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कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना पर प्रारंभ किया शोध, शरीर में विषाणु को प्रवेश ही न करने देंगे..

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प्रो. वीना पांडे।

-उत्तराखंड के पौधों में पाये जाने वाले ‘फाइटो कैमिकल्स’ से कोरोना विषाणु के मानव शरीर में प्रवेश को रोकने पर शुरू हुआ शोध
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 मई 2020। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना की वैश्विक महामारी के बचाव हेतु शोध कार्य प्रारम्भ हो गया है। विश्वविद्यालय के के भीमताल परिसर स्थित जैव प्रौद्योगिकी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने बताया कि विश्व के सभी देश कोरोना के खिलाफ वैक्सीन-औषधि प्राप्त करने की दिशा में प्रयासरत हैं, परन्तु वैक्सीन जनमानस तक पहुंचाना अभी एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें अभी भी काफी समय लगने की सम्भावना है। ऐसे में जैव प्रौद्योगिकी विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय के नवागत कुलपति प्रो. एनके जोशी की प्रेरणा से इस महामारी के बचाव की दूसरी सम्भावनाओं पर कार्य कर रहा है।
उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड महत्वपूर्ण औषधीय पादपों की सम्पदा का धनी है। राज्य में इन औषधीय पौधों में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण ‘फाइटोकैमिकल्स’ की एक लम्बी सूची है जो पहले से ही मिलती-जुलती बीमारियों से विरूद्ध काफी कारगर सिद्ध हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पौधे भी जीवित प्राणी ही होते हैं, और उनमें विभिन्न बीमारियों-बाहरी खतरों से लड़ने के फाइटो कैमिकल्स कहे जाने वाले तत्व होते हैं। उत्तराखंड में ऐसे सैकड़ों फाइटो कैमिकल्स की पहचान हो चुकी है। इसलिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने इन्ही फाइटोकैमिकल्स के उपयोग से कोरोना के बचाव तलाशने पर कार्य कर रहा है। प्रो. पांडे ने बताया कि कोरोना के संक्रमण के लिए ‘सार्क-कोव-2’ नाम का एक ‘आरएनए’ विषाणु जिम्मेदार है। मानव शरीर में गुर्दे व फेफड़े आदि विभिन्न अंग इसके लक्ष्य होते हैं। इन अंगों में यह विषाणु हमला न कर पाएं, इस हेतु कुछ एन्जाइम-प्रोटीन का होना अत्यंत आवश्यक होता है। इसलिए शोध में इन अंगों में विषाणु का प्रवेश निरुद्ध कर सकने योग्य राज्य में पाये जाने वाले फाइटोकैमिकल्स की कम्प्यूटर पर ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ प्रारम्भ की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जाये कि कौन से फाइटोकैमिकल इन अंगों में कोरोना को प्रवेश करने व स्थापित होने से रोक सकते हैं। ताकि उसको प्रवेश करने पर ही रोका जा सके, ताकि वह मानव शरीर में अन्य समस्याएं न पैदा कर सके।
एक खास बात यह भी कि कोरोना के विषाणु पर कोई प्रयोग करने की जगह ‘होस्ट सेल टार्गेट’ यानी मानव के फेफड़े, गुर्दे आदि लक्षित अंगों पर ही प्रयोग किये जा रहे हैं, क्योंकि उसमें ‘म्यूटेशन’ यानी बदलाव की सम्भावना बहुत कम होती है जबकि विषाणु में म्यूटेशन की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है, वह बार-बार अपनी संरचना बदलने में सक्षम होता है। ऐसे में हो सकता है जब तक वैज्ञानिक विषाणु पर शोध कर किसी निष्कर्ष पर पहुचें, वह अपनी संरचना परिवर्तित कर वैज्ञानिकों के सारे प्रयासों को निष्फल कर दे।
प्रो. पांडे ने बताया कि मानव शरीर में कुछ महत्वपूर्ण प्रोटीन व एन्जाइम पाये जाते हैं जो कि फेफड़ों व गुर्दों में इस विषाणु के प्रवेश करने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं एवं उसे वहां चिपकने के लिए आधार प्रदान करते हैं। इसलिए शोध में मुख्य रूप से इन्हीं प्रोटीनों व एन्जाइमों को अपना लक्ष्य माना है एवं उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित किया है कि कैसे इस प्राकृतिक फाइटो कैमिकल्स की मदद से या तो इन प्रोटीनों-एन्जाइमों के उत्पादन को रोका या कम किया जाये या उन बिन्दुओं को अवरुद्ध किया जाये, जहां पर विषाणु अपने विशिष्ट संरचनाओं के साथ संलग्न होता है। इसके लिए सर्वप्रथम ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ के माध्यम से एक सूची तैयार की जा रही है, जिसमें इस विषाणु के विरूद्ध मनुष्य के लिए उपयोगी फाइटोकैमिकल्स को रखा जाएगा। उसके पश्चात ‘बायोइन्फोर्मेटिक्स’ साधनों एवं ‘कम्पूटेशनल डोकिंग’ के माध्यम से सभी सम्भावित विकल्पों एवं सम्भावनाओं पर कार्य कर सबसे कारगर पाये गये कम्पाउंडों के एक संग्रह का निर्माण किया जायेगा जो कि दवा निर्माण में लगे वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होगा। इससे न सिर्फ समय अपितु ऊर्जा व संसाधनों की भी बचत होगी तथा कम समय में बेहतर नतीजे प्राप्त होंगे।

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कुमाऊं विवि के लिए’पहला पेटेंट’ हासिल कर प्रो. वीना ने रचा इतिहास, महाबीमारी के लिए खोजी पहाड़ी प्राकृतिक औषधि

-जैव प्रौद्योगिकी विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक प्रो. लालजी सिंह व प्रो. दुबे के साथ हासिल किया पेटेंट
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने विवि के लिए पहला पेटेंट हासिल कर इतिहास रच दिया है। विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक कहे जाने वाले प्रो. लालजी सिंह व बनारस हिंदू विवि के प्रोफेसर जीपी दुबे के साथ वर्ष 2011-12 से नैनीताल के अयारपाटा क्षेत्र में पहाड़ के फल किलमोड़ा (दारुहरिद्रा) पर किए गए शोध से मधुमेह के लिए प्राकृतिक, रसायन रहित आर्युर्वेदिक औषधि बनाने का रामबाण फार्मूला खोज निकाला है, जिसे अमेरिकी संस्था ‘इंटरनेशनल पेटेंट सेण्टर’ से पेटेंट प्रमाण पत्र प्राप्त हो गया है। आगे इस औषधि को व्यवसायिक तरीके से इस्तेमाल के लिए रोगियों तक पहुंचाने के लिए कंपनियों के साथ बात चल रही है।

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पूर्व में सात रिसर्च प्रोजेक्ट में कार्य कर चुकी और दो बार गवर्नर्स अवार्ड प्राप्त कर चुकी प्रो. पांडे ने अपनी उपलब्धि के बारे में एक विशेष बातचीत में खुलासा करते हुए बताया कि वानस्पतिक तौर पर बरबेरिस एरिस्टाटा (Berberis Aristata) कहे जाने वाले किलमोड़ा में मधुमेह से लड़ने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन इस पर अब तक कोई दवाई बाजार में उपलब्ध नहीं है। अब खोजा गया फार्मूला टाइप-2 यानी वयस्कों को होने वाले मधुमेह में रामबाण साबित हुआ है।

किल्मोड़ा
किल्मोड़ा के फल

परंपरागत तरीके से पौधों को होने वाला नुकसान रुकेगा
नैनीताल। यह सच्चाई है कि किलमोड़ा के मधुमेह में लाभदायक होने का तथ्य काफी समय से लोगों की परंपरागत जानकारी में है। परंपरागत तरीके के उपचार में लोगों का मानना है कि किलमोड़ा की जड़ें मधुमेह में लाभदायक हैं, इसलिए लोग इसकी जड़ों को काट ले जाते हैं, और इसे रात भर पानी में भिगोकर सुबह पी लेते हैं। इस कारण इसके पौधे मर जाते हैं। बीते दौर में इस कारण किलमोड़ा की जड़ों का काफी मात्रा में अंधाधुंध दोहन भी किया जाता रहा है। अब वन विभाग इस पर कुछ हद तक नजर रखता है। जबकि प्रो. पांडे के फार्मूले में इसकी जड़ों से वैज्ञानिक तरीके से अधिकाधिक सत्व निकालकर उसकी दवाई बनाई जाती है। साथ ही आगे इसके तने व अन्य भागों से भी सत्व निकाले जाने की विधि खोजी गयी है।

kilmoda (किल्मोड़ा): The famous fruit of Hills like Hisaaloo and Bedu 1
किल्मोड़ा के फल

किलमोड़ा को टिश्यू कल्चर से उत्पादित करने पर भी चल रहा है कार्य
नैनीताल। प्रो. वीना पांडे ने बताया कि किलमोड़ा के पौधों को औषधीय गुणों के कारण हो रहे दोहन के बाद भी बचाने के लिए प्रयोगशाला में इसके पौधे ‘टिश्यू कल्चर’ विधि से उत्पादित करने पर भी कुमाऊं विवि में उनकी प्रयोगशाला में कार्य हो रहा है। इसके विधि को ‘स्टेंडर्डाइज्ड’ किया जा रहा है। इससे किल्मोड़ा के अधिक पौधे उगाये जा सकेंगे। 

राष्ट्रीय सहारा, 25 मार्च 2018, पेज-1

बच्चों का पसंदीदा फल है किलमोड़ा
नैनीताल। पहाड़ में किलमोड़ा की छोटी कांटेदार झाड़ियां पाई जाती हैं। गर्मियों की ऋतु में इस पर कमोबेश अंगूरों जैसे नजर आने वाले छोटे-छोटे फल गहरे लाल-काले रंग में पक जाते है। हल्के खट्टे-मीठे-कसैले स्वाद के यह फल बच्चों के द्वारा खासे पसंद किये जाते हैं। इसका पीले रंग का फूल भी आकर्षक होता है, और शहद बनाने वाली मधुमक्खियों व भंवरों का पसंदीदा होता है।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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