High Court Orders

हाईकोर्ट के सभी न्यायाधीश, न्यायिक अधिकारी, कर्मचारी पीएम राहत कोष में देंगे बड़ी मदद, निचली अदालतों में अवकाश बढ़ा

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-निचली अदालतों में 14 अप्रैल तक अवकाश बढ़ा
नवीन समाचार, नैनीताल, 2 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाघीश कोरोना की महामारी से लड़ने के लिए पीएम केयर यानी प्राइम मिनिस्टर्स सिटीजन एसिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन फंड में 25-25 हजार रुपए की धनराशि देंगे। साथ ही उच्च न्यायालय एवं समस्त अधीनस्थ न्यायालयों, शासन के न्याय विभाग से संबंधित सचिवों एवं विभिन्न ट्रिब्यूनलों व लोक अदालतों आदि के राजपत्रित अधिकारियों मूल एवं डीए सहित तीन दिन का वेतन, गैर राजपत्रित अधिकारी एवं कर्मचारी दो दिन का वेतन तथा चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी एवं वाहन चालक आदि एक दिन का वेतन पीएम केयर में स्वैच्छिक रूप से देंगे। सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की ओर से यह योगदान अप्रैल माह में देय मार्च माह के वेतन से काटा जाएगा। उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल हीरा सिंह बोनाल ने अपेक्षा की है कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी अथवा कर्मचारी स्वैच्छिक तौर पर पीएम केयर में यह योगदान नहीं देना चाहते हैं तो उन्हें चार अप्रैल की सुबह 10 बजे तक उच्च न्यायालय के जॉइंट रजिस्ट्रार एमसी जोशी को उनके मोबाइल नंबर 9411167403 पर संदेश भेजना होगा।
इसके साथ ही रजिस्ट्रार जनरल श्री बोनाल ने एक नोटिफिकेशन जारी कर देश में लागू 21 दिन के लॉक डाउन के दृष्टिगत अधीनस्थ न्यायालयों में 4 अप्रैल तक घोषित हुए अवकाश को 14 अप्रैल तक आगे बढ़ा दिया है। उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय में पहले ही 14 अप्रैल तक अवकाश घोषित किया जा चुका है।

यह भी पढ़ें : देहरादून के डीएम को 23 मार्च को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में पेश होने का आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने बुधवार को देहरादून के जिलाधिकारी को 23 मार्च को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए।  इसके साथ ही यह बताने का निर्देश दिया है कि देहरादून में कोई बूचड़खाना संचालित नहीं होने पर लाइव स्टॉक का ट्रक लोड क्यों हो रहा है।
बुधवार को देहरादून के जिलाधिकारी की ओर से हाईकोर्ट में दून वैली में चल रहे अवैध स्लाटर हाउस मामले में रिपोर्ट पेश की गई। कोर्ट ने रिपोर्ट पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी को 23 मार्च को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए हैं। जिलाधिकारी ने अपने शपथपत्र में कहा है कि देहरादून के भंडारी बाग में नगर निगम द्वारा संचालित स्लाटर हाउस को भी अग्रिम आदशों तक बंद कर दिया गया है। सुनवाई के दौरान  अधिवक्ता डॉ कार्तिकेय हरि गुप्ता ने बताया कि कोई भी स्थान जहां दस या उससे अधिक पशुओं का वध किया जा रहा है, वह स्थान नियमानुसार वधशाला है।  डीएम केवल सरकारी बूचड़खाने बंद करके हाईकोर्ट के आदेश के पालन से खुद को निर्दोष साबित नहीं कर सकते हैं। सभी निजी दुकानें जो दस पशुओं या अधिक का वध कर रही हैं, वे भी बूचड़खाने हैं उन्हें बंद किया जाना चाहिए। 

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने डीएम देहरादून से जिंदा जानवरों के आयात पर दो दिन में रिपोर्ट मांगी

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने दून वैली में जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिलाधिकारी देहरादून से दो दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है । कोर्ट ने यह भी पूछा है कि देहरादून में कितने अवैध स्लाटर हाउस चल रहे हैं और मीट कहां से आ रहा है। 
यह याचिका देहरादून निवासी वरुण सोबती ने दायर की है। इसमें कहा गया है कि 29 सितम्बर 2018 को हाईकोर्ट ने राज्य में अवैध रूप से चल रहे स्लाटर हाउस बंद करने व खुले में पशु वध पर रोक लगाने के निर्देश सरकार को दिए थे। केंद्र सरकार ने दून वैली को रेड जोन में रखा है। देहरादून में कोई भी स्लाटर हाउस नहीं है। बावजूद इसके यहां जिंदा जानवरों का आयात किया जा रहा है। इस पर रोक लगाई जाए। दलील में कहा कि गया है चीन में कोरोना वायरस भी पशुओं की मंडी से फैला है। ऐसे में जिंदा जानवरों को लाने व उनके वध पर रोक लगाने का आदेश पारित किया जाए।  याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने बताया कि देहरादून घाटी के लिए 1989 व 2020 में अलग-अलग नोटिफिकेशन जारी किए हैं।

यह भी पढ़ें : 2 सप्ताह के भीतर दून वैली में सभी स्लाटर हाउसों की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 2 मार्च 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने दून वैली में जिंदा जानवरों के आयात पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए देहरादून के जिलाधिकारी सहित राज्य सरकार से 2 सप्ताह के भीतर दून वैली में सभी स्लाटर हाउसों की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 16 मार्च की तिथि नियत की है। 
मामले के अनुसार देहरादून निवासी वरुण सोबती ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि 29 सितम्बर 2018 को हाईकोर्ट ने राज्य में अवैध रूप से चल रहे स्लाटर हाउस बंद करने व खुले में पशु वध करने पर रोक लगाने के निर्देश सरकार को दिए थे। लेकिन देहरादून में इस आदेश का पालन नहीं हो रहा है। यहां अवैध रूप से स्लाटर हाउस भी चल रहे हैं और खुले में पशुओं को मारा भी जा रहा है। लिहाजा दून वैली में मांस की बिक्री पर पूर्णतः रोक लगाई जाए।

यह भी पढ़ें : छात्रवृत्ति घोटाले के आरोपियों को एक माह के भीतर पैसा जमा करने के निर्देश, गिरफ्तारी पर रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 फरवरी 2020। हाईकोर्ट ने छात्रवृत्ति घोटाले मामले में आरोपी याचिकाकर्ताओं को एक माह के भीतर पैसा जमा करने के निर्देश देते हुए उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई  हुई। 
मामले के अनुसार चंद्र प्रकाश चेयरमैन चमन देवी पैरामेडिकल प्राईवेट आईटीआई सदहोली हरिया मलहीपुर रोड सहारनपुर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका में कहा कि हरिद्वार निरीक्षक कमल कुमार लुंठी ने 3 फरवरी 2020 को एफआइआर दर्ज कर कहा था कि यूपी आनलाईन वर्ष 2014-2015 में अनुसूचित जाति के 84 छात्रों को धनराशि 726600 रूपये सात लाख छब्बीस हजार छह सौ रूपये संबंधित छात्रों के बैंक खातों में प्रदान की गई। सभी छात्रों को बैक खातों में एक समान मोबाईल नंबर एवं बैंक खाते एक ही बैंक में खोले गए है। जिससे स्पष्ट है कि छात्रों के बैैंक खातों का संचालन उनसे भिन्न व्यक्ति द्वारा किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की थी। इसी प्रकार दूसरी याचिका प्रशांत वर्मा मैनेजर शिवालिक इंस्टीटयूट आफ टेक्नॉलाजी मुस्तकम सहारनपुर ने भी दायर की थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को एक माह के भीतर पैसा जमा करने के निर्देश देते हुए उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।

यह भी पढ़ें : चारधाम देव स्थानम एक्ट पर उत्तराखंड की भाजपा सरकार की मुश्किलें बढनी तय, केंद्र, राज्य व बोर्ड से जवाब तलब

-राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि स्वामी ने राजनीति से प्रेरित होकर प्रचार के लिये ये जनहित याचिका दाखिल की है

नवीन समाचार, नैनीताल, 25 फरवरी 2020। चारधाम देव स्थानम एक्ट पर उत्तराखंड की भाजपा सरकार की मुश्किलें बढनी तय हैं। मंगलवार को हाईकोर्ट ने पूरे मामले पर सुनवाई कर केंद्र सरकार, राज्य सरकार व सीईओ चारधाम देव स्थानम बोर्ड़ को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि तीन हफ्तों के भीतर सभी पक्षकार अपना जवाब दाखिल करें। सुनवाई के दौरान आज याचिकाकर्ता भाजपा सांसद पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट के सामने कहा कि कल रात ही इसका सीईओ नियुक्त किया गया है लिहाजा जब तक इस पूरे मामले की सुनवाई जारी है तब तक किसी तरह की कार्रवाई पर रोक लगाई जाये। कोर्ट ने सरकार से इस मामले पर भी जवाब दाखिल करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने चारधाम देवस्थानम एक्ट पास कर 51 मन्दिरों को इसमें शामिल किया, जिसका पंड़ा पुरोहितों ने भारी विरोध किया था। अब हाईकोर्ट में सरकार के एक्ट को बीजेपी के राज्यसभा सांसद ने ही चुनौती देते हुए कहा है कि राज्य सरकार का एक्ट असंवैधानिक है और सुप्रीम कोर्ट के 2014 के आदेश का उल्लंघन भी करता है। याचिका में कहा गया है कि सरकार को मन्दिर चलाने का कोई अधिकार नहीं है मन्दिर को भक्त या फिर उनके लोग ही चला सकते हैं लिहाजा सरकार के एक्ट को निरस्त किया जाए। आज सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि स्वामी ने राजनीति से प्रेरित होकर प्रचार के लिये ये जनहित याचिका दाखिल की है जिस पर कोर्ट में सरकार की किरकिरी भी हुई।

जिला-मंडल मुख्यालय में मित्र पुलिस का ऐसा चेहरा सामने आया है, जो उनके नाम को साकार नहीं करता है। बेशक पुलिस कर्मी अपनी कार्य परिस्थितियों में काफी तनावों व दबावों में होते हैं, लेकिन उनसे उम्मीद की जाती है कि वे आम लोगो के साथ पूरी सादगी और संवेदनशीलता से पेश आएं। उनके लिए कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहने और परेशान लोगों की समस्या सुनने की उम्मीद की जाती है। लेकिन मुख्यालय में सोमवार अपराह्न एक ऐसा मामला प्रकाश मंे आया है, जहां मल्लीताल कोतवाली पुलिस के एक सिपाही व एक दरोगा ने चेकिंग के दौरान एक महिला की समस्या नहीं सुनी। महिला वाहन के कुछ कागजात घर पर भूल आई थी और उसके पास पैंसे भी नहीं थे। उधर पुलिस कर्मी उसका चालान करने पर उतारू थे। महिला ने कुमाऊं रेंज के डीआईजी जगतराम जोशी से बात की। डीआईजी जोशी ने संबंधित पुलिस कर्मी से बात कराने को कहा तो महिला ने अपना फोन सिपाही को थमा दिया। सिपाही ने फोन कान पर लगा कर दूसरी ओर से डीआईजी की आवाज को भी गंभीरता से लिए बगैर डीआईजी से भी अभद्रता कर डाली। डीआईजी जोशी ने बताया, उनसे सिपाही ने कहा, ‘कौन डीआईजी ? कहां के डीआईजी ?’ साथ ही और भी अभद्रता करने लगा। डीआईजी जोशी ने बताया, उन्हें लगा कि संभवतया महिला ने किसी और को फोन मिला दिया है। क्योंकि जैसी बातें सिपाही कर रहा था, वैसी बातें एक पुलिस कर्मी कर ही नहीं सकता। इस पर उन्होंने सिपाही से दरोगा से बात करने को कहा तो दरोगा भी डीआईजी से अभद्रता करने लगा। डीआईजी जोशी ने बताया, उन्होंने अपने पूरे जीवन व सेवा में किसी पुलिस कर्मी से इस तरह की भाषा व व्यवहार नहीं देखा था। इसलिए दोनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संस्तुति की गई है। सिपाही को निलंबित करने एवं दरोगा को लाइन हाजिर किया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने प्रधानाचार्य से पूछा-फीस वृद्धि पर क्यों न अवमानना की कार्रवाई की जाए

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ हिमालया आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज देहरादून के प्रधानाचार्य अनिल कुमार झा को 2 मार्च को कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि क्यों न प्रधानाचार्य के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाय।
मामले के अनुसार उत्तराखंड सरकार ने 14 अक्टूबर 2015 को शासनादेश जारी कर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की फीस 80 हजार से बढ़ाकर 2.15 लाख कर दी थी। जिसे आयुर्वेदिक कॉलेजों से बीएएमएस कर रहे छात्रों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 9 जुलाई 2018 को इस शासनादेश को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ बताते हुए उसे निरस्त कर दिया और मेडिकल कॉलेजों से छात्रों से ली गई बढ़ी हुई फीस वापस करने के आदेश दिए थे। एकलपीठ के इस आदेश को आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की एसोसिएशन ने खंडपीठ में चुनौती दी, जिसे खंडपीठ ने खारिज करते हुए एकलपीठ के आदेश को सही ठहराया। किंतु लंबे समय बाद भी आयुर्वेदिक कॉलेजों ने यह फीस वापस नहीं की। इसके खिलाफ कॉलेज के छात्र मनीष कुमार व अन्य ने अवमानना याचिका दायर की।

यह भी पढ़ें : छात्रवृत्ति घोटाले में कॉलेजों के प्रबंधकों को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिए बड़े आदेश, हडकंप मचना तय

कहा-कॉलेज संबंधित धनराशि को सरकार के वित्त विभाग में जमा कराएं

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2020। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश के बहुचर्चित छात्रवृत्ति घोटाला मामले में सम्बंधित कॉलेजों के प्रबंधकों को आदेश दिए कि वे कॉलेज से संबंधित धनराशि को सरकार के वित्त विभाग में जमा कराएं। कोर्ट ने वित्त विभाग को निर्देश दिए हैं कि वह इसके लिए अलग से खाता खोलें। कोर्ट ने कहा कि जमा की गई धनराशि का निस्तारण संबंधित वाद के भविष्य में होने वाले आदेशों पर निर्भर होगा। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 

 

मामले के अनुसार प्रदेश के 500 करोड़ रुपये से अधिक के छात्रवृत्ति घोटाले में एसआईटी की ओर से जांच की जा रही है। इसमें एसआईटी ने विभिन्न कॉलेज-संस्थान प्रबंधन के खिलाफ संबंधित साक्ष्य जुटाते हुए एफआईआर दर्ज की है। कॉलेज-संस्थानों के प्रबंधकों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए अपनी गिरफतारी पर रोक लगाने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान एसआईटी के अध्यक्ष मंजूनाथ टीसी सहित कई पुलिस अधिकारी न्यायालय में उपस्थित हुए। मंजूनाथ टीसी ने कोर्ट में अब तक की गई जांच, एफआईआर व अन्य प्रगति रिपोर्ट पेश की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि कई कॉलेज प्रबंधक घोटाले की धनराशि सरकार को वापस करने को तैयार है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने कॉलेज प्रबंधन को आदेश दिए कि वे एसआईटी द्वारा आरोपित की गई धनराशि सरकार के वित्त विभाग में जमा कराएं। कोर्ट ने कहा कि इसका निस्तारण संबंधित वाद के निर्णय के अधीन रहेगा।

यह भी पढ़ें : बिजली विभाग के अधिकारी का बिल 4 लाख, वे चुका रहे सिर्फ 400 और बाकी भुगत रही जनता, हाईकोर्ट ने सरकार का किया जवाब तलब

-हाईकोर्ट ने बिजली विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को मुफ्त बिजली देने पर सरकार को भेजा नोटिस
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायाल की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने ऊर्जा निगम के अधिकारियों व कर्मचारियों को सस्ती बिजली देने व आम आदमी के लिए बिजली की दरें बढ़ाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए स्वतः संज्ञान लेकर सरकार को नोटिस जारी किया है। तथा इस प्रवृत्ति पर सख्त नाराजगी जताते हुए ऊर्जा निगम को विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि आरटीआइ क्लब देहरादून ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ऊर्जा निगमों के अधिकारियों से एक माह का बिजली बिल मात्र 4-5 सौ व कर्मचारियों का मात्र सौ रुपये लिया जा रहा है। वर्तमान कर्मचारियों के अलावा अनेक सेवानिवृत्त कर्मचारियों व उनके आश्रितों को भी मुफ्त बिजली दी गई है। वहीं ऊर्जा निगमों के अनेक अधिकारियों के आवासों में मीटर ही नहीं लगे हैं, और अन्य के मीटर खराब स्थिति में हैं। उदाहरण के लिए जीएम सीके टम्टा का 25 माह का बिल चार लाख 20 हजार आया था, लेकिन उनसे करीब 400 रुपए का बिल लिया गया। उनके बिजली के मीटर की रीडिंग 2005 से 2016 तक नहीं ली गई थी। लिहाजा उनके द्वारा प्रयोग की गई बिजली का सीधा भार जनता की जेब पर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश घोषित है लेकिन यहां हिमाचल प्रदेश से महंगी बिजली है। जबकि हिमाचल में बिजली उत्पादन कम होता है।

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