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अशासकीय विद्यालयों के लिपिकों को 2013 से ग्रेड-पे वेतन देने के निर्देश

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नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ ने अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति 1 जनवरी 2013 से ग्रेड-पे वेतन देने के निर्देश दिये हैं। मामले के अनुसार नैनीताल निवासी नारायण दत्त पांडे व ऊधमसिंह नगर निवासी मनोरथ पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि लिपिकीय संवर्ग में अशासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ व वरिष्ठ सहायक के पद पर 1994 से कार्यरत है। इधर उत्तराखंड शासन की ओर से 16 जनवरी 2013 को शासनादेश जारी कर शासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ सहायक एवं प्रवर सहायकों को तथा सहायता प्राप्त अशासकीय विद्घालयों में ग्रेड पद नाम व ग्रेड पे को 20 अक्टूबर से लागू किया गया। लेकिन विभाग से बार-बार निवेदन के बाद भी उनके प्रकरण पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। याची का कहना था कि इसी प्रकार के एक अन्य वाद में 23 मार्च 2018 को जिला हरिद्वार में अशासकीय कर्मचारियों को ग्रेड वेतन व पद नाम दोनों देने के निर्देश पारित किए है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस आधार पर कहा कि अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को भी 1 जनवरी 2013 से शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति ग्रेड पे दिया जाए।

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नैनीताल, 10  अक्तूबर 2018। उत्तराखंड में एलटी शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके विष्ट की एकलपीठ ने नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जो भी नियुक्तियां होंगी वो हाई कोर्ट के अन्तिम निर्णय के अधीन रहेंगी। उल्लेखनीय है 21 जनवरी 2018 में उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 1214 पदों पर एलटी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। जिसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिये बुलाया गया। अभ्यर्थी  हरीश कुमार व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे चुनौती दी। 

याचिका में  भर्ती प्रक्रिया  में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए आरक्षण के नियमों का पालन ना करने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने पूर्व में पूरे मामले पर सुनवाई कर नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद आज एकलपीठ में सुनवाई के बाद कोर्ट ने खण्डपीठ के आदेश का हवाला देते हुए नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है।

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-इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तहत आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की जिला स्तर पर नयी भर्तियां करने को भी कहा
-मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त की शिक्षकों की कमी व अतिथि शिक्षकों की विशेष याचिका पर सुनाया फैसला
नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खण्डपीठ ने सरकार को मई 2019 तक शिक्षको की स्थायी नियुक्ति कर प्रदेश भर के सरकारी स्कूलो में शिक्षकों की कमी को दूर करने तथा इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था करने के आदेश दिये हैं।
खंडपीठ ने छात्रो के भविष्य को देखते हुए सरकार को यह भी निर्देश दिए है कि वह अतिथि शिक्षकों की भर्ती नए सिरे से जिला स्तर पर करे। कहा कि अतिथि शिक्षकों की भर्ती में नए अभियोथियो को भी मौका दिया जायेगा, साथ ही पूर्व से कार्यरत अतिथि शिक्षकों को प्राथमिकता दी जायेगी। खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिए है कि जैसे-जैसे अध्यापको की भर्ती होगी, उसी आधार पर अतिथि शिक्षक बाहर होते रहेंगे। खंडपीठ ने संघ लोक सेवा आयोग को यह भी निर्देश दिए हैं कि प्रवक्ताओं के 917 पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया को छः माह के भीतर पूर्ण करें। साथ ही एलटी के 1214 पदों पर पूर्व से घोषित परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को तीन माह के भीतर पूर्ण किया जाये। साथ ही एलटी के 906 पदों पर पदोन्नितियां चार माह के भीतर करने, राज्य आंदोलनकारियों से खाली हुए 296 एलटी के अध्यापको के पदों पर सात सप्ताह के भीतर उत्तराखंड तकनीकी शिक्षा से नियुक्तियां करने और सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया को मई 2019 तक पूर्ण करने के आदेश सरकार को दिए है।
मामले के अनुसार मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश की सरकारी विधालयों की शिक्षा व्यव्स्था अध्यापकों की कमी के कारण चरमरा गयी है। विद्यालयों में अध्यापकों की भारी कमी है। इससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। इस कारण बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ रहा है, या सभी विषयों के शिक्षक न होने के कारण अपना पसंदीदा विषय छोड़ना पड़ रहा है। याची ने यह भी प्रार्थना की थी कि जब तक स्थायी नियुक्तिया नहीं हो जातीं तब तक वैकल्पिक व्यवस्था की जाये, क्योंकि सत्र को चले हुए चार माह का समय बीत चुका हैं। दूसरी ओर अतिथि शिक्षकों ने भी अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए विशेष अपील दायर की थी। उनका कहना था कि उनका कार्यकाल न्यायालय के आदेशानुसार 31 मार्च को समाप्त हो गया है। खण्डपीठ ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किये है।

नैनीताल हाईकोर्ट की कार्रवाई के भय से भाजपा विधायक ने छोड़ा पद !

नैनीताल, 26 सितंबर 2018। भाजपा की थराली सुरक्षित सीट से विधायक मुन्नी देवी साह ने आखिर बुधवार को जिला पंचायत अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। यह जानकारी उन्होंने बुधवार को उच्च न्यायालय को अपने मामले की सुनवाई के दौरान दी। इसके बाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने जिला पंचायत के उपाध्यक्ष व मामले के याची को थराली के जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चार्ज देने के आदेश दिये और उनकी याचिका का निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार मुन्नी देवी के थराली से विधायक चुने जाने के बाद जिला पंचायत उपाध्यक्ष लखपत सिंह बुटोला ने अध्यक्ष का चार्ज 10 अगस्त को ले लिया था। लेकिन उन्हें कार्य नहीं करने दिया। बल्कि विधायक चुनी गयीं मुन्नी देवी ही कार्य देखती रहीं। लखपत सिंह ने हाईकोर्ट मे याचिका दाखिल कर मुन्नी देवी के दो पदों पर काबिज होने को चुनौती दी। उनका कहना था कि मुन्नी देवी की दो पदों पर काम करने की मंशा है, और सरकार भी उन्हें सहयोग कर रही है। जबकि जैसे ही वे थराली सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं, वैसे ही चमोली जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट रिक्त हो गई है। पंचायती राज अधिनियम के तहत उन्होंने उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया है। मुन्नी देवी दो पदों पर एक साथ कार्य नहीं कर सकती हैं। वे या तो वो विधायक थराली रह सकती हैं, या जिला पंचायत अध्यक्ष चमोली। इस दौरान मुन्नीदेवी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद लखपत सिंह के अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया।

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  • हल्द्वानी के एसटीएच-कैंसर हॉस्पिटल के कायापलट के लिए हाईकोर्ट ने दिये आठ बड़े आदेश
  • अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए सरकार को 1 सप्ताह का अल्टीमेटम
  • हल्द्वानी के भाजपा नेता विकास भगत की जनहित याचिका पर दिये हैं यह निेर्दश

नैनीताल, 19 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज स्थित स्वामी राम कैंसर इंस्टिट्यूट को राज्य स्तरीय कैंसर इंटिटूयूट बनाने और एक हप्ते के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति करने के लिए सरकार को अंतिम निर्णय लेने और सरकार द्वारा खरीदी गयी 61 एम्बुलेंस को तीन सप्ताह के भीतर चलाने के निर्देश भी दिए है।
मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी विकास भगत ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सुशीला तिवारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों व स्वास्थ्य सेवाओ का अभाव है। विकास हल्द्वानी के भाजपा विधायक व पूर्व काबीना मंत्री बंशीधर भगत के पुत्र व युवा भाजपा नेता बताये गये हैं। इस पर पीठ ने निर्देश दिये हैं कि सरकार अस्पताल में आकस्मिकता के आधार पर एक माह के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति हर हप्ते साक्षात्कार के माध्यम से करे। साथ ही सुशीला तिवारी अस्पताल व स्वामी राम कैंसर अस्पताल के विस्तारीकरण में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के आपत्ति को दूर करने के लिए राज्य सरकार का नोडल ऑफिशर केंद्र के सामने पैरवी करे और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पैरवी के 15 दिन के भीतर लगाई गयी आपतियो का निस्तारण करे। सुशीला तिवारी अस्पताल में तीन माह के भीतर नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी व कार्डियोलॉजी विभागों की स्थापना करने और और उसके एक सप्ताह के भीतर इन विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्त करने को भी पीठ ने कहा है। साथ ही इस अस्पताल में ट्रामा सेंटर की स्थापना के लिए शुरू की गयी टेंडर प्रक्रिया को चार सप्ताह के भीतर निस्तारित करने व उसके तीन सप्ताह का भीतर ट्रॉमा सेंटर को अस्तित्व में लाने के निर्देश भी दिए है। इसके अलावा मेडिकल कालेज हल्द्वानी में रेजिडेंट डॉक्टरों के पदों को भरने के लिए छः सप्ताह में प्रक्रिया पूर्ण करने व उसके चार सप्ताह में भीतर उनकी नियुक्ति करने के आदेश भी दिए गये है। साथ ही राज्य के पहाड़ी क्षेत्रो में एम्बुलेंस के अभाव में मरीजो को डोलियो व कुर्सियो में लाने-ले जाने का सज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने 61 एम्बुलेंस को शीघ्र चलाये जाने के आदेश दिए है। साथ ही खंडपीठ ने कुमाऊं मण्डल में चिकित्सको के कुल 1110 पदों में से 445 रिक्त पदों को शीघ्र भरने के आदेश भी दिए है।

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नैनीताल, 14 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने उपनल कर्मियो को साल में दिए जाने वाले ब्रेक पर रोक लगा दी है। खंडपीठ ने इसे सर्वोच्च न्यायलय के आदेशों के विपरीत माना है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाईकोर्ट के आदेशों पर राज्य सरकार सरकार की ओर से आज कोर्ट को बताया गया कि इस प्रकरण पर विचार किया जा रहा है और 2 सप्ताह के भीतर निर्णय ले लिया जाएगा। मामले के अनुसार कुंदन सिंह नेगी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र भेजकर उपनल द्वारा की जा रही नियुक्तियों पर रोक लगाने की मांग की है। जिसका हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया है। याचिका में कहा गया कि उपनल का संविदा लेबर एक्ट में पंजीकरण नही है इसलिए यह असंवैधानिक संस्था है। उपनल का गठन पूर्व सैनिको व उनके आश्रितों के लिए हुआ था लेकिन राज्य सरकार ने इस संस्था को आउटसोर्सिंग से कर्मचारियों की नियुक्ति का माध्यम बना दिया है। जिस पर पूर्ण नियंत्रण राज्य सरकार का है। याचिका में उपनल कर्मियों के समाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भविष्य के लिए निति बनाने की मांग की। अधिवक्ता एमसी पंत की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि कर्मचारियों की ओर से जब याचिका दायर की थी तो सरकार उनको एक दिन का फिक्सनल ब्रेक साल में देती है, जिससे कि उनकी नियमित नियुक्ति ना हो सके। कोर्ट ने सरकार को ऐसा कोई ब्रेक न देने को कहा है और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध माना है।

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नैनीताल, 6 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने शक्तिगढ़ (शक्तिफार्म) नगर पंचायत में हुए बहुचर्चित राजीव आवास योजना घोटाले से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ऊधमसिंह नगर जनपद के डीएम को आठ सप्ताह के भीतर पीड़ित पक्षों को सुनकर याची की आपत्ति को निस्तारित करने के आदेश दिये हैं।
मामले के अनुसार ऊधमसिंह नगर के शक्तिगढ़ नगर पंचायत निवासी रमेश राय पुत्र स्वर्गीय वीरेंद्र राय ने 18 जुलाई 2016 को क्षेत्र के एसडीएम एवं ऊधमसिंह नगर के डीएम को ज्ञापन सोंपकर राजीव आवास योजना में अनेक अनियमितताएं होने के आरोप लगाये थे। उनका कहना था कि इस योजना के तहत 3.68 लाख रुपयों से टाइप ए एवं 3.88 लाख रुपयों से टाइप बी के कुल 504 राजीव आवासों का निर्माण होना था। योजना के नियमों के तहत नगर पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के रक्त संबंध वाले संबंधियों को भी योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता है, और योजना के तहत भवनों का निर्माण स्वयं लााभार्थियों को अपना 10 फीसद अंश लगाकर निर्माण करना था। किंतु शक्तिगढ़ नगर पंचायत के चार में से दो सभासदों ने भी योजना के तहत आवास ले लिये। यही नहीं निर्माण लाभार्थियों के बजाय बिना निविदा कराये ठेकेदार से करवा दिये। निर्माण कार्य भी इतने घटिया हुए कि इनके लिंटर ढहने और फर्श व बुनियाद बैठ गयी हैं। शुक्रवार को खंडपीठ ने याचिका पर अपना निर्णय सुनाते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया।

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-एक डीएसपी की सेवाओं में सेना की सेवाओं को नहीं जोड़ा गया, फलस्वरूप उनसे कनिष्ठ को पदोन्नति दी गयी
-केंद्रीय लोक सेवा आयोग केे तीन पत्रों के बावजूद उनके प्रपत्र मुख्य सचिव ने नही भेजे

नैनीताल, 6 सितंबर 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने मुख्य सचिव से पूछा है कि न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने के मामले में क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाए। उच्च न्यायालय के रजिस्ट्री कार्यालय को मुख्य सचिव को नोटिस जारी करने को कहा गया है। उल्लेखनीय है कि याची डीएसपी रवींद्र सिंह नयाल की याचिका की सुनवाई करते हुए पिछली तिथि को खंडपीठ ने मुख्य सचिव को 48 घंटे के अंदर संघ लोक सेवा आयोग को याची के समस्त प्रमाण पत्र भेजने के भी निर्देश दिये थे।
मामले में याची का कहना था कि वह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं। उनकी सेवाओं में सेना की सेवाओ को नही जोड़ा गया, और उनसे जूनियर अधिकारियों का प्रमोशन कर दिया गया है। लिहाजा उनकी समस्त सेवाआंे को जोड़कर सभी लाभ दिए जायें। केंद्रीय लोक सेवा आयोग ने 24 अप्रैल 2018, 31 जुलाई 2018 व 7 अगस्त 2018 को तीन पत्र भेजे, परंतु अभी तक उनके द्वारा नही भेजे गए। न्यायालय ने कहा कि प्रदेश के मुख्य सचिव की ओर से मामले को संघ लोक सेवा आयोग के बजाय उप्र आयोग को भेज दिया गया। अगली सुनवाई की तिथि 10 सितम्बर की नियत की है।

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नैनीताल, 31 अगस्त 2018। अब अंगुलियों से विहीन अथवा आंखों में दिक्कत जैसे आधार कार्ड बनाने में किसी कारण से अनुपयुक्त दिव्यांगों के आधार कार्ड भी बन सकेंगे। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दिव्यांग (विकलांगता) पेंशन संबंधी एक पत्र का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में मानते हुए जिलाधिकारियों से ऐसे सभी मामलों में मानवीयता व संवेदनशीलता दिखाते हुए दिव्यांगों के आधार कार्ड बनाने और दिव्यांग पेंशन देने के आदेश दिये हैं।
उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी दिव्यांग लक्ष्मण सिंह नेगी ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि विकलांगता के कारण उनके तथा कई लोगों के आधार कार्ड नहीं बन रहे हैं। इस वजह से उन्हें विकलांगता पेंशन भी नहीं मिल पा रही है। न्यायालय ने इस मामले को अति संवेदनशील मानते हुए प्रशासन को आदेश दिए हैं कि ऐसे लोगों के साथ मानवीयता का व्यवहार करते हुए इनकी समस्याओं का समाधान अति शीघ्र किया जाना चाहिए। खासकर याची के मामले में अल्मोड़ा के डीएम को तीन दिन के भीतर बनाने तथा सात दिन के भीतर उनकी रुकी हुए पेंशन एरियर सहित देने के आदेश दिये।

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  • देहरादून स्थित एनआईवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थान का मामला, रंग लाया छात्रों का आंदोलन, हाईकोर्ट ने सचिव सेंथिल पांडियन को बनाया जांच अधिकारी

नैनीनाल, 29 अगस्त 2018। नैनीताल हाईकोर्ट ने देहरादून के एनआइवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थानमें छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और यौन शोषण के मामले को गंभीरता से लिया है। प्रकरण में नैनीताल हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने संस्थान के निदेशक को आदेश दिया है कि छेड़छाड़ के आरोपी टीचर को सस्पेंड कर उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज करें। गौरतलब है कि छेड़छाड़, यौन शोषण सहित कई मांगों को लेकर पिछले लम्बे समय से आंदोलन कर रहे छात्र आंदोलन कर रहे थे, उनकी मुहिम आखिर रंग लाई है।  इसके बाद एनआईवीएच में सुधार की उम्मीद जगी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सचिव सेंथिल पांडियन को इस जांच अधिकारी नियुक्त किया है और कहा है कि तीन दिनों के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट सभी बातें पेश करें।

इसके साथ ही एसएसपी देहरादून को आदेश दिया है कि वो एनआइवीएच में रेगुलर विजिट के लिए एक महिला एसआई के साथ दो कॉन्स्टेबलों की नियुक्ति करें। संस्थान में बिजली की आपूर्ति बाधित ना हो इसके लिये 48 घंटों के भीतर जनरेटर की व्यवस्था की जाए। साथ ही संस्थान में 12 घंटों के भीतर एमबीबीएस डॉक्टर की नियुक्ति की जाए, जिससे बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके अलावा हाईकोर्ट ने संस्कृति सचिव को आदेश दिया है कि एनआईवीएच में खेल मैदान बनाया जाए। साथ ही बच्चों को खेल और सास्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि इस संस्थान में सात दिन के भीतर नियमित निदेशक की नियुक्त की जाए। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार यानी 4 सितंबर को होगी।

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नैनीनाल, 23 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिम कार्बेट पार्क में वन्यजीवों की सुरक्षा के मामले में बेहद सख्त रुख दिखाते हुए राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को नोटिस जारी किया है। साथ ही राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को अंतरिम रूप से जिम कॉर्बेट पार्क पर अपना नियंत्रण लेने के आदेश दिए है। साथ ही प्राधिकरण से वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए उठाये जा सकने वाले कदमों पर 30 अगस्त को अगली सुनवाई तक न्यायालय में जवाब देने को कहा।

उच्च न्यायालय ने यह बात राज्य सरकार पर वन्य जीवों के प्रति उदासीन बताने की अभूतपूर्व टिप्पणी व उससे जिम कार्बेट पार्क का प्रबंधन हटाने की अभूतपूर्व कार्रवाई करते हुए कही है। पीठ ने कहा कि हाथियों की मौत के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद पांच लोग देश से बाहर चले गए। इस पर उन्होंने नैनीताल के एसएसपी से भी सवाल-जवाब किये और उनके द्वारा दिये गये शपथ पत्र पर नाराजगी जतायी। कहा कि आरोपितों को रोकने के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए गए। वहीं गूजरों को ना हटाये जाने पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई। कहा सरकार वन गूजरों को क्यों बचा रही है। बार-बार शपथ पत्रों में बदलाव करने पर भी न्यायालय ने राज्य सरकार को गैरजिम्मेदार बताया। अपर मुख्य सचिव के न्यायालय में पेश ना होने को अदालत के आदेश से बचने का प्रयास बताया।

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वन गूर्जरों को सरकार स्वयं अतिक्रमणकारी मानती है तो मुआवजा क्यों दे रही है
-झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा
-हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों में शीघ्र कार्यवाही करे नैनीताल पुलिस
-फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा
नैनीताल, 16 अगस्त 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन भूमि पर रह रहे वन गूर्जरों को नया नोटिस जारी कर हटाने के निर्देश दिये हैं। कोर्ट ने दिसंबर 2017 से मार्च 2018 तक देश के विभिन्न हिस्सों में मिली बाघ की पांच खालों के जिम कॉर्बेट पार्क रामनगर के बाघों के होने व दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही न होने पर अपर मुख्य सचिव से छह दिन में जवाब पेश करने को कहा है। साथ ही मामले को सीबीआई को भेजे जाने की चेतावनी भी दी है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में हिमालयन युवा ग्रामीण विकास समिति रामनगर की जनहित याचिका में अनिल बलूनी के प्रार्थना पत्र, जिसमें कार्बेट पार्क के बफर जोन से वन गुर्जरों को हटाने व बाघों के संरक्षण की अपील की गयी थी की सुनवाई के दौरान राज्य के अपर मुख्य सचिव रणबीर सिंह ने शपथ पत्र पेश कर 11 अगस्त को पारित आदेशों के क्रियान्वयन की जानकारी दी। किन्तु वन गूर्जरों को हटाने के संदर्भ में कार्बेट पार्क के निर्देशक की ओर से वन गूर्जरों को दिये गये नोटिस पर हाईकोर्ट ने असंतोष व्यक्त करते हुए नया नोटिस जारी करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वन विभाग ने नोटिस में हाईकोर्ट के आदेश का आर्डर का जिक्र क्यों किया और अतिक्रमणकारियों को वन भूमि खाली करने के लिये इतना समय क्यों दिया गया, उनके द्वारा वन भूमि खाली करने पर एक ही परिवार के 10 या उससे अधिक लोगों को 10-10 लाख रूपये का मुआवजा देने या 2 एकड़ भूमि देने का प्रस्ताव क्यों रखा गया है। जबकि सरकार उनको अपने शपथ पत्र में अतिक्रमणकारी मान रही है। कोर्ट ने इस मामले में झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने जिम कार्बेट पार्क के निदेशक राहुल से वन गुर्जरों की अतिक्रमित भूमि का मौका मुआयना करने को भी कहा है। साथ ही खंडपीठ ने पांच बाघों की खालों के मामले में जांच में दोषी पाये गये अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय एसआईटी गठित करने पर असंतोष व्यक्त करते हुए अपर मुख्य सचिव से पूछा कि उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही की है। चेतावनी दी कि इस मामले को कोर्ट जांच के लिये सीबीआई को सौंप देगी। इसके साथ ही आज रामनगर वन प्रभाग की डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि कब्जे में लिये गये हाथी अभी पूर्ण स्वस्थ नहीं है। उनका उपचार चल रहा है। इनके खाने-पीने व रहने की पर्याप्त व्यवस्था की है। इसके अलावा कोर्ट ने हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों की शीघ्र कार्यवाही करने के निर्देश एसएसपी नैनीताल को दिये हैं और प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। साथ ही टाइगर रिजर्व फोर्स के संदर्भ में काबेट पार्क के निदेशक ने बताया कि विभाग 83 फारेस्ट गार्डों की प्रतिनियुक्ति कर रही है। इस पर हाईकोर्ट ने फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : कमजोर तर्कों के कारण सरकार को वापस लेनी पड़ी रीवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों से सम्बंधित पुर्नविचार याचिका

नैनीताल, 18 जुलाई, 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के राज्य में रीवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए दो सप्ताह में उचित नियम बनाये जाने के एकलपीठ के आदेशों पर उत्तराखंड सरकार ने अब तक नियम तो नहीं बनाये, उलटे न्यायालय को कमजोर तर्कों से भरमाने का ऐसा बचकाना प्रयास किया कि उसे मुंह की खानी पड़ गयी। उच्च न्यायालय की एकलपीठ के आदेश  के विरुद्ध सरकार ने खंडपीठ में पुनर्विचार याचिका दायर की। बुधवार को पुनर्विचार याचिका पर वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद सरकार को अपनी पुनर्विचार याचिका को वापस लेना पड़ गया।
सरकार ने पुनर्विचार याचिका में कहा था कि सरकार ने राफ्टिंग के लिये 2014 में नियम बनाये हैं, जबकि पैराग्लाइडिंग के सम्बंध में नियम नही बने हैं। सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए न्यायालय को अवगत कराया कि जो नियम 2014 में सरकार ने बनाये थे उनका सरकार ने नोटिफिकेशन ही नही किया था, लिहाजा राफ्टिंग व पैराग्लाइडिंग के सम्बन्ध में अभी कोई नियम नही बने हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व में देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। लेकिन उन्होंने शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाए और कैंपों में गंगा के किनारे मांश व मदिरा का सेवन, डीजे बजाना तथा शौचालय व बाथरूम का मुहाना नदी में खोलने जैसे असामाजिक कार्य भी किए जाने लगे।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए नियमावली बनने तक रोक

नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए उचित नियमावली बनाने के निर्देश दिए हैं, और तब तक रीवरराफ्टिंग की स्वीकृति न देने तथा जो चल रहें हैं, उन पर रोक लगाने को कहा है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने हाईकार्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। याचिका में विपक्षीगणों की ओर से शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाने शुरू कर दिये और कैंपों में गंगा के किनारे कैंप की आड में मीट, मदिरा का सेवन, डीजे बजाना, बाथरूम का मुहाना नदी में खोलना व कूडा इत्यादि नदी में बहाने जैसे असामाजिक कार्य किए जाने लगे। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में कुछ फोटोग्राफ भी याचिका में लगाए थे। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिए हैं कि वे नदी के किनारे उपयुक्त शुल्क लिये बिना लाइसेंस जारी नहीं कर सकती तथा खेल गतिविधियों के नाम पर अय्याशी करने की स्वीकृति नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा राफ्टिंग कैंप को नदी किनारे स्वीकृति दी गई है, जिससे नदियों का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और राफ्टिंग के नाम पर लांचिंग पाइंट पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन रही है। बडे बडे राफ्टों से छोटी गाड़ियों से भी ढोया जा रही हैं। इस प्रकार की गतिविधियों की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए तथा राफ्टों को मानव शक्ति द्वारा ले जाया जाए न कि गाडियों द्वारा।

सात साल के बाद आचार्य बालकृष्ण को मिली राहत

  • हाई कोर्ट ने दिये सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे में 2011 में जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण का जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश दिए हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण का पासपोर्ट जुलाई 2011 से हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय मे जमा है। 2011 में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ धोखाधड़ी व फर्जी तरीके से शैक्षणिक दस्तावेज व पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में धारा 120 बी के तहत षडयंत्र का आरोप लगाया था। पूर्व में एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को हाईकोर्ट में जमा करने के आदेश दिए थे। तब से उनका पासपोर्ट यहीं जमा है। इधर मंगलवार को मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को रिलीज करने के निर्देश दे दिए हैं, साथ ही पासपोर्ट ऑथोरिटी को निर्देश दिए हैं कि वे चाहें तो बालकृष्ण के विदेश से लौटने के बाद उन्हें पासपोर्ट ऑथोरिटी के समक्ष पेश करवा लें या विदेश से आने का शपथपत्र लें।

तराई बीज निगम घोटाले में तीन आरोपितों की गिरफ्तारी पर लगी रोक हटी

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखंड तराई बीज निगम में हुए 16 करोड़ के बीज घोटाले के आरोपितों की मुश्किलें बढ़ गई है। नैनीताल उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने तीन आरोतितों पीके चौहान, अजीत सिंह व गिरीश तिवाड़ी की गिरफ्तारी से रोक हटा दी है, जिसके बाद तीनों आरोपितों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है।
उल्लेखनीय है कि तराई बीज निगम में गेहूं बीज घोटाला सामने आने के बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले पर एसआईटी जांच शुरू कर दी थी। इस पूरे मामले में एसआईटी ने 10 प्रशासनिक अधिकारियों को आरोपी बनाते हुए 7 जुलाई 2017 को मुकदमा दर्ज किया था। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिये इन अधिकारियों ने उच्च न्यायालय की शरण ली। पूर्व में न्यायालय ने सभी की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इधर एसआईटी की ओर से उच्च न्यायालय में बताया गया कि तीनों अधिकारियों द्वारा जांच में सहयोग नहीं किया जा रहा है, जिसके बाद न्यायालय ने पूरे मामले की सुनवाई कर तीनों आरोपितों की गिरफ्तारी से रोक को हटा दिया है। अब न्यायालय पूरे मामले पर 23 जुलाई को सुनवाई करेगी।

काशीपुर के महेशपुरा में कब्रिस्तान की जमीन से एक महिने के भीतर हटाना होगा कब्जा-अतिक्रमण 

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने ऊधमसिंह नगर जिला प्रशासन काशीपुर के महेशपुरा में कब्रिस्तान की जमीन से एक महिने के भीतर कब्जा निरस्त कर अतिक्रमण हटाने के आदेश दिये है।
मामले के अनुसार मौलाना आजाद जन कल्याण समिति ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि काशीपुर के महेशपुर की जमीन कब्रिस्तान की जमीन के रूप में दर्ज है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पूरे इलाके के कागजों में हेराफेरी कर अन्य लोगों का कब्जा दिखाया गया है। याची ने उच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि कब्रिस्तान की जमीन से कब्जे निरस्त कर उसे खाली कराया जाय।

यह भी पढ़ें : एलटी की काउंसलिंग जारी रखने लेकिन उसके परिणाम घोषित करने पर रोक

नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एलटी परीक्षा में हुई अनियमितताओं के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करने के बाद काउंसलिंग जारी रखने को कहा है, परंतु उसके परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी है। बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार उत्तरकाशी निवासी राममोहन सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि मई 2018 को एलटी परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया था, और इधर चल रही इसकी काउंसलिंग की प्रक्रिया में कई अनियमितताएं की गई हैं। याचिका में कहा गया है कि जिन अभ्यर्थिंयों के ज्यादा अंक है उसको मात्र ओबीसी के लिए टीईटी में नियत नंबर होने के कारण पीछे रखा गया है, जो कि गलत है। जबकि अभ्यर्थी मेरिट में ऊपरी स्थानों पर आना चाहिए था। ऐसे अनेक अभ्यर्थी है जिनका गढवाल व कुुमाऊं दोनों मंडलों में चयन किया गया है, जिससे कि अनेकों अभ्यर्थी चयन हाने से वंचित रह गए हैं। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिया नजीर पेश करने वाला बड़ा फैसला : फांसी की सजा पाये दोषियों को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार 27 अप्रैल 2018 को एक बड़ा, देश भर के लिए नजीर बन सकने वाला फैसला देते हुए फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया है। अपने निर्णय में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश आलोक सिंह की खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा है कि सजा के दो-तीन दिन तक ही फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखा जा सकता है, उसके बाद उनको अन्य कैदियों के साथ ही रखा जाय। खंडपीठ ने इस संबंध में जेल मैन्युअल में दिए गए प्राविधानों को भी असवैधानिक माना और कहा कि जेल मेनुअल में फांसी की सजा पाये अभियुक्तों को 24 घण्टे में से 23 घंटे अलग रखे जाने का प्राविधान गलत है और यह भी एक प्रकार की दूसरी सजा से कम नही है।
खंडपील ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी निचली अदालत द्वारा एक महिला की क्रूरतापूर्वक की गयी हत्या व दुर्व्यवहार किये जाने के आरोपी सुुशील व महताब को निचली अदालत द्वारा दी गयी फांसी की सजा के मामले में की। खंडपीठ ने फांसी की सजा को बरकरार रखा, परन्तु दोषियों पर लगाये गए एससी-एसटी एक्ट को गलत माना और फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को अकेले रखने को असवैधानिक माना।
मामले के अनुसार विकास नगर निवासी अनिल चौहान ने 29 दिसम्बर 2012 को विकास नगर थाने में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई थी कि उसकी 55 वर्षीय माँ गायों को चराने के लिए जंगल गयी हुई थी, जहां से वह वापस नही आयी। काफी खोजबीन करने पर उनका शव जंगल में मिला और उनके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ था। जाँच करने पर उक्त दोनों अभियुक्तों के द्वारा हत्या करने की पुष्टि हुई। मामले में विशेष न्यायाधीश देहरादून द्वारा उन्हें 27 जनवरी 2014 को आईपीसी की धारा 302,376 जी में निर्मम हत्या करने व दुष्कर्म करने के मामले में फाँसी की सजा सुनाई गयी। साथ ही उन पर एससी-एसटी एक्ट भी लगाया। इस आदेश को सरकार व अभियुक्तों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी जिस पर अभियुक्तों के अधिवक्ता ने कहा है कि अभियुक्तों के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी शाक्ष्य नही है उनको संदेह के आधार पर इस मामले में फसाया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : हरिद्वार की निलंबित जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी के सीज वित्तीय अधिकार भी बहाल

नैनीताल, 12 अप्रैल 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ ने ने हरिद्वार की निलंबित जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी के वित्तीय अधिकार बहाल कर दिये हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व में 12 मार्च 2018 न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ ने उनके कार्यकाल को बहाल कर दिये थे, परन्तु उनके वित्तीय अधिकार को सीज रखे थे। उस आदेश को याची द्वारा विशेष अपील के जरिये न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खण्डपीठ में चुनोती दी गई थी, जिसमें सुनवाई के बाद खंडपीठ ने उनके वित्तीय अधिकार को बहाल कर दिया है ।

जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी

मामले के अनुसार हरिद्वार की जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी पर आरोप था कि उन्होंने दुकानों की नीलामी में वित्तीय अनियमितताएं करते हुए अपने चेहतो की दुकांने आवंटित की हैं। इन आरोपों पर हरिद्वार के जिला अधिकारी ने दिसम्बर 2017 में उनके वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा दी थी। श्रीमती चौधरी ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा था कि उनके वित्तीय अधिकार सीज करने का अधिकार जिला अधिकारी को नहीं है। सरकार ने बिना उन्हें सुने नियम विरुद्ध वित्तीय अधिकार सीज कर दिए हैं। हालांकि सरकारी महाधिवक्ता ने कहा कि चौधरी को अपना पक्ष रखने के लिए पूरा अवसर दिया गया, लेकिन उन्होंने जानबूझकर अपना पक्ष नहीं रखा। यह भी कहा कि चौधरी पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं इसलिए उनके अधिकार बहाल नहीं हो सकते। मामले को सुनने के न्यायालय ने जिला पंचायत अध्यक्ष के कार्य को बहाल कर दिया और सरकार को निर्देश दिए कि उनको सुनवाई का उचित अवसर दें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के मुख्य सचिव व हरिद्वार के डीएम को हाईकोर्ट से अवमानना नोटिस

नैनीताल, 15 मार्च 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ ने ने प्रदेश के मुख्य सचिव उत्पल कुमार एवं हरिद्वार के डीएम दीपक रावत को अलग-अलग मामलों में अवमानना के नोटिस जारी किये हैं। पहला मामला किसान राईस मिल, डीएन एग्रो, अमन एग्रो, सोना एग्रो, गुरु कृपा राईस मिल, अनजानी राईस मिल और सोहता राईस मिल जसपुर ऊधम सिंह नगर से जुड़ा है। जिन्होंने उच्च न्यायालय ने में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि उत्तराखंड एग्रीकल्चरल प्रोड्यूज मार्केटिंग डेवलपमेंट रेगुलेशन एक्ट की धारा 27(ब) को सर्वोच्च न्यायालय ने हटा दिया था जिसके आधार पर समस्त राईस मिलों से मंडी शुल्क एवं विकास शुल्क लिया जाता था परन्तु इस धारा के हट जाने के बाद उनकी जमा मंडी फीस अभी तक सरकार ने वापस नही की है। पूर्व में उच्च न्यायलय ने सरकार को मंडी शुल्क एवं विकास का पैसा वापस करने और याचियों के प्रत्यावेदनों को तीन माह के भीतर निस्तारित करने को कहा था और इस हेतु सरकार से मुख्य सचिव, वित्त सचिव व विधि सचिव की तीन सदस्यीय कमेटी का गठन करने को कहा था। परन्तु सरकार ने कोई कमेटी गठित नहीं की। मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी कर 23 अप्रैल तक जवाब पेश करने को कहा।

वहीं दूसरे मामले में उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के आदेश का पालन न करने पर हरिद्वार के डीएम दीपक रावत, मुख्य नगर आयुक्त व ठेकेदार अनुज कुमार को अवमानना नोटिस जारी किया है। इस मामले में लघु व्यापार कल्याण समिति ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा है सरकार ने 25 मई 2016 को नियमावली जारी की थी। जिसके तहत नगर निकायों में साप्ताहिक हाट बाजारों की व्यवस्था की गयी। उच्च न्यायालय ने पूर्व में इसके लिए टाउन वेंडिंग कमेटी गठित करने के आदेश दिए थे। उक्त नियमावली के सेक्शन 16(2) के अनुसार साप्ताहिक पीठ बाजारों से ठेकेदारी के आधार पर अति लघु व्यापारियों से तहबाजारी वसूली नहीं करनी थी। परन्तु हरिद्वार नगर निगम द्वारा तहबाजारी वसूल की जा रही है। साथ ही टाउन वेंडिंग कमेटी का गठन भी नही किया गया।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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