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18 साल बाद उत्तराखंड पुलिस की नियमावली तैयार, पुलिसकर्मियों के लिए बहुत कुछ होगा खास

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नैनीताल, 27 अक्तूबर 2018। 18 साल के लंबे इंतजार के बाद उत्तराखंड पुलिस नियमावली बनकर तैयार हो गई हैं। इसी के साथ कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक के प्रमोशन का रास्ता साफ हो गया हैं। नियमावली न बन पाने के कारण काफी समय से कई सौ पुलिस कर्मियों के प्रमोशन अटके हुए थे। नियमावली आने के बाद नवंबर माह के अंत तक विभागीय प्रमोशन प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद जग गई हैं।

उत्तराखंड बनने के बाद पुलिस महकमे की नियमावली नहीं बन पाई थी। विभागीय प्रमोशन प्रक्रिया पुलिस स्थापना कमेटी के माध्यम से होते रहे हैं। पुलिस नियमावली न होने के चलते अधिकांश प्रमोशन प्रक्रिया को पुलिसकर्मी कोर्ट में चुनौती देते रहे हैं। इस कारण कई पदाें की प्रमोशन प्रक्रिया कई-कई साल उलझी रही हैं। लंबे समय से पुलिस नियमावली तैयार करने की कवायद चल रही थी। अब त्रिवेंद्र रावत सरकार में पुलिस नियमावली बनकर तैयार हुई हैं। कांस्टेबल, उप निरीक्षक, इंस्पेक्टर की नियमावली पर सरकार की मुहर लग चुकी है। हेड कांस्टेबल की नियमावली में थोड़ा सुधार अपेक्षित हैं। पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों के मुताबिक नियमावली तैयार होने के बाद विभाग में 600 कांस्टेबल, 70 हेड कांस्टेबल, 37 दारोगा और करीब 50 इंस्पेक्टरों के प्रमोशन का रास्ता साफ हो गया है।

प्रमोशन के बाद होगी सिपाहियों की भर्ती

पुलिस और पीएसी के कांस्टेबलों को बड़ी संख्या में प्रोन्नति मिलने के बाद प्रदेश भर में कांस्टेबल के छह सौ ज्यादा पद रिक्त होने का अनुमान है। ऐसे में नई भर्ती कर कांस्टेबल के पदों को भरा जाएगा। पुलिस मुख्यालय प्रमोशन प्रक्रिया पूरी करने के बाद शासन को कांस्टेबलों की भर्ती का प्रस्ताव भेजेगा।

मिनिस्ट्रीयल स्टाफ को करना होगा इंतजार 
पीएसी और पुलिस महकमे के मिनिस्ट्रीयल स्टाफ की नियमावली बननी बाकी हैं। पीएसी की नियमावली तो शासन में विचाराधीन है, जबकि मिनिस्ट्रीयल स्टाफ की नियमावली बनने में अभी थोड़ा समय लगेगा।

253 फायर कर्मियों की होगी भर्ती
अग्निशमन विभाग में फायर कर्मियों की कमी को भी पूरा किया जाएगा। शासन ने हाल में रिक्त चल रहे 253 फायर कर्मियों के पदों पर भर्ती को स्वीकृति प्रदान कर दी है। निकाय चुनाव के बाद फायर कर्मियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही हैं।

पुलिस नियमावली बनकर तैयार हो गई हैं। निकाय चुनाव की आचार संहिता हटने के बाद कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, उप निरीक्षक और इंस्पेक्टर के प्रमोशन की प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाएगा। महकमे में बड़े पैमाने पर प्रमोशन प्रस्तावित हैं। हेड कांस्टेबल की नियमावली को संशोधन के साथ स्वीकृति के लिए भेजा गया हैं।
जीएस मत्तोलिया, पुलिस महानिरीक्षक कार्मिक

यह भी पढ़ें : पुलिस सुधार-पुलिस के काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने का हाईकोर्ट का आदेश लागू करना दूर की कौड़ी

राष्ट्रीय सहारा, 18 मई 2018

-इसी कारण आदेशों पर राज्य के पुलिस कर्मियों में नहीं दिख रहा है खास उत्साह, उन्हें उम्मीद नहीं है कि राज्य सरकार इसे लागू कर पाएगी
नवीन जोशी, नैनीताल, 17 मई 2018। नैनीताल उच्च न्यायालय के राज्य पुलिस सुधार आयोग की 2012 में आई सिफारिशें लागू करने के सरकार को दिये गये आदेशों को लागू करने के लिए तीन माह का समय दिया है, लेकिन आसान नहीं लगता है। खासकर उत्तराखंड पुलिस के काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने का आदेश लागू करना तो बहुत दूर की ही कौड़ी होगा। कारण, उत्तराखंड पुलिस में मौजूदा जरूरतों, यानी जब पुलिस कर्मी दिन के 24 घंटे कार्य करने के लिए पाबंद हैं, तब 1500 से अधिक स्वीकृत पद ही रिक्त पड़े हैं, जबकि मौजूदा जरूरतों के लिहाज से भी इसके कम से कम दोगुने पुलिस यानी 3000 कर्मियों की आवश्यकता है। और यदि राज्य सरकार नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेशों पर राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशें लागू करती है तो आठ-आठ घंटे की तीन शिफ्टों के लिए 3 गुना अधिक पुलिस कर्मियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो कार्मिकों को वेतन देने के लिए सरकार के समक्ष आ रही कर्ज लेने की मजबूरी की स्थितियों में आसान नहीं लगता।

एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में पुलिस महकमे में पांच लाख पद रिक्त हैं। इसका असर पुलिसिंग पर पड़ रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से रिक्त पदों का ब्यौरा तलब किया है। उत्तराखंड पुलिस में भारतीय पुलिस सेवा, प्रांतीय पुलिस सेवा समेत सभी पदों को मिलाकर 27,442 पद हैं। इन पदों के सापेक्ष 26 हजार पदों पर कर्मचारी तैनात हैं। ऐसे में मौजूदा समय में रिक्त पदों की संख्या तकरीबन डेढ़ हजार है।
यही कारण है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के ताजा आदेश ऊपरी तौर पर खासे आकर्षक नजर आने के बावजूद राज्य के पुलिस कर्मियों में खास उत्साह पैदा नहीं कर पाये हैं। पुलिस कर्मियों को उम्मीद नहीं है कि पुलिस इन आदेशों को लागू कर पायेगी। अलबत्ता उन्हें केवल इतना लगता है कि सरकार उन्हें उच्च न्यायालय के आदेशों पर वर्ष भर में 30 दिनों की जगह 45 दिनों का अतिरिक्त वेतन दे सकती है। इससे आरक्षियों को प्रतिवर्ष लगभग 14000, उपनिरीक्षकों को 18 हजार और निरीक्षकों को 22000 रुपयों का लाभ होगा, और सरकार पर करीब 28 करोड़ का प्रतिवर्ष अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। कुमाऊं परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक पूरन सिंह रावत ने भी माना कि आदेशों को लागू करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। अलबत्ता, उम्मीद जताई कि सरकार कोई बीच का रास्ता निकाल सकती है।

कुमाऊं परिक्षेत्र में 544 पद हैं रिक्त
नैनीताल। कुमाऊं परिक्षेत्र में निरीक्षक के स्वीकृत 56 में से 23, उप निरीक्षक नागरिक पुलिस के 297 में से 54, उप निरीक्षक सशस्त्र पुलिस के 14 में से 7, मुख्य आरक्षी नागरिक पुलिस के 393 में से 120, सशस्त्र पुलिस के 343 में से 64, आरक्षी सशस्त्र पुलिस के 1330 में से 250 व लिपिक संवर्ग के 79 में से 26 यानी कुल 544 पद रिक्त हैं। वहीं आरक्षी नागरिक पुलिस के 3182 स्वीकृत पदों पर अभी हाल में राज्य को मिली 700 में से 370 महिला आरक्षियों की नियुक्ति पदों को बढ़ाए बिना भविष्य में होने वाली रिक्तियों के सापेक्ष तैनात किये गये हैं। यही स्थित उपनिरीक्षक के पदों पर भी है, जहां 140 महिला उपनिरीक्षकों की तैनाती की गयी है।

उपलब्ध पदों के एक तिहाई पुलिस कर्मी ही हैं थानों में तैनात
नैनीताल। पुलिस महकमे की मौजूदा स्थितियों को देखें तो जितने पुलिस कर्मी जिलों में तैनात हैं, उनके एक तिहाई ही थानों पर रहकर अपना मूल कार्य कर पा रहे हैं। पुलिस से ही जुड़े सूत्रों ने उदाहरण के तौर पर बताया कि नैनीताल जिले में करीब 2100 पुलिस कर्मी तैनात हैं, इनमें से करीब 1250 नागरिक पुलिस व 850 सशस्त्र एवं एलआईयू, अग्निशमन, रेडियो व लिपिक संवर्ग आदि में कार्यरत हैं। नागरिक पुलिस के 1250 पदों में से करीब आधे कर्मी थानों-कोतवालियों व चौकियों से इतर नित नये खुल रहे विभिन्न प्रकोष्ठों (सेलों), एसआईटी, हाईकोर्ट, जीआरपी, सीपीयू, पुलिस मुख्यालय एवं कुमाऊं परिक्षेत्र कार्यालय आदि में संबद्ध हैं। ऐसे में केवल 700 के करीब पुलिस कर्मियों पर ही जनपद की 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 9.55 लाख व वर्तमान में करीब 11 लाख की जनसंख्या की सुरक्षा व कानून व्यवस्था बनाये रखने का बोझ है।

आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक में पहले से हैं प्राविधान
नैनीताल। पुलिस कर्मियों को आठ घंटे ही नौकरी कराने के प्राविधान देश के आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक आदि राज्यों की पुलिस नियमावली में पहले से हैं, बावजूद वहां भी इसका पालन नहीं हो पा रहा है। देश में केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की पुलिस में ही आंशिक तौर पर यह व्यवस्था लागू हो पा रही है। अलबत्ता संबंधित याचिका के अनुसार केरल और मध्य प्रदेश के पांच पुलिस थानों में इस प्रयोग के बेहतर परिणाम देखने को मिले हैं, तथा मेघालय व पंजाब में इसके लिए पहल हुई हैं, लेकिन उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में इस संबंध में कोई प्राविधान नहीं हैं।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों के तहत दिए 12 बड़े निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरत शर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता अरूण भदौरिया की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद प्रदेश में राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों के तहत पुलिस कर्मियों के कल्याण के लिये राज्य सरकार को पुलिस एक्ट व पुलिस कर्मियों के बाबत 10 बड़े आदेश-निर्देश दिए हैं। यह निर्देश हैं : 

  1. सरकार को दिए पुलिस एक्ट में बदलाव करने के निर्देश
  2. पुलिस कर्मियों से रोजाना आठ घंटे से अधिक काम न लेने के निर्देश
  3. कठिन ड्यूटी करने पर 45 दिन का अतिरिक्त वेतन देने के निर्देश
  4. पुलिसकर्मी को करियर के दौरान तीन प्रमोशन जरूरी
  5. तीन माह में पुलिस अतिरिक्त (कॉर्पस) फंड का गठन करने के निर्देश
  6. पुलिसकर्मियों की हर तीन महीने के भीतर स्वास्थ्य जांच हो
  7. पुलिस विभाग में योग्य चिकित्सकों खासकर पुलिस कर्मियों के तनाव को दूर करने के लिये मनोचिकित्सकों की भी नियुक्ति करे सरकार
  8. ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को मिले मास्क व अन्य आवश्यक सुविधायें और गर्मी में आवश्यक अंतराल में ब्रेक देने के निर्देश
  9. पुलिस कर्मियों की आवासीय सुविधा में सुधार करें
  10. पुलिस वालों के रहने के लिए बनाई जाए हाउसिंग स्कीम
  11. खाली पदों को भरने के लिये विशेष चयन बोर्ड गठित करने के निर्देश
  12. पुलिस थानों में हो जिम और स्वीमिंग पूल की व्यवस्था

उल्लेखनीय है कि इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से मार्च 2013 में प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र दिया था। साथ ही प्रदेश मानवाधिकार आयोग में भी मामला दायर किया था। उसके बाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा था।

आज से इतिहास हो गई शेरशाह सूरी के जमाने की ‘गांधी पुलिस’ और ‘गाँधी’ !!

प्रदेश में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नाम से ‘गाँधी पुलिस’ कही जाने वाली 150 वर्षों से चली आ रही राजस्व पुलिस व्यवस्था अब इतिहास बन जाएगी। और इसके साथ लगता है कि गाँधी के ‘अहिंसात्मक’ सन्देश भी कहीं पीछे छूट जायेंगे। उत्तराखंड उच्च न्यायलय नैनीताल ने राजस्व पुलिस को तफ्तीश व कार्यवाही में असफल बताते हुए पूरे प्रदेश को सिविल पुलिस व्यवस्था के तहत लाने का आदेश दिया है। इधर शुक्रवार (12 जनवरी 2018) को नैनीताल हाईकोर्ट ने टिहरी जनपद के दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई करते हुए राजस्व पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े  किये और राज्य सरकार को छह महीने के अंदर इस व्यवस्था को खत्म करने के निर्देश दिये। जस्टिस राजीव शर्मा  व आलोक सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला दिया है। बताते चलें कि वर्ष 2013 में केदारनाथ व प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र  में आई आपदा के दौरान भी राजस्व पुलिस की कार्यशैली व क्षमता पर सवाल खड़े हुए थे और सरकार ने क्रमिक रूप से इस व्यवस्था को खत्म करने और उसके स्थान पर सिविल पुलिस का दायरा बढाने की नीति बनाई थी। त्यूनी थाने और कई पुलिस चौकियों को इसी उद्देश्य से गठित किया गया था। तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने भी राजस्व पुलिस को खत्म करने की सलाह सरकार को दी थी।

ऐतिहासिक संदर्भों की बात करें तो देश में ग्रांड ट्रंक रोड के निर्माता अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के दौर में उनके दरबार में भूलेख के मंत्री राजा टोडरमल के द्वारा जमीन संबंधी कार्याे के सम्पादन के लिये पटवारी पद की स्थापना की गयी थी। बाद में मुगह शहंशाह अकबर ने भी इस प्रणाली को बढ़ावा दिया। ब्रितानी शासनकाल के दौरान इसमें मामूली परिवर्तन हुये यह प्रणाली जारी रही। उत्तराखंड में हाथ में बिना लाठी-डंडे के तकरीबन गांधी जी की ही तरह गांधी पुलिस भी कहे जाने वाले यह जवान देश आजाद होने और राज्य अलग होने के बाद भी अब तक उत्तराखण्ड राज्य के पर्वतीय भू भाग में शान्ति व्यवस्था का दायित्व सम्भाले हुऐ थे। लेकिन इधर अपराधों के बढने के साथ बदले हालातों में राजस्व पुलिस के जवानों ने व्यवस्था और वर्तमान दौर से तंग आकर स्वयं भी इस दायित्व का परित्याग कर दिया था।

1857 में जब देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम यानी गदर लड़ा जा रहा था, तत्कालीन हुक्मरान अंग्रेजों को पहली बार देश में कानून व्यवस्था और शान्ति व्यवस्था बनाने की सूझी थी। अमूमन पूरे देश में उसी दौर में पुलिस व्यवस्था की शुरूआत हुई, लेकिन उत्तराखण्ड के पहाड़ों के लोगों की शान्ति प्रियता, सादगी और अपराधों से दूरी ने अंग्रेजों को अत्यधिक प्रभावित किया था, सम्भवतया इसी कारण अंग्रेजों ने 1861 में यहां अलग से ‘कुमाऊँ रूल्स” के तहत पूरे देश से इतर ‘बिना शस्त्रों वाली” गांधी जी की ही तरह केवल लाठी से संचालित ‘राजस्व पुलिस व्यवस्था” शुरू की, जो बाद में देश में ‘गांधी पुलिस व्यवस्था” के रूप में भी जानी गई। इस व्यवस्था के तहत पहाड़ के इस भूभाग में पुलिस के कार्य भूमि के राजस्व सम्बंधी कार्य करने वाले राजस्व लेखपालों को पटवारी का नाम देकर ही सोंप दिऐ गऐ। पटवारी, और उनके ऊपर के कानूनगो व नायब तहसीलदार जैसे अधिकारी भी बिना लाठी-डंडे के ही यहां पुलिस का कार्य संभाले रहे। गांवों में उनका काफी प्रभाव होता था, और उन्हें सम्मान से अहिंसावादी गांधी पुलिस भी कहा जाता था। कहा जाता था कि यदि पटवारी क्या उसका चपरासी यानी सटवारी भी यदि गांव का रुख कर ले तो कोशों दूर गांव में खबर लग जाती थी, और ग्रामीण डर से थर-थरा उठते थे।

एक किंवदन्ती के अनुसार कानूनगो के रूप में प्रोन्नत हुऐ पुत्र ने नई नियुक्ति पर जाने से पूर्व अपनी मां के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा तो मां ने कह दिया, `बेटा, भगवान चाहेंगे तो तू फिर पटवारी ही हो जाएगा´। यह किंवदन्ती पटवारी के प्रभाव को इंगित करती है।

कहते हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में पुलिस खर्च का बजट कम रखने के उद्देश्य से यह व्यवस्था की थी। इसके तहत पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी ही पुलिस, दरोगा व इंस्पेक्टर का काम काज देखते हैं। आईपीसी के आरोपियों की गिरफ्तारी व उन्हें जेल भेजने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। आज की तारीख में भी प्रदेश के 65 फीसदी इलाके में अपराध नियंत्रण, राजस्व संबंधी कार्यों के साथ ही वन संपदा की हकदारी का काम पटवारी ही संभाल रहे हैं।लेकिन अब यह व्यवस्था खत्म होने वाली है।

पूर्व आलेख : ‘तदर्थ” आधार पर चल रही प्रदेश की राजस्व व्यवस्था

नवीन जोशी, नैनीताल। अंग्रेजों से भी पहले मुगल शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल से देश में शुरू हुई और खासकर उत्तराखंड में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर से सफलता से चल रही ‘गांधी पुलिस” के रूप में शुरू हुई राजस्व पुलिस व्यवस्था कमोबेश ‘तदर्थ” आधार पर चल रही है। प्रदेश के संपूर्ण राजस्व क्षेत्रों में पुलिस कार्य संभालते आ रहे पटवारियों ने बीते वर्ष दो अक्टूबर से पुलिस कार्यों का बहिस्कार किया हुआ है, जबकि उनसे ऊपर के कानूनगो, नायब तहसीलदार व तहसीलदार के अधिसंख्य पद रिक्त हैं। और जो भरे हैं वह, तदर्थ आधार पर भरे हैं। शुक्रवार (22.01.2015) को उत्तराखंड सरकार के इस मामले में पटवारियों के लिए ‘नो वर्क-नो पे” की कार्रवाई करने के फरमान से व्यवस्था की कलई खुलने के साथ ही सरकार की कारगुजारी भी सामने आने की उम्मीद बनती नजर आ रही है।
कुमाऊं मंडल की बात करें तो यहां 325 लेखपालों में से 204 एवं पटवारियों के 410 पदों में से 82 रिक्त हैं। आज से भी उनकी भर्ती की कवायद शुरू हो तो वह 30 जून 2016 के बाद ही मिल पाएंगे, और तब तक रिक्तियां क्रमश: 212 और 123 हो जानी हैं। इसी तरह नायब तहसीलदारों के 60 में से 14 तथा तहसीलदारों के 49 में से 33 पद रिक्त पड़े हैं। यही नहीं इन पदों पर जो लोग कार्यरत हैं, वह भी पिछले दो वर्ष से डीपीसी न हो पाने के कारण तदर्थ आधार पर कार्य करने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि उनकी तदर्थ नियुक्ति में डीपीसी होने पर दो वर्ष पुरानी ही तिथि से नियुक्ति माने जाने का उल्लेख है, किंतु इस दौरान नई नियुक्ति पर आए कर्मी उन्हें खुद से जूनियर बता रहे हैं। ऐसे में उनका मनोबल टूट रहा है। प्रदेश में 2006 से पटवारियों की नई भर्तियां नहीं हुई हैं, जबकि इनका हर वर्ष, अगले दो वर्ष की रिक्तियों का पहले से हिसाब लगाकर भर्ती किये जाने का प्राविधान है।

अब पटवारी खुद नहीं चाहते खुद की व्यवस्था, चाहते हैं पुलिस की तरह थानेदार बनना

-1857 के गदर के जमाने से चल रही पटवारी व्यवस्था से पटवारी व कानूनगो पहले ही हैं विरत
-पहले आधुनिक संसाधनों के लिए थे आंदोलित, सरकार के उदासीन रवैये के बाद अब कोई मांग नहीं
-हाईटेक अपराधियों और सरकार की अनसुनी के आगे हुए पस्त
नवीन जोशी, नैनीताल। अंग्रेजों से भी पहले मुगल शासक शेर शाह सूरी के शासनकाल से देश में शुरू हुई और उत्तराखंड में खासकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर से सफलता से चल रही ‘गांधी पुलिस” व्यवस्था बीती दो अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन से कमोबेश इतिहास ही बन गई है। पूरे देश से इतर राज्य के 65 फीसदी पर्वतीय हिस्से में राजस्व संबंधी कार्यों के साथ ही अपराध नियंत्रण और पूर्व में वन संपदा की हकदारी का काम भी संभालने वाले पटवारियों ने अपने बस्ते अपने जिलों के कलक्ट्रेटों में जमा करा दिए हैं, और मौजूदा स्थितियों में खुद भी अपनी व्यवस्था के तहत कार्य करने से एक तरह से हाथ खड़े कर दिए हैं। सवालिया तथ्य यह भी है कि इतनी बड़ी व्यवस्था के ठप होने के बावजूद शासन व सरकार में इस मामले में कोई हरकत नजर नहीं आ रही है।

लेकिन बदले हालातों और हर वर्ग के सरकारी कर्मचारियों के कार्य से अधिक मांगों पर अड़ने के चलन में पटवारी भी कई दशकों तक बेहतर संसाधनों की मांगों के साथ आन्दोलित रहे। उनका कहना था कि वर्तमान गांवों तक हाई-टेक होते अपराधों के दौर में उन्हें भी पुलिस की तरह बेहतर संसाधन चाहिऐ, लेकिन सरकार ने कुछ पटवारी चौकियां बनाने के अतिरिक्त उनकी एक नहीं सुनी। यहाँ तक कि वह 1947 की बनी हथकडि़यों से ही दुर्दांत अपराधियों को भी गिरफ्त में लेने को मजबूर थे। 2010 में  40-40 जिप्सियां व मोटर साईकिलें मिलीं भी तो अधिकाँश पर कमिश्नर-डीएम जैसे अधिकारियों ने तक कब्ज़ा जमा लिया। 1982 से पटवारियों को प्रभारी पुलिस थानाध्यक्ष की तरह राजस्व पुलिस चौकी प्रभारी बना दिया गया, लेकिन वेतन तब भी पुलिस के सिपाही से भी कम था। अभी हाल तक वह केवल एक हजार रुपऐ के पुलिस भत्ते के साथ अपने इस दायित्व को अंजाम दे रहे थे। उनकी संख्या भी बेहद कम थी।प्रदेश के समस्त पर्वतीय अंचलों के राजस्व क्षेत्रों की जिम्मेदारी केवल 1250 पटवारी, उनके इतने ही अनुसेवक, 150 राजस्व निरीक्षक यानी कानूनगो और इतने ही चेनमैन सहित कुल 2813 राजस्व कर्मी सम्भाल रहे थे। इनमें से कुमाऊं मंडल में 408 पद हैं, जिनमें से 124 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। इस पर पटवारियों ने मई 2008 से पुलिस भत्ते सहित अपने पुलिस के दायित्वों का स्वयं परित्याग कर दिया। इसके बाद थोड़ा बहुत काम चला रहे कानूनगो के बाद पहले 30 मार्च 2010 से प्रदेश के रहे सहे नायब तहसीलदारों ने भी पुलिस कार्यों का परित्याग कर दिया था, जबकि इधर बीती दो अक्टूबर से एक बार फिर गांधी पुलिस के जवानों ने गांधी जयंती के दिन से अपने कार्य का परित्याग कर दिया है। खास बात यह है कि उनकी अब कोई खास मांग भी नहीं है। मंडलीय अध्यक्ष कमाल अशरफ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्थाओं, सुविधाओं से वर्तमान हाई-टेक अपराधियों के दौर में कार्य कर पाना संभव नहीं है। अच्छा हो कि चार-पांच पटवारी सर्किलों को जोड़कर नागरिक पुलिस के थाने-कोतवाली जैसी कोई व्यवस्था ही कर दी जाए। कुमाऊं परिक्षेत्र के पुलिस डीआईजी गणेश सिंह मर्तोलिया ने कहा कि जब तक राजस्व पुलिस कार्य से विरत है, नागरिक पुलिस कार्य करने को तैयार नहीं है।

1.5 करोड़ में करते हैं 400 करोड़ का काम

नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने कुछ समय पूर्व एक मुलाकात में इस प्रतिनिधि को साफगोई से बताया कि पूरे प्रदेश में राजस्व पुलिस व्यवस्था पर करीब केवल 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जबकि इसकी जगह यदि नागरिक पुलिस लगाई जाए तो 400 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यही बड़ा कारण है कि राज्य सरकार राजस्व पुलिस व्यवस्था को जारी भी रखना चाहती है, लेकिन उनकी सुन भी नहीं रही, यह सवालिया निशान खड़े करता है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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