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भारत का स्विटजरलेंड, गांधी-पंत का ‘कौसानी’

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Kausani

नवीन जोशी, नैनीताल। महाकवि कालीदास के कालजयी ग्रंथ कुमार संभव में नगाधिराज कहे गए हिमालय को बेहद करीब से निहारता और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा ‘भारत का स्विटजरलेंड’ कहा गया ‘कौसानी’ देश के चुनिंदा प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत रमणीक पर्वतीय पर्यटक स्थलों में एक है। महात्मा गांधी को अपनी नीरवता और शांति से गीता के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान कराने और ‘अनासक्ति योग’ ग्रंथ की रचना कराने वाली और प्रकृति के सुकुमार छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की यह जन्म भूमि आदि-अनादि काल से लेकर वर्तमान तक प्रकृति प्रेमियों का पसंदीदा स्थान रही है। यहां दूर तक कोसी, गोमती और गगास नदियों के बीच फैली कत्यूर, बोरारो व कैड़ारो घाटियों के बीच लहलहाती धान व आलू की खेती, हरे कालीन से बिछे चाय के बागानों और शीतलता बिखेरते देवदार व चीड़ के दरख्तों के बीच पर्वतराज हिमालय को अपनी स्वर्णिम आभा से रंगते सूर्याेदय और सूर्यास्त के स्वर्णिम आभा बिखेरते मनोहारी दृश्य सौंदर्य के वशीभूत सैलानियों को न केवल आकर्षित करते वरन अपना बना लेते हैं।

Kausani1कौसानी उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले से 53 किलोमीटर उत्तर में बागेश्वर, पिंडारी-सुंदरढूंगा ग्लेशियर के मार्ग पर समुद्र सतह से लगभग 1950 मीटर यानी 6075 फीट की ऊंचाई पर पिंगनाथ चोटी पर बसा एक छोटा सा पहाड़ी कस्बा है। यहाँ से बर्फ से ढके नंदा देवी पर्वत की चोटी का नजारा ‘ऊं’ जैसे स्वरूप में नजर आता है। साथ ही चौखंबा, नीलकंठ, नंदा घुंटी, नंदा देवी, नंदा खाट व नंदाकोट से लेकर पंचाचूली तक की हिम मंडित पर्वत श्रृंखलाओं का सुंदर व भव्य नजारा भी दिखता है। Himalaya's Trishul Peak from Kausaniकहा जाता है कुमाऊं में कत्यूरी राज के दौरान यह क्षेत्र राजा बैचलदेव के अधिकार में आता था, जिन्होंने इसे श्रीचंद तिवारी नाम के एक गुजराती ब्राह्मण को दे दिया था। संभवतया वहीं से गांधी जी इस स्थान के नाम से परिचित हुए और 1929 में एक स्थानीय चाय बागान मालिक के आतिथ्य में केवल दो दिन के प्रवास के लिए यहां आए थे, लेकिन इस स्थान के आकर्षण में पूरे 14 दिन न केवल रुके वरन ध्यान लगाकर ‘अनासक्ति योग’ ग्रंथ की रचना कर डाली। उन्होंने इस स्थान के बारे में कहा था, ‘इन पहाड़ों में प्राकृतिक सौंदर्य की मेहमाननवाजी के आगे मानव द्वारा किया गया कोई भी सत्कार फीका है। मैं आश्चर्य के साथ सोचता हूँ कि इन पर्वतों के सौंदर्य और जलवायु से बढ़ कर किसी और जगह का होना तो दूर, इनकी बराबरी भी संसार का कोई सौंदर्य स्थल नहीं कर सकता। अल्मोड़ा के पहाड़ों में करीब तीन सप्ताह का समय बिताने के बाद मैं बहुत ज्यादा आश्चर्यचकित हूँ कि हमारे यहाँ के लोग बेहतर स्वास्थ्य की चाह में यूरोप क्यों जाते हैं, जबकि यहीं भारत का स्विटजरलेंड मौजूद है।’

Anasakti Ashram Kausaniउनका वह ध्यान केंद्र आज यहां ‘अनासक्ति आश्रम’ के रूप में मौजूद है। कौसानी हिन्दी के छायावादी कवि त्रिमूर्ति महादेवी-पंत-निराला के पंत की न केवल जन्म स्थली रही है, वरन यहीं उनका बचपन बीता और उन्होंने अपनी कवि कालजयी रचनाओं का सृजन भी यहीं किया। उनकी यांदें आज भी यहां प्रसिद्ध इतिहासकार व साहित्यकार पं. नित्यानंद मिश्रा के प्रयासों से निर्मित राजकीय संग्रहालय में अनेक दुर्लभ चित्रों के रूप में मौजूद हैं। DSC07486पंत के पिता गंगा दत्त पंत कौसानी की खूबसूरती के एक प्रमुख आकर्षण, यहां उस दौर में करीब 390 एकड़ में फैले चाय बागान के व्यवस्थापक थे। यहां के चाय बागानों की गिरनार ब्रांड की चाय पहाड़ की खुशबू से लबरेज होती है, और देश ही नहीं जर्मनी, कोरिया और आस्ट्रेलिया तक निर्यात की जाती है। गौरतलब है कि ब्रिटिश शासन काल में महारानी विक्टोरिया ने वर्ष 1885 में भारत के तमाम हिस्सों में टी इस्टेट की स्थापना की थी। इसके तहत उत्तराखंड के देहरादून, कौसानी, चौकोड़ी, बेरीनाग, धरमघर (बागेश्वर व पिथौरागढ़ दोनों जिलों की सीमा), भीमताल समेत कई हिस्सों में टी इस्टेट विकसित किये गए थे। इन इलाकों में उत्पादित चाय ब्रिटेन समेत कई यूरोपीय देशों को भेजी जाती थी। भारत से ब्रिटिश राज के खात्मे से पहले टी इस्टेट को ब्रिटिश मूल की किसी महिला को सौंप दिया गया था। बाद में धीरे-धीरे तमाम लोगों ने टी इस्टेट में शेयर किया। साहित्यकार धर्मवीर भारती ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘ठेले पर हिमालय’ में कौसानी की खूबसूरती को अनेक कोणों से उकेरा है।

Pant Sangralaya kausaniकौसानी के अन्य पर्यटक स्थलों में गांधी जी की लंदन निवासी शिष्या कैथरीन मेरी हेल्वमन द्वारा 1964 में निर्मित लक्ष्मी आश्रम भी है। कैथरीन 1948 में भारत आकर गांधी जी के सत्य, अहिंसा के सिद्धांतों से इतना प्रभावित हुईं कि सरला बहन के रूप में यहीं बस गईं। वह यहां कस्तूरबा महिला उत्थान मंडल के तहत महिलाओं का संगठन बनाकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़कर कार्य करती रहीं। कौसानी से 17 किमी की दूरी पर गोमती नदी के तट पर कत्यूरी शासनकाल में 12वीं सदी में बने शिव, गणेश, पार्वती, चंडिका, कुबेर व सूर्य आदि देवताओं के मंदिर के समूह बैजनाथ भी एक दर्शनीय पौराणिक व धार्मिक महत्व का स्थल है। पास ही में गरुण के पास 21 किमी की दूरी पर कुमाऊं की कुलदेवी कही जाने वाली नंदा देवी एवं कोट भ्रामरी देवी का मंदिर भी बेहद प्रसिद्ध है। Kausani2बैजनाथ से 28 किमी और आगे बढ़ने पर सरयू और गोमती के संगम पर कुमाऊं की काशी कहा जाने वाला बागेश्वर नाम का स्थान है, जो पिंडारी, सुंदरढूंगा व काफनी ग्लेशियरों के यात्रा मार्ग का बेस शिविर भी है। आगे 87 किमी की दूरी पर स्थित चौकोड़ी से हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं को और भी अधिक करीब से देखा जा सकता है। बैजनाथ से ही दूसरी ओर कुमाऊँ और गढ़वाल मंडलों के मिलन स्थल ग्वालदम होते हुए स्वर्ग से भी सुंदर कहे जाने वाले बेदनी बुग्याल तक जाया जा सकता है। साहसिक खेलों के शौकीन सैलानियों के लिए यहां ट्रेकिंग, रॉक क्लाइबिंग के प्रबंध भी उपलब्ध हैं।

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यहां पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर-178 किमी, निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम-178 किमी तथा दिल्ली 431 किमी की दूरी पर है। मार्च-अप्रेल एवं सितंबर-अक्टूबर कौसानी सहित सभी पर्वतीय पर्यटक स्थलों की सैर एवं प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए सबसे बेहतर समय है, अलबत्ता गर्मियों में भी यहां शीतल जलवायु के लिए आया जा सकता है। कौसानी के प्रेमियों में गांधी जी के साथ ही अनेक अन्य खास हस्तियां भी शामिल हैं, इनमें पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के अलावा यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी, पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. कर्ण सिंह व अरुण शौरी के साथ प्रख्यात साहित्यकार निर्मल वर्मा के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं, जो कमोबेश हर वर्ष यहां आते रहते हैं। 

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सोमेश्वर का इतिहासः

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर तहसील में 150 गांव आते हैं। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा से करीब 40 किलोमीटर दूर और सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली कौसानी से करीब 12 किलोमीटर पहले स्थित इस घाटी का इतिहास इस तरह हैः
कहते हैं कि चंपावत के राजा गोरिया यानी पूरे कुमाऊं में न्यायप्रिय राजा के रूप में पूजे जाने वाले लोक देवता ग्वेल अर्थात ने धानिरौ में चार जातों को थात (जागीर) दे रखी थी, जिसमें बोर, बोरिला, चौधरी और कार्की थे। इनमें बोर काफी लड़ाकू था और उसने दूसरी तीनों जातों को काफी परेशान किया। आखिरकार तीनों ने मिलकर ग्वल के दरबार में गुहार लगाई। ग्वल ने बोर को बुलाकर काफी समझाया, लेकिन वो नहीं माना। इसलिए ग्वल ने बोर को अपने राज्य से निकाल दिया। बोर धानिरौ छोड़कर अल्मोड़ीहाट यानी तत्कालीन आलमशहर, अल्मोड़ा आ गया, जहां उस समय चंद वंशीय राजाओं का राज था।
कहते हैं कत्यूरी राजवंश का पतन 700 ईस्वी के करीब हो गया था, जिसके बाद चंद वंशीय राजाओं का उदय हुआ। इसके प्रथम शासक सोमचंद बताए जाते हैं। जिन्होंने शुरुआत में अपनी राजधानी चंपावत बनाई। लेकिन 1563 ईस्वी में राजा बलदेव कल्याण चंद इसे अल्मोड़ा ले आए। शायद ये इसके बाद की ही घटना होगी, तब अल्मोड़ा में राजा उदय चंद, तिरमोली चंद, राजा वीर विक्रमी चंद का राज था। बोर ने धानिरौ से आने के बाद इनके दरबार में नौकरी मांगी, तो इन्होंने कैड़ के साथ बोर को भी अपना शिकारी बना लिया। एक दिन जब राजा शिकार करते हुए रिहेड़छिन यानी रनमन के करीब आए, तो दोनों शिकारियों ने राजा से जागीर की मांग की। ऐसे में राजा ने दोनों को अपनी मर्जी से जगह हथियाने के लिए कह दिया। कहते हैं कि बोर काफी चतुर था, जिसने एक किल यानी सीमा रेखा के लिए लकड़ी वही रिहेड़छिन में गाड़ दी। इसके बाद दूसरा हथछिन यानी कौसानी, तीसरा लोदछिन यानी मवे के पास लोद में और चौथा गिरेछिन यानी भूलगांव-आगर के करीब गाड़ दिया। इसके बाद चार छिन का मालिक बन गया बोर। इस चार किलों के एरिया को ही बोरारौ घाटी कहते हैं।
बोर खुद छह राठ फल्या यानी चारों किलों के केंद्र सोमेश्वर में विराजमान हुए। कहते हैं कि बोर बाद में भाना राठ, अर्जुन राठ, हतु राठ और रितु राठ समेत छह भाई हुए, जिनके नाम पर आज भी फल्या में छह गांव बंटे हुए हैं। इस चारों छिन के एरिया में खाती, खर्कवाल, महरा, फर्त्याल राणा, भंडारी, नेगी और भैसौड़ा समेत कई जातियां रहती हैं। ब्राह्मणों में जोशी, कांडपाल, तिवारी, लोहनी लोगों के भी कुछ गांव हैं।

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