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पिथौरागढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए हाई कोर्ट ने दिए बड़े आदेश

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पिथौरागढ़ के सीमावर्ती ग्रामीणों को 24 घंटे में आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराए सरकार

नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को पिथौरागढ़ जिले के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों को 24 घंटे में दैनिक आवश्यकता की घी, गेहूं, धान, आटा, सब्जी, मसाले, माचिस, पावडर दूध, कंबल और मिटटी का तेल आदि चीजें उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने इस आपूर्ति को पूरे शीतकाल में जारी रखने को कहा है। मामले में मुख्य सचिव को भारतीय वायु सेना से संपर्क कर और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के साथ समन्वय बनाकर इस आदेश का अनुपालन करने में मदद लेने को भी कहा है। साथ ही विपक्षियों से दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र देने को भी कहा है।
मामले के अनुसार धारचूला निवासी महेंद्र सिंह बुदियाल ने जनहित याचिका दायर कर न्यायालय से कहा था कि पिथौरागढ़ जिले के लमारी, बुंदी, गुंजी, चौयालेख, गर्ब्यांग, नपलच्यु नाबी, रोगकोंग, कुटी, कालापानी और नाभीढांग गावों की लगभग 9000 की आबादी के लिए कोई सड़क नहीं है। पगडंडियां ही यहां आनेजाने का एकमात्र रास्ता हैं। 1999 से 2000 के बीच केंद्र सरकार ने सीमांत क्षेत्रों में सड़कों के महत्व को देखते हुए घटियाबागढ़ से लिपुलेख तक चार किलोमीटर मोटर मार्ग का प्रस्ताव स्वीकृत किया था, जिसे बीआरओ द्वारा संचालित कराना था जो अभी तक लंबित है। बताया गया कि वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की गई थी लेकिन उसका किराया 3100 रुपए प्रति व्यक्ति यानी बहुत ज्यादा था, और उसे भी बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया है। संचार और हेलीकॉप्टर सेवा के अभाव में उनके क्षेत्र में अब खाद्य सामग्री और दूसरे रोजमर्रा के जरूरी सामान भी समाप्त हो गए हैं।

बड़ा फैसला: निचली अदालतों से भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत, नहीं आना पड़ेगा हाईकोर्ट

नैनीताल, 20 सितंबर 2018। उत्तराखंड में भी अब किसी भी अपराध के आरोपित को अंतरिम जमानत के लिए हाईकोर्ट नहीं आना पड़ेगा। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दूरगामी प्रभाव के एक फैसले में उत्तराखंड में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा 438 को प्रभावी करते हुए अग्रिम जमानत के प्रभाव को लागू कर दिया है। इस आदेश के बाद राज्य को निचली अदालतों को भी अंतरिम जमानत देने का अधिकार मिल गया है। इससे आरोपित को जेल जाने से पहले ही जमानत मिल जाएगी।
मामले के अनुसार याची विष्णु सहाय व मोहन कुमार मित्तल ने विशेष अपील दायर कर एकल पीठ के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता-उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 को चुनौती दी थी और कहा था कि उक्त प्राविधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 व 22 का उल्लंघन है। उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 16 के द्वारा अग्रिम जमानत के प्राविधान वाली भादंसं की धारा 438 को रिपिल कर दिया था। याची का कहना था कि उत्तर प्रदेश पुर्नगठन अधिनियम के तहत उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किये गये नियम उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दो वर्ष तक ही प्रभावी हो सकते थे। इधर उत्तराखंड सरकार ने न तो यूपी संशोधन अधिनियम को लागू किया है और न ही निरस्त किया है। इसलिये यूपी के उस कानून को यहां लागू नहीं किया जा सकता है। माना जा रहा है कि इस आदेश के बाद पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद कोई भी आरोपित निचली अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल कर अंतरिम जमानत ले सकता है, जबकि अब तक किसी भी प्रकृति के अपराध में आरोपित को गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत अर्जी लगानी पड़ती है।

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-हाईकोर्ट ने सभी सरकारी अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा व डॉक्टरों के खाली पदों व भरने की जानकारी मांगी
नैनीताल, 12 सितंबर 2018। उत्तराखंड के सभी सरकारी चिकित्सालयों के दिन बहुरने की उम्मीद बनती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने सरकार को प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी, ओपीडी व पर्चा बनाने वाले कक्षों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा है, साथ ही सरकार से प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों के खाली पदों की जानकारी भी मांगी है। साथ ही रिक्त पदों को भरने के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयास को जानकारी शपथ पत्र पर मांगी है। मामले में अगली सुनवाई 25 सितम्बर को होगी। उल्लेखनीय है कि नरेश मंडोला नाम के याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज में चिकित्सकों के अभाव में तीन हफ्ते में नौ बच्चों की मौत हो गयी थी।

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-निबंधन और शर्त के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को मिलेगा अनुरक्षण
-सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में 30 जून 2016 का शासनादेश किया गया पेश, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया
नैनीताल, 6 सितंबर 2018। उत्तराखंड सरकार निबंधन और शर्तों के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को प्रतिमाह 1000 रुपए का अनुरक्षण देगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ में राज्य सरकार ने 30 जून 2016 का शासनादेश पेश किया, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया है।
उल्लेखनीय है कि हरिद्वार निवासी सुभाष जोशी ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र लिखकर कहा था कि मंदिरो व श्मशानघाट के महापुरोहितो की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, इस काम से उनका ठीक से गुजारा तक नहीं चल पाता है लिहाजा उनको सरकार से आर्थिक सहायता दिलाई जाए। पूर्व में खंडपीठ ने इसको जनहित के रूप में स्वीकार किया था और सरकार से इसमें जवाब पेश करने को कहा था। बृहस्पतिवार को मामले की सुनवाई के दौरान महाअधिक्वता द्वारा कोर्ट को अवगत कराया कि सरकार ने इस सम्बन्ध में शासनादेश पूर्व में जारी किये है और इनकी सहायता के लिए सरकार आर्थिक मदद दे रही है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने सरकार की इस पहल को सराहनीय माना और सरकार से इसका व्यापक प्रचार प्रशार करने को कहा। साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

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नैनीताल, 29 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खण्डपीठ ने ब्राह्मणों-पंडितों, पुरोहितों के हितों पर बड़े निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने तीर्थो, मन्दिरों में पण्डितों और पुरोहितों की आर्थिक स्थिति ठीक नही होने पर हरिद्वार निवासी पण्डित सुभाष जोशी के पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर सुनवाई करते हुए सरकार से उन्हें जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान देने के लिए 6 सितम्बर तक वित्त सचिव से जानकारी लेकर कोर्ट में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि मामले में याची पण्डित सुभाष जोशी ने अपने पत्र में कहा है कि तीर्थो, मन्दिरों व श्मशान घाट में जो महा ब्राह्मण होते हैं उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति ठीक नहीं है, लिहाजा उनको सरकार जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान करे, जिससे उनकी आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा हो सके। इस मामले में खण्डपीठ ने अधिवक्ता एमसी पंत को न्यायमित्र नियुक्त किया है । पंत ने उनका पक्ष रखते हुए तीर्थो को वैष्णो देवी  और बालाजी की तर्ज पर श्राइन बोर्ड गठित करने की मांग भी की जिससे इनमें कार्य करने वाले लोगों को वेतन व अन्य लाभ दिए जा सकें। मामले में प्रदेश के महाधिवक्ता द्वारा सरकार का पक्ष रखते हुए कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25(जे) के अनुसार किसी भी धर्म विशेष के लिये इस तरह के सेवाएं देना उचित नहीं है। यह सविधान का उल्लंघन होगा। यह सम्भव भी नहीं है। खण्डपीठ ने इस मामले में महाहाधिवक्ता से कहा है कि वे इस सम्बन्ध में वित्त सचिव से वार्ता करें और 6 सितम्बर को स्थिति से कोर्ट को अवगत कराये। मामले की अगली सुनवाई 6 सितम्बर की तिथि नियत की है।

एससी-एसटी एक्ट में संशोधन असंवैधानिक ! उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को भेजा नोटिस

नैनीताल, 31 अगस्त 2018। केंद्र सरकार द्वारा एससी-एसटी एक्ट में किये गये संशोधन को उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने इस पर केंद्र सरकार से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
इस मामले में उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता सनप्रीत अजमानी ने जनहित याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार की 17 अगस्त 2018 को जारी एससीएसटी एक्ट की अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा है कि यह सर्वोच्च न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट पर आदेश के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया गया है। इस पर पुनर्विचार याचिका भी अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसलिये यह संविधान की धारा 14, 19 व 21 के तहत असंवैधानिक है।

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नैनीताल, 24 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में केंद्र सरकार के ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट-2010’ के अधीन पंजीकृत नहीं हुए अस्पतालों और क्लीनिकों को तत्काल बंद करने के आदेश दिये हैं। साथ ही इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों में इस एक्ट के प्राविधानों का पूर्णतया पालन कराने के आदेश दिये हैं। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों की संख्या नगण्य बताई जा रही है। यानी अधिकांश अस्पताल और क्लीनिक गैर पंजीकृत हैं। ऐसे में उत्तराखंड के कमोबेश सभी अस्पतालों और क्लीनिकों पर ताले लटकने की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। आगे देखने वाली बात होगी कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है। हाईकोर्ट के आदेश का पालन करती है, अथवा सर्वोच्च न्यायालय जाती है।
इसके अलावा न्यायाल ने राज्य सरकार को सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज, ऑपरेशन और परीक्षणों के लिए एक माह के भीतर फीस तय करने के भी आदेश दिए है। साथ ही न्यायालय ने प्रदेश के सभी अस्पतालों को आदेश दिए हैं कि वे बेवजह मरीजो का डायग्नोस्टिक टेस्ट न कराएं, तथा रोगियों को केवल जेनरिक दवा ही लिखें, ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए अनुचित दबाव ना बनाएं।

राज्य में एक्ट लागू ही नहीं, सभी प्राइवेट स्थानीय नगर निकायों से केवल एक संस्थान के रूप में हैं पंजीकृत

नैनीताल। इस बारे में प्रदेश की चिकित्सा नगरी के रूप में विकसित हो रही हल्द्वानी के कुछ बड़े चिकित्सालयों के मालिकों से बात की गयी तो उनका कहना है कि ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के बारे में पहले ही राज्य सरकार की चिकित्सकों के संगठन आईएमए की वार्ता चल रही है। यह एक्ट अभी राज्य में लागू नहीं है। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के दृष्टिगत इसे लागू करना आसान नहीं है। उनका कहना है कि यह लागू हुआ तो अस्पताल तो किसी तरह अपना पंजीकरण और इसके प्राविधानों का पालन कर लेंगे, परंतु इससे चिकित्सा सुविधाएं और अधिक महंगी हो जाएंगीं। अभी हल्द्वानी के केवल दो चिकित्सालय डा. खुराना का कृष्णा अस्पताल और बृज लाल हॉस्पिटल ही इस एक्ट नहीं वरन एक राष्ट्रीय उपक्रम से पंजीकृत हैं, जबकि अन्य सभी अस्पताल केवल नगर पालिका, नगर निगम में एक संस्थान के रूप में पंजीकृत हैं।

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-राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों में उच्च शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश

प्रतिबंधित की गयी प्रमुख दवाइयां: बुखार की पैरासिटामौल, सिट्राजिन, टेराफिनाडीन, डीकोल्ड टोटल, सेराडॉन, फिंसाडीन, डोवर्स पावडर, दर्द की डाईक्लोफेन्स, पेरासिटामोल डोवोर्स टेबलेट व कोम्बिफ्लेम आदि।

नैनीताल, 13 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में 434 दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध राज्य के युवाओ का नशे की गर्त में जाने के खिलाफ दायर रामनगर नैनीताल निवासी श्वेता मासीवाल की जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने दिये। खंडपीठ ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 77 जे जे में विस्तार करते हुए 18 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रतिबंधित दवाइयां, मादक पदार्थ और नशा होने की आशंका वाली किसी भी दवा-चीज की बिक्री पर भी रोक लगा दी है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को केंद्रीय औषधि नियंत्रक बोर्ड द्वारा प्रतिबंधित की गयी सभी 434 दवाओं की बिक्री पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। पीठ ने कहा कि जिस किसी मेडिकल स्टोर में ये दवाईया उपलब्ध हैं उनको पुलिस की मदद से या तो नष्ट किया जाए, अथवा इन्हें इनकी कम्पनी को वापस किया जाए। इसके अलावा खंडपीठ ने राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश भी दिए हैं। इन क्लबों के अध्यक्ष उच्च शिक्षा निदेशक और नोडल अधिकारी विद्यालयी शिक्षा निदेशक होंगे। खण्डपीठ ने यह भी निर्देश दिए हैं कि जेलों से कैदियों को लाते व ले जाते वक्त नारकोटिक्स की जांच की जाये। राज्य व जनपदांे की सीमाओं पर ड्रग्स की जांच करने के लिए सरकार 3 सप्ताह में विशेष टीम गठित करे। प्रदेश के प्रत्येक जिले में नशा मुक्ति केंद्र खोले जाएं। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर ड्रग्स नारकोटिक्स स्क्वाड का गठन करने को भी कहा गया है। मामले के अनुसार याचिकर्ता ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश के युवा वर्ग दिन-प्रतिदिन नशे की गिरफ्त में डूब रहे हैं, लिहाजा नशे के कारोबारियों पर रोक लगाई जाये। उल्लेखनीय है कि पूर्व में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ ने भी इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रदेश का युवा वर्ग नशे की गर्त में डूब रहा है, तथा प्रदेश सरकार और पुलिस नशा रोकने में नाकाम हो रही है। पूर्व में इस मामले में एसएसपी एसटीएफ नारकोटिक्स एंड ड्रग्स कण्ट्रोल और क्षेत्रीय निदेशक कोर्ट में पेश हुए थे उन्होंने नशे को रोकने के लिए स्टाफ की कमी का हवाला दिया था, तथा माना था कि जो भी थोडा बहुत इसको रोकने के लिए केवल इलेक्ट्रानिक उपकरणों और एसएसबी की मदद से ही कार्रवाई की जाती है। बताया था कि उत्तराखंड में नशे का कारोबार बाहर के राज्यो से प्रमुख कोबरा गैंग के माध्यम से होता है। इस पर खंडपीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण मानते हुए पूर्व में ही राज्य के सभी 27 विश्वविद्यालयो, सभी एसएसपी और सभी जिला अधिकारियों को पक्षकार बनवाया था। (इनपुट : बीएस रावत )

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  • तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को असंवैधानिक करार दिया

नैनीताल, 4 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीसरे बच्चे के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश नहीं दिए जाने के प्रावधान में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने संशोधित फैसला दिया है। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने धात्री महिला को तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को उस स्थिति में असंवैधानिक करार दिया है, जबकि उसके पहले से दो जुड़वां बच्चे हों। यानी अब हर दूसरी डिलीवरी पर मातृत्व अवकाश मिल सकेगा, चाहे महिला के पहले से 2 जुड़वाँ बच्चे ही क्यों ना हों।न्यायालय ने साफ कहा कि यह नियम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा-27 के प्रावधानों के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 42 की भावना के विपरीत है। मामले में सुनवाई के बाद यह फैसला दिया है।
उच्च न्यायालय का यह फैसला राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी की स्टाफ नर्स उर्मिला मैसी की ओर दायर याचिका पर आया है। सिस्टर मैसी ने उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उन्होंने पांच माह के लिए मातृत्व अवकाश को आवेदन किया था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए उनके आवेदन को निरस्त कर दिया कि उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 के तहत तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति देने का नियम नहीं है। जबकि उसके पहले से दो जुड़वाँ बच्चे हैं, और वह दूसरी बार ही माँ बन रही है।

रामनगर के दो पूर्व पालिकाध्यक्षों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश

नैनीताल, 16 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की खंडपीठ ने रामनगर नगर पालिका के अंतर्गत ट्रंचिंग ग्राउंड में हुए अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर वहां के पूर्व पालिकाध्यक्ष भगीरथ लाल चौधरी व उनके पालिकाध्यक्ष रही उनकी पत्नी उर्मिला चौधरी के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिये हैं। मामले के अनुसार रामनगर निवासी भूपेंद्र सिंह खाती व ललित पांडे ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 1979 में नगर पालिका रामनगर को 18 बीघा 76 बिश्वा भूमि पर ट्रंचिंग ग्राउंड भूमि की रजिस्ट्री कराRaयी गयी थी। पालिका ने इस भूमि पर अवैध कब्जे होने दिये। तत्कालीन कुमाऊं मंडलायुक्त ने अपनी जांच में इन कब्जों के लिए तत्कालीन नगर पालिकाध्यक्ष को दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिये थे। इसी रिपोर्ट के आधार पर खंडपीठ ने दोनों पालिकाध्यक्षों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये हैं।

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1.17 करोड़ रुपये के घोटाले की आशंका, कमिश्नर की जांच में हुई आरोपों की पुष्टि जबकि डीएम ने पाया था आरोपों को निराधार
नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने चम्पावत वन प्रभाग के भींगराड़ा वन क्षेत्र की 31 वन पंचायतो में मनरेगा के तहत हुए कार्यो में वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितता करने के दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिये हैं। मामले में तत्कालीन डीएम की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।
मामले के अनुसार उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संजय भट्ट ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि उन्होंने मई 2011 में जिला अधिकारी चम्पावत के समक्ष शिकायत की थी कि बालातड़ि वन पंचायत में करीब 8 लाख रुपये की लागत से चेकडैम बनाने का फर्जी प्रस्ताव बनाया गया था। इस काम में जिन ग्रामीणों को जॉब कार्ड के जरिये काम में दिखाया गया वे गांव में थे ही नहीं। जिला अधिकारी की जाँच में यह शिकायत निराधार पाई गयी, जिसके खिलाफ उन्होंने लोकायुक्त से शिकायत की। किन्तु लोकायुक्त से जाँच नही हो सकी। इस बीच उन्हें 37 लाख रुपये की सीमेंट खरीद का पता चला, और जहां से सीमेंट खरीदा गया था उन फर्मो की जानकारी वाणिज्य कर विभाग से ली गयी तो ये फर्मे फर्जी पाई गयीं। इस आधार पर शिकायत कर्ता को बालातड़ी वन पंचायत के साथ साथ 31 अन्य पंचायतो में मनरेगा के तहत हुए कार्यों में 1.17 करोड़ रुपये की वित्तीय व प्रशासनिक अनियमित्ता होने की जानकारी मिली। इस मामले की जाँच के लिये याची ने मई 2015 में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी तब उच्च न्यायालय के निर्देश पर सरकार ने 3 जून 2015 को कुमाऊं कमिश्नर को इन अनियमितताओं की जाँच के लिए जाँच अधिकारी नियुक्त किया। 26 अक्टूबर 2015 को कमिश्नर ने अपनी जाँच में पाया की मनरेगा के तहत हुए कार्यों में धांधली हुई है। इस आधार पर उन्होंने दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति की थी। किन्तु दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नही किया गया। मामले में आज सुनवाई के बाद खंडपीठ ने कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर फर्जी फर्मों, तत्कालीन डीएफओ एपी सिंह और अन्य इसमें सम्मिलित वन विभाग के कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं।

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नैनीताल, 13 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने हल्द्वानी की ठंडी सड़क में दुपहिया वाहन चलाने की अनुमति देने व अपने पूर्व के आदेश में संशोधन करने के प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया है, साथ ही 43 याचिकर्ताओं पर ₹ 25 हजार का जुर्माना भी लगा दिया है।
मामले के अनुसार गुरु गोविंद सिंह चेरिटेबल सोसायटी हल्द्वानी के सचिव गुरुप्रीत सिंह ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हल्द्वानी की ठंडी सड़क में अवैध रूप से वाहन पार्क हो रहे हैं। साथ ही यहां स्थित रेस्टोरेंट, होटल व ढाबों के द्वारा नहर में गंदगी फैलाई जा रही है, जबकि पास के पार्कों में नसेड़ियो व मनचलो का बोलबाला है जो पार्कों में घूमने वाली युवतियो के साथ छेड़छाड़ करते हैं। पूर्व में खंडपीठ ने एसएसपी को निर्देश दिए है वे 24 घंटे के भीतर ठंडी सड़क पर खड़े अवैध वाहनों को हटायें, साथ ही नहर में गंदगी कर रहे ढाबों, होटलो व रेस्टोरेंटों को बंद करायें तथा ठंडी सड़क व पार्कों में पुलिस की गस्त बढ़ाई जाये। खंडपीठ के इस आदेश से प्रभावित ठंडी सड़क क्षेत्र के 43 लोगों ने खंडपीठ को अपने आदेश को संशोधित करने, उन्हें ठंडी सड़क में दोपहिया वाहन ले जाने देने की मांग की थी। खंडपीठ ने उनके प्रार्थना पत्र को निरस्त कर उन पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगा दिया है।

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-हाईकोर्ट ने उन रिसोर्ट मालिकों के खिलाफ 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये हैं जिन्होंने हाथी पाल रखे थे और हाथियों के साथ क्रूर व्यवहार किया जा रहा था

नैनीताल। कार्बेट पार्क व राजाजी नेशनल पार्क से वन गूर्जरों को हटाने व अन्य संबद्ध प्रकरणों में गलत शपथ पत्र पेश कर कोर्ट को गुमराह करने के मामले में अपर मुख्य सचिव रणवीर सिंह ने अदालत से माफी मांगी। साथ ही कोर्ट को यह भी आश्वासन दिया कि वह स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के संबंध में मुख्यमंत्री व वन मंत्री के समक्ष एक प्रस्ताव पेश करेंगे। इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव को 16 अगस्त को पुनः नया शपथ पत्र पेश करने का अवसर प्रदान किया। वहीं दो घंटे चली सुनवाई के दौरान अपन मुख्य सचिव समेत मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक कोर्ट के सवालों पर निरूत्तर रहे। हाईकोर्ट ने वन विभाग के अधिकारियों के प्रति टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय पार्कों में बड़ी संख्या में वन्य जीवों की मौत हो रही है, किन्तु वन विभाग के अधिकारियो में अतिक्रमणकारियेां के प्रति संवेदना है लेकिन निरीह वन्य प्राणियों के प्रति करूणा नहीं है। साथ ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में रामनगर की हिमायलन युवा ग्रामीण संस्था की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने उन रिसोर्ट मालिकों के खिलाफ 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये हैं जिन्होंने हाथी पाल रखे थे और इन हाथियों के साथ क्रूर व्यवहार किया जा रहा था।
खंडपीठ ने इन हाथियों को उचित देखरेख करने के निर्देश देते हुए उनके स्वस्थ होने के बाद ही उन्हें जंगलों में छोड़ने के निर्देश दिये हैं। कोर्ट ने सरकार से कार्बेट के बफर जोन में रह रहे 57 वन गूर्जर परिवारों को विस्थापित करने की समय सीमा भी बताने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि ये गूर्जर जबर्दस्ती कब्जा करके रह रहे हैं इसलिये इन्हें विस्थापित करने की क्या आवश्यकता है। क्यों नहीं दो माह का नोटिस देकर उन्हें हटाया जाये ? खंडपीठ ने 2014 में स्पेशल टाइगर फोर्स के गठन के बाद भी अब तक इस फोर्स की तैनाती नहीं होने पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि यह फोर्स कब तक अस्तित्व में आ जायेगी। खंडपीठ ने नेशनल बाघ संरक्षण प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव जनवरी 2017 में भेजे जाने के बाद भी अब तक इस प्रस्ताव पर कोई कार्यवाही न होने व इस प्रस्ताव को अब तक शिवालिक वन प्रभाग के वन संरक्षक राहुल को 16 अगस्त को कोर्ट में तलब किया है। कोर्ट ने यह भी वन्य जीवों की हत्या करने वाले आरोपियों के खिलाफ चल रहे वादों का निस्तारण छह माह के करने के निर्देश निचली अदालतों को देते हुए उसकी प्रगति रिपोर्ट हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को देने को कहा है।
खंडपीठ ने इस जनहित याचिका में केन्द्रीय परिवहन मंत्रालय व सड़क मंत्रालय को पक्षकार बनाने के निर्देश दिये हैं तथा रेलवे से हाथी कोरिडोर क्षेत्र में रेल ट्रेकों पर अंडर पाथ बनाने व रेल की गति 25 किमी प्रतिघंटा से अधिक नहीं करने को कहा है। न्यायालय ने सरकार को नेशनल पार्कों में कैमरा टैप लगाने की जिम्मेदारी वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को दी है।

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  • हाईकोर्ट के आदेश: फिलहाल पुरानी जगह पर ही डाला जाएगा कूड़ा
  • छह महीने में मौजूदा डंपिंग के बगल में ही वन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई 6 हैक्टेयर भूमि पर 6 माह में बनेगा ट्रीटमेंट प्लांट,
  • फिलहाल कूड़े को फैलने से लगाई जाएगी डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर दीवार,
  • अधिकारी वर्ग उच्च न्यायालय के फैसले से नजर आ रहा है खुश, कूड़ा निस्तारण पर सप्ताह भर से लगी रोक भी हटी

नैनीताल, 18 जुलाई, 2018। हल्द्वानी एवं हल्द्वानी से जुड़े नैनीताल, भवाली, भीमताल, रुद्रपुर आदि क्लस्टर नगरों का कूड़ा फिलहाल पुराने जगह पर ही निस्तारित किया जायेगा। अलबत्ता डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाई जायेगी। मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने बुधवार को नगर निगम हल्द्वानी को छः माह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए समयबद्ध तरीके से कार्य करने के आदेश देते हुए 3 सप्ताह के भीतर वर्तमान डम्पिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाने व 8 सप्ताह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए निविदा आमन्त्रित करने के निर्देश दिये। इस दौरान खंडपीठ ने सरकार से यह भी पूछा कि नैनीताल व हल्द्वानी निकायों के ईओ का स्थानांतरण नियमों के अनुसार तीन साल में क्यों नहीं किया गया। जबकि ये पांच-छः साल से एक ही जगह पर कार्यरत हैं।

इधर बुधवार को उत्तराखंड सरकार ने हल्द्वानी में ट्रंचिंग ग्राउंड बनाने के मामले में उच्च न्यायालय में अपना जवाब पेश किया। बताया कि नगर निगम को कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हेक्टेयर जमीन आवंटित कर दी है। बताया गया है कि वन विभाग द्वारा उपलब्ध करायी गयी यह जगह मौजूदा डंपिंग ग्राउंड से ही तथा इसकी तरह ही गौलापार बाईपास से लगी हुई है।

हाईकोर्ट के ताजा फैसले से अधिकारी वर्ग खुश नजर आ रहा है। न्यायालय के फैसले से जहां कूड़ा निस्तारण पर पिछले सप्ताह भर से लगी रोक भी एक तरह से हट गयी है, सो कूड़ा निस्तारण की तात्कालिक समस्या समाप्त हो गयी है। वहीं कूड़ा निस्तारण के लिए, जैसी की अपेक्षा थी, कहीं सड़क से दूर जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। आगे देखने वाली बात होगी कि छः माह बाद भी प्रशासन व सरकार कूड़े का कैसा ट्रीटमेंट प्लांट बनाते हैं। इससे गौलापार बाईपास से गुजरने वाले और इंद्रा नगर में रहने वाले लोगों को दुर्गंध से निजात मिलती है अथवा नहीं।

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  • हल्द्वानी-नैनीताल के कूड़ा निस्तारण को वन विभाग व सरकार से जवाब तलब करने के बाद विभाग ने निगम को हस्तांतरित की 4 हेक्टयर वन भूमि
  • अपर प्रमुख वन संरक्षक को 24 घंटे के भीतर कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हैक्टेयर जमीन नगर निगम को हस्तांतरित करने को कहा
  • सरकार से ठोस कूड़े को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने के लिए प्लान्ट लगाने के प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा
  • नैनीताल नगर पालिका के ईओ को हटाने को भी कहा

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने हल्द्वानी के वर्तमान ट्रंचिंग ग्राउंड में नगर निगम को कूड़ा डालने की अनुमति नही दी। अलबत्ता प्रदेश के अपर प्रमुख वन संरक्षक को 24 घंटे के भीतर कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हैक्टेयर जमीन नगर निगम को हस्तांतरित कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने तथा राज्य सरकार से ठोस कूड़े को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने के लिए प्लान्ट लगाने के प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। इसके अलावा न्यायालय की खंडपीठ ने कूड़ा निस्तारण पर यथोचित काम नहीं करने के लिए नैनीताल नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी को स्थानांतरित करने की बात भी कही।

इस आदेश के करीब 4 घंटे में ही हल्द्वानी-नैनीताल के कूड़ा निस्तारण को वन विभाग ने निगम को 4 हेक्टयर वन भूमि इसका केवल ठोस कूड़े का ही प्रबंधन करने सहित 20 शर्तों के साथ 30 वर्षों के लिये लीज पर हस्तांतरित कर दी है। उल्लेखनीय है कि पहले कई दशकों से गौला नदी में राजपुरा के पास और वहां विरोध के बाद इधर मार्च 2012 से गौलापार बाईपास पर हल्द्वानी का व इधर करीब 6 माह से नैनीताल, भवाली, भीमताल व रुद्रपुर का कूड़ा भी डाला जा रहा था।

उल्लेखनीय है कि नगर निगम हल्द्वानी ने सड़कों व गलियों में फैले कूड़े के निरस्ताण के लिए जनहित याचिका में रिकॉल प्रार्थना पत्र-पुर्नविचार याचिका देकर ट्रंचिंग ग्राउंड में कूड़ा डालने की अनुमति मांगी थी, परंतु खंडपीठ ने नगर निगम को कूड़ा निरस्तारण की अनुमति नही दी है। मामले के अनुसार हल्द्वानी के इंदिरा नगर जनविकास समिति ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमे कहा गया था कि नगर निगम हल्द्वानी शहर का समस्त एवं मेडिकल कूड़ा कूड़ा इंदिरा नगर व गौला नदी के पास डाला जा रहा है। इसके आस पास लगभग 3 हजार लोग निवास करते है। इससे कभी भी कोई महामारी होने की आशंका बनी रहती है। बस्ती में कूड़ा डाला जाना नियम विरुद्ध है। वर्ष 2017 में खंडपीठ ने इस क्षेत्र में कूड़ा डालने पर रोक लगा दी थी, फिर भी नगर निगम द्वारा हल्द्वानी, नैनीताल, भवाली व रुद्रपुर का कूड़ा यहां डम्प किया जा रहा है। 10 जुलाई 2018 को खंडपीठ ने इस क्षेत्र में कूड़ा डालने पर पुनः रोक लगा रखी है। वहीं नगर निगम ने अपने प्रार्थना पत्र में कहा है कि उन्होंने ट्रंचिंग ग्राउंड के लिये वन विभाग से अनुमति मांगी है, लेकिन वन विभाग से अभी तक अनुमति नही मिली है। जबकि उन्होंने इसके एवज में पेड़ लगाने के लिए वन विभाग को 15 लाख रूपये भी दे दिए है।

बहुउद्देश्यीय सहकारी समिति रैतोली बेरीनाग का चुनाव न कराए जाने पर निबंधक से जवाब तलब

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बहुउद्देश्यीय सहकारी समिति रैतोली बेरीनाग का चुनाव न कराए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सहकारी समिति के निबंधक को 31 जुलाई तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार बहुउद्देश्यीय सहकारी समिति रैतोली बेरीनाग के सदस्य बाला दत्त धारियाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि पिथौरागढ़ के रजिस्ट्रार कॉपरेटिव ने अपने आदेश में कहा है कि बहुउद्देश्यीय सहकारी समिति रैतोली बेरीनाग का दूसरी संस्था में विलय किये जाने की प्रक्रिया गतिमान है। जबकि याचिकाकर्ता ने रैतोली समिति का चुनाव अन्य समितियों के साथ कराए जाने की मांग की थी।

ठोस कूड़े के प्रबंधन पर हाईकोर्ट से हल्द्वानी, गरुड़, ऋषिकेश, मुनि की रेती स्वर्गाश्रम, नरेंद्र नगर व स्वर्गाश्रम के लिए आये बड़े फैसले

1-हल्द्वानी नगर निगम को छह माह में ठोस कूडे़ के लिए डंपिंग ग्राउंड बनाने के निर्देश

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हल्द्वानी नगर निगम को छह माह में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए डंपिंग ग्राउंड बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही गौला नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए निर्देश दिए हैं कि वर्तमान डंपिंग ग्राउंड में कूड़ा निस्तारित न करने के निर्देश दिए हैं।
हल्द्वानी की जन विकास समिति की ओर से कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। जिसमें कहा गया कि इंदिरानगर में मेडिकल वेस्ट फेंका जा रहा है और इससे लोगों को नुकसान हो रहा है। साथ ही इससे गौला नदी भी प्रदूषित हो रही है। वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। जिसे सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि सरकार छह माह में हल्द्वानी में डंपिंग ग्राउंड बनाए। यह भी कहा गया कि जब तक डंपिंग ग्राउंड स्थापित नहीं होता है तबतक वर्तमान जगह पर कूड़ा निस्तारित न किया जाए। इसके साथ ही पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सरकार बायो मेडिकल वेस्ट रूल्स के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे। ऐसे अस्पतालों, लेबोरेट्री और क्लीनिकों का पंजीकरण निरस्त करें। सरकार तीन माह में राज्य स्तरीय व जिलास्तरीय मॉनीटरिंग कमेटियों का गठन करे। इसके साथ ही उल्लंघन करने वालों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई करें। वहीं, हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी निकायों को निर्देश दिए कि गर्मियों में सुबह छह बजे और सर्दियों में सुबह सात बजे से पहले कूड़ादानों और डंपरों को खाली किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि कूड़ेदानों-डंपरों से कूड़ा बाहर न गिरे। खंडपीठ ने रात की अवधि में काम करने वाले कर्मचारियों को आवश्यक उपकरण भी उपलब्ध कराने को कहा है।

2- गरुड़ में कूड़ा निस्तारण के लिए टचिंग ग्राउंड बनाने के निर्देश

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को गरुड़-बागेश्वर में कूड़ा निस्तारण के लिए तीन माह के भीतर टचिंग ग्राउंड बनाने के लिए आवश्यक अनुमति देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही जिला अधिकारी बागेश्वर को कूड़ा निस्तारण हेतु केंद्रीय नियमावली सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 में उल्लेखित प्रावधानो के अनुसार कर्तव्य निर्वहन के आदेश दिए हैं।
गरुड़ निवासी अधिवक्ता डीके जोशी की जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने जिला पंचायत बागेश्वर को निर्देश दिए हैं कि वह वैज्ञानिक तरीके से कूड़े का निस्तारण करे और गरुड़ बाजार व उसके आस पास के क्षेत्र को स्वच्छ रखे। इसके साथ ही खंडपीठ ने राज्य सरकार को नगर पालिका परिषद बागेश्वर को टंªचिंग ग्राउंड हेतु जमीन आवंटित करने के निर्देश दिए हैं, और टंªचिंग ग्राउंड के लिए डीपीआर तैयार करने के आदेश सरकार को दिए हैं। इसके अलावा ग्राम पंचायत सीली, पाये, नौघर, गरसेर व फुलवारीगुर को निर्देश दिए है कि वे गोलू मार्किट से लगी हुई गरुड़ गंगा के किनारे कूड़ा ने डालें।

3- ऋषिकेश, मुनि की रेती स्वर्गाश्रम, नरेंद्र नगर व स्वर्गाश्रम के लिए एसडब्लूएम प्लांट स्थापित करने के निर्देश

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने ऋषिकेश, मुनि की रेती स्वर्गाश्रम जोंक नरेंद्र नगर व डोईवाला कस्बों के कूड़ा निस्तारण के लिए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए तीन माह के भीतर भूमि आवंटित करने तथा प्लांट स्थापित करने के निर्देश दिए हैं।
मामले के अनुसार ऋषिकेश निवासी आरपी पंवार ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ऋषिकेष के मुनि की रेती से सात सौ मीटर दूरी पर कूड़ा निस्तारित किया जाता है, जिसकी गंदगी गंगा नदी में जाती है और वही पास में शैक्षणिक संस्थान भी है जिससे वहाँ का वातावरण प्रदूषित रहता है। याची ने सरकार पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 का पालन नही कराने का आरोप भी लगाया है। इस मामले में सरकार ने हाईकोर्ट में शपथपत्र देकर कहा कि ऋषिकेश में डोईवाला, मुनि की रेती, नरेद्र नगर व स्वर्गाश्रम आदि कस्बों के लिए सामूहिक रूप से एक सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बनाने की डीपीआर तैयार की जा रही है। याचिका को निस्तारित करते हुए न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने सरकार से तीन माह के भीतर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट की डीपीआर तैयार करने व छः माह के भीतर प्लांट लगाने के आदेश दिए हैं।

विधायक पूरन फर्त्याल को विदेश जाने के लिए हरी झंडी

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने लोहाघाट के विधायक पूरन फर्त्याल को विदेश जाने के लिए हरी झंडी दे दी है। नैनीताल हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार कर उनको पासपोर्ट देने के आदेश दिए हैं। दरअसल अगस्त के पहले हफ्ते में उत्तराखंड सरकार के एक दल को इंग्लैंड, स्वीट्जरलैंड व जर्मनी के दौरे पर जाना है। इस दल में लोहाघाट के विधायक पूरन फर्त्याल को भी जाना है। वहां यह दल ऋषिकेश, देहरादून, हरिद्वार में मेट्रो लाइन व रोप वे सेवा शुरू करने के लिए अध्ययन करेंगा। मगर जब विधायक पूरन फर्त्याल ने पासपोर्ट कार्यालय में अपने नाम को ठीक करने का आवेदन किया तो पासपोर्ट कार्यालय ने उनको विदेश जाने से मना कर दिया क्योंकि उन पर एक मुकदमा निचली अदालत में चल रहा है, और निचली अदालत ने उनको विदेश जाने की अनुमति नही दी है। इधर 6 जुलाई को निचली अदालत ने उनके प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया था, जिसके बाद पूरन फर्त्याल ने हाई कोर्ट की शरण ली, जहां से उनको न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने विदेश जाने की अनुमति के आदेश दे दिए है ।

मेडिकल कॉलेजों पर फीस वृद्धि पर छात्र-छात्राओं को बड़ी राहत, कॉलेजों को झटका

1- आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में बीएमएस की फीस वृद्धि का शासनादेश रद्द

-80 हजार रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2.15 लाख रुपये कर दी गई थी फीस
नैनीताल, 9 जुलाई 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय से प्रदेश के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से बीएमएस कर रहे छात्र-छात्राओं को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने बीएमएस की फीस वृद्धि के शासनादेश को रद्द कर दिया है, वहीं कॉलेजों को जमा कराई गई बढ़ी फीस की राशि को 15 दिन में वापस करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की।
मामले के अनुसार हिमालयन आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज देहरादून के छात्र रजत राणा, यश सैनी व ललित तिवारी सहित 104 छात्र-छात्राओं ने इस मामले में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इसमें सरकार के फीस वृद्धि के 14 अक्तूबर 2015 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में फीस 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2.15 लाख रुपये कर दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि मेडिकल कॉलेज के प्रॉस्पेक्टस में 80 हजार रुपये सालाना फीस निर्धारित होने की जानकारी दी गई है। इधर सरकार ने फीस निर्धारण के लिए स्थायी कमेटी के गठन का ऐलान किया था, लेकिन कमेटी गठित नहीं की गई। इसके बावजूद फीस वृद्धि कर दी गई। बढ़ी हुई फीस नहीं देने पर जुर्माना भी लिया जा रहा है। इसके खिलाफ याचिका दायर करने वालों में वर्ष 2013-14, 14-15 व 15-16 बैच के मेडिकल छात्र शामिल थे। अदालत ने पहले हुई सुनवाई में अधिक फीस लेने पर रोक लगा रखी थी। इधर सोमवार को हुई सुनवाई के बाद सरकार के इस मामले में जारी शासनादेश को रद कर दिया है।

2- श्रीगुरु राम राय मेडिकल कॉलेज में फीस वृद्धि के नोटिफिकेशन पर भी रोक

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून के श्री गुरु राम राय मेडिकल कॉलेज में फीस वृद्धि के नोटिफिकेशन पर भी रोक लगा दी है। सरकार ने 12 मई 2018 को फीस वृद्धि का नोटिफिकेशन जारी किया था। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की।
मामले के अनुसार उत्तराखंड उच्च न्यायालय में देहरादून निवासी नामती रतूड़ी एवं 79 अन्य छात्र-छात्राओं की ओर से यह याचिका दायर की गई थी। इसमें याचियों ने कहा था कि उन्होंने वर्ष 2017 में नीट की परीक्षा उत्तीर्ण की है। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग के एचएन बहुगुणा विवि के स्तर से 16 से 21 जुलाई तक काउंसिलिंग की गई थी। इसके बाद सरकारी कोटे में चयनित से चार लाख तथा मेनेजमेंट कोटे वालों से पांच लाख का बैंक ड्राफ्ट लिया गया। इसके बाद याचियों ने श्री गुरु राम राय यूनिवर्सिटी व मेडिकल एंड हेल्थ साइंस कॉलेज देहरादून में प्रवेश लिया। 15 जुलाई 2017 को जारी हुए नोटिफिकेशन में प्रतिवर्ष 4 लाख रुपये ट्यूशन फीस तथा 2.32 लाख रुपये होटल व मेस के खर्च में रूप में तय किया गया था। इधर सरकार ने 12 मई 2018 को नोटिफिकेशन जारी कर फीस में 45 हजार रुपये की वृद्धि कर दी है। इसके बाद सरकारी कोटे की फीस 6 लाख 97 हजार रुपये तथा मैनेजमेंट कोटे की फीस 7 लाख 97 हजार रुपये कर दी है, जोकि न्याय संगत नहीं है। इस पर सुनवाई के बाद एकलपीठ ने कॉलेज में फीस वृद्धि के लिए 12 मई 18 को जारी शासनादेश पर रोक लगा दी है।

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  • स्वच्छ भारत अभियान के तहत मृत व्यक्तियों और पहले से शौचालयों वाले परिवारों को आवंटित कर दिये शौचालय, तथा पूरा पैंसा भी नहीं दिया

नैनीताल, 22 जून 2018। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में देश में स्वच्छ भारत अभियान चलाया, और इसके तहत हर परिवार, खासकर गरीब-बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था भी की। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। लेकिन देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के कुछ, कुछ भी ‘खा’ सकने वाले दानव सदृश अधिकारी न केवल शौचालयों का पैंसा खा गये, वरन उन्होंने इसके लिये दानवों की तरह ही मृत लोगों का ‘शौच’ खाने से भी परहेज नहीं किया। डीएम के स्तर से जांच में इन तथ्यों की पुष्टि हुई किंतु इसके बाद भी दोषी दानव अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय में आया तो न्यायालय में प्रदेश के मुख्य सचिव को ऐसे दोषी अधिकारियों के खिलाफ एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने व एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये हैं।
मामले के अनुसार विकास नगर देहरादून निवासी व्यक्ति सुंदर लाल सैनी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में भारत को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान योजना चलाई थी जिसके तहत बीपीएल परिवारो के लिए सुलभ शौचालयों का निर्माण किया जाना था। योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार को सुलभ शौचालय बनाने के लिए बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था थी। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। याची का आरोप था कि सरकार के अधिकारियों ने शौचालय उन लोगो को आवंटित कर दिए, जिनके पास पहले से शौचालय थे। साथ ही ऐसे लोगों के नाम पर भी शौचालय आवंटित दर्शा दिये गये, जो कि मर चुके थे। तथा कई को पूरा पैसा नहीं दिया। इसकी शिकायत लोगों ने जिला अधिकारी देहरादून से की। जिलाधिकारी देहरादून ने इसकी जांच तहसीलदार विकास नगर से कराई। तहसीलदार ने शिकायत को सही मानते हुए जाँच रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौपी। इसके बावजूद कोई कार्यवाही नही होने के कारण याची ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। मामले को सुनने के बाद वरिष्ठ न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने जनता के पैसांे का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मुख्य सचिव को एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने, तथा एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये, तथा जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के 25 अप्रैल 2018 के ट्रान्सफर आदेश पर लगाई रोक

नैनीताल, 1 जून 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के 25 अप्रैल 2018 के ट्रान्सफर आदेश पर रोक लगा दी है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार पुष्पा सोनी निवासी कंडोला देहरादून व 150 अन्य ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि 21 दिसम्बर 2016 को कांग्रेस सरकार ने अध्यापकों के व्यक्तिगत अनुरोध व पारिवारिक समस्याओं को देखते हुए करीब 450 अध्यापकों का स्थानान्तरण दुर्गम से सुगम क्षेत्रों में कर दिया था। साथ में आदेश में यह शर्त भी थी कि उक्त निर्धारित समय बीत जाने के बाद उनको अपने मूल विद्यालयों में जाना होगा। परन्तु अभी तक वे वापस नहीं गए। वर्तमान सरकार ने 25 अप्रैल 2018 को एक आदेश जारी कर पर्वतीय जिलों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए और शिक्षा का स्तर निम्न होने के कारण उनका ट्रांसफर उनके मूल विद्यालय में कर दिया और यह भी कहा कि जो अध्यापक 31 मई 2018 तक ज्वाइन नही करते हैं तो उनका जून माह का वेतन रोक दिया जाये। इस आदेश को याचिकर्ताओं ने हाई कोर्ट में विभिन्न याचिकाओं के द्वारा चुनौती दी। मामले को सुनने के बाद न्यायाधीश लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने सरकार के 25 अप्रैल 2018 के आदेश पर रोक लगा दी है।

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उच्वन्यायालय ने दिए केंद्र सरकार को कैट की स्थाई बेंच स्थापित करने के निर्देश

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने केंद्र सरकार को उत्तराखंड में तीन माह के भीतर कैट यानी केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal) की स्थापना करने के निर्देश दिये हैं। उल्लेखनीय है कि नैनीताल जनपद के ओखलकांड़ा निवासी डाक विभाग से सेवानिवृत्त हरीश चन्द्र जोशी ने उच्च न्यायालय  में याचिका दायर कर कहा है कि उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन व अन्य लाभ नहीं दिए जा रहे हैं। एकलपीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान इस मामले को कैट को संदर्भित करने के आदेश दिये, साथ ही केंद्र सरकार से नैनीताल में कैट की स्थाई बैंच बनाने पर निर्णय लेने को भी कहा। सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने यह भी कहा कि राज्य में डाक विभाग, सर्वे आफ इंण्डिया, रेलवे व आइएमए सहित कई केंद्रीय विभाग स्थित हैं, जिनके मामलों की सुनवाई हेतु यहां कोई स्थायी बैंच नहीं है। इस कारण कई वर्षों से अनेक मामलों का निस्तारण नही हो पा रहा है। कैट की बैंच साल में तीन या चार बार ही आती है। जबकि अन्य समय में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए वादकरियों को दिल्ली या लखनऊ जाना पड़ता है, या कैट के बैंच के नैनीताल आने का इंतजार करना पड़ता है। इससे वादकरियों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है।

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उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षक पद के लिए बाहरी राज्यों से किया गया दो वर्षीय डीएलएड डिप्लोमा भी मान्य होगा। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति शरद शर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने राज्य सरकार की एकलपीठ के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील को खारिज कर एकलपीठ के फैसले को सही ठहराया है।  उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी हरीश चन्द्र  ने राज्य सरकार के ‘प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती में प्रदेश के बाहर से डीएलएड को अमान्य करने के आदेश तथा शिक्षक सेवा नियमावली 2012 व संशोधन नियमावली 2013 को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याची का कहना था कि उसके पास दिल्ली के मान्यता प्राप्त संस्थान से प्राथमिक शिक्षा में दो वर्षीय डिप्लोमा है। साथ ही वह टीईटी भी उत्तीर्ण है। इधर जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक नैनीताल और उधमसिंह नगर ने शिक्षकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे हैं। जुलाई 2016 में प्रकाशित इस विज्ञप्ति में संबंधित जिले के डायट से डीएलएल अनिवार्य किया गया है जोकि न्याय संगत नहीं है। सरकार का यह कदम एनसीटीई के निर्धारित योग्यता के प्राविधान का भी उल्लंघन है। एकलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने के आदेश दिए थे। सितंबर 2017 के इस आदेश को सरकार ने स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी थी। संयुक्त खंडपीठ ने भी मामले की सुनवाई के बाद एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है और स्पेशल अपील खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद प्रदेश से बाहर से मान्यता प्राप्त संस्थानों से डीएलएल करने वाले अभ्यर्थी प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे।

कांग्रेस सरकार  में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 निरस्त

नैनीताल, 17 अप्रैल 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने सीधी भर्ती के पदों पर संविदा व अस्थायी कर्मचारियों की बजाय नियमित भर्ती करने के आदेश पारित किए हैं। न्यायालय के फैसले से राज्य के करीब 5000 से अधिक सरकारी नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों की नौकरी संकट में पड़ गई है। हालांकि सरकार के पास एकलपीठ के फैसले के खिलाफ अपील और नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों को नियमित भर्ती में अधिमान अंक देने के विकल्प मौजूद हैं।

उल्लेखनीय है कि 30 दिसंबर 2016 को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को मंजूरी प्रदान की थी। इसके तहत 2011 में नियुक्त हुए और 5 साल पूरे कर चुके अस्थायी व संविदा कर्मचारियों को नियमितीकरण का हकदार बना दिया गया। इस नियमावली के प्रभावी होने के बाद राज्य के तमाम विभागों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों को सीधी भर्ती वाले पदों पर नियमित कर दिया गया। इस नियमावली से करीब 5000 से अधिक कार्मिक लाभान्वित हुए।

सरकार की इस नियमावली को हल्द्वानी के बेरोजगार हिमांशु जोशी ने चुनौती दी। उनका कहना था कि सरकार अस्थायी कार्मिकों को सीधी भर्ती के पदों पर नियमित नहीं कर सकती। सीधी भर्ती के पदों पर नियमितीकरण से युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं, लिहाजा नियमावली को निरस्त किया जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार द्वारा 2013 और फिर 2016 में विनियमितीकरण सेवा नियमावली बनाई गई। यह सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ है। सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में दलील दी गई कि उमा देवी मामले से कहीं भी अस्थायी कार्मिकों का नियमितीकरण करने से रोक नहीं लगाई है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मंगलवार 17 अप्रैल 2018 को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सरकार की विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया।

अधिमान व आयु में छूट दे सकती है सरकार

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि नियमावली निरस्त होने से प्रभावित होने वाले कार्मिकों को सरकार सीधी भर्ती के पदों में नियुक्ति प्रक्रिया में अधिमान में तथा आयु में छूट दे सकती है।

यह है उमा देवी प्रकरण

2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी कर्मी उमा देवी से संबंधित मामले में अहम फैसला दिया था। इसमें कहा था कि दस अप्रैल 2006 तक जिन लोगों को अस्थायी तौर पर काम करते हुए दस साल हो चुके हैं, वह बिना न्यायालय के आदेश के यदि नियमित न हुए हों तो सरकार उन्हें नियमित करने के लिए एक बार नियम बना सकती है। मगर उत्तराखंड में 2011, 2013 फिर 2016 में विनियमितीकरण नियमावली को कैबिनेट ने मंजूरी प्रदान की।

पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी सरकार : कौशिक

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जहां राज्य में हजारों की संख्या में नियमित और नियमितीकरण की बाट जोह रहे कर्मचारियों को झटका लगा है, वहीं राज्य सरकार भी सकते में है। इस बारे में अग्रिम कानूनी विकल्प तलाशे जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह कर्मचारियों के साथ है और कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी। सरकार के प्रवक्ता एवं काबीना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। इसका अध्ययन कर आगे की तैयारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों के साथ है और इस आदेश के सिलसिले में रिव्यू में जाएगी।

पुलिस कर्मियों की तरह होमगार्डों को भी दैनिक भत्ते देने के आदेश 

-एकलपीठ का आदेश बरकरार, राज्य सरकार से आठ सप्ताह में इस पर विचार करने को कहा
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार से उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आधार पर होमगार्डो को पुलिस वालो की तरह दैनिक वेतन भत्ते के लिए 8 सप्ताह के भीतर विचार करने को कहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश केएम जोसफ व न्यायधीश शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ में हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी शिव प्रसाद एवं अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर होमगार्डों को भी पुलिस वालो की तरह वेतन भत्ते दिए जाय। इस पर पूर्व में उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि होमगार्डो को भी पुलिस के सामान वेतन व अन्य सुविधाए दिये जायें। इस आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। जिस पर आज सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है।

यह भी पढ़ें : केदारनाथ के लिये हैली सेवा की निविदा प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती

-प्रक्रिया पर उठाए कई गंभीर सवाल
नैनीताल। उत्तराखंड सरकार द्वारा केदारनाथ धाम के लिये हैलीकॉप्टर सेवा शुरु करने के लिए आमंत्रित की गयी निविदाओं की प्रक्रिया को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। वहीं उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने इस मामले को स्वयं सुनने से इंकार करते हुये याचिका को अन्य बैंच को संदर्भित कर दिया है। अब मुख्य न्यायाधीश किसी अन्य बैंच को यह मामला संदर्भित करेंगे, जो पूरे मामले की सुनवाई करेगी।
केदारघाटी के त्रियुगीनारायण हैलीपैड के संचालक राजीव धर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सरकार की निविदा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इसे निरस्त करने व नए सिरे से निविदाएं आमंत्रित करने तथा निविदाओं की वित्तीय बिड खोलने पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि सरकार द्वारा 9 ऑपरेटरों को प्रक्रिया में शामिल करने के लिए निविदा की शर्तें तय की हैं, यहां तक कि अनुभव की शर्तों में छह बार संशोधन कर दिया गया है। वहीं उन्हें प्रक्रिया से बाहर करने के लिए कंपनी का हेलीकॉप्टर पहाड़ों या उत्तराखंड में दो साल तक दुर्घटनाग्रस्त नहीं होने की शर्त लगा दी गयी, जिसकी कोई तुक नहीं हो। ऐसी किसी शर्त में पहाड़ या उत्तराखंड के बजाय पूरे देश में दुर्घटना न होने की शर्त होनी चाहिए थी। याचिका में यह भी कहा गया है केदारनाथ के मंदाकिनी घाटी में 14 हैलीपैड हैं। इनमें से गुप्तकाशी, फाटा, सिरसी, गोविंदघाट व गंगरिया हेलीपैड से पहले से उड़ानें होती रही हैं, जबकि इस बार सिरसा, गुप्तकाशी व फाटा के तीन रूट बनाए गए हैं, त्रिजुगीनारायण को भी छोड़ दिया गया है। जबकि यहां से केदारनाथ की उड़ान नजदीक भी होती है।

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नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक गाँव के ग्रामीणों को दैवीय आपदा का मुआवजा न देने पर सरकार से चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है। खास बात यह है कि इस गाँव को पूर्व में राष्ट्रपति द्वारा इस गांव को पुरस्कृत भी किया गया था।

मामले के अनुसार विजय राम भट्ट निवासी ग्राम कठुर तल्ला ब्लाक भिलंगना टिहरी गढ़वाल ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सन् 2016 में ग्राम कठुर तल्ला क्षेत्र में दैवीय आपदा आई थी गांव वालों का आरोप था कि जितना नुकसान हुआ था उनको उसका उचित मुआवजा नही दिया गया। जो मुआवजा दिया गया उसका अधिकांश भाग सरकारी फाइलों में ही दिया गया जबकि क्षेत्र का अधिकांश भाग सतिग्रस्त हो गया था। पूर्व में राष्ट्रपति द्वारा इस गांव को पुरस्कृत भी किया गया था। मामले को सुनने के बाद मुख्य न्यायधीश केएम जोसेफ व न्यायाधीश शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने सरकार से चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के बाद की नियत की है।

निलंबित सिविल जज दीपाली शर्मा की गिरफ्तारी पर रोक

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार की निलंबित सिविल जज दीपाली शर्मा की गिरफ्तारी से रोक सम्बंधित याचिका में सुनवाई करते हुए उनको फिलहाल राहत दी है और उनसे जाँच में सहयोग करने को कहा है। उल्लेखनीय है कि सुश्री शर्मा ने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद याची से सरकार के जवाब पर प्रतिशपथ पत्र पेश करने को कहा है, और अगली सुनवाई के लिए 6 अप्रैल की तिथि नियत की है।
बुधवार को मामले की जांच कर रहे जांच अधिकारी कोर्ट में पेश हुए। वहीं याची के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि दीपाली शर्मा के पिता का स्वास्थ्य ठीक नही होंने व दिल्ली के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती होने के कारण वे दो दिन जाँच में सहयोग नही कर सकतीं, लिहाज उनको समय दिया जाये। कोर्ट ने जांच अधिकारी को आदेश दिए कि उनके बयान एएसपी रैंक से ऊपर की महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में सूरज उगने के बाद व डूबने से पहले लिये जाएँ। उल्लेखनीय है सिविल जज सुश्री शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने नाबालिग लड़की को अपने पास रख कर प्रताड़ित किया व शाररिक चोट पहुचाई। मुख्य न्यायाधीश से शिकायत किये जाने पर मुख्य न्यायधीश ने जिला जज हरिद्वार को इस मामले जांच करने के लिए कहा गया था। जांच सही पाये जाने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए थे । 

एनएच 74 मामले में फंसे तहसीलदार ने कहा, अधिकारियों के आदेश पर किया

नैनीताल। एनएच 74 मामले में बड़े अधिकारी फंस सकते हैं। मामले में फंसे एक आरोपित काशीपुर के प्रभारी तहसीलदार मदन मोहन पलड़िया ने उच्च न्यायालय में बुधवार को कहा कि उन्होंने जो भी किया, वह अधिकारियों के आदेशों पर किया। उन्हें मामले में फंसाया जा रहा है। उत्तराखंड हाई कोर्ट में की जमानत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए इस मामले में सरकार से 2 अप्रैल तक जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बीके बिष्ट की एकलपीठ में हुई। अगली सुनवाई 2 अप्रैल की तिथि नियत की है। आरोपित का कहना था कि उन्होंने इस केस में अपने अधिकारियों के आदेशों का पालन किया है। उनको बेवजह फंसाया जा रहा है। इससे विपक्ष द्वारा राज्य सरकार पर बड़े अधिकारियों को बचाने के आरोपों की भी एक तरह से पुष्टि होती है।

 

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड