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उत्तराखंड में एक वरिष्ठ अधिकारी को जबरन किया सेवानिवृत्त, अपनी तरह का पहला मामला

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नवीन समाचार, नैनीताल, 19 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पहली बार कार्य में लेटलतीफी सहित अन्य कारणों से एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी को 50 वर्ष की आयु में जबरन सेवानिवृत्ति दे दी है। हाई कोर्ट की स्थापना के बाद किसी वरिष्ठ न्यायिक अफसर को जबरन रिटायर करने का यह पहला मामला है। हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से देहरादून की स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष राजीव कुमार को जबरन रिटायर करने की सिफारिश शासन को भेजी। शासन ने मामला राज्यपाल को रेफर कर दिया। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी की ओर से रिटायरमेंट का आदेश जारी कर दिया। 12 सितंबर को जारी आदेश में कहा गया है कि उत्तराखंड उच्चतर न्यायिक सेवा नियमावली-2004 (यथा संशोधित-2016) के नियम-25 क में उल्लेखित व्यवस्था के आधार पर राज्यपाल द्वारा लोकहित में स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष राजीव कुमार 30 सितंबर को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। बताया गया है कि भारत सरकार ने देश के अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों के 50 साल, 55 साल व 58 साल में कामकाज का आकलन करते हुए जबरन रिटायर करने का प्राविधान निकाला है। कामकाज के आकलन में अफसर की कार्यप्रणाली समेत अन्य परफार्मेस का फीडबैक लिया जाता है। 

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नवीन समाचार, देहरादून, 2 सितंबर 2019। उत्तराखंड के  बहुचर्चित राजधानी देहरादून के नारी निकेतन में मूक बधिर युवतियों के साथ दुष्कर्म और गर्भपात मामले में अदालत ने सभी नौ आरोपियों को दोषी करार दिया है। उत्तराखंड के चर्चित नारी निकेतन यौन शोषण मामले में कोर्ट ने आज दोषियों को सजा सुनाई। मुख्य आरोपी गुरदास को 7 साल की सजा और 30 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया है। वहीं, हासिम व ललित बिष्ट को 5-5 साल की कैद और 10-10 हजार रुपये का जुर्माना तथा निगार, चंद्रकला, किरण व अनिता मैंदोला को 4- 4 साल की कैद 10-10 हजार जुर्माना, मीनाक्षी पोखरियाल व कृष्णकांत को 2- 2 साल की सजा और 5-5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। वहीं मीनाक्षी और कांछा को जमानत मिल गई है।
बता दें कि 2015 में नारी निकेतन में मूक बधिर संवासिनी से दुष्कर्म, गर्भपात कराने और भ्रूण को ठिकाने लगाने के आरोप में अदालत ने 30 अगस्त को सभी नौ आरोपियों को दोषी करार दिया था। अपर जिला जज षष्ठम धर्म सिंह की अदालत ने आज सजा का एलान किया। दोषी करार हुए आरोपियों में तत्कालीन अधीक्षिका समेत 9 लोग शामिल हैं। ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट ने दुष्कर्म के मुख्य आरोपी गुरुदास को 7 साल की सज़ा और 10 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया, मालिक, हासिम और ललित बिष्ट को पाँच-पाँच साल की सज़ा और 10-10 हज़ार का जुर्माना तो वहीं मामले में शामिल चारों महिलाओं को 4-4 साल की सज़ा सुनाई है। मामले में तत्कालीन मुख्य अधिक्षिका मीनाक्षी पोखरियाल को 2 साल की सज़ा व 5 हज़ार का जुर्माना लगाया है। 23 लोगो की गवाही के बाद आखिरकार संवासनियों को इंसाफ मिल गया  फैक्स के आधार पर शुरुआत में साक्ष्य के तौर पर पुलिस के पास केवल फैक्स था जिसके बाद जांच शुरू की गई और 4 साल की चली जांच के बाद आखिरकार संवासनियों से दुष्कर्म  व गर्भपात कराने में  9 लोगों को अदालत ने दोषी पाया है।

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कारण सरकार का इस मुद्दे पर ढुलमुल रवैया

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पदोन्नति में आरक्षण पर बड़ा फैसला दिया है। इसके प्रभाव में राज्य सरकार को मंगलवार को होने वाली पुलिस के अधिकारियों की डीपीसी में आरक्षण के प्राविधानों का लाभ देना ही होगा, और आगे भी पदोन्नति में आरक्षण देने को बाध्य होना पड़ सकता है। इसका कारण सरकार का इस मुद्दे पर ढुलमुल रवैया होना बताया जा रहा है। क्योंकि कानूनी प्राविधान तो पदोन्नति में आरक्षण देने के हैं, परंतु सरकार बिना प्राविधानों को नियमानुसार बदले पदोन्नति में आरक्षण नहीं दे रही है। कारण, सरकार किसी भी पक्ष को पूरी तरह से नाराज नहीं करना चाहती है।
मामले के अनुसार पुलिस विभाग में एडीशनल एसपी जसवीर सिंह ने उच्च न्यायालय में प्रत्यावेदन दिया था कि मंगलवार 27 अगस्त 2019 को होने वाली एसपी पद की डीपीसी में उन्हें पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देते हुए शामिल नहीं किया जा रहा है। इस पर खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि सरकार का 21 जनवरी 2006 का आदेश पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था देता है। इस आदेश पर 5 सितंबर 2012 के आदेश से रोक लगाई गई, किंतु इस आदेश पर एकल पीठ ने एक अप्रैल 2019 के आदेश ने रोक लगा दी थी, क्योंकि यह सर्वोच्च न्यायालय के इंदिरा साहनी व जरनैल सिंह के मामलों में आये फैसलों के खिलाफ था। इसलिये 5 सितंबर 2012 के आदेश पर रोक लगने से 21 जनवरी 2006 का आदेश प्रभावी हो जाता हैं। इसलिए याचिकाकर्ता को भी मंगलवार को होने वाली डीपीसी में पदोन्नति में आरक्षण का लाभ मिलेगा। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हरिमोहन भाटिया ने पैरवी की।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 अगस्त 2019। डोइवाला चीनी मिल से मात्र 20-22 किमी की दूरी पर स्थित सचिवालय में डाक छोड़ने के लिए मिल के कर्मचारियों ने 65 से 70 लाख रुपए खर्च कर दिये। इस मामले में दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ ने अगले सोमवार तक सरकार व गन्ना आयुक्त से जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी संतराज सिंह ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सचिवालय से डोईवाला चीनी मिल की मात्र 20 से 22 किलोमीटर की दूरी तक डाक छोड़ने के लिए प्रत्येक दिन आठ बजे आठ से नौ कर्मचारी सचिवालय जाते थे और रात को आठ बजे वापस आते थे, और इसका उन्होंने अब तक करीब 65 से 70 लाख हो गया है। सन 2014 में इसकी शिकायत विजिलेंस से की गयी जिसकी जाँच सही पाई गयी और दोषी कर्मचारियों व अधिकारियो के खिलाफ विभागीय जाँच करने के आदेश दिए गए थे, परंतु बड़े अधिकारियो की मिलीभगत होने के कारण इस जाँच पर कोई कार्यवाही नही हुई। याचिकर्ता का कहना है कि इसकी जांच कराई जाय।

यह भी पढ़ें : डीएम ने की ब्लॉक प्रमुख को निलंबित करने की सिफारिश, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

-अपने चहेतों को कम कीमत पर दुकानें आवंटित करने और बिना निविदा व वन विभाग की अनुमति बिना पेड़ काटने के हैं आरोप
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 अगस्त 2019। उत्तराखंड हाई की वरिष्ठ न्यायमूर्ति सुुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने काशीपुर के ब्लॉक प्रमुख गुरमुख सिंह को निलंबित किए जाने के सम्बन्ध में जिला अधिकारी ऊधम सिंह नगर द्वारा शासन को की गयी संस्तुति को निरस्त करने के सम्बन्ध में उनके द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार विकास खंड काशीपुर परिसर में सरकारी निधि से 17 दुकानों के शॉपिंग कॉप्लेक्स का निर्माण किया गया था। इनमें छोटी दुकानों के लिए पाँच लाख और बड़ी दुकानों के लिए पाँच लाख से अधिक की धनराशि निर्धारित की गयी थी परन्तु जिन लोगो ने इन दुकानों के लिए आवेदन किया था, दुकानें उन्हें न देकर उससे कम धनराशि में अपने चहेतों को को दे दी गयीं। इसके साथ ही खंड विकास अधिकारी द्वारा परिसर में स्थित 75 पेड़ों की नीलामी हेतु निविदा आमंत्रित किये बिना और वन विभाग की अनुमति लिये बिना पेड़ काट दिए गए। इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपने करीबियों को कम दामांे पर दुकानें आवंटित करने वालों और बिना वन विभाग के अनुमति के पेड़ काटने वालों पर कार्यवाही की मांग की थी। इस पर जिला अधिकारी ऊधम सिंह नगर द्वारा कराई गयी जाँच में ब्लॉक प्रमुख गुरमुख सिंह, खण्ड विकास अधिकारी व अन्य लोग दोषी पाये गए। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में ब्लॉक प्रमुखो का का कार्यकाल 8 अगस्त को समाप्त हो रहा है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में 6 माह से बंद पड़े स्लॉटर हाउसों को खोलने के लिए हाईकोर्ट के आशाजनक आदेश

-राज्य में तीन माह के भीतर स्लॉटर हाउसों को अस्तित्व में लाने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 7 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने आदेश पर सितम्बर 2018 से राज्य में बंद पड़े स्लॉटर हाउसों यानी पशुवधशालाओं के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नगर आयुक्त हल्द्वानी नगर निगम को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने तथा नगर पालिका नैनीताल के अधिशासी अधिकारी 1 सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने एवं नगर पालिका रामनगर को डीपीआर तथा स्लॉटर हाउस को चालू करने के समय की जानकारी प्रस्तुत करने के आदेश दिये हैं। साथ ही राज्य सरकार से 3 माह के भीतर स्लॉटर हाउसों को अस्तित्व में लाने के आदेश जारी किये है राज्य सरकार से सुप्रीम कोर्ट में फाइल एसएलपी जानकारी कोर्ट में पेश करने को भी कहा है। आगे मामले की अगली सुनवाई के एक सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ ने प्रदेश के सभी अवैध स्लॉटर हाउसों को बंद करने के आदेश दिए थे और कहा था कि खुले में किसी भी प्रकार से जानवरों को ना काटा जाए। इसके बाद से पूरे प्रदेश भर में सरकार ने स्लॉटर हाउसों को बंद कर दिया हैं, और राज्य में बाहरी राज्यों खासकर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से लाकर मांश बेचा जा रहा है। सरकार के आदेश को प्रदेश के मीट कारोबारियों-रामनगर के मोहम्मद यूनूस और नैनीताल के जाकिर हसन ने नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती देकर कहा था पूर्व में हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर 2011 को एक आदेश जारी कर प्रदेश में मानकों के अनुसार स्लॉटर हाउस बनाने के निर्देश दिये थे, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी कोर्ट के आदेशो का पालन नही किया गया है। इस वजह से स्लॉटर हाउस बंद पड़े हैं। लिहाजा कोर्ट के आदेश का पालन ना करने वाले अधिकारियो के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाए।
वहीं स्लॉटर हाउस बंद किये जाने के उच्च न्यायालय आदेश के खिलाफ सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अपील-एसएलपी भी दायर की है ताकि मीट कारोबारियो को राहत मिल सके।

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