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तिब्बती निवासित सरकार के प्रधानमंत्री ने तिब्बत की आजादी-स्वायत्तता और भावी दलाईलामा पर की बड़ी भविष्यवाणियां

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  • कहा-जल्द आजाद होगा तिब्बत, अगले दलाई लामा निर्वासित लोगों में से होंगे
  • तिब्बत को आजाद कराने के लिए बनायी पांच वर्ष की अल्पकालीन योजना
  • केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष ने तीसरे ‘कुमाऊं कला एवं साहित्य पर्व’ में तिब्बत, चीन व भारत के बारे में कहीं कई बड़ी बातें
तीसरे ‘कुमाऊं कला एवं साहित्य पर्व’ में बोलते केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष डा. लोब्सांग सांगे।

नैनीताल, 5 अक्टूबर 2018। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष यानी तिब्बती निवासित सरकार के प्रधानमंत्री डा. लोब्सांग सांग्ये शुक्रवार को नैनीताल में थे। यहां तीसरे ‘कुमाऊं कला एवं साहित्य पर्व’ पर उन्होंने तिब्बत, चीन व भारत के बारे में कई बड़ी बातें कहीं। 1968 में दार्जिलिंग की एक शरणार्थी बस्ती में पैदा हुए और इधर मार्च 2018  में निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री चुने गए दिल्ली यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड में पढ़े डा. सांग्ये ने कहा कि चीन के तत्कालीन सत्ता प्रमुख माओत्से तुंग द्वारा धर्म को जहर की संज्ञा दी गयी थी, बावजूद जिस तरह से बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ है और स्वयं माओत्से का चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध धर्मानुयायी राष्ट्र बन गया है, ऐसे में बौद्ध धर्म के मूल स्थान तिब्बत की स्वायत्तता अधिक दूर नहीं है। बताया कि इस हेतु पांच वर्ष की अल्पकालीन योजना बनायी गयी है। साथ ही एक और बड़ी भविष्यवाणी करते हुए कहा कि अगले दलाई लामा चीन से बाहर निर्वासित तिब्बतियों में से पैदा हुवे होंगे। टिप्पणी की कि चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओत्से तुंग की राह पर चल रहे हैं।

तीसरे ‘कुमाऊं कला एवं साहित्य पर्व’ में आयोजकों को केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का प्रतीक चिन्ह भेंट करते अध्यक्ष डा. लोब्सांग सांगे।

स्वयं को शिव की धरती ‘कैलाश मानसरोवर’ की धरती तिब्बत से बताते हुए भारत व तिब्बत के दीर्घकालीन संबंधों का जिक्र करते हुए डा. सांगे ने तिब्बत को सोना, तांबा सहित बहुमूल्य खनिजों, दुनिया के 40 फीसद ग्लेशियरों के साथ आर्कटिक व अंटार्कटिक के बाद तीसरा ध्रुव तथा दुनिया के 1.4 बिलियन लोगों को पानी उपलब्ध कराने वाली सिंधु व ब्रह्मपुत्र सहित दर्जन भर नदियों के उद्गम का श्रोत बताते हुए पानी और शुद्ध हवा का केंद्र बताते हुए इसके वैश्विक पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित किया तथा कहा कि कि चीन ने इस क्षेत्र के लोगों से चांदी के सिक्के लेकर और उन्हें जेलों में ठूंसकर वहां अच्छी सड़कें विकास के लिये नहीं, वहां के बहुमूल्य खनिजों के दोहन के लिए बनायी हैं। कहा कि ग्लेशियरों के पिघलने और कार्बन डाई ऑक्साइड व मीथेन जैसी खतरनाक गैसों के उत्सर्जन से भी तिब्बत में पर्यावरणीय खतरा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में पूरे विश्व के लिए तिब्बत को बचाया जाना और तिब्बत की स्वतंत्रता-स्वायत्तता जरूरी है। कहा कि तिब्बत की निर्वासित सरकार दुनिया में बर्लिन की दीवार गिरने, रूस के बिघटित होने, इंडोनेशिया में ताउम्र जेल में रखी गयी एक दुर्बल महिला आन सान सू की के सत्तानशी होने तथा महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला के उदाहरणों के साथ तिब्बत की आजादी के प्रति आश्वस्त है। इस हेतु 5 एवं 50 वर्ष की यानी अल्पकालीन व दीर्घकालीन योजनाएं बनायी गयी हैं। अल्पकालीन योजना के तहत तिब्बत को आजाद कराना है, और दीर्घकालीन योजना के तहत तिब्बती संस्कृति, भाषा आदि को बचाये रखना है। निर्वासित सरकार का दायित्व तिब्बत से बाहर पैदा हुई पीढ़ियों तक भी यह संदेश पहुंचाने का है। कहा कि अगले पंचेन लामा निर्वासित परिवारों में ही पैदा होंगे। कहा कि बौद्ध धर्म की उम्र 2600 वर्ष और चीन की सत्ता पर काबिज कम्यूनिज्म की उम्र महज 100 वर्ष है। जिस तरह तिब्बत के मूल बौद्ध धर्म का चीन सहित पूरी दुनिया में विस्तार हो रहा है, स्वयं चीन के लोग धर्मशाला आकर दलाई लामा से बौद्ध धर्म की शिक्षा ले रहे हैं। स्वयं चीन के लोग 20 वर्षों से चीन द्वारा गायब किये जाने के बावजूद तिब्बत के पंचेन लामा के पोस्टर लेते हैं और चीन द्वारा घोषित दलाई लामा को नहीं मानते, ऐसे में तिब्बत की आजादी तय है। बताया कि दलाई लामा के भारत आने के 60 साल पूरे हुए हैं। इस बर्ष ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम चल रहा है। भारत के साथ ही विश्व समुदाय तिब्बती का आजादी का समर्थन कर रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका व यूरोप के कई देश बकायदा इसके लिए एक्ट पारित कर चुके हैं। 

उल्लेखनीय है कि चीन सरकार निर्वासित नेता के साथ कोई बातचीत नहीं करने की बात कह चुकी है। सांग्ये ने बताया कि 2010 से चीन सरकार के साथ बात नहीं हो पायी है, लेकिन निर्वासित सरकार हमेशा बातचीत के प्रयास में रही है।  निर्वासन में लगभग एक लाख 40 हजार तिब्बती रहते हैं। इनमें से एक लाख भारत के विभिन्न हिस्सों में, जबकि 60 लाख तिब्बती तिब्बत में रहते हैं। गौरतलब है कि दलाई लामा राजनीतिक जिम्मेदारियों से अलग हो चुके हैं। सांग्ये को निर्वासित सरकार का मुखिया बनाने को तिब्बतियों के मसले को धार्मिक रुझान से हटा कर लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान करना बताया गया है। अभी तक दलाई लामा तिब्बतियों के लिए आध्यात्मिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर नेतृत्व दे रहे थे। उल्लेखनीय है कि अपने शुरुआती दिनों में तिब्बत की आजादी के समर्थक रहे हैं। लेकिन वक्त के साथ वह चीनी शासन के तहत सार्थक स्वायत्तता की दलाई लामा की मांग के नजदीक आते गए हैं।

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-उपसा के तत्वावधान में यूजीसी एचआरडीसी में ‘ब्रिक्स’ एवं संयुक्त राष्ट्र के विशेष संदर्भ में एशियाइयों की शताब्दी’: एशियाई राष्ट्रों की भूमिका एवं प्रभाव विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
नैनीताल। विशेषज्ञों ने अगली सदी को एशिया की सदी होने की संभावना जताई है, और इसके लिए भारत और चीन के बीच इंग्लेंड व फ्रांस जैसे मजबूत संबंधों की आवश्यकता जताई है, और इसके लिए दोनों देशों के बीच आर्थिक के बजाय सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत किये जाने को प्रमुख उपकरण बताया है। हालांकि इसमें बाधा दोनों देशों की विचारधाराओं का अलग-अलग होना है। 
बृहस्पतिवार को कुमाऊं विवि के हरमिटेज परिसर स्थित यूजीसी के एचआरडीसी यानी मानव संसाधन विकास केंद्र में उपसा यानी यूनाईटेड प्रोफेशनल्स एण्ड स्कॉलर्स फॉर एक्शन के तत्वावधान में ‘ब्रिक्स’ एवं संयुक्त राष्ट्र के विशेष संदर्भ में एशियाइयों की शताब्दी’ : एशियाई राष्ट्रों की भूमिका एवं प्रभाव विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में इस तरह के विचार उभर कर आये। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आरएमएल अवध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि ब्रिक्स देशों में आपसी समन्वय स्थापित करने के लिए संस्कृतियों का परस्पर आदान-प्रदान करना आवश्यक है। इसके बिना हम एशियाई देशों का संगठित समूह नहीं बन सकते हैं। एशियाई समूह को अग्रसर करने के लिए केवल एक मापदंड पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा इंडोनेशिया और भारत के आपसी सहयोग के लिए सांस्कृतिक पद्धति को प्राथमिकता दी, जैसे कि इंग्लैण्ड और फ्रांस में मजबूत सांस्कृतिक सम्बन्ध हैं वैसे चीन और भारत के बीच में भी होने चाहिए लेकिन चीन और भारत की विचारधारा अलग-अलग है। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत एवं विश्वविद्यालय कुलगीत के गायन एवं द्वीप प्रज्वलन से प्रारम्भ हुआ। यूजीसी एचआरडीसी के निदेशक एवं उपसा के संयुक्त सचिव प्रो. बीएल साह ने अतिथियों का स्वागत किया। उपसा के अध्यक्ष डा. आरएस भाकुनी ने उपसा एवं संगोष्ठी के बारे में प्रतिभागियों को जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन डा. रीतेश साह ने किया। इस अवसर पर प्रो. राजवीर शर्मा, प्रो. प्रीता जोशी, प्रो. नीता बोरा शर्मा, डा. किरन बर्गली, डा. नीलू लोधियाल, डा. सुषमा टम्टा, हरदेश कुमार, पवन, बंटी, पूजा, नुशरत, शाइस्ता तथा ओरियंटेशन प्रोग्राम-39 के प्रतिभागी उपस्थित रहे। 
2 साल में महाशक्तिशाली देश बनेगा चीन: ले.जनरल रावत

नैनीताल। संगोष्ठी में भारत-चीन मामलों के सैन्य विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल डा. एमसी भंडारी ने कहा कि चीन अगले 2 साल में महाशक्तिशाली देश बनेगा, और भारत भी शक्तिशाली देश बनने को उन्मुख होगा। कहा कि ब्रिक्स का भविष्य चीन के ऊपर निर्भर करता है। उन्होंने चीन और भारत के भू-राजनीतिक विषयों तथा दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव एवं चीन की ‘वन बेल्ट-वन रोड’ परियोजना के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी, तथा भारत एवं चीन की सैन्य शक्ति एवं सुरक्षा के सम्बन्धों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में चीन में आधुनिकीकरण आया। बताया कि चीन और रूस दोनों ही कम्युनिस्ट विचारधारा का अनुसरण करते हैं।

एशियाई देशों की होगी 21वीं सदी: नौड़ियाल
नैनीताल। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल ने कहा कि 21वीं सदी एशियाई देशों की सदी है। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में ही इसकी शुरूआत हो गई थी। उन्होंने कहा कि 1950 तक जापान उतना मजबूत नहीं था लेकिन 1960 के बाद उसने बहुत तेजी से विकास किया। वहां पर विकास इसलिए हुआ कि वहां अन्य देशों ने निवेश करना प्रारम्भ किया। समान नीति अपनाते हुए चीन ने भी 1980 के दशक में विदेशी निवेश के लिए अपने देश के द्वार खोल दिये। कहा कि चीन एक अवसरवादी देश है। चीन की तुलना में भारत विकास के मामले में मध्यम रहा है। बौद्धिक सम्पदा अधिकार में चीन के नाम सबसे ऊपर है जबकि अमेरिका का स्थान उसके बाद आता है और भारत इस मामले में बहुत पीछे है। ब्रिक्स में भी चीन का वर्चस्व सबसे अधिक है अतः भारत को प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकास करने की आवश्यकता है।

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प्रो. एसडी मुनि

-दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ जवाहर लाल नेहरू विवि के प्रोफेसर एसडी मुनि ने कहा-अमेरिका व रूस की नजदीकी भारत के हित में
-चीन के बाबत कहा कि 15वीं-18वीं सदी तक भारत के बराबर व पीछे रहा चीन आगे निकलते ही संबंध खराब कर रहा
-पाकिस्तानी सेना तिजारत और सियासत से दूर हो तभी पाकिस्तान का और भारत से उसके संबंधों का हो सकता है भला
नवीन जोशी। नैनीताल। दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ एवं जवाहर लाल नेहरू विवि के प्रोफेसर एसडी मुनि ने कहा कि भारत काफी हद तक आर्थिक व सामरिक मोर्चों पर मजबूत हुआ है, बावजूद अभी देश ने वह स्तर नहीं छुवा है कि दुनिया के देश उसकी सुन पायें। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने व स्वयं उनके पारिवारिक समारोह में पाकिस्तान जाने व चीन के राष्ट्रपति शी के साथ झूला झूलने जैसे डिप्लोमैटिक उपाय भी इन देशों के साथ बेहतर रिश्ते नहीं बना सके। उन्होंने अमेरिका व रूस के बीच राष्ट्रपति ट्रम्प के आने के बाद बढ़ रही नजदीकी को भारत के हक में बताया। कहा कि ऐसा होने से रूस की चीन पर निर्भरता घटेगी। साथ ही कहा कि ओबामा के दोस्ती के दौर के बावजूद अमेरिका कभी भारत के लिये रूस जितना विश्वस्त नहीं रहा। पाकिस्तान पर उन्होंने कहा, ‘जब तक पाकिस्तानी फौज तिजारत व सियासत से अलग नहीं होती, तब तक भारत-पाकिस्तान के संबंध नहीं सुधर सकते।’ भारत चीन संबंधों पर उन्होंने टिप्पणी की कि 15वीं शताब्दी तक चीन ‘सोने की चिड़िया’ और बुद्ध की धरती रहे भारत से आर्थिक, सामाजिक व सामरिक स्तर पर पीछे और 15वीं से 18वीं सदी तक बराबर रहा। तब भारत-चीन के बीच बेहतर संबंध रहे। किंतु इधर भारत से आगे निकल रहा चीन आंखें तरेर रहा है। कहा कि भारत की विदेश नीति तभी सफल हो सकती है, जबकि वह स्वयं को और अधिक मजबूत करे।
प्रो. मुनि ने कहा कि कहा कि भारत आज दुनिया का सबसे युवा, सशक्त, सबसे बड़े बाजार युक्त व विश्वस्त देश है। उसे अपनी इन ताकतों के साथ विश्व राजनीति में आगे बढ़ना होगा। कहा कि पाकिस्तान की समस्या का कोई इलाज संभव नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बुरे संबंध पाकिस्तान की फौज की आंतरिक समस्या में निहित हैं। इसलिये इसका कोई निदान संभव नहीं है। सिवाय इसके कि भारत स्वयं अत्यधिक मजबूत होकर उसे विश्व बिरादरी से अलग-थलग कर दे। वहीं चीन से भारत के संबंध तभी मजबूत हो सकते हैं, जब भारत चीन से अधिक शक्तिशाली हो जाये, और दक्षिण एशिया के अपने पड़ोसी देशों को चीन के मदद के बहाने घुसने से दूर रख पाये, तथा चीन को दलाईलामा से बात करने को मजबूर कर सके। उसे अपनी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ से हुई ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ पर कार्य करके दक्षिण पूर्व के मित्र देशों को भी अपने साथ एकजुट रखना और पड़ोसियों से संबंधों को और प्रगाढ़ करना होगा। अमेरिका व भारत के रिस्तों के बाबत उन्होंने कहा कि 1949 में नेहरू के पहले अमेरिकी दौरे से ही भारत अमेरिका से बेहतर संबंधों का पक्षधर रहा, और ये संबंध ओबामा-मोदी के साथ परवान चढ़े।

ओसामा के पतन के बाद भारत को चीन-पाक से खतरा बढ़ा : ले.ज. भंडारी

राज्य की सीमाओं पर सुरक्षा को लेकर संवेदनशील रहे सरकार
भारत को अमेरिका, चीन, पाक और रूस से जारी रखनी चाहिए वार्ता
नवीन जोशी, नैनीताल। परम विशिष्ट व अति विशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डा. एमसी भंडारी ने आशंका जताई कि ओसामा की मौत के बाद भारत पर दोतरफा खतरा है। पाकिस्तान से आतंकियों की आमद के साथ चीन भी भारत की ओर बढ़ सकता है। डा. भंडारी ने कहा कि भारत पांच-छह वर्षो में दुनिया की आर्थिक सुपर पावर बन सकता है। इसलिए उसे इस अवधि में कूटनीति का परिचय देते हुए अमेरिका, चीन, पाकिस्तान व रूस सहित सभी देशों से बातचीत जारी रखनी चाहिए। 
कुमाऊं विवि के अकादमिक स्टाफ कालेज में कार्यक्रम में आए डा. भंडारी ने कहा कि ओसामा बिन लादेन के बाद पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे 32 शिविरों से प्रशिक्षित आतंकी दो-तीन माह में भारत की तरफ कूच कर सकते हैं। कश्मीर में शांति पाकिस्तान की ‘जेहाद फैक्टरी’ में बैठे लोगों को रास नहीं आएगी। ओसामा ने भी कश्मीर में जेहाद की इच्छा जताई थी। उधर चूंकि पाकिस्तान बिखर रहा है, इसलिए तालिबानी- पाकिस्तानी भी यहां घुसपैठ कर सकते हैं। पाक पहले ही गिलगिट व स्काई क्षेत्रों में अनधिकृत कब्जा कर चुका है, दूसरी ओर चीन के 10 से 15 हजार सैनिक ‘पीओके’ में पहुंच चुके हैं, पाकिस्तान ने उन्हें सियाचिन के ऊपर का करीब 5,180 वर्ग किमी भू भाग दे दिया है, ऐसे में चीन तिब्बत के बाद भारत के अक्साई चिन व नादर्न एरिया तक हड़पने का मंसूबा पाले हुए है। उन्होंने कहा कि चीन ने यहां उत्तराखंड के चमोली जिले के बाड़ाहोती में 543 वर्ग किमी व पिथौरागढ़ के कालापानी में 52 वर्ग किमी क्षेत्र को अपने नक्शे में दिखाना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में उत्तराखंड में अत्यधिक सतर्कता बरतने व सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन रोकने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में चीन के घुसने की संभावना वाले 11 दर्रे हैं, जिनके पास तक चीन पहुंच गया है, और भारतीय क्षेत्र जनसंख्या विहीन होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में सीमाओं की सुरक्षा मुख्यमंत्री देखें और वह सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ें। साथ ही उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के बावजूद 10 फीसद की विकास दर वाला भारत अगले पांच-छह वर्षो में सुपर पावर बन सकता है, इसलिए उसे इस अवधि में सभी देशों से कूटनीतिक मित्रता करनी चाहिए और अपने यहां सीमाओं की सुरक्षा दीवार मजबूत करनी चाहिए, ताकि बिखरते पाकिस्तान के बाद जब अमेरिका, चीन मजबूत होते भारत की ओर आंख उठाएं, वह मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार हो जाए। उन्होंने भारत में सेना का बजट जीडीपी का 2.1 फीसद (64 हजार लाख रुपये) को बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया।
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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