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May 20, 2024

विक्रम संवंत् सबसे अधिक प्रासंगिक एवं सार्वभौमिक हिन्दू नववर्ष, जानें हिन्दू नव वर्ष का महत्व एवं सम्पूर्ण जानकारी

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, देहरादून, 9 अप्रैल 2024 (Importance & complete info of Hindu New Year)। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा का दिन है। आज के दिन से नवरात्रि शुरु होती है और हिन्दू नववर्ष भी मनाया जाता है। इसे विक्रम संवत या नव संवत्सर कहा जाता है।

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हिंदू नव वर्ष के पहले दिन का पौराणिक इतिहास (Importance & complete info of Hindu New Year)

विक्रम संवत्सर की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ईसा से 57 वर्ष पूर्व की थी। इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरुआत भी होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि होती है। नव-संवत्सर शुरू होने के साथ ही सभी शुभ कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

हिंदू नव वर्ष का महत्व, इसी दिन सृष्टि-इसी दिन मानव की उत्पत्ति हुई (Importance & complete info of Hindu New Year)

हिंदू मान्यताओं के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सूर्योदय के समय सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसलिये इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन ‪1,96,08,53,125‬ यानी लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व इस पृथ्वी के तिब्बत-हिमालय क्षेत्र में मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, इस कारण यह मानव उत्पत्ति संवत् भी कहा जाता है।

मनुष्योत्पत्ति के दिन ही अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चार महर्षियों ने ब्रह्माण्ड में अनेक प्रकार के कंपनों के रूप में व्याप्त वैदिक ऋचाओं (मंत्रों) को अपने योग बल से ग्रहण करके सृष्टि के रचयिता निराकार सर्वज्ञ ब्रह्म रूप चेतन तत्व की प्रेरणा से उनका अर्थ जाना, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में सृष्टि में विख्यात हुए। इन्हीं चार ऋषियों ने महर्षि ब्रह्मा (आद्य) को सर्वप्रथम चारों वेदों का ज्ञान दिया। इस कारण यह वेद संवत् भी है। यह संवत् संसार के सभी धार्मिक पवित्र मानवों के लिए है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व (Importance & complete info of Hindu New Year)

प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है। वाल्मीकी रामायण के अनुसार इसी दिन वेद-वेदांग-विज्ञान के महान् ज्ञाता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने आततायी महाबली रावण का वध किया। ध्यातव्य है कि श्रीराम व रावण का अन्तिम युद्ध चैत्र की अमावस्या को प्रारम्भ हुआ और दो दिन चला। प्रचलित दशहरे (विजयादशमी) का रावण वध से कोई सम्बन्ध नहीं है।

महाभारत के अनुसार इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर की अधर्म की प्रतिमूर्ति दुर्योधन पर विजय हुई। दुर्योधन की मृत्यु के समय योगेश्वर महामानव भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा था-‘प्राप्तं कलियुगं विद्धि’, इस कारण यह दिन किसी भी युग का प्रारम्भिक दिन भी होने से युग संवत् भी कहा जाता है। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ था इसलिए यह युधिष्ठिर संवत भी कहा जाता है।

समस्त भारतीयों के लिए यह दिन इस कारण भी बड़ा दिन है क्योंकि इसी भारत भूमि पर मनुष्य, वेद, भगवान् श्रीराम, धर्मराज युधिष्ठिर सभी उत्पन्न हुए तथा इसी का सम्बन्ध सम्राट् विक्रमादित्य से भी है, जिनके नाम से इस दिन को विक्रम संवत् का प्रारम्भ भी मानते हैं। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। उन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।

विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना था। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना। आर्य समाज वेद प्रचार का महान कार्य करने वाला संगठन है। इसी दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था।

वैदिक नववर्ष का प्राकृतिक महत्व (Importance & complete info of Hindu New Year)

वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।

वैदिक नववर्ष कैसे मनाएँ (Importance & complete info of Hindu New Year)

  • परस्पर एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ दें।
  • आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।
  • इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों एवं धार्मिक स्थलों में हवन-यज्ञ करें और वेद आदि शास्त्रो के स्वाध्याय का संकल्प ले।
  • इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।

उत्तराखंड में परंपरागत तौर पर ऐसे मनाया जाता है हिंदू नव वर्ष (Importance & complete info of Hindu New Year)

उत्तराखंड में हिंदू नव वर्ष का दिन संवत्सर कहलाता है। कुछ स्थानों पर इस नवरात्रि के दिन भी हरेला रखा जाता है। इस दिन अधिकांश लोगों का उपवास होने के कारण रात्रि के समय ही पकवान बनाये जाते हैं। उत्तराखंड में नववर्ष के दिन गांव में पुरोहित आते हैं और संवत्सर का राशि व वर्षफल सुनाते हैं। संवत्सर को सुनाने के बदले पुरोहित को गांव वाले दक्षिणा देते हैं।

आज ही के दिन पंचांग भी पढ़ा जाता है। पंचांग हिंदू कलैन्डर है। पंचांग पढ़कर ज्योतिषी आने वाले वर्ष के विषय में बताते हैं। जिनका आने वाला वर्ष भारी या कठिन होता है उन्हें विभिन्न प्रकार के दान-पुण्य के कार्य करने की सलाह दी जाती है।

अन्य राज्यों में ऐसे मनाते हैं नव वर्ष (Importance & complete info of Hindu New Year)

महाराष्ट्र में इस दिन को गुड़ी पड़वा, गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे संवत्सर पड़वो कहते हैं तो कर्नाटक में इसे युगादि कहते हैं और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उगादी कहते हैं। गुड़ी का अर्थ विजय पताका से होता है।

महाराष्ट्र में आज के दिन हर घर में गुड़ी अर्थात विजय पताका लगायी जाती है। यहां इन्हीं दिनों से नववर्ष की शुरुआत मानी जातो और मीठे पकवान बनाकर नये वर्ष की शुरुआत की जाती है। महाराष्ट्र में आज के दिन पुरन पोली मनाया जाता है।

स्वयं महसूस करें कि अंग्रेजी नए वर्ष 1 जनवरी और भारतीय नववर्ष में कौन बेहतर है ? (Importance & complete info of Hindu New Year)

1 जनवरी को न ऋतु बदली, न मौसम। विद्यालयों में न कक्षा बदली, न सत्र। न फसल बदली, न खेती और न पेड़ पौधों की रंगत, न सूर्य, चाँद’सितारों की दिशा और ना ही नक्षत्र। नए वर्ष में कुछ तो नई अनुभूति होंनी ही चाहिए।

देखिये हिंदू नए वर्ष में क्या-क्या बदल रहा है, जबकि 1 जनवरी को ऐसी कुछ नई अनुभूति नहीं होती हैं। ईस्वी संवत का नया साल 1 जनवरी को और भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है।

आईये देखते हैं दोनों का तुलनात्मक अंतर (Importance & complete info of Hindu New Year)

प्रकृति- 1 जनवरी को कोई अंतर नही जैसा दिसम्बर वैसी जनवरी। जबकि चैत्र मास में चारों ओर फूल खिल जाते हैं, पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो ओर हरियाली मानो प्रकृति भी नया साल मना रही हो।
वस्त्र- दिसम्बर और जनवरी में वही वस्त्र, कंबल, रजाई, ठिठुरते हाथ पैर। जबकि चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है, गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है।

विद्यालयो का नया सत्र- दिसंबर-जनवरी में एक ही कक्षा, कुछ नया नहीं। जबकि मार्च अप्रैल में बच्चों की पिछली कक्षा का परिणाम आ जाता है नई कक्षा नया सत्र यानी विद्यालयों में भी नया वर्ष।
नया वित्तीय वर्ष- दिसम्बर-जनबरी में एक ही पुराने खाते रहते हैं। जबकि 31 मार्च को बैंको की क्लोजिंग होती हैं। नए खाते खोले जाते है। सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है। नये टैक्स यानी कर एवं अन्य नये प्राविधान लागू हो जाते हैं।

कलैण्डर- जनवरी में नया कलेंडर आता है। चैत्र में नया पंचांग आता है। उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं। इसके बिना हिंदू समाज जीबन की कल्पना भी नही कर सकते।
किसानो का भी नया वर्ष- दिसंबर-जनवरी में खेतो में एक ही फसल होती है। जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटती है और नया अनाज घर में आता है तो किसानो में भी नये वर्ष पर नया उत्साह रहता है।

पर्व मनाने की विधि- 31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर मदिरा पान करते है, हंगामा करते है, रात को शराब पीकर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, दुष्कर्म जैसी घटनाएं होती हैं। पुलिस-प्रशासन भी बेहाल रहता है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश होता है। जबकि भारतीय नववर्ष व्रत-उपवास से शुरू होता है। पहला नवरात्र होता है। घर-घर मे माता की पूजा होती है। शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।

अंग्रेजी कलेंडर में नव वर्ष पर तारीख के अलावा कुछ नही बदलता (Importance & complete info of Hindu New Year)

ऐसे में जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चाँद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है, जो विज्ञान आधारित हैं, तो क्यों न अपनी मानसिकता को बदलें, विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचानें, स्वयं सोचें और क्यों न मनायें 1 जनवरी के साथ चैत्र प्रतिपदा पर भी नया वर्ष मनाये।

भारतीय पंचांग में समय की सर्वाधिक सूक्ष्मता से होती है समय की गणना (Importance & complete info of Hindu New Year)

संवत्सर 60 प्रकार के होते हैं। विक्रम संवत्सर में यह सभी संवत्सर शामिल होते हैं। विक्रम संवत में दिन, सप्ताह और महिने की गणना सूर्य व चंद्रमा की गति पर आधारित है। यह काल गणना अंग्रेजी कलैंडर से आधुनिक व विकसित मानी गयी है। इसमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के साथ तारों के समूह को भी जोड़ा गया है जिन्हें नक्षत्र कहा जाता है।

एक नक्षत्र चार तारा समूहों से मिलकर बनता है। कुल नक्षत्रों की संख्या 27 बताई गयी है। सवा दो नक्षत्रों का समूह मिलकर एक राशि का निर्माण करता है।

भारतीय पंचांग के अनुसार हर वर्ष का अलग राजा व मंत्री होने का विधान है, जिसके बारे में यह मंत्र स्थिति स्पष्ट करता है, ‘चैत सित प्रतिपदियों वारों अर्कोदये स वर्शेषः’ अर्थात-चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को जो बार होगा वही सम्वतसर का राजा होगा।

(वैशाख) मेषार्क सक्रांन्ति का बार मंत्री होगा, कर्क सँँक्रान्ति का वार पूर्ण धन्येध, तुला संक्रान्ति का वार रशेरन, सिहं संक्रान्ति का वार नीरेसषं, आद्रा प्रवेश समय का वार मेधष, धनु संक्रान्ति का वार अग्र धान्येश होगा। और जिस वार को कर्क संक्रान्ति होगी उसी वार को मकर संक्रान्ति भी होगी।’’

एक अन्य मंत्र ‘ब्रहस्पतेमर्ध्यमरात्रि भोगात् संवत्सरं संहिततिका वदन्ति’ के अनुसार वृहस्पति ग्रह मध्यम गति से जब एक राशि को भोगता है, तो उतने समय को सम्वत्सर कहते है। सम्वत्सर 60 होते है। इन 60 सम्वत्सरों में से प्रथम 20 की संज्ञा ब्रह्मा, अगले 20 की विष्णु एवं शेष 20 की रूद्र संज्ञा होती है जो क्रमशः सृष्टि स्थिति व प्रलय के तुल्य फलदायिनि है।

भारतीय मान्यतानुसार- सृष्टि की रचना की शुरूआत ब्रह्मा जी की प्रेरणा से स्वायम्भुव मनु तथा शतरूपा ने की और उस समय सृष्टि की रचना के साथ काल का विभाजन भी हुआ।

श्रीमद्भागवत् के तृतीय सर्ग के एकादश अध्याय के अनुसार-सृष्टि का सबसे सूक्ष्मतम अंश परमाणु होता है, दो परमाणु मिलकर एक अणु बनाते है। तीन अणुओं के मिलने से एक ‘त्रसरेणु’ तथा तीन त्रसरेणु को पार करने में सूर्य को जितना समय लगता है उसे ‘त्रुटि’ कहते है। त्रुटि का सौ गुना काल ‘बेध’ कहलाता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

तीन बेध का एक ‘लव’ होता है। तीन लव से एक ‘निमेष’ तीन निमेष से लव का ‘क्षण’ पाँच क्षण का एक ‘लघु’ तथा 15 लघु की एक ‘नाड़िका’ दो नाड़िकाओं का एक ‘मुहूर्त’ होता है। छः या सात नाड़िकाएँ मिलकर ‘प्रहर’ बनाती है। यह प्रहर ‘याम’ कहलाता है, जो मनुष्य के दिन-रात का चौथा भाग होता है। चार-चार प्रहर के दिन-रात होते है। 15 दिन-रात का एक ‘पक्ष’ होता है। यह ‘कृष्ण-पक्ष’ एवं ‘शुक्ल पक्ष’ यानी दो प्रकार का होता है। दो पक्षों का एक ‘मास’ होता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

दो मास की एक ‘ऋतु’ होती है। छः मास अर्थात तीन ऋतुओं का एक ‘अयन’ होता है। यह अयन ‘उत्तरायण’ एवं ‘दक्षिणायन’ यानी दो प्रकार का होता है। दो अयन मिलकर एक ‘वर्ष’ बनाते हैैं। इसके अलावा ‘विष्णु पुराण द्वितीय अंश’ में वर्णित प्राचीन भारतीय काल-गणना के अनुसार ‘15 निमेष की एक काष्ठ, 30 काष्ठ की एक कला, 30 कला का एक मुहूर्त एवं 30 मुहूर्त का एक सम्पूर्ण दिन-रात्रि बनता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

सूर्योदय से लेकर तीन मुहूर्त की गति के काल को प्रातः काल कहते है। यह सम्पूर्ण दिन का पाँचवा भाग होता है। इस प्रकार प्रातः काल के तीन मुहूर्त का समय सग्ङव कहलाता है तथा संग्ङवकाल के तीन मुहूर्त का मध्याह्न होता है। अपराह्न के बीतने पर सायंकाल आता है।’ (Importance & complete info of Hindu New Year)

समय ज्ञात करने की प्राचीन विधि (Importance & complete info of Hindu New Year)

समय ज्ञात करने के लिए भारत में सदियों पूर्व जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था। जिसके लिए तांबे के बर्तन में छेद कर दिया जाता था, जिसमें सोने की 4 अंगुल लम्बी सलाई से बर्तन के पैंदे में छेद कर दिया जाता था तथा जब वह पूरी तरह भर जाता, जल में डूब जाता, उतने समय को एक नाड़िका कहा जाता था। जबकि वर्तमान मानव सभ्यता 1500-1300 ईसवी पूर्व मिश्र में सूर्य घड़ी का और सन् 1325 में मिश्र में ही पहली घड़ी का अविष्कार कर पाई। (Importance & complete info of Hindu New Year)

कहने की जरूरत नहीं कि जब शेष विश्व के लोग दिन, रात, मास, तक के नाम नही जानते थे, भारतीय मनीषियों ने काल गणना के सुक्ष्म रूप से लेकर ब्रह्माण्ड से प्रलय तक की दीर्घतम गणना कर ली थी। समय गणना में सौर मण्डल को 360 अंशों में बाँटा गया और फिर इन 360 अंशों को 30-30 अंशों की बारह राशियाँ समय गणना के लिए तीन शब्द घंटा, मिनट, सेकेेड प्रचलित है। जिन्हें संस्कृत भाषा में ‘अहोरात्र’ के नाम से जाना जाता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

अहोरात्र का अर्थ-दिन-रात से है। जबकि घंटे के लिए ‘होरा’, मिनट के लिए ‘निमेज’ तथा सेकेंड के लिए ‘अनिमेष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। एक अहोरात्र का मान 60 घड़ी या 24 घंटे होता है। दिनों का नाम सौर मण्डल मे स्थित ग्रहोें के आधार पर रखा गया, जो उनकी गति से निर्धारित होता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

ऐसे पड़े दिनों के नाम (Importance & complete info of Hindu New Year)

सूर्य सौर मंडल का मुख्य ग्रह है, इसलिए प्रथम दिन रविवार कहलाता था इसी प्रकार मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, व शनिवार निर्धारित होते है। चार सप्ताह को मिलाकर एक मास, बारह महीनों को मिलाकर एक वर्ष बनता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

ऐसे पड़े महीनों के नाम (Importance & complete info of Hindu New Year)

भारत में मासों (माह) का नामकरण चन्द्रमा के बारह भ्रमण अवधि वृत्तों पर आधारित है, जो यूरोपीय मासों की अपेक्षा कई अधिक वैज्ञानिक है। प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा जिस नक्षत्र का भोग करता है उसी के अनुसार उस मास का नाम पड़ जाता है जैसे-चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ‘चित्रा’ नक्षत्र में रहता हैं अतः उस मास का नाम पड़ गया ‘चैत्र’। (Importance & complete info of Hindu New Year)

इसी प्रकार शेष ग्यारह मासो की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा क्रमशः विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा श्रावण, पूर्वभाद्रपद अश्विनी, कृतिका, मृगशिरा, पुण्य, मघा, तथा पूर्वाफाल्गुनी में स्थित होता है। अतः इन मासों का नाम- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ श्रावण, भाद्रपद, अश्विनि, कार्तिक, मार्गाशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन पड़े। अग्नि पुराण के अनुसार-60 सम्वत्सर का पहला मण्डल समाप्त हो जाने के पश्चात अलग मण्डल पुनः इन्ही नामों से जाना जाता है। (Importance & complete info of Hindu New Year)

अंग्रेजी कलेंडर में कई बार बदलाव होते रहे (Importance & complete info of Hindu New Year)

1752 calander Importance & complete info of Hindu New Yearइस प्रकार देखा जाए तो भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन तथा इसकी काल गणना अत्यन्त सूक्ष्म है। जबकि वर्तमान समय में लोक प्रचलित-‘‘ग्रेगोरियन कलैंडर’’ को वर्तमान स्वरूप 1752 ई॰ में ‘पोप ग्रेगरी’ ने दिया था। तभी से इसे ‘ग्रेगरियन कलैंडर’ कहा जाता है। इसके पहले इसमें समय-समय में संशोधन होते रहे। (Importance & complete info of Hindu New Year)

ईसा के जन्म के बाद ही जनवरी को पहला मास माना गया, जबकि इसके पूर्व ईस्वी कलैंडर भी मार्च से प्रारम्भ होता था जो भारतीय चैत्र के समकालीन था। ग्रेगोरियन कलेंडर में आज भी सितम्बर (7वां) अक्टूबर (8वाँ) आदि नाम वैसे ही हैं, जब कि वे अब नवें तथा दसवें माह हैं। (Importance & complete info of Hindu New Year)

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