Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

धरतीवासियों की बड़ी सफलता, धरतीपुत्र मंगल पर सफलतापूर्वक उतारा यान

Spread the love

वाशिंगटन, आइएएनएस। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मार्स इनसाइट लैंडर यान सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा गया। भारतीय समयानुसार सोमवार-मंगलवार की रात करीब 1:24 बजे इसे मंगल पर लैंड कराया गया। इनसाइट लैंडर यान को मंगल की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानकारी के लिए बनाया गया।वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मददगार होगा। इससे पृथ्वी से जुड़े नए तथ्य पता लगने की उम्मीद भी जताई जा रही है।

जानकारी के मुताबिक, इनसाइट के लिए मंगल पर लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर इनसाइट लैंडर पर रहीं। इन दोनों सैटेलाइट्स का नाम डिज्नी के किरदानों पर रखा गया है- ‘वॉल ई’ और ‘ईव’। दोनों सैटेलाइट्स ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे मिशन का लाइव कवरेज किया। इनसाइट से पहले 2012 में नासा के क्यूरियोसिटी यान ने मंगल पर लैंडिंग की थी।

मार्स इनसाइट लैंडर यान कैसे काम करेगा 
नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना अलग क्यों है।

इनसाइट लैंडर की खासियत

  • इनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’
  • मार्स इनसाइट लैंडर का वजन 358 किलो
  • सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यान
  • 26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया
  • कुल 7000 करोड़ का मिशन
  • इस मिशन में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिल
  • इसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा।
  • दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है, जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।
  • इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।
  • इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट का कहना है कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।

यह भी पढ़ें : करीब आएंगे मां-बेटा, इस पखवाड़े धरती के सर्वाधिक करीब पहुंचेगा धरती पुत्र

-सूर्य पर धरती की ओर उभरा 8 लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ से खतरे की आशंका
-एरीज के सौर वैज्ञानिक के अनुसार सूर्य पर फिलहाल कोई सौर ज्वालाएं नहीं हैं
नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य के धरती की ओर की सतह पर बुधवार को आठ लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ यानी एक तरह का गड्ढा उभरने का दावा किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे 2 विशाल जी-1 श्रेणी की सौर ज्वालाएं रिकॉर्ड की गयी हैं। नासा ने आशंका जताई है कि इन विशाल सौर ज्वालाओं की वजह से उठा ‘सौर तूफान’ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा सकता है। इसके नतीजे काफी बुरे हो सकते हैं। इसके धरती के वायुमंडल से टकराने की वजह से उपग्रह अव्यवस्थित हो सकते हैं। इसकी वजह से व्यवसायिक उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, और जीपीएस सिस्टम भी अव्यवस्थित हो सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसकी वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में बिजली भी गुल हो सकती है।
अलबत्ता, एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन का ‘कोरोनल होल’ के उभरने की बात को स्वीकार करते हुए इससे इतर कहना है कि इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्ष के सौर सक्रियता चक्र में शांत स्थिति में है, और सौर सक्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर है। उनका कहना है कि कोरोनल होल की वजह से काफी सौर हवाएं आ सकती हैं। हो सकता है कि इसकी तीव्रता अधिक हो, किंतु सूर्य पर काफी समय से कोई बड़ी सौर ज्वाला और कोई सौर धब्बा नजर नहीं दिखी है।

कितना बड़ा हो सकता है नुकसान

नैनीताल। वैज्ञानिकों के अनुसार एक सौर कलंक में सामान्य सूर्य के मुकाबले तीन से चार हजार गुना तक चुंबकीय क्षेत्र हो सकता है। इसकी इकाई गौज कही जाती है। यहां बता दें कि सामान्य सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र एक गौज तथा पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र महज आधा गौज होता है। यह चुंबकीय क्षेत्र ही छह हजार डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म सूर्य पर बड़ी सौर ज्वालाएें पैदा करता है, जिन्हें कि एक अंग्रेजी फिल्म में सौर सूनामी नाम दे दिया गया है। इनके कारण वर्ष १८५९ में अमेरिका व यूरोप में आग लगने की अनेक घटनाएें हुई थीं, और टेलीग्राफ के तार शार्ट कर गऐ थे। ध्रुवीय देशों रूस, नार्वे के साथ फिनलेंड व कनाडा में पावर ग्रिड फेल होने से विद्युत आपूर्ति ओर कृत्रिम उपग्रह डगमगा जाने से संचार व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। डा. वहाबउद्दीन के अनुसार इसी कारण वर्ष १९८९ में नासा का सोलर मैक्सिमम मिशन व कोदाना उपग्रह तथा १९७६ में स्काई लैब उपग्रह नष्ट हो गऐ थे। इससे अधिक ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों के साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है, व जीपीएस सिस्टम भी गड़बड़ा जाता है। इसलिए इन सौर तूफानों के अध्ययन की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। डा. वहाबउद्दीन का कहना है कि सौर तूफानों से कृत्रिम उपग्रहों को बचाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं।

यह भी पढ़ें : सूर्य पर भी मनाई गयी ‘बड़ी दिवाली’, उभरा पृथ्वी से १४ गुना बड़ा ‘सौर कलंक’

-पृथ्वी की ओर है मुंह, सूर्य पर बनी ‘सौर सूनामी” और इससे पृथ्वी और इसके उपग्रहों को नुकसान की आशंका से वैज्ञानिक चिंतित
-पिछले २५ वर्षों का सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा 
– सूर्य भी मना रहा दिवाली, एक्स क्लास के दो सौर भभूका निकली, अगले चार-पांच दिन हो सकते हैं महत्वपूर्ण
नवीन जोशी, नैनीताल। यहां भारत में मनाई जा रही दीपावली की तरह ही सूर्य देव पर बहुत ‘बड़ी दीपावली” चल रही है। सूर्य पर पृथ्वी के आकार से करीब १४ गुना बड़े आकार का सौर कलंक (सन स्पॉट) उभरा हुआ है। इसे पिछले २५ वर्षों में सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा है। यह सौर कलंक इतने बड़े आकार का है कि इसे पृथ्वी से सुबह और शाम के वक्त सूर्य के दक्षिण पूर्वी किनारे पर खुली आंखों से देखा जा सकता है। मैं भी 22 अक्टूबर की शाम और 23 की सुबह अपने घर खेड़ा, गौलापार (हल्द्वानी) से अपने कैमरे से इसकी फोटो लेने में सफल रहा। पृथ्वी के लिए खतरे की बात यह है कि इस सौर कलंक का मुंह पृथ्वी की ओर है, और इस पर सबसे बड़ी ‘एक्स क्लास” की दो सौर भभूका (सोलर फ्लेयर) हैं, तथा अगले चार-पांच दिनों तक और बड़ी सौर भभूकाओं के निकलने और यहां तक की इनके बढ़ने पर सौर तूफानों और २००३ जैसी ‘सौर सूनामी” की हद तक जा सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे पृथ्वी से अंतरिक्ष में भेजे गए कृत्रिम उपग्रह तथा पृथ्वी पर संचार सुविधाएं तहस-नहस होने तक का खतरा हो सकता है।

जान लें कि सूर्य हमारे सौरमंडल की सबसे महत्वपूर्ण धुरी है, जिस पर उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के बीच चुंबकीय तूफान चलते हैं। यही चुंबकीय तूफान वास्तव में सूर्य के इतनी अधिक ऊष्मा के साथ धधकने के मुख्य कारक हैं, जिससे पृथ्वी सहित सौरमंडल के अन्य ग्रह भी ऊष्मा, प्रकाश एवं जीवन प्राप्त करते हैं। लेकिन कहते हैं कि एक सीमा से अधिक हर चीज खतरनाक साबित होती है। ऐसा ही सूर्य पर चुंबकीय तूफानों के एक सीमा से अधिक बढ़ने पर भी होता है। चुंबकीय तूफान सूर्य पर पहले सन स्पॉट यानी सौर कलंक उत्पन्न करते हैं, इन्हें सामान्यतया बड़ी सौर दूरबीनों के माध्यम से ही काले बिंदुओं के आकार में देखा जाता है। सौर कलंक सूर्य पर असीम अग्नि की लपटें उत्पन्न करते हैं, इन्हें सोलर फ्लेयर या सौर भभूका कहते हैं। सूर्य पर सौर भभूका 11 वर्ष के चक्र में घटती-बढ़ती या शांत रहती हैं, जिसे सोलर साइकिल या सौर चक्र कहा जाता है। खगोल वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार वर्तमान में वर्ष २००८ से २४वां सौर चक्र चल रहा है, जिसका चरम यानी ‘सोलर मैक्सिमम’ २०१२-१३ में था। इसके बाद वर्तमान सौर चक्र अपने ढलान (डिके पीरियड) की ओर है, लेकिन इधर वैज्ञानिकों के अनुसार बीती १७ अक्टूबर से सूर्य पर एक बड़ा सौर कलंक बनना शुरू हुआ। तब यह सूर्य के पृथ्वी से दिखने के लिहाज से पीछे की ओर था। १८ से यह पृथ्वी की ओर आया, तब तक इसका आकार अपेक्षाकृत छोटा ही था। १९ और २२ अक्टूबर को इस पर बड़ी एक्स-१.८ श्रेणी की दो सौर भभूका प्रकट हुर्इं। इसके अलावा भी इस बीच सूर्य पर इस सौर कलंक से सी-श्रेणी की २७ और एम-श्रेणी की नौ सौर भभूका निकल चुकी हैं। शुक्रवार को भी इस पर सौर भभूकाओं का निकलना जारी रहा। स्थानीय आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक एवं वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन ने बताया कि इस सौर कलंक का आकार पृथ्वी से करीब नौ गुना बड़ा है, और इससे अगले चार-पांच दिनों तक बड़े सौर तूफान आने की आशंका बनी हुई है। बताया कि वर्ष २००३ में आए अब तक के बड़े सौर कलंक भी पिछले सौर सक्रियता चक्र के ढलान के दौर में ही उभरे थे। उन्होंने खुलासा किया कि बीती २२ की रात्रि सूर्य पर उभरी सौर भभूका ने २३ को पृथ्वी पर पहुंचकर कुछ पलों के लिए यहां संचार तंत्र को प्रभावित भी किया था। उत्तरी अमेरिका में कल २३ अक्टूबर के दिन लगे सूर्य ग्रहण के दौरान भी इसके चित्र लिए गए हैं।

दिवाली पर खुला अंतरिक्ष की ‘बड़ी दिवाली’ का राज, आइंस्टीन ने किया था इशारा

-धनतेरस की पिछली शाम वाशिंगटन से हुई है न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पहली बार घोषणा, एरीज के वैज्ञानिकों की भूमिका भी रही है इस खोज में
-इस खोज में एरीज के वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी रहे हैं शामिल
-इसी माह ब्लेक होल्स के आपस में टकराने से संबंधित एक अन्य खोज पर मिला है इस वर्ष का नोबल पुरस्कार
नैनीताल। महान वैज्ञानिक आंइस्टीन ने अपने जीवन काल में पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में होने वाली एक ‘बड़ी दीपावली’ की ओर सैद्धांतिक तौर पर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि दो ‘न्यूट्रॉन स्टार्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलती हैं, जोकि ‘स्पेस टाइम’ यानी अंतरिक्ष के समय की गणना को प्रभावित करती हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की इस मान्यता की उपकरणों की मदद से पुष्टि कर दी है। बीती 16 अक्टूबर यानी धनतेरस की पिछली शाम अमेरिका के वाशिंगटन डीसी से इसकी घोषणा की गयी। गर्व करने वाली बात है कि इस सफलता में भारत और नैनीताल के एरीज के वैज्ञानिकों की भी भूमिका रही है। एरीज के दो वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी इस परियोजना के अंतर्गत एक खास तरह की गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज में शामिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि ऐसी ही एक अन्य खोज, जिसमें इसी तरह दो ‘ब्लेक होल्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पुष्टि हुई है, पर इसी माह इस वर्ष यानी 2017 का विज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा नोबल पुरस्कार दिया गया है। आगे एरीज में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ यानी ‘डॉट’ में भी इस सफलता की मुख्य सूत्रधार उपकरण ‘लाइगो’ के लगने की संभावना है, जिसके बाद एरीज इस दिशा में और अधिक बेहतर परिणाम दे सकता है।
इस संबंध में मंगलवार को एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडेय ने पत्रकार वार्ता कर इस उपलब्धि की जानकारी दी। बताया कि न्यूट्रॉन स्टार्स तारों के जीवन पूरा होने के बाद शेष बचे अत्यधिक घनत्व वाले करीब 20 किमी व्यास के पिंड होते हैं। ये इतने भारी होते हैं कि इनकी एक चम्मच भर सामग्री माउंट एवरेस्ट से अधिक भारी होती है। इनके टकराने के बारे में अध्ययन लेजर तकनीक आधारित ‘अमेरिकी लेजर इंटरफेरमीटर गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला’ यानी लाइगो डिटेक्टर कहे जाने वाले उपकरणों से ही संभव होता है। यह लाइगो डिटेक्टर भारत में पुणे स्थित जॉइंट मीटर वेभ रेडियो टेलीस्कोप और लद्दाख स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप में लगे हैं। इनकी मदद से ही एरीज के दोनों वैज्ञानिकों ने इस खोज को करने में अपना योगदान दिया है। इनके अवलोकन में वैज्ञानिक सूर्य के द्रव्यमान के 1.1 से 1.6 गुना तक भारी इन खगोलीय पिंडों को 100 सेकेंड तक न्यूट्रॉन स्टार्स के रूप में चिन्हित कर सके। इनके टकराने से गामा किरणों का फ्लैश यानी एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षाओं के उपग्रहों के द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के आगमन के सापेक्ष दो सेकेंड तक देखा गया। यह इस बात का पहला निर्णायक प्रमाण है कि अक्सर उपग्रहों से नजर आने वाला अल्प अवधि का गामा विकीरण विस्फोट वास्तव में न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से उत्पन्न होता है। इसका अनुमान एक शताब्दी पूर्व आइंस्टीन से लगाया था। इससे इस बात के संकेत भी मिले हैं कि गामा विकीरण के शक्तिशाली विस्फोटों से प्राप्त विलयनों में लोहे से ज्यादा घनत्व वाले सोना और सीसा जैसे तत्वों की 50 फीसद से अधिक मात्रा होती है। लिहाजा इस खोज से एरीज के वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर है, और इसे मील का पत्थर और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

सुरक्षित निकल कर भी धरती को बड़े सुरक्षा सबक दे गया क्षुद्रग्रह ‘2012टीसी 4’

-12 अक्टूबर 2017 की दोपहर 12.12 बजे आस्ट्रेलिया के करीब से चांद की दूरी के आठवें हिस्से तक करीब से गुजरा करीब 15 मीटर व्यास का क्षुद्रग्रह
नवीन जोशी, नैनीताल। बृहस्पतिवार के दिन जब हम आम दिनों की तरह अपने काम में लगे थे, तभी करीब 15 मीटर व्यास यानी एक घर के बराबर बड़ा पिंड 4.5 मील प्रति सेकेंड यानी 7.6 किमी प्रति सेकेंड यानी 16000 मील प्रति घंटे की अत्यधिक गति से (अपार ब्रह्मांड के हिसाब से बेहद कम) धरती के मात्र 36000 किमी पास से गुजरा। गनीमत रही कि इससे धरती को कोई खतरा उत्पन्न नहीं हुआ। साथ ही अच्छी बात यह भी रही कि इसके गुजरने से देश-दुनिया के वैज्ञानिकों ने इसके गुजरने पर बारीकी से नजर रखकर भविष्य में कभी इससे बड़े क्षुद्रग्रहों के धरती से टकराने की संभावनाओं का अध्ययन और विष्लेषण भी किया, यानी इससे सबक सीखे हैं।

बृहस्पतिवार 12 अक्टूबर 2017 को धरती के बेहद करीब से गुजरे इस क्षुद्रग्रह को सर्वप्रथम पांच वर्ष पूर्व देखा गया था, इसी आधार पर इसका नाम 2012 टीसी4 रखा गया था। वैज्ञानिकों को पहले से इसके पृथ्वी के काफी करीब से गुजरने की संभावना थी। इसलिये खोजकर्ता और वैज्ञानिक इसके प्रेक्षण से भविष्य के इस तरह के संभावित खतरों से बचने का अध्ययन करने के लिये पहले से जुटे हुए थे।
स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के विज्ञान केंद्र के समन्वयक डा. रवींद्र कुमार यादव ने नासा के हवाले से बताया यह क्षुद्र ग्रह भारतीय मानक समय के अनुसार 12 बजकर 12 मिनट पर पृथ्वी के सबसे करीब से गुजरा। इसकी चमक इतनी धीमी थी कि कोरी आंखो से इसे देख पाना संभव नहीं था। बावजूद वैज्ञानिक इस नजर रखे रहे। बताया गया है कि यह आस्ट्रेलिया के दक्षिणी ओर से पृथ्वी के पास से गुजरा।

चाँद के बनने व  डायनासोरों के धरती से गायब होने के कारण भी रहे हैं क्षुद्रग्रह

नैनीताल। डा. यादव ने बताया कि हमारे सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच की एक खास पट्टी में अरबों की संख्या में क्षुद्रग्रह मौजूद हैं। इन्हें ऐसे किसी ग्रह का हिस्सा माना जाता है जो ग्रहों के बनने की प्रक्रिया के बीच ग्रह नहीं पाए और सौरमंडल में सूर्य के चारों ओर घूमते रहते हैं, और कई बार अपने पथ से भटककर दूसरे ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में भी प्रवेश कर जाते हैं। स्वयं पृथ्वी के शुरुआती समय में यह अरबों बार पृथ्वी से टकराए हैं। इन्ही शुरूआती टक्करों में से एक के कारण पृथ्वी से टूटकर ही चन्द्रमा बना। वैज्ञानिक 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व धरती के सबसे विशाल जीव डायनासोरों के समूल नाश का कारण मैक्सिको के पास एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने को ही कारण मानते हैं। वहीं भारत में भी महाराष्ट्र पांत के बुल्ढाना जिले में स्थित पानी से भरे लोनार क्रेटर को किसी क्षुद्रग्रह के टकराने के कारण ही बना हुआ माना जाता है। हाल के वर्षों में बृहस्पति ग्रह पर एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने की घटना भी प्रकाश में आई थी। इसी तरह 2013 में मध्य रूस के चेल्याबिन्स्क में करीब 10 टन वजनी क्षुद्रग्रह धरती से टकराने से पूर्व ही भस्म हो गया था, बावजूद इसके कारण करीब 1000 लोग इसके कठोर टुकड़ों से जख्मी हुए। अलबत्ता, वैज्ञानिकों का मानना है कि एक अरब क्षुद्रग्रहों में से एक के ही धरती पर टकराने की यानी बेहद कम संभावना होती है। क्योंकि धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने पर इनके जल कर भष्म होने की भी अधिक संभावना रहती है, लेकिन जिस तरह धरती पर छोटे उल्का पात भी हो जाते हैं, और नुकसान पहुंचाते हैं, लिहाजा ऐसी संभावनाओं से पूरी तरह इंकार भी नहीं किया जा सकता है। हालांकि डा. यादव ने एनईओ यानी पृथ्वी के समीप के पिंड का पता लगाने वाले विशेषज्ञों के हवाले से बताया कि ज्ञात पिंडो में से कोई भी पिंड ऐसा नही है, जिसकी आने वाले 100 वर्षो में पृथ्वी से टकराने की संभावना है।

स्विफ्ट टटल धूमकेतु से सशंकित है दुनिया !

2016 व 2040 में पृथ्वी के पास से गुजरेगा स्विफ्ट टटल 
धूमकेतुओं को बताया जाता है पृथ्वी से डायनासौर के विनाश का कारण 
1994 में बृहस्पति से टकराया था लेवी सूमेकर धूमकेतु, जिससे सूर्य के वलय भी प्रभावित हो गये थे, 
एरीज में लिये गये थे घटना के चित्र
नवीन जोशी, नैनीताल। यों तो पृथ्वी के भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों व पंडितों की ओर से अक्सर अनेक चिंताजनक भविष्यवाणियां की जाती रही हैं और अब तक ऐसी हर संभावना निर्मूल भी साबित होती रही है। लेकिन पृथ्वी के बाबत नई चिंता इस बात को लेकर उत्पन्न हो गई है कि वर्ष 2016 और वर्ष 2040 में स्विफ्ट टटल नामक एक विशालकाय धूमकेतु पृथ्वी के पास से गुजर सकता है। इसकी दूरी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति की जद में ना जाए, इस बात की चिंता है। यदि यह पृथ्वी से टकरा गया, तो इसके परिणामों का अंदाजा 1994 में पृथ्वी से कई गुना बड़े ग्रह बृहस्पति पर शूमेकर लेवी नाम के एक पृथ्वी से बड़े आकार के धूमकेतु की टक्कर के परिणामों से लगाया जाने लगा है, जिसमें शूमेकर पूरी तरह नष्ट हो गया था। बृहस्पति के वलयों पर भी इसका प्रभाव पड़ा था। इस आधार पर वैज्ञानिक 2016 व 2040 में पृथ्वी पर व्यापक नुकसान होने की संभावना की हद तक आशंकित हैं। 
शूमेकर धूमकेतु के बृहस्पति पर टकराने की घटना का नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया था और वह अपनी एक मीटर व्यास की दूरबीन से इस घटना के कई चित्र लेने में सफल रहे थे। इधर देश-दुनिया के साथ एरीज के वैज्ञानिक भी 2016 में स्विफ्ट टटल एसएन 1998  नाम के धूमकेतु के पृथ्वी के पास से गुजरने की संभावित घटना को लेकर चिंतित हैं और 1994 की घटना के अध्ययनों के आधार पर ही 2016 में किसी अनिष्ट की संभावना को टालने के लिए प्रयासरत हैं। 
गौरतलब है कि वर्ष 1994 खगोलीय घटनाओं के लिए सर्वाधिक याद किया जाता रहा है। इसी वर्ष 16 से 22 जुलाई तक जो कुछ घटा, उसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को शोध के लिए अच्छा प्लेटफार्म तो दिया ही साथ ही भविष्य में इस तरह की घटनाओं से पृथ्वी को बचा सकने की तैयारियों के लिए भी लंबा समय दिया। इस दौरान बृहस्पति पर शूमेकर लेवी नाम के एक धूमकेतु के विभिन्न आकार के टुकड़ों के टकराने से आतिशबाजी जैसी घटना हुई,फलस्वरूप शूमेकर धूमकेतु टकराने से नष्ट हो गया था। उल्लेखनीय है कि लगभग छह करेाड़ वर्ष पहले पृथ्वी से विशालकाय डायनसोरों के अंत का कारण भी धूमकेतुओं के पृथ्वी से टकराने को माना जाता है। भारत के लिए यह सौभाग्य रहा कि नैनीताल स्थित एरीज में इस महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के दिन अध्ययन किया गया। एरीज में एक मीटर व्यास की दूरबीन के साथ लगे सीसी टीवी कैमरों से इस दुर्लभ खगोलीय घटना का अध्ययन किया गया था। इस टीम में डा. जेबी श्रीवास्तव, डा. बीबी सनवाल, डीसी जोशी, डा. एचएस मेहरा, डा.एके पांडे व डा. बीसी भट्ट ने सौर घटना के महत्वपूर्ण फोटो द्वारा इस पर शोध किया। इस बाबत पूछे जाने पर एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.शशिभूषण पांडे कहते हैं कि वर्ष 2016 और वर्ष 2040 में भी धूमकेतु पृथ्वी के करीब से गुजरेगा। धूमकेतु व पृथ्वी की यह नजदीकी पृथ्वी व चंद्रमा के बीच की दूरी की 30 गुना तक हो सकती है। इतनी दूर से गुजरने को भी खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से पास से गुजरना ही कहा जाता है।
धूमकेतु क्या होते हैं ? 

नैनीताल। धूमकेतु अंतरिक्ष में घूमने वाले ऐसे सूक्ष्म ग्रह हैं जो सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच बहुतायत क्षेत्र मे फैले हैं। कभी-कभार ये पृथ्वी के आसपास भी भटकते हैं। इसी तरह का एक धूमकेतु लेवी शूमेकर भी रहा। जिसकी खोज वैज्ञानिक कैरोलिन शूमेकर व डेविड लेवी ने 1993 में की थी। यह धूमकेतु बृहस्पति से टक्कर में 22 जुलाई 1994 को नष्ट हो गया। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार इस टक्कर से लगभग साढ़े चार करोड़ मेगाटन टीएनटी मात्रा में ऊर्जा भी निकली थी। ज्ञात रहे कि इस तरह की टक्कर पृथ्वी से होती तो यहां जीवन के साथ-साथ पृथ्वी का अस्तित्व भी नहीं रहता। विश्व भर के अंतरिक्ष शोध संस्थान इस घटना से प्राप्त फोटो के आधार पर पिछले डेड़ दशक से शोध कर रहे हैं। 

खगोल वैज्ञानिकों के लिए अच्छा ‘टेस्ट मैच’
नैनीताल। एक ओर जहां धूमकेतु की पृथ्वी से टकराने की घटना ने खगोल वैज्ञानिकों के माथे पर चिंता की लकीर खीचीं है, दूसरी ओर भविष्य की इस संभावित घटना के लिए अच्छा प्लेटफार्म भी पाया है। इस बाबत एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक बहाबउद्दीन बताते हैं कि इस तरह की घटनाओं से निपटने की तैयारियों में खगोल विज्ञान और शक्तिशाली होता रहा है। दूसरी ओर यह माना जा रहा है इस तरह कि संभावित घटना पृथ्वी को आकाशीय पिंडों से बचाने व उन्हें दूर धकेलने व मिसाइल आदि से समुद्री क्षेत्र में गिराने की नई सौर तकनीकों से रूबरू होगा। यह भी सच है कि इस संभावित घटना से सौर वैज्ञानिक कई महत्वपूर्ण खोजों के साथ कईं आंकड़े भी जुटा पायेगें। 
पृथ्वी का बॉडीगार्ड है बृहस्पति 
नैनीताल। वेद पुराणों में बृहस्पति को गुरु का दर्जा मिला है। वहीं सौर विज्ञान में यह बॉडीगार्ड की भूमिका को निभाता रहा है। आकार में पृथ्वीं से कई गुना बड़ा होने के कारण यह पृथ्वी की सौर कक्षा की ओर आने वाले आकाशीय पिंडों को अपने गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में लेकर उन्हें पृथ्वी की ओर आने से रोकता है।

क्या होते हैं क्षुद्रग्रह

क्षुद्रग्रह या ‘बौने ग्रह’ ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले आकाशीय पिंड होते हैं। इनका आकर असमान होता है। पथरीले और धातुओं के ऐसे पिंड है जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं लेकिन इतने लघु हैं कि इन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता। हमारी सौर प्रणाली में लगभग 1,00,000 क्षुद्रग्रह हैं लेकिन उनमें से अधिकतर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक क्षुद्रग्रह की अपनी कक्षा होती है, जिसमें ये सूर्य के चारों और घूमते रहते हैं। इनमें से सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह हैं ‘सेरेस’। इतालवी खगोलवेत्ता पीआज्जी ने इस क्षुद्रग्रह को जनवरी 1801 में खोजा था। केवल ‘वेस्टाल’ ही एक ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है, यद्यपि इसे सेरेस के बाद खोजा गया था। इनका आकार 1000 किमी व्यास के सेरस से 1 से 2 इंच के पत्थर के टुकड़ों तक होता है। ये क्षुद्र ग्रह पृथ्वी की कक्षा के अंदर से शनि की कक्षा से बाहर तक है। इनमें से दो तिहाई क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच में एक पट्टे में है। ‘हिडाल्गो’ नामक क्षुद्रग्रह की कक्षा मंगल तथा शनि ग्रहों के बीच पड़ती है। ‘हर्मेस’ तथा ‘ऐरोस’ नामक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की ही दूरी पर हैं।

धूमकेतु व उल्का इस तरह हैं क्षुद्रग्रहों से अलग
A color image of comet Halley, shown flying to the left aligned flat against the sky
8 मार्च 1986 को देखा गया हेली धूमकेतु

नैनीताल। क्षुद्रग्रह जहां हमारे सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच की एक खास पट्टी में अवस्थित होते हैं, वहीं धूमकेतु सौरमंडल के सबसे बाहरी, प्लूटो से भी बाहर के क्षेत्र में होते हैं। इनके साथ धूल व छोटे पिंडों का गुबार होता है, जोकि सूर्य के विपरीत दिशा में पूंछ के रूप में दिखाई देता है। इसी कारण इन्हें पुच्छल तारा भी कहा जाता है। हेली पुच्छल तारा काफी चर्चित रहा है। एडमंड हेली नाम के वैज्ञानिक ने सिद्ध किया कि 1531, 1582 और 1607 में देखा गया धूमकेतु एक ही था और 1957 में फिर से दिखने की भविष्यवाणी की। वास्तव में 1959 में यह धूमकेतु आसमान में फिर से दिखा तब उसका नाम हेली धुमकेतू रखा गया। उन्होंने सर्वप्रथम सन 1705 में इसे पहचाना था।हैली धूमकेतु भीतरी सौरमंडल में आखरी बार सन 1986 में दिखाई दिया था और यह अगली बार सन 2061 में दिखाई देगा। यह प्रत्येक 75 से 76 वर्ष के अंतराल में पृथ्वी से नजर आता है।

वहीं इसकी पूंछ के रूप में दिखने वाले कुछ मिमी से कुछ सेमी के आकार के छोटे उल्का कहे जाने वाले पिंडों का भी कई बार धरती पर उल्का पात होता है। यह भी अत्यधिक गति से होने की वजह से जानलेवा हो सकते हैं। क्षुद्रग्रह मुख्य रूप से खनिज और चट्टान से बने होते हैं, जबकि धूमकेतु धूल और गैसों की बर्फ के बने होते हैं। इन्हें ‘गिरते तारे’ की संज्ञा भी दी जाती है।

Loading...

नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड