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पंचायत चुनाव में बड़ा आदेश: पंचायती राज निदेशक से परिसीमन व आरक्षण पर आपत्तियां फिर दो सप्ताह में सुनने को कहा..

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नवीन समाचार, नैनीताल, 5 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने प्रदेश में आयोजित होने जा रहे त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में सीटों के आरक्षण एवं परिसीमन के मामले में पंचायती राज के निदेशक को दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुनने एवं निर्णय लेने पर विस्तृत कारण देने के आदेश सुनाए हैं।
मामले के अनुसार डोईवाला देहरादून निवासी संजय पोखरियाल ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि देहरादून जिले की जिला पंचायत सीटों के मामले में उनका पक्ष सुने बिना ही परिसीमन एवं आरक्षण जारी कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि देहरादून जिले की हरिपुर कला, साहब नगर व खदरी खड़क माप जिला पंचायत सीटों के परिसीमन व आरक्षण पर आपत्ति जताई कि पक्ष नहीं सुना गया। पहले हरिपुर कला अनारक्षित थी, जबकि साहब नगर एवं खदरी खड़क माप को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था, किंतु बाद में दबाव में आकर खदरी खड़क माप को अनारक्षित तथा हरिपुर कला को महिलाओं हेतु आरक्षित कर दिया। जबकि हरिपुर कला 2003 में महिला, 2008 में अनारक्षित एवं 2014 में महिला के लिए आरक्षित थी। बताया गया है कि उत्तरकाशी सहित कुछ अन्य मामलों में भी एकल पीठ ने यही आदेश जारी किये हैं।

यह भी पढ़ें : प्रदेश के बहुचर्चित आवास घोटाले में भाजपा नेता सहित 17 दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने व वसूली करने के आदेश..

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश के बहुचर्चित, शक्तिगढ़ (शक्तिफार्म) नगर पंचायत में हुए बहुचर्चित राजीव आवास घोटाला मामले में भाजपा नेता सहित 17 दोषियों से योजना के तहत राजकोष को पहुंचाये गये नुकसान की वसूली करने एवं उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिये हैं, साथ ही प्रदेश के मुख्य सचिव एवं ऊधमसिंह नगर जिले के डीएम से मामले में 15 दिन के भीतर खंडपीठ के समक्ष कृत कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट का काउंटर दाखिल करने के आदेश दिये हैं। मामले में आधे घंटे तक चली बहस में न्यायालय ने यह भी कहा कि गरीबों का पैंसा अमीरों में बांटने के लिए नहीं है।
उल्लेखनीय है कि मामले में वर्ष 2016 से सक्रिय याचिकाकर्ता रमेश राय की याचिका पर आये उच्च न्यायालय के आदेशों पर ऊधमसिंह नगर के डीएम द्वारा कराई गयी जांच में शक्तिगढ़ नगर पंचायत के तत्कालीन अध्यक्ष भाजपा नेता सुक्रांत ब्रह्म, दो सभासद उमेद सिंह व शगुन गुप्ता के साथ ही पूर्व अधिशासी अधिकारी जयवीर राठी व मौजूदा अधिशासी अधिकारी सरिता राणा तथा मौजूदा अवर अभियंता रावेंद्र पाल सिंह सहित कुल 17 लोग दोषी पाये गये थे। इधर श्री राय एवं प्रेम कुमार अरोऱा द्वारा मामले में पुनः उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा गया कि डीएम द्वारा जांच रिपोर्ट न्यायालय एवं शासन को भेजने के बावजूद न ही दोषियों के खिलाफ पुलिस में कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया, न योजना के तहत आवास प्राप्त करने वाले अपात्रों से कोई रिकवरी की गयी, और न कार्यरत अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कोई प्रशासनिक व विभागीय कार्रवाई ही की गयी। याचिकाकर्ता के अनुसार पूर्व में उन्होंने 18 जुलाई 2016 को क्षेत्र के एसडीएम एवं ऊधमसिंह नगर के डीएम को ज्ञापन सोंपकर राजीव आवास योजना में अनेक अनियमितताएं होने के आरोप लगाये थे। उनका कहना था कि इस योजना के तहत 3.68 लाख रुपयों से टाइप ए एवं 3.88 लाख रुपयों से टाइप बी के कुल 504 राजीव आवासों का निर्माण होना था। योजना के नियमों के तहत नगर पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के रक्त संबंध वाले संबंधियों को भी योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता है, और योजना के तहत भवनों का निर्माण स्वयं लााभार्थियों को अपना 10 फीसद अंश लगाकर निर्माण करना था। किंतु शक्तिगढ़ नगर पंचायत के चार में से दो सभासदों ने भी योजना के तहत आवास ले लिये। यही नहीं निर्माण लाभार्थियों के बजाय बिना निविदा कराये ठेकेदार से करवा दिये। निर्माण कार्य भी इतने घटिया हुए कि इनके लिंटर ढहने और फर्श व बुनियाद बैठ गयी हैं।

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-हाईकोर्ट ने बिजली विभाग के खिलाफ याचिका पर याचिकाकर्ता से प्रतिशपथ पत्र मांगा
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने बिजली विभाग के कर्मचारियों से बिजली बिलों का भुगतान न्यूनतम लिये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर याचिकाकर्ता से दस दिन के भीतर प्रति शपथपत्र पेश करने को कहा है। ऐसा यूपीसीएल द्वारा आरोपों को नकारने के बाद किया गया है।
उल्लेखनीय है कि कि आरटीआई क्लब उत्तराखंड ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर राज्य में बिजली की दरों में लगातार की जा रही वृद्धि को चुनौती दी है। कहा है कि विभाग ने अपने छोटे-बड़े अधिकारियों का चाहे जितनी बिजली खर्च करें, 100 से 500 रुपये महीना बिल फिक्स कर दिया है। इतना ही नहीं विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के घरों में या तो मीटर हैं ही नहीं, या खराब पड़ें हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि यूपीसीएल के जीएम ने एक महीने में 92,000 यूनिट बिजली खर्च की जिसका बिल एक लाख से ऊपर था लेकिन इसके एवज में उन्होंने सिर्फ 425 रुपये ही जमा किए। इस तरह बिजली विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के द्वारा मुफ्त के भाव खर्च की जा रही बिजली का पैसा भी जनता से लिया जा रहा है, लिहाजा इस तरह के फर्जीवाड़े और बिजली घोटाले को बंद किया जाए। वहीं मंगलवार को यूपीसीएल के द्वारा विस्तृत जवाब पेश करने की जगह शपथ पत्र के जरिये छोटा जवाब पेश कर जनहित याचिका में उठाये गए सभी बिंदुओं को निराधार करार दिया। इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने जिन बिंदुओं पर जनहित याचिका दायर की है, वे आंकड़े उन्हें विभाग ने आरटीआई में दिए हैं। याचिका में करीब तीन सौ कर्मचारियों के बिल लगाये हैं जो न्यूनतम बिल भुगतान करते हैं जबकि उनका महीने का बिल हजारों रूपये में आता है।

हाईकोर्ट ने उर्दू शिक्षक मामले में शिक्षा विभाग से फिर से जवाब मांगा….

नवीन समाचार, नैनीताल, 6 अगस्त 2019। हाईकोर्ट ने उर्दू शिक्षक मामले में विभाग से फिर से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की। सरकारी स्कूल में उर्दू शिक्षक हर गोविंद सिंह ने इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें कहा था कि 17 साल की सेवा के बाद उसे प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी के नाम पर बाहर कर दिया गया है। अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सरकार के 30 नवंबर 17 के आदेश पर रोक लगा दी थी और विभाग से उर्दू शिक्षकों की तैनाती को लेकर प्रदेश में चल रही व्यवस्था का पूरा ब्योरा तलब किया था। आदलत ने अदीब, अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल योग्यता को लेकर पूरी जानकारी तलब की थी। इन योग्यताओं की हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और स्नातक तुलनात्मक विवरण तलब किया था। इधर शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम व निदेशक माध्यमिक आरके कुंवर सहित शिक्षा विभाग के अधिकारी मंगलवार को हाईकोर्ट में पेश हुए। 16 मार्च 2018 को दिए आदेश के बाद विभाग ने शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब पेश किया, लेकिन अदालत जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। पिछली सुवनाई के दौरान एकलपीठ ने सचिव सहित अन्य अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। इधर मंगलवार को अदालत में उपस्थित अधिकारी अदालत को मामले में पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सके। इस पर अदालत ने फिर से पूरे विवरण के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

यह भी पढ़ें : पंचायत चुनाव पर बड़ा समाचार : उच्च न्यायालय ने सरकार की मानी, दिया मांगा गया समय, तय हुआ कब तक होंगे चुनाव…

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की खंडपीठ ने प्रदेश के हरिद्वार जनपद को छोड़कर शेष 12 जिलों में 30 नवम्बर तक त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने के आदेश दिए हैं। वहीं प्रशासकों पर अपने पूर्व के निर्णय को बरकरार रखते हुए प्रशासकों की प्रशासनिक या नीतिगत निर्णय लेने पर बरकरार रखी है। अलबत्ता वे अन्य नियमित कार्य करते रहेंगे। साथ ही हरिद्वार जनपद में अगले वर्ष होने वाले पंचायत चुनावों के बारे में ताकीद की है कि वहां ऐसी स्थित नहीं आनी चाहिए। अगर आती है तो चुनाव आयोग कोर्ट की शरण में आ सकता है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने गत दिवस इस बाबत दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पंचायत चुनाव कराने के लिए चार माह का समय मांगा था। इस प्रकार उच्च न्यायालय ने सरकार को इच्छित चार माह का समय दे दिया है।

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चुनाव आयोग को भी हाई कोर्ट से मिली फटकार, प्रशासकों के वित्तीय फैसलों व नीतिगत निर्णयों पर कोर्ट ने लगाईं रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 जुलाई 2019। उत्तराखंड सरकार राज्य में पंचायत चुनाव कराने को तैयार नहीं है। सरकार पंचायत चुनाव से पूर्व पंचायत राज अधिनियम में संशोधन करने जा रही है, और अभी चुनाव हेतु आरक्षण की प्रक्रिया भी पूरी नही हो पाई है। इसलिए सरकार की ओर से उत्तराखंड उच्च न्यायालय से पंचायत चुनाव कराने के लिए चार माह का समय मांगा गया है। इसके बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश में तय समय के भीतर पंचायत चुनाव नही कराने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार व राज्य चुनाव आयोग से बुधवार तक जवाब पेश करने को कहा है, और मामले की अगली सुनवाई के लिए बृहस्पतिवार की तिथि नियत कर दी है। न्यायालय ने चुनाव आयोग को भी इस बात को लेकर फटकारा व नाराजगी व्यक्त की कि जब सरकार तय समय सीमा में चुनाव नही करा पा रही है तो चुनाव आयोग न्यायालय में याचिका लेकर क्यों नही आया। वहीं प्रशासकों की नियुक्ति के सम्बन्ध में कोर्ट ने प्रशासकों के वित्तीय फैसलों व नीतिगत निर्णयों पर रोक लगा दी है, अलबत्ता वे अपने दिन-प्रतिदिन के ही कार्य करते रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता नईम अहमद पूर्व ग्राम प्रधान गुलरभोज ऊधम सिंह नगर ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने अभी तक पंचायत चुनाव का नोटिफिकेशन जारी नही किया है और प्रशासक नियुक्त कर दिए हैं, जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 ई के तहत दिये संवैधानिक प्राविधान के अनुसार पुरानी कमेटी का कार्यकाल समाप्त होने से पहले नई कमेटी का गठन हो जाना चाहिए। लिहाजा सरकार द्वारा पुराने आदेश का पालन नही करने पर सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाये।

यह भी पढ़ें : उच्च न्यायालय में उत्तराखंड सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग पर याचिका दायर

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गयी है। उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा है। याचिकाकर्ता गूलरभोज निवासी पूर्व प्रधान नईम का कहना है कि पूर्व में 2010 में राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में शपथ पत्र देकर समय पर चुनाव कराने और प्रशासक नियुक्त न करने की बात कही थी। सरकार निकाय चुनाव भी समय पर नहीं करा पाई थी और अब पंचायत चुनाव के लिए भी उसकी कोई तैयारी नहीं है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि सरकार नियत समय पर पंचायतों के चुनाव कराने के अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं कर सकी है, वल्कि सरकार ने चुनाव कराने के बजाय पंचायतों को नियमविरुद्ध प्रशासकों के हवाले कर दिया है। सरकार की चुनाव कराने की कोई तैयारी भी नहीं है। इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ेगा। यह एक बड़ा संवैधानिक संकट भी है। इस आधार पर याचिका में मांग की गई है कि धारा 356 के तहत सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के पंचायतों का कार्यकाल 15 जुलाई को खत्म हो गया था और उसके बाद से राज्य सरकार की 6 जुलाई की अधिसूचना के तहत पंयाचतों का काम प्रशासक संभाल रहे हैं।

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-पूरी तैयारी के बाद 12वीं के बाद चार साल का इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स कराने से किया इंकार
नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जुलाई 2019। उत्तराखंड में 12वीं के बाद चार साल का इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स नहीं करवाया जाएगा। राज्य सरकार ने इस मामले में केंद्र की राह से खुद को अलग कर लिया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि 2021-22 में इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स नहीं पढ़ाया जाएगा, लिहाजा किसी कॉलेज को एनओसी देने का सवाल नहीं है। इससे चार वर्षीय बीएड में एडमिशन की उम्मीद पाले युवाओं को बड़ा धक्का लगा है।
उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष 20 मई को एनसीटीई यानी नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर्स एजुकेशन की ओर से चार वर्षीय बीएड कोर्स को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया था। राज्य सरकार ने भी रेगुलर बीएड कोर्स के स्थान पर इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स लागू करने के लिए तैयार होने की बात कही थी। राज्य सरकार की सहमति के आधार पर ही एनसीटीई ने कोर्स की तैयारी शुरु कर दी गई थी। इसके लिए राज्य सरकार की एनओसी के साथ विश्वविद्यालय, सरकारी व निजी बीएड कॉलेज को तीन जून से 31 जुलाई तक ऑनलाइन आवेदन करना था। लेकिन इधर राज्य में 101 बीएड कॉलेज द्वारा आवेदन के लिए राज्य सरकार से एनओसी देने को प्रार्थना पत्र दिया गया। जब एक सप्ताह में एनओसी नहीं मिली तो साईं शिक्षण संस्थान जसपुर ने याचिका दायर की। इस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब कर पूछा कि 48 घंटे में एनओसी देने में देरी क्यों की जा रही है। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट में दिया बयान दिया कि सरकार ने इस साल इस कोर्स को लागू नहीं करने का फैसला लिया है। लिहाजा किसी कॉलेज को एनओसी देने का सवाल नहीं है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा, जब भी पदोन्नति करें, आरक्षण का लाभ दें…

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि जब भी सरकार लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंताओं के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करे, उसमें कानूनन आरक्षण के अनुमन्य कोटे के अनुसार अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दे।
मामले के अनुसार लोनिवि में अवर अभियंता-सिविल के पद पर कार्यरत हल्द्वानी निवासी विनोद कुमार व अन्य की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा गया था कि राज्य सरकार लोनिवि में जूनियर से सहायक अभियंताओं के 164 पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करने जा रही है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के जरनैल सिंह व अन्य विरुद्ध लक्ष्मी नारायण गुप्त एंव अन्य मामले में आये आदेश के विपरीत अनुसूचित जाति के लिए अनुमन्य 19 प्रतिशत के आरक्षण कोटे के तहत 31 पदों पर आरक्षण का लाभ नहीं देने जा रही है। सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता परेश त्रिपाठी के द्वारा खंडपीठ को बताया गया कि 31 नहीं केवल 25 पद अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इनमें से पहले ही अनुसूचित जाति के 12 लोग सहायक अभियंता के पद पर हैं, लिहाजा आगे 13 पदों पर आरक्षण का लाभ दिया जाना है। राज्य सरकार लोनिवि में सहायक अभियंताओं के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करने नहीं जा रही है, लेकिन जब भी पदोन्नति की कार्रवाई की जाएगी तो अनुसूचित जाति को पदोन्नति में आरक्षण के कोटे के अनुसार आरक्षण दिया जाएगा। सुनवाई के उपरांत खंडपीठ ने याचिका को पूरी तरह से निस्तारित करते हुए आदेश दिया कि जब भी सरकार लोनिवि में जूनियर से सहायक अभियंता-सिविल के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करे तो आरक्षण के अनुमन्य कोटे के अनुसार अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दे। याची की ओर से अधिवक्ता हरिमोहन भाटिया ने पैरवी की।

यह भी पढ़ें : भीमताल झील की मछलियों के अवैध शिकार पर डीएम, कमिश्नर सहित 6 को नोटिस…

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने भीमताल झील में अवैध रूप मछली मारने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर पंचायत भीमताल के साथ ही कुमाऊं कमिश्नर, डीएम और एसएसपी नैनीताल, उप निदेशक मत्स्य भीमताल और सिंचाई विभाग के एसई को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। 

उल्लेखनीय है कि भीमताल के ब्लॉक रोड मल्लीताल निवासी संजीव पांडे ने हाईकोर्ट में मामले में जनहित याचिका दायर की है। जिसमें कहा है भीमताल झील में मत्स्य विभाग ने मछली मारने का लाइसेंस दिया है। इसके लिए 30 रुपये प्रतिदिन का शुल्क रखा गया है, लेकिन लाइसेंस की आड़ में अवैध रूप से मछलियां मारी जा रही है। यही नहीं अन्य जलीय जीव भी मारे जा रहे हैं। इससे झील के पर्यावरण पर प्रभाव पड़ रहा है। हो रहा है। साथ ही असंतुलन का असर झील में मौजूद जलीय जीवों पर भी हो रहा है। इस मामले में कुमाऊं कमिश्नर के साथ ही डीएम और एसएसपी नैनीताल, नगर पंचायत भीमताल, उप निदेशक मत्स्य विभाग भीमताल आदि को शिकायती पत्र दिया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। संयुक्त खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद संबंधित पक्षकारों को जवाब के लिए नोटिस जारी किया है। अदालत ने जवाब के लिए दो सप्ताह का समय नियत किया है।

यह भी पढ़ें : HC का बड़ा फैसला : उत्तराखंड में इस खास परिस्थिति में 2 से अधिक बच्चों पर भी लड़ सकेंगे चुनाव…

-कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के मद्देनजर और उत्तराखंड सरकार द्वारा संशोधित अधिनियम की धारा को वैध ठहराते हुए दूसरे प्रसव में जुड़वाँ बच्चों के मामले को अपवादिक परिस्थिति माना और इसे दंपत्ति को चुनाव लड़ने के लिए योग्य ठहराया

नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जुलाई 2019। उत्तराखंड में अब एक बच्चे के बाद जुड़वां बच्चे होने पर निकाय या पंचायत चुनाव में प्रत्याशी बनने पर कोई महाही नहीं होगी। हाईकोर्ट ने भाजपा नेता भारत भूषण चुघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले को अपवादिक विलक्षण परिस्थिति माना है। 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उत्तर प्रदेश म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन अधिनियम 1959 के संशोधित अधिनियम के तहत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य नहीं माना है। कोर्ट ने कहा है कि इन परिस्थितियों पर याचिकाकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं था। दरअसल भाजपा नेता भारत भूषण चुघ निवासी भूरारानी पिछले साल निकाय चुनाव लड़ने के इच्छुक थे लेकिन नगर निगम अधिनियम में प्रदेश सरकार के नोटिफिकेशन द्वारा संशोधन के बाद जोड़ी गई धारा 25 (आई) (वी) के तहत निगम और पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों के होने पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना गया था। संशोधन में जोड़ी धारा में जुड़वां दो या तीन बच्चों की स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से असमंजस की स्थिति बनी थी। याचिकाकर्ता का एक पुत्र और फिर जुड़वां पुत्र हुए थे। भारत ने यूनिटी लॉ कॉलेज के प्राचार्य डॉ. केएस राठौर से चर्चा के बाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता कुर्बान अली के माध्यम से एक याचिका निकाय चुनाव से ठीक पहले दाखिल की थी। अधिवक्ता कुर्बान अली ने कोर्ट के समक्ष जावेद अहमद और अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले रखे थे। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद निर्णय दिया कि नगर निगम अधिनियम की संशोधित धारा से याचिकाकर्ता भारत भूषण को अयोग्य नहीं माना जाएगा। जुड़वां बच्चे होने की स्थितियों में याचिकाकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं था। कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के मद्देनजर और उत्तराखंड सरकार द्वारा संशोधित अधिनियम की धारा को वैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता के मामले को अपवादिक परिस्थिति माना और उसे चुनाव लड़ने के लिए योग्य ठहराया है।

यह भी पढ़ें : प्रधान ने दूसरे के नाम स्वीकृत आवास अपने ससुर का बना दिया था, हाईकोर्ट ने पंचायती राज सचिव से किया जवाब तलब..

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जसपुर ऊधम सिंह नगर के ग्राम मनोरथपुर में ग्राम प्रधान द्वारा विभिन्न सरकारी योजनाओं में वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सचिव पंचायती राज से पूछा है कि पूर्व में आदेश पारित होने के बाद भी आपने घपले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की और न्यायालय के आदेश का पालन क्यों नही किया गया, इसका जवाब न्यायालय में पेश करें।
मामले के अनुसार जसवीर सिंह निवासी मनोरथपुर जसपुर ऊधम सिंह नगर ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ग्राम प्रधान द्वारा विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हुए वित्तीय अनियमितता की गयी है। आवासों के आवंटन में अपने ससुर रईस को आवास दिया गया है जबकि उसी नाम के दूसरे व्यक्ति रईस के नाम से आवास आया था। मरे हुए व्यक्तिओ के नाम शौचालय स्वीकृत कर दिए। शिकायत करने पर जिला अधिकारी द्वारा इसकी जाँच की गयी जाँच करने में अनियमित्ताए पाई गयी।
बताया गया कि पूर्व में न्यायालय ने इसकी जाँच कर आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करने को कहा था। जिसमें जिला अधिकारी द्वारा जाँच की गयी और मामले में एक लाख तीस हजार रुपये का घपला सामने आया परंतु जिला अधिकारी द्वारा ग्राम प्रधान को इस धनराशि पर एक तिहाई अधिभार व चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। न्यायालय ने जिलाधिकारी की इस रिपोर्ट पर सचिव पंचायती राज से कार्यवाही कर इसकी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा था। परंतु सचिव ने न्यायालय में अपनी रिपोर्ट न देकर जिला अधिकारी की जाँच रिपोर्ट पेश की थी। आज सरकार की ओर से न्यायालय को अवगत कराया गया कि खंड विकास अधिकारी द्वारा ग्राम प्रधान, ग्राम विकास अधिकारी व अवर अभियन्ता के खिलाफ जसपुर थाने में 2 जुलाई को मुकदमा दर्ज करा दिया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : सरकार के ‘एस्मा’ के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंची यह कर्मचारी यूनियन…

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2019। उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने सरकार द्वारा एस्मा लगाए जाने के विरुद्ध उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। यूनियन की ओर से कहा गया है कि उनको सरकार हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर करती आई है। साथ ही हड़ताल करने पर एस्मा लगाकर कार्यवाही करने को कहती है। यूनियन की ओर से कहा गया है कि उनको समय पर वेतन नही दिया जा रहा है, सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनके देयक नहीं दिए जा रहे है। पिछले चार वर्षों से कर्मचारियो को ओवर टाइम काम नही दिया जा रहा है न ही उनको रेगुलर किया जा रहा है। सरकार व निगम हमेशा बजट का रोना रोते हैं जबकि स्थिति यह है कि निगम का 2002 से उत्तर प्रदेश पर 700 करोड़ और निगम का आपदा के समय का 45 करोड़ रुपया सरकार के पास बकाया है। फिर भी सरकार व निगम के पास अपने कर्मचारीयो को वेतन नही देने के लिए बजट नही है। मामले में सुनवाई 2 जुलाई को हो सकती है।

यह भी पढ़ें : मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के चार धाम यात्रा संबंधी पत्र पर उत्तराखंड सरकार को नोटिस, जानें तारीफ के साथ क्या लिखा है पत्र में…

-उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 5 पेज के पत्र को जनहित याचिका के रूप में लिया
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 जून 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने चार धाम यात्रा पर आए मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश केआर श्रीराम द्वारा उन्हें भेजे गए पत्र को जनहित याचिका के रूप में लेते हुए राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है।
मामले के अनुसार मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आरके श्रीराम ने गत 15 जून को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन को 5 पन्नों का पत्र लिखकर चार धाम यात्रा में यात्रियों को सुख-सुविधाओं में होने वाली कई असुविधाओं की जानकारी दी है। पत्र में कहा गया है कि चार धाम यात्रा में मानो फिर से आपदा का इंतजार किया जा रहा है। यमुनोत्री में तत्काल सुरक्षा के उपाय करने की जरूरत है। यात्रा मार्ग में कई किलोमीटर तक कोई पुलिस का जवान मौजूद नहीं रहता है जिससे स्वास्थ्य अथवा दूसरी आपात स्थितियों में कोई मदद नहीं मिल पाती है। इसके अलावा यात्रा मार्ग में बैठने के लिए कोई बेंच, कुर्सी अथवा दूसरी सुविधा नहीं है, ताकि यात्री कुछ देर आराम कर सकें। पत्र में लिखा है कि उन्होंने खच्चर से जबकि उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने डांडी से पहाड़ों में मिटटी से भरे कट्टे वाले रास्ते से और पथरीले मार्गों से यात्रा तय की। उन्हें इन लंबे मार्गों पर कोई आराम करने की जगह नहीं मिली। न्यायाधीश ने बताया है कि उनका दल फाटा से केदारनाथ और केदारनाथ से फाटा हैलीकॉप्टर से आया और गया। केदारनाथ में उन्हें हैलीकॉप्टर के लिए साढ़े तीन घंटे इंतजार करना पड़ा और वहां आराम कक्ष भी नहीं था, हालांकि उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें और उनकी पत्नी को अपने कक्ष में बैठने का स्थान दिया। आम यात्रियों के लिए इन स्थानों में कोई आराम का स्थान नहीं है। यात्रा मार्ग में चिकित्सा और सामान्य भोजन की भी कोई व्यवस्था नहीं है। पत्र में लिखा गया है कि कई स्थानों में दुकानें इतनी नजदीक बनी हैं कि वहां आग लगने अथवा भगदड़ मचने पर काफी जानमाल का नुकसान हो सकता है। खासकर बद्रीनाथ और गंगोत्री में अगर आग लगती है तो बचने की कोई जगह नहीं है और अग्निशमन विभाग भी अपना काम नहीं कर सकेगा। साथ ही यात्रा मार्ग पर सम्पर्क करने के लिए मोबाईल नेटवर्क का अभाव है। उनके इस पत्र को जनहित याचिका के रूप में लेते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव तीर्थाटन के साथ ही श्री बद्री केदार मंदिर समिति के सीईओ को पक्षकार बनाया है।

प्राकृतिक सुविधा व चार लेन योजना की प्रशंसा भी

नैनीताल। महाराष्ट्र से चार धाम यात्रा पर आए न्यायाधीश ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में कहा है कि उनके परिवार के 11 सदस्यीय दल को 22 मई से एक जून तक चार धाम यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा है कि उत्तराखंड बहुत सुंदर है। साथ ही गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ को जोड़ती हुई केंद्र सरकार की महवपूर्ण फोर लेन योजना ने भी सभी के दिलों को खुश कर दिया है।

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-शहरी विकास सचिव ने नहीं दिया था जवाब
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जून 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने रुड़की के मंगलौर में चल रही व्यवसायिक पशु वधशाला के संचालन पर रोक लगा दी है। मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार रुड़की निवासी रईस अहमद राव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि मंगलौर में व्यवसायिक पशु वधशाला घनी आवादी के बीच में सभी नियमो को ताक पर रखकर खोली गयी है, और इसमंे हर रोज 250 भैंसंे काटी जा रही हैं। यही नहीं जहां पर यह स्लाटर हाउस चलाया जा रहा है उसके आसपास स्कूल, मस्जिद व कब्रिस्तान आदि भी स्थित हैं। क्षेत्र वासियों द्वारा इसका विरोध भी किया गया परंतु सरकार द्वारा इस पर कोई कार्यवही नही की गयी। पूर्व में कोर्ट ने शहरी विकास विभाग के सचिव से जवाब पेश करने को कहा था। साथ में कोर्ट ने यह भी पूछा था कि स्लाटर हाउस खोलने के क्या नियम हैं। लेकिन अब तक सचिव के द्वारा अपना जवाब पेश नही किया गया। मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने स्लाटर हाउस के संचालन पर रोक लगा दी है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 2 अप्रैल 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने प्रदेश में बंद पड़े स्लाटर हाउस के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नगर पालिका नैनीताल, रामनगर व मंगलोर तथा नगर निगम हल्द्वानी को 15 जुलाई तक हर हाल में स्लॉटर हाउस चालू करने और इसकी रिपोर्ट एक अगस्त तक कोर्ट में पेश करने के आदेश दिये हैं। साथ ही अगली सुनवाई की तिथि एक अगस्त नियत कर दी है। कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि पिछले आठ साल से स्लॉटर हाउस नही बनाए गए तो यह कोर्ट के आदेश की अवमानना होगी। उल्लेखनीय है कि पूर्व के आदेश में कोर्ट ने राज्य सरकार से 3 माह के भीतर स्लॉटर हाउसों को अस्तित्व में लाने के आदेश जारी किये थे।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी अवैध स्लॉटर हाउसो को बंद करने के आदेश दिए थे और कहा था कि खुले में जानवर ना काटे जाएं। इसके बाद से पुरे प्रदेश में स्लॉटर हाउस बंद है। कोर्ट के इस आदेश को मीट कारोबारीयो ने हाईकोट में चुनौती देते हुए कहा कि पूर्व में हाईकोट ने 9 दिसंबर 2011 को एक आदेश जारी कर प्रदेश में मानकों के अनुसार स्लाटर हाउस बनाने के निर्देश दिये थे। लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी कोर्ट के आदेशो का पालन नही किया जा रहा है जिस वजह से स्लॉटर हाउसो का मामला अधर मे है। लिहाजा कोर्ट के आदेश का पालन ना करने वाले अधिकारीयो के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाए। वही स्लॉटर हाउस बंद किये जाने के आदेश के खिलाफ सरकार ने मीट कारोबारियों को राहत देने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी भी दायर की है।

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-उत्तरकाशी के जिला पंचायत अध्यक्ष का पदभार उपाध्यक्ष रमोला को देने के आदेश, राज्य सरकार द्वारा गठित कमेटी को कोर्ट ने किया निरस्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए सरकार की ओर से दस मई को बनाई गई जिला पंचायत उत्तरकाशी की कमेटी को निरस्त कर दिया है। साथ ही उत्तरकाशी के जिला पंचायत अध्यक्ष का पदभार मौजूदा जिला पंचायत उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला को देने के आदेश दे दिये के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में जिला पंचायत उत्तरकाशी के उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला की याचिका पर ही हाईकोर्ट ने तीन अप्रैल 2019 को वोटर लिस्ट में नाम न होने के विवाद के चलते तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष जसोदा राणा को अध्यक्ष पद से हटाने के आदेश दिए थे। इस पर जिला प्रशासन ने उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला को जिला पंचायत अध्यक्ष का चार्ज देने के बजाय तीन सदस्यों की कमेटी बना दी। याचिकाकर्ता की ओर से इस बनाई गई कमेटी को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। इस याचिका पर ही बुधवार को एकलपीठ ने सरकार द्वारा बनाई गयी कमेटी को निरस्त कर याचिकाकर्ता जिला पंचायत उपाध्यक्ष रमोला को अध्यक्ष पद का कार्यभार देने के स्पष्ट आदेश दे दिये हैं।

पहले ही जताई थी सम्भावना: जिला पंचायत अध्यक्ष को हटाने के आदेश, उपाध्यक्ष रमोला की है नया अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 अप्रैल 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मामले में सुनवाई करते हुए उत्तरकाशी जनपद की जिला पंचायत अध्यक्ष जसोदा राणा को उनके पद से हटाने के आदेश दे दिए हैं। ऐसा उनका नाम उत्तरकाशी जिले के ग्रामीण क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम कटने की वजह से हुआ है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में उच्च न्यायालय की एकलपीठ द्वारा जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर बने रहने के आदेश दिए थे, जिसे उनकी जगह जिला पंचायत अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना वाले जिला पंचायत सदस्य प्रकाश चन्द्र रमोला ने खंडपीठ में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि जब राणा का नाम कंसेरी गांव की मतदाता सूची से कट गया था तो वह वहां की सदस्य ही नही रहीं। खंडपीठ ने याचिकर्ता के इस तर्क से सहमत होकर यह माना कि वह अभी कहीं की वोटर लिस्ट की सदस्य नही है न ही उनका नाम दोनों जगहों में से किसी भी जगह की वोटर लिस्ट में है। उन्होंने गलत तरीके से वर्तमान में अध्यक्ष का पद ग्रहण किया हुआ है इस आधार पर उनकी अध्यक्षता समाप्त की जाती है।
मामले के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष बड़कोट उत्तरकाशी की जसोदा राणा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे बड़कोट उत्तरकाशी नगर पालिका से चेयरमैन पद हेतु भाजपा की उम्मीदवार हैं। उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए सरकार को पत्र लिखा था कि उनका नाम ग्रामीण क्षेत्र की वोटर लिस्ट से हटाकर बड़कोट नगर पालिका की वोटर लिस्ट में जोड़ा जाये। किंतु उत्तरकाशी के जिला अधिकारी डा. आशीष चौहान ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने का प्रार्थना पत्र आयोग को भेज दिया परन्तु जोड़ने वाला नही भेजा और इसे अपने पास रख लिया। उनका यह भी कहना था कि 23 अक्टूबर को नामांकन करने की आखिरी तिथि थी और आयोग ने उनका नाम हटाने का आदेश 22 अक्टूबर को दे दिया था। उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया परन्तु जोड़ा नही गया। 22 अक्टूबर को निवार्चन आयोग ने देहरादून से रिपोर्ट मंगाकर कहा कि उनका नाम देहरादून की वोटर लिस्ट में भी है। याचिकर्ता का यह भी कहना था कि उन्होंने कभी भी देहरादून की वोटर लिस्ट में नाम के लिए आवेदन नही किया और उनको में फंसाया जा रहा है। उन्होंने वोटर लिस्ट में नाम नही जोड़ने के मामले को पूर्व में हाई कोर्ट में चुनोती दी परन्तु हाई कोर्ट ने उसे निरस्त कर दिया था। इसी बीच जिला अधिकारी उत्तरकाशी ने सरकार को पत्र लिखकर कहा कि जसोदा राणा का नाम बड़कोट जिला पंचायत की वोटर लिस्ट से कट चुका है इसलिए उनको जिला पंचायत के पद से हटा दिया जाय।
उल्लेखनीय है कि जसोदा राणा के अध्यक्ष पद से हटने के बाद उनके खिलाफ मामले को उच्च न्यायालय में ले गये जिपं अध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला का अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा है।

यह भी पढ़ें : लिंग परिवर्तन कर पुरुष से महिला बनी, मंगेतर ने बलात्कार किया, अब हाईकोर्ट बताएगा दुष्कर्म प्राकृतिक माना जाएगा अथवा अप्राकृतिक, महत्वपूर्ण फैसला सुरक्षित..

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मई 2019। लिंग परिवर्तन कर यदि कोई पुरुष महिला बन जाता है तो उसके साथ उसकी मर्जी के बिना किसी पुरुष के द्वारा किया गया दुष्कर्म महिला के साथ होने पर माना जाने वाला ‘प्राकृतिक’ माना जाएगा अथवा किसी पुरुष के साथ होने वाला ‘अप्राकृतिक‘, इस पर, उत्तराखंड उच्च न्यायालय से शीघ्र ही महत्वपूर्ण फैसला आ सकता है। इस संबंध में एक लिंग परिवर्तन कर बनी महिला की याचिका पर उच्च न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
मामले के अनुसार उत्तराखंड के कोटद्वार में एक अजब मामला प्रकाश में आया। यहाँ लिंग परिवर्तन कर पुरुष से महिला बनी ट्रांसजेंडर महिला से उसके मंगेतर ने बलात्कार किया, पर पुलिस ने  अप्राकृतिक यौन शोषण की धाराओं में मामला दर्ज किया। इसे लिंग परिवर्तन कर बनी महिला ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मामले के अनुसार एक ट्रांसजेंडर महिला ने 2017 में कोटद्वार थाने में एक एफआईआर इस आधार पर दर्ज कराई थी कि वह और कोटद्वार निवासी परीक्षित अरविन्द जोशी दोनों मुम्बई के एक पांच सितारा होटल में जॉब करते थे । दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था। इस दौरान अपना लिंग बदल कर महिला बन गई । इधर जोशी ने उसे शादी के बहाने कोटद्वार बुलाया और उसके साथ रेप किया। इसकी रिपोर्ट उसने कोटद्वार थाने में आईपीसी की धारा 376 में दर्ज कराई परन्तु कोटद्वार पुलिस ने 376 का मुकदमा दर्ज न करके 377 अप्राकृतिक यौन शोषण का मुकदमा दर्ज कर दिया । पुलिस ने उनको एक महिला मानने से इन्‍कार कर दिया। उन्होंने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश नालसा बनाम केंद्र सरकार जिसमें ट्रांसजेंडर को मान्यता दी गयी है उनको भी एक महिला के समान अधिकार है। उनकी एफआईआर 376 में दर्ज की जाय न कि 377 में।

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-उत्तराखंड में अंतरिम जमानत का प्राविधान समाप्त
नवीन समाचार, नैनीताल, 3 मई 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश की निचली अदालतों सेअग्रिम जमानत लेने का प्राविधान पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। इसके बाद 7 वर्ष से कम की सजा के प्राविधान वाले कुछ मामलों में पहले की तरह पुलिस थाने से और बड़े मामलों में केवल उच्च न्यायालय से ही अग्रिम जमानत मिल सकेगी। प्रदेश की निचली अदालतों से किसी भी दशा में अंतरिम/अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी। उत्तराखंड सरकार द्वारा यूपी के CRPC की धारा 438 से संबंधित अधिनियम को स्वीकार करने के बाद यूपी के अधिनियम के तहत यह व्यवस्था समाप्त की गई है।
उल्लेखनीय है कि हाइकोर्ट ने इससे पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 438 को प्रभावी बनाकर अंतरिम जमानत देने की व्यवस्था कर दी थी। इस कारण निचली अदालतों को अंतरिम जमानत देने का अधिकार मिल गया था। बता दें कि देश के तमाम राज्यों ने दंड संहिता की धारा 438 को प्रभावी बनाया था, मगर उत्तराखंड गत वर्ष तक इसमें शामिल नहीं था। पिछले साल तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ के समक्ष विष्णु सहाय ने विशेष याचिका दायर कर दंड प्रक्रिया संहिता उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 के उस प्राविधान को चुनौती दी थी, जिसमें उत्तर प्रदेश ने धारा 438 को प्रभावी नहीं माना था। इस धारा के तहत अंतरिम जमानत का प्रावधान है। याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकार ने धारा 9 यूपी एमेंडमेंट एक्ट 1976 के प्रावधान को न तो उत्तराखंड में अंगीकृत किया और न ही निरस्त किया। कोर्ट ने तब अंतरिम जमानत के प्रावधान उत्तराखंड में प्रभावी कर दिए थे।
किंतु इधर गत दिनों सरकार ने इस संबंध में हाईकोर्ट में पुन: जानकारी दी थी कि राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत नियम अंगीकृत किए गए थे लेकिन इसे समझने में अंतर आ गया था। मामले की समीक्षा के बाद शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और जस्टिस मनोज तिवारी की खंडपीठ ने अंतरिम जमानत के नियम को रद्द कर दिया।

उत्तराखंड की इस 100% लाभ में चल रही कंपनी को निजी हाथों में देने जा रही है केंद्र सरकार, हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 29 अप्रैल 2019। केंद्र सरकार की कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल्स कारपोरेशन लिमिटेड रामनगर के कर्मचारी संघ (आईएमपीएल) ने कंपनी के लाभ में होने के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा इसे निजी हाथों में दिये जाने की आशंका जताते हुए इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आलोक सिंह की एकलपीठ ने
केंद्र सरकार से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार आईएमपीएल कर्मचारी संघ रामनगर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि रामनगर में स्थित केंद्र सरकार की दवा कम्पनी केंद्र सरकार को हर वर्ष सौ प्रतिशत शुद्ध लाभ देती आई है। भारत सरकार के पास कुछ ही कम्पनियां ऐसी है जो सरकार को इतना अधिक शुद्ध लाभ देती है, परंतु केंद्र सरकार इस शुद्ध लाभ देने वाली कम्पनी को निजी हाथांे में देने जा रही है जो फैक्ट्री नियमावली के विपरीत है। कर्मचारी संघ ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि इस कम्पनी को शिखर तक ले जाने में उनका सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो चूका है और वे अब सेवानिवृत्ति की कगार पर हैं, और इस हाल में इसे निजी हाथो में देना उनके भविष्य के खिलाफ है। संघ ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि केंद्र सरकार घाटे में चलने वाली एयर इंडिया को निजी हाथो में तो नही दे रही है, लेकिन सौ प्रतिशत शुद्ध लाभ देने वाली कम्पनी को निजी हाथो में देने जा रही है जो न्यायविरुद्ध है, इसलिए इस पर रोक लगाई जाये।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट का प्रदूषण फैला रही फैक्टरियों पर कड़ा रुख, दुबारा से जांच कराने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अप्रैल, 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों पर आपत्ति वाले उद्योगों की दोबारा से जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 15 अप्रैल को जवाब पेश करने के आदेश देते हुए मामले में सुनवाई की तिथि आगामी सोमवार यानी 15 अप्रैल को नियत कर दी है।
उल्लेखनीय है कि रुद्रपुर ऊधमसिंह नगर निवासी हिमांशु चंदोला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा कि ऊधमसिंह नगर के सिडकुल में तमाम फैक्ट्रियों से वायु, जल और अन्य प्रदूषण बढ़ रहा है। याचिका के साथ फोटो संलग्न कर कहा कि जल प्रदूषण की वजह से क्षेत्र में हैपेटाइटिस-बी रोग फैला और तमाम लोगों की मौत हो गई। जहरीला पानी खेतों में जाने से खेती चौपट हो गई और कल्याणी नदी भी प्रदूषित हो रही है।
मामले की पूर्व में हुई सुनवाई में सरकार की ओर से बताया गया कि प्रदेश में अभी तक मानको को पूरा नही करने वाली फैक्ट्रियो को चिन्हित कर लगभग 130 फैक्ट्रियो यानी करीब 20 फीसद को बंद करने का नोटिस जारी कर दिया गया था। पूर्व में कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड से प्रदेश की सभी फैक्ट्रियो की लिस्ट मांगी थी जिसमे कहा गया था कि प्रदेश की 30 से 35 फैक्ट्रियां ऐसी है जो केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण के मानको को पूरा नही करती हैं। इस रिपोर्ट पर राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि वे इस पर कार्यवाही करे। मानक पूरे नहीं करने वाले 130 उद्योगों को बंद करने के लिए नोटिस जारी किया है।

यह भी पढ़ें : पदोन्नति में आरक्षण पर उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 7 साल पुरानी अधिसूचना निरस्त…. 

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अप्रैल 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार को बड़ा झटका देते हुए 2012 में जारी उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया है जिसमें पदोन्नति में एससी-एसटी कोटे के आरक्षण को खत्म कर दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि ज्ञान चन्द्र ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के आदेश के बाद उत्तराखंड सरकार ने 5 सितंबर 2012 को अधिसूचना जारी कर पदोन्नति में एसटी एससी के आरक्षण को खत्म कर दिया, जो गलत है। आज हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के साल 2012 में जारी अधिसूचना को निरस्त करते हुए सरकार को कहा है कि चाहे तो वो इसमें कानून बना सकती है। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुराने लागू शासनदेश के अनुसार राज्य में भी पदोन्नति में आरक्षण की सुविधा मिल सकती है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता हरि मोहन भाटिया ने कहा कि अगर उत्तराखंड सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश के किसी भी सरकारी आदेश को लागू किया गया हो या उत्तराखंड सरकार द्वारा खुद सरकारी आदेश जारी किया गया हो, जिसमें पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था थी तो वो आज की स्थिति में फिर से लागू हो जाएंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार आर्टिकल 16(4) अ के आधार पर नया कानून भी बना सकती है।

यह भी पढ़ें : बड़ा फैसला: बेटियों के लिये खुशखबरी, अब विवाहित बेटियां भी पिता के परिवार की सदस्य और मृतक आश्रित कोटे से नौकरी की हकदार

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक दूरगामी व बड़ा फैसला देते हुए विवाहित पुत्रियों को भी मृतक आश्रित कोटे में सरकारी नौकरी का लाभ देने का रास्ता खोल दिया है। बुधवार को नैनीताल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन, न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की पूर्णपीठ ने एक याचिका की याचिका पर इस बारे मे ंफैसला सुनाया। पीठ ने मुख्य रूप से इस पर विचार किया कि विवाहित पुत्री परिवार का सदस्य मानी जा सकती है अथवा नहीं और वह मृतक आश्रित कोटे से सरकारी नौकरी पाने की हकदार है या नहीं। विचार विमर्श के बाद पूर्ण पीठ ने विवाहित पुत्री को परिवार का सदस्य माना है। अदालत ने कहा कि वह मृतक आश्रित कोटे में नौकरी पाने का अधिकार रखती है। हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के इस फैसले के बाद प्रदेश में विवाहित पुत्रियां भी मृतक आश्रित कोटे में नौकरी की हकदार हो गई है।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय में इस मामले में अलग अलग याचिकाएं दायर की गई थी। जिन पर पूर्व में नैनीताल उच्च न्यायालय की एकलपीठ भी इसी आशय का फैसला सुना चुकी थी। इसमें एक याचिका चमोली निवासी संतोष किमोठी नाम की विवाहित महिला की भी थी। जिसमें कहा गया था कि उसका विवाह होने के उपरांत उसके पिता की मृत्यु सरकारी नौकरी में सेवाकाल के दौरान हुई थी। मायके में पिता की मृत्यु के बाद कोई बालिग सदस्य कमाई करने वाला नहीं बचा था। लिहाजा उसने संबंधित विभाग में मृत आश्रित कोटे में नौकरी की गुहार लगाई, लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया है। वहीं, दूसरा मामला ऊधमसिंह नगर डिस्ट्रिक को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में नौकरी को लेकर था। ऊधमसिंह नगर निवासी अंजुला सिंह और अन्य ने उच्च न्यायालय की एकलपीठ के समक्ष याचिका दायर कर कहा था कि उसके पिता डिस्ट्रिक को-ऑपरेटिव बैंक में लिपिक कैशियर के पद पर कार्यरत थे। 23 फरवरी 2014 को उनका निधन हो गया। उसने मृतक आश्रित के रूप में नौकरी के लिए विभाग में आवेदन किया था, मगर विभाग ने आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि वह मृतक की विवाहित पुत्री है। दोनों मामलों में सुनवाई के बाद एकलपीठ ने विवाहित बेटी को मृतक आश्रित कोटे में नौकरी पाने की हकदार घोषित किया था। बता दें कि चमोली के मामले में सरकार और ऊधमसिंह नगर के मामले में बैंक प्रबंधन ने हाईकोर्ट में एकलपीठ के फैसले को चुनौती दी थी। बाद में दोनों मामलों में विशेष अपील दायर की गई थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के लिये तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ का गठन करने का फैसला लिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश समेत तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब जारी हुआ है।

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-दक्षिण अफ्रीका टूर घोटाले की रकम ब्याज सहित जमा करें: हाईकोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 फरवरी 2019 । उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायाधीश आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कायर्काल में दक्षिण अफ्रीका के टूर के लिए लाखो रुपये का घोटाला करने के मामले में सुनवाई करते हुए तत्कालीन पीसीसीएफ दिग्विजय सिंह खाती व लेसर होटल के मालिक से 12 प्रतिशत ब्याज की दर से रकम जमा जमा करने तथा जमा की गयी धनराशि के संबंध में न्यायालय में शपथपत्र पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च की नियत की है।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता जय प्रकाश डबराल ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि 2006 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री नवप्रभात, तत्कालीन विधायक शैलेंद्र मोहन सिंघल सहित 3 वन अधिकारी और कई अन्य लोग इको पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया था। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी की है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य आपदा प्रबंधन न्यूनीकरण केंद्र देहरादून में कथित अवैध नियुक्तियों के मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ में देहरादून निवासी राज्य आंदोलनकारी रवींद्र जुगरान की उस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सचिव व वित्त सचिव द्वारा बिना कैबिनेट की मंजूरी तथा शासनादेश के अवैध तरीके से आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए पांच अनर्ह अभ्यर्थियों को नियुक्त कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया है। याची के अनुसार उन्होंने इस मामले में प्राधिकरण के अध्यक्ष व मुख्य सचिव को प्रत्यावेदन दिए मगर उनके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

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-सरकार की अपील पर सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की बाध्यता को समानता के अधिकार के खिलाफ मानने के एकलपीठ के आदेश को सही ठहराया
नवीन समाचार, नैनीताल, 26 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि समूह ‘ग’ की भर्ती में सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकरण की अनिवार्यता नहीं होगी।
उल्लेखनीय है कि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 2016 में एक्सरे तकनीशियनों के 45 पदों पर आवेदन आमंत्रित किए थे। इसमें आवेदकों को प्रदेश के किसी भी जिले के सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की अनिवार्यता रखी गई थी। आयोग का कहना था कि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने के लिए सरकार की ओर से 10 फरवरी 2014 को सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण आवश्यक होने के आदेशों के तहत ही यह व्यवस्था की गई थी। माना जा रहा है कि इस फैसले का दीर्घकालीन प्रभाव हो सकता है। इसके बाद राज्य के बेरोजगारों को स्थानीय फैक्टरियों में 70 फीसद आरक्षण, राज्य के बाहर के लोगों को राज्य में संपत्ति खरीदने से रोकने जैसे प्राविधानों युक्त भू-अध्यादेश आदि को भी चुनौती दी जा सकेगी।
एक आवेदनकर्ता ने इस परीक्षा में सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण आवश्यक होने के प्रावधान को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उस समय इस अनिवार्यता को समानता के अधिकार के खिलाफ माना था और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को दस सप्ताह के अंदर आवेदनकर्ता को नियुक्ति देने का आदेश दिया था। किंतु हाईकोर्ट का यह आदेश आने तक आयोग परीक्षा पूरी करवाकर शासन को सूची भी भेज चुका था। यह देखते हुए एकलपीठ के आदेश के खिलाफ सरकार की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। इधर मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने इस अपील पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ के आदेश को आंशिक रूप से सही माना है। पीठ ने समूह ‘ग’ के लिए आवेदन में सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की अनिवार्यता को समाप्त करने के एकलपीठ के आदेश को सही माना है। किंतु चूंकि एकलपीठ का आदेश ही नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद आया, इसलिए पीठ ने याची को नियुक्ति देने संबंधी एकलपीठ के आदेश को खारिज कर दिया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 18 दिसंबर 2018। पंतनगर विश्वविद्यालय के ठेका मजदूरों को श्रम कानूनों का लाभ मिलने की उम्मीद नजर आ रही है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में ठेकेदारी प्रथा के तहत कार्य कर रहे करीब ढाई हजार कर्मचारियों के मामले को सुनने के बाद पंतनगर विश्वविद्यालय, राज्य सरकार व केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिये हैं।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में कार्य करने वाले ठेका मजदूरों की कल्याण समिति की ओर से समिति के सचिव अभिलाख सिंह व जेपी सिंह ने याचिका दायर कर कहा है कि पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में 2003 से करीब ढाई हजार कर्मचारी ठेकेदारी प्रथा के तहत कार्य कर रहे हैं। उनको श्रम कानून के अंतर्गत देय चिकित्सा, ग्रेच्युटी, बोनस और मुलभुत सुविधाएं तथा मार्च 2018 से सरकार द्वारा देय बढ़ा हुआ न्यूनतम वेतनमान तथा केंद्र सरकार के आदेश पर पहली जून 2016 से देय ईएसआई का लाभ भी नहीं दिया गया है। साथ ही कार्य करते हुए 15 साल होने के बावजूद भी उनको नियमित नहीं किया जा रहा है।

बड़ा समाचार: हाईकोर्ट ने हटाई एलटी संवर्ग के 1214 पदों पर नियुक्ति पर लगी रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने एलटी संवर्ग के सहायक अध्यापकों के 1214 रिक्त पदों पर नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है। इस संबंध में एकलपीठ ने यह भी कहा है कि नियुक्तियां याचिका पर आने वाले अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।
मामले के अनुसार इसी वर्ष 21 जनवरी 2018 को उत्तराखण्ड अधीनस्थ चयन आयोग ने 1214 पदों पर एलटी शिक्षकों की भर्ती शुरु की थी। इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिये बुलाया गया। इस प्रक्रिया में आरक्षण के नियमों का पालन ना करने तथा गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए पिथौरागढ़ जिले के हरीश कुमार व पुष्पा कार्की सहित अन्य ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने नियुिक्त पर रोक लगा दी थी। बाद में इस मामले की जांच डी सेंथिल पांडियन की तीन सदस्यों की कमेटी द्वारा की गयी थी जिसकी रिपोर्ट आज सीलबंद लिफाफे में पीठ को दी गयी। रिपोर्ट को पढ़ने के बाद पीठ ने नियुक्ति पर लगी रोक हटा दी।

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नैनीताल, 10  अक्तूबर 2018। उत्तराखंड में एलटी शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके विष्ट की एकलपीठ ने नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जो भी नियुक्तियां होंगी वो हाई कोर्ट के अन्तिम निर्णय के अधीन रहेंगी। उल्लेखनीय है 21 जनवरी 2018 में उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 1214 पदों पर एलटी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। जिसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिये बुलाया गया। अभ्यर्थी  हरीश कुमार व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे चुनौती दी। 

याचिका में  भर्ती प्रक्रिया  में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए आरक्षण के नियमों का पालन ना करने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने पूर्व में पूरे मामले पर सुनवाई कर नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद आज एकलपीठ में सुनवाई के बाद कोर्ट ने खण्डपीठ के आदेश का हवाला देते हुए नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है।

यह भी पढ़ें : 5000 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति के लिये शासनादेश जारी

नैनीताल, 22 नवंबर 2018। माध्यमिक विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की राह खुल गई है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शिक्षा सचिव डा. भूपेंदर कौर औलख ने इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया है। बृहस्पतिवार को जारी शासनादेश के अनुसार 4200 एलटी व 834 प्रवक्ता पदों के लिए 10 दिन के भीतर आवेदन ऑनलाइन करना होगा। अभ्यर्थी जिस जनपद में शिक्षण के इच्छुक होंगे, उन्हें वरीयता क्रम में जिलों का विकल्प अंकित किया जाएगा। मैरिट के आधार पर वरीयता क्रम में एक ही जिला आवंटित किया जाएगा। महिला शाखा के विद्यालयों में सिर्फ महिला अभ्यर्थी ही आवेदन कर सकेंगी।
जिलास्तर पर अतिथि शिक्षकों की तैनाती के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। जिसमें मुख्य शिक्षा अधिकारी सदस्य सचिव, डायट प्राचार्य व जिला शिक्षा अधिकारीे सदस्य होंगे। पहले अतिथि शिक्षक के तौर पर काम कर चुके अभ्यथिर्यों को वरीयता गुणांक प्रदान किए जाएंगे। ऑनलाइन आवेदन के अनुसार मैरिट सूची तैयार की जाएगी। अभ्यर्थियों का नियमित नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार का दावा मान्य नहीं होगा। इस संबंध में उन्हेें सौ रुपये का स्टांप पेपर प्रस्तुत करना होगा। चयनित अभ्यर्थी को मासिक 15 हजार मानदेय दिया जाएगा। हर माह एक दिन का आकस्मिक अवकाश देय होगा। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से प्रथम बैच से चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति या उससे पूर्व तक के लिए शिक्षण कार्य के लिए रखे जा सकेंगे।

यह भी पढ़ें: अशासकीय विद्यालयों के लिपिकों को 2013 से ग्रेड-पे वेतन देने के निर्देश

नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ ने अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति 1 जनवरी 2013 से ग्रेड-पे वेतन देने के निर्देश दिये हैं। मामले के अनुसार नैनीताल निवासी नारायण दत्त पांडे व ऊधमसिंह नगर निवासी मनोरथ पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि लिपिकीय संवर्ग में अशासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ व वरिष्ठ सहायक के पद पर 1994 से कार्यरत है। इधर उत्तराखंड शासन की ओर से 16 जनवरी 2013 को शासनादेश जारी कर शासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ सहायक एवं प्रवर सहायकों को तथा सहायता प्राप्त अशासकीय विद्घालयों में ग्रेड पद नाम व ग्रेड पे को 20 अक्टूबर से लागू किया गया। लेकिन विभाग से बार-बार निवेदन के बाद भी उनके प्रकरण पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। याची का कहना था कि इसी प्रकार के एक अन्य वाद में 23 मार्च 2018 को जिला हरिद्वार में अशासकीय कर्मचारियों को ग्रेड वेतन व पद नाम दोनों देने के निर्देश पारित किए है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस आधार पर कहा कि अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को भी 1 जनवरी 2013 से शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति ग्रेड पे दिया जाए।

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-इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तहत आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की जिला स्तर पर नयी भर्तियां करने को भी कहा
-मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त की शिक्षकों की कमी व अतिथि शिक्षकों की विशेष याचिका पर सुनाया फैसला
नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खण्डपीठ ने सरकार को मई 2019 तक शिक्षको की स्थायी नियुक्ति कर प्रदेश भर के सरकारी स्कूलो में शिक्षकों की कमी को दूर करने तथा इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था करने के आदेश दिये हैं।
खंडपीठ ने छात्रो के भविष्य को देखते हुए सरकार को यह भी निर्देश दिए है कि वह अतिथि शिक्षकों की भर्ती नए सिरे से जिला स्तर पर करे। कहा कि अतिथि शिक्षकों की भर्ती में नए अभियोथियो को भी मौका दिया जायेगा, साथ ही पूर्व से कार्यरत अतिथि शिक्षकों को प्राथमिकता दी जायेगी। खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिए है कि जैसे-जैसे अध्यापको की भर्ती होगी, उसी आधार पर अतिथि शिक्षक बाहर होते रहेंगे। खंडपीठ ने संघ लोक सेवा आयोग को यह भी निर्देश दिए हैं कि प्रवक्ताओं के 917 पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया को छः माह के भीतर पूर्ण करें। साथ ही एलटी के 1214 पदों पर पूर्व से घोषित परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को तीन माह के भीतर पूर्ण किया जाये। साथ ही एलटी के 906 पदों पर पदोन्नितियां चार माह के भीतर करने, राज्य आंदोलनकारियों से खाली हुए 296 एलटी के अध्यापको के पदों पर सात सप्ताह के भीतर उत्तराखंड तकनीकी शिक्षा से नियुक्तियां करने और सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया को मई 2019 तक पूर्ण करने के आदेश सरकार को दिए है।
मामले के अनुसार मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश की सरकारी विधालयों की शिक्षा व्यव्स्था अध्यापकों की कमी के कारण चरमरा गयी है। विद्यालयों में अध्यापकों की भारी कमी है। इससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। इस कारण बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ रहा है, या सभी विषयों के शिक्षक न होने के कारण अपना पसंदीदा विषय छोड़ना पड़ रहा है। याची ने यह भी प्रार्थना की थी कि जब तक स्थायी नियुक्तिया नहीं हो जातीं तब तक वैकल्पिक व्यवस्था की जाये, क्योंकि सत्र को चले हुए चार माह का समय बीत चुका हैं। दूसरी ओर अतिथि शिक्षकों ने भी अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए विशेष अपील दायर की थी। उनका कहना था कि उनका कार्यकाल न्यायालय के आदेशानुसार 31 मार्च को समाप्त हो गया है। खण्डपीठ ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किये है।

नैनीताल हाईकोर्ट की कार्रवाई के भय से भाजपा विधायक ने छोड़ा पद !
नैनीताल, 26 सितंबर 2018। भाजपा की थराली सुरक्षित सीट से विधायक मुन्नी देवी साह ने आखिर बुधवार को जिला पंचायत अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। यह जानकारी उन्होंने बुधवार को उच्च न्यायालय को अपने मामले की सुनवाई के दौरान दी। इसके बाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने जिला पंचायत के उपाध्यक्ष व मामले के याची को थराली के जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चार्ज देने के आदेश दिये और उनकी याचिका का निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार मुन्नी देवी के थराली से विधायक चुने जाने के बाद जिला पंचायत उपाध्यक्ष लखपत सिंह बुटोला ने अध्यक्ष का चार्ज 10 अगस्त को ले लिया था। लेकिन उन्हें कार्य नहीं करने दिया। बल्कि विधायक चुनी गयीं मुन्नी देवी ही कार्य देखती रहीं। लखपत सिंह ने हाईकोर्ट मे याचिका दाखिल कर मुन्नी देवी के दो पदों पर काबिज होने को चुनौती दी। उनका कहना था कि मुन्नी देवी की दो पदों पर काम करने की मंशा है, और सरकार भी उन्हें सहयोग कर रही है। जबकि जैसे ही वे थराली सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं, वैसे ही चमोली जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट रिक्त हो गई है। पंचायती राज अधिनियम के तहत उन्होंने उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया है। मुन्नी देवी दो पदों पर एक साथ कार्य नहीं कर सकती हैं। वे या तो वो विधायक थराली रह सकती हैं, या जिला पंचायत अध्यक्ष चमोली। इस दौरान मुन्नीदेवी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद लखपत सिंह के अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया।

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    • हल्द्वानी के एसटीएच-कैंसर हॉस्पिटल के कायापलट के लिए हाईकोर्ट ने दिये आठ बड़े आदेश
    • अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए सरकार को 1 सप्ताह का अल्टीमेटम
  • हल्द्वानी के भाजपा नेता विकास भगत की जनहित याचिका पर दिये हैं यह निेर्दश

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 19 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज स्थित स्वामी राम कैंसर इंस्टिट्यूट को राज्य स्तरीय कैंसर इंटिटूयूट बनाने और एक हप्ते के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति करने के लिए सरकार को अंतिम निर्णय लेने और सरकार द्वारा खरीदी गयी 61 एम्बुलेंस को तीन सप्ताह के भीतर चलाने के निर्देश भी दिए है।
मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी विकास भगत ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सुशीला तिवारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों व स्वास्थ्य सेवाओ का अभाव है। विकास हल्द्वानी के भाजपा विधायक व पूर्व काबीना मंत्री बंशीधर भगत के पुत्र व युवा भाजपा नेता बताये गये हैं। इस पर पीठ ने निर्देश दिये हैं कि सरकार अस्पताल में आकस्मिकता के आधार पर एक माह के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति हर हप्ते साक्षात्कार के माध्यम से करे। साथ ही सुशीला तिवारी अस्पताल व स्वामी राम कैंसर अस्पताल के विस्तारीकरण में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के आपत्ति को दूर करने के लिए राज्य सरकार का नोडल ऑफिशर केंद्र के सामने पैरवी करे और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पैरवी के 15 दिन के भीतर लगाई गयी आपतियो का निस्तारण करे। सुशीला तिवारी अस्पताल में तीन माह के भीतर नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी व कार्डियोलॉजी विभागों की स्थापना करने और और उसके एक सप्ताह के भीतर इन विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्त करने को भी पीठ ने कहा है। साथ ही इस अस्पताल में ट्रामा सेंटर की स्थापना के लिए शुरू की गयी टेंडर प्रक्रिया को चार सप्ताह के भीतर निस्तारित करने व उसके तीन सप्ताह का भीतर ट्रॉमा सेंटर को अस्तित्व में लाने के निर्देश भी दिए है। इसके अलावा मेडिकल कालेज हल्द्वानी में रेजिडेंट डॉक्टरों के पदों को भरने के लिए छः सप्ताह में प्रक्रिया पूर्ण करने व उसके चार सप्ताह में भीतर उनकी नियुक्ति करने के आदेश भी दिए गये है। साथ ही राज्य के पहाड़ी क्षेत्रो में एम्बुलेंस के अभाव में मरीजो को डोलियो व कुर्सियो में लाने-ले जाने का सज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने 61 एम्बुलेंस को शीघ्र चलाये जाने के आदेश दिए है। साथ ही खंडपीठ ने कुमाऊं मण्डल में चिकित्सको के कुल 1110 पदों में से 445 रिक्त पदों को शीघ्र भरने के आदेश भी दिए है।

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 14 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने उपनल कर्मियो को साल में दिए जाने वाले ब्रेक पर रोक लगा दी है। खंडपीठ ने इसे सर्वोच्च न्यायलय के आदेशों के विपरीत माना है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाईकोर्ट के आदेशों पर राज्य सरकार सरकार की ओर से आज कोर्ट को बताया गया कि इस प्रकरण पर विचार किया जा रहा है और 2 सप्ताह के भीतर निर्णय ले लिया जाएगा। मामले के अनुसार कुंदन सिंह नेगी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र भेजकर उपनल द्वारा की जा रही नियुक्तियों पर रोक लगाने की मांग की है। जिसका हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया है। याचिका में कहा गया कि उपनल का संविदा लेबर एक्ट में पंजीकरण नही है इसलिए यह असंवैधानिक संस्था है। उपनल का गठन पूर्व सैनिको व उनके आश्रितों के लिए हुआ था लेकिन राज्य सरकार ने इस संस्था को आउटसोर्सिंग से कर्मचारियों की नियुक्ति का माध्यम बना दिया है। जिस पर पूर्ण नियंत्रण राज्य सरकार का है। याचिका में उपनल कर्मियों के समाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भविष्य के लिए निति बनाने की मांग की। अधिवक्ता एमसी पंत की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि कर्मचारियों की ओर से जब याचिका दायर की थी तो सरकार उनको एक दिन का फिक्सनल ब्रेक साल में देती है, जिससे कि उनकी नियमित नियुक्ति ना हो सके। कोर्ट ने सरकार को ऐसा कोई ब्रेक न देने को कहा है और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध माना है।

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 31 अगस्त 2018। अब अंगुलियों से विहीन अथवा आंखों में दिक्कत जैसे आधार कार्ड बनाने में किसी कारण से अनुपयुक्त दिव्यांगों के आधार कार्ड भी बन सकेंगे। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दिव्यांग (विकलांगता) पेंशन संबंधी एक पत्र का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में मानते हुए जिलाधिकारियों से ऐसे सभी मामलों में मानवीयता व संवेदनशीलता दिखाते हुए दिव्यांगों के आधार कार्ड बनाने और दिव्यांग पेंशन देने के आदेश दिये हैं।
उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी दिव्यांग लक्ष्मण सिंह नेगी ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि विकलांगता के कारण उनके तथा कई लोगों के आधार कार्ड नहीं बन रहे हैं। इस वजह से उन्हें विकलांगता पेंशन भी नहीं मिल पा रही है। न्यायालय ने इस मामले को अति संवेदनशील मानते हुए प्रशासन को आदेश दिए हैं कि ऐसे लोगों के साथ मानवीयता का व्यवहार करते हुए इनकी समस्याओं का समाधान अति शीघ्र किया जाना चाहिए। खासकर याची के मामले में अल्मोड़ा के डीएम को तीन दिन के भीतर बनाने तथा सात दिन के भीतर उनकी रुकी हुए पेंशन एरियर सहित देने के आदेश दिये।

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  • देहरादून स्थित एनआईवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थान का मामला, रंग लाया छात्रों का आंदोलन, हाईकोर्ट ने सचिव सेंथिल पांडियन को बनाया जांच अधिकारी

नैनीनाल, 29 अगस्त 2018। नैनीताल हाईकोर्ट ने देहरादून के एनआइवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थानमें छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और यौन शोषण के मामले को गंभीरता से लिया है। प्रकरण में नैनीताल हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने संस्थान के निदेशक को आदेश दिया है कि छेड़छाड़ के आरोपी टीचर को सस्पेंड कर उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज करें। गौरतलब है कि छेड़छाड़, यौन शोषण सहित कई मांगों को लेकर पिछले लम्बे समय से आंदोलन कर रहे छात्र आंदोलन कर रहे थे, उनकी मुहिम आखिर रंग लाई है।  इसके बाद एनआईवीएच में सुधार की उम्मीद जगी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सचिव सेंथिल पांडियन को इस जांच अधिकारी नियुक्त किया है और कहा है कि तीन दिनों के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट सभी बातें पेश करें।

इसके साथ ही एसएसपी देहरादून को आदेश दिया है कि वो एनआइवीएच में रेगुलर विजिट के लिए एक महिला एसआई के साथ दो कॉन्स्टेबलों की नियुक्ति करें। संस्थान में बिजली की आपूर्ति बाधित ना हो इसके लिये 48 घंटों के भीतर जनरेटर की व्यवस्था की जाए। साथ ही संस्थान में 12 घंटों के भीतर एमबीबीएस डॉक्टर की नियुक्ति की जाए, जिससे बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके अलावा हाईकोर्ट ने संस्कृति सचिव को आदेश दिया है कि एनआईवीएच में खेल मैदान बनाया जाए। साथ ही बच्चों को खेल और सास्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि इस संस्थान में सात दिन के भीतर नियमित निदेशक की नियुक्त की जाए। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार यानी 4 सितंबर को होगी।

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नैनीनाल, 23 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिम कार्बेट पार्क में वन्यजीवों की सुरक्षा के मामले में बेहद सख्त रुख दिखाते हुए राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को नोटिस जारी किया है। साथ ही राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को अंतरिम रूप से जिम कॉर्बेट पार्क पर अपना नियंत्रण लेने के आदेश दिए है। साथ ही प्राधिकरण से वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए उठाये जा सकने वाले कदमों पर 30 अगस्त को अगली सुनवाई तक न्यायालय में जवाब देने को कहा।

उच्च न्यायालय ने यह बात राज्य सरकार पर वन्य जीवों के प्रति उदासीन बताने की अभूतपूर्व टिप्पणी व उससे जिम कार्बेट पार्क का प्रबंधन हटाने की अभूतपूर्व कार्रवाई करते हुए कही है। पीठ ने कहा कि हाथियों की मौत के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद पांच लोग देश से बाहर चले गए। इस पर उन्होंने नैनीताल के एसएसपी से भी सवाल-जवाब किये और उनके द्वारा दिये गये शपथ पत्र पर नाराजगी जतायी। कहा कि आरोपितों को रोकने के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए गए। वहीं गूजरों को ना हटाये जाने पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई। कहा सरकार वन गूजरों को क्यों बचा रही है। बार-बार शपथ पत्रों में बदलाव करने पर भी न्यायालय ने राज्य सरकार को गैरजिम्मेदार बताया। अपर मुख्य सचिव के न्यायालय में पेश ना होने को अदालत के आदेश से बचने का प्रयास बताया।

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p style=”text-align: justify;”>-वन गूर्जरों को सरकार स्वयं अतिक्रमणकारी मानती है तो मुआवजा क्यों दे रही है
-झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा
-हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों में शीघ्र कार्यवाही करे नैनीताल पुलिस
-फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा
नैनीताल, 16 अगस्त 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन भूमि पर रह रहे वन गूर्जरों को नया नोटिस जारी कर हटाने के निर्देश दिये हैं। कोर्ट ने दिसंबर 2017 से मार्च 2018 तक देश के विभिन्न हिस्सों में मिली बाघ की पांच खालों के जिम कॉर्बेट पार्क रामनगर के बाघों के होने व दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही न होने पर अपर मुख्य सचिव से छह दिन में जवाब पेश करने को कहा है। साथ ही मामले को सीबीआई को भेजे जाने की चेतावनी भी दी है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में हिमालयन युवा ग्रामीण विकास समिति रामनगर की जनहित याचिका में अनिल बलूनी के प्रार्थना पत्र, जिसमें कार्बेट पार्क के बफर जोन से वन गुर्जरों को हटाने व बाघों के संरक्षण की अपील की गयी थी की सुनवाई के दौरान राज्य के अपर मुख्य सचिव रणबीर सिंह ने शपथ पत्र पेश कर 11 अगस्त को पारित आदेशों के क्रियान्वयन की जानकारी दी। किन्तु वन गूर्जरों को हटाने के संदर्भ में कार्बेट पार्क के निर्देशक की ओर से वन गूर्जरों को दिये गये नोटिस पर हाईकोर्ट ने असंतोष व्यक्त करते हुए नया नोटिस जारी करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वन विभाग ने नोटिस में हाईकोर्ट के आदेश का आर्डर का जिक्र क्यों किया और अतिक्रमणकारियों को वन भूमि खाली करने के लिये इतना समय क्यों दिया गया, उनके द्वारा वन भूमि खाली करने पर एक ही परिवार के 10 या उससे अधिक लोगों को 10-10 लाख रूपये का मुआवजा देने या 2 एकड़ भूमि देने का प्रस्ताव क्यों रखा गया है। जबकि सरकार उनको अपने शपथ पत्र में अतिक्रमणकारी मान रही है। कोर्ट ने इस मामले में झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने जिम कार्बेट पार्क के निदेशक राहुल से वन गुर्जरों की अतिक्रमित भूमि का मौका मुआयना करने को भी कहा है। साथ ही खंडपीठ ने पांच बाघों की खालों के मामले में जांच में दोषी पाये गये अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय एसआईटी गठित करने पर असंतोष व्यक्त करते हुए अपर मुख्य सचिव से पूछा कि उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही की है। चेतावनी दी कि इस मामले को कोर्ट जांच के लिये सीबीआई को सौंप देगी। इसके साथ ही आज रामनगर वन प्रभाग की डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि कब्जे में लिये गये हाथी अभी पूर्ण स्वस्थ नहीं है। उनका उपचार चल रहा है। इनके खाने-पीने व रहने की पर्याप्त व्यवस्था की है। इसके अलावा कोर्ट ने हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों की शीघ्र कार्यवाही करने के निर्देश एसएसपी नैनीताल को दिये हैं और प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। साथ ही टाइगर रिजर्व फोर्स के संदर्भ में काबेट पार्क के निदेशक ने बताया कि विभाग 83 फारेस्ट गार्डों की प्रतिनियुक्ति कर रही है। इस पर हाईकोर्ट ने फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए नियमावली बनने तक रोक

नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए उचित नियमावली बनाने के निर्देश दिए हैं, और तब तक रीवरराफ्टिंग की स्वीकृति न देने तथा जो चल रहें हैं, उन पर रोक लगाने को कहा है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने हाईकार्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। याचिका में विपक्षीगणों की ओर से शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाने शुरू कर दिये और कैंपों में गंगा के किनारे कैंप की आड में मीट, मदिरा का सेवन, डीजे बजाना, बाथरूम का मुहाना नदी में खोलना व कूडा इत्यादि नदी में बहाने जैसे असामाजिक कार्य किए जाने लगे। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में कुछ फोटोग्राफ भी याचिका में लगाए थे। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिए हैं कि वे नदी के किनारे उपयुक्त शुल्क लिये बिना लाइसेंस जारी नहीं कर सकती तथा खेल गतिविधियों के नाम पर अय्याशी करने की स्वीकृति नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा राफ्टिंग कैंप को नदी किनारे स्वीकृति दी गई है, जिससे नदियों का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और राफ्टिंग के नाम पर लांचिंग पाइंट पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन रही है। बडे बडे राफ्टों से छोटी गाड़ियों से भी ढोया जा रही हैं। इस प्रकार की गतिविधियों की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए तथा राफ्टों को मानव शक्ति द्वारा ले जाया जाए न कि गाडियों द्वारा।

सात साल के बाद आचार्य बालकृष्ण को मिली राहत

  • हाई कोर्ट ने दिये सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे में 2011 में जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण का जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश दिए हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण का पासपोर्ट जुलाई 2011 से हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय मे जमा है। 2011 में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ धोखाधड़ी व फर्जी तरीके से शैक्षणिक दस्तावेज व पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में धारा 120 बी के तहत षडयंत्र का आरोप लगाया था। पूर्व में एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को हाईकोर्ट में जमा करने के आदेश दिए थे। तब से उनका पासपोर्ट यहीं जमा है। इधर मंगलवार को मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को रिलीज करने के निर्देश दे दिए हैं, साथ ही पासपोर्ट ऑथोरिटी को निर्देश दिए हैं कि वे चाहें तो बालकृष्ण के विदेश से लौटने के बाद उन्हें पासपोर्ट ऑथोरिटी के समक्ष पेश करवा लें या विदेश से आने का शपथपत्र लें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिया नजीर पेश करने वाला बड़ा फैसला : फांसी की सजा पाये दोषियों को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार 27 अप्रैल 2018 को एक बड़ा, देश भर के लिए नजीर बन सकने वाला फैसला देते हुए फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया है। अपने निर्णय में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश आलोक सिंह की खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा है कि सजा के दो-तीन दिन तक ही फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखा जा सकता है, उसके बाद उनको अन्य कैदियों के साथ ही रखा जाय। खंडपीठ ने इस संबंध में जेल मैन्युअल में दिए गए प्राविधानों को भी असवैधानिक माना और कहा कि जेल मेनुअल में फांसी की सजा पाये अभियुक्तों को 24 घण्टे में से 23 घंटे अलग रखे जाने का प्राविधान गलत है और यह भी एक प्रकार की दूसरी सजा से कम नही है।
खंडपील ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी निचली अदालत द्वारा एक महिला की क्रूरतापूर्वक की गयी हत्या व दुर्व्यवहार किये जाने के आरोपी सुुशील व महताब को निचली अदालत द्वारा दी गयी फांसी की सजा के मामले में की। खंडपीठ ने फांसी की सजा को बरकरार रखा, परन्तु दोषियों पर लगाये गए एससी-एसटी एक्ट को गलत माना और फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को अकेले रखने को असवैधानिक माना।
मामले के अनुसार विकास नगर निवासी अनिल चौहान ने 29 दिसम्बर 2012 को विकास नगर थाने में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई थी कि उसकी 55 वर्षीय माँ गायों को चराने के लिए जंगल गयी हुई थी, जहां से वह वापस नही आयी। काफी खोजबीन करने पर उनका शव जंगल में मिला और उनके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ था। जाँच करने पर उक्त दोनों अभियुक्तों के द्वारा हत्या करने की पुष्टि हुई। मामले में विशेष न्यायाधीश देहरादून द्वारा उन्हें 27 जनवरी 2014 को आईपीसी की धारा 302,376 जी में निर्मम हत्या करने व दुष्कर्म करने के मामले में फाँसी की सजा सुनाई गयी। साथ ही उन पर एससी-एसटी एक्ट भी लगाया। इस आदेश को सरकार व अभियुक्तों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी जिस पर अभियुक्तों के अधिवक्ता ने कहा है कि अभियुक्तों के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी शाक्ष्य नही है उनको संदेह के आधार पर इस मामले में फसाया जा रहा है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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