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बड़ा समाचार : केंद्र सरकार की आक्सीजन आवंटन नीति पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उठाये सवाल…

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-सवाल उठाया कि क्यों उत्तराखंड के प्लांटों में उत्पादित ऑक्सीजन बाहर भेजी जाती है, और राज्य को झारखंड व पश्चिम बंगाल से आक्सीजन उपलब्ध करायी जाती है
रवीन्द्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 मई 2021। देश में आक्सीजन की भारी कमी के बीच उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की आक्सीजन आवंटन नीति पर सवाल उठाते हुए राज्य को पुनः इस मामले में केंद्र से बात करने को कहा है। अदालत ने प्रदेश की आक्सीजन को बाहरी राज्यों को भेजने और प्रदेश को झारखंड व बंगाल से आक्सीजन आपूर्ति करने को गंभीरता से लेते हुए कहा कि प्रदेश में उत्पादित आक्सीजन पर पहले उसी राज्य की जनता का हक होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि कोविड-19 महामारी को लेकर उच्च न्यायालय में लगभग आधे दर्जन विभिन्न जनहित याचिकायें दायर की गयी हैं। इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान प्रदेश में आक्सीजन की कमी का मामला उठा। प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि राज्य में आक्सीजन की मात्रा बढ़ाने के लिये विगत सात मई को केंद्र सरकार को पत्र भेजा गया है लेकिन केंद्र सरकार की ओर से उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी है। यह भी कहा गया कि प्रदेश में देहरादून, हरिद्वार व उधमसिंह नगर जनपद में मौजूद तीन आक्सीजन संयंत्रों से 358 मीट्रिक टन आक्सीजन का उत्पादन किया जाता है। आक्सीजन का आवंटन केंद्र सरकार की निगरानी में किया जाता है। इसलिये प्रदेश को इसमें से मात्र 183 मीट्रिक टन आक्सीजन ही उपलब्ध करायी जाती है। शेष आक्सीजन केंद्र के निर्देश पर अन्य राज्यों को भेज दी जाती है। प्रदेश सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि इसके बदले उत्तराखंड में झारखंड के जमशेदपुर व पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर से आक्सीजन उपलब्ध करायी जाती है। जो कि सामयिक दृष्टि से अनुपयोगी है। इसमें समय व धन भी अधिक बर्बाद होता है जो कि कोरोना महामारी के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। केंद्र सरकार के सहायक सॉलिसिटर जनरल राकेश थपलियाल की ओर से अदालत को बताया गया कि केंद्र सरकार की ओर से सभी राज्यों के साथ संतुलन कायम किये जाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि केंद्र के जवाब से अदालत संतुष्ट नजर नहीं आयी। अदालत ने इस पर भारी नाराजगी जतायी कि केंद्र सरकार का कोई अधिकारी अदालत में पेश नहीं हुआ, और अपनी टिप्पणी में गैर जमानती वारंट जारी करने की बात भी कही।

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रवीन्द्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 11 मई 2021। दिल्ली में ऑक्सीजन के अभाव से जिंदगी और मौत के बीच जूझते मरीजों के दर्द को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गयी है, जिसमें कहा गया है कि जब अस्पतालों में हर तरह की सुविधा का प्रावधान है तो ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की क्यों नहीं ?
दिल्ली निवासी जसविंदर सिंह जॉली की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार इस मामले में गाइड लाइन बनाये ताकि अस्पतालों के पास अपने ऑक्सीजन प्लांट्स या टैंकर्स अथवा ऑक्सीजन की सप्लाई का इंतजाम हो। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता नगिंदर बेनीपाल और हरप्रीत सिंह होरा ने कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में कानून के तहत आक्सीजन मास्टर प्लान भी बनाया जाना चाहिए ताकि कोरोना की तीसरी लहर आने से पहले मरीजों को ऑक्सीजन के अभाव में जान न गवानी पड़े। साथ ही यह भी कहा कि ऑक्सीजन की कमी में अस्पताल मरीजों से खुद ही ऑक्सीजन लाने को कहते हैं जबकि यह अस्पताल की जिम्मेदारी बनती है और संविधान की धारा 21 के तहत यह सरकार की भी जिम्मेदारी भी है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जब अस्पताल मरीजों से फीस लेते हैं तो ऐसे मौके पर ऑक्सीजन का दायत्व मरीजों पर डाल देना गलत है। लिहाजा अस्पतालों को ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाने चाहिए। याचिका में आगे कहा गया है कि इंदौर और बंगाल में इस योजना पर काम चल रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले पर आज 11 मई को सुनवाई होगी।

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-ऑक्सीजन व ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर तथा मोबाइल टेस्टिंग लैब्स के लिए केंद्र सरकार से अनुमति व सहयोग लेने को कहा
नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मई 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ कोरोना से बचाव के लिए किये जा रहे कार्यों पर राज्य सरकार के स्वास्थ्य सचिव के जवाब ने संतुष्ट नहीं है। इसलिए न्यायालय ने स्वास्थ्य सचिव से अब पूरे प्रमाण के साथ स्वास्थ्य सचिव अमित नेगी से 20 मई तक कोर्ट में विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही उच्च न्यायालय ने मामले में कड़ा रुख बरकरार रखते हुए सरकार से भी कोरोना पर गंभीर रुख अपनाते हुए तत्काल कोरोना जांच के लिए प्रयोगशालाएं बढ़ाने के साथ पहाड़ में मोबाइल टेस्टिंग लैब सुविधा देने का निर्देश दिया है। इसके लिए भारत सरकार से तत्काल मोबाइल बैन एवं विदेशों से ऑक्सीजन व ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर मंगवाने की व्यवस्था करने के लिए केंद्र सरकार की मदद लेने को भी कहा जिससे कि राज्य में ऑक्सीजन की कमी को पूरा किया जा सके। न्यायालय ने ऑक्सीजन की कमी पर राज्य के तीनों प्लांटों से पहले राज्य में ऑक्सीजन की आपूर्ति करने और उसके बाद ही अन्य स्थानों को आपूर्ति देने को भी कहा।
उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली तथा अन्य की याचिका पर आज घंटो चली सुनवाई के दौरान यह आदेश दिए। न्यायालय ने कहा कि कोरोना की तीसरी लहर यदि आई तो सरकार द्वारा बनाए जा रहे 500 बेड का अस्पताल पर्याप्त नहीं होंगे। छोटे शहरों के भी कोरोना की संभावित तीसरी लहर के लिए कोविड हेल्थ सेंटर बनाने की आवश्यकता है। साथ ही इस समय बंद स्कूल-कॉलेजों को कोविड हेल्थ सेंटर के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। वहीं बड़े शहरों में आईसीयू बेड की संख्या को बढ़ाने और रामनगर में युद्धस्तर पर कोविड़ हेल्थ सेंटर खोलने की आवश्यकता है। हरिद्वार, हल्द्वानी और देहरादून में कोरोना के उपचार के लिए बेड बढ़ाने के आदेश देने के साथ हरिद्वार, रुद्रपुर व पौड़ी में सिटी स्कैन की व्यवस्था तत्काल करने का आदेश भी दिये हैं। न्यायालय ने दवा की कालाबाजारी पर कार्रवाई कर रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा है। न्यायालय ने कोविड अस्पतालों से टीकाकरण केंद्र हटाकर कहीं अन्य कहीं टीकाकरण करने की व्यवस्था करने को भी कहा है, साथ ही भवाली टीवी सेनेटोरियम को कोविड अस्पताल बनाने के भी निर्देश दिये हैं। इसके अलावा न्यायालय ने ऐसे नाजुक वक्त में भी हो रही मनमानी व दवाओं की कालाबाजारी पर नाराजगी व्यक्त करते हुए अधिक कीमतें वसूलने वाले प्राइवेट अस्पतालों पर कार्रवाई की रिपोर्ट भी सरकार से मांगी है। कोर्ट ने आईजी अमित सिन्हा से कहा है कि वो तुरंत इस पूरे मामले पर एक्शन लें और रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें। आज सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सीमित संसाधनों में स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा किये जा रहे कार्य की सराहना करते हुए उनके प्रति जनता की ओर से आभार भी जताया। कोर्ट ने राज्य सरकार को भवाली स्थित टीबी सेनोटोरियम अस्पताल को कोविड़ अस्पताल बनाने पर भी विचार करने को कहा।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 29 अप्रैल 2021। हाइकोर्ट ने उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं की अर्जेंट सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की। अदालत ने निर्देश दिए हैंं कि हल्द्वानी, हरिद्वार व देहरादून में आरटीपीसीआर वे रैपिड एंटीजन टेस्ट 30 से 50 हजार प्रतिदिन किए जाएं।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में अर्जेंसी प्रार्थनापत्र दाखिल कर अनुरोध किया गया था कि इस महामारी को देखते हुए इस मामले की सुनवाई त्वरित की जाए। याचिकाकर्ता ने शपथपत्र के माध्यम से कहा कि वर्तमान समय मे अस्पतालों में ऑक्सीजन नहींं हैं। रेमडेसिविर इंजेक्शन उपलब्ध नहीं हैं। पीपीई किट उपलब्ध नहीं हैं। एम्बुलेंस पीड़ितों से एक किलोमीटर का किराया 5000 हजार रुपये ले रहे हैं। शवों को जलाने के लिए श्मशान घाटों की कमी हो रही हैं और घाटों में लकड़ियों की भारी कमी हैं। अस्पतालों में ऑक्सीजन बेड उपलब्ध नहीं हैं। होम आइसोलेशन मरीजों के लिए किसी भी प्रकार की सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं।आरटीपीसीआर टेस्ट धीमी गति से हो रहे हैं। अभी 30 हजार टेस्ट रिपोर्ट पेंडिंग हैं। कोर्ट ने स्वाथ्य सचीव अमित नेगी को निर्देश दिए हैंं कि होम आइसोलेशन पीड़ितों को त्वरित सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए। आरटीपीसीआर टेस्ट कराने के लिए प्राइवेट हॉस्पिटल व लैबों का नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन कराकर उनसे भी टेस्ट शीघ्र कराए जाएं। सभी जिला अधिकारियों को निर्देश दिए हैंं कि वे अपने अपने क्षेत्रों में आशा वर्कर व एनजीओ के माध्यम से संक्रमित क्षेत्रों को चिह्नित करें ताकि पीड़ितों को शीघ्र उपचार मिल सके। जिला अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए हैंं कि किस हॉस्पिटल में कितने बेड खाली पड़े हुए हैं और किस हॉस्पिटल में ऑक्सीजन उपलब्ध है उसकी जानकारी प्रत्येक दिन उपलब्ध कराएं जिससे पीड़ितों को आसानी से पता चल सके और समय पर उनको उपचार मिल सके। शमसान घाटों की व्यवस्था दुरस्त करें। स्वास्थ्य सचिव को यह भी निर्देश दिए गए हैंं कि गरीब व जरूरतमंद लोगों को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना व दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत उपचार के लिए हेल्थ कार्ड शीघ्र उपलब्ध कराएं, जिससे वे अधिकृत अस्पतालों में अपना उपचार करा सकें। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि उत्तराखंड में कोरोना से मरने वालों की दर सभी राज्यों से ज्यादा है। देश मे कोरोना से मरने वालों की दर 1.514 है जबकि उत्तराखंड में 1.542 प्रतिशत है। अदालत ने कहा कि‌ यह चिंता का विषय हैं। सुनवाई के दौरान स्वाथ्य सचिव अमित नेगी कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। कोर्ट ने इन सभी बिंदुओं पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट 7 मई तक पेश करने और स्वयं भी पेश होने को कहा हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 मई की तिथि नियत की है। मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने क्वारंटाइन सेंटरों व कोविड अस्पतालों की बदहाली और उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को लेकर हाईकोर्ट में अलग -अलग जनहित याचिकाएं दायर की थीं। पूर्व में बदहाल क्वारंटाइन सेंटरों के मामले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर माना था कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैंं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहींं की गई हैं। इसका संज्ञान लेकर कोर्ट ने अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग के लिए जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में जिलेवार निगरानी कमेट‌ियां गठित करने के आदेश दिए थे और कमेटियों से सुझाव मांगे थे।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिए हैं कि हल्द्वानी ,हरिद्वार व देहरादून में आरटीपीसीआर वे रैपिड एंटीजन टेस्ट 30 से 50 हजार प्रतिदिन किए जाएं। कोर्ट ने कहा कि होम आइसोलेशन टेस्ट बढ़ाए जाएं। उत्तराखंड में 2500 रजिस्टर्ड दंत चिकित्सक हैं और कोविड सेंटरों में डॉक्टरों की कमी है। सरकार इनकी मदद ले। सुशीला तिवारी हॉस्पिटल में जो उपनल कर्मचारी हैं उनकी वहीं खाने व रहने की व्यवस्था की जाए। उनके घर जाने से उनका परिवार प्रभावित हो रहा हैं। सुशीला तिवारी अस्पताल में रामनगर से आने वाले कोरोना पीड़ितों का भार बढ़ रहा है। इसलिए रामनगर में भी एक कोविड सेंटर बनाया जाए। कोर्ट को बताया गया कि आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार कोविड सेंटर, हेल्थ सेंटर व केयर सेंटरों में कोरोना पीड़ितों का इलाज होना था जिनमें प्राइवेट शामिल हैं, ये प्राइवेट हॉस्पिटल उन कोरोना पीड़ितों का रजिस्ट्रेशन नहीं कर रहे हैं जिनका ऑक्सीजन लेवल 92 से कम हो गया है। इस पर कोर्ट ने प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा है। हाईकोर्ट ने प्रत्येक जिले में एक कोविड से संबंधित हेल्थ पोर्टल बनाने को कहा है जो हर घं‌टे हेल्थ से संबंधित व अस्पतालों में ऑक्सीजन बेड, दवाइयों सहित अन्य जानकारी लोगों को देगा। अदालत ने कहा है कि मरीजों से अधिक चार्ज करने वाले एम्बुलेंस मालिकों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।पर्वतीय क्षेत्रों में वेक्सीनेशन लगाने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने में दिक्कत आ रही है। इसलिए उनको वैक्सीन बिना रजिस्ट्रेशन के लगाई जाए। रेमडेसिविर इंजेक्शन की कलाबाजारी को ड्रग्स इंसेपेक्टर रोकें। उस पर क्यूआर कोड लगाया जाए।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 3 मई 2021। उत्तराखंड पब्लिक ट्रिब्यूनल ने राज्य आयुर्वेदिक एवं यूनानी विभाग द्वारा गत 5 मार्च 2019 को जारी 238 फार्मेसिस्टों की वरिष्ठता सूची को निरस्त करते हुए तीन माह के भीतर नए सिरे से वरिष्ठता सूची जारी करने के बड़े आदेश दिए हैं। सोमवार को ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष राम सिंह व प्रशासनिक सदस्य एएस नयाल की खंडपीठ में फार्मेसिस्ट सतीश ममगई व राकेश रावत की याचिका सुनवाई को पेश हुई, जिन्होंने फार्मेसिस्टों की 5 मार्च 2019 को जारी पदोन्नति सूची को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार दिसम्बर 2009 में 238 फार्मेसिस्टों की नियुक्ति हुई। लेकिन हाईकोर्ट ने 2012 में ये नियुक्तियां निरस्त कर विभाग से दोबारा मैरिट लिस्ट बनाकर नियुक्तियां करने का आदेश दिया। इसके बाद विभाग ने पुनः मैरिट लिस्ट बनाकर नियुक्तियां कीं, जिसमें दोनों याचिकाकर्ता भी शामिल थे। याचिकाकर्ताओं के अनुसार नियुक्ति के समय उनका क्रमांक 10 व 19 था, लेकिन वरिष्ठता सूची में उन्हें सबसे नीचे रखा गया। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं के अनुसार जब हाईकोर्ट ने 2009 की नियुक्ति रद्द कर दी थी तो वरिष्ठता सूची 2009 के आधार पर बनाना गलत है। इन तर्कों के आधार पर ट्रिब्यूनल ने 2019 में जारी वरिष्ठता सूची रद्द कर दी है। उल्लेखनीय है कि इस वरिष्ठता सूची के बाद करीब दो दर्जन फार्मेसिस्ट चीफ फार्मेसिस्ट भी बन गए हैं। उनकी पदोन्नति भी अब इस आदेश से प्रभावित होगी। इसके अलावा विभाग ने 2011 में भी फार्मेसिस्टों की नियुक्ति की है और इस आधार पर उनके वरिष्ठ होने की संभावना हो गई है।

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-दूरस्थ क्षेत्रा में कोरोना की जांच के लिए मोबाइल वैन की व्यवस्था करने तथा प्राइवेट अस्पतालों में बीपीएल के लिए 25 फीसद बेड आरक्षित रखने को कहा
-प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव से मांगा आपत्तियों पर जवाब
नवीन समाचार, नैनीताल, 20 अप्रैल 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने राज्य के दूरस्थ इलाकों में कोरोना की जांच बढ़ाने के लिए मोबाइल वैन व मोबाइल टीम गठित करने, कोविड अस्पतालों की संख्या बढ़ाने तथा एसटीएच में उपनल व अन्य कर्मचारियों को पीपीई किट व अन्य सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं। उच्च न्यायालय ने डीआरडीओ व अन्य केंद्रीय संस्थाओं की मदद से राज्य में कोविड संक्रमित मरीजों के उपचार के लिए अस्थायी अस्पताल बनाने, सरकारी अस्पतालों में कम से कम जिला चिकित्सालयों में अनिवार्य रूप से सिटी स्कैन की सुविधा उपलब्ध कराने तथा सरकार को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि प्राइवेट अस्पताल कम से कम 25 प्रतिशत बिस्तर बीपीएल मरीजों के लिए आरक्षित रखेंगे और उनका उपचार करेंगे।
मंगलवार को अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व सच्चिदानंद की पहले से चल रही जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान पीठ ने अधिवक्ता दुष्यंत की ओर से कोविड अस्पतालों की कमी, कम टीकाकरण, इंजेक्शन की कमी, 17 अप्रैल को एक दिन में 37 मरीजों की मौत आदि को लेकर दायर प्रार्थना पत्र का संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य सचिव अमित नेगी से जवाब मांगा। साथ ही इंजेक्शन की कालाबाजारी करने वालो के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। पीठ ने निजी अस्पतालों में अधिक धनराशि वसूले जाने पर रोक लगाने, स्वास्थ्य सचिव को रोजाना अस्पतालों के खाली बिस्तरों व जांच के नतीजे सार्वजनिक करने को भी कहा है। पीठ ने जांच बढ़ाने के लिए की गई कार्रवाई, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन की आपूर्ति, बिस्तर, दैनिक प्रयोग होने वाले इंजेक्शन, टेस्ट क्लिनिक आदि को लेकर 22 अप्रैल को तय कैबिनेट बैठक के निर्णय आदि के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट पांच मई तक दाखिल करने के निर्देश भी दिए। मामले की अगली सुनवाई दस मई को होगी।

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-वन विभाग में 60 फीसद रिक्त पड़े पदों को भरने के न्यायालय ने दिये निर्देश
नवीन समाचार, नैनीताल, 07 अप्रैल 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश के जंगलों में लग रही वनाग्नि के मामले में मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रमुख वन संरक्षक को उत्तराखंड वन विभाग में रिक्त पड़े 60 फीसद खाली पड़े ग्राउंड ड्यूटी के व एसीसीएफ के पदों पर नियुक्तियां करने, ग्राम पंचायतों को मजबूत करने के साथ वर्ष भर जंगलो की निगरानी करने और दिए गए दिशा-निर्देशों को तुरंग लागू करने और जंगलो में लगने वाली आग के निस्तारण के लिए स्थायी व्यवस्था करने को कहा है। साथ ही न्यायालय ने पूछा कि क्या राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के दृष्टिगत राज्य में कृत्रिम बारिश कराना संभव है। इसके अलावा राज्य सरकार को एनडीआरफ व एसडीआरफ को बजट भी उपलब्ध कराने, आग पर काबू पाने के लिए हेलीकॉटर का भी उपयोग करने, जंगलों में लग रही आग को दो सप्ताह में बुझाने को भी कहा। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश आरएस चौहान व न्यायमुर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान प्रमुख वन संरक्षक राजीव भरतरी न्यायालय में वीडियो कॉंफ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए।

सुनवाई के दौरान पर्यावरण मित्रो ने न्यायालय को यह भी बताया कि 2016 में आग लगने पर एनजीटी द्वारा 12 बिंदुओं पर एक गाइड लाइन जारी की थी जिस पर आज तक सरकार ने कोई अमल नही किया। इस पर न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए है कि उस गाइड लाइन को छः माह के भीतर लागू करें। इसके साथ खण्डपीठ ने स्वतः संज्ञान लेकर दायर ‘इन द मैटर आफ प्रोटेक्शन आफ फारेस्ट एरिया फारेस्ट हेल्थ एंड वाइल्ड लाइफ’ जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया। इस दौरान अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व राजीव बिष्ट ने कोर्ट के सम्मुख प्रदेश के जंगलों में लग रही आग के सम्बंध में न्यायालय को अवगत कराया। उनका कहना था कि अभी प्रदेश के कई जंगल आग से जल रहे है और प्रदेश सरकार इस सम्बंध में कोई ठोस कदम नही उठा रही है। न्यायालय ने गांव स्तर से ही आग बुझाने के लिए कमेटियां गठित करने को कहा था जिस पर आज तक अमल नही किया गया। सरकार जहां आग बुझाने के लिए हेलीकाप्टर का उपयोग कर रही है उसका खर्चा बहुत अधिक है और पूरी तरह से आग भी नही बुझती है इसके बजाय गाँव स्तर पर कमेटियां गठित की जाय।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 31 मार्च 2021। नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को हरिद्वार कुंभ को लेकर मेला क्षेत्र में रोजाना 50 हजार कोरोना टेस्ट करने तथा पार्किंग और घाटों के पास मोबाइल चिकित्सा वाहन तैनात करने के आदेश दिए हैं, ताकि श्रद्धालुओं को चिकित्सा सुविधा नजदीक मिले। इसके अलावा, मेला क्षेत्र में हो प्रशिक्षित चिकित्सकों की तैनाती करने को भी कहा है। साथ ही यह भी साफ किया है कि जिन लोगों ने वैक्सीन की पहली डोज लगवा ली है, उनके लिए भी कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट जरूरी है।
इसके साथ ही कोर्ट ने कुंभ क्षेत्र में वैक्सीनेशन करने का आदेश दिया है। इसके अलावा घाटों और कुंभ इलाके में जल पुलिस की तैनाती करने, कोरोना के नियमों का सख्ती से पालन को भी कहा है, तथा इस पर आगामी 13 अप्रैल तक रिपोर्ट मांगी है।

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-कोविड नेगेटिव रिपोर्ट अथवा कोविड वैक्सीन की दो डोज लगाने का प्रमाण पत्र दिखाने पर पर ही कुंभ में दिया जाएगा प्रवेश
-मेला अधिकारी को दिया राज्य एवं केंद्र सरकार की एसओपी का पालन कराने का आदेश
-एम्स के चिकित्सकों के सुझाव पर विचार करने और ऋषिकेश, तपोवन व मुनिकीरेती की घाटों को ठीक करने को कहा
-31 मार्च को मेला अधिकारी, वित्त सचिव और मुख्य सचिव को वीडियो कांफ्रेसिंग से पेश होने के भी दिए निर्देश
नवीन समाचार, नैनीताल, 24 मार्च 2021। प्रदेश के नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का हर कदम उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। कुंभ मेले में कोविद-19 के दिशा-निर्देशों का पालन किये बिना बेरोकटोक आने जाने के आदेश को पहले उन्हीं की पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने नकार दिया था, अब नैनीताल उच्च न्यायालय ने भी उन्हें करारा झटका दे दिया है। न्यायालय ने साफ कर दिया है कि हरिद्वार कुंभ में केवल कोरोना की निगेटिव रिपोर्ट लाने वाले और कोविड के टीके की दोनों डोज लगाने का प्रमाण पत्र पेश करने वाले लोगों को ही प्रवेश दिया जाएगा। इसके साथ ही न्यायालय ने सीएम तीरथ सिंह रावत के दुनियाभर के लोगों के लिए कुंभ में बेरोकटोक आने जाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने यह भी साफ कर दिया है कि मेला अधिकारी को राज्य एवं केंद्र सरकार की एसओपी का पालन करना होगा। अलबत्ता उच्च न्यायालय ने कुंभ मेले के लिए मेलाधिकारी द्वारा हरिद्वार में की गई व्यवस्थाओं की भी सराहना की है, जबकि ऋषिकेश में व्यवस्थाओं में कुछ और कार्य भी किए जाने की आवश्यकता जताई है। बुधवार को न्यायालय ने यह आदेश अधिवक्ता शिव भट्ट, सचिव डीएलएसए शिवानी पसबोला और मेला अधिकारी की निरीक्षण रिपोर्ट के बाद जारी किया। न्यायालय ने एम्स के डाक्टरों द्वारा दिये गए सुझाओं पर भी विचार करने को कहा है। एम्स के डाक्टरों ने कमेटी को सुझाव दिए थे कि प्रत्येक दस बैड पर एक चिकित्सक व स्टाफ की नियुक्ति की जाये। प्रत्येक हास्पिटल में सुविधायुक्त पाँच एम्बुलेंस होनी चाहिए तथा एयर एंबुलेंस की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि मेला अधिकारी ने हरकी पैड़ी व मेला क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया है परंतु महिलाओं के वाशरूम अच्छी स्थिति में नही हैं। उनमें सुविधाओ का अभाव है। कुछ लोग स्नान कर रही महिलाओं की वीडियो भी बना रहे हैं। यह मेला एवं एवं महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। इसलिए मेला क्षेत्र में एक महिला अधिकारी की नियुक्ति की जाये। याचिकाकर्ता ने आईजी संजय गुंज्याल से मेला क्षेत्र एवं स्नान की जगह में वर्दी व बिना वर्दी के महिला पुलिस कर्मी नियुक्ति करने का भी अनुरोध किया। याचिकाकर्ता ने अपनी रिपोर्ट मे यह भी तथ्य उठाया है कि ऋषिकेश, तपोवन मुनिकीरेती के घाटों की हालात जर्जर अवस्था में है। सरकार ने इनको सुधारने के लिए कोई व्यवस्था नही की है। न्यायालय ने मुख्य सचिव व वित्त सचिव से इस पर विचार करने को कहा। न्यायालय ने मेला अधिकारी, मुख्य सचिव, वित्त सचिव व आईजी संजय गुंज्याल को निर्देश दिए है कि वे मेला क्षेत्र का अधिवक्ता के साथ निरीक्षण करेंगे और 30 मार्च तक मेला अधिकरी अपनी रिपोर्ट पेश करेंगे। इसके साथ ही 31 मार्च को मेला अधिकारी, मुख्य सचिव, वित्त सचिव और आईजी वीडियो कन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होंगे।
गौरतलब है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने क्वारन्टीन सेंटरों व कोविड अस्पतालों की बदहाली और उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को लेकर न्यायालय में में अलग अलग जनहित याचिकाएं दायर की थी। इस मामले में पूर्व में बदहाल क्वरंटाइन सेंटरों के मामले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर माना था कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। इस रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने अस्पतालों की नियमित मनिटरिंग के लिये जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में जिलेवार निगरानी कमेटियां गठित करने के आदेश दिए थे और कमेटियों से सुझाव माँगे थे। इसी कड़ी में कुंभ की व्यवस्थाओं को ठीक करने के लिए भी एक जनहित याचिका दाखिल की गई थीं। इस याचिका की सुनवाई पर पूर्व में न्यायालय ने तीन सदस्यीय कमेटी से रिपोर्ट तलब की थीं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मार्च 2021। देहरादून में महिला की संपत्ति पर अवैध कब्जा कर निर्माण करने के मामले में शिकायत के बाद कार्रवाई नहीं करने को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राघवेंद्र सिंह चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने गंभीरता से लेते हुए एमडीडीए तथा देहरादून से एसएसपी व कोतवाल पर उनके वेतन से एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। पीठ ने यह भी कहा है कि दो सप्ताह के भीतर जुर्माने की राशि याचिकाकर्ता को न देने पर अवमानना की कार्रवाई की जाएगी, तथा डीएम देहरादून को राजस्व वसूली की तरह कार्रवाई करनी होगी।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी सविता गुप्ता ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा था कि उन्होंने पलटन बाजार की अपनी दुकान बिना छत के बेची थी। लेकिन सौरभ गुप्ता, गौरव गुप्ता व हरीश गुप्ता ने छत पर अवैध तरीके से कब्जा कर बिना अनुमति निर्माण कर लिया है। महिला का कहना था कि उसने पहले 2019, फिर दिसंबर 2020 में एमडीडीए, एसएसपी व एसएचओ से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने इसी साल जनवरी में याचिका खारिज करते हुए सिविल वाद दायर करने का आदेश दिया। एकलपीठ के इस निर्णय के खिलाफ सविता ने विशेष अपील दायर की। इस पर न्यायालय ने एसएसपी, एसएचओ व एमडीडीए के अफसरों को तलब किया था। सोमवार को खंडपीठ में एसएसपी वाईएस रावत व कोतवाली देहरादून के एसएचओ शिशुपाल सिंह नेगी कोर्ट में पेश हुए। एमडीडीए की ओर से कहा गया कि 28 दिसंबर 2020 व 15 जनवरी 2021 को सीलिंग का नोटिस दिया गया था। साथ ही कहा कि पुलिस फोर्स मांगने के बाद उपलब्ध नहीं कराई गई। इस पर नाराज कोर्ट ने कहा कि डीजीपी को पत्र क्यों नहीं लिखा। इस पर एमडीडीए की ओर से कुछ कहते नहीं बना। इस पर पीठ ने यह कठोर निर्देश जारी किए।

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-एकलपीठ ने सुनवाई के लिए तीन माह बाद की तिथि घोषित की, गंगोत्री ग्लेशियर में कचरे व बन रही झील का मामला
नवीन समाचार, नैनीताल, 12 मार्च 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने उत्तराखंड स्थित पवित्र गंगोत्री ग्लेशियर में बढ़ते कचरेे व इसकी वजह से बनी झील के मामले में अवमानना याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए अगली सुनवाई की तिथि तीन सप्ताह बाद नियत कर दी है। पूर्व में इस मामले में न्यायालय ने आपदा प्रबंधन सचिव के खिलाफ तल्ख टिप्पणी की थी। शुक्रवार को एकलपीठ ने इस मामले में आपदा प्रबंधन सचिव मुरुगेशन व दो माह तक आपदा प्रबंधन सचिव का अतिरिक्त कार्यभार देख चुके सचिव शैलेश बगौली न्यायालय में पेश हुए। सरकार की ओर से सीएससी चंद्रशेखर रावत ने इस मामले में जवाब के लिए समय मांगा। इसके बाद कोर्ट ने अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद नियत कर दी।
मामले के अनुसार दिल्ली निवासी अजय गौतम ने वर्ष 2017 में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि गंगोत्री ग्लेशियर में कूड़े-कचरे की वजह से पानी रुक जाने कृत्रिम झील बन गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार इस मामले में सरकार ने पहले जवाब में माना था कि झील बनी है, जबकि बाद में हेलीकॉप्टर से किए सर्वे का हवाला देते हुए कहा था कि झील नहीं बनी है। 2018 में न्यायालय ने जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए सरकार को तीन माह में इसकी मॉनिटरिंग करने व छह माह में रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने के निर्देश दिए थे, मगर सरकार ने कुछ नहीं किया। ऐसे में न्यायालय ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए आदेश का अनुपालन नहीं करने पर तल्ख टिप्पणी की थी कि सचिव आपदा प्रबंधन पद एवं सरकारी नौकरी के योग्य नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि सरकार न्यायालय में इस मामले में उठाए गए कदमों की रिपोर्ट पेश कर चुकी है। रिपोर्ट में आपदा प्रबंधन न्यूनीकरण केन्द्र के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला के निलंबन व तीन अन्य सेक्शन अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने का उल्लेख किया था।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मार्च 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पूर्णागिरी धाम के पास बूम ब्रह्मदेव में हाथी कॉरिडोर में पार्किंग की निविदा पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार, सचिव वन, सचिव वित्त, डीएम चम्पावत व एसडीएम पूर्णागिरि सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर 23 मार्च तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले में अगली सुनवाई 24 मार्च को होगी।
मामले के अनुसार खटीमा निवासी अमित खोलिया व अन्य ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर कहा है कि तीन फरवरी को हाथी कॉरिडोर की जमीन पर पार्किंग की निविदा प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसमें 29 मार्च से एक साल के लिए ठेका दिया जाना है। याचिका में कहा गया है कि पूर्व में उच्च न्यायालय में सरकार खुद कह चुकी है कि इस वनभूमि में किसी भी तरह से पार्किंग नहीं की जाएगी। इसके पास राजस्व की जमीन है लेकिन जिला प्रशासन उस जमीन के बजाय हाथी कॉरिडोर की जमीन पर ही पार्किंग का ठेका देने जा रहा है। इस मामले में वन विभाग ने भी 21 फरवरी को आपत्ति दर्ज की थी। इसके बावजूद निविदा की प्रक्रिया जारी है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 09 मार्च 2021। रामनगर के डॉ. विनीत मोदी द्वारा सीएमओ कार्यालय नैनीताल में 23 नवम्बर 2020 को डायग्नोस्टिक सेंटर के लिए किए गए आवेदन पर लगातार आपत्तियां लग रही थीं, लेकिन मंगलवार को मामले में उच्च न्यायालय में मनोज तिवारी की अदालत में सुनवाई के दौरान ही उन्हें अनुमति मिल गई।
मंगलवार को न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सीएमओ कार्यालय से दो बजे तक स्थिति साफ करने के लिए कहा, इस पर दो बजे स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई रिपोर्ट दे दी। इस पर न्यायालय ने मामला निस्तारित कर दिया। याचिकाकर्ता डॉ. विनीत मोदी के अनुसार उन्होंने पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत सीएमओ से डाइग्नोस्टिक सेंटर के लिए आवेदन किया था। नियम के अनुसार 90 दिनों में या तो पंजीकरण किया जाना चाहिए था या आवेदन को निरस्त किया जाना चाहिए था, लेकिन सीएमओ कार्यालय स्थित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संबंधित लिपिक ने 90 दिनों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की, और आपत्तियों पर आपत्तियां लगती रहीं। परेशान होकर उन्होंने संबंधित लिपिक अनूप बमोला को भी पक्षकार बनाया और आरोप लगाया कि वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं। याचिका में पीसीपीएनडीटी एक्ट का ठीक तरह से अनुपालन कराने की गुहार भी लगाई गई थी।

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-आईएफएस संजीव चतुर्वेदी की याचिका पर चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 दिसम्बर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने आईएफएस संजीव चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र व संघ लोक सेवा आयोग के साथ-साथ कैट के चेयरमैन जस्टिस नरसिम्हा रेड्डी को व्यक्तिगत रूप से नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जबाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार आईएफएस संजीव चतुर्वेदी ने फरवरी 2020 में केंद्र सरकार द्वारा सीधे भर्ती किए जा रहे संयुक्त सचिवों के मामले में तमाम दस्तावेजों के साथ अनियमितता का आरोप लगाकर जांच की मांग करते हुए कैट की नैनीताल बैंच में याचिका दायर की थी। याचिका में उनका कहना था कि अक्तूबर में केंद्र सरकार ने इस मामले की सुनवाई दिल्ली कैट में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कैट के चेयरमैन जस्टिस रेड्डी ने इसी महीने की चार तारीख को इस मामले की सुनवाई नैनीताल बैंच से दिल्ली बैंच स्थानांतरित करने के आदेश जारी किए थे। याची के अनुसार चेयरमैन ने अपने आदेश मे कहा था कि इस मामले की सुनवाई दिल्ली में करने से केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर असर पड़ेगा इसलिए इस मामले की सुनवाई दिल्ली बैंच द्वारा ही की जानी उचित हैं। इस निर्णय को संजीव चतुर्वेदी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। याचिका में कहा गया कि इस मामले में पहले से ही जस्टिस रेड्डी और उनके बीच कई सारे वाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। अतः जस्टिस रेड्डी इस मामले की सुनवाई जज के रूप में नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इन मामलों में वे स्वयं भी एक पक्षकार है। उनका यह भी कहना है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में भी जस्टिस रेड्डी के इसी तरह के आदेशों को रद्द करते हुए उनके विरुद्ध तीखी टिप्पणी की थी तथा केंद्र सरकार का रवैया भी प्रतिशोधात्मक बताते हुए 25 हजार का जुर्माना लगाया था। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इस निर्णय को बरकरार रखते हुए जुर्माने की राशि बढ़ा कर 50 हजार रुपये कर दी थी। इसके बाद इन्ही मामलों में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जस्टिस रेड्डी को अवमानना का नोटिस भी जारी किया गया था। लिहाजा याची के अधिवक्ता द्वारा कोर्ट के सम्मुख यह भी कहा गया कि संजीव चतुर्वेदी और रेड्डी के बीच इतने सारे वादों के लंबित रहते हुए इस मामले की सुनवाई जस्टिस रेड्डी द्वारा नहीं की जा सकती, क्योंकि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति अपने मामले में जज नहीं बन सकता है और न ही निर्णय दे सकता है।

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-डिफॉल्टर चाय कंपनी से वसूली नही करने पर हाई कोर्ट सख्त
-मुख्य सचिव उत्तराखंड को कर्नाटक सरकार से संपर्क कर कार्यवाही करने के आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 01 दिसम्बर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने कौसानी निवासी किशन चंद्र सिंह खत्री द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई की। गत 23 नवंबर को हुई पिछली सुनवाई के आदेश के क्रम में आज राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में एक शपथ पत्र दाखिल किया गया, जिसमें अपर सचिव कृषि किसान कल्याण विभाग उत्तराखंड शासन द्वारा कहा गया कि कर्नाटक स्थित मै. गिरियाज इन्वेस्टमेंट लिमिटेड की सहयोगी कंपनी मै. उत्तरांचल टी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड से 25 लाख 85 हजार 269 रु की वसूली हेतु 26 नवम्बर 2020 को पत्र के माध्यम से मुख्य सचिव कर्नाटक सरकार बंगलौर को वसूली हेतु आवश्यक कार्यवाही करने का अनुरोध किया गया है।
इस पर खंडपीठ ने राज्य सरकार के द्वारा दाखिल शपथ पत्र पर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए पुनः आदेश पारित किया कि 2015 से उत्तरांचल टी कंपनी से लंबित देनदारी की वसूली हेतु गंभीरता से कार्यवाही करें। खंडपीठ ने अपने आदेश में राज्य के मुख्य सचिव के द्वारा याचिका की एक प्रति डिफॉल्टर कंपनी को उपलब्ध कराने का सख्त आदेश भी पारित किया है। मामले में अगली सुनवाई 29 दिसंबर को होगी। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता के अनुसार बागेश्वर जिले की पर्यटन नगरी कौसानी में चाय विकास बोर्ड उत्तराखंड की लापरवाही से करीब 6 वर्षो से एकमात्र चाय फैक्ट्री बंद पड़ी है। इससे न केवल 500 हेक्टेयर भूमि में चाय उत्पादन में लगे 1200 से अधिक लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है, बल्कि सरकार को चाय उत्पादन से होने वाले राजस्व का नुकसान भी हो रहा है। 2002 में कुमाऊं मंडल विकास निगम व उत्तराचंल चाय कंपनी के द्वारा संयुक्त उपक्रम द्वारा एक चाय फैक्ट्री का संचालन किया गया लेकिन फरवरी 2015 में उत्तरांचल चाय कंपनी ने फैक्टरी का संचालन बंद कर दिया जिसके कारण करीब 30 कर्मचारी प्रत्यक्ष रूप से बेरोजगार हो गए, साथ ही सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल कौसानी में पर्यटकों के आकर्षण का केंद व चाय से होने वाली आमदनी भी प्रभावित हुई। याचिका में यह भी कहा गया है कि बंद हो गयी चाय कंपनी के खिलाफ 44 लाख रुपये से अधिक की देनदारी लंबित रही जिसे राज्य सरकार वसूलने में असफल साबित हुई। याची ने चाय विकास बोर्ड व सरकार से कई बार बंद पड़ी चाय फैक्ट्री को खोले जाने हेतु आग्रह किया लेकिन अंत मे मजबूर होकर जनहित याचिका हाई कोर्ट में दाखिल करनी पड़ी। याचिका में उच्च न्यायालय से प्रार्थना की गयी है कि कौसानी में चाय फैक्ट्री का पुनः संचालन हेतु सरकार को निर्देश जारी किए जाये तथा उत्तरांचल चाय कंपनी से समस्त देय राशि की वसूली की जाये।

यह भी पढ़ें : अल्मोड़ा विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति का मामला उच्च न्यायालय पहुंचा, नोटिस जारी

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 नवम्बर 2020। नव स्थापित सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के नवनियुक्त कुलपति प्रो. एनएस भंडारी की नियुक्ति का मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय पहुंच गया है। देहरादून निवासी रवींद्र जुगरान की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने कुलपति प्रो. भंडारी को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के नवनियुक्त कुलपति प्रो. भंडारी की नियुक्ति यूजीसी के नियमों को दरकिनार कर की गयी है। यूजीसी की नियमावली के अनुसार कुलपति नियुक्त होने के लिए दस साल प्रोफेशर होना आवश्यक है जबकि प्रो. भंडारी साढ़े आठ साल से ही प्रोफेसर रहे हैं। उसके बाद प्रो. भंडारी उत्तराखंड संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य नियुक्त रहे थे। उस दौरान की सेवा को उनके प्रोफेशर रहने में नहीं जोड़ा जा सकता है, इसलिए उनकी नियुक्ति अवैध है। याचिका में प्रो. भंडारी को पद से हटाने की मांग की गई है।

यह भी पढ़ें : धार्मिक निर्माणों के मामले में मुख्य सचिव ओम प्रकाश को हाईकोर्ट का अवमानना नोटिस 

नवीन समाचार, नैनीताल, 28 अक्टूबर 2020। नैनीताल हाइकोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों पर अवैध रूप से बनाए गए धार्मिक निर्माणों को अभी तक नहीं हटाने पर मुख्य सचिव ओम प्रकाश को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।  न्यायमूर्ति शरद शर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।

मामले के अनुसार अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2009 को सभी राज्यों को आदेश दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर अवैध रूप से बनाए गए धार्मिक निर्माणों को हटाएं लेकिन उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश का पालन कराने के लिए सभी उच्च न्यायालयों को भी आदेशित किया था। अवमानना याचिका में कहा गया कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ तो हाईकोर्ट ने मामले का का स्वत: संज्ञान लेते हुए 23 मार्च 2020 तक सार्वजनिक स्थलों से अवैध धार्मिक निर्माणों को हटाने के आदेश सभी जिलाधिकारियों को दिए थे लेकिन प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकार ने अवैध धार्मिक निर्माणों के मामले में कोई नीति तक नहीं बनाई है।

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-राज्य के सभी जिलों के जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग कमेटी होंगी गठित
-कमेटी में जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव भी होंगे सदस्य
नवीन समाचार, नैनीताल, 23 सितंबर 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने राज्य के क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की मॉनिटरिंग के लिये राज्य के सभी जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। इस कमेटी में सम्बंधित जिले के जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव भी सदस्य होंगे। इस कमेटी की पहली बैठक आगामी 26 सितंबर शनिवार को अनिवार्य रूप से होगी। यह कमेटी निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेगी साथ ही याचिकाकर्ताओं से भी सम्पर्क बनाये रखेगी। मामले की सुनवाई अगले बुधवार को होगी।
मामले के अनुसार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली व देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने राज्य में क्वारन्टाइन सेंटरों व कोविड अस्पतालों की बदहाली और उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अलग अलग जनहित याचिकायें दायर की थीं। इन याचिकाओं पर पूर्व में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर माना कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। बुधवार को पीठ ने इन अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग के लिये जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने के आदेश दिए।

यह भी पढ़ें : कोविद अस्पतालों व क्वारन्टाइन सेंटरों की बदहाली पर हाईकोर्ट ने किया सरकार से रिपोर्ट तलब…

नवीन समाचार, नैनीताल, 06 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदेश के बदहाल क्वारंटाइन सेंटरों और कोरोना अस्पतालों की बदहाली के मामले को लेकर दायर याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई की। मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि कोरोना मरीजों के इलाज में डब्ल्यूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों का कितना अनुपालन किया जा रहा है। उसकी विस्तृत रिपोर्ट 17 सितंबर तक कोर्ट में शपथपत्र के माध्यम से पेश की जाए।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका कर कहा है कि राज्य सरकार ने प्रदेश के छह अस्पतालों को कोविड-19 के रूप में स्थापित किया है। लेकिन इन अस्पतालों में कोई भी आधारभूत सुविधा नहीं है। जिसके बाद देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल ने भी उत्तराखंड वापस लौट रहे प्रवासियों की मदद और उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। बदहाल क्वारंटाइन सेंटरों के मामले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश करते हुए माना है कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटाइन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। न ही ग्राम प्रधानों के पास कोई फंड उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाईकोर्ट ने सरकार और स्वास्थ्य सचिव को जवाब पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश के तहत जिला विधिक प्राधिकरण की रिपोर्ट के आधार पर क्वारंटाइन सेंटरों की कमियों को 14 दिन के अंदर दूर कर विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था।

यह भी पढ़ें : कोरोनिल पर बाबा रामदेव की बल्ले-बल्ले-विरोधियों को बड़ा झटका ! चुनौती देने वाले याची पर HC ने गलत तथ्य पेश करने पर लगाया 25 हजार का जुर्माना, याचिका खारिज

नवीन समाचार, नैनीताल, 07 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने बाबा रामदेव द्वारा कोरोना वायरस से निजात दिलाने की बनाई गई दवा ‘कोरोनिल’ को लांच किए जाने के खिलाफ मणि कुमार की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गलत तथ्य पेश करने पर याचिकाकर्ता पर न्यायालय का समय बरबाद करने के लिए 25 हजार का जुर्माना लगाते हुए जनहित याचिका को खारीज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका को वापस लेने हेतु कोर्ट से प्रार्थना भी की, परंतु खंडपीठ ने कहा कि इससे न्यायालय का अमूल्य समय बरबाद हुआ है तथा गलत तथ्य पेश करने पर समाज मे इसका गलत प्रभाव भी पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में ऊधमसिंह नगर जनपद के अधिवक्ता मणि कुमार ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि बाबा रामदेव व उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पिछले मंगलवार को हरिद्वार में कोरोना वायरस से निजात दिलाने के लिए पतंजलि योगपीठ के दिव्य फॉर्मेसी द्वारा निर्मित कोरोनिल दवा लांच की। इसमें आईसीएमआर द्वारा जारी गाइड लाइनों का पालन नहीं किया गया है और आयुष मंत्रालय भारत सरकार की अनुमति भी नही ली गई है। केवल आयुष विभाग उत्तराखंड से रोग प्रतिरोधक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लाइसेंस लिया गया और दवा कोरोना के इलाज के नाम पर बना दी गई। इसके साथ ही कंपनी ने दावा किया कि निम्स विश्विद्यालय राजस्थान द्वारा दवा का परीक्षण किया गया है, जबकि निम्स का कहना है कि उन्होंने ऐसी किसी भी दवा का कोई क्लीनिकल परीक्षण नहीं किया है। उनका यह भी कहना है कि बाबा रामदेव लोगों में अपनी इस दवा का भ्रामक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। यह दवा न ही आईसीएमआर से प्रमाणित है न ही उनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। इस दवा का अभी तक क्लीनिकल परीक्षण तक नहीं किया गया है। इसके उपयोग से शरीर मे क्या साइड इफेक्ट होंगे इसका कोई इतिहास नहीं है, इसलिए दवा पर पूर्ण रोक लगाई जाए और आईसीएमआर द्वारा जारी गाइड लाइनों के आधार पर भ्रामक प्रचार हेतु कानूनी कार्यवाही की जाए। खंडपीठ के एक आदेश से बाबा रामदेव को उनकी कोरोनिल दवा पर मुंह चिढ़ा रहे विरोधियों को करारा झटका लगने की उम्मीद है।

यह भी पढ़ें : ‘बाबाजी की बूटी’ पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने बाबा रामदेव की कोरोना विषाणु की दवा कोरोनिल लांच किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर विपक्षियों से अगली सुनवाई की तिथि 27 जुलाई तक जवाब मांगा है।

यह भी पढ़ें : बाबा रामदेव की ‘कोरोनिल’ पर और बढ़ीं मुश्किलें, लगातार दूसरे दिन सुनवाई में पतंजलि से लेकर राज्य व केंद्रीय संबंधितों को नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2020। बाबा रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण के लिए उनके पतंजलि योगपीठ द्वारा कथित तौर पर कोरोना के उपचार के लिए ‘कोरोनिल’ नाम की दवा बनाने का मामला गले की हड्डी बन गया है, जो न अब उगलते बन रहा है और न उगलते। वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट भी मामले में सख्त हो गया है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते बुधवार को लगातार इस मामले में सुनवाई की और केंद्र व राज्य सरकार के साथ ही पतंजलि, आयुष उत्तराखंड के निदेशक, आईसीएमआर के साथ कोरोनिल का कथित तौर पर परीक्षण करने वाले निम्स विवि राजस्थान को भी नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

यह भी पढ़ें : कोरोना जांच की धीमी गति पर हाईकोर्ट सख्त, क्षमता बढ़ाने के निर्देशों के साथ सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने राज्य में हो रही कोरोना जांच की संख्या को कम मानते हुए जांच की क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिये हैं, और इस संबंध में सरकार से 13 जुलाई तक रिपोर्ट देने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली, हरिद्वार के सच्चिदानंद डबराल व अन्य की जनहित याचिका में शुक्रवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि कोरोना की महामारी व लॉकडाउन के दौरान राज्य में तीन लाख से अधिक प्रवासी लौट चुके हैं मगर अब तक प्रवासियों सहित राज्य वासियों के करीब 65 हजार ही कोरोना टेस्ट हुए हैं। वहीं सरकार की ओर से पीठ को बताया गया कि नैनीताल के मुक्तेश्वर में आईवीआरआई में कोरोना जांच की लैब ने काम करना आरंभ कर दिया है। साथ ही प्राइवेट लैबों में भी जांच के लिए निविदा जारी की जा चुकी है।

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-बरिंदरजीत सिंह के मामले की अगली सुनवाई 25 को होगी
IPS Barinderjit Singh reached High Court against DGPनवीन समाचार, नैनीताल, 21 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आईपीएस बरिंदरजीत सिंह के एसएसपी ऊधमसिंह नगर पद से आईआरबी बैलपडाव रामनगर स्थानांतरण किए जाने के आदेश व उच्चाधिकारियों पर प्रताडना का आरोप लगाने वाली याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई की और अगली सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तिथि नियत कर दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविकुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान आईपीएस बरिंदरजीत सिंह ने पिछली सुनवाई की तरह इस बार भी स्वयं ही अपने मामले की पैरवी की।
मामले के अनुसार एसएसपी बरिंदरजीत सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उसका स्थानांतरण आईआरबी कमांडेंट बैलपड़ाव के पद पर कर दिया गया। उन्होंने याचिका में प्रदेश के डीजीपी अनिल रतूडी, डीजी-कानून व्यवस्था अशोक कुमार, सेवानिवृत्त आईजी जगत राम जोशी पर महत्वपूर्ण मामलों में निष्पक्ष जांच में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया था। याचिका में कहा कि उन्हें इसके लिए चेतावनी भी दी गई। जब उन्होंने पत्राचार किया तब चेतावनी वापस ली गई मगर उत्पीड़न जारी रहा। याचिका में कहा कि 12 वर्ष की सेवा में ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठ होने का ईनाम आठ बार तबादला कर दिया गया। पूर्व में कोर्ट ने मामले में डीजीपी, डीजी लॉ एंड ऑर्डर व पूर्व आईजी को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने इस प्रकरण पर सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तिथि नियत की है।

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-याची ने जल्द सुनवाई हेतु दिया प्रार्थना पत्र, पीठ ने 14 अगस्त की तिथि लगाई
नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमुर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने प्रदेश में बिजली विभाग में तैनात अधिकारियों, कर्मचारियों व रिटायर कर्मचारियों को पावर कारपोरेशन द्वारा सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। मामले में आज संस्था की ओर से याचिका पर जल्द सुनवाई हेतु प्रार्थना पत्र पेश किया, जिस पर न्यायालय ने सुनवाई करते हेतु अगली सुनवाई हेतु 14 अगस्त की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार देहरादून के आरटीआई क्लब ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार विद्युत विभाग में तैनात अधिकारियों व कर्मचारियों से एक माह का बिल मात्र 100 रुपये वसूल रही है, जबकि आम लोगो से 400 से 500 रुपए ले रही है। जबकि इनका बिल लाखांे में आता है, लेकिन इसका बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदेश में कई अधिकारियों के घर बिजली के मीटर तक नहीं लगे हैं, और जो लगे भी है वे खराब स्थिति में हैं। कारपोरेशन ने वर्तमान कर्मचारियों के अलावा सेवानिवृत्त व उनके आश्रितों को भी बिजली मुफ्त में दी है, जिसका सीधा भार आम जनता की जेब पर पड़ रहा है। याची का कहना है कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश घोषित है, लेकिन यहां हिमांचल से अधिक मंहगी बिजली है, जबकि वहाँ बिजली का उत्पादन तक नही होता है। याची का यह भी कहना है कि घरों में लगे मीटरों का किराया पावर कारपोरेशन कब का वसूल कर चुका है परंतु हर माह के बिल के साथ जुडकर आता है जो गलत है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 10 अगस्त 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रवि कुमार मलिमथ व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियांे द्वारा उत्पाद से जुड़ी जानकारियां उत्पाद में नहीं दिखाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए याची से अपनी शिकायत केंद्र सरकार को दर्ज कराने को कहा है। इसके साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका को इस आधार पर निरस्त कर दिया है कि याची ने अपनी शिकायत केंद्र सरकार को नही भेजी थी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि अगर उनकी शिकायत पर केंद्र सरकार सम्बंधित कम्पनी पर कोई दण्डात्मक कार्यवाही नही करती है तो याचिकर्ता दुबारा याचिका दायर कर सकता है। सुनवाई के दौरान असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल राकेश थपलियाल ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि याची ने अभी इस सम्बंध में कोई शिकायत केंद्र सरकार को नही दी है।
मामले के अनुसार नैनीताल निवासी अवनीश उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर कर ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियां अमेजॉन, फिलिप्कार्ट, मिंत्रा, नायका ई-रिटेल, स्नैपडील, अजीजों, लाइफ स्टाइल इंटरनेशनल को पक्षकार बनाया है। याची का कहना है कि इन कम्पनियो के द्वारा ऑन लाइन शॉपिंग कराते वक्त उनके द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा उत्पाद कहाँ बना है, किस देश मे बना है, और उसकी मदर कम्पनी किस देश की है, यह नही दिखाया जाता है। इसके कारण उपभोक्ता स्वयं को ठगा सा महसूस करते हैं। इस कारण अगर उपभोक्ता उत्पाद सही नही होने पर उसके खिलाफ उपभोक्ता फोरम में शिकायत करना चाहता है तो नही कर सकता, क्योंकि उस कम्पनी का पता ज्ञात नहीं होता है। याची के अधिवक्ता राजीव बिष्ट का कहना था कि इस सम्बंध में केंद्र सरकार ने 2011 में लीगल मिट्रोलॉजी एक्ट बनाया था और 2018 में इस एक्ट को संशोधित भी किया था। जिसमंे कहा गया कि ऑन लाइन शॉपिंग कराने वाली कम्पनियां उत्पाद के साथ उसकी निर्माण अवधि, किस स्थान पर बना है, किस देश का है आदि उससे जुड़ी सभी जानकारियां उत्पाद के साथ देंगे, परन्तु ये कम्पनियां ऐसी कोई जानकारी नही देती हैं।

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नवीन समाचार, देहरादून, 25 जून 2020। लॉक डाउन के दौरान उत्तर प्रदेश के विवादित विधायक अमनमणि त्रिपाठी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्वर्गीय पिता के पितृकर्म का झूठा बहाना लेकर चारधाम की यात्रा पर विशेष पास लेकर जा रहे थे। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के द्वारा पिछली तिथि में मांगे जाने पर बृहस्पतिवार को देहरादून और और डीजीपी उत्तराखंड ने अपना जवाब दाखिल कर दिया। इस मामले में प्रदेश के अपर मुख्य सचिव पर विशेष पास जारी करने को लेकर अंगुलियां उठा रहे थे। लेकिन जवाब में डीएम देहरादून ने अपर मुख्य सचिव का बचाव करते हुए कहा है कि विशेष पास एडीएम देहरादून द्वारा जारी किया गया था, अपर मुख्य सचिव के द्वारा नहीं। इसके साथ पीठ ने अन्य पक्षों को 10 दिन में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई अब सात जुलाई को होगी। वहीं अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन के अतिरिक्त समय की मांग की, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।
उल्लेखनीय है कि इस मामले की सीबीआई जांच की मांग के साथ जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के सचिव अपर मुख्य सचिव ने अपने पद का दुरुपयोग कर तथा केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का उलंघन करते हुए अमनमणि त्रिपाठी सहित 11 लोगों को विशेश पास जारी किया। याचिकाकर्ता द्वारा मुख्य सचिव और डीजीपी से लिखित शिकायत करने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा अपर मुख्य सचिव पर कोई कार्रवाई नहीं कि गयी, लिहाजा इस मामले की सीबीआई जांच कर दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

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-बागेश्वर जिले के अधिकारियों से जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वहन करवाएं : हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जून 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गरुड़-बागेश्वर में राज्य सरकार द्वारा प्रवासियों को प्राथमिक विद्यालयों व पंचायत भवनों में क्वारन्टाइन करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव को बागेश्वर जिले के स्वास्थ्य सम्बन्धी तथ्यों व शिकायतों का संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी ठीक से निर्वहन करने हेतु निर्देश देने और 30 जून तक इस पर विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया व न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई। मामले की अगली सुनवाई की तिथि 30 जून की तिथि नियत की है।
आज सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के द्वारा कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार ने महामारी से लड़ने के लिए जिले के ग्राम प्रधानों को अभी तक फंड नही दिया गया है। महामारी से लड़ने के लिए जब गरुड़ क्षेत्र के ग्राम प्रधानों ने जिम्मेदार अधिकारियों से फोन पर शिकायत करनी चाही तो उनके मोबाइल नंबर बंद मिले और उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां आंगनबाड़ी कार्यकर्तियो व आशा वर्करों को दे दी हैं। क्वारन्टाइन सेंटरों में न तो आने-जाने वाले लोगों का रिकार्ड रखा जा रहा है न ही सेंटरों में सेनेटाइजिंग की जा रही है। मामले के अनुसार अधिवक्ता डीके जोशी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि गरुड़ बागेश्वर में राज्य सरकार द्वारा प्रवासियों को लाकर विद्यालयों व पंचायत भवनों में क्वारन्टाइन किया जा रहा है जिनमें कोई सुविधा नहीं है।ं इसलिए उनको तहसील या जिला स्तर पर क्वारन्टाइन किया जाये। इस सम्बंध में गरुड़ के ग्राम प्रधानों ने जिला अधिकारी को ज्ञापन देकर कहा था कि अगर उनकी मांग पूरी नही की जाती है तो वे सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देंगे।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक में थापला-तया मोटर मार्ग के निर्माण पर रोक लगा दी है। पीठ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि अगर रोक के बाद भी सड़क का निर्माण हुआ तो डीएफओ जिम्मेदार होंगे। पीठ ने अपने आदेश में पूरे मामले की राजस्व पुलिस से जांच कर तीन दिन के भीतर रेगुलर पुलिस से जांच कराने और जांच कराकर आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट 13 जुलाई को उच्च न्यायालय में पेश करने को कहा है। साथ ही पीठ ने ठेकेदार द्वारा पेड़ काटने और राजस्व पुलिस द्वारा अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज करने पर सवाल खड़े किए है।
उल्लेखनीय है कि रामनगर के खुशाल रावत ने जनहित याचिका दाखिल कर कहा है कि थापला तया मोटरमार्ग का निर्माण नियम विरुद्ध चल रहा है। सड़क निर्माण में संरक्षित प्रजाति के 224 पेड़ों का कटान किया गया है । याचिका में कहा गया है कि ग्रामीणों ने इसका विरोध किया तो ठेकेदार ने उनको धमकी दी और गांव के आसपास गोलियां चला दीं। ग्रामीणों ने कहा है कि जब शिकायत राजस्व पुलिस की की गई तो आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। याचिका में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

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-उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में अनियमितताओं का मामला
-याचिका में बोर्ड के चेयरमैन की पुत्रवधु को लाभ पहुंचाने का लगाया गया है आरोप, बोर्ड चेयरमैन को हटाने और बोर्ड की गतिविधियों की जांच की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में गड़बड़ियों और निर्माण में लगे श्रमिकों को फायदा पहुंचाने के बजाय बोर्ड द्वारा बोर्ड चेयरमैन की पुत्रवधू के एनजीओ को लाभ पहुंचाने के मामले में बोर्ड के चेयरमैन श्रम मंत्री हरक सिंह रावत व उनकी पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं सहित श्रम आयुक्त उत्तराखंड तथा केंद्रीय श्रम सचिव को नोटिस जारी कर 2 सप्ताह में जवाब मांगा है। साथ ही अधिकांश बड़े निर्माणों और निर्माण श्रमिकों के नियोक्ताओं व बिल्डरों से कल्याणकारी सैस की जानबूझकर वसूली न करने पर शपथ पत्र दायर करने को भी कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 सप्ताह बाद होगी।
उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी निवासी अमित पांडे ने याचिका दायर कर उत्तराखंड भवन निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड पर मजदूरों के हित में कार्य ना करने, बल्कि बोर्ड के साधनों से बोर्ड के चेयरमैन की पुत्रवधू के एनजीओ को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया है। साथ ही याचिका में बोर्ड की गतिविधियों की जांच और बोर्ड चेयरमैन को इमानदारी से पद का निर्वहन न करने के कारण हटाने की मांग भी की गई है। न्यायालय ने सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता अमित पांडे द्वारा मजदूरों के हित में उठाए गए इस अनियमितता के विषय को बहुत महत्वपूर्ण भी बताया है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने मुम्बई में फंसे 2600 प्रवासियों को वापस लाने पर सरकार से दो दिन में मांगा जवाब…

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 जून 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और भारतीय रेलवे से मुम्बई में अब भी फंसे 2600 उत्तराखंड के प्रवासियों को वापस लाने के मामले में त्वरित कार्ययोजना बनाकर 17 जून को न्यायालय में जवाब दायर करने के लिए कहा है। न्यायालय ने यह आदेश प्रवासी सहयोगी टीम की सदस्य श्वेता मासीवाल की हस्तक्षेप याचिका का संज्ञान लेते हुए दिये हैं। उल्लेखनीय है कि प्रवासी सहयोगी टीम की श्वेता मासीवाल ने हाईकोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर कर 30 अप्रैल से पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करा कर वापसी का इंतजार कर रहे 2600 प्रवासियों को मुम्बई से वापस लाने के मामले में राज्य सरकार द्वारा अड़ियल रवैया अपनाने की बात कही थी। प्रवासी सहायता टीम के अधिवक्ता दुष्यन्त मैनाली ने बताया कि टीम के कई बार संपर्क करने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस मामले में महाराष्ट्र को एनओसी नहीं दी गई। जबकि टीम के अनुरोध पर महाराष्ट्र सरकार के अधिकारियों ने उत्तराखंड के नोडल अधिकारियों से तथा टीम ने भी लगातार 26 मई से कई बार संपर्क कर उत्तराखंड सरकार से अनुरोध किया था।

यह भी पढ़ें : बाहर से आने वाले यात्रियों के साथ भेदभाव पर हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार को दिये निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जून 2020। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने हवाई सेवा से राज्य में आने वाले प्रवासियों के मामले में दायर जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए केन्द्र व राज्य सरकार के साथ ही मुख्य सचिव, नागरिक उड्डयन सचिव को आदेश जारी कर कहा है कि यात्रियों को जबरन पेड क्वारंटीन में न भेजंे। बल्कि यात्रियों को उनकी सहमति से ही पेड या सरकारी क्वारंटीन सेंटरों में भेजा जाए।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी उमेश कुमार ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार हवाई जहाज से आने वाले प्रवासियों के साथ भेदभाव कर रही है। सरकार की ओर से यहां आने वाले प्रवासियों को क्वारंटीन के नाम पर होटलों में रखा जा रहा है और उनके ठहरने व खाने-पीने का खर्चा उनसे वसूला जा रहा है जबकि अन्य यात्रियों का खर्चा राज्य सरकार खुद वहन कर रही है। जो कि गलत है। याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले में केन्द्र व राज्य के साथ साथ प्रदेश के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह, नागरिक उड्डयन सचिव व देहरादून के जिलाधिकारी को पक्षकार बनाया गया था।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने दिए आदेश, रेड जोन से आ रहे लोगों को राज्य की सीमा पर ही किया जाए क्वॉरेंटाइन

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मई 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता दुष्यन्त मैनाली व सच्चिदानंद डबराल की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय राज्य सरकार को आदेशित किया है जहां तक संभव हो, रेड जोन के राज्यों से उत्तराखंड आने वाले व खासकर कोरोना के लक्षणों वाले लोगों को राज्य की सीमा पर ही संस्थागत क्वारन्टाइन यानी एकांतवास किया जाये, और साथ में उनकी कोरोना की जांच भी कराई जाये। नकारात्मक रिपोर्ट आने पर ही उन्हें राज्य में आगे जाने दिया जाये।
सुनवाई के दौरान आईसीएमआर द्वारा राज्य सरकार को एलिजा टेस्ट किट और आरटीसीटीपी किट जल्द उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया गया है। राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट को बताया गया कि सभी कोरोना अस्पतालों में पूर्व आदेशों के क्रम में आईसीयू व वेंटिलेटर संचालित कर दिए गए हैं और अन्य जगह भी ये सुविधा जल्द उपलब्ध करायी जाएगी। सुनवाई के दौरान राज्य के स्वास्थ्य सचिव नितेश झा और महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ अमिता उप्रेती भी वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से कोर्ट के सामने उपस्थित हुए। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ में हुई। मामले की अगली सुनवाई 1 सप्ताह बाद होगी।

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-कोर्ट ने राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के वालिंटियरों को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया
– ये रिलीफ कैंप में जाकर मौका मुआयना करेंगे और प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेंगे
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 मई 2020। हाईकोर्ट ने बाहरी लोगों तथा राज्य में आ रहे उत्तराखंड के प्रवासी लोंगों की राज्य की सीमाओं पर थर्मल टेस्टिंग के साथ  रैपिड टेस्टिंग और एंटीजिंग टेस्टिंग की व्यवस्था करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार को 15 मई तक समय दिया है। साथ ही कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के वालिंटियरों को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया है। यह लोग रिलीफ कैंप में जाकर मौका- मुआयना कर प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेंगे।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग माध्यम से हरिद्वार निवासी सचिदानन्द डबराल की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए। याचिका में कोरोना वायरस से बचाव के लिए घोषित लॉक डाउन से प्रभावित लोंगों की मदद करने की मांग की गई थी। पिछली सुनवाई में महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया था कि उत्तराखंड में अन्य राज्यों के करीब 40 हजार मजदूर हैं जबकि करीब दो लाख उत्तराखंड के लोग अन्य राज्यों में फंसे हैं। वह उत्तराखंड आना चाह रहे हैं। इन लोगों ने उत्तराखंड आने के लिये पंजीकरण भी कराया है। सरकार इन्हें लाने का प्रयास कर रही है। 
हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा था कि वह राज्य खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 व इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमैन एक्ट 1979 का पालन कर पा रही है या नहीं? बुधवार को सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि बाहरी राज्यों से आने वाले प्रवासियों की जांच व देखभाल के लिए राज्य सरकार ने 49 रिलीफ कैंप स्थापित किए हैं। इनमें जांच की जा रही है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को थर्मल टेस्टिंग के साथ साथ रैपिड टेस्टिंग और एंटीजिंग टेस्टिंग की 15 मई तक व्यवस्था करने के लिए आदेशित किया।

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-सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ प्रस्तुत करने के भी आदेश
नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह व न्यायमुर्ति रवींद्र मैठाणी की खण्डपीठ ने कोरोना की वैश्विक महामारी से निपटने के लिए चिकित्सकों, सहायक चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा व आवश्यक उपकरणों की घटिया किस्म उपलब्ध कराए जाने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सीएमओ नैनीताल व सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज हल्द्वानी के प्राचार्य से 21 अप्रैल तक यह बताने को कहा है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए सुरक्षा उपकरणों में क्या कमियां थीं। साथ ही खंडपीठ ने हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार को निर्देश दिए है कि इससे सम्बन्धित सभी जनहित याचिकाओं को एक साथ लिस्ट करें।
शनिवार को मामले की सुनवााई के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा पीठ को अवगत कराया गया कि सरकार द्वारा सुुशीला तिवारी मेडिकल कालेज को जो एक हजार पीपीई किट उपलब्ध कराये गई थे वे घटिया गुणवत्ता वाले थे। उनमें कई तरह की खामियां थीं। एक किट की कीमत नौ सौ रुपये थी। सरकार ने एक हजार किट नौ लाख में खरीदी थीं, जिसे बाद में वापस कर दिया था। मामले के अनुसार अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश में तेजी से फैल रहे कोरोना विषाणु के संक्रमण को देखते हुए राज्य में चिकित्सकों को उचित सुविधाएं मुहैया कराने के साथ ही उनको पूरी सुरक्षा दी जाए। साथ ही सुरक्षा में दी जा रही सुविधाओं पर भी सवाल खड़े किये हैं। यह भी कहा है कि सरकार ने पीपीई किट के बजाय एचआइवी किट भेज दी है जो इस महामारी से लड़ने के लिए उचित नही है। उन्होंने घटिया पीपीई किट आपूर्ति करने वाले आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी की है।

यह भी पढ़ें : कोरोना पर डब्लूएचओ व केंद्र सरकार से निर्देशो का सख्ती से पालन करे सरकार: हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 अप्रैल 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कोरोना विषाषु से लड़ने के लिए केंद्र व डब्ल्यूएचओ के द्वारा जारी दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन नही कराने के आरोपों पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार से डब्लूएचओ व केंद्र सरकार से निर्देशो का सख्ती से पालन करने को कहा है। साथ मे खंडपीठ ने ने यह भी कहा है कि महामारी से लड़ने के लिए आवश्यक वस्तुओं को मुहैय्या कराया जाये और इसमें लगे सभी कर्मचारियो की सुरक्षा का भी ध्यान दिया रखा जाये।
मामले के अनुसार अधिवक्ता सनप्रीत अजमानी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए केंद्र व डब्ल्यूएचओ ने कई तरह के दिशा निर्देश जारी किए हैं, परन्तु उत्तराखंड में इन निर्देशों का कड़ाई से पालन नही कराया जा रहा है। न ही डॉक्टरों व इसमें लगे अन्य स्टाफ जरूरी किट उपलब्ध कराई जा रही न ही उनकी सुुरक्षा की जा रही है जिससे वायरस को बढ़ने में मदद मिल रही है। लोग सामाजिक दूरी का पालन भी नही कर रहे है। मेडिकल स्टोरों में एन 95 मास्क तक नही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सम्मुख बनभूलपुरा का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि पहले से सुुरक्षा को लेकर सरकार ने इंतेजाम किये होते तो वहां घटना नही होती।

यह भी पढ़ें : लॉक डाउन के दौरान बिजली, पानी व टेलीफोन बिलों को माफ करने पर केंद्र व राज्य सरकार को नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने वीडियो कांफ्रंेस के माध्यम से कोरोना विषाणु कोविद-19 के संक्रमण की वजह से लागू लॉकडाउन की अवधि के बिजली, पानी व टेलीफोन के बिलों के माफ करने तथा कोरोना के खिलाफ अपनी सेवाएं दे रहे सफाई कर्मचारियों को पीपीई किट उपलब्ध कराने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने मामले में राज्य व केंद्र सरकार को शनिवार 18 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में हल्द्वानी निवासी अधिवक्ता राजेन्द्र आर्य ने उच्च न्यायालय में ऑनलाइन जनहित याचिका दायर की है। याचिक में कहा गया है कि लॉकडाउन की वजह से समाज के बड़े वर्ग की आमदनी पूरी तरह बंद है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि बिलों को माफ किया जाए। बृहस्पतिवार को इस मामले में विडियो कॉन्फ्रेस के माध्यम से सुनवाई के दौरान प्रदेश के महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर, मुख्य स्थाई अधिवक्ता परेश त्रिपाठी, स्टैंडिंग काउंसिल अनिल बिष्ट व योगेश पांडेय तथा केंद्र सरकार की ओर सेे अधिवक्ता संजय भट्ट शामिल हुए।

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-पहली बार वीडियों कांफ्रेसिंग से दो जनहित याचिकाओं पर होगी सुनवाई
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के लिए बुधवार 15 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक होगा। इस दिन से उच्च न्यायालय में पहली बार वादों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेसिंग द्वारा की जाएगी। पहले दिन दो जनहित याचिकाओं को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया गया है। इन वादों की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ करेगी। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन ने सुनवाई के लिए यह पीठ गठित की है। दोनों याचिकाएं ईमेल के द्वारा दायर की गई हैं। साथ ही दोनों याचिकाएं कोरोना महामारी के कारण गरीब कृषकों को हो रही परेशानी एवं चिकित्सकों व पैरा मैडिकल स्टाफ को सुरक्षा प्रदान किए जाने हेतु हाईकोर्ट से सरकार को आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए जाने हेतु योजित की गई है। सुनवाई के लिए सभी पक्ष वीडियो कांफ्रेसिंग से ही सम्मिलित होंगे। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से इस निमित्त सभी तैयारियां कर ली गई है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री की ओर से 3 मई तक लॉकडाउन जारी रखने की घोषणा की गई है। वहीं उत्तराखंड उच्च न्यायालय की ओर से वादकारियों की परेशानी को मद्देनजर रखते हुए 15 अप्रैल से आवश्यक वादों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेसिंग द्वारा करने का निर्णय लिया गया है।

यह भी पढ़ें : डीएम को आदेश का पालन करने अथवा कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने के आदेश…

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। हाईकोर्ट ने पिथौरागढ के डीएम को पूर्व में पारित आदेश का पालन करने अथवा 17 अप्रैल को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने को कहा है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार हेम चंद्र उप्रेती ने हाईकोर्ट मेें अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि वे जनवरी 2019 को कलैक्शन अमीन के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। जिसके बाद उनको बढा हुआ एसीपी का लाभ व पेशन इत्यादि का भुगतान नहीं किया गया था। कोर्ट ने पूर्व में आदेश पारित कर कहा था कि याचिकाकर्ता को समस्त लाभ दिए जाए। लेकिन विभाग की ओर से कुछ भुगतान किया गया और कुछ भुगतान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कोर्ट के पूर्व आदेशों के बावजूद उन्हें पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है। सरकार की ओर से कहा गया कि वे दो सप्ताह के भीतर बचा हुआ शेष भुगतान भी कर दिया जाएगा। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में पारित आदेश का पालन करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : अवैध खड़िया खनन के मामले में हाई कोर्ट ने तलब की जांच रिपोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मार्च 2020। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने दपटि कांडा बागेश्वर में अवैध रूप से किये जा रहे खड़िया खनन के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी बागेश्वर से 20 मार्च तक पर्यावरण बोर्ड की अनुमति प्रमाण पत्र व पूर्व में की गयी जांच की रिपोर्ट  पेश करने को कहा है। आज सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से कहा गया कि खनन के लिए पर्यावरण बोर्ड की उनको अनुमति मिली हुई है और प्रशाशन द्वारा पूर्व में इसकी जांच भी की गई है। कोर्ट ने इस पर जिला अधिकारी से रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमुर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। 
मामले के अनुसार दपटि कांडा बागेश्वर निवासी बलवंत धामी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि उनके गांव में कुछ लोगो द्वारा खड़िया का खनन किया जा रहा है परन्तु उनके द्वारा लीज पर दिये गए पट्टों के अलावा गाँव के अन्य लोगो की भूमि से भी खनन किया जा रहा है  जिसकी शिकायत उनके द्वारा प्रशाशन से की गई परन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई उल्टा एसडीएम ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया । कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद सरकार से मंगलवार को स्थिति स्पस्ट करने को कहा है। उत्तराखंड  हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरिद्वार जिले के इमरती ग्राम सभा में ग्रामप्रधान द्वारा किए गए घोटाले के मामले में दायर जनहित याचिका पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : डीएफओ आकाश कुमार वर्मा के खिलाफ अवमानना याचिका निस्तारित 

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व के आदेश का पालन नहीं करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा सोमवार को न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि उन्होने कोर्ट के आदेश का पालन कर दिया है। मामले को सुनने के बाद कोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि कोर्ट ने पूर्व में उनकी समस्त सेवाओं को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है, इसलिए उनको पेंशनरी बेनिफिट का समस्त लाभ नहीं दिया जा सकता है। इसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

यह भी पढ़ें : अवमानना पर डीएफओ के खिलाफ जमानती वारन्ट जारी

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा को जमानती वारन्ट जारी कर 16 को कारण सहित कोर्ट में पेश होने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमुर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि कोर्ट ने पूर्व में उनके समस्त सेवाओ को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नही करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है इसलिए उनको पेंशन के समस्त लाभ नही दिये जा सकते हैं। जिसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

यह भी पढ़ें : प्रमुख सचिव को उत्तराखंड हाईकोर्ट से अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी..

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन नहीं करने पर प्रमुख सचिव गृह  को आदेश दिया है कि वो 30 मार्च के आदेश का पालन करें वरना उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करते हुए चार्ज फ्रेम करेगे।  
मामले के अनुसार विनो‌द सिंह देव व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे उत्तराखंड पुलिस में एएसआई व सब इंस्पेक्टर के नीचे रेंक के कर्मचारी हैं।  ‌उन्हें छठा वेतनमान के तहत रिवाईज पे-स्केल का लाभ 1 जनवरी 2006 से मिलना था लेकिन विभाग की ओर से उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा था। याचिका में कहा कि सरकार की ओर से अन्य इंस्पेक्टर रेंक के सब इंस्पेक्टरों को 1 जनवरी 2006 से इसका लाभ दिया गया और एसआई से नीचे जो भी पुलिस कर्मी है उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा है। लेकिन याचिकाकर्ताओं को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में सरकार को आदेश दिया था कि याचिकाकर्ताओं को ऐरियर के साथ 1 जनवरी 2006 से रिवाईस पे-स्केल दिया जाए। एकलपीठ के इस आदेश के खिलाफ सरकार ने स्पेशल अपील दायर की जिसे खंडपीठ ने सरकार की स्पेशल अपील को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई थी।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड HC ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय पर लगाया 50 लाख का जुर्माना, जानें क्यों ?

-काउंसिलिंग में शामिल किए बिना 474 छात्रों को प्रवेश देने पर की कार्रवाई 
नवीन समाचार, देहरादून, 3 मार्च 2020।हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग में शामिल किए बिना निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा 474 छात्रों को अपने संस्थानों में प्रवेश देने पर 50 लाख का जुर्माना लगाते हुए जुर्माने की राशि 5 मार्च तक आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के खाते में जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इन 474 छात्र छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुये आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय से इन छात्र छात्राओं का विश्वविद्यालय में नामांकन दर्ज करने के आदेश दिए हैं।न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर बिना नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति शासन से मिल गई थी। इसके लिए 15 नवंबर 2018 की अंतिम तिथि थी। लेकिन इस तिथि के बाद भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर उन्होंने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय में अभ्यर्थियों का पंजीयन किये बिना ही उन्हें अपने कॉलेजों में प्रवेश दिया। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय द्वारा इन छात्र छात्राओं का पंजीयन न करने के खिलाफ निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की संस्था एसोसिएशन ऑफ कम्बाइंड  इंटरेंस एक्जामिनेशन ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा बिना विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग के छात्र छात्राओं को प्रवेश देने पर इन कॉलेजों पर 50 लाख का जुर्माना लगाया।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट की सख्ती से 72 वर्षीया विधवा को 17 वर्ष बाद मिला ‌’11.55 लाख’ का न्याय….

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने 17 वर्ष बाद एक 72 वर्षीया विधवा को 11,55,474 का भुगतान कर दिया है। इसके बाद हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित ‌कर‌ दिया। न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार ग्राम बानना भीमताल निवासी देवकी देवी (72 वर्ष) ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि उसके पति भूपाल दत्त शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पद से संतोष जनक सेवा करने के बाद जिला ‌बेसिक शिक्षा के अंतर्गत जूनियर हाईस्कूल देवस्थल पिनरों विकासखंड से मई 2003 से सेवानिवृत्त हुए थे।  याचिका में कहा कि उसके पति के पेशन का भुगतान नहीं किया गया था। इसी बीच उसके पति की मृ‌त्यु 9 सितंबर 2016 को हो गई। जिसके बाद कोर्ट ने 2017 में आदेश पारित कर समस्त देयकों का भुगतान करने के निर्देश दिए। शिक्षा विभाग ने इस आदेश को स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने दान सिंह बनाम सरकार के निर्णय में समस्त पेंशन लाभ देने के निर्देश दिए। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ के सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने विधवा याचिकाकर्ता को 11,55,474 का किया भुगतान किया गया। देवकी देवी का कहना है कि उसे इतने वर्षों बाद न्याय मिला है। उसे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा था। 

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने बरकरार रखी एक बच्ची की हत्या में आजीवन कारावास की सजा..

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने एक बच्ची की हत्या में निचली कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा पाए अभियुक्त की सजा को हाइकोर्ट ने बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशू धुलिया व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खण्डपीठ में हुई । 
मामले के अनुसार अप्रैल 2014 में रामनगर में दोषी मजदूर पवन सैनी को 10 वर्षीय बच्ची को रिश्ते के मामा के साथ देखा गया था। 12 अप्रैल 2014 को बच्ची के पिता बाजार गए थे। जब शाम को पिता श्रीराम पत्नी के साथ घर लौटे तो बेटी घर पर नहीं थी। बच्ची की खोजबीन की गयी तो उस दिन बच्ची को पता नहीं चल सका। इस दौरान रुकसाना नामक महिला ने बताया कि दिन में पवन सैनी बच्ची के साथ था जिसके बाद सभी मजदूरों ने पवन को पकड़कर पीटा तो उसने बताया कि वो बच्ची को लेकर जंगल गया था। जहां उसने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद बच्ची के पिता ने रामनगर कोतवाली में आरोपी पवन सैनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और पुलिस ने पवन को पकड़कर जेल भेज दिया। इस पूरे मामले पर जिला अदालत में लम्बी सुनवाई हुई  और 2014 में ही जिला जज नैनीताल ने पवन सैनी को दोषी मानते हुये उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को पवन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा वो निर्दोष है व उनको पूरे मामले पर फंसाया जा रहा है। सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता जेएस विर्क ने दलील दी की इस मामले में जो भी वैज्ञानिक व अन्य प्रमाण हैं वे आरोपी को दोषी ठहराने के लिये पर्याप्त हैं जिसे कोर्ट ने माना व दोषी की सजा को बरकरार रखा है। श्रीराम का परिवार व दोषी पवन पड़ोसी थे। दोनों कोसी नदी में खनन में मजदूरी करते थे इस दौरान बच्ची ने पवन से मामा का रिश्ता बना लिया जिसके चलते घर के लोगों को भी पवन से कोई खतरा नहीं था। मगर बलात्कार के प्रयास में पवन एक दिन बच्ची को बहलाकर साथ जंगल ले गया और हत्या कर दी।

यह भी पढ़ें : जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली याचिका पर सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दून वैली में जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते राज्य सरकार से एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 2 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई।

मामले के अनुसार देहरादून निवासी वरुण सोफ़्ती ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि केंद्र  सरकार ने एक आदेश जारी कर   दून वैली को रेड जोन में रखा गया है। याचिकर्ता का यह भी कहना है कि देहरादून में कोई भी स्लाटर हाउस नही होने के  बावजूद यहां  जिंदा जानवरों का दून वैली में आयात किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने दून वेली में जिंदा जानवरों के आयात पर पूर्णतः रोक लगाने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : जज कॉलोनी के घोटाले में डीएम देहरादून को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में पेश होने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने देहरादून के बहुचर्चित 48 बलबीर रोड जज कालोनी घोटाले के मामले में सुनवाई करते हुए देहरादून के डीएम को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी अधिवक्ता राजेश सूरी की बहन रीता सूरी ने याचिका दायर कर कहा है कि अधिवक्ता राजेश सूरी की हत्या 30 नवम्बर 2014 को हुई थी जब राजेश सूरी नैनीताल हाईकोट से अदालत में पैरवी करके ट्रेन से देहरादून जा रहे थे तभी उनको ट्रेन में ही जहर देकर मार दिया गया था। यह भी आरोप लगाया था कि राजेश की सभी फाइलें भी ट्रेन से ही गायब हो गई थीं और केवल कपड़ों से भरा बैग मिला था। राजेश की बहन रीता ने बताया कि राजेश ने देहरादून के कई भ्रष्टाचार के मामले-घोटाले उजागर किए थे। इनमें से एक बलवीर रोड में जज र्क्वाटर घोटाला भी था। आरोप लगाया कि जिस भूमि में भगीरथ कालोनी बनी है उसे फर्जी कागज बनाकर बेच दिया गया था। इस पर 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राधा रतूडी ने सम्पत्ति को फर्जी पाते हुए कुर्क करने के आदेश देने के साथ ही किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि 2003 से अभी तक इसमें कोई कार्यवाही नही की गई है। कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद जिला अधिकारी देहरादून को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए है।

यह भी पढ़ें : राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि अतिक्रमण कर बेचे जाने के मामले में जांच कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने सिडकुल रुद्रपुर के पास कल्याणी नदी के किनारे उत्तराखंड के राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर उसे बेचे जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार व सिडकुल प्रशासन को जांच कर रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 फरवरी की तिथि नियत की है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार रुद्रपुर निवासी सर्वेश कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सिडकुल पंतनगर में कल्याणी नदी के किनारे जो सरकारी भूमि स्थित है वह महामहिम राज्यपाल के नाम पर दर्ज है। याचिका में कहा कि उस भूमि पर कुछ लोगों की ओर से  अतिक्रमण कर उसे बेचा जा रहा है। याचिका में कहा कि जब इस प्रकरण का मामला प्रशासन के संज्ञान में आया तो उसकी जांच कराई गई। जांच में इस बात की पुष्टि हुई कि वहां पर अतिक्रमण किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह भूमि सिडकुल की मिलीभगत से बेची जा रही है। जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्‍य सरकार व सिडकुल प्रशासन को इस प्रकरण की जांच कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड की जेलों में तीन माह में घनघनाएंगे फोन, कैदी कर सकेंगे बातें

नवीन समाचार, नैनीताल, 8 जनवरी 2020। उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदी तीन माह में टेलीफोन से अपने घरों को बात कर पाएंगे। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदियों को टेलीफोन सुविधा उपलब्ध कराए जाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान राज्य सरकार ने अवगत कराया कि प्रदेश की सभी जेलों में भारत संचार निगम के माध्यम से टेलीफोन सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस पर कोर्ट ने इसके लिए सरकार को तीन माह का समय दिया और जनहित याचिका को निस्तारित घोषित कर दिया है।

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उल्लेखनीय है कि जेल में बंद कैदी- पूर्व सैनिक विनोद बिष्ट ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस समस्या के संबंध में जानकारी दी थी। कहा था कि प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद कैदियों के लिए टेलीफोन की सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे वह अपने परिजनों की कुशलक्षेम भी नहीं जान पाते। यह भी कहा गया कि राज्य सरकार ने परीक्षण के तौर पर देहरादून व हरिद्वार की जेलों में यह सुविधा उपलब्ध कराई है। उन्होंने वहीं की तर्ज पर प्रदेश की अन्य जेलों में भी यह सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की थी। इस पत्र को कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया। इसमें सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। बुधवार को सरकार की ओर से मामले में शपथपत्र पेश किया गया। इसमें न्यायालय को बताया गया कि 16 जून 2016 को मुख्यालय के कारागार अधीक्षक वीपी पांडे और जिला कारागार अधीक्षक देहरादून महेंद्र सिंह ग्वाल ने इन सुविधाओं को जानने के लिए केंद्रीय कारागार अंबाला का भ्रमण किया था। इसके बाद देहरादून व हरिद्वार की जेलों में परीक्षण के तौर पर इसे लागू करने के लिए बीएसएनएल के साथ समझौता किया था। इसी क्रम में प्रदेश की अन्य जेलों में भी टेलीफोन सुविधा शुरू कर दी जाएगी।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने निजीकरण के लिए केंद्र सरकार को दिया बड़ा झटका

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रामनगर के पास मोहान में स्थापित केंद्र सरकार की मिनी रत्न कम्पनी आईएमपीसीएल यानी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड के निजीकरण के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इसकी विनिवेश प्रकिया को बड़ा झटका दिया है। रामनगर निवासी एडवोकेट नीरज तिवारी की जनहित याचिका में कहा गया है कि रामनगर के पास मोहान (अल्मोड़ा) में केंद्र सरकार की आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी आईएमपीसीएल है। दवा कंपनी हर साल शत-प्रतिशत शुद्ध लाभ देती आई है और भारत सरकार की चंद कंपनियों में शामिल है, जो कि आज भी शुद्ध लाभ दे रही है।

आईएमपीसीएल में केंद्र सरकार की 98.11 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि शेष 1.89 प्रतिशत हिस्सेदारी उत्तराखंड सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के पास है। सरकार ने आईएमपीसीएल में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के लिये प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश के तहत ‘‘वैश्विक स्तर’’ पर रुचि पत्र आमंत्रित किये हैं। इस तरह केद्र सरकार शत प्रतिशत शुद्ध लाभ दे रही आईएमपीसीएल कंपनी को केंद्रीय वित्त मंत्रालय निजी हाथों में देने जा रहा है। जबकि यह कम्पनी लगभग 500 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और इस पिछड़े क्षेत्र के जड़ी बूटी उगाने और कम्पनी को आपूर्ति करने वाले वाले लगभग 5000 किसानों को अप्रत्यक्ष रोजगार देती है। इसके उत्पादन की उत्कृष्ट दवाइयां देश भर के सरकारी आयुर्वेदिक अस्पतालों में सस्ती दरों पर उपलब्ध कराईं जाती हैं। निजीकरण से ये दवाएं भी महंगी हो जाएंगी जो कि स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होगा। स्वयं मुख्यमंत्री उत्तराखंड, केंद्रीय आयुष मंत्रालय तथा सांसदों और विधायकों ने लिखित में इस कम्पनी के विनिवेश का विरोध किया है फिर भी कम्पनी का निजीकरण किया जा रहा है।

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