका दायर कर सकता है। सुनवाई के दौरान असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल राकेश थपलियाल ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि याची ने अभी इस सम्बंध में कोई शिकायत केंद्र सरकार को नही दी है।
मामले के अनुसार नैनीताल निवासी अवनीश उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर कर ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियां अमेजॉन, फिलिप्कार्ट, मिंत्रा, नायका ई-रिटेल, स्नैपडील, अजीजों, लाइफ स्टाइल इंटरनेशनल को पक्षकार बनाया है। याची का कहना है कि इन कम्पनियो के द्वारा ऑन लाइन शॉपिंग कराते वक्त उनके द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा उत्पाद कहाँ बना है, किस देश मे बना है, और उसकी मदर कम्पनी किस देश की है, यह नही दिखाया जाता है। इसके कारण उपभोक्ता स्वयं को ठगा सा महसूस करते हैं। इस कारण अगर उपभोक्ता उत्पाद सही नही होने पर उसके खिलाफ उपभोक्ता फोरम में शिकायत करना चाहता है तो नही कर सकता, क्योंकि उस कम्पनी का पता ज्ञात नहीं होता है। याची के अधिवक्ता राजीव बिष्ट का कहना था कि इस सम्बंध में केंद्र सरकार ने 2011 में लीगल मिट्रोलॉजी एक्ट बनाया था और 2018 में इस एक्ट को संशोधित भी किया था। जिसमंे कहा गया कि ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियां उत्पाद के साथ उसकी निर्माण अवधि, किस स्थान पर बना है, किस देश का है आदि उससे जुड़ी सभी जानकारियां उत्पाद के साथ देंगे, परन्तु ये कम्पनियां ऐसी कोई जानकारी नही देती हैं।

यह भी पढ़ें : यूपी के विधायक अमनमणि को विशेष पास मामले में ‘बड़ों पर रहम-छोटों पर सितम’..

नवीन समाचार, देहरादून, 25 जून 2020। लॉक डाउन के दौरान उत्तर प्रदेश के विवादित विधायक अमनमणि त्रिपाठी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्वर्गीय पिता के पितृकर्म का झूठा बहाना लेकर चारधाम की यात्रा पर विशेष पास लेकर जा रहे थे। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के द्वारा पिछली तिथि में मांगे जाने पर बृहस्पतिवार को देहरादून और और डीजीपी उत्तराखंड ने अपना जवाब दाखिल कर दिया। इस मामले में प्रदेश के अपर मुख्य सचिव पर विशेष पास जारी करने को लेकर अंगुलियां उठा रहे थे। लेकिन जवाब में डीएम देहरादून ने अपर मुख्य सचिव का बचाव करते हुए कहा है कि विशेष पास एडीएम देहरादून द्वारा जारी किया गया था, अपर मुख्य सचिव के द्वारा नहीं। इसके साथ पीठ ने अन्य पक्षों को 10 दिन में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई अब सात जुलाई को होगी। वहीं अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन के अतिरिक्त समय की मांग की, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।
उल्लेखनीय है कि इस मामले की सीबीआई जांच की मांग के साथ जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के सचिव अपर मुख्य सचिव ने अपने पद का दुरुपयोग कर तथा केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का उलंघन करते हुए अमनमणि त्रिपाठी सहित 11 लोगों को विशेश पास जारी किया। याचिकाकर्ता द्वारा मुख्य सचिव और डीजीपी से लिखित शिकायत करने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा अपर मुख्य सचिव पर कोई कार्रवाई नहीं कि गयी, लिहाजा इस मामले की सीबीआई जांच कर दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

यह भी पढ़ें : ग्राम प्रधानों के फोन नहीं उठाते डीएम, आशाओं पर सौंपी जिम्मेदारी.. हाई कोर्ट सख्त

-बागेश्वर जिले के अधिकारियों से जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वहन करवाएं : हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जून 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गरुड़-बागेश्वर में राज्य सरकार द्वारा प्रवासियों को प्राथमिक विद्यालयों व पंचायत भवनों में क्वारन्टाइन करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव को बागेश्वर जिले के स्वास्थ्य सम्बन्धी तथ्यों व शिकायतों का संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी ठीक से निर्वहन करने हेतु निर्देश देने और 30 जून तक इस पर विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया व न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई। मामले की अगली सुनवाई की तिथि 30 जून की तिथि नियत की है।
आज सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के द्वारा कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार ने महामारी से लड़ने के लिए जिले के ग्राम प्रधानों को अभी तक फंड नही दिया गया है। महामारी से लड़ने के लिए जब गरुड़ क्षेत्र के ग्राम प्रधानों ने जिम्मेदार अधिकारियों से फोन पर शिकायत करनी चाही तो उनके मोबाइल नंबर बंद मिले और उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां आंगनबाड़ी कार्यकर्तियो व आशा वर्करों को दे दी हैं। क्वारन्टाइन सेंटरों में न तो आने-जाने वाले लोगों का रिकार्ड रखा जा रहा है न ही सेंटरों में सेनेटाइजिंग की जा रही है। मामले के अनुसार अधिवक्ता डीके जोशी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि गरुड़ बागेश्वर में राज्य सरकार द्वारा प्रवासियों को लाकर विद्यालयों व पंचायत भवनों में क्वारन्टाइन किया जा रहा है जिनमें कोई सुविधा नहीं है।ं इसलिए उनको तहसील या जिला स्तर पर क्वारन्टाइन किया जाये। इस सम्बंध में गरुड़ के ग्राम प्रधानों ने जिला अधिकारी को ज्ञापन देकर कहा था कि अगर उनकी मांग पूरी नही की जाती है तो वे सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देंगे।

यह भी पढ़ें : हाई कोर्ट ने सल्ट के थापला-तया मोटर मार्ग के निर्माण पर लगाई रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक में थापला-तया मोटर मार्ग के निर्माण पर रोक लगा दी है। पीठ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि अगर रोक के बाद भी सड़क का निर्माण हुआ तो डीएफओ जिम्मेदार होंगे। पीठ ने अपने आदेश में पूरे मामले की राजस्व पुलिस से जांच कर तीन दिन के भीतर रेगुलर पुलिस से जांच कराने और जांच कराकर आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट 13 जुलाई को उच्च न्यायालय में पेश करने को कहा है। साथ ही पीठ ने ठेकेदार द्वारा पेड़ काटने और राजस्व पुलिस द्वारा अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज करने पर सवाल खड़े किए है।
उल्लेखनीय है कि रामनगर के खुशाल रावत ने जनहित याचिका दाखिल कर कहा है कि थापला तया मोटरमार्ग का निर्माण नियम विरुद्ध चल रहा है। सड़क निर्माण में संरक्षित प्रजाति के 224 पेड़ों का कटान किया गया है । याचिका में कहा गया है कि ग्रामीणों ने इसका विरोध किया तो ठेकेदार ने उनको धमकी दी और गांव के आसपास गोलियां चला दीं। ग्रामीणों ने कहा है कि जब शिकायत राजस्व पुलिस की की गई तो आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। याचिका में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

यह भी पढ़ें : प्रदेश के एक मंत्री, उनकी पुत्रवधु सहित केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों को नोटिस

-उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में अनियमितताओं का मामला
-याचिका में बोर्ड के चेयरमैन की पुत्रवधु को लाभ पहुंचाने का लगाया गया है आरोप, बोर्ड चेयरमैन को हटाने और बोर्ड की गतिविधियों की जांच की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में गड़बड़ियों और निर्माण में लगे श्रमिकों को फायदा पहुंचाने के बजाय बोर्ड द्वारा बोर्ड चेयरमैन की पुत्रवधू के एनजीओ को लाभ पहुंचाने के मामले में बोर्ड के चेयरमैन श्रम मंत्री हरक सिंह रावत व उनकी पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं सहित श्रम आयुक्त उत्तराखंड तथा केंद्रीय श्रम सचिव को नोटिस जारी कर 2 सप्ताह में जवाब मांगा है। साथ ही अधिकांश बड़े निर्माणों और निर्माण श्रमिकों के नियोक्ताओं व बिल्डरों से कल्याणकारी सैस की जानबूझकर वसूली न करने पर शपथ पत्र दायर करने को भी कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 सप्ताह बाद होगी।
उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी निवासी अमित पांडे ने याचिका दायर कर उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड पर मजदूरों के हित में कार्य ना करने, बल्कि बोर्ड के साधनों से बोर्ड के चेयरमैन की पुत्रवधू के एनजीओ को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया है। साथ ही याचिका में बोर्ड की गतिविधियों की जांच और बोर्ड चेयरमैन को इमानदारी से पद का निर्वहन न करने के कारण हटाने की मांग भी की गई है। न्यायालय ने सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता अमित पांडे द्वारा मजदूरों के हित में उठाए गए इस अनियमितता के विषय को बहुत महत्वपूर्ण भी बताया है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने मुम्बई में फंसे 2600 प्रवासियों को वापस लाने पर सरकार से दो दिन में मांगा जवाब…

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और भारतीय रेलवे से मुम्बई में अब भी फंसे 2600 उत्तराखंड के प्रवासियों को वापस लाने के मामले में त्वरित कार्ययोजना बनाकर 17 जून को न्यायालय में जवाब दायर करने के लिए कहा है। न्यायालय ने यह आदेश प्रवासी सहयोगी टीम की सदस्य श्वेता मासीवाल की हस्तक्षेप याचिका का संज्ञान लेते हुए दिये हैं। उल्लेखनीय है कि प्रवासी सहयोगी टीम की श्वेता मासीवाल ने हाईकोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर कर 30 अप्रैल से पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करा कर वापसी का इंतजार कर रहे 2600 प्रवासियों को मुम्बई से वापस लाने के मामले में राज्य सरकार द्वारा अड़ियल रवैया अपनाने की बात कही थी। प्रवासी सहायता टीम के अधिवक्ता दुष्यन्त मैनाली ने बताया कि टीम के कई बार संपर्क करने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस मामले में महाराष्ट्र को एनओसी नहीं दी गई। जबकि टीम के अनुरोध पर महाराष्ट्र सरकार के अधिकारियों ने उत्तराखंड के नोडल अधिकारियों से तथा टीम ने भी लगातार 26 मई से कई बार संपर्क कर उत्तराखंड सरकार से अनुरोध किया था।

यह भी पढ़ें : बाहर से आने वाले यात्रियों के साथ भेदभाव पर हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार को दिये निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जून 2020। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने हवाई सेवा से राज्य में आने वाले प्रवासियों के मामले में दायर जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए केन्द्र व राज्य सरकार के साथ ही मुख्य सचिव, नागरिक उड्डयन सचिव को आदेश जारी कर कहा है कि यात्रियों को जबरन पेड क्वारंटीन में न भेजंे। बल्कि यात्रियों को उनकी सहमति से ही पेड या सरकारी क्वारंटीन सेंटरों में भेजा जाए।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी उमेश कुमार ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार हवाई जहाज से आने वाले प्रवासियों के साथ भेदभाव कर रही है। सरकार की ओर से यहां आने वाले प्रवासियों को क्वारंटीन के नाम पर होटलों में रखा जा रहा है और उनके ठहरने व खाने-पीने का खर्चा उनसे वसूला जा रहा है जबकि अन्य यात्रियों का खर्चा राज्य सरकार खुद वहन कर रही है। जो कि गलत है। याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले में केन्द्र व राज्य के साथ साथ प्रदेश के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह, नागरिक उड्डयन सचिव व देहरादून के जिलाधिकारी को पक्षकार बनाया गया था।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने दिए आदेश, रेड जोन से आ रहे लोगों को राज्य की सीमा पर ही किया जाए क्वॉरेंटाइन

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता दुष्यन्त मैनाली व सच्चिदानंद डबराल की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय राज्य सरकार को आदेशित किया है जहां तक संभव हो, रेड जोन के राज्यों से उत्तराखंड आने वाले व खासकर कोरोना के लक्षणों वाले लोगों को राज्य की सीमा पर ही संस्थागत क्वारन्टाइन यानी एकांतवास किया जाये, और साथ में उनकी कोरोना की जांच भी कराई जाये। नकारात्मक रिपोर्ट आने पर ही उन्हें राज्य में आगे जाने दिया जाये।
सुनवाई के दौरान आईसीएमआर द्वारा राज्य सरकार को एलिजा टेस्ट किट और आरटीसीटीपी किट जल्द उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया गया है। राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट को बताया गया कि सभी कोरोना अस्पतालों में पूर्व आदेशों के क्रम में आईसीयू व वेंटिलेटर संचालित कर दिए गए हैं और अन्य जगह भी ये सुविधा जल्द उपलब्ध करायी जाएगी। सुनवाई के दौरान राज्य के स्वास्थ्य सचिव नितेश झा और महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ अमिता उप्रेती भी वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से कोर्ट के सामने उपस्थित हुए। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई। मामले की अगली सुनवाई 1 सप्ताह बाद होगी।

यह भी पढ़ें : कोरोना पर हाईकोर्ट सख्त, उत्तराखंड आने वालों का सीमा पर ही रैपिड और एंटीजिंग टेस्ट करने को दिए निर्देश..

-कोर्ट ने राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के वालिंटियरों को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया
– ये रिलीफ कैंप में जाकर मौका मुआयना करेंगे और प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेंगे
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 मई 2020। हाईकोर्ट ने बाहरी लोगों तथा राज्य में आ रहे उत्तराखंड के प्रवासी लोंगों की राज्य की सीमाओं पर थर्मल टेस्टिंग के साथ  रैपिड टेस्टिंग और एंटीजिंग टेस्टिंग की व्यवस्था करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार को 15 मई तक समय दिया है। साथ ही कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के वालिंटियरों को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया है। यह लोग रिलीफ कैंप में जाकर मौका- मुआयना कर प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेंगे।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग माध्यम से हरिद्वार निवासी सचिदानन्द डबराल की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए। याचिका में कोरोना वायरस से बचाव के लिए घोषित लॉक डाउन से प्रभावित लोंगों की मदद करने की मांग की गई थी। पिछली सुनवाई में महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया था कि उत्तराखंड में अन्य राज्यों के करीब 40 हजार मजदूर हैं जबकि करीब दो लाख उत्तराखंड के लोग अन्य राज्यों में फंसे हैं। वह उत्तराखंड आना चाह रहे हैं। इन लोगों ने उत्तराखंड आने के लिये पंजीकरण भी कराया है। सरकार इन्हें लाने का प्रयास कर रही है। 
हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा था कि वह राज्य खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 व इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमैन एक्ट 1979 का पालन कर पा रही है या नहीं? बुधवार को सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि बाहरी राज्यों से आने वाले प्रवासियों की जांच व देखभाल के लिए राज्य सरकार ने 49 रिलीफ कैंप स्थापित किए हैं। इनमें जांच की जा रही है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को थर्मल टेस्टिंग के साथ साथ रैपिड टेस्टिंग और एंटीजिंग टेस्टिंग की 15 मई तक व्यवस्था करने के लिए आदेशित किया।

यह भी पढ़ें : कोरोना फाइटर्स के लिए घटिया पीपीई किट उपलब्ध कराने पर हाईकोर्ट ने 21 तक मांगा जवाब

-सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ प्रस्तुत करने के भी आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमुर्ति रवींद्र मैठाणी की खण्डपीठ ने कोरोना की वैश्विक महामारी से निपटने के लिए चिकित्सकों, सहायक चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा व आवश्यक उपकरणों की घटिया किस्म उपलब्ध कराए जाने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सीएमओ नैनीताल व सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज हल्द्वानी के प्राचार्य से 21 अप्रैल तक यह बताने को कहा है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए सुरक्षा उपकरणों में क्या कमियां थीं। साथ ही खंडपीठ ने हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार को निर्देश दिए है कि इससे सम्बन्धित सभी जनहित याचिकाओं को एक साथ लिस्ट करें।
शनिवार को मामले की सुनवााई के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा पीठ को अवगत कराया गया कि सरकार द्वारा सुुशीला तिवारी मेडिकल कालेज को जो एक हजार पीपीई किट उपलब्ध कराये गई थे वे घटिया गुणवत्ता वाले थे। उनमें कई तरह की खामियां थीं। एक किट की कीमत नौ सौ रुपये थी। सरकार ने एक हजार किट नौ लाख में खरीदी थीं, जिसे बाद में वापस कर दिया था। मामले के अनुसार अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश में तेजी से फैल रहे कोरोना विषाणु के संक्रमण को देखते हुए राज्य में चिकित्सकों को उचित सुविधाएं मुहैया कराने के साथ ही उनको पूरी सुरक्षा दी जाए। साथ ही सुरक्षा में दी जा रही सुविधाओं पर भी सवाल खड़े किये हैं। यह भी कहा है कि सरकार ने पीपीई किट के बजाय एचआइवी किट भेज दी है जो इस महामारी से लड़ने के लिए उचित नही है। उन्होंने घटिया पीपीई किट आपूर्ति करने वाले आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी की है।

यह भी पढ़ें : कोरोना पर डब्लूएचओ व केंद्र सरकार से निर्देशो का सख्ती से पालन करे सरकार: हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कोरोना विषाषु से लड़ने के लिए केंद्र व डब्ल्यूएचओ के द्वारा जारी दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन नही कराने के आरोपों पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार से डब्लूएचओ व केंद्र सरकार से निर्देशो का सख्ती से पालन करने को कहा है। साथ मे खंडपीठ ने ने यह भी कहा है कि महामारी से लड़ने के लिए आवश्यक वस्तुओं को मुहैय्या कराया जाये और इसमें लगे सभी कर्मचारियो की सुरक्षा का भी ध्यान दिया रखा जाये।
मामले के अनुसार अधिवक्ता सनप्रीत अजमानी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए केंद्र व डब्ल्यूएचओ ने कई तरह के दिशा निर्देश जारी किए हैं, परन्तु उत्तराखंड में इन निर्देशों का कड़ाई से पालन नही कराया जा रहा है। न ही डॉक्टरों व इसमें लगे अन्य स्टाफ जरूरी किट उपलब्ध कराई जा रही न ही उनकी सुुरक्षा की जा रही है जिससे वायरस को बढ़ने में मदद मिल रही है। लोग सामाजिक दूरी का पालन भी नही कर रहे है। मेडिकल स्टोरों में एन 95 मास्क तक नही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सम्मुख बनभूलपुरा का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि पहले से सुुरक्षा को लेकर सरकार ने इंतेजाम किये होते तो वहां घटना नही होती।

यह भी पढ़ें : लॉक डाउन के दौरान बिजली, पानी व टेलीफोन बिलों को माफ करने पर केंद्र व राज्य सरकार को नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने वीडियो कांफ्रंेस के माध्यम से कोरोना विषाणु कोविद-19 के संक्रमण की वजह से लागू लॉकडाउन की अवधि के बिजली, पानी व टेलीफोन के बिलों के माफ करने तथा कोरोना के खिलाफ अपनी सेवाएं दे रहे सफाई कर्मचारियों को पीपीई किट उपलब्ध कराने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने मामले में राज्य व केंद्र सरकार को शनिवार 18 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में हल्द्वानी निवासी अधिवक्ता राजेन्द्र आर्य ने उच्च न्यायालय में ऑनलाइन जनहित याचिका दायर की है। याचिक में कहा गया है कि लॉकडाउन की वजह से समाज के बड़े वर्ग की आमदनी पूरी तरह बंद है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि बिलों को माफ किया जाए। बृहस्पतिवार को इस मामले में विडियो कॉन्फ्रेस के माध्यम से सुनवाई के दौरान प्रदेश के महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर, मुख्य स्थाई अधिवक्ता परेश त्रिपाठी, स्टैंडिंग काउंसिल अनिल बिष्ट व योगेश पांडेय तथा केंद्र सरकार की ओर सेे अधिवक्ता संजय भट्ट शामिल हुए।

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-पहली बार वीडियों कांफ्रेसिंग से दो जनहित याचिकाओं पर होगी सुनवाई
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के लिए बुधवार 15 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक होगा। इस दिन से उच्च न्यायालय में पहली बार वादों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेसिंग द्वारा की जाएगी। पहले दिन दो जनहित याचिकाओं को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया गया है। इन वादों की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ करेगी। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन ने सुनवाई के लिए यह पीठ गठित की है। दोनों याचिकाएं ईमेल के द्वारा दायर की गई हैं। साथ ही दोनों याचिकाएं कोरोना महामारी के कारण गरीब कृषकों को हो रही परेशानी एवं चिकित्सकों व पैरा मैडिकल स्टाफ को सुरक्षा प्रदान किए जाने हेतु हाईकोर्ट से सरकार को आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए जाने हेतु योजित की गई है। सुनवाई के लिए सभी पक्ष वीडियो कांफ्रेसिंग से ही सम्मिलित होंगे। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से इस निमित्त सभी तैयारियां कर ली गई है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री की ओर से 3 मई तक लॉकडाउन जारी रखने की घोषणा की गई है। वहीं उत्तराखंड उच्च न्यायालय की ओर से वादकारियों की परेशानी को मद्देनजर रखते हुए 15 अप्रैल से आवश्यक वादों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेसिंग द्वारा करने का निर्णय लिया गया है।

यह भी पढ़ें : डीएम को आदेश का पालन करने अथवा कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने के आदेश…

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। हाईकोर्ट ने पिथौरागढ के डीएम को पूर्व में पारित आदेश का पालन करने अथवा 17 अप्रैल को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने को कहा है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार हेम चंद्र उप्रेती ने हाईकोर्ट मेें अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि वे जनवरी 2019 को कलैक्शन अमीन के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। जिसके बाद उनको बढा हुआ एसीपी का लाभ व पेशन इत्यादि का भुगतान नहीं किया गया था। कोर्ट ने पूर्व में आदेश पारित कर कहा था कि याचिकाकर्ता को समस्त लाभ दिए जाए। लेकिन विभाग की ओर से कुछ भुगतान किया गया और कुछ भुगतान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कोर्ट के पूर्व आदेशों के बावजूद उन्हें पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है। सरकार की ओर से कहा गया कि वे दो सप्ताह के भीतर बचा हुआ शेष भुगतान भी कर दिया जाएगा। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में पारित आदेश का पालन करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : अवैध खड़िया खनन के मामले में हाई कोर्ट ने तलब की जांच रिपोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मार्च 2020। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने दपटि कांडा बागेश्वर में अवैध रूप से किये जा रहे खड़िया खनन के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी बागेश्वर से 20 मार्च तक पर्यावरण बोर्ड की अनुमति प्रमाण पत्र व पूर्व में की गयी जांच की रिपोर्ट  पेश करने को कहा है। आज सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से कहा गया कि खनन के लिए पर्यावरण बोर्ड की उनको अनुमति मिली हुई है और प्रशाशन द्वारा पूर्व में इसकी जांच भी की गई है। कोर्ट ने इस पर जिला अधिकारी से रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमुर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। 
मामले के अनुसार दपटि कांडा बागेश्वर निवासी बलवंत धामी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि उनके गांव में कुछ लोगो द्वारा खड़िया का खनन किया जा रहा है परन्तु उनके द्वारा लीज पर दिये गए पट्टों के अलावा गाँव के अन्य लोगो की भूमि से भी खनन किया जा रहा है  जिसकी शिकायत उनके द्वारा प्रशाशन से की गई परन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई उल्टा एसडीएम ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया । कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद सरकार से मंगलवार को स्थिति स्पस्ट करने को कहा है। उत्तराखंड  हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरिद्वार जिले के इमरती ग्राम सभा में ग्रामप्रधान द्वारा किए गए घोटाले के मामले में दायर जनहित याचिका पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : डीएफओ आकाश कुमार वर्मा के खिलाफ अवमानना याचिका निस्तारित 

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व के आदेश का पालन नहीं करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा सोमवार को न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि उन्होने कोर्ट के आदेश का पालन कर दिया है। मामले को सुनने के बाद कोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि कोर्ट ने पूर्व में उनकी समस्त सेवाओं को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है, इसलिए उनको पेंशनरी बेनिफिट का समस्त लाभ नहीं दिया जा सकता है। इसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
 

यह भी पढ़ें : अवमानना पर डीएफओ के खिलाफ जमानती वारन्ट जारी

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा को जमानती वारन्ट जारी कर 16 को कारण सहित कोर्ट में पेश होने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमुर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि कोर्ट ने पूर्व में उनके समस्त सेवाओ को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नही करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है इसलिए उनको पेंशन के समस्त लाभ नही दिये जा सकते हैं। जिसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

यह भी पढ़ें : प्रमुख सचिव को उत्तराखंड हाईकोर्ट से अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी..

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन नहीं करने पर प्रमुख सचिव गृह  को आदेश दिया है कि वो 30 मार्च के आदेश का पालन करें वरना उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करते हुए चार्ज फ्रेम करेगे।  
मामले के अनुसार विनो‌द सिंह देव व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे उत्तराखंड पुलिस में एएसआई व सब इंस्पेक्टर के नीचे रेंक के कर्मचारी हैं।  ‌उन्हें छठा वेतनमान के तहत रिवाईज पे-स्केल का लाभ 1 जनवरी 2006 से मिलना था लेकिन विभाग की ओर से उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा था। याचिका में कहा कि सरकार की ओर से अन्य इंस्पेक्टर रेंक के सब इंस्पेक्टरों को 1 जनवरी 2006 से इसका लाभ दिया गया और एसआई से नीचे जो भी पुलिस कर्मी है उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा है। लेकिन याचिकाकर्ताओं को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में सरकार को आदेश दिया था कि याचिकाकर्ताओं को ऐरियर के साथ 1 जनवरी 2006 से रिवाईस पे-स्केल दिया जाए। एकलपीठ के इस आदेश के खिलाफ सरकार ने स्पेशल अपील दायर की जिसे खंडपीठ ने सरकार की स्पेशल अपील को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई थी।
 

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड HC ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय पर लगाया 50 लाख का जुर्माना, जानें क्यों ?

-काउंसिलिंग में शामिल किए बिना 474 छात्रों को प्रवेश देने पर की कार्रवाई 
नवीन समाचार, देहरादून, 3 मार्च 2020।हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग में शामिल किए बिना निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा 474 छात्रों को अपने संस्थानों में प्रवेश देने पर 50 लाख का जुर्माना लगाते हुए जुर्माने की राशि 5 मार्च तक आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के खाते में जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इन 474 छात्र छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुये आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय से इन छात्र छात्राओं का विश्वविद्यालय में नामांकन दर्ज करने के आदेश दिए हैं।न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर बिना नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति शासन से मिल गई थी। इसके लिए 15 नवंबर 2018 की अंतिम तिथि थी। लेकिन इस तिथि के बाद भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर उन्होंने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय में अभ्यर्थियों का पंजीयन किये बिना ही उन्हें अपने कॉलेजों में प्रवेश दिया। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय द्वारा इन छात्र छात्राओं का पंजीयन न करने के खिलाफ निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की संस्था एसोसिएशन ऑफ कम्बाइंड  इंटरेंस एक्जामिनेशन ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा बिना विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग के छात्र छात्राओं को प्रवेश देने पर इन कॉलेजों पर 50 लाख का जुर्माना लगाया।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट की सख्ती से 72 वर्षीया विधवा को 17 वर्ष बाद मिला ‌’11.55 लाख’ का न्याय….

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने 17 वर्ष बाद एक 72 वर्षीया विधवा को 11,55,474 का भुगतान कर दिया है। इसके बाद हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित ‌कर‌ दिया। न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार ग्राम बानना भीमताल निवासी देवकी देवी (72 वर्ष) ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि उसके पति भूपाल दत्त शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पद से संतोष जनक सेवा करने के बाद जिला ‌बेसिक शिक्षा के अंतर्गत जूनियर हाईस्कूल देवस्थल पिनरों विकासखंड से मई 2003 से सेवानिवृत्त हुए थे।  याचिका में कहा कि उसके पति के पेशन का भुगतान नहीं किया गया था। इसी बीच उसके पति की मृ‌त्यु 9 सितंबर 2016 को हो गई। जिसके बाद कोर्ट ने 2017 में आदेश पारित कर समस्त देयकों का भुगतान करने के निर्देश दिए। शिक्षा विभाग ने इस आदेश को स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने दान सिंह बनाम सरकार के निर्णय में समस्त पेंशन लाभ देने के निर्देश दिए। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ के सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने विधवा याचिकाकर्ता को 11,55,474 का किया भुगतान किया गया। देवकी देवी का कहना है कि उसे इतने वर्षों बाद न्याय मिला है। उसे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा था। 

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने बरकरार रखी एक बच्ची की हत्या में आजीवन कारावास की सजा..

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने एक बच्ची की हत्या में निचली कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा पाए अभियुक्त की सजा को हाइकोर्ट ने बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशू धुलिया व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खण्डपीठ में हुई । 
मामले के अनुसार अप्रैल 2014 में रामनगर में दोषी मजदूर पवन सैनी को 10 वर्षीय बच्ची को रिश्ते के मामा के साथ देखा गया था। 12 अप्रैल 2014 को बच्ची के पिता बाजार गए थे। जब शाम को पिता श्रीराम पत्नी के साथ घर लौटे तो बेटी घर पर नहीं थी। बच्ची की खोजबीन की गयी तो उस दिन बच्ची को पता नहीं चल सका। इस दौरान रुकसाना नामक महिला ने बताया कि दिन में पवन सैनी बच्ची के साथ था जिसके बाद सभी मजदूरों ने पवन को पकड़कर पीटा तो उसने बताया कि वो बच्ची को लेकर जंगल गया था। जहां उसने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद बच्ची के पिता ने रामनगर कोतवाली में आरोपी पवन सैनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और पुलिस ने पवन को पकड़कर जेल भेज दिया। इस पूरे मामले पर जिला अदालत में लम्बी सुनवाई हुई  और 2014 में ही जिला जज नैनीताल ने पवन सैनी को दोषी मानते हुये उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को पवन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा वो निर्दोष है व उनको पूरे मामले पर फंसाया जा रहा है। सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता जेएस विर्क ने दलील दी की इस मामले में जो भी वैज्ञानिक व अन्य प्रमाण हैं वे आरोपी को दोषी ठहराने के लिये पर्याप्त हैं जिसे कोर्ट ने माना व दोषी की सजा को बरकरार रखा है। श्रीराम का परिवार व दोषी पवन पड़ोसी थे। दोनों कोसी नदी में खनन में मजदूरी करते थे इस दौरान बच्ची ने पवन से मामा का रिश्ता बना लिया जिसके चलते घर के लोगों को भी पवन से कोई खतरा नहीं था। मगर बलात्कार के प्रयास में पवन एक दिन बच्ची को बहलाकर साथ जंगल ले गया और हत्या कर दी।

यह भी पढ़ें : जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली याचिका पर सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दून वैली में जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते राज्य सरकार से एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 2 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई।

 

मामले के अनुसार देहरादून निवासी वरुण सोफ़्ती ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि केंद्र  सरकार ने एक आदेश जारी कर   दून वैली को रेड जोन में रखा गया है। याचिकर्ता का यह भी कहना है कि देहरादून में कोई भी स्लाटर हाउस नही होने के  बावजूद यहां  जिंदा जानवरों का दून वैली में आयात किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने दून वेली में जिंदा जानवरों के आयात पर पूर्णतः रोक लगाने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : जज कॉलोनी के घोटाले में डीएम देहरादून को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में पेश होने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने देहरादून के बहुचर्चित 48 बलबीर रोड जज कालोनी घोटाले के मामले में सुनवाई करते हुए देहरादून के डीएम को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी अधिवक्ता राजेश सूरी की बहन रीता सूरी ने याचिका दायर कर कहा है कि अधिवक्ता राजेश सूरी की हत्या 30 नवम्बर 2014 को हुई थी जब राजेश सूरी नैनीताल हाईकोट से अदालत में पैरवी करके ट्रेन से देहरादून जा रहे थे तभी उनको ट्रेन में ही जहर देकर मार दिया गया था। यह भी आरोप लगाया था कि राजेश की सभी फाइलें भी ट्रेन से ही गायब हो गई थीं और केवल कपड़ों से भरा बैग मिला था। राजेश की बहन रीता ने बताया कि राजेश ने देहरादून के कई भ्रष्टाचार के मामले-घोटाले उजागर किए थे। इनमें से एक बलवीर रोड में जज र्क्वाटर घोटाला भी था। आरोप लगाया कि जिस भूमि में भगीरथ कालोनी बनी है उसे फर्जी कागज बनाकर बेच दिया गया था। इस पर 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राधा रतूडी ने सम्पत्ति को फर्जी पाते हुए कुर्क करने के आदेश देने के साथ ही किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि 2003 से अभी तक इसमें कोई कार्यवाही नही की गई है। कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद जिला अधिकारी देहरादून को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए है।

यह भी पढ़ें : राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि अतिक्रमण कर बेचे जाने के मामले में जांच कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने सिडकुल रुद्रपुर के पास कल्याणी नदी के किनारे उत्तराखंड के राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर उसे बेचे जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार व सिडकुल प्रशासन को जांच कर रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 फरवरी की तिथि नियत की है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार रुद्रपुर निवासी सर्वेश कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सिडकुल पंतनगर में कल्याणी नदी के किनारे जो सरकारी भूमि स्थित है वह महामहिम राज्यपाल के नाम पर दर्ज है। याचिका में कहा कि उस भूमि पर कुछ लोगों की ओर से  अतिक्रमण कर उसे बेचा जा रहा है। याचिका में कहा कि जब इस प्रकरण का मामला प्रशासन के संज्ञान में आया तो उसकी जांच कराई गई। जांच में इस बात की पुष्टि हुई कि वहां पर अतिक्रमण किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह भूमि सिडकुल की मिलीभगत से बेची जा रही है। जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्‍य सरकार व सिडकुल प्रशासन को इस प्रकरण की जांच कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड की जेलों में तीन माह में घनघनाएंगे फोन, कैदी कर सकेंगे बातें

नवीन समाचार, नैनीताल, 8 जनवरी 2020। उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदी तीन माह में टेलीफोन से अपने घरों को बात कर पाएंगे। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदियों को टेलीफोन सुविधा उपलब्ध कराए जाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान राज्य सरकार ने अवगत कराया कि प्रदेश की सभी जेलों में भारत संचार निगम के माध्यम से टेलीफोन सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस पर कोर्ट ने इसके लिए सरकार को तीन माह का समय दिया और जनहित याचिका को निस्तारित घोषित कर दिया है।

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उल्लेखनीय है कि जेल में बंद कैदी- पूर्व सैनिक विनोद बिष्ट ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस समस्या के संबंध में जानकारी दी थी। कहा था कि प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद कैदियों के लिए टेलीफोन की सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे वह अपने परिजनों की कुशलक्षेम भी नहीं जान पाते। यह भी कहा गया कि राज्य सरकार ने परीक्षण के तौर पर देहरादून व हरिद्वार की जेलों में यह सुविधा उपलब्ध कराई है। उन्होंने वहीं की तर्ज पर प्रदेश की अन्य जेलों में भी यह सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की थी। इस पत्र को कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया। इसमें सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। बुधवार को सरकार की ओर से मामले में शपथपत्र पेश किया गया। इसमें न्यायालय को बताया गया कि 16 जून 2016 को मुख्यालय के कारागार अधीक्षक वीपी पांडे और जिला कारागार अधीक्षक देहरादून महेंद्र सिंह ग्वाल ने इन सुविधाओं को जानने के लिए केंद्रीय कारागार अंबाला का भ्रमण किया था। इसके बाद देहरादून व हरिद्वार की जेलों में परीक्षण के तौर पर इसे लागू करने के लिए बीएसएनएल के साथ समझौता किया था। इसी क्रम में प्रदेश की अन्य जेलों में भी टेलीफोन सुविधा शुरू कर दी जाएगी।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रामनगर के पास मोहान में स्थापित केंद्र सरकार की मिनी रत्न कम्पनी आईएमपीसीएल यानी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड के निजीकरण के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इसकी विनिवेश प्रकिया को बड़ा झटका दिया है। रामनगर निवासी एडवोकेट नीरज तिवारी की जनहित याचिका में कहा गया है कि रामनगर के पास मोहान (अल्मोड़ा) में केंद्र सरकार की आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी आईएमपीसीएल है। दवा कंपनी हर साल शत-प्रतिशत शुद्ध लाभ देती आई है और भारत सरकार की चंद कंपनियों में शामिल है, जो कि आज भी शुद्ध लाभ दे रही है।

आईएमपीसीएल में केंद्र सरकार की 98.11 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि शेष 1.89 प्रतिशत हिस्सेदारी उत्तराखंड सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के पास है। सरकार ने आईएमपीसीएल में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के लिये प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश के तहत ‘‘वैश्विक स्तर’’ पर रुचि पत्र आमंत्रित किये हैं। इस तरह केद्र सरकार शत प्रतिशत शुद्ध लाभ दे रही आईएमपीसीएल कंपनी को केंद्रीय वित्त मंत्रालय निजी हाथों में देने जा रहा है। जबकि यह कम्पनी लगभग 500 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और इस पिछड़े क्षेत्र के जड़ी बूटी उगाने और कम्पनी को आपूर्ति करने वाले वाले लगभग 5000 किसानों को अप्रत्यक्ष रोजगार देती है। इसके उत्पादन की उत्कृष्ट दवाइयां देश भर के सरकारी आयुर्वेदिक अस्पतालों में सस्ती दरों पर उपलब्ध कराईं जाती हैं। निजीकरण से ये दवाएं भी महंगी हो जाएंगी जो कि स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होगा। स्वयं मुख्यमंत्री उत्तराखंड, केंद्रीय आयुष मंत्रालय तथा सांसदों और विधायकों ने लिखित में इस कम्पनी के विनिवेश का विरोध किया है फिर भी कम्पनी का निजीकरण किया जा रहा है।

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