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डीएम को आदेश का पालन करने अथवा कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने के आदेश…

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2020। हाईकोर्ट ने पिथौरागढ के डीएम को पूर्व में पारित आदेश का पालन करने अथवा 17 अप्रैल को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उप‌स्थित होने को कहा है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार हेम चंद्र उप्रेती ने हाईकोर्ट मेें अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि वे जनवरी 2019 को कलैक्शन अमीन के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। जिसके बाद उनको बढा हुआ एसीपी का लाभ व पेशन इत्यादि का भुगतान नहीं किया गया था। कोर्ट ने पूर्व में आदेश पारित कर कहा था कि याचिकाकर्ता को समस्त लाभ दिए जाए। लेकिन विभाग की ओर से कुछ भुगतान किया गया और कुछ भुगतान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कोर्ट के पूर्व आदेशों के बावजूद उन्हें पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है। सरकार की ओर से कहा गया कि वे दो सप्ताह के भीतर बचा हुआ शेष भुगतान भी कर दिया जाएगा। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में पारित आदेश का पालन करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : अवैध खड़िया खनन के मामले में हाई कोर्ट ने तलब की जांच रिपोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मार्च 2020। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने दपटि कांडा बागेश्वर में अवैध रूप से किये जा रहे खड़िया खनन के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी बागेश्वर से 20 मार्च तक पर्यावरण बोर्ड की अनुमति प्रमाण पत्र व पूर्व में की गयी जांच की रिपोर्ट  पेश करने को कहा है। आज सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से कहा गया कि खनन के लिए पर्यावरण बोर्ड की उनको अनुमति मिली हुई है और प्रशाशन द्वारा पूर्व में इसकी जांच भी की गई है। कोर्ट ने इस पर जिला अधिकारी से रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमुर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। 
मामले के अनुसार दपटि कांडा बागेश्वर निवासी बलवंत धामी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि उनके गांव में कुछ लोगो द्वारा खड़िया का खनन किया जा रहा है परन्तु उनके द्वारा लीज पर दिये गए पट्टों के अलावा गाँव के अन्य लोगो की भूमि से भी खनन किया जा रहा है  जिसकी शिकायत उनके द्वारा प्रशाशन से की गई परन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई उल्टा एसडीएम ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया । कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद सरकार से मंगलवार को स्थिति स्पस्ट करने को कहा है। उत्तराखंड  हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरिद्वार जिले के इमरती ग्राम सभा में ग्रामप्रधान द्वारा किए गए घोटाले के मामले में दायर जनहित याचिका पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : डीएफओ आकाश कुमार वर्मा के खिलाफ अवमानना याचिका निस्तारित 

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व के आदेश का पालन नहीं करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा सोमवार को न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि उन्होने कोर्ट के आदेश का पालन कर दिया है। मामले को सुनने के बाद कोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि कोर्ट ने पूर्व में उनकी समस्त सेवाओं को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है, इसलिए उनको पेंशनरी बेनिफिट का समस्त लाभ नहीं दिया जा सकता है। इसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
 

यह भी पढ़ें : अवमानना पर डीएफओ के खिलाफ जमानती वारन्ट जारी

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 मार्च 2020। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर हरिद्वार के डीएफओ आकाश कुमार वर्मा को जमानती वारन्ट जारी कर 16 को कारण सहित कोर्ट में पेश होने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमुर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी रति राम ने अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि कोर्ट ने पूर्व में उनके समस्त सेवाओ को जोड़ते हुए उनको पेंशनरी बेनिफिट के समस्त लाभ देने के आदेश दिए थे परन्तु डीएफओ हरिद्वार ने कोर्ट के आदेश का पालन नही करते हुए कहा कि उनकी रेगुलर सर्विस 10 साल से कम है इसलिए उनको पेंशन के समस्त लाभ नही दिये जा सकते हैं। जिसको लेकर उन्होंने उनके खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

यह भी पढ़ें : प्रमुख सचिव को उत्तराखंड हाईकोर्ट से अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी..

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन नहीं करने पर प्रमुख सचिव गृह  को आदेश दिया है कि वो 30 मार्च के आदेश का पालन करें वरना उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करते हुए चार्ज फ्रेम करेगे।  
मामले के अनुसार विनो‌द सिंह देव व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे उत्तराखंड पुलिस में एएसआई व सब इंस्पेक्टर के नीचे रेंक के कर्मचारी हैं।  ‌उन्हें छठा वेतनमान के तहत रिवाईज पे-स्केल का लाभ 1 जनवरी 2006 से मिलना था लेकिन विभाग की ओर से उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा था। याचिका में कहा कि सरकार की ओर से अन्य इंस्पेक्टर रेंक के सब इंस्पेक्टरों को 1 जनवरी 2006 से इसका लाभ दिया गया और एसआई से नीचे जो भी पुलिस कर्मी है उन्हें 12 दिसंबर 2012 से दिया जा रहा है। लेकिन याचिकाकर्ताओं को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पूर्व में सरकार को आदेश दिया था कि याचिकाकर्ताओं को ऐरियर के साथ 1 जनवरी 2006 से रिवाईस पे-स्केल दिया जाए। एकलपीठ के इस आदेश के खिलाफ सरकार ने स्पेशल अपील दायर की जिसे खंडपीठ ने सरकार की स्पेशल अपील को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई थी।
 

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड HC ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय पर लगाया 50 लाख का जुर्माना, जानें क्यों ?

-काउंसिलिंग में शामिल किए बिना 474 छात्रों को प्रवेश देने पर की कार्रवाई 
नवीन समाचार, देहरादून, 3 मार्च 2020।हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग में शामिल किए बिना निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा 474 छात्रों को अपने संस्थानों में प्रवेश देने पर 50 लाख का जुर्माना लगाते हुए जुर्माने की राशि 5 मार्च तक आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के खाते में जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इन 474 छात्र छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुये आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय से इन छात्र छात्राओं का विश्वविद्यालय में नामांकन दर्ज करने के आदेश दिए हैं।न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर बिना नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति शासन से मिल गई थी। इसके लिए 15 नवंबर 2018 की अंतिम तिथि थी। लेकिन इस तिथि के बाद भी निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की सीटें रिक्त रहने पर उन्होंने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय में अभ्यर्थियों का पंजीयन किये बिना ही उन्हें अपने कॉलेजों में प्रवेश दिया। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय द्वारा इन छात्र छात्राओं का पंजीयन न करने के खिलाफ निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों की संस्था एसोसिएशन ऑफ कम्बाइंड  इंटरेंस एक्जामिनेशन ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक कॉलेजों द्वारा बिना विश्वविद्यालय की काउंसिलिंग के छात्र छात्राओं को प्रवेश देने पर इन कॉलेजों पर 50 लाख का जुर्माना लगाया।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट की सख्ती से 72 वर्षीया विधवा को 17 वर्ष बाद मिला ‌’11.55 लाख’ का न्याय….

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने 17 वर्ष बाद एक 72 वर्षीया विधवा को 11,55,474 का भुगतान कर दिया है। इसके बाद हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित ‌कर‌ दिया। न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
मामले के अनुसार ग्राम बानना भीमताल निवासी देवकी देवी (72 वर्ष) ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि उसके पति भूपाल दत्त शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पद से संतोष जनक सेवा करने के बाद जिला ‌बेसिक शिक्षा के अंतर्गत जूनियर हाईस्कूल देवस्थल पिनरों विकासखंड से मई 2003 से सेवानिवृत्त हुए थे।  याचिका में कहा कि उसके पति के पेशन का भुगतान नहीं किया गया था। इसी बीच उसके पति की मृ‌त्यु 9 सितंबर 2016 को हो गई। जिसके बाद कोर्ट ने 2017 में आदेश पारित कर समस्त देयकों का भुगतान करने के निर्देश दिए। शिक्षा विभाग ने इस आदेश को स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने दान सिंह बनाम सरकार के निर्णय में समस्त पेंशन लाभ देने के निर्देश दिए। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ के सख्ती के बाद शिक्षा विभाग ने विधवा याचिकाकर्ता को 11,55,474 का किया भुगतान किया गया। देवकी देवी का कहना है कि उसे इतने वर्षों बाद न्याय मिला है। उसे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा था। 

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने बरकरार रखी एक बच्ची की हत्या में आजीवन कारावास की सजा..

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने एक बच्ची की हत्या में निचली कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा पाए अभियुक्त की सजा को हाइकोर्ट ने बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशू धुलिया व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खण्डपीठ में हुई । 
मामले के अनुसार अप्रैल 2014 में रामनगर में दोषी मजदूर पवन सैनी को 10 वर्षीय बच्ची को रिश्ते के मामा के साथ देखा गया था। 12 अप्रैल 2014 को बच्ची के पिता बाजार गए थे। जब शाम को पिता श्रीराम पत्नी के साथ घर लौटे तो बेटी घर पर नहीं थी। बच्ची की खोजबीन की गयी तो उस दिन बच्ची को पता नहीं चल सका। इस दौरान रुकसाना नामक महिला ने बताया कि दिन में पवन सैनी बच्ची के साथ था जिसके बाद सभी मजदूरों ने पवन को पकड़कर पीटा तो उसने बताया कि वो बच्ची को लेकर जंगल गया था। जहां उसने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद बच्ची के पिता ने रामनगर कोतवाली में आरोपी पवन सैनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और पुलिस ने पवन को पकड़कर जेल भेज दिया। इस पूरे मामले पर जिला अदालत में लम्बी सुनवाई हुई  और 2014 में ही जिला जज नैनीताल ने पवन सैनी को दोषी मानते हुये उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को पवन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा वो निर्दोष है व उनको पूरे मामले पर फंसाया जा रहा है। सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता जेएस विर्क ने दलील दी की इस मामले में जो भी वैज्ञानिक व अन्य प्रमाण हैं वे आरोपी को दोषी ठहराने के लिये पर्याप्त हैं जिसे कोर्ट ने माना व दोषी की सजा को बरकरार रखा है। श्रीराम का परिवार व दोषी पवन पड़ोसी थे। दोनों कोसी नदी में खनन में मजदूरी करते थे इस दौरान बच्ची ने पवन से मामा का रिश्ता बना लिया जिसके चलते घर के लोगों को भी पवन से कोई खतरा नहीं था। मगर बलात्कार के प्रयास में पवन एक दिन बच्ची को बहलाकर साथ जंगल ले गया और हत्या कर दी।

यह भी पढ़ें : जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली याचिका पर सरकार से जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दून वैली में जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते राज्य सरकार से एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 2 मार्च की तिथि नियत की है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई।

 

मामले के अनुसार देहरादून निवासी वरुण सोफ़्ती ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि केंद्र  सरकार ने एक आदेश जारी कर   दून वैली को रेड जोन में रखा गया है। याचिकर्ता का यह भी कहना है कि देहरादून में कोई भी स्लाटर हाउस नही होने के  बावजूद यहां  जिंदा जानवरों का दून वैली में आयात किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने दून वेली में जिंदा जानवरों के आयात पर पूर्णतः रोक लगाने की मांग की है।

यह भी पढ़ें : जज कॉलोनी के घोटाले में डीएम देहरादून को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में पेश होने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने देहरादून के बहुचर्चित 48 बलबीर रोड जज कालोनी घोटाले के मामले में सुनवाई करते हुए देहरादून के डीएम को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी अधिवक्ता राजेश सूरी की बहन रीता सूरी ने याचिका दायर कर कहा है कि अधिवक्ता राजेश सूरी की हत्या 30 नवम्बर 2014 को हुई थी जब राजेश सूरी नैनीताल हाईकोट से अदालत में पैरवी करके ट्रेन से देहरादून जा रहे थे तभी उनको ट्रेन में ही जहर देकर मार दिया गया था। यह भी आरोप लगाया था कि राजेश की सभी फाइलें भी ट्रेन से ही गायब हो गई थीं और केवल कपड़ों से भरा बैग मिला था। राजेश की बहन रीता ने बताया कि राजेश ने देहरादून के कई भ्रष्टाचार के मामले-घोटाले उजागर किए थे। इनमें से एक बलवीर रोड में जज र्क्वाटर घोटाला भी था। आरोप लगाया कि जिस भूमि में भगीरथ कालोनी बनी है उसे फर्जी कागज बनाकर बेच दिया गया था। इस पर 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राधा रतूडी ने सम्पत्ति को फर्जी पाते हुए कुर्क करने के आदेश देने के साथ ही किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि 2003 से अभी तक इसमें कोई कार्यवाही नही की गई है। कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद जिला अधिकारी देहरादून को 24 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए है।

यह भी पढ़ें : राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि अतिक्रमण कर बेचे जाने के मामले में जांच कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने सिडकुल रुद्रपुर के पास कल्याणी नदी के किनारे उत्तराखंड के राज्यपाल के नाम दर्ज सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर उसे बेचे जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार व सिडकुल प्रशासन को जांच कर रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 फरवरी की तिथि नियत की है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार रुद्रपुर निवासी सर्वेश कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सिडकुल पंतनगर में कल्याणी नदी के किनारे जो सरकारी भूमि स्थित है वह महामहिम राज्यपाल के नाम पर दर्ज है। याचिका में कहा कि उस भूमि पर कुछ लोगों की ओर से  अतिक्रमण कर उसे बेचा जा रहा है। याचिका में कहा कि जब इस प्रकरण का मामला प्रशासन के संज्ञान में आया तो उसकी जांच कराई गई। जांच में इस बात की पुष्टि हुई कि वहां पर अतिक्रमण किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह भूमि सिडकुल की मिलीभगत से बेची जा रही है। जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्‍य सरकार व सिडकुल प्रशासन को इस प्रकरण की जांच कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड की जेलों में तीन माह में घनघनाएंगे फोन, कैदी कर सकेंगे बातें

नवीन समाचार, नैनीताल, 8 जनवरी 2020। उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदी तीन माह में टेलीफोन से अपने घरों को बात कर पाएंगे। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तराखंड की जेलों में बंद कैदियों को टेलीफोन सुविधा उपलब्ध कराए जाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान राज्य सरकार ने अवगत कराया कि प्रदेश की सभी जेलों में भारत संचार निगम के माध्यम से टेलीफोन सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस पर कोर्ट ने इसके लिए सरकार को तीन माह का समय दिया और जनहित याचिका को निस्तारित घोषित कर दिया है।

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उल्लेखनीय है कि जेल में बंद कैदी- पूर्व सैनिक विनोद बिष्ट ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस समस्या के संबंध में जानकारी दी थी। कहा था कि प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद कैदियों के लिए टेलीफोन की सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे वह अपने परिजनों की कुशलक्षेम भी नहीं जान पाते। यह भी कहा गया कि राज्य सरकार ने परीक्षण के तौर पर देहरादून व हरिद्वार की जेलों में यह सुविधा उपलब्ध कराई है। उन्होंने वहीं की तर्ज पर प्रदेश की अन्य जेलों में भी यह सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की थी। इस पत्र को कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया। इसमें सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। बुधवार को सरकार की ओर से मामले में शपथपत्र पेश किया गया। इसमें न्यायालय को बताया गया कि 16 जून 2016 को मुख्यालय के कारागार अधीक्षक वीपी पांडे और जिला कारागार अधीक्षक देहरादून महेंद्र सिंह ग्वाल ने इन सुविधाओं को जानने के लिए केंद्रीय कारागार अंबाला का भ्रमण किया था। इसके बाद देहरादून व हरिद्वार की जेलों में परीक्षण के तौर पर इसे लागू करने के लिए बीएसएनएल के साथ समझौता किया था। इसी क्रम में प्रदेश की अन्य जेलों में भी टेलीफोन सुविधा शुरू कर दी जाएगी।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने निजीकरण के लिए केंद्र सरकार को दिया बड़ा झटका

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रामनगर के पास मोहान में स्थापित केंद्र सरकार की मिनी रत्न कम्पनी आईएमपीसीएल यानी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड के निजीकरण के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इसकी विनिवेश प्रकिया को बड़ा झटका दिया है। रामनगर निवासी एडवोकेट नीरज तिवारी की जनहित याचिका में कहा गया है कि रामनगर के पास मोहान (अल्मोड़ा) में केंद्र सरकार की आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी आईएमपीसीएल है। दवा कंपनी हर साल शत-प्रतिशत शुद्ध लाभ देती आई है और भारत सरकार की चंद कंपनियों में शामिल है, जो कि आज भी शुद्ध लाभ दे रही है।

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आईएमपीसीएल में केंद्र सरकार की 98.11 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि शेष 1.89 प्रतिशत हिस्सेदारी उत्तराखंड सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के पास है। सरकार ने आईएमपीसीएल में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के लिये प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश के तहत ‘‘वैश्विक स्तर’’ पर रुचि पत्र आमंत्रित किये हैं। इस तरह केद्र सरकार शत प्रतिशत शुद्ध लाभ दे रही आईएमपीसीएल कंपनी को केंद्रीय वित्त मंत्रालय निजी हाथों में देने जा रहा है। जबकि यह कम्पनी लगभग 500 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और इस पिछड़े क्षेत्र के जड़ी बूटी उगाने और कम्पनी को आपूर्ति करने वाले वाले लगभग 5000 किसानों को अप्रत्यक्ष रोजगार देती है। इसके उत्पादन की उत्कृष्ट दवाइयां देश भर के सरकारी आयुर्वेदिक अस्पतालों में सस्ती दरों पर उपलब्ध कराईं जाती हैं। निजीकरण से ये दवाएं भी महंगी हो जाएंगी जो कि स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होगा। स्वयं मुख्यमंत्री उत्तराखंड, केंद्रीय आयुष मंत्रालय तथा सांसदों और विधायकों ने लिखित में इस कम्पनी के विनिवेश का विरोध किया है फिर भी कम्पनी का निजीकरण किया जा रहा है।

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