Court News News

सुबह का सुखद समाचार : 26 लोग राज्य आंदोलनकारी घोषित

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 मई 2022। बागेश्वर के 26 लोग राज्य आंदेलनकारी घोषित किए गए हैं। उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए बागेश्वर जिले के 26 लोगों को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा दे दिया है, और बागेश्वर को जिलाधिकारी को उन्हें राज्य आंदोलनकारी का दर्जा देने के आदेश जारी करने को कहा है।

शुक्रवार को यह आदेश बागेश्वर निवासी भगवान सिंह माजिला एवं अन्य 25 लोगों की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने जारी किया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चिह्नीकरण के बावजूद उन्हें राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी और वे राज्य आनोदलनकारी होने के लिए सभी मानक पूरा करते हैं।

याचिका में यह भी कहा गया कि डीएम की अगुआई में गठित कमेटी की ओर से उनका चिह्नीकरण भी किया गया था। चिह्नीकरण के बाद जिला प्रशासन ने यह सूची शासन को भेज दी। उसके बाद भी राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं दिया गया न ही कोई सुविधा दी जा रही है। सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद एकलपीठ ने डीएम बागेश्वर को याचिकाकर्ताओं को राज्य आंदोलनकारी घोषित करने के आदेश जारी करने के निर्देश दिए हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : मुख्यमंत्री से मिलेगा राज्य आंदोलनकारियों का प्रतिनिधिमंडल…

बैठक करते राज्य आंदोलनकारी।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अप्रैल 2022। जनपद नैनीताल के उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संगठन की क्षेत्रीय बैठक शुक्रवार को मुख्यालय के निकट बजून में आयोजित हुई। जिला अध्यक्ष गणेश बिष्ट की अध्यक्षता में हुई बैठक में वक्ताओं ने राज्य के मुद्दों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य आंदोलनकारियों व राज्यवासियो के हक-हकूकों को सुनिश्चित करने के लिए शीघ्र ही एक प्रतिनिधिमंडल प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा।

वक्ताओं न इस बात पर चिंता व्यक्त की कि राज्य बने 22 वर्ष हो जाने के बावजूद राजधानी गैरसैण का मुद्दा अद्यतन लंबित है। साथ ही मूल निवास, पलायन, जल-जंगल-जमीन के मसलों का हल भी नहीं हुआ है। अध्यक्ष बिष्ट ने वास्तविक आंदोलनकारिओ के चिन्हीकरण के मुद्दे को शीघ्र हल किये जाने तथा सभी आंदोलनकारियों को एक समान पेंशन, चिन्हित राज्य कर्मचारियों को भी पेंशन स्वीकृत करने, मुजफ्फरनगर कांड के दोषी अधिकारियो को दंडित करने, राज्य के नौनिहालों को बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए दीर्घकालीन योजनाओं का निर्माण कर उनका ईमानदारी से क्रियान्वयन किए जाने की भी आवश्यकता जताई।

उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि अक्टूबर माह में आई दैवीय आपदा से टूटी सडको का निर्माण छः माह बाद भी नहीं हो पाया है। बैठक मैं राज्य आंदोलनकारी कमलेश पांडे, पान सिंह सिजवाली, एचआर बहुगुणा, नवीन जोशी, दीवान सिंह कनवाल, मनमोहन कनवाल, रमेश पंत, लीला बोरा व हरेंद्र बिष्ट आदि राज्य आंदोलनकारी उपस्थित रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य सरकार की देरी से राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण की उम्मीदों पर झटका ! नौकरी पाए राज्य आंदोलनकारियों की नौकरी पर भी संकट !!

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 6 अप्रैल 2022। राज्य सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को लोक सेवा आयोग की परिधि से बाहर की सरकारी सेवाओं में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने के मुद्दे पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में संशोधन हेतु प्रार्थना पत्र देने में देरी कर दी है। सरकार की इस गलती से नौकरी पाए राज्य आंदोलनकारियों की नौकरी पर तलवार लटक गई है, जबकि नौकरी पाने की उम्मीद रखने वाले राज्य आंदोलनकारियों की उम्मीदों पर तुषारापात होता नजर आ रहा है।

उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सरकार के राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी सेवाओं में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने के प्रार्थना पत्र को इस आधार पर निरस्त कर दिया है आदेश को 1403 दिन होने के बाद सरकार ‘मोडिफिकेशन एप्लिकेशन’ पेश कर रही है। जबकि इसे आदेश होने के 30 दिन के भीतर पेश किया जाना था। पीठ ने कहा कि सरकार ने यह प्रार्थना पत्र ‘लिमिटेशन एक्ट’ की परिधि से बाहर जाकर पेश किया है और सरकार ने देर से प्रार्थना पत्र दाखिल करने का कोई ठोस कारण भी नहीं बताया है।

उल्लेखनीय है कि 2004 में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार राज्य आंदोलनकारियों को लोक सेवा आयोग से भरे जाने वाले पदों एवं लोक सेवा आयोग की परिधि के बाहर के पदों में 10 फीसद आरक्षण दिए जाने के लिए अलग-अलग दो शासनादेश लाई थी। शासनादेश जारी होने के बाद राज्य आंदोलनकारियों को दस फीसदी क्षैतिज आरक्षण दिया गया। 2011 में उच्च न्यायालय ने इस शासनादेश पर रोक लगा दी। बाद में उच्च न्यायालय ने इस मामले को जनहित याचिका में बदल करके 2015 में इस पर सुनवाई की। खंडपीठ में शामिल दो न्यायाधीशों ने आरक्षण दिए जाने व नहीं दिए जाने को लेकर अपने अलग-अलग निर्णय दिए।

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने अपने निर्णय में कहा कि सरकारी सेवाओं में दस फीसद क्षैतिज आरक्षण देने को नियम विरुद्ध बताया, जबकि न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने अपने निर्णय में आरक्षण को संवैधानिक माना। इस पर यह मामला सुनवाई हेतु अन्य पीठ को भेजा गया। उसने भी आरक्षण को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया कि सरकारी सेवा के लिए नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त है। इसलिए आरक्षण दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 16 के विरुद्ध व असवैधानिक है।

इधर, सरकार ने बुधवार को राज्य लोक सेवा आयोग की परिधि से बाहर वाले शासनादेश में शामिल प्रावधान के संशोधन को प्रार्थना पत्र पेश किया था, जिसको न्यायालय ने निरस्त कर दिया। इस प्रार्थना पत्र का विरोध करते हुए राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन साह ने न्यायालय को बताया कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी यानी विशेष अनुमति याचिका विचाराधीन है।

दूसरी ओर 2015 में कांग्रेस सरकार ने विधान सभा में विधेयक पास कर राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद आरक्षण देने का विधेयक पास किया और इस विधेयक को राज्यपाल के हस्ताक्षरों के लिये भेजा लेकिन राजभवन से यह विधेयक वापस नहीं आया। अभी तक आयोग की परिधि से बाहर 730 लोगो को नौकरी दी गयी है, जो अब खतरे में है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों ने चिन्हीकरण की समस्याओं को लेकर किया प्रदर्शन

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 28 दिसंबर 2021। राज्य आंदोलनकारियों ने चिन्हीकरण की प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों का समाधान करने की मांग को लेकर मंगलवार को उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी मंच के बैनर तले मुख्यालय स्थित जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन किया एवं ज्ञापन सोंपा।

राज्य आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी की अगुवाई में हुई प्रदर्शन में कहा गया कि उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य आंदोलनकारियों के चिह्निनीकरण के लिए थाने या अभिसूचना इकाइयों की रिपोर्ट व दस्तावेजों को आधार बनाया गया है लेकिन स्थानीय थाना, कोतवाली व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में वर्ष 1994 से लेकर 1997 तक के दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। बताया जा रहा है कि उस समय के दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया है। ऐसे में सत्यापन होना कठिन है।

धरना-प्रदर्शन में पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जंतवाल पूरन मेहरा, किशन पाठक, हरेंद्र बिष्ट, केएल आर्य, देवी दत्त पांडे, जगदीश पांडे, दिपुली देवी, कृष्णा नंद जोशी, देवेंद्र मेहरा व गणेश लाल आदि लोग मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : जो वादा किया वो निभाया: राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन में बढ़ोत्तरी के लिए शासनादेश जारी…

नवीन समाचार, देहरादून, 17 दिसंबर 2021। उत्तराखंड की धामी सरकार ने अपना एक और वादा निभाया है। राज्य स्थापना दिवस पर देहरादून स्थित पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन बढ़ाने की घोषणा की थी। अब सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को उनकी पेंशन की धनराशि में बढ़ोतरी करने का शासनादेश जारी कर नए साल का तोहफा दिया है। आंदोलनकारियों की पेंशन 1000 से 1400 रुपये तक बढ़ाई गई है।

शुक्रवार को अपर सचिव रिद्धिम अग्रवाल ने इस संबंध आदेश जारी किए। आदेश में प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को कहा गया है कि वित्त विभाग की सहमति पर उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सात दिन जेल गए या आंदोलन के दौरान घायल हुए आंदोलनकारियों की पेंशन पांच हजार से बढ़ाकर छह हजार रुपये प्रति माह और अन्य आंदोलनकारियों की पेंशन 3100 में 1400 रुपये की बढ़ोतरी कर 4500 रुपए की गई है।

इससे सात दिन जेल गए एवं घायल आंदोलनकारियों की संख्या 344 तथा अन्य 6821 सहित सात हजार से अधिक राज्य आंदोलनकारियों को लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री धामी की घोषणा के बाद उत्तराखंड शासन ने पेंशन बढ़ाने का शासनादेश जारी कर दिया है। उल्लेखनीय है कि राज्य आंदोलनकारी लंबे समय से पेंशन बढ़ाने की मांग कर रहे थे। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : 43 राज्य आंदोलनकारियों की हत्या और सात महिलाओं से दुराचार के आरोपितों को सजा दिलाने का संकल्प

-यूपी के मुजफ्फरनगर सहित प्रदेश भर से विचार मंथन में पहुंचे राज्य आंदोलनकारी, हुआ अभिनंदन

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 31 अक्टूबर 2021। मुजफ्फरनगर सहित प्रदेश भर से पहुंचे राज्य आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर में 43 राज्य आंदोलनकारियों की हत्या और सात राज्य आंदोलनकारी महिलाओं से दुराचार की घटना के दोषियों को सजा दिलाने के लिए ‘उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता संघ’ के बैनर तले सभी आंदोलनकारी संगठनों ने सभी विचाराधीन मामलों की पैरवी पूरी ताकत से कर इस संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प जताया। कहा कि सभी आंदोलनकारी संघ इसमें मदद करेंगे।

यह भी कहा गया कि मुजफ्फरनगर बार एसोसिएशन भी वहां विचाराधीन 12 मुकदमों में मदद करेंगे। इस दौरान खास तौर पर मुजफ्फरनगर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कलिराम, महासचिव अरुण कुमार शर्मा आदि पदाधिकारियों का स्मृति चिन्ह भेंट कर अभिनंदन किया गया, साथ ही रामपुर तिराहा में शहीद स्मारक व आवास गृह के लिए जमीन देने वाले श्री शर्मा के लिए भी अभिनंदन स्मृति चिन्ह भिजवाया गया।

मुख्यालय स्थित नैनीताल क्लब में ‘उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता संघ’ द्वारा आयोजित ‘संवैधानिक विचार मंथन’ में यूपी के मुजफ्फरनगर सहित प्रदेश भर से राज्य आंदोलनकारी पहुंचे।

पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र पाल की अध्यक्षता में आयोजित विचार मंथन में चिन्हित राज्य आंदोलकारी समिति के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र रावत, राज्य निर्माण सेनानी मोर्चा के अध्यक्ष महेंद्र रावत, राज्य आंदोलकारी मंच देहरादून के अध्यक्ष जगमोहन नेगी, पूर्व महाधिवक्ता वीबीएस नेगी, राजीव लोचन साह, उमेश जोशी, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अवतार सिंह रावत, मोहन पाठक एवं आयोजक संस्था के अध्यक्ष रमन कुमार शाह, सैयद नदीम मून, रवींद्र बिष्ट, अतुल बंसल, भगवत नेगी, आनंद पांडे, डॉ. रमेश पांडे, पान सिंह रौतेला व प्रभाकर जोशी आदि ने अपने क्षेत्रों में हुए राज्य आंदोलन की यादों का स्मरण किया, तथा अब तक भी राज्य आंदोलनकारी शहीदों के हत्यारों को सजा न मिलने पर राज्य की सरकारों के प्रति नाराजगी जताई।

साथ ही कहा कि मुजफ्फरनगर कांड के शहीदों के हत्यारों को सजा दिलाकर इस दिशा में शुरुआत की जा सकती है। कहा कि इस मामले में इतने सबूत मौजूद हैं कि दोषियों को आजीवन कारावास अथवा फांसी की सजा होनी तय है।

अलबत्ता इस दौरान कई वक्ता राजनीतिक रंग में भी नजर आए और राज्य की चुनिंदा सरकारों पर निशाना साधते और अन्य को छोटे-छोटे श्रेय देते भी नजर आए, जबकि सभी ने माना कि इन मामलों में केवल तीन गवाहों की गवाही के अलावा कुछ भी ठोस नहीं हो पाया है। यह भी कहा कि राज्य सरकारें राज्य आंदोलनकारियों को केवल एक बार नौकरियों में मिलने वाली रियायत को आरक्षण से इतर करके बचा नहीं सके। यह भी माना कि यह मामले सीबीआई से संबंधित है, और सरकार इन मामलों में पक्षकार नहीं है।

अलबत्ता कहा कि सरकार को खुद पहल कर मजबूत पैरवी करनी चाहिए थी। संचालन हाईकोर्ट बार के पूर्व सचिव पूरन सिंह रावत ने किया। इस मौके पर रवींद्र बिष्ट, मुन्नी तिवारी, लीला बोरा, शीला रजवार, पुष्कर नयाल, सरिता आर्य व प्रो. रवि प्रताप सिंह सहित बड़ी संख्या में राज्य आंदोलनकारी मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य स्थापना दिवस पर राज्य के अवधारणात्मक विकास पर चर्चा करेंगे राज्य आंदोलनकारी

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 अक्टूबर 2021। राज्य निर्माण के 21 वर्ष पूरे होने को हैं, और इस दौरान राज्य आंदोलनकारी एक बार फिर सक्रिय हैं। अब राज्य आंदोलनकारियों ने राज्य के विकास व नव निर्माण की रूपरेखा बनाने की बात कही है।

इस हेतु आगामी नौ नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के दिन राज्य आंदोलनकारियों का एक शिविर आयोजित किया जाएगा। जिसमें राज्य की अवधारणा के साथ ही आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण को लेकर चर्चा की जाएगी।

शनिवार को उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी क्रांतिकारी मोर्चा से जुड़े आंदोलनकारियों ने नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता करते हुए यह बात कही। जिलाध्यक्ष गणेश बिष्ट ने कहा कि 21 वर्ष गुजरने के बाद भी उत्तराखंड विकास की राह ताक रहा है। आज भी प्रदेश में स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजगार की बुरी हालत है।

राज्य आंदोलनकारी मोहन पाठक ने कहा कि राज्य की अवधारणा को पूरा करने में राज्य की किसी सरकार ने कोई कार्य नहीं किया है। आगामी नौ नवंबर को आयोजित शिविर में आगामी रूपरेखा पर मंथन किया जाएगा।

इस दौरान जिला उपाध्यक्ष महेश जोशी, महामंत्री हरेंद्र बिष्ट, मुनीर आलम, कैलाश तिवारी, हरगोविंद रावत, लीला बोरा, दीवान कनवाल, तारा बिष्ट, पान सिंह रौतेला, शाकिर अली, लक्ष्मी नारायण लोहनी व रईस भाई आदि राज्य आंदोलनकारी मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : मुजफ्फरनगर कांड को बताया जलियावाला बाग हत्याकांड, लिया उत्तराखंडियों के हत्यारों-बलात्कारियों को सजा दिलाने का संकल्प

-43 राज्य आंदोलनकारी शहीदों की हत्या और सात राज्य आंदोलनकारी महिलाओं से दुराचार के आरोपितों को सजा दिलाने का ऐलान

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 29 अक्टूबर 2021। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता संघ ने मुजफ्फरनगर कांड को देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ घटित जलियावाल बाग हत्याकांड सरीखा बताया है। कहा कि जैसे जलियावाला बाग कांड में स्वतंत्रता संग्राम के लिए लोग शहीद हुए थे वैसे ही उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर में 43 राज्य आंदोलनकारियों की हत्या और सात राज्य आंदोलनकारी महिलाओं से दुराचार की घटना हुई थी। देखें विडियो :

इसके आरोपितों को संवैधानिक तरीके से सजा दिलाने का ऐलान करते हुए कहा कि जलियावाला बाग और मुजफ्फरनगर कांड की घटनाएं हर तरह से समान हैं। अलबत्ता, दोनों कांडों के बीच अंतर यह है कि जलियावाला बाग कांड के दौरान भारतीय संविधान अस्तित्व में नहीं था और मुजफ्फरनगर कांड के सदस्य भारतीय संविधान अस्तित्व में था।

आगामी 31 अक्टूबर को मुख्यालय में उत्तराखंड सहित अन्य क्षेत्रों से राज्य आंदोलनकारियों के बड़े ‘संवैधानिक विचार मंथन शिविर’ के आयोजन का ऐलान करते हुए संघ के अध्यक्ष रमन कुमार शाह ने शुक्रवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि एक अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए आंदोलनन विधि सम्मत था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी इसे विधि सम्मत तथा राज्य आंदोलनकारियों के साथ हुए मुजफ्फरनगर कांड को उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है, और तत्कालीन सरकार को राज्य आंदोलनकारियों को हर्जाना देने के आदेश दिए थे।

इसी आदेश के तहत उत्तराखंड सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को नौकरियों में रियायत दी थी, न कि आरक्षण। उन्होंने मुजफ्फरनगर कांड के मामले को भी मानवाधिकार आयोग द्वारा संज्ञान में लेने की मांग करते हुए केंद्र सरकार से 26 वर्ष पुराने इस कांड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए सीबीआई को पुनः सक्रिय किए जाने की मांग भी उठाई।

कहा कि आरोपितों के खिलाफ इतने सबूत हैं कि उन्हें सजा मिलनी तय है। क्योंकि पिछले 26 वर्षों में सीबीआई केवल 3 गवाहों की गवाही करा पाई है, और आरोपितों की फाइलें भी खो गई बताई जा रही हैं। सीबीआई इन फाइलों को खोजे। पत्रकार वार्ता में पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र पाल, सैयद नदीम मून, रवींद्र बिष्ट, अतुल बंसल, भगवत नेगी, आनंद पांडे व प्रभाकर जोशी आदि अधिवक्ता सदस्य मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन कोषागार के हेड में भेजे जाने की मांग..

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 अक्टूबर 2021। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन कोषागार के हेड में भेजे जाने की मांग की है। डीएम नैनीताल को भेजे गए ज्ञापन में राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि अभी पेंशन जिलों में जिलाधिकारियों के पास दो-दो माह में आती है। इसमें विलंब भी हो जाता है।

इसलिए उन्होंने इसे कोषागार के माध्यम से अन्य पेंशनों की तरह भेजे जाने की मांग की है। उनका कहना है कि शासन ने उत्तरकाशी जनपद को इस संबंध में अपना मंतव्य देने को भी कहा है। इस संबंध में डीएम ने अनुरोध किया गया है कि यहां से भी आंदोलनकारियों की पेंशन कोषागार में भिजवाने के लिए पहल करें। ज्ञापन में पूरन मेहरा, हेम चंद्र पाठक, कंचन चंदोला, योगेश तिवाड़ी व चंदन बिष्ट आदि के हस्ताक्षर हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : सरकारी नौकरी पाये उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की नौकरी पर एक बार फिर छाया संकट…

-उत्तराखंड हाईकोर्ट के असंवैधानिक बताने के आदेश का पालन करने के लिए अपर सचिव ने विभागाध्यक्षों को पत्र लिखा
नवीन समाचार, देहरादून, 30 जून 2021। उत्तराखंड में क्षैतिज आरक्षण के आधार पर राज्य सरकार के विभिन्न सरकारी विभागों में नौकरी पाने वाले राज्य आंदोलनकारियों की नौकरी पर फिर संकट छाने लगा है। अपर सचिव रिद्धिम अग्रवाल ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के इन नौकरियों को असंवैधानिक बताने वाले आदेश का हवाला देते हुए राज्याधीन सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों के क्षैतिज आरक्षण के संबंध में पारित आदेश का पालन करने के निर्देश दिये हैं। उन्होंने इस संबंध में सभी विभागाध्यक्षों को पत्र भेज कर इस मामले में अद्यतन स्थिति से शासन को अवगत कराने के भी निर्देश दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में याचिकाकर्ता प्रशांत तड़ियाल ने वर्ष 2011 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा था कि राज्य आंदोलनकारी श्रेणी के अंतर्गत राजकीय सेवा में जो कर्मचारी कार्यरत हैं, उनकी नियुक्तियां असंवैधानिक हैं, इसलिए इन्हें निरस्त किया जाए। उच्च न्यायालय ने पांच दिसम्बर 2018 को इस मामले में अपना आदेश सुनाते हुए राज्य आंदोलनकारियों की पूर्व में की गयी नियुक्तियों को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त करने के आदेश जारी कर दिये थे।

उच्च न्यायालय के आदेश पर अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने इसी तिथि यानी पांच दिसम्बर 2018 को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, सचिव, मंडलायुक्त, विभागाध्यक्षों व जिलाधिकारियों को राज्याधीन सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों के क्षैतिज आरक्षण के संबंध में पारित आदेश के क्रियान्वयन के लिए पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि राज्य आंदोलनकारियों के संबंध में जारी सभी परिपत्र और नियमों, अधिसूचनाओं के अनुसरण में सरकार द्वारा नियुक्तियां करने के सभी परिणामी आदेश निरस्त माने जाएंगे।

लिहाजा सभी विभागाध्यक्ष उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करें। हालांकि उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध राज्य सरकार व ऊधमसिंह नगर की एक याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय में एसएलपी यानी पुर्नविचार याचिका दाखिल की है, जिस पर करीब दो वर्ष में अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है। इस बीच हाल ही में याचिकाकर्ता प्रशांत तड़ियाल ने फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बताया कि सरकार ने न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया है, जिस पर सरकार को अपना जवाव दाखिल करना है।

इस मामले में अपर सचिव रिद्धिम अग्रवाल ने गत 23 जून को सभी विभागाध्यक्षों को पत्र लिख इस मामले में कार्यवाही करते हुए अद्यतन वस्तुस्थिति यथाशीघ्र गृह विभाग को उपलब्ध कराने के निर्देश जारी किये हैं। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों ने सीएम को याद दिलाईं अपनी लंबित मांगें

नवीन समाचार, नैनीताल, 02 अक्टूबर 2020। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की संस्था चिन्हित राज्य आंदोलनकारी संयुक्त समिति ने रविवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अपनी 11 लंबित मांगें याद दिलाईं। ज्ञापन में मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को शीघ्र सजा देने, अब तक चिन्हित नहीं हुए राज्य आंदोलनकारियों को चिन्हित करने, गैरसेंण को शीघ्र स्थायी राजधानी घोषित करने, चिन्हित राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद आरक्षण, 10 हजार रुपए मासिक पेंशन, राज्य सेनानी का दर्जा, पारिवारिक पेंशन, स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराने, रोजगार, शिक्षा व अन्य सरकारी योजनाओं में आंदोलनकारियों को प्राथमिकता तथा पूर्व की भांति उत्तराखंड परिवहन की बसों में राज्य आंदोलनकारियों के सह यात्री को भी तथा राज्य के बाहरी क्षेत्र में भी राज्य की सीमा की तरह लाभ देने एवं उत्तराखंड से पलायन को रोकने के लिए रोजगार की व्यवस्था करने की मांगें की गई हैं। ज्ञापन में समिति के केंद्रीय उपाध्यक्ष रईस भाई, जिला अध्यक्ष सुंदर सिंह नेगी व जिला अध्यक्ष-महिला लीला बोरा के हस्ताक्षर हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों का मामला 23 वर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए स्वीकार..

-राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन साह की याचिका में की गई है सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बिना मामले की फाइलें मुजफ्फरनगर स्थानांतरित किये जाने,
नवीन समाचार, नैनीताल, 23 सितंबर 2019। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की फाइलें उत्तराखंड से मुजफ्फरनगर-यूपी को स्थानांतरित किये जाने का मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय की विशेष अनुमति से 23 वर्षों की समय सीमा के बाद सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है। राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन साह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में स्वीकार कर ली गयी है, और शीघ्र सुनवाई प्रारंभ होने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि राज्य आंदोलनकारियों को राज्य सरकार की नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण दिये जाने के बाद का मामला भी

श्री साह की निजी याचिका पर ही सर्वोच्च न्यायालय में है। याचिकाकर्ता श्री साह ने बताया कि गत दिनों राज्य आंदोलन की फाइलें आरोपितों के प्रभाव में उत्तराखंड से मुजफ्फरनगर-यूपी को स्थानांतरित कर दी गयी थीं। इसकी प्रमाणित प्रतियां मांगे जाने पर भी उपलब्ध नहीं कराई गईं। ऐसे में उच्च न्यायालय के माध्यम से सत्यापित प्रतियां मांगी गईं। इस पर जिला जज देहरादून की रिपोर्ट में बताया गया कि यह फाइलें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मुजफ्फरनगर स्थानांतरित कर दी गई हैं।

आंदोलनकारियों की ओर से आपत्ति की गई कि सर्वोच्च न्यायालय का कोई ऐसा आदेश नहीं है। इस पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आंदोलनकारियों को 23 वर्ष की लंबी समयसीमा बीत जाने के बावजूद मामले में सर्वोच्च न्यायालय जाने की इजाजत दी गई। लिहाजा उच्च न्यायालय के इजाजत से मामले में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गयी है।

बताया कि याचिका में सीबीआई कोर्ट देहरादून के 22 अप्रैल 1996 के आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने, सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बिना उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के मामले की फाइलें आरोपितों के प्रभाव में उत्तराखंड से मुजफ्फरनगर-यूपी को स्थानांतरित किये जाने के पूरे मामले की सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्ति न्यायाधीश के नेतृत्व में समिति गठित कर जांच कराने, सीबीआई के गवाह सुभाष गिरि की 1996 में दिल्ली-मुंबई रेलगाड़ी में गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई हत्या की भी एसआईटी के माध्यम से जांच करवाने की मांग की गयी है। कहा है कि सीबीआई ने अपने गवाह की हत्या होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की, ना ही इस बारे में न्यायालय को अवगत कराया। मामले का मुकदमा जीआरपी गाजियाबाद में हत्या के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दर्ज है। उन्होंने राज्य आंदोलन के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर इन मामलों में आंदोलनकारियों के पक्ष में फैसला आने और दोषियों को सजा मिलने की उम्मीद जताई है।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड राज्य के बहुचर्चित व राज्य के इतिहास में बदनुमा दाग माने जाने वाले मुजफ्फरनगर कांड के मामले की मुजफ्फरनगर स्थानांतरित हुई फाइलों में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनन्त कुमार सहित कई अन्य आरोपी हैं। वहीं राज्य आंदोलनकारी इस कांड में पीड़ित के रूप में न्याय मांग रहे हैं। उनका कहना है कि वे अपने कानूनी-संवैधानिक अधिकारों के तहत धारा 3 के तहत अलग राज्य की मांग 19बी के अंतर्गत अहिंसक तरीके से कर रहे थे। आंदोलन के दौरान वे कभी भी अराजक नहीं हुए, उन्होंने सरकारी संपत्तियों को नुकसान भी नही पहुंचाया। इसलिए उच्च न्यायालय पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों के लिए प्रयुक्त ‘राउडी’ यानी ‘अराजक तत्व’ शब्द को हटा चुकी है। राज्य आंदोलनकारी वास्तव में ‘पीड़ित’ हैं। उन्होंने राज्य के लिए 28 शहादतें और 7 माताओं-बहनों के साथ अमानवीय कृत्य झेले तथा 21 हजार लोग जेलों में बंद हुए। गुलाम भारत के जलियावाला बाग हत्याकांड में जिस तरह विदेशी शासकों ने किया, वैसा ही उनके साथ मुजफ्फरनगर में किया गया। लिहाजा उन्हें संविधान की धारा 16 (4) के तहत तथा इंदिरा सावनी मामले में संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन न करते हुए, यानी अधिकतम 50 फीसद आरक्षण के दायरे में ही जातिगत आरक्षण के इतर, संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत बाढ़, भूस्खलन व दंगा प्रभावित आदि कमजोर वर्गों को मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर मिलने वाले आरक्षण की तर्ज पर सामान्य वर्ग के अंतर्गत ही क्षैतिज आधार पर सामाजिक आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर सुना और माना कि धारा 71 के तहत उत्तराखंडियों के मानवाधिकारों का हनन हुआ है, लिहाजा ‘मानवाधिकारों के हनन’ के लिए ‘क्षतिपूर्ति’ के रूप में 1996 में 10 लाख रुपए दिये, जो बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. नारायण दत्त तिवारी ने राज्य आंदोलनकारियों को दिये। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने जांच के बाद क्षतिपूर्ति दिये जाने के आदेश दिये था। राज्य आंदोलनकारियों ने कभी धारा 15 के तहत आरक्षण की मांग नहीं की थी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : :: ब्रेकिंग ::मुजफ्फरनगर कांड की फाइलें गायब ! हाई कोर्ट ने किया जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 मई 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के बहुचर्चित व राज्य के इतिहास में बदनुमा दाग माने जाने वाले मुजफ्फरनगर कांड के मामले में दुबारा से सुनवाई करते हुए जिला जज देहरादून से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। साथ ही सरकार व सीबीआई को नोटिस जारी किया है। मामले में मुजफ्फरनगर कांड की सभी फाइल गायब किये जाने का आरोप लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि इन फाइलों में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनन्त कुमार सहित कई अन्य आरोपी थे।

मंगलवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में मुजफ्फरनगर कांड के मामले में दुबारा से सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई, और अगली सुनवाई दो सप्ताह के बाद की नियत की गयी। मामले के अनुसार राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन कुमार साह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि राज्यआंदोलनकारियों को दस प्रतिशत आरक्षण देने वाली जनहित याचिका के निरस्त होने के कारण उन्होंने इस फैसले को सर्र्वाेच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए राज्य आंदोलनकारियों से सम्बन्धित दस्तावेजों को इकठ्ठा करने के लिए विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट देहरादून के कार्यालय से मुजफ्फर कांड से सम्बंधित दस्तावेज मांगे, परन्तु उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इस सम्बन्ध में कोई पत्रावली यहाँ उपलब्ध नही है। इसे लेकर उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने इसकी जाँच सीबीआई से कराने और संबंधित पत्रावलियां उन्हें उपलब्ध कराने और फाइल गायब कराने वाले सभी लोगो के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की प्राथर्ना की है।

सीबीआई ने खोला अनंत कुमार सिंह का काला चिट्ठा
याची ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि सन 1996 में उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने के लिए राज्य आंदोलन किया गया था। इस दौरान मुजफ्फरनगर में राज्य के लोगों के साथ पुलिस ने मारपीट, लूट, हत्या व बलात्कार किया। सीबीआई ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस कांड में 28 लोगो की मौत, 7 गैंग रेप 17 महिलाओ के साथ छेड़छाड़ हुई। सारी घटना मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार के आदेश पर हुई। सीबीआई ने 22 अप्रैल 1996 को सिंह को आईपीसी की धारा 302, 307, 324, 326/34 के तहत दोषी पाया। जिसको सिंह ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 22 जुलाई 2003 को निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर याचिका को निस्तारित कर दिया। इस आदेश पर पुनर्विचार याचिका सरकार व राज्य आंदोलनकारियों द्वारा दायर की गयी, जिस पर सुनवाई करते हुए उसी खंडपीठ ने अपने आदेश की वापस लेकर मामले को सुनने के लिए अन्य बेंच को भेज दिया। खंडपीठ ने 22 मई 2004 को सिंह की याचिका को खारिज कर दिया। तब से यह मामला निचली अदालत में लम्बित है इधर 17 फरवरी 2018 को याची ने 22 अप्रैल 1996 के आदेश को लेने के लिए निचली अदालत में आवेदन किया तो ऑफिस ने इस केस का रिकार्ड नहीं होने की जानकारी दी गई। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण पर फिर बंधी उम्मीद मामला नई दलीलों के साथ फिर हाईकोर्ट पहुंचा, पुनर्विचार याचिका दाखिल

नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने का मामला नयी दलीलों के साथ फिर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में पहुंच गया है। इस मामले में उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रमन शाह ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। मामले पर सुनवाई अगले सप्ताह होने की उम्मीद है।

अधिवक्ता रमन साह ने याचिका में राज्य आंदोलनकारियों को पीड़ित बताते हए राहत और पुनर्वास नीति का हकदार बताया गया है। साथ ही कहा है कि अब तक मुजफ्फरनगर कांड में महिलाओं से दुष्कर्म, छेड़छाड़ तथा हत्या के मामलों के आरोपियों को सजा नहीं मिली है। यहां बता दें कि राज्य आंदोलनकारियों को दस फीसद क्षैतिज आरक्षण के मामले में खंडपीठ के दो न्यायाधीशों द्वारा अलग-अलग राय दी गई। जिसके बाद मामला मुख्य न्यायाधीश द्वारा तीसरी बेंच को रेफर किया गया, जिसने आरक्षण को असंवैधानिक घोषित करने के पक्ष में राय दी, जिसके बाद आरक्षण का फैसला असंवैधानिक हो गया। वहीं इसके बाद प्रदेश के काबीना मंत्री डा. धन सिंह रावत ने उच्च न्यायालय की डबल बेंच में चुनौती देने की बात कही थी, हालांकि उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं का मानना है कि तीन न्यायाधीशों के द्वारा मामला सुन लिए जाने के बाद डबल बेंच में जाने की बात कहना बचकाना है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

पूर्व आलेख (7 मार्च 2018) : हाईकोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण

  • राज्य सरकार का संबंधित शासनादेश व नियमावली भी अवैधानिक हुई
  • उच्च न्यायालय की संस्तुति पर दायर हुई संबंधित जनहित याचिका खारिज

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने को संविधान सम्मत नहीं ठहराया है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में पूर्व में खंडपीठ के दो न्यायाधीशों की राय परस्पर विपरीत आई थी। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण न देने सम्बंधित आदेश दिए थे, जबकि गत दिनों सेवानिवृत्त हो गये न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आन्दोलन कारियों के पक्ष में निर्णय दिया था। खंडपीठ के न्यायाधीशों के परस्पर विरोधी मत होने के कारण मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ ने मामले को न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की तीसरी बेंच को सुनने के लिए सौंपा था। बुधवार को न्यायमूर्ति धूलिया की एकलपीठ ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति धूलिया के आदेश को सही ठहराया, और राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद आरक्षण देने से सम्बंधित सरकार के शासनादेश को गलत व संविधान की धारा 16 (4) की भावना के खिलाफ माना, तथा उच्च न्यायालय की संस्तुति पर ही ‘इन द मेटर ऑफ अपोइन्टमेंट एक्टिविस्ट’ द्वारा दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस प्रकार उत्तराखंड सरकार के इस संबंध में जारी 11 अगस्त 2004 के शासनादेश एवं वर्ष 2010 में आयी नियमावली भी असंवैधानिक घोषित हो गयी है।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी लंबे समय से प्रदेश की सरकारी नौकरियों में 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। सरकार ने पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों की मांग को देखते हुए 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था कर दी थी। मामले के अनुसार पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने के संबंध में हल्द्वानी निवासी करुणेश जोशी की याचिका को न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकलपीठ ने खारिज कर दिया था, एकलपीठ के इस आदेश की खंडपीठ में चुनौती दी गयी। खंडपीठ ने याचिका को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया। तब से अब तक यह मामला उच्च न्यायालय की कई बेंचों में चलता आ रहा था। यहां तक कि वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को दुबारा सुनने के लिए हाई कोर्ट को रेफर कर दिया था। पूर्व में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने अपने निर्णय में राज्य आंदोलन कारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण न देने और न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आंदोलन कारियों को आरक्षण देने का आदेश दिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की तीसरी एकलपीठ को मामला सुनने को दिया। जिसने बुधवार को अपना फैसला सुना दिया है।

यह भी पढ़ें : 

राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र ही नहीं था शुरुआती याचिका में

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने के मामले के बुधवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। ऐसे में इस संबंध में आये दोनों पक्षों को समझना भी एक दिलचस्प कहानी है। खास बात यह भी है कि यह मामला शुरू से राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाले आरक्षण से संबंधित कहा जा रहा है, जबकि खास बात यह है कि मामले में आरक्षण पर सुनवाई ही कई वर्षो के बाद हुई।

इस मामले की शुरुआत 11 अगस्त 2004 को आये तत्कालीन एनडी तिवारी की अगुवाई वाली सरकार के शासनादेश संख्या 1269 से हुई। जिसके आधार पर राज्य आन्दोलन के दौरान सात दिन से अधिक जेल में रहे राज्य आंदोलनकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार समूह ‘ग’ व ‘घ’ में सीधी भर्ती से नियुक्तियां दी गयीं (इस पर सरकार पर अपने चुनिन्दा लोगों को उपकृत करने के आरोप भी लगे, क्योंकि इस कसौटी पर खरे कई राज्य आन्दोलनकारियों को नौकरी नहीं मिली, और खास बात यह भी थी कि इस शासनादेश में कहीं भी राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण का जिक्र नहीं था) अलबत्ता आगे इसके साथ ही एक अन्य शासनादेश संख्या 1270 भी जारी हुआ था जिसमें उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत सभी सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण देने का प्राविधान किया गया था। बहरहाल, हल्द्वानी निवासी एक राज्य आंदोलनकारी करुणेश जोशी ने नौकरी की मांग करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। बताया गया है कि करुणेश के पास सरकार के बजाय निजी चिकित्सक का राज्य आंदोलन के दौरान घायल होने का प्रमाण पत्र था। इसी आधार पर उसे इस शासनादेश का लाभ नहीं मिला था। उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की एकल पीठ ने शासनादेश संख्या 1269 के बाबत राज्य सरकार की कोई नियमावली न होने की बात कहते हुए इस शासनादेश को असंवैधानिक करार देते हुए करुणेश की याचिका को खारिज कर दिया। इस पर राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में सेवायोजन नियमावली बनाते हुए उसमें शासनादेश संख्या 1269 के प्राविधानों को यथावत रख लिया। इस पर करुणेश ने पुनः उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर अब नियमावली होने का तर्क देते हुए उसे शासनादेश संख्या 1269 के तहत नियुक्ति देने की मांग की। इस बार न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल की पीठ ने याचिका के साथ ही शासनादेश संख्या 1269 को भी खारिज कर दिया। साथ ही मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले को जनहित याचिका के रूप में लेने एवं राज्य सरकार की नियमावली की वैधानिकता की जांच करने की संस्तुति की। इस बीच 26 अगस्त 2013 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति एसके गुप्ता की खंडपीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य आंदोलनकारियों के लिए अंग्रेजी के ‘राउडी’ यानी ‘अराजक तत्व’ शब्द का प्रयोग किया गया। आगे एक अप्रैल 2014 को एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने पर भी रोक लगा दी। राज्य आंदोलनकारी एवं अधिवक्ता रमन साह ने वर्ष 2015 में इस शब्द ‘राउडी’ पर आपत्ति जताते हुए और इस शब्द को हटाने और आरक्षण पर आये स्थगनादेश को निरस्त करने की मांग की। उनका कहना था कि राज्य आंदोलनकारी कभी भी अराजक नहीं हुए, उन्होंने सरकारी संपत्तियों को नुकसान भी नही पहुंचाया। साह का कहना था कि राज्य आंदोलनकारी ‘पीड़ित’ हैं। उन्होंने राज्य के लिए अनेक शहादतें और माताओं-बहनों के साथ अमानवीय कृत्य झेले हैं। लिहाजा उन्हें संविधान की धारा 16 (4) के तहत तथा इंदिरा सावनी मामले में संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन न करते हुए, यानी अधिकतम 50 फीसद आरक्षण के दायरे में ही जातिगत आरक्षण के इतर, संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत बाढ़, भूस्खलन व दंगा प्रभावित आदि कमजोर वर्गों को मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर मिलने वाले आरक्षण की तर्ज पर सामान्य वर्ग के अंतर्गत ही क्षैतिज आधार पर सामाजिक आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस बीच खंडपीठ में अलग-अलग न्यायाधीशगण आते रहे। आखिर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ ने ‘राउडी’ शब्द को हटा दिया, अलबत्ता आरक्षण पर स्थगनादेश और मामले पर सुनवाई जारी रही। इसके अलावा जनहित याचिका में भवाली निवासी अधिवक्ता महेश चन्द पंत का कहना था कि अगर सरकार आरक्षण देती है तो उत्तराखंड के राज्य आंदोलन में भाग लेने वाले सभी लोगों को आरक्षण दे, अन्यथा किसी को भी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने के लिए वर्ष 1952 से लड़ाई चल रही थी, इसमें सभी ने भाग लिया था केवल वे ही लोग नही थे जो जेल गए थे या जो शहीद हो गए थे। इधर उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने गत 18 मार्च 2017 को सुनवाई पूरी कर इस पर फैसला सुनाया था। फैसले में खंडपीठ के दोनों न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने शासनादेश संख्या 1269 की वैधता के संबंध में अलग-अलग फैसले देते हुए मामले को बड़ी पीठ को संदर्भित करने की संस्तुति की।

सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे
नैनीताल। बुधवार को उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद राज्य आंदोलनकारियों की ओर से मामले में राज्य आंदोलनकारियों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रमन साह ने कहा कि मामले को उच्च न्यायालय की संविधान पीठ से सुने जाने का अनुरोध किया जाएगा, तथा सर्वोच्च न्यायालय जाने का विकल्प भी खुला है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
https://navinsamachar.com

Leave a Reply