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उत्तराखंड की ‘ग्रेटा थनबर्ग’ हिमानी ने प्रधानमंत्री मोदी को भेजा ज्ञापन, जलवायु आपातकाल लागू करने की उठाई बड़ी मांग

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पीएम नरेंद्र मोदी
नवीन समाचार,  रामनगर,  13 फरवरी 2019। उत्तराखंड के ‘रॉयल बंगाल टाइगर’ बाघों सी चाल-ढाल वाले  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 14 फरवरी को उत्तराखंड आगमन पर  देश के पहले जिम कार्बेट पार्क की सैर पर भी आ सकते हैं। इसे  एक बाघ की  दूसरे बाघों से  वेलेंटाइन मुलाकात भी कहा जा सकता है। कार्बेट पार्क के इतिहास में यह पहली बार होगा कि सैर सपाटे के सीजन में ढिकाला जोन में 13 फरवरी को रात्रि विश्राम और 14 को दिन के भ्रमण की इजाजत नहीं होगी। माना जा रहा है कि रुद्रपुर में 14 फरवरी की प्रस्तावित रैली में शामिल होने आ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां भ्रमण पर आ सकते हैं और इसी की तैयारी के तहत पार्क प्रशासन ने यह फैसला किया है।
कार्बेट पार्क प्रशासन ने मंगलवार को वेबसाइट पर 13 फरवरी के नाइट स्टे और 14 फरवरी को डे विजिट के निरस्त होने की जानकारी दी है। अचानक ही लिए गए इस निर्णय के पीछे असल वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुद्रपुर दौरा माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक 14 फरवरी को रुद्रपुर में प्रस्तावित जनसभा में शामिल होने  से पहले ही प्रधानमंत्री कार्बेट पार्क की ओर रुख कर सकते हैं। सूत्रों की मानें तो पीएमओ से यह संकेत मिलने के बाद पार्क प्रशासन तैयारी में जुट गया है।  इस तैयारी में भाजपा के आला नेता भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री की सुरक्षा को देखते हुए तैयारी को बेहद गोपनीय तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। कोई भी अधिकारी अचानक डे और नाइट विजिट को निरस्त करने के पीछे का कारण बताने को तैयार नहीं है। यह तब है जबकि  कॉर्बेट में वीवीआईपी या वीआईपी के आने की जानकारी पहले ही मिल जाती है। ज्यादा जोर देने पर कहा जा रहा है कि ढिकाला जोन में ग्लोबल टाइगर फाउंडेशन की महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है। इसमें देश विदेश से प्रतिनिधि आएंगे। इस बैठक में कई सांसदों के आने की भी उम्मीद है। ऐसे में उनकी सुरक्षा और गोपनीयता को देखते हुए ढिकाला जोन को बंद किया गया है। यह तर्क भी पर्यटकों और कारोबारियों के गले नहीं उतर रहा है। कारण यह भी है कि कार्बेट पार्क को सीजन के दौरान अब से पहले कभी बंद नहीं किया गया। सीटीआर के निदेशक राहुल से भी संपर्क नहीं हो पा रहा है।

यह भी पढ़ें : नवीन समाचार एक्सक्लूसिवः क्या आपको पता है केदारनाथ के अलावा उत्तराखंड के कुमाऊं में यहां भी नरेंद्र मोदी ने की थी तपस्या

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p style=”text-align: justify;”>-17 की उम्र में प्रधानमंत्री मोदी ने अल्मोड़ा में की थी तपस्या
-नरेंद्र मोदी पर बन रही फिल्म ‘मन बैरागी’ में दिखाया जाएगा अल्मोड़ा से मोदी का जुड़ाव, चुनाव से पूर्व फिल्म होगी प्रदर्शित

नैनीताल में मोदी को माता नंदा-सुनंदा के चित्र युक्त प्रतीक चिन्ह भेंट करते बची सिंह रावत, बलराज पासी व अन्य स्थानीय नेता (फाइल फोटो)।
फिल्म के स्थानीय प्रतिनिधि सगीर खान

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 3 फ़रवरी 2019।

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p style=”text-align: justify;”>p style=”text-align: justify;”>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उत्तराखंड में केदारनाथ के निकट गरुड़ चट्टी नाम के स्थान पर तपस्या करने की बात तो अब काफी लोगों को पता है किंतु यह बात शायद किसी को पता नहीं कि मोदी का उत्तराखंड के एक अन्य स्थान से भी गहरा संबंध रहा है। और अब तक इस स्थान के बारे में नरेंद्र मोदी ने भी कभी बात नहीं की है। लेकिन इधर प्रधानमंत्री मोदी पर बन रही एक फिल्म में राज्य के उस स्थान और उस स्थान पर मोदी द्वारा बिताये गये समय का बड़े स्तर पर जिक्र होने जा रहा है। ‘मन बैरागी’ नाम की यह फिल्म प्रधानमंत्री मोदी के 17 वर्ष की उम्र से उनके प्रधानमंत्री बनने के बीच की अवधि में उनके जीवन संघर्ष को बयां करने वाली है। फिल्म के निर्माताओं की कोशिश है कि फिल्म को आगामी लोक सभा चुनाव से पूर्व रिलीज किया जाये।
यूं उत्तराखंड को देवभूमि और इसके कण-कण में देवत्व होने की बात कही जाती है, लेकिन प्रदेश में सांस्कृतिक नगरी के नाम से प्रसिद्ध अल्मोड़ा नगर है जो धार्मिक-आध्यात्मिक आस्था से बचपन से ही ओतप्रोत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे पहले अपने पास खींच कर लाया था। फिल्म के प्रोडक्शन इंचार्ज जीतू भाई ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर लंबा शोध एवं स्वयं मोदी से बात करने के बाद उनके जीवन के कई रहस्यों व उनके जीवन संघर्ष को लेकर इस फिल्म का निर्माण शुरू किया है।

इस तरह किशोरवय मोदी पहुंचे अल्मोड़ा

फिल्म ‘मन बैरागी’ की कहानी मोदी के देवभूमि अल्मोड़ा स्थित अद्भुत शक्तियों युक्त कसारदेवी मंदिर से शुरू होती है। जीतू ने बताया कि एक पंडित ने नरेंद्र मोदी के परिजनों को उनके सांसारिक मोह माया से विरत ‘बैरागी’ बनने की भविष्यवाणी की थी। इसलिये उनके परिजन 17 वर्ष की उम्र में ही उनके विवाह की योजना बना रहे थे। लेकिन इससे पहले ही आध्यात्म में रम चुके नरेंद्र विवाह से बचने के लिए अपने आदर्श स्वामी विवेकानंद के स्थान कलकत्ता के बेलूर मठ भाग आये। किंतु वहां उन्हें प्रवेश नहीं मिल पाया। उन्हें कहा गया कि मठ में केवल स्नातकों को ही प्रवेश दिया जाता है, और वे स्नातक नहीं थे, इसलिये उन्हें प्रवेश नहीं मिल सकता है। अलबत्ता वे स्वामी विवेकानंद के कसारदेवी, अल्मोड़ा स्थित सारदा मठ में प्रवेश ले सकते हैं, जहां स्वयं विवेकानंद भी अगस्त 1890 में कुमाऊं आगमन पर तपस्या कर चुके थे। इस पर नरेंद्र 17 वर्ष की उम्र में ही अल्मोड़ा के कसारदेवी मंदिर चले आये और यहां लंबे समय तक तपस्या की। फिल्म के स्थानीय प्रतिनिधि सगीर खान ने बताया कि गत 28 से 31 जनवरी तक कसारदेवी मंदिर में नरेंद्र मोदी द्वारा तपस्या करने के दृश्यों का फिल्मांकन किया गया है। आगे फिल्म की शूटिंग कोलकाता व गुजरात में होने जा रही है।

नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार भी अद्भुत चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है कसारदेवी में

कसारदेवी मंदिर

अल्मोड़ा से 5 किमी दूर स्थित दूसरी शताब्दी में बने कसार देवी मंदिर में महान भारतीय संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ध्यान-योग किया था। इस स्थान पर मौजूद ‘असीम’ शक्ति से नासा के वैज्ञानिक भी हैरान हैं। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार कसारदेवी दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग की तरह अद्वितीय चुंबकीय शक्ति का केंद्र हैं। कसारदेवी मंदिर के आसपास वाला पूरा क्षेत्र ‘वैन एलेन बेल्ट’ कहा जाता है, जहां धरती के भीतर विशाल भू-चुंबकीय पिंड है। इस पिंड में विद्युतीय चार्ज कणों की परत होती है जिसे रेडिएशन भी कह सकते हैं। जानकारी के अनुसार पिछले कई सालों से नासा के वैज्ञानिक इस बैल्ट के बनने के कारणों एवं इनसे मानव मस्तिष्क या प्रकृति पर पड़ने वाले असर का पता लगाने में जुटे हैं।

अल्मोड़ा के निकट काकड़ीघाट में नरेंद्र से महर्षि बने थे स्वामी विवेकानंद

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p style=”text-align: justify;”>p style=”text-align: justify;”>नैनीताल। देश के विचारवान युवाओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी आदि अनेकानेक लोगों के आदर्श स्वामी विवेकानंद का नैनीताल-कुमाऊं-उत्तराखंड से गहरा संबंध रहा है। वस्तुतः यहीं उनके ‘बोधगया’ कहे जाने वाले काकड़ीघाट धाम में उनके ‘बोधिवृक्ष’ सदृश पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ‘समूचे ब्रह्मांड को एक अणु में दिखाने वाला’ ज्ञान प्राप्त हुआ और इसी पुण्यधरा ने उन्हें एक साधारण कमउम्र साधु नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनते हुए देखा।
उल्लेखनीय है कि 19वीं शताब्दी के उस दौर में सपेरों के देश माने जाने वाले भारत को दुनिया के समक्ष आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रवर्तित करने वाले युगदृष्टा राजर्षि विवेकानंद को आध्यात्मिक ज्ञान नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट नाम के स्थान पर प्राप्त हुआ था। यानी सही मायनों में बालक नरेंद्र के राजर्षि विवेकानंद बनने की यात्रा देवभूमि के इसी स्थान से प्रारंभ हुई थी, और काकड़ीघाट ही उनका ‘बोध गया’ था। यहीं उनके अवचेतन शरीर में अजीब सी सिंहरन हुई, और वह यहीं ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गऐ। इस बात का जिक्र करते हुऐ बाद में स्वामी जी ने कहा था, यहां (काकड़ीघाट) में उन्हें पूरे ब्रह्मांड के एक अणु में दर्शन हुऐ। यही वह ज्ञान था जिसे 11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी जी ने पूरी दुनिया के समक्ष ‘मेरे अमेरिकावासी भाइयोे और बहनो…’ से अपना संबोधन शुरू करके विश्व को चमत्कृत कर दिया था। साथ ही सम्भवतः स्वामी जी को अपने मंत्र ‘उत्तिष्ठ जागृत प्राप्यवरान्निबोध्’ के प्रथम शब्द ‘उत्तिष्ठ’ की प्रेरणा भी उत्तराखंड के अल्मोड़ा के वर्तमान राजकीय इंटर कालेज में हिन्दी में अपना पहला भाषण देते हुए मिली थी।

विवेकानंद जीवन के तीन महत्वपूर्ण पड़ावों के साथ चार बार आए उत्तराखंड

स्वामी विवेकानंद चार बार देवभूमि आऐ, और उनका देवभूमि से संबंध उनके तीन चरणों यानी उनके नरेंद्र होने से लेकर स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनने तक का था। अगस्त 1890 में अपनी पहली आध्यात्मिक यात्रा में वे एक सामान्य साधु नरेंद्र के रूप में गुरु भाई अखंडानंद के साथ नैनीताल में प्रसन्न भट्टाचार्य के घर पर छह दिन रूककर अल्मोड़ा की तरफ चल पड़े। तभी काकड़ीघाट में एक पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें यह आत्मज्ञान प्राप्त हुआ कि कैसे समूचा ब्रह्मांड एक अणु में समाया हुआ है। स्वामीजी ने उस दिन की अनुभूति की बात बांग्ला में लिखी, ‘आमार जीवनेर एकटा मस्त समस्या आमि महाधामे फेले दिये गेलुम!’ यानी ‘आज मेरे जीवन की एक बहुत गूढ़ समस्या का समाधान इस महा धाम में प्राप्त हो गया है।’ काकड़ीघाट में आज भी उन्हें ज्ञान प्रदान कराने वाला वह बोधि वृक्ष सरीखा पीपल का पेड़ तथा आश्रम आज भी मौजूद है। यहां से आगे चलते हुए वह अल्मोड़ा की ओर बढ़े। कहते हैं कि अल्मोड़ा से पहले वर्तमान मुस्लिम कब्रिस्तान करबला के पास खड़ी चढ़ाई चढ़ने व भूख-प्यास के कारण उन्हें मूर्छा आ गई। वहां एक मुस्लिम फकीर ने उन्हें ककड़ी (पहाड़ी खीरा) खिलाकर ठीक किया। इस दौरान उन्होंने अल्मोड़ा नगर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुर्गा के मंदिर-कसारदेवी की गुफा में ध्यान और साधना भी की थीे। उन्होने यहां कई दिनों तक एक शिला पर बैठ कर साधना की। अल्मोड़ा के देवलधार और स्याही देवी मंदिर भी उनके प्रिय स्थल थे। ऐसी कुछ बातों का जिक्र स्वामी जी ने शिकागो से लौटकर मई 1897 में दूसरी बार अल्मोड़ा आने पर किया। इस बार अल्मोड़ा में वह लाला बद्रीश शाह के आतिथ्य में रहे। यह स्वामी विवेकानंद का राजर्षि के रूप में नया अवतार था। इस मौके पर हिंदी के छायावादी सुकुमार कवि सुमित्रानंदन ने कविता लिखी थी, ‘मां अल्मोड़े में आऐ थे जब राजर्षि विवेकानंद, तब मग में मखमल बिछवाया था, दीपावली थी अति उमंग”। स्वामी जी अल्मोड़ा से आगे चंपावत जिले के मायावती आश्रम भी गऐ थे, जहां आज भी स्वामी जी का प्रचुर साहित्य संग्रहीत है, तथा अल्मोड़ा में स्वामी जी के गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम से मठ व कुटीर आज भी मौजूद है। बाद में उनके भाषणों का संग्रह ‘कोलंबो से अल्मोड़ा तक’ नाम से प्रकाशित हुआ था। वहीं 1898 में की गई अपनी तीसरी यात्रा के दौरान अल्मोड़ा में उन्होंने अपनी मद्रास से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘प्रबुद्ध भारत’ का प्रकाशन मायावती आश्रम से करने का निर्णय लिया था। इसके अलावा दिसंबर से जनवरी 1901 के बीच वे उत्तराखंड के अद्वैत आश्रम मायावती चंपावत की यात्रा पर आये थे।

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p style=”text-align: justify;”>p style=”text-align: justify;”>-पीएम के भाई ने भी किए बदरीविशाल के दर्शन, पौड़ी या हरिद्वार सीट से चुनाव लड़ सकते हैं मोदी 
रोहित डिमरी, रुद्रप्रयाग, गोपेश्वर। दीपावली के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ के दर्शन किए और आज बृहस्पतिवार को नरेंद्र मोदी के भाई पंकज मोदी ने भगवान बद्रीविशाल के दर्शन किये। दोनों भाई हर वर्ष भगवान भोले और नारायण के दर पर पहुंच रहे हैं। पंकज मोदी ने आज बद्रीनाथ धाम पहुंचकर सबसे पहले भगवान नारायण के विशेष पूजा-पाठ किया और भगवान बद्रीविशाल से देश और दुनिया की खुशहाली के लिए प्रार्थना की।
दीपावली के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ पहुंचने के बाद सियासी हलकों में अटकलों का बाजार गरम हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी का केदारनाथ में यह तीसरा दौरा था। प्रधानमंत्री मोदी के केदारनाथ में इतनी रुचि लेने से माना जा रहा है कि इस बार आम चुनाव में भाजपा का फोकस उत्तराखंड पर रहेगा। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी पौड़ी या हरिद्वार सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक ही दिवाली के मौके पर बाबा केदार के धाम जाने की योजना बनायी। हालांकि इस दौरान उत्तराखंड में निकाय चुनाव व पांच अन्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते आचार संहिता लगी थी, इसके बावजूद उनका केदारनाथ दर्शन के लिए जाना सियासी हलकों में उबाल लाने जैसा है। सूत्रों के अनुसार अयोध्या मामले में भाजपा और संघ का रटारटाया राम मंदिर का मुद्दा पुराना हो चुका है और इसके झांसे में मतदाताओं के आने के कम ही चांस हैं। ऐसे में यदि मोदी केदारनाथ पुनर्निर्माण का श्रेय लेते हैं तो यह उनके लिए लाभ का कारण बन सकता है क्योंकि उत्तराखंड ही एक मात्र ऐसा प्रदेश है जहां गंगा-यमुना भी है और पंच केदार भी हैं। चारधाम भी हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्षी दलों के महागठबंधन से निटपने के लिए भाजपा हिन्दुत्व का कार्ड खेल सकती है। ऐसे में केदारनाथ में किये जा रहे पुनर्निर्माण कार्य और गंगा के निर्मल और अविरलता के लिए किये जा रहे प्रयासों को भाजपा भुना सकती है। कुछ जानकार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी उत्तराखंड से चुनाव लड़कर पूरे हिन्दुओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं कि वे देवभूमि का प्रतिनिधित्व करेंगे। ऐसे में वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, लेकिन कुछ राजनीति जानकार मानते हैं कि मोदी ऐसी सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां से कम से कम बीस संसदीय क्षेत्र प्रभावित हो। भाजपा नेता अभी इस संबंध में कोई भी टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। अलबत्ता उनका कहना है कि यदि मोदी उत्तराखंड से चुनाव लड़ते हैं तो यह गर्व की बात होगी। 
दीपावली के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ पहुंचने के बाद सियासी हलकों में अटकलों का बाजार गरम हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी का केदारनाथ में यह तीसरा दौरा था। प्रधानमंत्री मोदी के केदारनाथ में इतनी रुचि लेने से माना जा रहा है कि इस बार आम चुनाव में भाजपा का फोकस उत्तराखंड पर रहेगा। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी पौड़ी या हरिद्वार सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक ही दिवाली के मौके पर बाबा केदार के धाम जाने की योजना बनायी। हालांकि इस दौरान उत्तराखंड में निकाय चुनाव व पांच अन्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते आचार संहिता लगी थी, इसके बावजूद उनका केदारनाथ दर्शन के लिए जाना सियासी हलकों में उबाल लाने जैसा है। सूत्रों के अनुसार अयोध्या मामले में भाजपा और संघ का रटारटाया राम मंदिर का मुद्दा पुराना हो चुका है और इसके झांसे में मतदाताओं के आने के कम ही चांस हैं। ऐसे में यदि मोदी केदारनाथ पुनर्निर्माण का श्रेय लेते हैं तो यह उनके लिए लाभ का कारण बन सकता है क्योंकि उत्तराखंड ही एक मात्र ऐसा प्रदेश है जहां गंगा-यमुना भी है और पंच केदार भी हैं। चारधाम भी हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्षी दलों के महागठबंधन से निटपने के लिए भाजपा हिन्दुत्व का कार्ड खेल सकती है। ऐसे में केदारनाथ में किये जा रहे पुनर्निर्माण कार्य और गंगा के निर्मल और अविरलता के लिए किये जा रहे प्रयासों को भाजपा भुना सकती है। कुछ जानकार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी उत्तराखंड से चुनाव लड़कर पूरे हिन्दुओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं कि वे देवभूमि का प्रतिनिधित्व करेंगे। ऐसे में वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, लेकिन कुछ राजनीति जानकार मानते हैं कि मोदी ऐसी सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां से कम से कम बीस संसदीय क्षेत्र प्रभावित हो। भाजपा नेता अभी इस संबंध में कोई भी टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। अलबत्ता उनका कहना है कि यदि मोदी उत्तराखंड से चुनाव लड़ते हैं तो यह गर्व की बात होगी। 

नवीन समाचार एक्सक्लूसिवः उत्तराखंड में ‘ट्रिपल इंजन’ लगाने का संदेश दे गये हैं प्रधानमंत्री मोदी ! निकाय चुनाव में कितना असर करेगा यह चुनावी दांव…

नैनीताल, 8 नवंबर 2018। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 7 नवंबर दीपावली के अवसर पर उत्तराखंड दौरा और खासकर इस दौरान सीमांत सैन्य चौकी हर्षिल में पूर्व सैनिकों से आत्मीयता से मिलना, उन्हें अपने हाथों से मिठाइयां खिलाना और उनके परिजनों की भी कुशलक्षेम पूछना राज्य में आगामी 18 नवंबर को होने वाले निकाय चुनावों में भी अपना असर दिखा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस दौरे से मोदी ने दो तरह से उत्तराखंड के लोगों को छुवा है। पहला इससे उत्तराखंड के प्रति मोदी का लगाव प्रकट हुआ है, दूसरे राज्य के सैन्य बहुल होने के नाते भी इसका गहरा संदेश गया है। सूत्रों के अनुसार इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा राज्य में ‘डबल इंजन’ के बाद पहली बार नगर निकायों की ‘छोटी सरकारों’ में भी भाजपा प्रत्याशियों को जिताकर ‘ट्रिपल इंजन’ लगाने का संदेश भी कार्यकर्ताओं को दिया गया है। संदेश साफ है, यदि केंद्र एवं राज्य के साथ निकायों की छोटी सरकार में भी भाजपा होगी तो विकास के अवरुद्ध कार्यों को अधिक गति मिल सकेगी।

यह भी पढ़ें : मोदी होने के मायने

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p style=”text-align: justify;”>p style=”text-align: justify;”>केदारनाथ में नरेंद्र मोदीराजनीति के जानकार कहते हैं कि मोदी जो भी करते हैं उसके गहरे राजनीतिक अर्थ होते हैं। लिहाजा पूरी तरह गैर राजनीतिक कहे जा रहे प्रधानमंत्री के इस दौरे के भी राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। खासकर विपक्षी कांग्रेस की ओर से देखें तो वह मोदी के आने से पहले ही इसके विरोध में बोलकर अपनी राजनीतिक चिंता को प्रकट कर चुकी है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अब तक के कार्यकाल में दस बार उत्तराखंड आ चुके हैं। इससे पहले उनकी तरह देश का कोई नेता साढ़े चार वर्ष के कार्यकाल में इस छोटे से राज्य में आया हो, कहना मुश्किल है। इससे कहीं न कहीं वह यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि वह उत्तराखंड की चिंता करते हैं और प्रदेश के विकास को लेकर वह अहम कदम भी उठा रहे हैं। केदारनाथ में केदारपुरी के पुर्ननिर्माण कार्यों के साथ ही चाहे ऑल वेदर रोड का मामला हो या फिर ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेललाइन परियोजना, प्रधानमंत्री इनकी प्रगति पर स्वयं नजर रखे हुए हैं। यहां तक कि इन्वेस्टर्स समिट में आकर भी प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड में निवेश की संभावनाओं के द्वार खोले और राज्य के प्रति अपने लगाव को प्रदर्शित किया। इधर हर्षिल में सैनिकों को दिए गए संबोधन में प्रधानमंत्री ने ‘वन रैंक वन पेंशन’ से लेकर सेना को मजबूत करने के लिए सरकार के प्रयासों को साझा किया। सैनिक बहुल प्रदेश में प्रधानमंत्री का यह कदम पूर्व सैनिकों के साथ ही सैन्य परिवारों के बीच एक संदेश भी दे गया है। उनके इस लगाव से जनता भी कहीं न कहीं जुड़ रही है। इसका सीधा फायदा भाजपा संगठन व प्रदेश भाजपा सरकार को मिल सकता है।
जनता के बीच सरकार और संगठन, प्रधानमंत्री के उत्तराखंड के प्रति लगाव को प्रचारित भी कर रही हैं और केंद्र की सहयोग से प्रदेश में हो रहे कार्यों को भी इससे जोड़ रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि मौजूदा चुनावों में भी इसका असर पड़ेगा और मोदी के नाम पर एक बार फिर कई प्रत्याशी अपनी चुनावी वैतरणी पार लगा सकेंगे।

दिवाली उत्तराखंड के हर्षिल में तैनात जवानों का उत्साहवर्धन करने पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी जवानों को खिलाई दीवाली की मिठाई

देहरादून, 7 नवंबर 2018 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने केदारनाथ दौरे के दौरान दीपावली के पवित्र पर्व पर बुधवार की सुबह देहरादून पहुंचने के बाद हर्षिल गए। वहां पर उन्होने जवानों का हौसला बढ़ाया। इसके साथ ही, पीएम ने सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत और आईटीबीपी के डीजी से मुलाकात की। इस मौके पर उन्होंने जवानों को मिठाई खिलाकर दीपावली की बधाई दी। इसके बाद वह केदारनाथ धाम पहुंचे और बाबा के दर्शन के साथ ही निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली से सेना के विशेष विमान से 6: 47 बजे जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर पहुचे। जौलीग्रांट एयरपोर्ट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7:10 पर सेना के 4 एम आई -17 हेलीकॉप्टर की सुरक्षा घेरे में एयरपोर्ट से उत्तरकाशी जिले में भारत चीन सीमा पर स्थित हर्षिल के लिए रवाना हुए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को केदारनाथ मदिर में जाकर पूजा अर्चना की। उन्होंने अक्टूबर 2017 में परियोजना की रखी गई आधारशिला की भी समीक्षा की। 2013 में आए आपदा में हुआ भारी तबाही और बाढ़ के चलते हजारों लोग मारे गए थे। इसस पहले, मंगलवार को 5,100 दीये मंदिर के पास जलाए गए थे। उत्तराखंड की राज्यपाल बेबीरानी मौर्य, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह भी मौजूद रहे। पीएम मोदी मंदिर के अंदर करीब 10 से 15 मिनट रहे। उन्होंने पूजा करने के बाद मंदिर की परिक्रमा की और पिछले कुछ दिनों में धाम में हुई बर्फबारी से खूबसूरत हुए नजारे का भी दीदार किया। प्रधानमंत्री ने मंदिर प्रांगण में लगाई गई केदारनाथ की तस्वीरों का भी अवलोकन किया, जिसमें वर्ष 2013 में आई प्रलयंकारी भीषण आपदा से उजड़ गए क्षेत्र के पुनर्निर्माण की यात्रा को दर्शाया गया था। उल्लेखनीय है कि मोदी की बाबा केदार के प्रति अगाध श्रद्धा है। जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वह केदारनाथ आते रहे हैं। यही नहीं, केदारपुरी का पुनर्निर्माण नमो के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है और वह इस पर लगातार निगरानी रखे हुए हैं। केदारपुरी में यह कार्य जोर-शोर से चल रहे हैं। इसे देखते हुए लंबे समय से चर्चा चल रही थी कि नौ नवंबर को केदारनाथ के कपाट बंद होने से पहले प्रधानमंत्री केदारनाथ पहुंचेंगे। साथ ही कुछ निर्माण कार्यों का लोकार्पण भी करेंगे। इस बीच राज्य में निकाय चुनाव की आचार संहिता लगने और लोकार्पण व शिलान्यास के लिए राज्य निर्वाचन आयोग से अनुमति न मिलने के मद्देनजर प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर असमंजस की स्थिति भी बनी हुई थी।

यह भी देखें : वीडियो और पीएम मोदी का ट्वीट, उत्तराखंड के लाभार्थी को बिजली का कनेक्शन मिलने पर कैसे हैरान हुए मोदी

पुराना समाचार: पीएम मोदी ने सराही उत्तराखंड के किसानों की यह पहल, बताया देश के लिए अनुकरणीय

जहां पहाड़ के गांव पलायन का दंश झेल रहे हैं। वहीं कुछ गांव और उसमें रहने वाले लोग अपने प्रयासों से देशवासियों की प्रेरणा बन रहे हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद के सीमांत मुनार गांव के ग्रामीणों ने। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में मुनार के काश्तकारों से प्रेरणा लेने की अपील की है।

प्रधानमंत्री ने क्या कहा, यहां सुनिए :

प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में कहा, “भाइयो, बहनो, उत्तराखंड के किसान देश भर के किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गए हैं। उन्होंने संगठित प्रयास से काम किया। खेत की पैदावार से बिस्कुट बनाया और इन्हें बेचना शुरु किया। उस इलाके में पक्की मान्यता है कि बिस्कुट आयरन रिच होते हैं। यह आयरन रिच गर्भवती महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। मुनार गांव में एक सहकारी संस्था बनाई है। बिस्कुट की फैक्ट्री खोल ली है। किसानों की हिम्मत देखते हुए सरकार ने भी इसे राष्ट्रीय आजीविका मिशन से जोड़ दिया है। यह बिस्कुट अब न केवल जिले के 50 आंगनबाड़ी केंद्रों में बल्कि अल्मोड़ा कौसानी में भी पहुंचाए जा रहे हैं। किसानों की मेहनत से कंपनी का सालाना टर्न ओवर 10 से 15 लाख पहुंच गया है। 900 परिवारों को रोजगार भी मिला है। जिले से होने वाला पलायन भी रुकना शुरु हुआ है।”

देश भर को इस तरह प्रेरणा बने मुनार के ग्रामीण

वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में कपकोट ब्लाक के दूरस्थ, सरयू नदी के उद्गम स्थल सरमूल के आखिरी पड़ाव, मुनार के मडुवे के बिस्कुटों का जिक्र किया है। देश भर के लिए प्रेरणा बने मुनार के लोगों ने एक दशक पूर्व स्वयं सहायता समूह बनाया। उन्होंने एसएचजी के माध्यम से मडुवा, चौलाई, मक्का के बिस्कुट बनाने शुरु किए। पहले कुछ समय तक इन लोगों ने स्थानीय बाजार कपकोट, भराड़ी क्षेत्र के दुकानों में अपने मडुवे से बने उत्पादों को बेचा। किसानों की मेहनत रंग लाई। इसके बाद सरकार की नजर इन पर पड़ी और इसे व्यापक रुप दिया गया। 10 माह पूर्व इन लोगों ने एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना से मां चिल्टा आजीविका स्वायत्त सहकारिता, मुनार, लोहारखेत में बनाई। जहां हिलांस ब्रांड का मडुवा, चौलाई व मक्का से निर्मित बिस्कुट बनाए। जिसको व्यापक पैमाने में बाजार मिला। आज यह बागेश्वर, कौसानी, अल्मोड़ा आदि स्थानों पर आसानी से बिकने लगा है।

20 गांवों के 984 लोग जुड़े

स्यायत्त सहकारिता में 20 गांवों में 84 स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं। जिसमें सीधे तौर पर 984 सदस्य जुड़े हुए हैं। सरकार भी इनके काम को अब प्रोत्साहित करने लगी है। स्वायत्त सहकारिता की अध्यक्ष तारा टाकुली, कोषाध्यक्ष गंगा देवी ने कहा कि अब इस काम से लोग लगातार जुड़ रहे है। गत दिनों इस पर डीडी न्यूज में भी समाचार प्रसारित हुआ था। उसी समाचार को मोदी ने अपनी मन की बात में शामिल किया है।

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