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March 3, 2024

History of Transport : भारत आज चांद पर जा रहा, इस मौके पर जानें उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में 1884 से आवागमन की सुविधाओं का पैदल से बैलगाड़ियों और केमू-रोडवेज का इतिहास…

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History of Transport in Kumaon: Today, July 14, is going to be a historic day for the country, when India will reach the moon. On this machine, we are taking you on a journey through the history of traffic in Kumaon Mandal of Uttarakhand (History of Transport in Kumaon), which shows how the journey of human beings from different observation to here.

History of Transport in Kumaon

डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल, 14 जुलाई 2023। आज 14 जुलाई का दिन देश के लिए ऐतिहासिक होने जा रहा है, जब भारत चांद पर पहुंचेगा। इस मौके पर हम उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में यातायात के इतिहास (History of Transport) की यात्रा पर आपको ले जा रहे हैं, जिससे पता चलेगा कि मनुष्य की यात्रा किस तरह विभिन्न पड़ावों से होते हुए यहां तक पहुंची है।

History of Transport in Kumaon
काठगोदाम रेलवे स्टेशन

कुमाऊँ के प्रवेश द्वार काठगोदाम में पहली बार 24 अप्रैल 1884 में पहली ट्रेन लखनऊ से पहुंची। काठगोदाम अपने नाम के अनुरूप अंग्रेजी दौर में पहाड़ से लायी जाने वाली काठ यानी लकड़ी का गोदाम था। यहां की बेशकीमती लकड़ी को अंग्रेज काटकर रेल के स्लीपर बनाने ले जाते थे। 1926 में बरेली से काठगोदाम के लिए दो ट्रेनें आती थीं। इनमें से एक सवेरे छः बजे और दूसरी रात के 10-11 बजे छूटती थी और पहली दिन के 12 बजे के करीब और दूसरी सुबह करीब पांच बजे के करीब काठगोदाम पहुंचती थी। लेकिन काठगोदाम से आगे पहाड़ों की राह आसान नहीं थी। 

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काठगोदाम से अल्मोड़ा पैदल 

19वीं सदी की शुरुआत में काठगोदाम में एक अच्छा हिन्दुस्तानी डाक बंगला था। काठगोदाम से लोग पैदल अल्मोड़ा के लिए निकलते थे। काठगोदाम से अल्मोड़ा की दूरी पैदल रास्ते से करीब 37 मील थी। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से रानीबाग तक करीब दो मील चलकर पहाड़ की चढ़ाई प्रारम्भ हो जाती थी। यहां से 8 मील की चढ़ाई चढ़कर भीमताल और फिर 5 मील यानी कुल 13 मील की चढ़ाई और चार मील के उतार से यात्री शाम को रामगढ़ पहुंच जाते थे।

भीमताल में जलपान और खाने पीने की चीजें मिल जाती थीं। रामगढ़ में भी दुकानें थीं। वहां भी सब तरह की खाद्य वस्तुएँ बिकती थीं। रामगढ़ में रात को ठहरने के लिए दुकानदारों के पास प्रवंध हो जाता था। डाक बंगले और उससे डेढ़ मील नीचे स्थित स्कूल में भी लोग ठहर सकते थे। वहां भी हलवाई की दुकानें थीं। रामगढ़ से सुबह चलकर शाम को पांच बजे या इससे पहले अल्मोड़ा अच्छी तरह पहुंच सकते थे।

आगे रास्ते में 10 मील पर प्यूड़ा का पड़ाव आता था। प्यूड़ा का पानी काफी गुणकारी माना जाता था। रामगढ़ से प्यूड़ा पहुंचने में रास्ता मनोहर दृश्यों के बीच से होता हुआ बहुत अच्छा सुन्दर था। इस रास्ते में केवल सवा मील की कठिन चढ़ाई थी। जबकि प्यूड़ा से आगे पांच मील के उतार के बाद दो पहाड़ी नदियों के संगम पर पुल पार कर आगे साढ़े चार मील की चढ़ाई चढ़कर अल्मोड़ा पहुंचा जाता था।

बैलगाड़ियों का दौर

History of Transport in Kumaon
नैनीताल की मॉल रोड में बैलगाड़ियों का दुर्लभ चित्र

पैदल मार्गों से आगे कुमाऊं क्षेत्र में यातायात के विकास की बात करें तो यहां मोटर मार्ग प्रारम्भ होने से पहले अपेक्षाकृत समतल भूभागों में तीन प्रमुख बैलगाड़ी मार्ग थे। इन मार्गों को अंग्रेज कार्ट रोड कहा करते थे। इन्हीं मार्गों से होकर शीतकालीन प्रवास भी हुआ करता था। इनमें पहला मार्ग रियुनी (मजखाली) से रानीखेत, स्यूनी-भतरौंजखान होकर मोहान गर्जिया होते हुए रामनगर तक, दूसरा रियूनी से रानीखेत होते हुए गरमपानी, भवाली, ज्योलीकोट, रानीबाग होते हुए काठगोदाम-हल्द्वानी और तीसरा मार्ग चौखुटिया-मासी-भिकियासैंण, भतरौजखान, मोहान, गर्जिया होते हुए रामनगर तक था। इसके अलावा नैनीताल में भी कार्ट रोड थी। नैनीताल की वर्तमान मॉल रोड पर बैलगाड़ी के चलने की फोटो अब भी उपलब्ध है।

सड़क मार्गों की शुरुआत 1911 से

सबसे पहले अंग्रेज शासकों ने हल्द्वानी से रानीबाग तक पुराने बैलगाड़ी मार्ग की लीक पर मोटर मार्ग का निर्माण शुरू किया था। 1911 से नैनीताल की ओर मोटर मार्ग बनाया जाने लगा जो 1915 में बनकर पूरा हुआ। 1920 में अल्मोड़ा और 1929 में गरुड़-बागेश्वर के लिए कच्ची सड़क बनी। खैरना से क्वारब होते हुए अल्मोड़ा की सड़क 1962 में चीन युद्ध के बाद बनी थी।

History of Transport in Kumaon
नैनीताल में अंग्रेजी दौर में वाहन

काठगोदाम से आगे पहाड़ों पर पहली सड़क अंग्रेजों की ऐशगाह-छोटी बिलायत कहे जाने वाले नैनीताल के लिए 1915 में बनकर तैयार हुई, और 1916 तक वहां मोटर गाड़ियां चलने लगी थीं। 1926 तक पहाड़ों के लिए चलने वाली कई मोटर और लारियाँ चलाने वाली कई कम्पनियाँ अस्तित्व में आ गई थी, जो अल्मोड़ा तक यात्रियों को पहुंचाती थीं।

काठगोदाम से अल्मोड़ा की दूरी रानीखेत होते हुए जाने वाली मोटर के रास्ते 80 मील थी। रानीखेत अच्छी बड़ी छावनी थी, वहां गोरी पल्टनें गर्मी के दिनों में आ जाती थीं। काठगोदाम से सुबह 7 लॉरी में बैठकर शाम तक अल्मोड़ा पहुंचा जा सकता था। लेकिन यदि दिन के बारह बजे काठगोदाम से लॉरी चलती तो रास्ते में रानीखेत में रात काटनी पड़ती थी। रास्ते में रुकने के लिए जगह-जगह धर्मशालाएं भी होती थीं, जहां कोई भी रात बिता सकता था। दानवीर महिला जसुली देवी शौक्याड़ी द्वारा बनाई कई धर्मशालाएं आज भी कई जगह नजर आती हैं। 

गर्मियों के दिनों में काठगोदाम से अल्मोड़ा के लिए मोटर का किराया पचहत्तर रुपये तक देना पड़ता था। गौरतलब है कि अब भी काठगोदाम से अल्मोड़ा का किराया 200 रुपए से कम है। यानी समझ सकते हैं करीब 100 वर्ष पूर्व 75 रुपए किराया कितना अधिक था। इसके अलावा भी लॉरी वाले ग्राहकों की सूरत-हैसियत देखकर मनमाना किराया भी वसूल लेते थे। शायद इतने अधिक किराये की वजह से कम ही लोग तब मोटरों या लारियों में सफर करते थे। बल्कि कई लोग अपना सामान तो इन मोटरों-लॉरियों से बुक कर अल्मोड़ा भेज देते थे, लेकिन खुद पैदल काठगोदाम से अल्मोड़ा जाते थे। अधिकांश लोग चुंगी के 25-50 पैसे बचाने के लिए भी मीलों पैदल जाते थे। 

History of Transport in Kumaon : बिन ट्यूब के टायरों की होती थीं शुरुआती गाड़ियां, लालटेन से दिखाया जाता था रास्ता

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शुरुआती दिनों में पर्वतीय मार्गों में सर्वप्रथम आधा टन की ठोस रबर टायर की (पेट्रोल चलित) गाड़ियां प्रारम्भ हुई, जिनकी अधिकतम गति सीमा 8 मील प्रति घंटा थी। तब पहियों में हवा डालने की व्यवस्था नहीं होती थी।

1920 तक अल्मोड़ा के लिए कच्ची सड़क बन गई और इस पर एक टन की पेट्रोल चलित लीलेंड गाड़ियां चलना प्रारम्भ हुईं, इनमें 12 व्यक्ति चालक व उपचालक सहित बैठ सकते थे और टायर हवा भरे रबर के होने प्रारम्भ हो गए थे। रात्रि में सामान्यतया वाहन नहीं चलते थे। चलना ही पड़े तो गाड़ियों के आगे एक व्यक्ति लालटेन लेकर गाड़ियों के आगे चलता था।

रात्रि में एक व्यक्ति लालटेन लेकर लॉरी को रोशनी दिखाता हुआ चलता था। शुरुआती लॉरियों में सीटें लकड़ी के फट्टों की होती थीं और इनमें धूप-बारिश से बचने का भी प्रबंध नहीं होता था। हां, बसों में ड्राइवर के पीछे एक लाइन वीआईपी यात्रियों के लिए, उसके पीछे दूसरे और फिर तीसरे दर्जे की सीटें होती थीं। वीवाईपी सीटों पर बैठना यात्रियों के लिए सपना सरीखा होता था।

1920 से 1938 तक डेढ़ टन की सेवरलेट गाड़ियां चलने लगीं, इन गाड़ियों में 18 व्यक्ति बैठ सकते थे। इन सवारी गाड़ियों में 42 मन भार की अनुमति थी। 1938 में पूर्ण कुंभ के पश्चात् दो टन की मोटर गाड़ियों के संचालन की अनुमति दी गई। बाद में 44 व्यक्तियों को ले जाने की अनुमति दी गई।

History of Transport in Kumaon : 1915 में मोटर यातायात की शुरुआत काठगोदाम-नैनीताल के बीच

History of Transport in Kumaonकुमाऊँ क्षेत्र में मोटर यातायात पहली बार 1915 में शुरू किया गया था, जब नैनीताल और काठगोदाम के बीच वाहन चलने लगे। 1920 तक इस मार्ग का विस्तार अल्मोडा तक हो गया और 1920 में ही काठगोदाम से अल्मोड़ा के लिए रानीखेत के रास्ते यात्री लॉरियों की सेवा प्रारंभ हुई। मोटर कंपनियों की स्थापना से पूर्व यहां बौन ट्रांसपोर्ट, फौन्सिका ट्रांसपोर्ट, इन्द्रजीत सिंह ट्रांसपोर्ट, ब्रिटिश इंडिया ट्रांसपोर्ट कम्पनी, हरवंश ट्रांसपोर्ट, हटन ट्रांसपोर्ट व चालक परमानन्द के वाहन चला करते थे।

History of Transport in Kumaonइसी वर्ष अल्मोडा के मुंशी ललिता प्रसाद टम्टा ने ‘हिल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ नाम से एक कंपनी शुरू की, जो हल्द्वानी और काठगोदाम से अल्मोडा और रानीखेत तक लॉरियां चलाती थी। कुछ समय बाद, ‘द कुमाऊं मोटर सर्विस कंपनी’ नामक एक और छोटी कंपनी ने परिचालन शुरू किया, लेकिन 1922 के उत्तरार्ध में इसे देवी लाल शाह गंगा राम को स्थानांतरित कर दिया गया।

History of Transport in Kumaon
‘द नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ नैनीताल

इसी दौरान ‘द नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ नाम की एक तीसरी कंपनी ने परिचालन शुरू किया। इसकी स्थापना में पं. गोविन्द बल्लभ पंत का भी योगदान रहा। साथ ही इस कंपनी में विदेशी लोगों का भी बाहुल्य बताया जाता है। नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कम्पनी’ के पास 88 वाहनों का समूह था। इसी साल श्री विल्सन (महाप्रबंधक) और अब्दुल रहमान खान (मुख्य अभियंता) के नेतृत्व में ‘ब्रिटिश इंडिया कॉर्पोरेशन कंपनी’ द्वारा इसका अधिग्रहण कर लिया गया और 1922 में ही इस मार्ग पर बसें चलाने वाली एक और कंपनी ठेकेदार नारायण दास हंसराज द्वारा शुरू की गई थी।

इस दौरान कई अन्य मोटर कंपनियों ने भी परिचालन शुरू किया। इस प्रकार 1921 से 1938 तक कुमाऊं में 13 मोटर कंपनियां पंजीकृत हुईं, जो काठगोदाम से नैनीताल, भवाली, रानीखेत और अल्मोडा तक परिवहन सेवाएं प्रदान करती थीं।

History of Transport in Kumaon : 1939 में 13 कंपनियों के विलय से हुई केमू की स्थापना

इतनी अधिक कंपनियां हो जाने के कारण आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से इन्हें भारी राजस्व हानि हुई। यहां तक कि 1938 में विदेशी लोगों के बाहुल्य वाली नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी भी डूब गई। इसलिए मुनाफा बढ़ाने और परिवहन व्यवस्था विकसित करने के उद्देश्य से 1939 में 13 कम्पनियों को विलय कर काठगोदाम में केमू यानी ‘कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड’ की स्थापना की गई। 1939 में पर्वतीय मार्गों पर नौ बसों के संचालन के साथ यह सेवा शुरू हुई थी।

History of Transport in Kumaon : एंग्लोइंडियन थे केमू के पहले महाप्रबंधक

कंपनी के पहले महाप्रबंधक एंग्लोइंडियन ईजेड फौन्सिका और पहले सचिव देवीदत्त तिवारी पहले निदेशक काठगोदाम के हरवंश पेट्रोल पम्प के मालिक हरवंश सिंह और लाला बालमुकुन्द थे। 1939 में फोंसेका एस्टेट काठगोदाम में केमू की पहली बैठक ईजेड फौन्सिका की अध्यक्षता में हुई थी। इस बैठक में काठगोदाम में संगठन के प्रमुख कार्यालय की स्थापना और कुमाऊं क्षेत्र में चेक-पोस्ट और स्टेशन स्थापित करने सहित 23 प्रस्ताव पारित किए गए थे। इसके बाद ही सार्वजनिक परिवहन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए हेड ऑफिस और विभिन्न चेक-पोस्ट व स्टेशनों का निर्माण किया गया था।

 धीरे-धीरे कंपनी में 250 वाहन शामिल हो गए। इस तरह 250 वाहन मालिक, 250 ड्राइवर, 250 क्लीनर और इतने ही अन्य कर्मचारी सीधे इस व्यवसाय यानी रोजी-रोटी से जुड़ गए। इसके अलावा सैंकड़ों मैकेनिक, मोटर पार्टस विक्रेता भी इससे जुड़े थे। बाद में इसकी दो शाखाएं रामनगर और टनकपुर में खोली गयी जिससे कुमाऊँ क्षेत्र में यात्रियों का परिवहन बढ़ा।

इनसे अनाज, वन उपज, आलू और यात्रियों के परिवहन में सुविधा हुई, जिससे क्षेत्र में अनाज, वन उत्पादन और सब्जी उत्पादन भी बड़ा। बाद में इस मोटर कंपनी की दो शाखाएँ रामनगर और टनकपुर में खोली गईं। स्वतंत्रता से पूर्व केमू लिमिटिड पहली व एकमात्र कम्पनी थी जिसकी बसें पूरे कुमाऊँ में दौड़ा करती थी। 1947 यानी आजादी के दौर से कुछ पहले ही बसें, ट्रक, लॉरी आदि अल्मोडा-रानीखेत से आगे जा सकीं।

History of Transport in Kumaon : 1929 में गांधी जी कार से पहुंचे कौसानी-बागेश्वर, अल्मोड़ा में उनकी गाड़ी से दबकर एक व्यक्ति की हुई मौत

History of Transport in Kumaon
Gandhi-in-Kumaon 1929

1929 में गांधीजी अपनी पर्वतीय यात्रा पर दो दिन ताड़ीखेत में रहने के बाद अल्मोड़ा पहुंचे। अल्मोड़ा में हुई सभा से लौटते हुए लोगों की भारी भीड़ के बीच पद्म सिंह नाम का एक व्यक्ति उस मोटर गाड़ी से कुचल गया जिसमें गांधीजी बैठे थे। गांधीजी तुंरत अपनी मोटर गाड़ी से उतरे और उस व्यक्ति को अस्पताल ले गये। अगले तीन दिन पद्मसिंह अस्पताल में रहे और अंत में अपना दम तोड़ दिया। अस्पताल में पद्मसिंह के पास बयान लेने मजिस्ट्रेट आया लेकिन उन्होंने मोटर गाड़ी के चालक के विरुद्ध कोई बयान नहीं दिया। पद्मसिंह की अंतिम यात्रा में क्षेत्र के बड़े कांग्रेसी नेता गोविन्द वल्लभ पन्त के साथ अनेक स्थानीय लोग शामिल हुए।

History of Transport in Kumaon : रोडवेज की स्थापना 1945 में

रोडवेज यानी पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम और अब उत्तराखंड परिवहन निगम द्वारा चलाई जाने वाली बसें आजादी के बाद चलनी शुरू हुईं। परिवहन विभाग का गठन 1945 में मोटर वाहन अधिनियम 1939 की धारा 133 ए के प्रावधानों के तहत किया गया था। उत्तराखंड निगम ने 31 अक्टूबर 2003 को काम करना शुरू किया।

History of Transport in Kumaon : 1950-51 में बनी टनकपुर से पिथौरागढ़ की सड़क 

टनकपुर से पिथौरागढ़ की पैदल दूरी 67 मील थी। साधारण लोग इसे तीन दिन में पार करते थे पर अच्छा चलने वाले दो दिन में। मैदान से सामान खच्चरों और घोड़ों में आता था। जुलाई में बारिश होने पर घाट और चल्थी के कच्चे पुल तोड़ दिये जाते थे। 1950-51 में टनकपुर से पिथौरागढ़ के लिए सड़क बनी। तब भी पिथौरागढ़ से टनकपुर जाने में पूरा दिन लगता था।

धूल से सने हुए व यात्रियों की उल्टी की बदबू सहते हुए यात्री अधमरी सी अवस्था में पिथौरागढ़ पहुँचते थे। टनकपुर-पिथौरागढ़ मार्ग में एक कठिन चढ़ाई नौ ड्योढ़ी की मानी जाती थी। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग इसके भी बहुत बाद में भारत-चीन युद्ध के बाद बना। तब पिथौरागढ़ से अल्मोड़ा की दूरी 54 मील थी। पिथौरागढ़-अल्मोड़ा मार्ग के लिये कहावत थी: रौल गौं की सोल धार, कां हाट कां बाजार। यहां हाट का मतलब गंगोली हाट से और बजार का मतलब पिथौरागढ़ से था।

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