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March 5, 2024

(Pahad ke Mudde) कठोर भूकानून की ओर और आगे बढ़ा उत्तराखंड, एसीएस ने मांगी पिछले 10 वर्ष की अनुमतियों की जानकारी, साथ ही बताई सरकार की मंशा

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Pahad ke Mudde

Uttarakhand Rajniti

नवीन समाचार, अल्मोड़ा, 25 जनवरी 2024। उत्तराखंड शायद कठोर भू-कानून की ओर आगे बढ़ रहा है। आज प्रदेश की अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी की अध्यक्षता में भू कानून से संबंधित प्रारूप समिति की बैठक हुई, और इसके बाद श्रीमती रतूड़ी ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को पिछले दस वर्षों में उनके स्तर से कृषि एवं औद्यानिकी हेतु दी गयी अनुमतियों से प्राप्त भूमि की जानकारी शीघ्र राजस्व विभाग को भेजने के निर्देश दिये। देखें वीडिओ :

इसके अलावा सरकार द्वारा जल्दी ही सशक्त भू-कानून तैयार कर लागू करने के लिये जिलाधिकारियों से सुझाव मांगे हैं। बैठक में एसीएस राधा रतूड़ी ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित भू-कानून के संबंध में सरकार का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड के मूल निवासियों के हितों का संरक्षण तथा उन्हें न्याय दिलाना है। साथ ही निवेशकों में अस्थायी रूप से कृषि एवं औद्यानिकी हेतु भूमि की अनुमति पर रोक से सम्बन्धित कानून के सम्बन्ध में फैली विभिन्न भ्रान्तियों व संशयों को विभिन्न माध्यमों से तत्काल दूर करना है। देखें वीडिओ :

इसके साथ ही इस कानून का लक्ष्य उत्तराखण्ड में निवेश एवं रोजगार सृजित करने वाले विश्वसनीय निवेशकों को प्रोत्साहित करना तथा निवेश की प्रक्रिया को सरल करना है। श्रीमती रतूड़ी ने जिलाधिकारियों को यह भी स्पष्ट किया है कि अस्थायी रूप से कृषि एवं औद्यानिकी हेतु भूमि की अनुमति पर रोक से सम्बन्धित कानून का उद्देश्य भूमि के दुरूपयोग को रोकना, भू कानून को और भी अधिक तर्कसंगत एवं न्यायपूर्ण बनाना तथा औद्योगिक गतिविधियों एव निवेश को हतोत्साहित करना नहीं है।

उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि निवेशकों में अस्थायी रूप से कृषि एवं औद्योनिकी हेतु भूमि की अनुमति पर रोक से सम्बन्धित कानून के सम्बन्ध में फैली विभिन्न भ्रान्तियों या संशयों को विभिन्न माध्यमों से तत्काल दूर करें।

बैठक के दौरान एसीएस रतूड़ी ने निर्देश दिए कि राज्य में निवेश के आवेदकों का सत्यापन सम्बन्धित विभागों द्वारा पूरी तत्परता से सुनिश्चित कराया जाना चाहिए। इस हेतु निवेश की प्रक्रिया को सरल किया जाना भी जरूरी है ताकि अधिक से अधिक निवेशक राज्य में उद्यम स्थापित करने एवं रोजगार सृजन हेतु प्रोत्साहित हो सके। बैठक में डीजीपी अभिनव कुमार, सचिव आर मीनाक्षी सुन्दरम, विनय शंकर पांडेय, दीपेंद्र कुमार चौधरी तथा वर्चुअल माध्यम से सभी जिलों के जिलाधिकारी सहित अन्य सम्बंधित अधिकारी शामिल रहे।

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नवीन समाचार, देहरादून, 1 जनवरी 2023 (Pahad ke Mudde)। उत्तराखंड में अब प्रदेश से बाहर के लोग कृषि या उद्यान के नाम पर जमीन नहीं खरीद सकेंगे। प्रदेश में जमीनों का खुर्द-बुर्द करने की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाने के लिए धामी सरकार ने नये वर्ष की पूर्व संध्या पर बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने भू-कानून प्रारूप समिति की रिपोर्ट आने या अगले आदेश तक प्रदेश से बाहर के लोगों को जिलाधिकारी की अनुमति से मिलने वाली कृषि एवं उद्यान भूमि खरीदने की छूट पर रोक लगा दी है।

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इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है, ‘शासकीय आवास पर भू-कानून के संबंध में उच्च स्तरीय बैठक लेते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए कि भू कानून समिति की आख्या प्रस्तुत किये जाने तक या अग्रिम आदेशों तक जिलाधिकारी बाहरी व्यक्तियों को कृषि एवं उद्यान के उद्देश्य से भूमि क्रय करने की अनुमति के प्रस्ताव पर निर्णय नहीं लेंगे।’

यह भी कहा है, ‘भू-कानून के लिए बनाई गई कमेटी द्वारा बड़े पैमाने पर जन सुनवाई की जाए और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों की राय ली जाए। भू-कानून के लिए विकेंद्रीकृत व्यवस्था के लिए गढ़वाल और कुमाऊं कमिश्नर को भी शामिल किया जाए।’ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बताया कि यह रोक भू माफिया व गलत नीयत से जमीन खरीदने वालों के लिए है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय, उद्योग या किसी अन्य स्टार्टअप के लिए जमीन लेना चाहता है, जिससे स्थानीय लोगों को भी लाभ मिले तो उसका उत्तराखंड में स्वागत है।

उल्लेखनीय है कि राज्य से बाहर के लोग उत्तराखंड में डीएम स्तर पर मंजूरी लेकर धड़ल्ले से कृषि और उद्यान के नाम पर भूमि खरीद रहे थे। उदाहरण के लिये दिसंबर माह में ही नैनीताल जनपद के रामगढ़ विकास खंड में दिल्ली निवासी पूर्व में कांग्रेस के बड़े नेता एवं एवं वर्तमान में समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुके नेता के नाम पर कई लोगों के बड़े भूभाग को खरीदे जाने की जिलाधिकारी के स्तर से अनुमति मिली है। 

इसी तरह पूरे प्रदेश में राज्य की जमीनें खरीदे जाने का सिलसिला जारी है। यह भी है कि पूर्व में पहाड़ की जमीनों पर बाहरी लोगों द्वारा घर बनाकर उन्हें उनके मूल मालिकों को ही चौकीदार बनाकर छोड़ा गया था। अब इन छूटे घरों में से बड़े पैमाने पर नियमविरुद्ध होम स्टे, बिना मूल मालिक के रहते दिल्ली आदि से बुकिंग लेकर इन्हीं चौकीदारों के भरोसे ‘होम स्टे’ चलाये जा रहे हैं। इससे राज्य की होम स्टे नीति का लाभ स्थानीय लोग नहीं, बल्कि ये बाहरी लोग ही उठा रहे हैं।

बहरहाल, प्रदेश सरकार के इस नये कदम के बाद अब उत्तराखंड में सिर्फ वही लोग कृषि व उद्यान की जमीन खरीद सकेंगे, जिनके नाम पर 12 सितंबर 2003 से पहले उत्तराखंड में अचल संपत्ति है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश जमींदारी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 की धारा 154 में वर्ष 2004 में संशोधन किया गया था कि ऐसे व्यक्ति जो प्रदेश में 12 सितंबर 2003 से पूर्व अचल संपत्ति के धारक नहीं हैं, वे कृषि और औद्यानिकी के उद्देश्य से भूमि खरीदने को जिलाधिकारी से मंजूरी ले सकता है।

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यह भी पढ़ें : Pahad ke Mudde : क्यों सुलगा है भू-कानून के मुद्दे पर उत्तराखंड ? जानें इतिहास से लेकर वर्तमान तक पूरा विषय…

डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 25 दिसंबर 2023 (Pahad ke Mudde)। हिमालयी राज्य उत्तराखंड में पूरे देश से इतर अलग विरोधाभास की वजह से गर्म ‘मूल निवास’ के मुद्दे के साथ ‘भूकानून’ की मांग भी लंबी, पर्वतीय राज्य की अवधारणा से जुड़ी एवं महत्वपूर्ण है।

राज्य में एक सशक्त भूकानून न होने की वजह से हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड अकेला राज्य है जहां राज्य के बाहर के लोग पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि भूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए खरीद सकते हैं। इन्हीं दो मुद्दों पर उत्तराखंड में बीती 24 दिसंबर 2023 को राजधानी देहरादून में महारैली आयोजित हुई है।

उत्तराखंड मांगे भू कानून : ...जिस दिन राज्य की विधानसभा में पहाड़ों को  बेचने का हो रहा था षडयंत्र। जरूर पढें यह खास खबर - Mukhyadharaगौरतलब है कि राज्य के कुल क्षेत्रफल 56.72 लाख हेक्टेअर का 63.41 प्रतिशत यानी अधिकांश क्षेत्र वन और बंजर भूमि के अंतर्गत आता है। जबकि कृषि योग्य भूमि मात्र 7.41 लाख हेक्टेयर यानी लगभग 14 प्रतिशत तक सीमित है। इसके बावजूद राज्य में सशक्त भू कानून नहीं होने की वजह से राज्य की जमीन को राज्य से बाहर के लोग बड़े पैमाने पर खरीद रहे हैं और राज्य के संसाधनों पर हावी हो रहे हैं।

जबकि यहां के मूल निवासी और भूमिधर भूमिहीन हो रहे हैं और कई जगह अपनी जमीनों पर काबिज बाहरी लोगों के ‘केयर टेकर’ होकर रह गये हैं। इसका प्रभाव पर्वतीय राज्य की संस्कृति, परंपरा, अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ रहा है। ऐसे में आइये भूकानून के इस महत्वपूर्ण विषय को पूरे विस्तार एवं ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समझते हैं। 

वर्ष 1815-16 में उत्तराखंड में ब्रिटिश हुकूमत का पदार्पण हुआ। इस दौरान खेती पर लिया जाने वाला टैक्स अंग्रेज सरकार की आय का बड़ा स्रोत होता था। लेकिन पहाड़ों में 10-12 प्रतिशत भूमि ही कृषि योग्य थी। ऐसे में इस दौरान पहाड़ों पर खेती का विस्तार हुआ और प्रति व्यक्ति जमीन के साथ-साथ आबादी भी बढ़ी। साथ ही इस दौरान वर्ष 1840 से 1846, 1870, 1905-1906 तथा 1924 तक कई चरणों में जमीनों के बंदोबस्त यानी लैंड सेटलमेंट हुए।

जबकि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में जेडएएलआर एक्ट कहे जाने वाले यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम-1950 के बाद कूजा एक्ट कहे जाने वाले कुमाऊं और उत्तराखंड जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम 1960 के तहत तत्कालीन उत्तर प्रदेश के आज के उत्तराखंड कहे जाने वाले पर्वतीय भूभाग के लिये नये भूकानून आये और आजादी के बाद से अब तक राज्य में एकमात्र भूमि बंदोबस्त 1960 से 1964 के बीच हुआ।

लिहाजा इसके बाद के करीब 60 सालों में कितनी कृषि योग्य भूमि का इस्तेमाल गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए किया गया है, इसके सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। नब्बे के दशक में चले ऐतिहासिक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में पृथक राज्य के साथ ही पहाड़वासियों की जमीनें एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने के लिए उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी संविधान के अनुच्छेद 371 के प्रावधानों की मांग की जाने लगी थी।

भाजपा के तत्कालीन सांसद मनोहर कांत ध्यानी ने राज्य सभा में भी यह मांग उठाई थी। जबकि राज्य गठन के बाद भी मांग उठी कि, जम्मू-कमीर और उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा न सही, कम से कम पड़ोसी राज्य हिमांचल की तरह का सशक्त भूकानून मिलना ही चाहिये। ताकि अन्य हिमालयी राज्यों की तरह उत्तराखंड की जमीनें और संस्कृति सुरक्षित रह सके।

लेकिन इस हिमालयी राज्य को न तो उत्तर पूर्व की तरह धारा 371 के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा मिला, और विशेष राज्य का दर्जा भी कुछ समय के लिये मिला भी तो उससे राज्य में कुछ हद तक औद्योगिक विकास होने के साथ राज्य की जमीनों की बलि ही चढ़ी।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राज्य की पहली निर्वाचित नारायण दत्त तिवारी और फिर भुवन चंद्र खंडूड़ी के नेतृत्व वाली सरकारों ने हिमाचल प्रदेश के काश्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम-1972 की धारा 118 की तर्ज पर उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम-1950 तथा अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश-2001 और इसके संशोधन अधिनियम-2008 में संशोधन कर इसे कुछ हद तक सशक्त बना दिया था।

राज्य में बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद सीमित करने के लिए वर्ष 2003 में तत्कालीन एनडी तिवारी सरकार ने उत्तर प्रदेश के कानून में संशोधन किया और राज्य का अपना भूमि कानून अस्तित्व में आया। इस संशोधन में व्यवस्था थी कि जो बाहरी व्यक्ति धारा 129 के तहत राज्य में जमीन का खातेदार न हो, वह राज्य में 500 वर्ग मीटर की सीमा तक कृषि भूमि की खरीद कर सकता है।

लेकिन इस सीमा से अधिक जमीन खरीदने पर राज्य सरकार से क्रेता को विशेष अनुमति लेनी होगी। तब उत्तराखंड में कृषि के लिए केवल 13 प्रतिशत जमीन वर्गित थी और इसका बड़ा हिस्सा बंजर और जंगलों में बदल चुका था और राज्य गठन के बाद से 4 वर्षों में लगभग 1 लाख हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन कृषि से बाहर हो गई थी।

लेकिन वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी की सरकार ने इस कानून में संशोधन कर भूमि खरीद की सीमा घटाकर 250 वर्ग मीटर कर दी। इस कानून में व्यवस्था थी कि 12 सितम्बर 2003 तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन है, वे 12 एकड़ तक कृषि योग्य जमीन खरीद सकते हैं। लेकिन जिनके पास जमीन नहीं है, वे आवासीय उद्देश्य के लिए भी इस तारीख के बाद 250 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं।

जबकि 2018 में भाजपा की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने जेडएएलआर एक्ट में संशोधन कर, उद्योग स्थापित करने के उद्देश्य से पहाड़ में जमीन खरीदने की अधिकतम सीमा और किसान होने की बाध्यता ही खत्म कर दी। साथ ही, कृषि भूमि का भू उपयोग बदलना आसान कर दिया। पहले पर्वतीय और फिर मैदानी क्षेत्र भी इसमें शामिल किए गए।

अलबत्ता यह व्यवस्था भी की गई कि खरीदी गई भूमि का इस्तेमाल यदि निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया जाता या कोई जमीन किसी अन्य को बेची जाती है तो वह राज्य सरकार में निहित हो जाएगी।कारण यह था कि तब उत्तराखंड में 2018 में आयोजित निवेशक सम्मेलन में 1.25 लाख करोड़ के पूंजी निवेश प्रस्तावों के एमओयू हुये थे।

इससे त्रिवेंद्र सरकार इतनी गदगद हुई कि उसको जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 के पीछे छिपी जमींदारी के विनाश और काश्तकार की भूमि बचाने की भावना शायद नजर नहीं आई और उन्होंने उद्योगों के नाम पर पैतृक राज्य उत्तर प्रदेश से विरासत में मिले ऐतिहासिक कानून को ही दांव पर लगा दिया।

त्रिवेंद्र सरकार ने 2018 में उत्तराखंड में लागू उत्तर-प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम-1950, अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश 2001 में संशोधन कर इस कानून में धारा 154 (2) जोड़ते हुए पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर दी। इसके साथ ही 143 (क) जोड़ कर कृषकों की जमीनों को अकृषक घोषित करना तथा बाहरी लोगों के लिये उद्योगों के नाम पर कृषि भूमि खरीद कर उसका भूउपयोग परिवर्तन करना आसान कर दिया।

इस तरह इस संशोधन के तहत विधेयक में यह प्रावधान किया गया था कि औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि क्रय करे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ेगी। जबकि औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाने पर उसका भू उपयोग स्वतः बदल जाएगा और वह-अकृषि या गैर कृषि हो जाएगी।

जबकि इस अधिनियम में धारा 154 (2) जोड़कर पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद की सीमा को औद्योगिक प्रयोजन के लिए पूरी तरह खत्म कर दिया गया। इसका फायदा उठाकर बाहरी लोगों ने राज्य में निवेश के नाम पर बेतहाशा जमीनें खरीद डालीं, लेकिन इन जमीनों पर आज तक उद्योगों की फसल खड़ी नहीं हुई, लेकिन राज्य की बड़े पैमाने पर कृषि भूमि बंजर जरूर हो गयीं।

जबकि इधर, राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने राज्य में उद्योगों के लिये ‘सिंगल विंडो’ की व्यवस्था लागू की है। इसके तहत खरीदी गई कृषि भूमि को गैर कृषि घोषित करने के बाद वह राज्य सरकार में निहित नहीं की जा सकती है। यानी राज्य का भूकानून सरकार दर सरकार कमजोर होता चला गया है।

अलबत्ता, धामी सरकार ने जहां एक ओर कानून में ढील दी, वहीं भू-सुधार के लिए पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की। इस समिति में श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य अजेंद्र अजय, पूर्व आईएएस अधिकारी अरुण ढौंडियाल व डीएस गर्ब्याल तथा प्रदेश के तत्कालीन राजस्व सचिव दीपेंद्र कुमार चौधरी समिति के सदस्य थे। इस समिति ने वर्ष 2022 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। जिसमें सख्त भू कानून लाने के लिए 80 पृष्ठ में तैयार कर अपनी 23 संस्तुतियां सरकार को दी थीं।

रिपोर्ट में समिति ने वर्तमान में प्रदेश में प्रचलित उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम-1950 यथा संशोधित तथ यथा प्रवृत्त में जन भावनाओं के अनुरूप हिमाचल प्रदेश की तरह कई प्रावधान किये।

जैसे कृषि अथवा औद्यानिक तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों और 4-5 सितारा होटल, रिसॉर्ट, मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, वोकेशनल, प्रोफेशनल इंस्टिट्यूट आदि के लिये कृषि भूमि क्रय करने की अनुमति जिलाधिकारी की जगह शासन से ही देने का प्रावधान करने तथा पर्वतीय एवं मैदानी क्षेत्रों में औद्योगिक प्रयोजनों, आयुष, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, उद्यान एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, कृषि के लिए 12.05 एकड़ से ज्यादा भूमि देने की जगह हिमाचल प्रदेश की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता के आधार पर देने जैसे प्रावधान किये गये थे।

साथ ही भू-कानून में सुधार हेतु हिमाचल की तर्ज पर उद्योगों को उनकी जरूरत के हिसाब से भूमि उपलब्ध कराने तथा अन्य प्रायोजनों के लिए तय सीमा से अधिक भूमि केवल लीज पर देने तथा स्थानीय लोगों का भूमि पर मालिकाना हक बनाये रखने की भी संस्तुतियां की गयी थीं।

इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि इस समितिं की संस्तुतियों के बाद राज्य में वर्ष 2018 में संशोधन से भूमि क्रय संबंधी अधिनियम में जोड़ी गई उपधारा 143-क और धारा 154 (2) समाप्त की जा सकती है। उद्योगों को जमीन आवंटित करने का अधिकार जिलाधिकारियों को देने के फैसले तथा उद्योगों को जमीन खरीद में दी गई छूट को भी निरस्त किया जा सकता है, तथा उद्योगों के नाम पर ली गई जमीनों का उपयोग बदलने पर जमीन सरकारी कब्जे में ली जा सकती है।

लेकिन इस रिपोर्ट के आधार पर एक वर्ष के बाद भी भूकानून में कोई बदलाव नहीं किये, अलबत्ता इधर राज्य में हुए वैश्विक निवेश सम्मेलन में हुए करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये के समझौतों को पूरा करने की चुनौती के बीच धामी सरकार हरकत में आयी है।

सरकार ने 24 दिसंबर 2023 को देहरादून में भूकानून एवं मूल निवास के मुद्दों को लेकर आयोजित हुई ‘मूल निवास स्वाभिमान महारैली’ से दो दिन पहले 22 दिसंबर को सुभाष कुमार की अध्यक्षता वाली भूमि कानून समिति द्वारा सरकार को उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के विस्तृत परीक्षण के लिए अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय प्रारूप समिति का गठन कर दिया है।

यह समिति विशेषज्ञों और अधिकारियों से भूमि व्यवस्था अधिनियम में आवश्यक बदलाव के लिए सुझाव लेगी और इन सुझावों को राज्य सरकार को उपलब्ध कराएगी। लिहाजा इन स्थितियों में राज्य में भूमि की बेरोकटोक एवं अनियंत्रित बिक्री को रोकने के लिए सशक्त भूकानून की प्रबल आवश्यकता वक्त की जरूरत है

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यह भी पढ़ें : Pahad ke Mudde : मूल निवास-स्थायी निवास पर जन दबाव तेज, 24 को देहरादून में ‘मूल निवास स्वाभिमान महारैली’, जानें क्या है पूरा मामला-विवाद ?

नवीन समाचार, देहरादून, 22 दिसंबर 2023 (Pahad ke Mudde)। उत्तराखंड में इन दिनों मूल निवास और स्थायी निवास की बहस छिड़ी हुई है। उत्तराखंड में मूल निवास राज्य बनने के दिन 9 नवंबर 2000 से लागू है। लेकिन इसे 1950 से लागू करने की मांग तूल पकड़ रही है।

इस संबंध में आगामी रविवार 24 दिसंबर को राजधानी देहरादून में ‘मूल निवास स्वाभिमान महारैली’ का आह्वान किया गया है। इस संबंध में प्रदेश के चर्चित कवि-गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने भी अपील की है। हर कोई मूल निवास और स्थायी निवास के पक्ष में अपनी-अपनी दलीलें दे रहा है, लेकिन मूल निवास और स्थायी निवास के पीछे तकनीकी पहलू क्या है और कानूनी जानकार इसके बारे में क्या कहते हैं? देखें वीडिओ :

 उल्लेखनीय है कि भारत में आजादी के बाद अधिवासन को लेकर 8 अगस्त 1950 और 6 सितंबर 1950 को राष्ट्रपति के माध्यम से ‘प्रेसीडेंशियल नोटिफिकेशन’ जारी हुआ था और इसे वर्ष 1961 में गजट नोटिफिकेशन के तहत प्रकाशित किया गया था।

इसमें भारत के अधिवासन को लेकर कहा गया था कि वर्ष 1950 से जो व्यक्ति देश के जिस राज्य में मौजूद है, वह वहीं का मूल निवासी होगा। इस नोटिफिकेशन में साफ तौर से मूल निवास की परिभाषा को परिभाषित किया गया था। साथ ही मूल निवास की अवधारणा को लेकर भी स्पष्ट व्याख्यान किया गया था।

इसके बावजूद देश में मूल निवास को लेकर पहली बहस साल 1977 में हुई, जब 1961 में महाराष्ट्र और गुजरात राज्य का विभाजन हुआ और यहां पर मराठा संप्रदाय ने मूल निवास को लेकर पहली बार सर्वोच्च न्यायालय में बहस की।

इसके बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ यानी आठ न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में राष्ट्रपति के वर्ष 1950 के नोटिफिकेशन को मूल निवास के लिए देश के हर एक राज्य में बाध्य किया। साथ ही 1950 के प्रेसीडेंशियल नोटिफिकेशन को बाध्य मानते हुए मूल निवास की सीमा को 1950 ही रखा।

लेकिन अजीब बात रही कि उत्तराखंड में न प्रेसीडेंशियल नोटिफिकेशन यानी देश के राष्ट्रपति की ओर से जारी अधिसूचना लागू है और न ही देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाई गयी मुहर ही। बल्कि यहां 1950 की जगह राज्य बनने के दिन यानी 9 नवंबर 2000 के दिन को मूल निवास के रूप में माना गया।

गौरतलब है कि वर्ष 2000 में देश के तीन नए राज्यों-उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन हुआ। इन तीन नए राज्यों में से उत्तराखंड के अलावा शेष दोनों राज्यों झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य ने मूल निवास को लेकर के प्रेसीडेंशियल नोटिफिकेशन को मान्य मानते हुए 1950 को ही मूल निवास रखा, लेकिन उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के नेतृत्व वाली भाजपा की अंतरिम सरकार ने मूल निवास के साथ स्थायी निवास की व्यवस्था कर दी।

इसके तहत 15 साल पूर्व से उत्तराखंड में रहने वालों के लिए स्थायी निवास की व्यवस्था कर दी गई, और मूल निवास के साथ स्थायी निवास को अनिवार्य किया गया। आगे वर्ष 2010 में जब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार थी, उस समय उत्तराखंड उच्च न्यायालय में ‘नैना सैनी बनाम उत्तराखंड राज्य, केस संख्या ।प्त् 2010न्ज्ज्36 और देश के सर्वोच्च न्यायालय में ‘प्रदीप जैन विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया के केस संख्या ।प्त्1984ैब 1420 दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं।

इन दोनों याचिकाओं में एक ही विषय रखा गया था, जिसमें उत्तराखंड में राज्य गठन के समय निवास करने वाले व्यक्ति को मूल निवासी के रूप में मान्यता देने की मांग की गई थी, लेकिन इन दोनों याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय और उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक ही फैसला दिया। जोकि 1950 के प्रेसिडेंशियल नोटिफिकेशन के पक्ष में था। जहां पर याचिकाकर्ताओं को सफलता हासिल नहीं हुई और उत्तराखंड में 1950 का मूल निवास लागू रहा।

लेकिन वर्ष 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार आई और इसी दौरान ही तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के शासन काल में मूल निवास और स्थायी निवास को लेकर वास्तविक खेल हुआ। 17 अगस्त 2012 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक याचिका की सुनवाई हुई। जिसमें उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने फैसला दिया कि 9 नवंबर 2000 के दिन से राज्य में निवास करने वाले व्यक्तियों को मूल निवासी माना जाएगा।

यह उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 24 और 25 के अधिनियम 5 और 6 अनुसूची के साथ 1950 में लागू हुए प्रेसिडेंशियल नोटिफिकेशन का उल्लंघन था, इसके बावजूद भी सरकार ने एकल पीठ के इस फैसले को चुनौती न देते हुए स्वीकार कर लिया। साथ ही सरकार ने वर्ष 2012 के बाद से मूल निवास प्रमाण पत्र बनाने की व्यवस्था भी बंद कर दी। तब से उत्तराखंड में केवल स्थायी निवास की व्यवस्था ही लागू है।

इसके बाद से राज्य में मूल निवास प्रमाण पत्र के बावजदू स्थायी निवास प्रमाण पत्र मांगे जा रहे थे, लेकिन इधर राज्य में मूल निवास व स्थायी निवास के मुद्दे के तूल पकड़ने के बाद धामी सरकार ने मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों से स्थायी निवासी प्रमाण पत्र न मांगने का आदेश जारी किया है। आगे देखना होगा कि इस संबंध में बन रहे जनदबाव के बाद राज्य की धामी सरकार इस मुद्दे पर आगे कहां तक जाती है।

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-अब मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों को स्थाई निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे विभाग
नवीन समाचार, देहरादून, 20 दिसंबर 2023 (Pahad ke Mudde)। उत्तराखंड में धामी सरकार ने मूल निवास प्रमाण पत्र को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया है। अब राज्य के विभाग राज्य के मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों को स्थाई निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर सचिव विनोद कुमार सुमन की ओर से आज इस संबंध में आदेश जारी किये गये हैं।

आदेश पत्र में कहा गया है, ‘शासन के संज्ञान में यह तथ्य लाया गया था कि राज्य में सेवायोजन, शैक्षणिक संस्थाओं, प्रदेश में अन्य विभिन्न कार्यों के लिए उत्तराखण्ड के मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों को संबंधित विभागों, संस्थाओं व संस्थानों द्वारा स्थाई निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत किये जाने के लिए बाध्य किया जा रहा है,

जबकि इस सम्बन्ध में सामान्य प्रशासन विभाग के शासनादेश संख्या 60/CM/xxxi(13)G/07-87(3)/2007 दिनांक 28 सितम्बर 2007 के द्वारा मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों के लिये स्थायी निवास प्रमाण पत्र की आवश्यकता न होने के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश पूर्व में ही दिये गये हैं।

लिहाजा आदेश में कहा गया है कि जिन प्रयोजनों के लिये स्थाई निवास प्रमाण पत्र की आवश्यकता है, उन प्रयोजनों के लिये मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों को स्थाई निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत किये जाने हेतु बाध्य न किया जाए। आदेश का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने को भी कहा गया है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने राज्य मे मूल निवास को लेकर सीएम पुष्कर सिंह धामी के निर्णय को स्वागतयोग्य कदम बताते हुए कहा कि यह प्रदेश के मूल निवासियों के हित मे लिया गया अच्छा फैसला है। भट्ट ने कहा कि अब राज्य में मूल निवास प्रमाण पत्र धारकों को स्थायी निवास प्रमाण पत्र की जरूरत नही है। उन्होंने कहा कि मूल निवास को लेकर फैलाये जा रहे भ्रम को लेकर पार्टी सतर्क है और किसी भी परस्थिति मे आम जन को कठिनाइयों का सामना नही करना पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में मूल निवास का मुद्दा जोर शोर से उठने लगा है। इसको लेकर उत्तराखंड के तमाम संगठनों ने 24 दिसंबर को देहरादून में मूल निवास स्वाभिमान रैली बुलाई है। इसको जनमानस की भावना से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी भी वीडियो संदेश जारी कर इससे जुड़ने की अपील कर रहे हैं। ऐसे में आंदोलन से पहले सीएम धामी के इस फैसले से मुहिम पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

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(Pahad ke Mudde) कोरोना के चलते 52 हजार से ज्यादा लोग लौटे उत्‍तराखंड, सरकार के सामने इनके  लिए आजीविका जुटाने की चुनौती - More than 52 thousand people returned to  Uttarakhand due to ...नवीन समाचार, देहरादून, 10 मार्च 2023(Pahad ke Mudde)। उत्तराखंड में पलायन के मोर्चे पर अच्छी खबर सामने आई है। ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने द्वितीय राज्य स्तरीय पलायन सर्वेक्षण अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार राज्य में बीते पांच सालों में स्थायी पलायन में कमी आई है, जबकि अस्थायी पलायन की स्थिति पहले जैसी ही है। रोजगार की तलाश में राज्य के बाहर जाने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है, जबकि राज्य के भीतर एक जिले से दूसरे जिले में परस्पर पलायन बना हुआ है। यह भी पढ़ें : होली पर मस्ती-नशे से कोहराम ! अलग-अलग दुर्घटनाओं में 22 वर्षीय युवती सहित दो की मौत, 5 घायल…

ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की वर्ष 2018 से 2022 की द्वितीय राज्य स्तरीय पलायन सर्वेक्षण अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। साथ ही आम जनता के लिए इसे आयोग की वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया है। इस रिपोर्ट में इससे पहले आयोग की ओर से वर्ष 2011 से वर्ष 2018 के मध्य राज्य में पलायन की स्थिति पर सरकार को आई प्रथम रिपोर्ट से तुलनात्मक स्थिति में बेहतर स्थिति सामने आई है।

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रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2018 से सितंबर 2022 तक राज्य के 92 विकासखंडों की 6,436 ग्राम पंचायतों से कुल 3,07,310 लोगों ने अस्थायी पलायन और 77 ब्लॉकों के 2,067 गांवों से कुल 28,631 लोगों ने स्थायी पलायन किया है। राज्य में सबसे अधिक अस्थायी पलायन तीन जिलों से हुआ है। अल्मोड़ा जिले में 1090 गांवों से 54,519, टिहरी में 906 गांवों से 41,359 और पौड़ी के 1,057 गांवों से 29,093 लोगों ने अस्थायी पलायन किया है।

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जबकि हरिद्वार के रुड़की ब्लॉक में मात्र छह गांवों से सबसे कम 250 लोगों ने पलायन किया है। देहरादून, चमोली, टिहरी, पौड़ी, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग और चंपावत जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अस्थायी पलायन पर अंकुश लगा है। जबकि ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में अस्थायी पलायन का प्रभाव अधिक होने के आंकड़े प्राप्त हुए हैं। वहीं, उत्तरकाशी में अस्थायी पलायन के प्रभाव में अपेक्षाकृत कमी देखने को मिली है।

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बीते पांच वर्षों में यूएसनगर और देहरादून के गांवों से अन्य जिलों की अपेक्षाकृत कम पलायन हुआ है। स्थायी पलायन के मामले में भी अल्मोड़ा, टिहरी और पौड़ी ही सबसे आगे हैं। अल्मोड़ा जिले में 407 गांवों में 5,926, टिहरी के 350 गांवों में 5,653 और पौड़ी जिले के 467 गांवों में 5,474 लोगों ने स्थायी पलायन किया है। पलायन से सबसे अधिक प्रभावित जिले अल्मोड़ा के ब्लॉक ताड़ीखेत एवं द्वाराहाट और टिहरी के ब्लॉक जाखणीधार व प्रतापनगर के गांवों से सर्वाधिक स्थायी पलायन हुआ है।

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उत्तराखंड पलायन निवारण आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी ने बताया कि उत्तराखंड में पलायन के तहत कराए गए द्वितीय चरण के सर्वेक्षण की अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। वर्ष 2011-18 के मुकाबले वर्ष 2018-22 की रिपोर्ट के तुलनात्मक अध्ययन में राज्य में पलायन में गिरावट देखी गई है। यह राज्य के लिए अच्छे संकेत हैं। राज्य के ग्रामीण युवाओं का स्वरोजगार की दिशा में रुझान बढ़ा है। यह भी पढ़ें : एक और विद्यालय की हल्द्वानी की तरह कॉलेज के बाहर छात्र पर चाकू से हमला, गर्लफ्रेंड को लेकर हुआ विवाद !

राज्य में अस्थायी पलायन का जिलावार विवरण
जिला- ब्लाक – प्रभावित गांव – लोगों की संख्या
अल्मोड़ा – 11 – 1,090 – 54,519
टिहरी – 09 – 906 – 41,359
पौड़ी – 15 – 1,057 – 29,093

हरिद्वार – 04 – 179 – 28,087
पिथौरागढ़ – 08 – 585 – 25,715
नैनीताल – 08 – 410 – 20,863
उत्तरकाशी – 06 – 377 – 19,649
यूएस नगर – 06 – 191 – 19,583

चमोली – 09 – 478 – 18,326
रुद्रप्रयाग – 03 – 300 – 14,593
बागेश्वर – 03 – 380 – 14,503
चंपावत – 04 – 263 – 13,711
देहरादून – 06 – 220 – 9,309
योग – 92 – 6,436 – 3,07,310

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राज्य में स्थायी पलायन का जिलावार विवरण
अल्मोड़ा – 11 – 407 – 5,926
टिहरी – 09 – 350 – 5,653
पौड़ी – 15 – 467 – 5,474
नैनीताल – 06 – 152 – 2,014

चमोली – 07 – 151 – 1,722
पिथौरागढ़ – 07 – 173 – 1,713
चंपावत – 03 – 90 – 1,588
बागेश्वर – 03 – 93 – 1,403
हरिद्वार – 03 – 26 – 1,029

उत्तरकाशी – 05 – 78 – 900
रुद्रप्रयाग – 03 – 71 – 715
देहरादून – 03 – 07 – 312
यूएस नगर – 02 – 02 – 82
योग – 77 – 2,067 – 28,531

(डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Pahad ke Mudde): मोदी जी को बेडू-तिमिल और राहुल गांधी को गेठी खिलाना चाहते हैं हरीश रावत… जानें क्यों ?

नवीन समाचार, देहरादून, 5 सितंबर 2022 (Pahad ke Mudde)।आजकल कभी वे सोशल मीडिया में गांव की पगडंडियां चढ़ते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को बेड़ू (पहाड़ी अंजीर) भेजने की बात कहते दिखाई दे रहे हैं तो कभी राहुल गांधी को गेठी (अंग्रेजी में एयर पोटैटो) खिलाने की इच्छा जताते हैं. बहरहाल, उनकी इन बातों के पीछे कहीं न कहीं पहाड़ी क्षेत्रों के उत्पादों को बढ़ावा देने की सोच भी दिखाई दे रही है। देखें वीडियो :

पूर्व सीएम हरीश रावत इन दिनों अल्मोड़ा जिले में स्थित अपने गांव मोहनरी गए हुए हैं. जहां अपने घर की छत पर बैठे हुए उन्होंने बीते एक वीडियो सोशल मीडिया में शेयर किया. इसमें वे अपने सामने रखी एक थाली से उबली हुई गेठी खाते हुए उसके साथ काली चाय पी रहे हैं. गेठी जिंदाबाद, काली चाय जिंदाबाद के हैशटैग के साथ उन्होंने लिखा है कि ‘गुरु हो जा शुरू. याद है आपको, डेढ़ या दो साल पहले मैंने एक वीडियो बनाई थी। 

वीडियो में रावत कह रहे हैं,  ‘यह गेठी है, मेरे गांव की गेठी, बड़ी स्वास्थ्यवर्धक गेठी है. इससे डायबिटीज से लेकर पेट की कई बीमारियां दूर होती हैं. बल्कि इसको खाते वक्त मेरे मन में इच्छा जग रही है कि काश मैं, भारत जोड़ो यात्री राहुल गांधीजी के पास भी उनके सुबह के नाश्ते के लिए गेठी भेज सकता.’  पीएम मोदी को घेरने का मौका न छोड़ते हुए उन्होंने आगे लिखा कि ‘मुझे पूरी उम्मीद है कि अगले साल तक मोदीजी की मन की बात में मेरे गांव की गेठी भी सम्मिलित हो जाएगी.

इधर, मंगलवार की सुबह वे अपने कुछ समर्थकों और गांव के लोगों के साथ पगडंडी चढ़ते हुए तिमिल की खासियत बता रहे हैं. इसके बारे में उन्होंने सोशल मीडिया में लिखा कि ‘मोदी जी 2015-16 तक और उसके बाद मैं अकेले बेड़ू, तिमला कहने वाला था, अब आप भी शामिल हो गए हैं.’,।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार: उत्तराखंड में भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण के लिए गठित समिति ने सीएम को सोंपी रिपोर्ट, सीएम ने कहा-करेंगे भूकानून में संशोधन

नवीन समाचार, देहरादून, 5 सितंबर 2022। उत्तराखंड में भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण के लिए गठित समिति ने सोमवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। समिति ने प्रदेश हित में निवेश की संभावनाओं और भूमि के अनियंत्रित क्रय-विक्रय के बीच संतुलन स्थापित करते हुए अपनी 23 संस्तुतियां सरकार को दी हैं। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार शीघ्र ही समिति की रिपोर्ट का गहन अध्ययन कर व्यापक जनहित व प्रदेश हित में समिति की संस्तुतियों पर विचार करेगी और भू-कानून में संशोधन करेगी।

विदित हो कि मुख्यमंत्री धामी ने जुलाई 2021 में प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद अगस्त माह में भूकानून के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। समिति का अध्यक्ष प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार को जबकि श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य अजेंद्र अजय, पूर्व आईएएस अधिकारी अरुण ढौंडियाल व डीएस गर्ब्याल प्रदेश के राजस्व दीपेंद्र कुमार चौधरी समिति के सदस्य थे। सोमवार को समिति के सदस्यों ने सभी हितधारकों से सुझाव लेकर गहन विचार विमर्श कर 80 पृष्ठ में तैयार की रिपोर्ट सीएम को सोंपी।

रिपोर्ट में समिति ने वर्तमान में प्रदेश में प्रचलित उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950) यथा संशोधित और यथा प्रवृत्त में जन भावनाओं के अनुरूप हिमाचल प्रदेश की तरह कतिपय प्रावधानों की संस्तुति की है।

समिति की प्रमुख संस्तुतियां

–  वर्तमान में जिलाधिकारी द्वारा कृषि अथवा औद्यानिक प्रयोजन हेतु कृषि भूमि क्रय करने की अनुमति दी जाती है। कतिपय प्रकरणों में ऐसी अनुमति का उपयोग कृषि/औद्यानिक प्रयोजन न करके रिसोर्ट/ निजी बंगले बनाकर दुरुपयोग हो रहा है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में लोग भूमिहीन  हो रहें और रोजगार सृजन भी नहीं हो रहा है। समिति ने संस्तुति की है कि ऐसी अनुमतियां जिलाधिकारी स्तर से ना दी जाऐं। शासन से ही अनुमति का प्रावधान हो।

-वर्तमान में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों हेतु भूमि क्रय करने की अनुमति जिलाधिकारी द्वारा प्रदान की जा रही है। हिमांचल प्रदेश की भाँति ही ये अनुमतियाँ, शासन स्तर से न्यूनतम भूमि की आवश्यकता के आधार पर, प्राप्त की जाएं।

–  वर्तमान में राज्य सरकार पर्वतीय एवं मैदानी में औद्योगिक प्रयोजनों, आयुष, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, उद्यान एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, कृषि के लिए 12.05 एकड़ से ज्यादा भूमि आवेदक संस्था/फर्म/ कम्पनी/ व्यक्ति को उसके आवेदन पर दे सकती है। उपरोक्त प्रचलित व्यवस्था को समाप्त करते हुए हिमाचल प्रदेश की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता (Essentiality Certificate) के आधार पर दिया जाना उचित होगा।

–  केवल बड़े उद्योगों के अतिरिक्त 4-5 सितारा होटल / रिसॉर्ट, मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, वोकेशनल/प्रोफेशनल इंस्टिट्यूट आदि को ही Essentiality Certificate के आधार भूमि क्रय करने की अनुमति शासन स्तर से दी जाए। अन्य प्रयोजनों हेतु लीज पर ही भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था लाने की समिति संस्तुति करती है।

–  वर्तमान में, गैर कृषि प्रयोजन हेतु खरीदी गई भूमि को 10 दिन में S.D.M. धारा- 143 के अंतर्गत गैर कृषि घोषित करते हुए खतौनी में दर्ज करेगा। परन्तु क्रय अनुमति आदेश में 2 वर्ष में भूमि का उपयोग निर्धारित प्रयोजन में करने की शर्त रहती है। यदि निर्धारित अवधि में उपयोग ना करने पर या किसी अन्य उपयोग में लाने/विक्रय करने पर राज्य सरकार में भूमि निहित की जाएगी, यह भी शर्त में उल्लखित रहता है।

यदि 10 दिन में गैर कृषि प्रयोजन हेतु क्रय की गई कृषि भूमि को गैर कृषि” घोषित कर दिया जाता है, तो फिर यह धारा-167 के अंतर्गत राज्य सरकार में (उल्लंघन की स्थिति में) निहित नहीं की जा सकती है। अतः नई उपधारा जोङते हुए उक्त भूमि को पुनः कृषि भूमि घोषित करना होगा तत्पश्चात उसे राज्य सरकार में निहित किया जा सकता है।

–  कोई व्यक्ति स्वयं या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के नाम बिना अनुमति के अपने जीवनकाल में अधिकतम 250 वर्ग मीटर भूमि आवासीय प्रयोजन हेतु खरीद सकता है । समिति की संस्तुति है कि परिवार के सभी सदस्यों के नाम से अलग अलग भूमि खरीद पर रोक लगाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड राजस्व अभिलेख से लिंक कर दिया जाए।

– राज्य सरकार ‘भूमिहीन’ को अधिनियम में परिभाषित करे। समिति का सुझाव है कि पर्वतीय क्षेत्र में न्यूनतम 5 नाली एवं मैदानी क्षेत्र में 0.5 एकड़ न्यूनतम भूमि मानक भूमिहीन’ की परिभाषा हेतु औचित्यपूर्ण होगा।
–   भूमि जिस प्रयोजन के लिए क्रय की गई, उसका उललंघन रोकने के लिए एक जिला / मण्डल / शासन स्तर पर एक टास्क फ़ोर्स बनायीं जाए। ताकि ऐसी भूमि को राज्य सरकार में निहित किया जा सके।

–  सरकारी विभाग अपनी खाली पड़ी भूमि पर साइनबोर्ड लगाएं।
–  कतिपय प्रकरणों में कुछ व्यक्तियों द्वारा एक साथ भूमि क्रय कर ली जाती है तथा भूमि के बीच में किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पड़ती है तो उसका रास्ता रोक दिया जाता है। इसके लिए  Right of Way की व्यवस्था।

–  विभिन्न प्रयोजनों हेतु जो भूमि खरीदी जायेगी उसमें समूह ग व समूह ‘घ’ श्रेणीयो में स्थानीय लोगो को 70% रोजगार आरक्षण सुनिश्चित हो। उच्चतर पदों पर योग्यतानुसार वरीयता दी जाए।
– विभिन्न अधिसूचित प्रयोजनों हेतु प्रदान की गयीं अनुमतियों के सापेक्ष आवेदक इकाइयों/ संस्थाओं द्वारा कितने स्थानीय लोगों को रोजगार दिए गए, इसकी सूचना अनिवार्य रूप से शासन को उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो

– वर्तमान में भूमि क्रय करने के पश्चात भूमि का सदुपयोग करने के लिए दो वर्ष की अवधि निर्धारित है और राज्य सरकार को अपने विवेक के अनुसार इसे बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। इसमें संशोधन कर विशेष परिस्थितयों में यह अवधि तीन वर्ष (2+1=3) से अधिक नहीं होनी चाहिए।
– पारदर्शिता हेतु क्रय- विक्रय, भूमि हस्तांतरण एवं स्वामित्व संबंधी समस्त प्रक्रिया Online हो। समस्त प्रक्रिया एक वेबसाइट के माध्यम से पब्लिक डोमेन में हो।

–  प्राथमिकता के आधार पर सिडकुल/ औद्योगिक आस्थानों में खाली पड़े औौद्योगिक प्लाट्स/ बंद पड़ी फैक्ट्रियों की भूमि का आबंटन औद्योगिक प्रयोजन हेतु किया जाए।

–  प्रदेश में वर्ष बन्दोबस्त हुआ है। जनहित/ राज्य हित में भूमि बंदोबस्त की प्रक्रिया प्रारंभ की जाए।
–  भूमि क्रय की अनुमतियों का जनपद एवं शासन स्तर पर नियमित अंकन एवं इन अभिलेखों का रख-रखाव ।
–  धार्मिक प्रयोजन हेतु कोई भूमि क्रय/ निर्माण किया जाता है तो अनिवार्य रूप से जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर शासन स्तर से निर्णय लिया जाए।

–  राज्य में भूमि व्यवस्था को लेकर जब भी कोई नया अधिनियम/ नीति / भूमि सुधार कार्यक्रम चलायें जायें तो राज्य हितबद्ध पक्षकारों / राज्य की जनता से  सुझाव अवश्य प्राप्त कर लिए जाएँ।
–   नदी – नालों, वन क्षेत्रों, चारागाहों, सार्वजनिक भूमि आदि पर अतिक्रमण कर अवैध कब्जे /निर्माण / धार्मिक स्थल बनाने वालों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान हो।  संबंधित विभागों के अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान हो। ऐसे अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रदेशव्यापी अभियान चलाया जाए। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में भू-कानून में बदलाव की तैयारी, बाहरी लोगों के जमीन खरीदने के नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी !

(Pahad ke Mudde) भू-कानून : भूमि सुधार में जो हिमाचल ने किया वह उत्तराखंड क्यों नहीं कर पाया  ? - Uttarakhand Gazetteerनवीन समाचार, देहरादून, 20 अगस्त 2022। उत्तराखंड में उद्योगों की स्थापना के लिए बाहरी लोगों की मनमानी जमीन खरीदने पर रोक लग सकती है। भू-कानून को लेकर गठित समिति ने अपने मसौदे में बाहरी लोगों को 12.5 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं बेचने की पैरवी की है।

शुक्रवार को राज्य अतिथि गृह बीजापुर में उत्तराखंड भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण के लिए गठित समिति की करीब दो घंटे चली बैठक में भू-कानून में सुधार संबंधी तमाम बिंदुओं पर चर्चा की गई। इसमें समिति ने ड्राफ्ट में हिमाचल की तर्ज पर उद्योगों को उनकी जरूरत के हिसाब भूमि उपलब्ध कराने की सिफारिश की है।

साथ ही अन्य प्रायोजनों के लिए तय सीमा से अधिक भूमि केवल लीज पर देने पर सहमति जताई है। समिति का मानना है कि स्थानीय लोगों का भूमि पर मालिकाना हक बना रहना चाहिए। समिति के सदस्य अजेंद्र अजय ने बताया कि 23 अगस्त को फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा। मुख्यमंत्री से समय लेकर मसौदा उन्हें सौंप दिया जाएगा।

वहीं, सूत्रों के अनुसार समिति के ज्यादातर सदस्य इस बात पर सहमत थे कि राज्य में निवेश को बढ़ावा देने, उद्योग व अन्य विकास कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता को ध्यान में रख कानून में संशोधन करने होंगे।

(Pahad ke Mudde) साथ ही भूमि की खरीद-फरोख्त को रोकने के इंतजाम किए जाएं, पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई। समिति अब 23 अगस्त को बैठक के बाद अपनी फाइनल रिपोर्ट तय करेगी और सरकार को सौंपेगी। अध्यक्ष सुभाष कुमार की अध्यक्षता में हुई बैठक में रिटायर आईएएस अरुण कुमार ढौंडियाल, बीएस गर्ब्याल, सदस्य अजेंद्र अजय, सचिव राजस्व दीपेंद्र कुमार चौधरी, प्रभारी उप राजस्व आयुक्त देवानंद मौजूद रहे।

ये हो सकते हैं बदलाव
-वर्ष 2018 में संशोधन से भूमि क्रय संबंधी अधिनियम में जोड़ी गई उपधारा 143-क और धारा 154 (2) समाप्त की जा सकती है।
-उद्योगों को जमीन आवंटित करने का अधिकार जिलाधिकारियों को देने के फैसले को भी निरस्त किया जा सकता है।
-उद्योगों को जमीन खरीद में जो छूट दी गई थी, उसको भी निरस्त किया जा सकता है।
-उद्योग के नाम पर ली गई जमीन का उपयोग बदलने पर जमीन सरकारी कब्जे में लिया जा सकता है।

समिति की सिफारिशें
1. 12.50 एकड़ की सीमा से अधिक भूमि खरीदने की छूट खत्म हो।
2. जिलाधिकारी को भूमि खरीद का अधिकार न दिया जाए।
3. भूमि के बीच में किसी अन्य व्यक्ति भूमि होने पर रास्ता रोक देने या मनमाने दाम वसूलने की प्रथा को रोकने के लिए समिति ने राइट टू की व्यवस्था हो।
4. हिमाचल की तर्ज पर उद्योगों को दी जाए जमीन। उद्योगों के लिए भू उपयोग परिवर्तन में कतई विलंब न हो।

5. अन्य प्रायोजनों के लिए लीज भी भूमि दी जाए । स्थानीय भूमिधर का मालिकाना हक बना रहे ताकि वह भूमिहीन न हो। उसे निरंतर आय प्राप्त होती रहे।
6. शहरों में मास्टर प्लान की जद में आने वाली कृषि भूमि को अकृषि भूमि में बदलने के लिए 29 अक्टूबर 2020 को जारी हुए शासनादेश को विलुप्त कर दिया जाए। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय का उत्तराखंड सरकार के मूल निवासी आरक्षण को लेकर बड़ा आदेश, शासनादेश पर लगाई रोक

-प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य की मूल निवासी महिलाओं को दिया गया था 30 प्रतिशत आरक्षण
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अगस्त 2022। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने उत्तराखंड सरकार के गत 24 जुलाई के राज्य की मूल निवासी महिलाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं में 30 प्रतिशत आरक्षण देने के शासनादेश पर रोक लगा दी है और याचिकाकर्ताओं को मुख्य परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी है।

उल्लेखनीय है कि पवित्रा चौहान और अन्य याचिकाकर्ताओं ने गत 24 जुलाई के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उत्तराखंड राज्य की मूल निवासी महिलाओं को राज्य सेवाओं में 30 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया था।

(Pahad ke Mudde) याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता डॉ. कार्तिकेय हरि गुप्ता ने न्यायालय को बताया कि उन्होंने न्यायालय के समक्ष अनुरोध किया कि राज्य सरकार को मूल निवास आधारित आरक्षण प्रदान करने की कोई शक्ति नहीं है। भारत का संविधान केवल संसद के एक अधिनियम द्वारा मूल निवास के आधार पर आरक्षण की अनुमति देता है।

राज्य सरकार का गत 24 जुलाई का आदेश भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 का उल्लंघन है। सभी याचिकाकर्ताओं ने प्रारंभिक परीक्षा में उत्तराखंड की महिलाओं के लिए निर्धारित कट ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। सभी याचिकाकर्ता महिलाएं हैं और उन्हें उत्तराखंड राज्य द्वारा प्रतिकूल भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है,

(Pahad ke Mudde) जो उत्तराखंड से अधिक अंक होने के बावजूद उन्हें विफल कर देता है। इस आधार पर न्यायालय ने 24 जुलाई के शासनादेश पर रोक लगा दी और याचिकाकर्ताओं को मुख्य परीक्षा में बैठने की अनुमति भी दे दी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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PM Modi in Haldwani LIVE: पीएम मोदी हल्द्वानी पहुंचे, कुछ देर में जनसभा को  करेंगे संबोधित - pm narendra modi in uttarakhand haldwani AIIMS live and  latest updates NTC - AajTakडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 दिसंबर 2021। हल्द्वानी में जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुदूर देहरादून में यमुमा नदी पर प्रस्तावित लखवाड़ जल विद्युत परियोजना की बात की। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने जनता से पूछा, 1976 में प्रस्तावित इस परियोजना को लटकाने का पाप करने वालों का क्या वह मांफ करेंगे। लेकिन न जाने क्यों प्रधानमंत्री मोदी ने हल्द्वानी में हल्द्वानी के पास ही जमरानी में प्रस्तावित जमरानी बांध की बात नहीं की।

गौरतलब है कि जमरानी बांध परियोजना का पहला प्रस्ताव 1965 में, यानी लखवाड़ जल विद्युत परियोजना से भी 12 वर्ष पूर्व बना था। कमोबेश उसी दौर में प्रस्तावित सरदार सरोवर बांध को भी प्रधानमंत्री मोदी बनवा चुके हैं, लेकिन जमरानी बांध पर धरातल पर प्रगति शून्य है, केवल इसका इंतजार और इस पर खर्च होने वाली प्रस्तावित धनराशि और फाइलों का बोझ बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के रहते यह बांध न बना तो कब बनेगा, और बनेगा भी कि नहीं, यह जनता किससे पूछे।

इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी एचएमटी फैक्टरी पर भी नहीं बोले। जिसके सदुपयोग, यहां एम्स की स्थापना जैसे प्रस्तावों के लिए पूर्व मुख्यमंत्री व महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से लेकर केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट तक प्रयासशील रहे हैं, लेकिन करोड़ों रुपए की इस घड़ी की फैक्टरी की सुई आज मोदी जी के हल्द्वानी आगमन के बाद भी अटकी रही तो फिर कब चलेगी, यह भी कहना मुश्किल है।

प्रधानमंत्री मोदी ने हल्द्वानी में कुमाउनी टोपी व वास्केट पहन अपने संबोधन की शुरुआत और समापन कुमाउनी लोकभाषा में की। प्रधानमंत्री वैसे भी, जहां भी जाते हैं, वहां की लोकभाषा में संवाद करते हुए वहां के लोगों से भावनात्मक तौर पर जुड़ते हैं। इस लिहाज से लगता है कि वह लोकभाषाओं के प्रति संवेदनशील हैं। उत्तराखंड की कुमाउनी व गढ़वाली लोकभाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए नैनीताल सांसद व केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट संसद में प्रस्ताव रख चुके हैं।

इस बीच प्रधानमंत्री को प्रदेश के साहित्यकारों ने चंद एवं परमार राजाओं के काल में राजभाषा रहीं कुमाउनी व गढ़वाली लोकभाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए पत्र भी लिखा था। इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री यहां कुमाउनी-गढ़वाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की घोषणा कर सकते हैं। लेकिन यह घोषणा भी उन्होंने नहीं की। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : कैसा हो उत्तराखंड हमारा, बॉलीवुड गायक जुबिन नौटियाल व प्रीतम भरतवाण ने बताया

Panchayat AajTak 2021: उत्तराखंड के दो कलाकारों ने बांधा समां, Jubin  Nautiyal-Pritam Bhartwan ने सजाए सुर - uttarakhand-assembly-elections AajTakनवीन समाचार, देहरादून, 29 दिसंबर 2021। एक समाचार चैनल द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘पहाड़ की पुकार’ में बॉलीवुड गायक जुबिन नौटियाल और प्रीतम भरतवाण ने शिरकत की। इस दौरान दोनों गायकों ने उत्तराखंड के मुद्दों को लेकर अपने उद्गार प्रकट किए। जुबिन नौटियाल ने अपने सपनों के उत्तराखंड को लेकर सवाल पर कहा कि यह योग की, तप की भूमि है। सपनों का उत्तराखंड ऐसा हो जहां खनन, शराब माफियाओं की कोई जगह ना हो। जहां हर कोई खुश रहे।  इस दौरान दोनों कलाकारों ने गीत सुनाकर माहौल को संगीतमय भी बनाया।

जुबिन ने कहा, आज देश-विदेश का बच्चा-बच्चा पहाड़ की खूबसूरती और उत्तराखंड को जानता है। उत्तराखंड ने अच्छी शुरुआत की है। इसी शुरुआत की मजबूत नीव पर अगले 10 साल में सपनों का उत्तराखंड बनेगा। उन्होंने कहा, वह उत्तराखंड के जॉनसार बाबर इलाके के क्यारी गांव से आते हैं। वहां के लोगों में आज भी सरलता है।

(Pahad ke Mudde) उन्होंने अपने गृह इलाके में टाउनशिप अप्रूव किए जाने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को धन्यवाद दिया। जुबिन ने अपनी यात्रा को लेकर कहा कि संगीत एक ऐसी चीज है जो मनोरंजन की चीज है। इसमें संघर्ष नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि मुंबई ने उन्हें बहुत प्यार दिया, बहुत कुछ सिखाया।

पहाड़ों की पुकार क्या है, इस सवाल पर जुबिन नौटियाल ने कहा कि यहां की सबसे बड़ी समस्या है पलायन। पहाड़ को विकास के लिए एक मौका चाहिए। पहाड़ी आदमी स्वाभिमानी और मेहनती होता है। कोरोना काल में अपने पिता के साथ पहाड़ में घूमकर लोगों की मदद करने की कोशिश की। पहाड़ पर सड़कें पहुंची हैं। अब देखना होगा कि इन सड़कों से लोग वापस आते हैं या नीचे जाते हैं।

वहीं, प्रीतम ने पलायन को लेकर कहा कि पहाड़ में चिकित्सा, स्कूल के साथ ही मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। पलायन की मुख्य वजह भी यही है कि लोग विकसित जगह चले जाना चाहते हैं। पहाड़ की पीड़ा को समझना होगा। उन्होंने इसे गीतों के जरिए भी व्यक्त किया।

(Pahad ke Mudde) प्रीतम ने कहा कि पहाड़ पर निर्माण हो रहा है लेकिन इसकी रफ्तार और बढ़नी चाहिए। प्रीतम ने कहा कि पहाड़ का विकास इतनी तेज गति से हो कि लोग पहाड़ में रहना चाहें। राजधानी भी पहाड़ में रहे। उन्होंने पहाड़ी, गढ़वाली आदि बोलियों के संरक्षण पर भी बल दिया। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : जिन मंत्री के शामिल होने का ख्वाब देख रही थी कांग्रेस, आज उन्हीं ने रोजगार के मुद्दे पर विपक्ष को आईना दिखाया…

नवीन समाचार, देहरादून, 10 दिसंबर 2021। उत्तराखंड सरकार के जिन कबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के अपनी पार्टी में शामिल होने को लेकर कांग्रेस पार्टी गत दिनों तक आश्वस्त थी और करीब डेढ़ माह पूर्व तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने हरक सहित 6 भाजपा नेताओं के 6 दिन के भी कांग्रेस में शामिल होने का दावा कर दिया था, उन्हीं ने आज कांग्रेस पार्टी को सदन में बेरोजगारी के मुद्दे पर आईना दिखाया।

उल्लेखनीय है कि गत दिनों बेरोजगारी के मुद्दे पर कांग्रेस के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अघोषित तौर पर अगुवाई कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा कर दी थी। लेकिन आज स्थिति यह हो गई कि पहले कांग्रेस नेताओं ने मंत्री हरक को सदन में बोलने से रोका, इस पर हरक को कहना पड़ा कि कोई उनकी आवाज को नहीं सकता। ऐसे में जब हरक ने रोजगार के आंकड़े पेश करने शुरू किए तो कांग्रेस के नेताओं ने सदन से वॉकआउट करने में ही भलाई समझी।

Everything is fair in love and war, Harish played his move and we played  ours: Harak Rawat | Dehradun News - Times of Indiaहुआ यह कि विपक्ष ने विधानसभा सत्र शुरू होते ही बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की। कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन ने रोजगार और बेरोजगारी को लेकर प्रश्न पूछा। इस पर डॉ. रावत सदन में जबाब देते हुए कहा कि उत्तराखंड की मौजूदा सरकार ने 7 लाख लोगों को नौकरी दी। इनमें से 1 लाख 15 हजार से अधिक को आउटसोर्स से और 5 लाख से अधिक को उद्योगों में नौकरी दी। यह भी बताया कि राज्य में वर्तमान में 8 लाख से अधिक बेरोजगार पंजीकृत हैं।

उन्होंने कहा कि राज्य में 1 रु में 88 पैसा यानी 88 फीसद हिस्सा नॉन प्लान में वेतन-भत्तों आदि पर खर्च हो रहा है। उन्होंने बताया कि सरकार ने 1856 सहायता समूहों में भी लोगों को रोजगार दिया। 2691 लोगो को ई-रिक्शे उपलब्ध कराये। 78,588 लोगो को कौशल विकास में प्रशिक्षित किया, 16900 लोगों को कृषि के क्षेत्र में लाभ दिया।

(Pahad ke Mudde) अलबत्ता नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने बेरोजगारी के मसले पर सदन में सरकार को घेरने की कोशिश करते हुए सरकार द्वारा सदन में पेश किए जा रहे रोजगार के आंकड़ों को गुमराह करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि सरकार ने 2020 में 10 लाख लोगों को, मार्च 2021 में 7 लाख लोगों को और आज वर्तमान में फिर 7 लाख लोगों को रोजगार देने की बात कही और सरकार के जबाब से विपक्ष को असंतुष्ट बताकर वॉक आउट किया। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद प्रदेश के शहरी विकास मंत्री भगत ने भी नजूल नीति पर दिया बड़ा बयान

नवीन समाचार, हल्द्वानी, 3 दिसंबर 2021। उत्तराखंड सरकार की नजूल नीति पर सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिलने पर प्रदेश्ज्ञ के शहरी विकास एवं आवास मंत्री बंशीधर भगत ने प्रसन्नता व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने कहा कि आगामी 6 दिसंबर को सरकार इस मामले को कैबिनेट में पास कर आगामी विधानसभा सत्र में अध्यादेश ला कर प्रदेश में नजूल एक्ट लागू करेंगें।

(Pahad ke Mudde) इससे उत्तराखंड के सालों से नजूल भूमि पर रह रहे हजारों परिवारों को मालिकाना हक मिल सकेगा और भूमिधरी का अधिकार मिल सकेगा। साथ ही अधिक से अधिक लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का भी लाभ अब मिल सकेगा।

भगत ने फैसले का स्वागत करते हुए और इसका श्रेय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को देते हुए कहा कि उनके प्रयासों से देवस्थानम बोर्ड के बाद नजूल प्रकरण का भी समाधान हो गया है। इससे स्पष्ट है कि भाजपा सरकार सभी वर्गों के हितों का ध्यान रख रही है। भगत ने बताया कि 2018 में भाजपा सरकार ने कैबिनेट में नजूल भूमि का प्रस्ताव पास किया था। किंतु उसका शासनादेश होने से पूर्व ही उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी।

आज नजूल भूमि मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले का अध्ययन कर उसमें राहत प्रदान की भगत ने कहा कि मुख्यमंत्री धामी द्वारा की गई मजबूत पैरवी से ही आज सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। जिस तेजी से सरकार द्वारा बड़े निर्णय लिए गए और उन पर अमल हुआ उससे प्रदेश में सकारात्मक माहौल बना है। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : एक और ‘रोल बैक’ के साथ बड़ा निर्णय लेने की तैयारी में धामी सरकार…

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 3 दिसंबर 2021। केंद्र में तीन कृषि कानून एवं उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड को भंग करने के बाद अब उत्तराखंड में सरकार एक और रोलबैक या कहें कि जन दबाव में बड़ा निर्णय लेने जा रही है। राज्य में भूकानून पर अगले सप्ताह सात दिसंबर को निर्णायक बैठक होने जा रही है और निर्णय के भी इसी पखवाड़े होने की संभावना बताई जा रही है। क्योंकि इसके बाद इसी माह के अंत तक आचार संहिता लगने की भी संभावना जताई जा रही है।

उल्लेखनीय है कि संशोधित भू कानून के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अगुवाई में एक समिति बनाई थी। इसकी बैठक आगामी 7 दिसंबर को होनी है। बताया गया है कि इस बैठक में समिति को अब तक करीब 160 से अधिक सुझाव मिले हैं। इन सुझावों पर विचार करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देगी। इसके अलावा सरकार भूकानून पर जन सुनवाई भी कर सकती है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : नैनीताल विधायक ने भू-कानून पर नियम 300 के तहत दिया नोटिस

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 अगस्त 2021। नैनीताल के विधायक संजीव आर्य ने विधान सभा के सचिव को नियम 300 के तहत राज्य में भू-कानून में संशोधन लाने पर प्रश्न उठाया है। श्री आर्य ने कहा है कि राज्य में बाहरी राज्यों के धनवान लोगों के द्वारा बेरोकटोक भूमि का क्रय मनमाने तरीके से किया जा रहा है। इससे राज्य के छोटे किसान अपनी भूमि से बेदखल हो रहे हैं, और बिचौलिये एवं भूमाफिया निर्धन निवासियों का शोषण कर रहे हैं।

यदि इसी प्रकार जमीनों का विक्रय होता रहा तो भविष्य में इस पर्वतीय राज्य में युवाओं को कृषि, बागवानी, मौनपालन, पुष्प उत्पादन, पशुपालन डेयरी, फल एवं सब्जी उत्पादन जैसे स्वरोजगार के लिए आवश्यक भूमि से वंचित होना पड़ेगा तथा आने वाली पीढ़ियों को विकट बेरोजगारी एवं पलायन का सामना करना पड़ेगा।

इसलिए राज्य में भूमि की बेरोकटोक एवं अनियंत्रित बिक्री को रोकने के लिए सशक्त भूकानून की आवश्यकता है। लिहाजा उन्होंने इन आलोक में पूछा है कि क्या सरकार राज्य में प्रवृत्त उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 में संशोधन कर इस समस्या के निराकरण हेतु अधिनियम को सशक्त करने हेतु आवश्यक संशोधन लाने पर विचार कर रही है ? आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : क्यों त्रिवेंद्र सरकार ने दांव पर लगाया ऐतिहासिक भू कानून

नवीन समाचार, देहरादून, 28 जुलाई 2021।  हिमालयी राज्य उत्तराखंड में तराई से लेकर बदरीनाथ-केदारनाथ तक भूमिखोर सक्रिय होने से जनाक्रोश भड़कने लगा है। हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड अकेला राज्य है जहां जमीनों की खरीद-फरोख्त की इतनी छूट मिली हुई है।

(Pahad ke Mudde) नब्बे के दशक में चले ऐतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन में पृथक राज्य के साथ ही पहाड़वासियों की जमीनें एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने के लिए उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह संविधान के अनुच्छेद 371 के प्रावधानों की मांग की गई थी। यह मांग भाजपा सांसद मनोहरकांत ध्यानी ने राज्य सभा में भी उठाई थी।

राज्य गठन के बाद मांग उठी कि अगर जम्मू-कमीर और उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह विशेष दर्जा न सही, कम से कम पड़ोसी राज्य हिमाचल की तरह का भूकानून तो दे ही दो। ताकि अन्य हिमालयी राज्यों की तरह उत्तराखंड की जमीनें और संस्कृति सुरक्षित रह सके।

(Pahad ke Mudde) लेकिन इस हिमालयी राज्य को उत्तर पूर्व की तरह संवैधानिक दर्जा तो नहीं मिला मगर नारायण दत्त तिवारी और फिर भुवन चंद्र खंडूड़ी सरकारों ने हिमाचल प्रदेश के काश्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम 1972 की धारा 118 की तर्ज पर उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950) (अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश, 2001) (संशोधन) अधिनियम, 2008 में संशोधन अवश्य किए।

(Pahad ke Mudde) यद्यपि ये प्रावधान बहुत नाकाफी थे। फिर भी उस कानून में 2017 में सत्ता में आई त्रिवेंद्र रावत सरकार ने अनेक संशोधन कर इस कानून के उद्देश्य को ही समाप्त कर दिया। इस अधिनियम के मूल संशोधनों में व्यवस्था थी कि जो व्यक्ति धारा 129 के तहत राज्य में जमीन का खातेदार न हो, वह 500 वर्ग मीटर तक बिना अनुमति के भी जमीन खरीद सकता है। इस कानून में यह भी व्यवस्था थी कि इस सीमा से अधिक जमीन खरीदने पर राज्य सरकार से क्रेता को विशेष अनुमति लेनी होगी।

(Pahad ke Mudde) उसके बाद 2007 में खंडूड़ी सरकार ने ५०० वर्ग मीटर की सीमा घटा कर २५० वर्गमीटर कर दी थी। इस कानून में व्यवस्था थी कि १२ सितम्बर, २००३ तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन है, वे १२ एकड़ तक कृषि योग्य जमीन खरीद सकते हैं। लेकिन जिनके पास जमीन नहीं है, वे आवासीय उद्देश्य के लिए भी इस तारीख के बाद २५० वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं।
मजेदार बात यह कि पहाड़ के लिए १९६० में बने भूकानून कूजा एक्ट का कहीं अतापता नहीं है।

(Pahad ke Mudde) उत्तराखंड में पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने २००३ में नये भूकानून की प्रस्तावना में कहा था कि उन्हें बड़े पैमाने पर कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त अकृषि कार्यों और मुनाफाखोरी के लिए किए जाने की शिकायतें मिल रही थीं। उनका कहना था कि प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को देखते हुये असामाजिक तत्वों द्वारा भी कृषि भूमि की उदार क्रय-विक्रय नीति का लाभ उठाया जा सकता है।

(Pahad ke Mudde) अतः कृषि भूमि के उदार क्रय-विक्रय को नियंत्रित करने और पहाड़वासियों के आर्थिक स्थायित्व तथा विकास के लिए संभावनाओं का माहौल बनाए जाने हेतु यह कानून लाया जाना जरूरी है। उत्तराखंड में कृषि के लिए केवल 13 प्रतिशत जमीन वर्गित है, जिसका बड़ा हिस्सा बंजर और जंगलों में बदल चुका है। राज्य गठन के बाद ही लगभग 1 लाख हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन कृषि से बाहर हो गई है। इसमें इमारतें और जंगल-झाड़ियां उग गईं।

(Pahad ke Mudde) फिर भी उत्तराखंड में २०१८ में आयोजित निवेशक सम्मेलन में १.२५ लाख करोड़ के पूंजी निवेश प्रस्तावों के एमओयू से तत्कालीन त्रिवेन्द्र सिंह सरकार इतनी गदगद हुई कि उसको जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, १९५० के पीछे छिपी जमींदारी के विनाश और काश्तकार की भूमि बचाने की भावना नजर नहीं आई और उन्होंने उद्योगों के नाम पर पैतृक राज्य उत्तर प्रदेश से विरासत में मिले ऐतिहासिक कानून को ही दांव पर लगा दिया।

(Pahad ke Mudde) त्रिवेन्द्र सरकार ने २०१८ में उत्तराखंड (उत्तरप्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, १९५०), (अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश, २००१) में संशोधन कर उक्त कानून में धारा १५४ (२) जोड़ते हुए पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर दी। इस के साथ ही १४३ (क) जोड़ कर कृषकों की जमीनों को अकृषक बाहरी लोगों द्वारा उद्योगों के नाम पर खरीद कर उसका भूउपयोग परिवर्तन आसान कर दिया।

(Pahad ke Mudde) इसके बाद पहाड़ों में प्राइम लोकेशन पर जमीनें खरीदने की होड़ लग गई है। बेचने वाले भी भूल गए कि जमीन पर एक नहीं अपितु अनेक पीढियों का हक होता है।  (लेखक जय सिंह रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

यह भी पढ़ें : ‘कान खोलकर सुन लो दिल्ली, नींद से जागो देहरादून’… कविता हो रही वायरल…

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 11 जुलाई 2021। उत्तराखंड में जनता का मुद्दा बन रहे ‘भूमि कानून’ पर एक कविता सोशल मीडिया पर वायरल होती जा रही है। आप भी पढ़ें यह कविता और आगे इस पोस्ट को शेयर कर आगे बढ़ाएं…

कान खोलकर सुन लो दिल्ली, नींद से जागो देहरादून।
देवभूमि की जनता अब के, मांग रही है “भू-कानून”।।
ये देवभूमि तुमने बतलाओ, किसके हवाले छोड़ी है।
कोई भी आकर बस जाए, ये “धर्मशाला” थोड़ी है।।
देवभूमि का नौजवान, मुम्बई दिल्ली में भटक रहा।

और यहां की सुख सुविधाएं, कोई और ही गटक रहा।।
उत्तराखंड के लोगों को, ना शिक्षा ना रोजगार मिला।
20 साल से हम सबको क्यों, धोखा ही हर बार मिला।।
सपनों के उत्तराखंड के लिए, सैकड़ों ने दी है कुर्बानी।
खून तुम्हारा नहीं खौलता, क्या खून हो गया है पानी।।

सत्ता में बैठे नेताओ, इस बार ये काम तुम खास करो।
50 साल के मूल निवास का, कानून जल्दी पास करो।।
ध्यान रहे ये देवभूमि, जम्मू कश्मीर ना बनने पाए।
अपनी कोख से कोई माँ, “आतंकी” ना जनने पाए।।
जागो देवभूमि के लोगो, सबके मन में ये जोश भरो।

हमें चाहिए “भू-कानून”, इस नारे का “उद्घोष”करो।।
जो करे पहल इन कानूनों की, वो सरकार हमारी है।
करे विरोध इन आवाजों का, तो “संस्कृति” की हत्यारी है।
अब के तो इस राज्य का पूरा, वोट उसी को जाएगा।
जो देवभूमि की रक्षा हेतु , जल्दी “भू-कानून” लाएगा।।

(सोशल मीडिया से साभार) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Pahad ke Mudde) : उत्तराखंड का बड़ा मुद्दा: भू कानून को भूल सुधार की जरूरत…

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 06 जुलाई 2021। उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और बदहाल शिक्षा व्यवस्था जैसे राजनीतिक मुद्दों की कमी नहीं है। लेकिन सभी मुद्दों के मूल में पहाड़ की अस्मिता से जुड़ा एक मुद्दा इन दिनों गैर राजनीतिक स्तर पर भी बुलंद है। हम बात कर रहे हैं भूकानून की। भूकानून एक ऐसा मुद्दा है, जो यदि न हो तो उत्तराखंड का अस्तित्व व सांस्कृतिक पहचान भूमंडलीकरण की हवा में घुलनी तय है, और घुलती जा रही है।

(Pahad ke Mudde) उत्तराखंड में लगातार बाहरी आबादी व बाहरी लोगों का स्वामित्व बढ़ता जा रहा है। एक ओर राज्य के मूल वाशिंदों के गांव के गांव खाली होकर ‘भुतहा’ होते जा रहे हैं, दूसरी ओर बाहरी लोगों की वर्ष भर बंद रहने और कुछ ही दिन ऐशो-आराम के लिए सजने वाली बस्तियां बनती जा रही हैं। इन बस्तियों के मूल मालिक यहां ‘केयर टेकर’ की भूमिका में आ गए हैं।

उल्लेखनीय है कि पड़ोसी राज्य हिमाचल में कानूनी प्रावधानों के चलते कृषि भूमि की खरीद लगभग नामुमकिन है। सिक्किम में भी भूमि की बेरोकटोक बिक्री पर रोक के लिए बीते वर्ष ही कानून बना है। मेघालय का कानून भी भूमि बिक्री पर पाबंदी लगाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब दूसरे हिमालयी राज्यों में कानून हैं तो फिर उत्तराखंड में क्यों नहीं? राज्य में एक सशक्त कानून लाना चाहिए।

(Pahad ke Mudde) इसलिए यह मुद्दा न केवल उत्तराखंड में रहने वाले, वरन उत्तराखंड छोड़कर बाहर रहे प्रवासियों के बीच भी सोशल मीडिया पर इतना बड़ा व प्रमुख मुद्दा बन गया है कि इसे फिल्म अभिनेता हेमंत पांडे के उस वक्तव्य से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने उतराखंड में हिमाचल की तरह भू-कानून लागू करने की वकालत की है।

(Pahad ke Mudde) उन्होंने कहा कि यदि समय रहते भू-कानून लागू नहीं किया गया तो भविष्य में उतराखंड की स्थिति भी कश्मीर की तरह हो जाएगी। यह कहते हुए उन्होंने उतराखंड के युवाओं का आह्वान किया है कि वे राज्य में भू-कानून लागू करने के लिए दलगत राजनीति से हटकर और एकजुट होकर आवाज उठाएं।

उत्तराखंड बनने के बाद राज्य में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 लागू किया गया। वर्ष 2002 में बाहरी व्यक्तियों के लिए भूमि खरीद की अधिकतम सीमा 500 वर्ग मीटर तय की गई। लेकिन वर्ष 2007 में खंडूड़ी सरकार में यह सीमा 250 वर्ग मीटर तक सीमित कर दी गई। लेकिन इधर वर्ष 2018 में त्रिवेंद्र रावत सरकार में उत्तराखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 में संशोधन का विधेयक पारित करवाया गया।

(Pahad ke Mudde) इस संशोधन के तहत विधेयक में धारा 143 (क) जोड़ कर यह प्रावधान किया गया कि औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि क्रय करे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ेगी। औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाने पर उसका भू उपयोग स्वतः बादल जाएगा और वह-अकृषि या गैर कृषि हो जाएगा।

(Pahad ke Mudde) इसके साथ ही इस अधिनियम में धारा 154 (2) भी जोड़ी गई। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद की सीमा को औद्योगिक प्रयोजन के लिए पूरी तरह खत्म कर दिया गया। इसका फायदा उठाकर बाहरी लोगों ने राज्य में निवेश के नाम पर बेतहाशा जमीनें खरीद डालीं, लेकिन इन जमीनों पर आज तक उद्योगों की फसल खड़ी नहीं हुई।

भूकानून से ही जुड़ा विषय है चकबंदी। इसका अर्थ है पहाड़ में ग्रामीणों के दूर-दूर छिटके खेतों को एक साथ लाना। इसमें बाधा यह है कि पर्वतीय गांवों में खेतों की प्रवृत्ति उर्वरता के लिहाज से अलग-अलग होती है, और विरासतन खेतों का बंटवारा खेतों को भाइयों में अलग-अलग बांटने की जगह हर खेत को बांटकर होता है, ताकि हर किसी को समान उर्वरता के खेत मिल सकंे। इस कारण अब लोगों के छोटे-छोटे खेतों के टुकड़े दूर-दूर छिटके हुए हो गए हैं।

(Pahad ke Mudde) इस कारण उनकी उचित देखरेख व उनमें खेती नहीं हो पाती है। गौरतलब है कि प्रदेश में 2016 मेें पर्वतीय चकबंदी का कानून बना, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया जा सका। वर्तमान में राज्य में आंशिक और स्वैच्छिक चकबंदी को कानूनी रूप में मान्य किया गया है। अभी तक राज्य में मात्र पौड़ी गढ़वाल के तीन गांवों में चकबंदी का नोटिफिकेशन हुआ है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का गांव खैरा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गांव पंचूर और कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का पैतृक गांव औणी शामिल है।

(Pahad ke Mudde) 21 मई 2020 को चकबंदी नियमावली राज्य कैबिनेट में पास एवं विधायी द्वारा परीक्षण के बाद राजस्व विभाग द्वारा नियमावली का प्रकाशन किया जा चुका है। अब चकबंदी कानून को अनिवार्य बनाने की मांग की जा रही है।

(Pahad ke Mudde) ऐसे में राज्य में भूकानून बनाने, अनुच्छेद-371 में ऐसे प्रावधान किए जाने की मांग उठ रही है कि राज्य में शिक्षा, रोजगार एवं भूमि पर केवल राज्य के लोगोें का अधिकार हो। दूसरे राज्यों के लोगों द्वारा की जा रही जमीनों की खरीद फरोख्त पर रोक लगाई जा सके। मुद्दे में वजन एवं इसका आगामी विधानसभा चुनाव में संभावित प्रभाव देखते हुए राजनीतिक दल भी इसे हड़पने की कोशिश में लग गए हैं।

(Pahad ke Mudde) उत्तराखंड क्रांति दल के बाद कांग्रेस और नई-नई आई आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर खुद को पहाड़ वासियों का सबसे बड़ा हितैषी दिखाने की कोशिश में जुट गए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि चुनाव से पहले नए सीएम धामी की अगुवाई वाली सरकार जनदबाव में इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार के इस फैसले पर भूल सुधार के रूप में कोई सकारात्मक कदम उठाने को मजबूर हो सकती है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 मई 2021। कोविड-19 की महामारी ने मानव जीवन को पूरी तरह से उथल-पुथल कर रख दिया है। लाखों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि इससे कहीं अधिक कोरोना से पीड़ित होकर किसी तरह बच पाए हैं। लेकिन इस महामारी के कई सुखद पक्ष भी हैं। इस महामारी ने अंधाधुंध भाग रही कमोबेश पूरी दुनिया को अपने घरों की ओर लौटाया है।

(Pahad ke Mudde) पर्वतीय राज्य उत्तराखंड जो कि पलायन की सबसे बड़ी समस्या झेल रहा था, इस कारण राज्य के 1000 से अधिक गांव खाली हो गए थे, और इन्हें ‘भुतहा गांव’ नाम दे दिया गया था, पूरे देश-दुनिया की तरह यहां भी कोरोना काल में लोग अपने गांवों को लौटे।

(Pahad ke Mudde) इसी कड़ी में ताजा सुखद समाचार यह है कोविड की दूसरी लहर में उत्तराखंड के कई भुतहा गांव भी आबाद हो गए हैं। वहां पसरा सन्नाटा और घरों में लगे मकड़ी के जाले लोगांे की आमद, चहक व उम्मीदों से टूट रहे है। बंजर खेत हरे होते दिख रहे हैं।

(Pahad ke Mudde) बात पौड़ी के चौंदली गांव से शुरू करते हैं। कभी अपने बासमती चावल के लिए पहचाने जाने वाले इस गांव में 40 परिवार रहते थे, लेकिन सड़क और संसाधनों की कमी के नाम पर एक-एक कर गांव के सभी परिवारों ने गांव छोड़कर पलायन कर दिया। आखिरी परिवार ने 2013 में गांव छोड़ा। इसके बाद से चौंदली भी भुतहा गांवों की सूची में शामिल हो गया। इसके बाद कभी-कभार गाँव के लोग साल में एक बार धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आते थे और फिर से चले जाते थे।

(Pahad ke Mudde) लेकिन लगता है कि महामारी ने रिवर्स माइग्रेशन यानी वापस लौटने की प्रवृत्ति को उत्प्रेरित किया है। इस महीने गांव के तीन परिवारों के 20 लोग दिल्ली से गांव लौटे हैं। गांव लौटे जगदीश सिंह, मनमोहन सिंह और जगमोहन सिंह तीन सप्ताह पहले अपने परिवारों के साथ चौंदली लौटे। उनका कहना था कि महामारी ने उन्हें दिल्ली शहर में एक अच्छे जीवन की आशा से वंचित कर दिया था, और उन्हें लगा कि घर में रहने से और विकल्प खुल सकते हैं।

(Pahad ke Mudde) इसलिए, जब उनके बच्चे पढ़ाई के लिए दिल्ली वापस चले गए, तो नौकरी से सेवानिवृत्त हुए तीनों भाइयों ने गांव में ही रहने और यहीं खेती कर जीवन बिताने का फैसला लिया है। इसी तरह पौड़ी के थानूल व आलासू, अल्मोड़ा जिले के स्यूरा, ज्योली, न्योली व हरड़ा आदि अनेक गांवों में भी कई लोग शहरों से वापस लौटे हैं। हालांकि इसके अभी ठीक से आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

(Pahad ke Mudde) उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17793 गांवों में से 1053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं। इनमें से अधिकांश पौड़ी और अल्मोड़ा में हैं। राज्य में हालांकि हालात काफी सुधरे हैं, खासकर अधिकांश गांवों में सड़क पहुंच चुकी है, लेकिन कहा जाता है कि सड़कें देर से बनीं। तब बनीं जब तक अधिकांश लोगों समस्याओं के आगे थक-हार कर पलायन कर चुके थे।

(Pahad ke Mudde) और जो बचे थे वे भी नौकरी, सड़कें, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी समस्याओं को बरकरार देखकर इन सड़कों का इस्तेमाल कर गांव छोड़ गए। इस प्रकार गांवों तक पहुंची सड़कें भी लोगों को गांव वापस लौटाने की जगह उन्हें बाहर ले जाने का माध्यम बनीं। लेकिन कोरोना काल में लोगांे ने शहरों में अपना रोजगार खोने के बाद समस्याएं झेली हैं, और जीवन की अनिश्चितताएं देखी हैं,

(Pahad ke Mudde) ऐसे में वे ‘जहाज के पंछी’ की तरह अपने स्थायी ठिकाने, गांव की ओर शुद्ध ऑक्सीजन युक्त हवा-पानी की ओर लौट रहे हैं। राज्य सरकार की ओर से इस ओर प्रयास किये जा रहे हैं।

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नवीन समाचार, देहरादून, 8 नवम्बर 2020। कोरोना के कारण देशभर में लागू तालाबंदी यानी लॉकडाउन में राज्य में वापस आये प्रवासियों में से 71 फीसद प्रवासी ही राज्य में अब तक टिके हैं। जबकि 29 फीसद वापस लौट चुके हैं। पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी ने मुख्यमंत्री को आयोग के सर्वे के हवाले से बताया कि सितम्बर, 2020 के अंत तक कोविड-19 महामारी के कारण राज्य में लौटे प्रवासियों में से लगभग 29 प्रतिशत पुनः पलायन कर गये हैं।

(Pahad ke Mudde) राज्य में लौटे प्रवासियों में से लगभग 71 प्रतिशत अपने मूल निवास या उसके पास के क्षेत्रों में चले गए हैं। इनमें से लगभग 33 प्रतिशत कृषि, पशुपालन आदि, 38 प्रतिशत मनरेगा, 12 प्रतिशत स्वरोजगार तथा 17 प्रतिशत अन्य पर आजीविका पर निर्भर हैं।

(Pahad ke Mudde) उन्होंने बताया कि जनपद अल्मोड़ा में लगभग 39 प्रतिशत लौटे प्रवासी स्वरोजगार पर निर्भर हैं। जनपद नैनीताल, ऊधमसिंह नगर तथा टिहरी में भी अधिक संख्या में लौटे प्रवासी स्वरोजगार पर अपनी निर्भरता दिखा रहे हैं। काफी संख्या में लौटे प्रवासी कृषि, बागवानी, पशुपालन आदि, पर आजीविका के लिए निर्भर हैं।

(Pahad ke Mudde) इनमें से सबसे अधिक जनपद नैनीताल में 59 प्रतिशत, पिथौरागढ़ में 57 प्रतिशत, बागेश्वर में 53 प्रतिशत चम्पावत में 40 प्रतिशत तथा उत्तरकाशी 45 प्रतिशत में है जबकि मनरेगा पर सबसे अधिक जनपद हरिद्वार 75 प्रतिशत, पौड़ी में 53 प्रतिशत, टिहरी में 51 प्रतिशत तथा चमोली में 43 प्रतिशत में लौटे प्रवासी आजीविका के लिए निर्भर हैं। राज्य एवं जनपद स्तर पर प्रवासियों के आर्थिक पुनर्वास हेतु प्रभावी सेल गठित करने तथा उनके अनुभवों एवं आवश्यकताओं का डाटा बेस तैयार करने पर बल दिया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 30 मई 2020। कोरोना के प्रसार का कारण बने प्रवासियों को राज्य में ही रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश पर पलीता लग सकता है। शनिवार को कुमाऊं मंडल के नवागत आयुक्त एवं मुख्यमंत्री के सचिव अरविंद सिंह ह्याकी ने वीडियो कॉफ्रेंस के माध्यम से मंडल के जिलाधिकारियों से संवाद किया। इस दौरान नैनीताल के मुख्य विकास अधिकारी विनीत कुमार ने बताया कि जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में आये 7322 प्रवासियों में से 2500 की स्किल मैपिंग कर यह पता लगाया गया है कि उनमें क्या कार्य दक्षता है।

(Pahad ke Mudde) बताया कि इनमें से केवल 20 प्रतिशत प्रवासी ही स्वरोजगार करने और मात्र 10 प्रतिशत ही मनरेगा के अंतर्गत कार्य करने के इच्छुक हैं। इनका पंजीकरण किया जा रहा है। उन्होने बताया कि जनपद में 10 मॉडल क्लस्टर चिन्हित किये गये है जिन्हे स्वीकृत हेतु शासन को भेजा जायेगा। यानी अधिकांश स्थितियां ठीक होने पर वापस जाना चाहते हैं और उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार करने की कोई खास रुचि नहीं है।

(Pahad ke Mudde) बैठक में मंडलायुक्त ह्यांकी ने जिलों के अधिकारियों से कहा कि वे मंडल स्तरीय अधिकारियों के साथ आपसी समन्वय स्थापित करते हुए कार्य करें। इस दौरान उन्होंने खासकर आगामी वर्षाकाल से पूर्व खाद्यान व आवश्यक वस्तुओं के भंडारण एवं जल शक्ति मिशन पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिये। कहा कि अधिकारी पहले से इस बारे में विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर लें। उन्होंने कोरोना आपदा के दौरान अधिगृहीत किये गये वाहनों व होटलांे आदि का शीघ्र भुगतान कराने के निर्देश भी जिलाधिकारियों को दिये।

(Pahad ke Mudde) साथ ही लौटे प्रवासियों के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन हेतु नवाचार के प्रयास करने को भी कहा। वीडियो कांफ्रेंस में डॉ. नीरज खैरवाल, सविन बंसल, विजय कुमार जोगदंडे, नितिन भदौरिया, रंजना राजगुरू, एसएन पांडे आदि जिलाधिकारी तथा अपर आयुक्त संजय खेतवाल, आरएफसी कुमाऊं ललित मोहन रयाल, एडीएम एसएस जंगपांगी, स्वास्थ्य निदेशक डॉ. संजय साह, अपर शिक्षा निदेशक डा. मुकुल सती, उपनिदेशक अर्थ एवं संख्यां राजेंद्र तिवारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी केके गुप्ता, जिला पूर्ति अधिकारी मनोज वर्मन आदि मौजूद रहे।

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-रिवर्स पलायन कर राज्य में वापस लौटे लोगों को यहीं रोकने के लिए पलायन आयोग को दिये निर्देश
नवीन समाचार, देहरादून, 15 अप्रैल 2020। देश-प्रदेश में लॉक डाउन का दूसरा चरण शुरू होने के साथ ही लॉक डाउन से पटरी से उतरी व्यवस्थओं को वापस से पटरी पर लाने एवं लॉक डाउन से हुए नुकसानों को अवसरों में बदलने पर भी राज्य सरकार के स्तर से सोचा जाने लगा है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को मुख्यमंत्री आवास में अपने मंत्रिपरिषद् के साथ देश में लॉक डाउन से उत्पन्न परिस्थितियों पर चर्चा की।

(Pahad ke Mudde) इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि इस आपदा को अवसर के रूप में किस प्रकार बदला जाए हमें इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। साथ ही लॉक डाउन की स्थिति के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी होने वाले निर्देशों के अनुरूप प्रदेश में तदनुसार ही कार्य योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि बदलते हालात में अर्थव्यवस्था को किस प्रकार मजबूती प्रदान की जाए इसकी भी हमारे सामने चुनौती है।

(Pahad ke Mudde) लॉक डाउन के दौरान बङी संख्या में लोग अपने घरों को लौटे हैं। ये लोग रिवर्स माइग्रेशन की ओर अग्रसर हों, इसके लिए एक अध्ययन रिपोर्ट तैयार करने के लिए पलायन आयोग को निर्देश दिए जा रहे हैं। आयोग इनसे वार्ता कर उनसे सुझाव भी प्राप्त करेगा। यहां लौटे लोगों को यहां पर बेहतर संसाधन एवं सुविधाएं उपलब्ध कराकर उन्हें रोका जा सकता है, पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने में यह कारगर प्रयास होगा।

(Pahad ke Mudde) उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री राहत कोष में अधिक से अधिक सहयोग हेतु लोगों को प्रेरित किए जाने की जरूरत है। इस धनराशि से हम प्रदेश की जनता की बेहतरी के लिए भी कार्ययोजना बना सकेंगे।

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कहा-याची सरकार के समक्ष प्रस्तुत करे अपना प्रत्यावेदन और सरकार उस पर विचार करे
नवीन समाचार, नैनीताल, 9 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए जनसंख्या की जगह भौगोलिक आधार पर परिसीमन करने के संबंध में दायर जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

(Pahad ke Mudde) पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वह अपना प्रत्यावेदन सरकार को दें, साथ ही न्यायालय ने सरकार को आदेश दिए हैं कि वह प्रत्यावेदन पर विचार करे। परिसीमन को लेकर रामनगर निवासी प्रेम चंद्र जोशी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी।

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याचिका में कहा था कि उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है, जिसकी अधिकांश जनसंख्या मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही है। इस कारण यहां हर चुनाव में परिसीमन करने की जरूरत होने लगी है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां परिसीमन जनसंख्या के आधार पर न करके क्षेत्र के भौगोलिक आधार पर किया जाए।

(Pahad ke Mudde) यदि यहां जनसंख्या को ही आधार माना गया तो पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा विकासहीन हो जाएगा। याची का यह भी कहना है कि 1994 में मुलायम सिंह की सरकार ने उत्तराखंड के 8 जिलों में परिसीमन भौगोलिक आधार पर करने के लिए एक कमेटी भी गठित की थी।

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-पलायन करने वालों में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अगस्त 2019। राज्य ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के हालिया आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड  में 43.17 प्रतिशत लोग पलायन करके एक जगह से दूसरी जगह जा बसे हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की जनसंख्या एक करोड़ 86 हजार 292 है। पलायन आयोग के सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश के 43.17 लाख लोगों ने खुद को पलायन करके आया हुआ बताया।

(Pahad ke Mudde) इनमें से भी अधिकांश यानी करीब 70 फीसद यानी 29.83 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे गांवों से पलायन करके शहरों में आये। जबकि आधे लोगों ने अपने ही जिले के भीतर पलायन किया। वहीं केवल 14 प्रतिशत लोगों ने ही कहा कि उन्होंने नौकरी की तलाश में पलायन किया, जबकि दो प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने बेहतर शिक्षा के लिए पलायन किया। पलायन करने वालों में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का है। 66 फीसद महिलाओं के पलायन की वजह विवाह है।

वहीँ, जिलावार पलायन करने कर आने वालों की तादाद देखें तो 70 प्रतिशत लोगों ने गांवों से शहरों में पलायन किया है। पहाड़ से सबसे ज्यादा लोग मैदानी जिलों में पलायन करके बसे हैं। इनमें देहरादून सबसे ऊपर है। यहां 21 फीसद यानी 894455 लोग, ऊधमसिंह नगर में 714252 यानी 17 फीसद, हरिद्वार में 673506 यानी 16 फीसद पलायन करके बसे हैं।

(Pahad ke Mudde) बागेश्वर, रुद्रप्रयाग और चंपावत में सबसे कम यानी करीब दो-दो फीसद आबादी पलायन करके आई है। इसके उलट प्रदेश में 12.5 लाख से अधिक लोग दूसरे प्रदेशों से आये हैं। यह प्रदेश की आबादी का करीब 12 फीसद है। इनमें से 8.9 लाख से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश से जबकि 76 हजार से ज्यादा लोग बिहार, 52 हजार से अधिक लोग दिल्ली से आकर बस गए हैं।

(Pahad ke Mudde) उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी के मुताबिक प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन एक बड़ी चिंता का विषय है। इसकी असली वजह गांवों में लोगों की कम आय लगती है। प्रदेश में गांवों में अधिकांश लोगों की औसत आय पांच हजार रुपये मासिक है। इसलिए वह रोजगार के नए व बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं।

(Pahad ke Mudde) उनके मुताबिक प्रदेश सरकार को गांवों में लोगों की आय बढ़ाने के उपाय करने होंगे, तभी इस प्रवृत्ति की रोकथाम की जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि पलायन करने वालों का दो तिहाई हिस्सा महिलाओं का है। यह उस धारणा से उलट है जिसके तहत कहा जाता है कि रोजगार के अवसरों की तलाश में लोग पलायन करते हैं।

(Pahad ke Mudde) डा. नेगी का कहना है कि महिलाओं के पलायन की असली वजह उनकी शादी है। शादी के बाद महिला को अपना घर- गांव यहां तक कि जिला तक छोड़ना होता है। इसीलिए पलायन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है। यानी सव्रेक्षण में 66 फीसद महिलाओं ने अपने पलायन की वजह विवाह को बताया।

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-जिला-मंडल मुख्यालय में पता ही नहीं चल रहा कि चुनाव भी हैं
-अब तक केवल केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह आये हैं पहाड़ पर
-केवल तीन दिन पूर्व ही भाजपा और केवल दो दिन पूर्व ही कांग्रेस का मोहल्लों में शुरू हुआ है चुनाव प्रचार

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 अप्रैल 2019। लोक सभा चुनाव के प्रचार का एक सप्ताह ही शेष है, लेकिन जिला व मंडल मुख्यालय तथा पर्यटन नगरी नैनीताल सहित पहाड़ों पर चुनाव करीब होने का कोई चिन्ह नजर नहीं आ रहा है। अब तक कुमाऊं मंडल के पहाड़ों पर स्टार प्रचारक के तौर पर केवल केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह आये हैं।

(Pahad ke Mudde) वहीं मंडल मुख्यालय में चुनाव प्रचार के नाम पर केवल एक दिन पूर्व ही खुले कांग्रेस के और बीते सप्ताह खुले भाजपा कार्यालय के अलावा माल रोड सहित कहीं भी, किसी भी पार्टी का एक भी झंडा, और यहां तक छोटे पोस्टर व बिल्ले भी लगे नजर नहीं आ रहे हैं। अन्य चुनावों की तरह किराये की चुनाव पार्टियां भी इस चुनाव में घर-घर नहीं जा रही हैं।

(Pahad ke Mudde) अलबत्ता करीब तीन दिन से भाजपा के कार्यकर्ता स्वयं ही घर-घर जा रहे हैं। इसे पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों को हुए पलायन का जीता-जागता प्रमाण बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पहाड़ की छितरी व बची-खुची आबादी खासकर नैनीता-ऊधमसिंह नगर जैसे आधे पहाड़ व आधे मैदान की लोकसभा सीट पर कोई मायने नहीं रखती है। जीत का असली दारोमदार मैदान में बसे मतदाताओं पर ही है। यह भी पढ़ें : यहां पर नेता भी कर चुके हैं पलायन, अभी तक प्रचार के लिए कोई नहीं पहुंचा जनता के बीच

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-32 लाख लोगों के साथ ही मुख्यमंत्री सहित अनेक राजनेता व प्रत्याशी भी कर चुके पलायन

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 26 मार्च 2019। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये करीब 5000 करोड़ रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। वहीं हाल में आई ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 17.4 फीसद शिक्षित युवा बेरोजगार हैं, जो रोजगार न मिलने की स्थिति में पलायन करने को तैयार बैठे हैं।

(Pahad ke Mudde) रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में स्वरोजगार करने वालों की संख्या में भी करीब 12 फीसद की कमी आ चुकी है। यह वह समस्या है जिससे उत्तराखंड उलट-पलट हो गया है। पूरा पहाड़ खाली हो गया है। मनुष्य तो छोड़िये, देवी-देवताओं ने भी पलायन कर दिया है।

(Pahad ke Mudde) 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17793 गांवों में से 1053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत विकास केंद्र के एक अध्ययन के अनुसार तो प्रदेश के तीन हजार से अधिक गांव 2,57,875 घर ताले लटकने से वीरान हो गये हैं।

(Pahad ke Mudde) इनमें से 42 फीसद ने रोजगार, 30 फीसद ने मूल सुविधाओं और 26 फीसद ने शिक्षा के अवसरों के अभाव अपने गांव छोड़े हैं। वहीं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत-डोईवाला, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अल्मोड़ा से नैनीताल और पूर्व में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, पूर्व मुख्यमंत्री के सलाहकार रणजीत रावत (सल्ट से रामनगर), दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक हरिद्वार के साथ ही पहाड़ के अनेक नेता मैदानी सीटों को अपने लिये सुरक्षित करने में जुटे हुए हैं।

(Pahad ke Mudde) यही नहीं पहाड़ के भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई कुल व ईष्ट देवताओं के मंदिरों को मैदानों पर स्थापित कर एक तरह से उनका भी पलायन कर दिया गया है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में बेरोजगारी बढ़ी-स्वरोजगार घटे, सरकार के लिए खतरे की घंटी है यह सरकारी रिपोर्ट….

नवीन समाचार 17 जनवरी 2019। पिछला यानी 2018 का वर्ष ‘रोजगार वर्ष’ के रूप में मनाने का दावा करने वाली उत्तराखंड सरकार के लिए एक सरकारी रिपोर्ट खतरे की घंटी के रूप में आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या तो बढ़ ही रही है

(Pahad ke Mudde) साथ ही स्वरोजगार करने वालों की संख्या घट रही है। ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 17.4 फीसदी शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। 12वीं या इससे अधिक की शिक्षा लेने वाले युवाओं को इस श्रेणी में रखा गया है। अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग की ओर से रिपोर्ट जारी की गई है।

(Pahad ke Mudde) राज्य सरकार का स्वरोजगार को बढ़ावा देने का दावा भी झूठा साबित हो रहा है। ताजा रिपोर्ट बताती है कि पांच साल में स्वरोजगार करने वालों की संख्या में करीब 12 फीसदी की कमी आ चुकी है। 2012 में जहां 69 फीसदी स्वरोजगार कर रहे थे वहीं 2017 तक यह संख्या घटकर 56.9 पर आ चुकी है।

(Pahad ke Mudde) इसके उलट दैनिक वेतनभागी रोजगार छह फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। हालांकि नियमित रोजगार भी सात फीसदी बढ़ा है। बेरोजगारी की मुख्य वजह आर्थिक तरक्की का तीन मैदानी जिलों तक सीमित रहना है। देहरादून 30 फीसदी शिक्षित बेरोजगारों के साथ प्रदेश में अव्वल है। रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी व चम्पावत जिले में दो तिहाई लोग स्वरोजगार कर रहे हैं।

राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बेरोजगारी
दूसरी ओर केंद्र सरकार की एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सीएमआईई) की रिपोर्ट भी उत्तराखंड में बेरोजगारी बढ़ने की पुष्टि कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2018 में प्रदेश में बेरोजगारी की रफ्तार 7.5 फीसदी रही। जो कि राष्ट्रीय औसत 7.4 से भी ज्यादा है। आंध्र प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश ने बेरोजगारी कम करने में सफलता पाई है। इसके उलट  असम, मध्य प्रदेश पंजाब, त्रिपुरा, राजस्थान में यह दर बढ़ी है।

लोगों तक पहुंच रही सरकारी योजनाएं
पहाड़ों में सरकार की योजनाएं अब ज्यादा तेजी से लोगों तक पहुंच रही है। रिपोर्ट बताती है कि 13.3 फीसदी पर्वतीय जनता एनआरएलएम, एमएमएसजे, शिल्पीग्राम योजना, एनयूएलएम और पर्यटन विकास की योजना का लाभ उठा रहे हैं। हालांकि मुद्रा लोन का वितरण पहाड़ों में कम हो रहा है।

पर्यटन नहीं पकड़ पा रहा रफ्तार
हिमाचल व जम्मू कश्मीर की जीडीपी में पर्यटन का हिस्सा करीब सात फीसदी का है। पूर्वोत्तर के राज्य भी पर्यटन विकास के मामले में उत्तराखंड से आगे निकल रहे हैं। उत्तराखंड में पर्यटक बढ़ रहे हैं पर स्थानीय विकास में योगदान अन्य राज्यों के मुकाबले कम है। विदेशी पर्यटक भी उत्तराखंड में बढ़ रहे हैं।

फसल बीमा का लाभ कम
पहाड़ों में जंगली जानवर व प्राकृतिक कारणों से फसल को नुकसान ज्यादा हो रहा है। लेकिन फसल बीमा योजना आगे नहीं बढ़ रही है। उत्तरकाशी और ऊधमसिंहनगर में छह फीसदी फसल ही बीमा के दायरे में पहुंच रही है।

यह भी पढ़ें : पलायन आयोग के उपाध्यक्ष ने पलायन रोकने के लिए कही यह बड़ी बात

-पलायन रोकने के उपाय के साथ ही प्रमुख वजहें भी बतायीं
-कहा-कृषि नहीं ग्रामीण उद्यमों से रुकेगा पलायन
-पलायन के लिए आर्थिक कारण मुख्य, अंग्रेजी शिक्षा का आकर्षण भी प्रमुख वजह: डा. नेगी

नैनीताल, 19 नवंबर 2018। उत्तराखंड पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डा. शरण सिंह नेगी ने कहा कि पहाड़ों से पलायन केवल कृषि के भरोसे नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण उद्यम को बढ़ावा देना होगा। कहा कि पलायन के पीछे आर्थिक कारण प्रमुख है। ग्रामीणों की आय बढ़ाकर ही उन्हें गांवों में रोका जा सकता है। साथ ही ग्रामीणों में बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलाने का बड़ा आकर्षण भी पलायन करने की प्रमुख वजह है।

(Pahad ke Mudde) साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात पहाड़ के ही रहने वाले शिक्षकों व चिकित्सकों-चिकित्सा कर्मियों का गांव में न रुककर दूर शहरों से आना-जाना करना भी पलायन और ग्रामीण क्षेत्रों में असुविधाओं का बड़ा कारण है।

डा. नेगी सोमवार को मुख्यालय स्थित हरमिटेज परिसर स्थित एचआरडीसी सभागार में कुमाऊं विवि के सर्वप्रमुख डीएसबी परिसर के वाणिज्य विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेसरनल स्टडीज एंड रिसर्च यानी आईपीएसडीआर एवं ‘हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायअी उत्तराखंड’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय हिमालय क्षेत्र से पलायन: चुनौतियां तथा समाधान’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता अपने विचार रख रहे थे।

(Pahad ke Mudde) उन्होंने कहा कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन का कारण आर्थिक विषमता है। कहा, एक ओर उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय गुजरात से भी बेहतर है, परंतु इसका बड़ा हिस्सा तीन मैदानी जिलों हरिद्वार, देहरादून व ऊधमसिंह नगर से आता है। हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय 2.54 लाख जबकि रुद्रप्रयाग की मात्र 80 हजार रुपये है। इसके साथ ही पर्वतीय जिलों के बेतालघाट, ओखलकांडा, स्याल्दे, ताकुला, चौखुटिया आदि विकासखंड विकास में बहुत पीछे हैं।

(Pahad ke Mudde) वहीं नजदीकी शहरों में सब्जी-दूध आदि की खपत होने के कारण अच्छी आर्थिक स्थिति बेहतर होने से खिर्सू, थलीसेंण व दुगड्डा आदि विकासखंडों में जनसंख्या घटने के बजाय बढ़ी भी है। अन्य क्षेत्रों में वर्षा आधारित व जनसंख्या घटने से वन्य जीवों का शिकार हो रही खेती के कारण पहाड़ के अधिकांश परिवारों की आय मात्र 5 हजार रुपये मासिक तक सीमित है। ऐसे में वे खेती की जगह नियमित आय के लिये आसपास के नगरों का रुख कर रहे हैं।

(Pahad ke Mudde) बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने का शौक भी ग्रामीणों को ‘सड़क पर ला रहा है।’ इन स्थितियों को बदलने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वहां की जरूरत के कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ाने वाले उद्यमों को बढ़ावा देने एवं विश्वविद्यालयों को ग्रामीण क्षेत्रों का अध्ययन करवाने तथा अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं को ‘क्रेडिट पॉइंट’ देने की जरूरत बताई। वहीं अध्यक्षता कर रहे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एनएस बिष्ट ने कहा कि पहाड़ ही नहीं देश की 30 फीसद जनसंख्या पलायन की समस्या से ग्रस्त है।

(Pahad ke Mudde) कहा कि उत्तराखंड को पृथक राज्य पर्वतीय प्रदेश के नाते बनाया गया था कि किंतु राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को ही उचित योजनाओं के अभाव में राज्य बनने का लाभ नहीं मिला। संगोष्ठी के आयोजक वाणिज्य विभागाध्यक्ष प्रो. अतुल जोशी ने बताया कि विवि में पहले ही ग्रामीण प्रबंधन पर चल रहे पाठ्यक्रम कर रहे छात्र-छात्राएं ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर कार्य कर रहे हैं।

(Pahad ke Mudde) डा. शरमनी पांडे ने ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की कीमत बढ़ाने वाले उपक्रम करने, ग्रामीण उत्पादों को अमेजन जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जोड़ने की आवश्यकता जताई। संगोष्ठी में रिसर निदेशक प्रो. एलएम जोशी, प्रो. अजय रावत आदि ने भी विचार रखे। संचालन प्रो. इंदु पाठक ने किया। इस मौके पर संयोजक वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष प्रो. बीपी सिंघल, प्रो. गंगा बिष्ट, डा. रीतेश साह सहित अनेक अन्य प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं भी मौजूद रहे।

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नवीन जोशी, नैनीताल (Pahad ke Mudde) उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये 409 अरब रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17,793 गांवों में 1,053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है।

(Pahad ke Mudde) वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। प्रदेश के अधिकांश बड़े राजनेताओं (कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, यशपाल आर्य) ने भी अपने लिये मैदानी क्षेत्रों की सीटें तलाश ली हैं, वहीं भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई देवताओं ने भी पहाड़ों से मैदानों में पलायन कर दिया है।

प्रदेश के खासकर सीमांत क्षेत्रों उत्तरकाशी से लेकर चंपावत तक नेपाल-तिब्बत (चीन) से जुड़ी सरहद मानव विहीन होने की स्थिति में पहुंच गई है और यह इलाका एक बार फिर इतिहास दोहराने की स्थिति में आ गया है। कई सौ साल पहले मुगल और दूसरे राजाओं के उत्पीड़न से नेपाल समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से लोगों ने कुमाऊं और गढ़वाल की शांत वादियों में बसेरा बनाया था।

(Pahad ke Mudde) लेकिन आजादी के बाद सरकारें इन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रहीं, जिस कारण पलायन ने गति पकड़ी, और सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही पहाड़ के 1,053 पर्वतीय गांव खाली हो गये। जबकि वास्तविकता यह है कि अकेले कुमाऊं में ही पांच हजार से अधिक गांव वीरान हो गये हैं। खासतौर पर नेपाल और तिब्बत सीमा से लगे गांवों से अधिक पलायन हुआ है, और हजारों एकड़ भूमि बंजर हो गई है।

(Pahad ke Mudde) पलायन की गति 1980 के दशक से बढ़ी मानी जाती है। उस दौर में शहरों की ओर निकले लोग अब वृद्ध होने की स्थिति में स्वयं को पहाड़ की बजाय मैदानों में ही स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं, और वे हर साल पहाड़ आने से बचने के लिये अपने ग्राम व ईष्ट देवी-देवताओं को भी साथ मैदानों की ओर ले गये हैं।

नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर में सामने आया कड़वा सच

नाबार्ड ने वार्षिक स्टेट फोकस पेपर में राज्य की स्थिति को लेकर काफी भयावह तथ्य सामने आये हैं। 24 जनवरी 2018 को जारी फोकस पेपर के अनुसार उत्तराखंड के 968 गांव पूरी तरह खाली होकर भूतगांव (घोस्ट विलेज) बन गये हैं, वहीं राज्य गठन के बाद के इन वर्षो में एक लाख हेक्टेयर कृषि भूमि भी बंजर हो गयी है।

(Pahad ke Mudde) पर्वतीय क्षेत्र की छोटी जोतों को समय रहते नहीं बचाया गया तो सरकारी प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे। समाधान के तौर पर नाबार्ड ने आने वाले वित्त वर्ष के लिए उत्तराखंड के किसानों को 20301.87 करोड़ ऋण देने की सिफारिश की है।

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राज्य बनने के बाद पलायन पहाड़ से पलायन अपने ही राज्य में तराई-भावर की ओर अधिक हुआ है। राज्य बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं, और यहीं तीन से चार हजार तक विभिन्न पर्वतीय देवी-देवताओं नामों के देवी देवताओं के मंदिर भी बन गये हैं। पलायन के कारणों की पड़ताल करें तो पहाड़ों में 0.68 हेक्टेयर औसत भूमि स्वामित्व है, जो कि बहुत कम है।

(Pahad ke Mudde) वहीं कभी कभी 60 फीसद से अधिक ग्रामीण रोजगार देने वाली पहाड़ की खेती जंगली जानवरों के प्रकोप, घर के पुरुषों के पलायन से हल जोतने वाले हाथों के अभाव जैसे कारणों से बंजर हो चुकी है, फलस्वरूप खाली हो चुके गांवों में लेंटाना (कुरी) घास की झाडि़यां और बंजर हो चुके उपजाऊ खेत ही देखने को मिलते हैं। सशस्त्र सुरक्षा बल के आंकड़ों के अनुसार अब लोग खेती के लिए नेपाली मजदूरों को भूमि सौंपने लगे है।

(Pahad ke Mudde) 128 नेपाली परिवार दोहरी नागरिकता लेकर पहाड़ी किसान बन चुके हैं। वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 7,69,944 हेक्टेयर कृषि भूमि में से खेती घटकर 2014-15 तक मात्र 7,01,030 हेक्टेयर में सिमट गयी है। ग्रामीण अब कृषि की जगह मनरेगा से रोजगार प्राप्त करते हुए मजदूर बन गये हैं। सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना के अनुसार एक से तीन रूपये की कीमत पर राशन मिल जाने से भी उनमें मेहनत करने की भावना खत्म हो रही है।

जहां सबसे पहले सड़क आयी, वहीं सबसे अधिक पलायन

नैनीताल। संगोष्ठी में श्रमयोग्य पत्र के संपादक अजय कुमार ने दिलचस्प तथ्य पेश करते हुए बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी व अल्मोड़ा जिलों में जनसंख्या 2001 के मुकाबले घटी है, और इन जिलों के नैनीडांडा और सल्ट ब्लॉकों से सर्वाधिक पलायन हुआ है।

(Pahad ke Mudde) अब यह संयोग है अथवा कुछ और कि इन्हीं दो ब्लॉकों में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के लिहाज से सबसे पहले सड़क आयीं। यानी सड़कें विकास को गांवों में लाने का माध्यम बनने की जगह ग्रामीणों को पलायन कर शहर ले जाने का माध्यम भी अधिक बनी हैं।

वहीं पलायन कर दूर देश में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों की भूमिका दूर बैठकर ‘नराई’ लगाने या दूर से ही ‘उपदेश’ देने तक ही सीमित हो गयी है। किसी में वहां के ‘सुख’ छोड़कर पहाड़ आने, अपनी म्हणत से दूसरों के बजाय अपना घर सजाने-संवारने का साहस नहीं है…. है क्या ???

पहाड़ के पलायन पर एक कविता (साभार गूगल से)

मैंने देखा है अपने आँगन में
तेरे दादा और परदादा को भी,
तुतलाते,अलमस्त बचपन बिताते,
तख्ती पे घोटा लगाते,कलम बनाते….
मुस्कराते,गुनगुनाते और खिलखिलाते,
जब अ से अनार सीखते थे तेरे बूबू…..
       मैं  तब भी थी , मैं आज भी हूँ,

    मैं बाखली हूँ……..

खेले हैं मैंने होली के रंग ,तेरे पुरखों के संग ,
ना जाने कितनी दिवालियों में सजी हूँ,
सुनी है मैंने वो “काले-कव्वा काले ” की पुकार
जब घूघूते की माला ले के दौड़ते थे तेरे बाज्यू…
           मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ……

गवाह हूँ मैं कितनी डोलियों की याद नहीं,
कितनी बेटियों की विदाई में बहे आंसू मेरे
कितनी बहुवों की द्वारपूजा की साक्षी हूँ….
जब चाँद सी सजके आई थी तेरी ईजा ……
              मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
               मैं बाखली हूँ……….

फिर तेरे नामकरण की वो दावत
कितनी लम्बी पंगतों को जिमाया मैंने….
तेरा बचपन, तेरी शिक्षा,तेरा संघर्ष,
कितना फूला था मेरा सीना ,जब आया तू
पहली बार मेरे आँगन में ठुल सैप बनके
                 मैं तब भी थी , मैं आज भी हूँ…
                  मैं बाखली हूँ……

पर शायद मेरा आँगन छोटा हो गया ,
तेरे सपनो  के लम्बे सफर के लिए…
तुझे पूरा हक है, जीने का नई जिंदगी।
शायद समय की दौड़ में मैं ही पिछड़ गई हूँ…
याद है वो भी जब आखिरी बार कांपते हाथों से 
सांकल चड़ाई थी तूने………………
            मैं तब भी थी,मैं आज भी हूँ,
            मैं बाखली हूँ…………..

अब शायद और ना झेल पाऊं वक्त की मार,
अकेलेपन ने हिला दिया है मेरी बुनियादों को….
अब तो दरवाजों पे लगे तालों पे भी जंक आ गया
पर मेरा रिश्ता तेरी बागुड़ी से आज भी वही है।
लेके खड़ी  मीठी यादें,ढेरों आशीर्वाद……
                   मैं तब भी थी ,मैं आज भी हूँ,
                    मैं बाखली हूँ………

पलायन की दुखती रग

पहाड़ दूर से बहुत सुंदर लगते हैं। करीब जाइए तो उनकी हकीकत समझ में आती है। अपनी आंखों के सैलानीपन से बाहर आकर आप देखेंगे तो पाएंगे कि पहाड़ की जिंदगी कितने तरह के इम्तिहान लेती है। यह बदकिस्मती नहीं, विकास की बदनीयती है कि इन दिनों पहाड़ के संकट और बढ़ गए हैं। पहाड़ आज की तारीख में बेदखली, विस्थापन और सन्नाटे का नाम है। घरों पर ताले पड़े हुए हैं, दिलों में उदासी है, थके हुए पांव राहत नाम के किसी बुलावे की उम्मीद में पहाड़ों से उतरते हैं।

(Pahad ke Mudde) आज पलायन उत्तराखंड के लिए एक गम्भीर प्रश्न बन गया है। हमें पलायन को रोकने के लिए कारणों का निवारण करना होगा। उच्च शिक्षा की बात करें तो देहरादून के अलावा उंगलियों में गिनने लायक ही अच्छे शिक्षा संस्थान हैं। कृषि योग्य भूमि का कम होना और साथ में परम्परागत अनाज को उसका उचित स्थान न मिलना भी पलायन का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। उत्तराखंड के उन किसानों पर किसी का ध्यान नहीं जाता जो कभी जौ, बाजरा, कोदा, झंगोरा उगाते थे

(Pahad ke Mudde) और उस खेती का सही लागत मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने इसे उगाना ही छोड़ दिया। सरकार चाहे तो यहां के परम्परागत अनाज का सही लागत मूल्य जारी कर पलायन रोकने के लिए एक अच्छा कदम उठा सकती है। वर्ष 2011 की जनगणना में कहा गया था कि 2001 में पहाड़ी इलाकों में 53 प्रतिशत लोग थे। लेकिन 2011 में इन पहाड़ी इलाकों मात्र 48 प्रतिशत ही लोग रह गए। एनएसएसओ का 70वां सव्रे बताता है कि उत्तराखंड में कृषि उपज की कीमत राष्ट्रीय औसत से 3.4 गुना कम है।

(Pahad ke Mudde) उत्तराखंड में औसत कृषि उपज कीमत 10,752 रुपये प्रति परिवार थी। जबकि कृषि उपज कीमत का राष्ट्रीय औसत 36,696 रुपये। अगर पड़ोसी राज्य हिमाचल की बात की जाए तो खेतिहर परिवार की आय हिमाचल से लगभग आधी है। उत्तराखंड में एक खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 4,701 रुपये थी। जबकि हिमाचल में खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 8,777 रुपये थी। कृषि प्रधान देश होने के नाते कई सीखें विरासत में हमें मिलीं, पर हम उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं।

(Pahad ke Mudde) हमारे खेत छोटे हैं, बिखरे पड़े हैं और जहां गांवों में पलायन हो चुका है वहां खेत बंजर और खाली पड़े हैं। पाली हाउस तकनीक से ज्यादा-से-ज्यादा सब्जियां उगाने पर ध्यान दिया जा सकता है। हिमाचल हमारे लिए एक उदाहरण है कि कैसे वहां कृषि को फलों की तरफ मोड़कर समृद्धि हासिल की गई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की 5.1 प्रतिशत आबादी घटी है।

(Pahad ke Mudde) पहले कुल जनसंख्या का ज्यादातर अनुपात गांवों में रहता था, लेकिन पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो गए हैं। ग्रामीण आबादी शहरी क्षेत्र की तरफ सिमट रही है। स्वास्य की समस्या से पहाड़ जूझ रहा है। डॉक्टर तो हैं नहीं साथ ही पैरामेडिकल और फाम्रेसी स्टाफ की भी बेहद कमी है। 108 एंबुलेंस हमारे लिए जीवनदायनी जरूर साबित हुई पर पीपीपी मॉडल का यह खेल बहुत से सवाल भी छोड़ता है।

(Pahad ke Mudde) तीर्थ स्थल गौरवान्वित महसूस कराते हैं, मगर यह पूरा सिस्टम इतना अव्यवस्थित है कि इससे अच्छा रोजगार नहीं जुटाया जा सका है। युवा पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाती है और वहीं की होकर रह जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 17793 गांवों में से 1053 गांव पूरी तरह से वीरान हो चुके हैं। अन्य 405 गांवों में लगभग 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। 2013 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से गांवों से पलायन का ग्राफ बढ़ गया है।

(Pahad ke Mudde) सरकार की योजना जुलाई अंत तक पर्वतीय क्षेत्रों में डक्टरों की तैनाती सुनिचित करने के लिए उत्तराखंड में 2700 डक्टर लाने की है। इसके लिए तमिलनाडु, उड़ीसा व महाराष्ट्र आदि राज्यों से डॉक्टर लेने की तैयारी चल रही है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए 13 नये क्षेत्र खोले जा रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि बहुत ही कम युवा आज की तारीख में गांवों की तरफ रुख कर रहे हैं?

(Pahad ke Mudde) राज्य सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है, जिसके तहत यहां का युवा पहाड़ के विकास के लिए काम करे। आज उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कठिन जिंदगी से मुक्ति की जिंदगी को पलायन का नाम दिया जाता है। यदि इसी प्रकार पलायन बढ़ता गया तो गांवों में इंसान नहीं जानवर देखने को मिलेंगे। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गढ़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन।                                                                ♦♦♦ आशीष रावत

तीन करोड़ प्रवासी उत्तराखंडियों की ‘घर वापसी’ कराएगा आरएसएस !

-प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विदेशों में बसे भारतवंशियों से किए जा रहे आह्वान की तर्ज पर उत्तराखंडियों से किया जाएगा वर्ष में एक सप्ताह अपने गांव आने का आह्वान करते हुए शुरू की ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना
-संघ ने इस कार्य हेतु 670 गांवों में तैनात कर दिए हैं संयोजक

(Pahad ke Mudde) नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य की वर्ष 2011 में हुई जनगणना में आबादी एक करोड़ एक लाख 16 हजार 752 है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि इससे तीन गुना उत्तराखंडी पलायन कर चुके हैं। इनमें से 30-35 लाख उत्तराखंडी प्रवासी तो अकेले दिल्ली में ही हैं, जबकि अमेरिका, जापान, यूएई सहित दुनिया भर में फैले हुए हैं। जापान जैसे छोटे देश में भी संघ के अनुसार करीब 35 हजार उत्तराखंडी रहते हैं।

(Pahad ke Mudde) संघ अब इन लोगों को वर्ष में कम से कम एक बार सप्ताह भर के लिए अपने मूल गांव वापस लाने का खाका बुन रहा है। इस हेतु संघ ने ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना शुरू की है। योजना के तहत प्रदेश की 670 न्याय पंचायतों में संयोजक तैनात कर दिए हैं, जिन्हें प्रवासियों को गाँव लौटाने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रचारक डा. हरीश कहते हैं कि पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है। इसकी वजह से इस सीमांत राज्य के गांव के गांव खाली हो रहे हैं। इससे देश की सीमाएं भी खाली और सामरिक दृष्टिकोण से कमजोर होती जा रही हैं। पहाड़ को पलायन के अभिशाप से मुक्त कराने के लिए यह पहल की जा रही है। गत दिनों दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना की शुरुआत की है।

(Pahad ke Mudde) खास बात यह भी है डा। हरीश ही इस योजना के योजनाकार हैं, और उत्तराखंड से हैं, लिहाजा उत्तराखंड पर इस योजना का सबसे ज्यादा फोकस है। योजना के तहत उत्तराखंड के तीन करोड़ प्रवासियों को पीएम मोदी के भारतवंशियों से अपने विदेश दौरों में किए जा रहे आह्वान की तरह एक सप्ताह के लिए अपने घर आने का आह्वान किया जाएगा। प्रवासी घर आएंगे तो अपने गांव, घर, क्षेत्र को कुछ तो देकर जाएंगे।

(Pahad ke Mudde) इससे एक ओर उनके गांवों में पसरा सन्नाटा टूटेगा, और इस पहल के तहत यदि पांच हजार प्रवासी भी गांवों में आए तो उनकी आवाजाही से 10 से 15 करोड़ रुपये की आर्थिकी विकसित होगी। साथ ही वह यहां से कोंदो, झंगोरा, गहत, राजमा, काला भट्ट, मसूर सरीखी पहाड़ी दालों जैसी गांव की वनस्पतियों, दाल, फल, सब्जियों को वापस ले जाएंगे। इन स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ेगी तो लोग उसका और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित होंगे, और स्थानीय लोगों का भी गांवों के प्रति लगाव बढ़ेगा।

विकट है उत्तराखंड में पलायन की स्थिति

(Pahad ke Mudde) नैनीताल। वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार पिछले एक दशक में 78 गांव गैर-आबाद हो चुके हैं, और यह संख्या 1143 तक पहुंच गई है। वहीं इस दौरान राज्य के दो जनपदों, अल्मोड़ा की आबादी 1.73 फीसद और पौड़ी की 1.51 फीसद बढ़ने के बजाए घट गई है, जबकि अन्य पहाड़ी जिलों चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर की आबादी भी पांच फीसद से भी कम की रफ्तार से बढ़ी है,

(Pahad ke Mudde) वहीं इसके उल्टे राज्य के मैदानी जिलों, ऊधम सिंह नगर की आबादी 33.40, हरिद्वार 33.16 की, देहरादून की 32 और नैनीताल की आबादी 25 फीसद की रफ्तार से बढ़ी है। जबकि प्रदेश की आबादी के बढ़ने की औसत दशकीय दर 16 और देश की 17 फीसद है। वहीं योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार करीब 9 .3 फीसद की विकास दर वाले राज्य में पहाड़ के करीब 32.8 9 लाख ग्रामीण 17 रुपए से कम में दिन का गुजारा करने को मजबूर हैं।

(Pahad ke Mudde) वहीं स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो मैदान में आपातकाल में रोगी के डॉक्टर तक पहुंचने के 20 मिनट के औसत समय के मुकाबले पहाड़ पर यह समय 4 घंटा 48 मिनट है। वहीं राज्य के करीब 16 हजार गांवों में 45 हजार से अधिक स्वयं सेवी संस्थाएं कहने भर को कार्य कर रहे हैं।

पलायन : वर्ष 2017 में 7,000 भारतीय करोड़पति हो गए विदेशों में शिफ्ट
नयी दिल्ली, 04 फरवरी। देश से बाहर जाने वाले करोड़पतियों की संख्या में 2017 में 16% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान 7,000 ऊंची नेटवर्थ वाले भारतीयों ने अपना स्थायी निवास (डोमिसाइल) बदल लिया। यह चीन के बाद विदेश चले जाने वाले करोड़पतियों की दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रपट के अनुसार 2017 में 7,000 करोड़पतियों ने अपना स्थायी निवास किसी और देश को बना लिया।

(Pahad ke Mudde) वर्ष 2016 में यह संख्या 6,000 और 2015 में 4,000 थी। वैश्विक स्तर पर 2017 में 10,000 चीनी करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला था। अन्य देशों के अमीरों का अपने देश से दूसरे देश में बस जाने की संख्या में तुर्की के 6,000, ब्रिटेन के 4,000, फ्रांस के 4,000 और रुस के 3,000 करोड़पतियों ने अपना डोमिसाइल बदला है।

(Pahad ke Mudde) स्थायी निवास बदलने के रुख के मुताबिक भारत के करोड़पति अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड गए हैं जबकि चीनी करोड़पतियों का रुख अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की ओर है।

पहाड़ के नेता भी मैदानों को कर गये ‘पलायन’

-मौजूदा विस चुनाव में ‘रणछोड़’ नेताओं में सीएम हरीश रावत, किशोर उपाध्याय  और मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत प्रमुख रूप से शामिल -कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, हरक, अमृता भी कर चुके हैं अपनी पर्वतीय सीटों से मैदानों की ओर पलायन -एक दौर में यूपी के सीएम चंद्रभान गुप्ता ने पहाड़ की रानीखेत विधानसभा से लड़ा था चुनाव -अब जनता पर कि ‘रणछोड़” नेताओं को सबक सिखाती है कि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल उच्च न्यायालय में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में 12 नवंबर 2014 को अधिवक्ताओं के बीच पलायन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए कहा था, ‘तो क्या पहाड़ पर बुल्डोजर चला दूं। प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ पर तैनाती के आदेशों पर ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं, मानो किसी ने उनके मुंह में नींबू डाल दिया हो…”

(Pahad ke Mudde) उनका तात्पर्य पहाड़ों पर बुल्डोजर चलाकर उन्हें मैदान कर देने से था, ताकि पहाड़-मैदान में असुविधाओं का भेद मिट जाये। लेकिन इस वक्तव्य के करीब सवा दो वर्ष बाद ही उनकी अगुवाई में ही जब उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो स्वयं रावत ही अपनी धारचूला सीट छोड़कर दो-दो मैदानी सीटों-किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण सीटों पर पलायन कर गये हैं।

(Pahad ke Mudde) यही नहीं उनकी पार्टी के प्रमुख किशोर उपाध्याय भी अपनी, दो बार 2002 व 2007 में विजय दिलाने वाली पहाड़ की परंपरागत टिहरी सीट छोड़कर सहसपुर उतरते हुए पहाड़ों के ‘रणछोड़’ साबित हुये हैं। साथ ही मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत भी अपनी परंपरागत साल्ट सीट छोड़कर रामनगर उतर आये हैं। 

(Pahad ke Mudde) जबकि एक दौर में पूर्ववर्ती राज्य यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता (1967 में) पहाड़ की रानीखेत सीट से चुनाव लड़े और जीते थे, और अकबर अहमद डम्पी जैसी मैदानी नेता भी राज्य बनने से पूर्व पहाड़ से चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं करते थे। जबकि अपने गोविन्द बल्लभ पन्त बरेली,  हेमवती नन्दन बहुगुणा बारा और नारायण दत्त तिवारी काशीपुर की मैदानी सीटों से चुनाव लड़ते रहे।

गौरतलब है कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में जनाक्रोश भड़कने और लोगों के आंदोलित होने में पलायन की गंभीर समस्या सर्वप्रमुख थी। लेकिन पलायन का मुद्दा राज्य बनने के बाद पहली बार 2001 में हुई जनगणना में ही पहाड़ की जनसंख्या के बड़े पैमाने पर मैदानों की ओर पलायन करने से हाशिये पर आना शुरू गया। यहां तक कि राज्य में 2002 के बाद पांच वर्ष के भीतर ही 2007 में दूसरी बार विस सीटों का परिसीमन न केवल बिना किसी खास विरोध के हो गया,

(Pahad ke Mudde) वरन नेता मौका देख कर स्वयं ही नीचे मैदानों की ओर सीटें तलाशने लगे। 2007 के नये परिसीमन के तहत पहाड़ों का पिछड़ेपन, भौगोलिक व सामाजिक स्थिति की वजह से मिली छूटें छीन ली गयीं, और पहाड़ की छह विस सीटें घटाकर मैदान की बढ़ा दी गयीं। पहली बार नये परिसीमन पर हुए 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (अब भाजपा) नेता डा. हरक सिंह रावत व अमृता रावत सहित कई नेता पहाड़ छोड़कर मैदानी सीटों पर ‘भाग’ आये।

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इस सूची में यशपाल आर्य भी शामिल हो मुक्तेश्वर छोड़ बाजपुर आ गये, अलबत्ता इस बार पुत्र संजीव आर्य को नैनीताल भेजकर उन्होंने एक तरह से पहाड़ के प्रति कुछ हद तक सम्मान का परिचय दिया है। अमृता के पति सतपाल महाराज भी कुछ इसी तरह पहाड चढ़ गये हैं। इस बीच भाजपा नेता प्रकाश पंत भी पिथौरागढ़ के साथ मैदान पर उतरे तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा से भिड़ने के नाम पर सितारगंज उतर आये थे,

(Pahad ke Mudde) और आगे लालकुआ में भी करीब दो वर्ष ‘राजनीतिक जमीन’ तलाशने में नाकामी के बाद वापस पिथौरागढ़ लौटने को मजबूर हुए हैं, जबकि बहुगुणा ने बेटे सौरभ के साथ सितारगंज में ही जड़े गहरी करने की ठानी है। बहरहाल, अब जनता को तय करना है कि वे अपने पहाड़ के इन ‘रणछोड़’ नेताओं का क्या भविश्य तय करती है। याकि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है।

बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे पहाड़ की उपेक्षा करने में

नैनीताल। पहाड़ की उपेक्षा करने में पहाड़ के बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे। यहां तक कहा जाता है कि पहाड़ के कई बड़े नेता अलग पर्वतीय राज्य का इसलिये विरोध करते थे कि इससे कहीं उनकी पहचान भी छोटे राज्य की तरह सिमट न जाये।

(Pahad ke Mudde) वहीं लोक सभा चुनावों में भी कांग्रेस के बड़े हरीश रावत से लेकर दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अपनी परंपरागत सीट छोड़कर हरिद्वार तो भाजपा के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत को नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट पर उतरने से कोई गुरेज नहीं रहा।

(Pahad ke Mudde) वहीं एक अन्य पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी पहाड़ के होते हुए भी कमोबेश हमेशा ही मैदानी सीटों से चुनाव लड़े। कुछ इसी तरह पर्वत पुत्र कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को भी पहाड़ की बजाय मैदानी सीटें ही अधिक रास आर्इं।

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