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‘नवीन समाचार’ एक्सक्लूसिव: शासन एवं जिला प्रशासन के ड्रीम प्रोजेक्ट के नाम पर अवैध खनन व वृक्ष पातन का ‘खेल’

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डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अक्टूबर 2021। नैनीताल जनपद के रामगढ़ में उमागढ़ ग्राम सभा के अंतर्गत राज्य सरकार एवं जिला प्रशासन के द्वारा मल्ला रामगढ़ में डीम प्रोजेक्ट के रूप में विकसित किए जा रहे सेब के बागान में उद्यान विभाग की मिलीभगत से लकड़ी एवं पत्थरों का अवैध कारोबार किए जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। देखें संबंधित वीडियो:

इस मामले में क्षेत्रीय ग्रामीण मुखर हो गए हैं और यहां बांज एवं अन्य प्रजातियों के अनेक पेड़ों को काटने तथा उनकी लकड़ी चीरकर बेचने एवं इसी तरह से जंगल में मार्ग बनाने के नाम पर पत्थरों का अवैध खनन करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा ग्रामीणों ने आगे बरसात होने पर यहां के मलबे के नीचे गांव में जाकर वहां तबाही मचाने की आशंका भी जताई है।

पूछे जाने पर क्षेत्रीय ग्राम प्रधान रेखा जोशी ने कहा कि मामला संज्ञान में आने पर उन्होंने मौका मुआयना किया है। वन विभाग की ओर से कार्य रुकवाने के साथ कार्रवाई की गई है। वहीं इस मामले में पूछे जाने पर डीएम धीराज गर्ब्याल ने कहा कि वन विभाग द्वारा ठेकेदार का पेड़ों को गिराने व अवैध कटान पर करीब एक लाख रुपए का चालान कर दिया गया है। साथ ही ठेकेदार से आगे यहां इस तरह की गतिविधि न करने की चेतावनी दी गई है। इसके अलावा डीएम ने नवीन समाचार द्वारा मामला संज्ञान में लाये जाने के बाद अवैध खनन को लेकर भी कार्रवाई करने की बात कही है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : यूपी की घटना के बाद उत्तराखंड में भी किसान आन्दोलन को चढ़ने का ‘मौका’, मंत्रियों के कार्यक्रम स्थगित, सीएम को भी कार्यक्रम निरस्त करने की चुनौती

lakhimpur kheri kisan farmer angry in uttarakhand closed shops protested  kisan andolan - लखीमपुर खीरी कांड:यूपी के बाद उत्तराखंड में भी फैली  आग,आक्रोशित किसानों का रुद्रपुर सहित ...नवीन समाचार, जनरल डेस्क, 4 अक्टूबर 2021। उत्तर प्रदेश के लखीमपुरी खीरी में रविवार को उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य के कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र की कार से दबकर किसानों की मौत हो गई थी। इस मामले में उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार व देहरादून के मैदानी क्षेत्रों की कृषि पट्टी में किसान संगठन व्यापक विरोध प्रदर्शन पर उतर आए हैं।

सोमवार को इस मामले में उत्तराखंड के किसान संगठनों ने बाजपुर, काशीपुर, रुद्रपुर, किच्छा, हरिद्वार व देहरादून के डोईवाला आदि शहरों में विरोध प्रदर्शन किये और मंत्री के इस्तीफे और आरोपित पुत्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मुकदमा पंजीकृत करने की मांग की। कई जगह केंद्र व यूपी सरकार के पुतले भी दहन किए गए। नैनीताल जनपद के कालाढुंगी में भी भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले किसानों ने प्रदर्शन किया और पुतला फूका। देखें विडियो :

उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन अब तक यूपी व उत्तराखंड में किसान संगठनों की अपेक्षानुरूप नहीं उभर पा रहा था, किंतु लखीमपुर की घटना ने किसान संगठनों को इस मुद्दे को उभारने का मौका दे दिया है। कांग्रेस व आप जैसी पार्टियों को भी इस मुद्दे में राजनीतिक लाभ दिख रहा है, इसलिए वह भी आग में घी डालने को तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, इसी कड़ी में आज ऊधमसिंह नगर जनपद में काशीपुर, बाजपुर व गदरपुर आदि से किसानों ने विरोध प्रदर्शन कर जिला मुख्यालय स्थित कलक्ट्रेट कूच किया और रुद्रपुर के कलक्ट्रेट गेट पर किसानों ने धरना प्रदर्शन किया। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर सोमवार को भाकियू प्रदेश अध्यक्ष कर्म सिंह पड्डा की अगुवाई में सैकड़ों किसान बाजपुर से लखीमपुर खीरी को प्रस्थान कर चुके हैं।

इस दौरान काशीपुर में भारतीय किसान यूनियन (युवा) प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह जीतू ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बुधवार को प्रस्तावित काशीपुर आगमन का बड़े स्तर पर विरोध का ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री के आगमन को निरस्त करने की मांग की। किसानों के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए राज्य के चीनी व गन्ना उद्योग मंत्री यतीश्वरानंद का सोमवार का सितारगंज चीनी मिल दौरा रद्द हो गया। वहीं बाजपुर के विधायक व काबीना मंत्री यशपाल आर्य ने भी अपना जिले का दौरा निरस्त कर दिया।

उल्लेखनीय है कि रविवार को लखीमपुर खीरी में विकास योजनाओं का शिलान्यास करने पहुंचे थे। उनका हेलीकॉप्टर न उतरे, इसलिए किसानों ने हेलीपैड पर कब्जा कर लिया था। इस कारण मौर्य सड़क मार्ग से खीरी पहुंचे। दोपहर 12 बजे शिलान्यास हुआ। इसके बाद मौर्य को दंगल का उद्घाटन करना था। रास्ते में तिकुनिया में किसान बड़ी संख्या जमा थे, इस पर मौर्य का रूट बदल दिया गया। इसी दौरान मौर्य के कार्यक्रम में शामिल होने मंत्री पुत्र आशीष मिश्र भी काफिले के साथ तिकुनिया मार्ग से जा रहे थे। विद्युत उपकेंद्र के पास जमा किसानों और आशीष के बीच झड़प हो गई। किसान नेताओं का आरोप है कि आशीष ने उन पर गाड़ी चढ़ा दी। इससे सात किसानों की मौत हो गई। इसके बाद किसानों ने काफिले पर धावा बोल दिया और गाड़ियों में आग लगा दी। मंत्री पुत्र को भी खेतों में भागकर जान बचानी पड़ी, जबकि उनके चालक सहित कई भाजपा नेताओं की भी मौत की खबर है। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-रामगढ़ में 3 एकड़ में किए गए सेब के पौधों में लगने लगे फूल, आगे हॉर्टिकल्चर टूरिज्म सेंटर के रूप में होगा विकसित

रामगढ़ में डीएम के निर्देशन में तैयार की जा रही सेब के पौधों की नर्सरी में खिले फूल।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 2 अगस्त 2021। जिलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल द्वारा जनपद में कार्यभार संभालने पर उद्यान एवं बागवानी पर कार्य करने की प्राथमिकता बताई थी। अब उनके इस दिशा में प्रयास धरातल पर दिखने लगे हैं। डीएम के प्रयासों से जनपद के किसानो को अच्छी किस्म के सेब के पौधे दिलाने के लिए एक उन्नत किस्म की नर्सरी, एक उद्यान, ट्रेनिंग सेंटर और हार्टिकल्चर टूरिज्म को प्रमोट करने के लिए पार्किंग की सुविधायुक्त एक कैफे और कॉटेज की परिकल्पना की गई है। इस परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए रामगढ़ में 8 एकड़ जमीन ढूंढकर उसे विकसित किया गया है। पहले चरण मे यहां सेब की नर्सरी हेतु रूट स्टॉक्स और सेब के पौधों का प्लांटेशन किया गया है। अब दूसरे चरण मे किसानो के लिए ट्रेनिंग सेंटर, पर्यटकों के रहने के लिए पारंपरिक शैली मे कॉटेज और पार्किंग की सुविधा के साथ कैफे के निर्माण का कार्य किया जा रहा है। इससे जनपद के किसानों को वातावरण के अनुकूल उन्नत किस्म के सस्ते पौधे आसानी से उपलब्ध होंगे।

उल्लेखनीय है कि श्री गर्ब्याल ने पौड़ी के बाद जनपद नैनीताल में हॉर्टिकल्चर टूरिज्म की अवधारणा को विकसित करने के लिए जनपद के किसानो के लिए जनपद की एम-7, एमएम-111, एमएम -116 व एमएम-106 प्रजाति की दस हजार रूट स्टॉक की पहली नर्सरी एवं ग्रेनी स्मिथ, डेकारिली, हनी क्रिस्प, हेप्के, जेरोमिन उच्च घनत्व के 2500 सेब के पौधों का उद्यान तैयार किया जा रहा है। इसकी जिलाधिकारी द्वारा नियमित मॉनीटरिंग भी की जा रही है।

यह भी पढ़ें : नैनीताल के किसान नरेन्द्र के नाम जुडी बड़ी उपलब्धि, भारत सरकार ने पंजीकृत की गेहूं की ‘नरेन्द्र-09’ प्रजाति

-12 वर्षो के अथक प्रयास के बाद मिली सफलता

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 31 जुलाई 2021। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के किसानों की आय दो गुना करने के संकल्प के बीच उन्हीं के नाम पर ‘नरेंद्र-09’ नाम की गेहूं की एक प्रजाति को भारत सरकार से पेटेंट मिल गया है। भारत सरकार ने ‘नरेंद्र-09’ को नैनीताल जनपद के खेड़ा गौलापार निवासी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा के नाम पर पंजीकृत कर दिया है। ‘नरेंद्र-09’ गेहूं की एक ऐसी प्रजाति है, जिसके अन्य प्रजातियों की अपेक्षा करीब 15-16 फीसद कम बीज बोने पड़ते है और सामान्य बीज के मुकाबले 12 से 14 फीसद अधिक उपज होती है। खास बात यह भी है कि ‘नरेंद्र-09’ जैविक बीज है, इसलिए इसकी रोटियां पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ अधिक स्वादिष्ट होती हैं, और हाइब्रिड बीजों से इतर किसान इसके बीच एक वर्ष लेकर अगले वर्षों से खुद के बीज तैयार कर बो सकते हैं। यह कम पानी के साथ तराई-भावर में केवल एक या दो सिचाई से एवं पर्वतीय क्षेत्रों में केवल बारिश के भरोसे भी उगाया जा सकता है। पहाड़ में भी इसकी सामान्य बीज के मुकाबले प्रति एकड़ में दो से ढाई कुंतल अधिक उपज होती है।
यह संयोग है कि नरेंद्र मेहरा करीब तीन दशक से नरेंद्र मोदी की ही पार्टी भाजपा से जुड़े हैं, अलबत्ता उनकी इस खोज व नाम का पार्टी से कोई संबंध नहीं है। गेहूं की इस प्रजाति का नाम नरेंद्र-09 केवल इसलिये है कि इसे नरेंद्र मेहरा ने वर्ष 2009 में खोजा है। वर्ष 2009 में मेहरा को अपने गेहूं के खेत में सामान्य पौधों के बीच सबसे बड़ी गेहूं की बाली मिली थी, जिसको उन्होंने लाइन सलेक्शन द्वारा चयनित कर इस नई किस्म को विकसित किया, और इसका नाम ‘नरेंद्र 09’ रखा। शुरुआती दौर में खुद के बाद अन्य किसानों के खेतों में परीक्षण के तौर पर इस प्रजाति का गेहूं बोया गया और उसकी विशेषताओं को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र ज्योलीकोट के सहयोग से जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर में परीक्षण के तौर पर बोया गया। तत्पश्चात निदेशक रिसर्च के आदेश पर नरेंद्र 09 गेहूं को कृषि अनुसंधान केंद्र मझेड़ा जनपद नैनीताल एवं कृषि विज्ञान केन्द्र ग्वालदम चमोली में बोया गया। जहां से सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद भारत सरकार की इकाई ‘पौधा किस्म और कृषक अधिकार प्राधिकरण’ ने इसे नरेंद्र मेहरा के नाम पर पंजीकृत कर दिया है।
मेहरा ने बताया कि वर्ष 2017 में बीज को उनके नाम पर पंजीकृत कराने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ज्योलीकोट के प्रभारी डॉ विजय कुमार दोहरे ने पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण भारत सरकार को बीज उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के वैज्ञानिक डॉ. जेपी जायसवाल ने विश्वविद्यालय स्तर पर इस बीज का परीक्षण कर पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण को इसकी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। श्री मेहरा ने इस उपलब्धि में सहयोग देने के लिए पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति शोध एवं प्रसार निदेशक सहित सभी वैज्ञानिकों का आभार व्यक्त किया है जिन्होंने उनका समय-समय पर मार्गदर्शन और सहयोग दिया। इस उपलब्धि से किसान श्री मेहरा राष्ट्रीय स्तर के उन मूर्धन्य किसानों की सूची में शामिल हो गए हैं जिन्होंने कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए विभिन्न प्रकार की फसलों के बीजों को विकसित कर राष्ट्रीय स्तर पर अपना योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि आगे उनकी योजना अपने इस बीज को राष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से देश-प्रदेश में प्रसार दिलाने की होगी ताकि बीज की इस प्रजाति से किसान जैविक खेती करें एवं लोगों को पौष्टिक व जैविक भोजन मिल सके। अलबत्ता किसी भी प्राइवेट कंपनी को व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए यह बीज नहीं देंगे। लिहाजा, यदि उनकी यह खोज सही तरह से देश में प्रसारित होती है जो इससे बिना अतिरिक्त रसायनिक खाद व अन्य प्रयासों के लगातार घटती खेती की जमीनों व किसानों में खेती के प्रति लगातार घटते रुझान, खेती में नुकसान व लगातार आ रही किसानों की आत्महत्याओं की गंभीर चुनौतियों के दौर में खेती-किसानी को बेहतर उत्पादन के साथ नवजीवन मिल सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

नरेंद्र-09 प्रजाति के गेहूं का अन्य प्रजातियों से तुलनात्मक विवरण

नैनीताल। प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा के अनुसार प्रदेश के भाबर क्षेत्र में जहां अन्य प्रजातियों के गेहूं के एक बीज से उगने वाले एक पौधे में जहां 3 से 8 तक कल्ले निकलते हैं, और हर कल्ले में एक के हिसाब से इतनी ही बालियां लगती हैं, वहीं नरेंद्र-09 में 40 कल्ले तक आते हैं, और हर कल्ले में 93 से 95 दाने तक आते हैं। जबकि अन्य प्रजातियों की एक बाली में केवल 55 से 60 दाने ही लगते हैं। इस प्रकार जहां एक एकड़ में अन्य प्रजातियों के गेहूं की उपज 12 से 16 कुंतल प्रति एकड तक होती है़, वहीं नरेंद्र-09 की पैदावार 18 से 26 प्रति एकड यानी करीब डेढ़़ से दो गुना तक होती है। जबकि जनपद के पर्वतीय क्षेत्र में किये गये एक प्रयोग के तहत नरेंद्र-09 के एक मुट्ठी बीज से हर पौधे में 19 से 22 कल्ले तक निकले और अन्य प्रजातियों के 1 मुट्ठी बीज से 3 से 3.5 नाली उत्पादन के मुकाबले 9 नाली यानी करीब तीन गुना तक गेहूं उत्पन्न हुआ है।

इसके अलावा भी जहां कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार भाबर क्षेत्र में एक एकड़ में अल्स प्रजातियों का 40 किग्रा बीज बोने की सलाह दी जाती है, वहीं नरेंद्र-09 को 35 किग्रा बोने से ही काम चल जाता है। इसके अलावा एक पौधे में अधिक कल्ले होने की वजह से इसका पौधा अन्य प्रजातियों के मुकाबले अधिक मजबूत भी होता है, और आंधी-तूफान आने पर भी गिरता नहीं है। वहीं इसका पौधा अन्य प्रजातियों के पौधों के मुकाबले अधिक पुष्ट व मजबूत भी होता है, जिस कारण अधिक पकने के बावजूद इसकी बालियों से गेहूं खेत में गिरते नहीं हैं। इसका पौधा अधिक लंबा होता है, जिस कारण इससे बनने वाला भूसा भी 20 फीसद अधिक व अच्छा होता है। अधिक मात्रा में और जानवरों के लिये अधिक पौष्टिक होता है। स्वाद में भी इसके आटे की रोटियां अधिक स्वादिष्ट बताई गयी हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : आया मोदी जैसा गेहूं ‘नरेंद्र-09’, देता है दो-तीन गुना अधिक उत्पादन

राष्ट्रीय सहारा, 18 दिसंबर 2017

-नैनीताल जनपद के गौलापार खेड़ा निवासी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने की खोज, पेटेंट कराने की है तैयारी
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के किसानों व खेती को बढ़ावा देने के आह्वान के बीच उन्हीं के नाम पर ‘नरेंद्र-09’ नाम की गेहूं की एक ऐसी प्रजाति प्रकाश में आयी है, जो मोदी की तरह ही (जैसे मोदी नवरात्र में ब्रत करने के बावजूद दिन में 20 घंटे तक कार्य करते हैं) दो से तीन गुना अधिक उत्पादकता देती है। हालांकि गेहूं की इस प्रजाति के नाम और नरेंद्र मोदी में कोई संबंध नहीं है, लेकिन देश में ‘नमो-नमो’ की गूंज के बीच यह संयोग ही है कि इस प्रजाति को मोदी के ही हम नाम नरेंद्र मेहरा (आप चाहें तो उन्हें ‘नमे’ कह लें) ने खोजा है। और यह भी संयोग है कि नरेंद्र मेहरा करीब तीन दशक से यानी नरेंद्र मोदी की ही पार्टी भाजपा से जुड़े हैं, अलबत्ता उनकी इस खोज व नाम का पार्टी से कोई संबंध नहीं है। गेहूं की इस प्रजाति का नाम नरेंद्र-09 केवल इसलिये है कि इसे नरेंद्र मेहरा ने वर्ष 2009 में खोजा है।

अपने कार्य को गंभीरता व पूरी तन्मयता किसी को भी बड़ी उपलब्धि दिला सकती है। खेती-किसानी करते हुए अपने गेहूं के खेत में अन्य पौधों के साथ एक असामान्य रूप से अधिक विकसित हुए पौधे ने जनपद के गौलापार देवला मल्ला निवासी किसान नरेंद्र मेहरा को एक बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया है। नरेंद्र अब अपनी विकसित की गयी गेहूं की प्रजाति ‘नरेंद्र-09’ को पेटेंट कराने जा रहे हैं। जबकि उनकी प्रजाति को ‘फार्मर्स वैराइटी’ यानी किसानों द्वारा तैयार प्रजाति के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यदि उनकी यह खोज सही तरह से देश में प्रसारित होती है जो इससे बिना अतिरिक्त रसायनिक खाद व अन्य प्रयासों के लगातार घटती खेती की जमीनों व किसानों में खेती के प्रति लगातार घटते रुझान, खेती में नुकसान व लगातार आ रही किसानों की आत्महत्याओं की गंभीर चुनौतियों के दौर में खेती-किसानी को बेहतर उत्पादन के साथ नवजीवन मिल सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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नैनीताल जनपद के भूगोल में परास्नातक एवं पर्यटन में डिप्लोमाधारी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा की इस नयी खोज की कहानी वर्ष 2009 से प्रारंभ हुई। एक दिन वे अपने आरआर-21 प्रजाति के गेहूं के खेत का निरीक्षण कर रहे थे, तभी उनकी नजर एक अधिक विकसित हुए पौधे पर पड़ी, जिस पर उन्होंने पहचान चिन्ह लगा दिया, और आगे इसी पौधे से निकले बीजों को अगले वर्षों में अलग से उगाकर वर्ष 2013 तक इस एक पौधे के बीज से ही 80 किग्रा बीज उत्पन्न कर लिया। 2013 से ही उन्होंने अपनी इस खोज को केवल स्वयं के खेतों तक सीमित करने के बजाय आस-पड़ोस के आधा दर्जन अन्य किसानों को भी उगाने को दिया, साथ ही इसके वैज्ञानिक परीक्षण के लिये भी पंतनगर विवि से प्रयास शुरू किये, और अपनी प्रजाति को अपने नाम व इसे खोजे जाने के वर्ष के साथ नरेंद्र-09 नाम दिया।

नरेंद्र ने बताया कि अब उनकी प्रजाति की ‘फार्मर्स वैराइटी’ के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। साथ ही वे इसे पेटेंट कराने की भी तैयारी में हैं। इसके अलावा वे इस प्रजाति को पूरी तरह जैविक तरीके से उगाकर इसका जैविक उत्पाद के रूप में पंजीकरण कराने के साथ ही इसकी गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिये भी प्रयासरत हैं। आगे वे सरकार से इसके गुणों का अन्य प्रजातियों से वैज्ञानिक तरीके से तुलनात्मक अध्ययन व जेनेटिक परीक्षण कराने के लिये मांग कर रहे हैं कि उनकी प्रजाति को प्रदेश के सभी जिलों में निःशुल्क तरीके से उगाकर परीक्षण करा लिये जाएं, ताकि प्रदेश के अधिक किसानों को इसका लाभ मिल पाए। उन्होंने बताया कि नरेंद्र-09 के लिये बिजाई का समय 20 नवंबर से 5 दिसंबर तक है, और इसकी फसल अप्रैल माह में अन्य प्रजातियों के साथ ही पकती है। अपनी इस उपलब्धि के लिये वे नैनीताल के जिला कृषि अधिकारी से वर्ष 2015-16 में ‘किसान श्री’ तथा मंडी समिति से ‘स्वतंत्रता दिवस कृषि सम्मान’ प्राप्त कर चुके हैं।

‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले किसान नरेंद्र मेहरा को सीएम ने किया सम्मानित

नैनीताल। दो से तीन गुना तक पैदावार देने वाली गेहूं की नई किस्म ‘नरेंद्र 09’ विकसित करने वाले जनपद के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा को शुक्रवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविश्वविद्यालय, पंतनगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस उपलब्धि के लिये सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि पंतनगर विवि इस संबंध में मेहरा की उपलब्धि को अन्य किसानों तक पहुंचाने में मदद करे। इस मौके पर पंतनगर विवि के कुलपति प्रो. ए के मिश्रा, विधायक राजेश शुक्ला व राजकुमार ठुकराल, तथा प्रसार निदेशक डा. वाईपीएस डबास आदि भी मौजूद थे। 

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-मैदानी क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार हो पहाड़ों पर गैर मौसमी सब्जी का उत्पादन: मंडलायुक्त
-मंडलायुक्त ने की कृषि, उद्यान, पशुपालन, मत्स्य, रेशम, को-ऑपरेटिव, समाज कल्याण, चिकित्सा आदि विभागों की समीक्षा
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 29 जुलाई 2021। कुमाऊं मंडल के आयुक्त सुशील कुमार ने कृषि, उद्यान तथा आजीविका के संसाधनों से जुड़े सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों से जनहित में आपसी तालमेल से बेहतर कार्य करने को कहा है। बृहस्पतिवार को कृषि, उद्यान, पशुपालन, मत्स्य, रेशम, को-ऑपरेटिव, समाज कल्याण, चिकित्सा आदि विभागों द्वारा कुमाऊं मण्डल में संचालित योजनाओं कीएलडीए सभागार में समीक्षा करते हुए श्री कुमार ने कहा कि मंडल को सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में पूर्ण आत्म निर्भर बनाने का प्रयास किया जाये।

इसके लिए उन्होंने मैदानी क्षेत्रों की जरूरतों के हिसाब से पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष तौर पर गैर मौसमी सब्जी उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा, ताकि सब्जी उत्पादों की अच्छी कीमत प्राप्त हो। इसके लिए उन्होंने सभी विभागों के अधिकारियों से किसानों को समय से बीज उपलब्ध कराने, ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई व कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के साथ क्लस्टर आधारित गतिविधियों को प्रोत्साहित करने, पलायन वाले विशेषकर अल्मोड़ा, बागेश्वर आदि क्षेत्रों में विशेष ध्यान केन्द्रित करते हुए कार्य करने के निर्देश दिये। साथ ही उन्होंने मंडल में उत्पादित तेज पत्ते की ब्राण्डिंग करने, ऑर्गेनिक तथा परम्परागत खेती को बढ़ावा देने, उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के निर्देश भी दिये।

उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में मंडुवा का प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने हेतु टीडीसी का सहयोग लेने, परम्परागत कृषि विकास योजना के अन्तर्गत गठित कलस्टरों के उत्पादों के प्रमाणीकरण हेतु ऑर्गेनिक बोर्ड को शामिल करने तथा जैविक बोर्ड व हिलांस के माध्यम से उत्पादों की मार्केटिंग कराने, पीएम किसान सम्मान निधि योजना के अन्तर्गत पात्र व्यक्तियों को शत-प्रतिशत योजना का लाभ दिलाने के निर्देश संयुक्त निदेशक कृषि को दिये। साथ ही मैदानी क्षेत्रों में धान की तीसरी फसल-समर पैडी के उत्पादन को हतोत्साहित करने तथा उसके स्थान पर विकल्प के तौर पर मक्का की खेती को प्रोत्साहित करने के निर्देश संयुक्त निदेशक कृषि को दिये।

उन्होंने पीएम फसल बीमा योजना की समीक्षा करते हुए कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये कि फसलों को नुकसान पहुॅचने की सूचना मिलते ही विभागीय अधिकारी तथा कर्मचारी तुरन्त कार्यवाही करने को भी कहा। उन्होंने पीएम कृषि सिंचाई योजना के अन्तर्गत किये गये कार्यों से किसानों को होने वाले लाभ एवं परिवर्तन की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिये।

पशुपालन विभाग की समीक्षा के दौरान मंडलायुक्त ने चारा विकास, समय से पशुओं का टीकाकरण, पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल करने, पशु सेवा केंद्र एंव पशु चिकित्सालयों में कर्मचारियों की मौजूदगी हर समय बनाए रखने, मत्स्य विभाग की समीक्षा के दौरान रेफ्रिजरेटेड वैन खरीदने, को-ऑपरेटिव विभाग की समीक्षा के दौरान दीनदयाल उपाध्याय अल्पकालीन ऋण वितरण योजना के अन्तर्गत सभी पात्रो को योजना से लाभांवित करने, फसल खरीद के दौरान फर्जीवाडा करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्यवाही करने के निर्देश दिए। साथ ही चिकित्सा, समाज कल्याण, श्रम, रेशम आदि विभागों की भी विस्तार से समीक्षा करते हुए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिये। उन्होंने नाबार्ड का एक मंडलीय अधिकारी नामित कराने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश उप निदेशक अर्थ एवं संख्या को दिये।

बैठक में निदेशक स्वास्थ्य डॉ. शैलजा भट्ट, अपर निदेशक शिक्षा रघुनाथ लाल आर्य, उप निदेशक अर्थ एवं संख्या राजेंद्र तिवारी, संयुक्त निदेशक उद्यान हरीश तिवारी, संयुक्त निदेशक कृषि पीके सिंह, संयुक्त निदेशक समाज कल्याण वंदना सिंह, सहायक श्रम आयुक्त उमेश राय, प्रशांत कुमार सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : लगातार हो रही बारिश-ओलावृष्टि से खेती-बागवानी तबाह, नैनीताल में तय हुए फल-सब्जियों के दाम

अलचौना गांव में बारिश-ओलावृष्टि से बरबाद हुई टमाटर की नई पौध।

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 मई 2021। बीते कुछ दिनों से जनपद के मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों में कमोबेश हर रोज अपराह्न में अंधड़ के साथ बारिश व ओलावृष्टि हो रही है। इससे मैदानी क्षेत्रों में आम एवं लीची में आ रही बौर और पर्वतीय क्षेत्र में आड़ू की नई कोपलों के साथ फलों और पहाड़ी टमाटर व अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। क्षेत्रीय ग्रामीण गौरव भट्ट ने बताया कि भवाली के पास अलचौना गांव में बारिश-ओलावृष्टि से टमाटर की फसल तबाह हो गई है। इसी तरह रामगढ़, मुक्तेश्वर से लेकर गरमपानी तक की फल पट्टी में भी फसलों व फलोद्यानों को भारी नुकसान पहुंचा है। जाफ, कफुल्टा व बारगल आदि गांवों में भी आड़ूं के बागानों को भारी नुकसान पहुंचने की खबर है। अलबत्ता, लोग यह भी मान रहे हैं कि यह बारिश-ओलवृष्टि व अंधड़ कोरोना की महामारी का क्षेत्र से खात्मा करने में मददगार साबित हो सकता है तो भी संतोष किया जा सकता है। अलबत्ता, ग्रामीणों ने सरकार से नुकसान का जायजा लेकर भरपाई करने की मांग की है।

नैनीताल में तय हुए फल-सब्जियों के दाम
नैनीताल। जिला प्रशासन ने बुधवार को एसडीएम आईएएस अधिकारी प्रतीक जैन की अगुवाई में नगर की मंडी में फल-सब्जियों के दाम तय कर दिये हैं। तय दामों के अनुसार अब नगर में आलू 15 से 18, प्याज 18 से 20, लौकी, कद्दू व टमाटर 10 से 15, मटर व अदरक 55 से 65, भिंडी 30 से 35, नीबू 90 से 110, खीरा 12 से 20, शिमला मिर्च 15 से 17, करेला 25 से 30, तोरई पहाड़ी 25 से 30, तोरई देशी 35 से 40, फूलगोभी 14 से 20, लहसुन 60 से 80, सेब 150 से 180, संतरा 60 से 90, अंगूर 70 से 90, अनार 100 से 130 रुपए प्रति किलोग्राम और केले 30 से 50 रुपए दर्जन तक के भाव पर उपलब्ध होंगे। एसडीएम जैन ने साफ किया है कि इससे अधिक कीमतें वसूले जाने को कालाबाजारी मानते हुए कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 6 मई 2021। नैनीताल उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने बृहस्पतिवार को किसान नेता डॉ. गणेश उपाध्याय द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड के कृषि सचिव हरवंश सिंह चुघ को अवमानना का नोटिस जारी करते हुए 3 हफ्ते के जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में पूर्व में याचिकाकर्ता डॉ. गणेश उपाध्याय की जनहित याचिका पर न्यायालय की खंडपीठ ने कृषि उपज के त्वरित भुगतान के आदेश दिए थे। इस पर सरकार ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ में लिखित तौर पर दिया था कि 48 घंटे से लेकर 1 हफ्ते के अंदर किसानों को धान व गेहूं का भुगतान कर दिया जाएगा।
विदित रहे कि आजकल गेहूं की तौल चल रही है, लेकिन अभी तक 80 करोड़ रुपए से लेकर 100 करोड़ रुपए के बीच भी भुगतान नहीं हो पाया है। जबकि गेहूं खरीद की दारी हुए लगभग 2 माह से ऊपर हो गए हैं। वहीं गन्ने का भुगतान विगत वर्ष और आज तक 700 करोड रुपए का लगभग होना बाकी है। 7 माह पहले धान का का भुगतान 21 करोड़ रुपए भी होना बाकी है। जबकि कोरोना काल चल रहा है पूरा देश देश के अन्नदाता के बदौलत जीवित है। जब किसान किसी बैंक से किसी कार्य हेतु ऋण लेता है, तभी से उसे ब्याज चढ़ जाता है, लेकिन भुगतान समय से प्राप्त न होने के कारण अन्नदाता की स्थिति बदतर बनी हुई है।

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रवींद्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 02 मार्च 2021। उत्तराखंड के रूद्रपुर में कृषि कानूनों के विरोध में आयोजित किसान महापंचायत में किसान नेता भीड़ एकत्र करने में तो कामयाब रहे, लेकिन कृषि कानूनों की खामियों को बताने में एकदम विफल रहे हैं। किसान महापंचायत कृषि कानूनों के विरोध के बजाय पूरी तरह से केंद्र सरकार के विरोध पर कंेद्रित रही। इससे किसान नेताओं ने भीड़ का दिल तो जीता लेकिन उत्तराखंड की जनता का विश्वास जीतने में नाकाम रहे।
किसान नेताओं की ओर से एक दिन पहलेे एक मार्च को धान का कटोरा कहे जाने वाले तराई के दिल रुद्रपुर में किसान महापंचायत आयोजित की गयी। महापंचायत में तराई के विभिन्न हिस्सों से हजारों किसानों की भीड़ भी उमड़ी। राज्य की जनता व प्रदेश के अन्य हिस्सों के किसानों की नजर भी किसान महापंचायत पर लगी थी। महापंचायत को संबोधित करने किसान संयुक्त मोर्चा के बड़े नेता राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी और दर्शनपाल भी आये। महापंचायत में प्रदेश के कृषकों व अकृषकों को उम्मीद थी कि किसान नेता कृषि कानूनों की खामियों पर सिलसिलेवार बात रखेंगे। कृषि कानूनों को लेकर आम लोगों के भ्रम को दूर करेंगे। कृषि कानूनों के प्रावधानों पर विस्तार से बात करेंगे लेकिन लोगों को महापंचायत से निराशा हुई। किसान नेताओं की ओर से कृषि कानूनों की खामियों व कमियों को गिनाने के बजाय केंद्र सरकार की खामियों पर बात की गयी व केंद्र सरकार का जमकर विरोध किया गया।
किसानों के बीच लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध राकेश टिकैत ने तो केंद्र सरकार पर सबसे तीखा हमला बोला और कहा कि केंद्र में लुटेरों की सरकार है। यह सरकार भूख पर व्यापार करती है। जिन्हें भगाया जायेगा। सरकार पूंजीपतियों की सरकार है। उन्होंने किसानों व लोगों से पंतजलि के उत्पादों और अंबानी के रिलायंस पेट्रोल पंपों का बहिष्कार करने का भी आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार आंदोलन में भाग लेने वाले किसानों को परेशान करने पर तुली हुई है। किसानों को नोटिस भेजे जा रहे हैं, उनके खिलाफ छापे मारे जा रहे हैं और जमीन भी कुर्क करने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने आगे कहा कि केंद्र सरकार की पिछले कुछ दिनों की खामोशी बता रही है कि सरकार किसानों के आंदोलन को दबाने के लिये नयी रणनीति पर विचार कर रही है लेकिन किसान डरेगा नहीं। जब तक तीनों कानूनों को वापस नहीं लिया जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा और आंदोलन को और तेज किया जाएगा। किसान नेता ने 26 जनवरी को हुए लालकिला प्रकरण को भी केंद्र सरकार की साजिश करार दिया और कहा कि किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिये केंद्र सरकार की ओर से यह साजिश रची गयी थी लेकिन केंद्र सरकार अपनी ही साजिश में फंस गयी। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन से अब देश का आम आदमी व मजदूर भी जुड़ने लगा है। उन्होंने गैस के बढ़ते दामों पर भी ंिचंता जताई और कहा कि महंगाई व केंद्र सरकार के खिलाफ महिलायें भी सड़कों पर उतरेंगी। यहीं नहीं कृषि कानूनों की लड़ाई में कई किसान शहीद हुए हैं। उन्होंने स्थानीय मोदी मैदान का नामकरण भी किसान मैदान के नाम से किया और कहा कि आज से यह किसान मैदान के नाम से जाना जाएगा।
किसान नेता राकेश टिकैत के भाषण को गौर से सुने तो उन्होंने कृषि कानूनों के नाम पर सिर्फ एक बात कही कि तीनों काले कानून हैं। उन्होंने किसानों व लोगों को यह नहीं बताया कि कानून क्यों काले हैं। उनमें किसानों के विरूद्ध कौन-कौन से प्रावधान मौजूद हैं जिससे देश के किसानों को नुकसान होगा। कांट्रेक्ट फार्मिंग के क्या नुकसान हैं और कैसे किसानों की जमीन छिन जायेगी। उन्होंने दावा किया है कि ऐसी ही किसान पंचायत वह उत्तराखंड के बाद राजस्थान के झुंझनु, जोधपुर, उप्र के सैफई, गाजीपुर बार्डर, बलिया, मध्यप्रदेश के शिवपुर, रीवा और कर्नाटक के कई हिस्सों में करेंगे। अब टिकैत साहब को कौन समझाये कि केंद्र सरकार का विरोध करके क्या हासिल होगा। देश के अधिकांश विपक्षी दल एक साथ मिलकर भी मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ पाये बल्कि मोदी और मजबूत होकर उभरे हैं। अच्छा होता कि वे महापंचायत में किसान कानूनों को बीच में रखकर बात करते। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक और आम लोग भी अब दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को राजनीतिक स्टंटबाजी करार देने लगे हैं। ऐसे में किसान नेताओं से उम्मीद है कि वह किसानों के आंदोलन को मुख्य उद्देश्य से भटकने नहीं देंगे और किसान हितों को ही मुख्य धारा में रखकर इस लड़ाई को आगे लड़ेंगे। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब किसान आंदोलन लोगों की बची-खुची सहानुभूति को भी खो देगा।

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नवीन समाचार, गाजियाबाद, 05 फरवरी 2021। किसान आंदोलन के दौरान 6 फरवरी को प्रस्तावित चक्का जाम पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लोगों के लिए महत्वपूर्ण समाचार है। आखिरी वक्त पर किसान संयुक्त मोर्चे ने 6 फरवरी के राष्ट्रव्यापी चक्काजाम कार्यक्रम को यूपी और उत्तराखण्ड में चक्का जाम की जगह जुलूस और प्रदर्शन में बदला गया है। इसको लेकर हो रही भ्रम की की स्थिति को दूर करने के लिए भारतीय किसान यूनियन टिकैत की ओर से भाकियू के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र मलिक ने यह बयान जारी किया है, ‘उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान शनिवार को सड़क पर जाम नहीं लगाएंगे, बल्कि शांतिपूर्वक जिला मुख्यालय और तहसील मुख्यालय पर ज्ञापन देंगे। इन दोनों राज्यों में जाम की कॉल वापस लेने पर एक सवाल के जबाब में किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि यूपी और उत्तराखंड के किसानों को स्टैंडबाइ में रखने का फैसला लिया गया है। इस दौरान यूपी गेट (गाजीपुर बार्डर) पर श्री टिकैत के साथ संयुक्त मोर्चा के सदस्य और किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल भी मौजूद थे। राजेवाल ने कहा कि विशेष कारणों से यूपी और उत्तराखंड के लिए शनिवार के चक्का जाम कार्यक्रम में थोड़ा बदलाव किया गया है। चक्का जाम की कॉल वापस नहीं ली गई है, बल्कि कार्यक्रम में मामूली सा फेरबदल किया गया है। यूपी और उत्तराखंड के किसान अपने तहसील और जिला मुख्यालय पर जाकर अधिकारियों को ज्ञापन देंगे। ज्ञापन में तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी पर कानून की मांग की जाएगी। किसानों से यह कार्यक्रम शांतिपूर्वक करने की अपील की गई है। श्री टिकैत ने कहा कि आंदोलन को बैकअप देने के लिए यूपी और उत्तराखंड के एक लाख किसानों को बैकअप में रखा गया।’

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नवीन समाचार, नैनीताल, 04 दिसम्बर 2020। राजधानी दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में चल रहे किसान आंदोलन उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के आम किसानों की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है। अलबत्ता जिला-मंडल मुख्यालय में आज शुक्रवार को दिल्ली व अन्य स्थानों पर आंदोलित किसानों को समर्थन देने के लिए ‘नैनीताल पीपल्स फोरम’ के बैनर तले पूर्वघोषित कार्यक्रम के तहत धरना किया गया। तल्लीताल डाँठ पर गांधी जी की प्रतिमा के बगल में आयोजित इस धरने में आंदोलनरत किसानों की माँगों के साथ एकजुटता जतलाई गयी।

वक्ताओं ने केंद्र सरकार द्वारा किसानों के आंदोलन की अवहेलना करने और उन्हें बातचीत के जाल में फंसाने की कोशिश की निंदा की और सरकार से आग्रह किया कि किसानों की मांगों को मानते हुए पिछले दिनों जल्दबाजी में पारित तीन कृषि कानूनों को तत्काल खत्म किया जाए। धरने में प्रो. शेखर पाठक, राजीव लोचन साह, जहूर आलम, प्रो. उमा भट्ट, प्रो. केबी मेलकानी, कैलाश जोशी अनिल कार्की, दिनेश उपाध्याय, माया चिलवाल, चंचला बिष्ट, विनीता यशस्वी, जय जोशी, पंकज भट्ट, अपल, भावना, पंकज जोशी व हरीश पाठक आदि ने अपने विचार व्यक्त किये।

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-इन की देख-रेख व लालन-पालन में देशी, जर्सी एवं अन्य नस्ली की गायों की अपेक्षा 10 प्रतिशत भी खर्चा नही आता हैं

बद्री गाय

महिपाल गुसाईं @ नवीन समाचार, गोपेश्वर, 28 जून 2020। ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात के सिल पर पड़त निशान।’ यह कहावत सीमांत जिले में पहाड़ की अपनी, आम बोलचाल की भाषा में पहाड़ी गाय कही जाने वाली, बद्री गाय पालन के मामले में सौ फीसद चरितार्थ हो रही हैं। धीरे-धीरे ही सही किंतु लगातार प्रयासों के बाद बद्री-गाय का दूध व घी ग्रामीणों की आजीविका को संवारने लगा है। सफलता की इस इबारत को देख कर माना जा रहा हैं कि सब कुछ ठीक रहा तो बद्री गायें पहाड़ से पलायन रोकने में काफी कारगर साबित हो सकती हैं।

बद्री गाय नाम सुन कर एकाएक एक स्वाभाविक सी उत्सुकता उत्पन्न होती है कि आखिर ये कौन सी नस्ल की गाय हैं, और कहां रहती हैं, क्या खाती हैं, कैसे पाली जाती हैं, इससे पशुपालक को कितना लाभ मिल सकता है ? इस का दूध व घी अन्य गाय, भैंसों से महंगा क्यों हैं ? आदि-आदि। यह प्रश्न जेहन में आने भी स्वाभाविक ही हैं, क्योंकि जहां देशी गाय व भैंस का दूध अधिकतम 40 रूपए लीटर और घी 6 से 7 सौ रुपए होता है, वहीं बद्री गाय का दूध 50 से 70 रूपए लीटर एवं घी 12 से 15सौ रुपए प्रति किलो मिलता है। इसलिए निश्चित ही इन गायों को पालना फायदे का ही सौदा माना जा सकता है। यही नही इन बद्री गायों के अन्य कई फायदे भी हैं जिन्हें जानने के बाद आम पशुपालक भी चौंके बगैर नही रह सकता है।

उत्तराखंड के गोपेश्वर जनपद में पिछले वित्तीय वर्ष में बागेश्वर जनपद निवासी मुख्य विकास अधिकारी हंसा दत्त पांडे की पहल पर डेरी विकास विभाग ने जिला योजना के तहत 3 लाख 69 हजार रुपए की लागत से बद्री गायों का एक ग्रोथ सेंटर जोशीमठ ब्लाक के करछी गांव में स्थापित करवाया, और इस प्रायोगिक प्रोजक्ट में उच्च हिमालयी क्षेत्र में बसे तुगासी एवं रेगड़ी गांव के 89 परिवारों को जोड़ कर उन्हें बद्री गायों के लालन-पालन में थोड़ा बहुत सहयोग दिया। जिनके अब सुखद ही नही आश्चर्यजनक परिणाम सामने आने लगे हैं।

एक विशेष भेंट में चमोली के मुख्य विकास अधिकारी श्री पांडे ने बताया कि बद्री गायें प्रदेश की वही अपनी परंपरागत गायें हैं जो पूरी 24 घंटों में कम से कम 8 घंटे, विविध प्रकार की वनस्पतियों, जड़ी-बूटीयों से भरपूर बुग्यालों, जंगलों, गाड़ गद्देरों के छोरो में चुगान कर स्वयं ही सांझ होते ही अपनी गौशालाओं में लौट आती हैं। इन की देख-रेख व लालन-पालन में देशी, जर्सी एवं अन्य नस्ली की गायों की अपेक्षा 10 प्रतिशत भी खर्चा नही आता है और इन से मिलने वाला दूध, घी एवं यहां तक कि इनका गौ मूत्र अन्य गायों की अपेक्षा डेढ़ से दो गुना अधिक मूल्य पर बिक रहा हैं। क्योंकि यह दर्जनों रोगों की दवाओं के रूप में प्रयोग किया जाता है। यही नही इनके दूध व घी की राज्य के अंदर ही नही देश एवं विदेशों में इतनी अधिक मांग हैं कि लाखों टन दूध, घी व गौमूत्र की आपूर्ति भी कम ही पड़ती है।

पूछने पर सीडीओ ने बताया कि पिछले वर्षों तक बद्री गायों के पालन, पोषण व रखरखाव के लिए पशुपालकों को कम ही सहायता दी जाती थी, किंतु अब उनका प्रयास रहेगा कि जिला योजना सहित, मनरेगा, पशुपालन सहित अन्य योजनाओं में बद्री गायों के प्रोत्साहन एवं इनके लालन-पालन के लिए स्थानीय पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए एक धनराशि तय की जाएगी। उनका मानना हैं कि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की आबोहवा में बद्री गायें तेजी के साथ विकास करती हैं एवं बेहतरीन उत्पादन देती हैं। अगर इन के पालन के साथ ही उचित रखरखाव पर ध्यान दिया जाए तो पलायन की समस्या को घर बैठे दूर किया जा सकता है। सीडीओ पांडे का कहना हैं कि बद्री गायें केवल उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के साथ ही इसी तरह की आबोहवा वाले क्षेत्रों में ही जीवन जी सकती हैं। बिना किसी भी तरह के अतिरिक्त खर्च करवाए भी पशुपालकों को बेहतरीन लाभ पहुंचाने की क्षमता रखती हैं। उत्तराखंड की मिट्टी से जुड़े अधिकारी जब अपने पूर्व अनुभवों से इस तरह के अभिनव प्रयासों में जुट जाते है तो साफ होता है कि वे अपने कर्तव्य के प्रति कितने संजीदा हैं।

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-उच्च न्यायालय के आदेशों पर सरकार ने तत्काल किया गेहूं खरीद का भुगतान, पर गन्ने का भुगतान अभी बाकी
नवीन समाचार, नैनीताल, 29 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में कांग्रेस पार्टी के एवं कांग्रेस नेता डा. गणेश उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर बुधवार को राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रवींद्र मैथाणी की खंडपीठ को बताया कि राज्य की मंडियों में कुल 81,453 कुंतल गेहूं आया था। इसमें से 10,085 कुंतल गेहूं अब तक किसानों ने सरकार को बेचा है। इस गेहूं की अनुमानित कीमत 15 करोड़ 30 लाख रुपए में से 15 करोड़ 11 लाख का भुगतान 28 अप्रैल की अपराहन एक बजे तक किसानों को किया जा चुका है। वहीं याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पीठ को अवगत कराया कि गन्ने का पुराना शेष भुगतान कई माह बीतने के बावजूद अभी भी सरकार के द्वारा नहीं किया गया है। इस पर पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए मंगलवार 5 अप्रैल की तिथि नियत कर दी है। उल्लेखनीय है कि किसान नेता डॉ. गणेश उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर कर किसानों को कोरोना संक्रमण के दौरान आ रही भुगतान की समस्याओं को उच्च न्यायालय के सामने रखा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अप्रैल 2020। उत्तराखंड सरकार ने सभी किसानों को दो से सात दिन के भीतर पूरा भुगतान करने का निर्णय ले लिया है। शुक्रवार को प्रदेश सरकार के महाधिवक्ता ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष चल रही कांग्रेस पार्टी के एवं किसान नेता डा. गणेश उपाध्याय द्वारा दायर ऑनलाइन याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात बताई। इसे न्यायालय ने भी एक अच्छा कदम बताया।
अलबत्ता इस दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पीठ के समक्ष सभी खरीद केंद्रों पर बारदाना यानी जूट बैग उपलब्ध न होने तथा रविवार को गेहूं की खरीद न किये जाने की जानकारी दी। न्यायालय ने इस पर विचार के लिए 29 अप्रैल की अगली तिथि निश्चित कर दी।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा, क्या छोटे किसानों को 48 घंटे में गेहूं का भुगतान कर सकते हैं ?

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने किसानों, खास तौर पर छोटे व लघु किसानों की समस्या के दृष्टिगत राज्य सरकार की ओर से मामले में पक्ष रख रहे महाधिवक्ता से पूछा कि क्या 100 कंुतल तक गेहूं बेचने वाले छोटे व लघु किसानों को 50 फीसद तक भुगतान तुरंत यानी 48 घंटे के अंदर किया जा सकता है। इस मामले में पीठ ने तीन दिन का समय देते हुए 24 अप्रैल को सुनवाई की अगली तिथि नियत कर दी है।
उल्लेखनीय है कि कोरोना विषाणु की महामारी के दौरान किसानों को आ रही दिक्कतों के सन्दर्भ में कांग्रेस पार्टी के एवं किसान नेता डा. गणेश उपाध्याय द्वारा ऑनलाइन याचिकाएं दायर की गई हैं। मंगलवार को ऐसी दो यचिकाओं की वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय की पीठ ने यह आदेश दिये। इस दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने उच्च न्यायालय के पिछली सुनवाई की तिथि पर दिये गये आदेशों के तहत राज्य सरकार द्वारा गत 16 अप्रैल को जारी किये गये विस्तृत दिशा निर्देशों की जानकारी पीठ के समक्ष रखी।

यह भी पढ़ें : किसानों के करीब 800 करोड़ का भुगतान बकाया, सरकार को गाइड-लाइन प्रस्तुत करने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अप्रैल 2020। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ ने किसानों की समस्याओं पर दायर एक जनहित याचिका पर वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई करते हुए उत्तराखंड सरकार द्वारा गत 16 अप्रैल को जारी दिशा-निर्देशों को पीठ के समक्ष प्रस्तुत करने के आदेश दिये हैं। साथ ही मामले की सुनवाई के लिए 21 अप्रैल की तिथि निश्चित कर दी है।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पार्टी से जुड़े शांतिपुरी किच्छा जिला ऊधमसिंह नगर निवासी किसान नेता डा. गणेश उपाध्यायन ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया है कि किसानों का गन्ने के भुगतान का विगत वर्षों का 200 करोड़ एवं वर्तमान में 600 करोड़ यानी कुल 800 करोड़ रुपया सरकार पर बकाया है। इसके अलावा 7 माह पहले धान की खरीद का 3.25 करोड़ रुपए की धनराशि का भुगतान 24 घंटे के अंदर किसानों को करने की बात कही गई थी। लेकिन यह भुगतान अब तक नहीं हुए हैं। यायिका में इसके साथ ही पॉपुलर के खेतों में बोये गये गेहूं की कटाई के लिए मजदूरों की व्यवस्था करने एवं सरकार को किसानों के द्वार पर जाकर गेहूं खरीदने की व्यवस्था सुनिश्चित करने व तुरंत भुगतान की व्यवस्था करने की मांग भी याचिका में की गई है। अगली सुनवाई पर मामले में बहस होने की संभावना है।

यह भी पढ़ें : सावधान ! ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना-सेनिटाइजेशन जैव विविधता को पहुंचा रहा नुकसान

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 अप्रैल 2020। इन दिनों कोरोना विषाणु के संक्रमण को रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में धरातल पर गैर वैज्ञानिक तरीके से भी सेनिटाइजेशन किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों पेड़-पौधों एवं फसलों में हो रहे परागण एवं पूरी जैव विविधता को बड़ा नुकसान होने का अंदेशा जताया जा रहा है। इस पर वैज्ञानिक तरीके से नियत मात्रा में ही सेनिटाइजेशन किये जाने की सलाह दी जा रही है।
बताया जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत सदस्यों के द्वारा स्प्रे मशीन के जरिये दवा का छिड़काव कर सेनिटाइजेशन किया जा रहा है। इसमें कई बार निर्धारित 1 फीसद से अधिक मात्रा में दवा पानी में मिला कर छिड़काव कर दिया जाता है, और कई बार घरों के आसपास की निर्जीव सतहों-वस्तुओं के साथ ही घरों के आसपास व खेतों में पेड़-पौधों पर भी लोग इस दवा का छिड़काव कर रहे हैं। यह खेती एवं जैव विविधता के लिए काफी नुकसानदेह हो सकता है। जिला उद्यान अधिकारी भावना जोशी ने पूछे जाने पर बताया कि सेनिटाइजेशन के लिए प्रयुक्त सोडियम हाइपोक्लोराइड की 1 फीसद से अधिक मात्रा मधुमक्खियां और लाभप्रद कीट-पतंगों के साथ ही केंचुओं जैसे खेती के लिए लाभप्रद जीवों के लिए भी नुकसानदेह हो सकती है। इससे ये मर सकते हैं। फलस्वरूप पौधों में परागण प्रभावित हो सकता है, और अंततः इससे फसल कम उत्पन्न होगी। साथ ही पक्षियों को भी कीट-पतंगों के रूप में भोजन नहीं मिल पाएगा। इस तरह पूरी जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। सुश्री जोशी ने ऐसे में निर्धारित एक फीसद की मात्रा में ही दवा का छिड़काव करने और छिड़काव केवल घरों के निकट निर्जीव वस्तुओं में ही करने की सलाह दी है।

यह भी पढ़ें : इधर बेकाबू कोरोना, उधर फलों के बगीचों में ‘टफरीना’

यह आलेख ‘डेली हंट’ के इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं 

-नैनीताल जनपद की फल-पट्टी में 40-50 फीसद से अधिक के नुकसान का अनुमान, पूरे प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में हुआ हो सकता है नुकसान

टफरीना के संक्रमण से फलों के पेड़ों की पत्तियों को हुआ नुकसान दिखाते बागवान।

नवीन समाचार, नैनीताल, 6 अप्रैल 2020। देश-दुनिया में जहां मानव सभ्यता पर कोरोना की महामारी का प्रकोप छाया हुआ है, वहीं नैनीताल जनपद की विश्व प्रसिद्ध भवाली-रामगढ़ की फल पट्टी में ‘टफरीना’ नाम के विषाणुजनित फंगस का संक्रमण आड़ू, खुमानी व पुलम आदि फलों के बगीचों में कमोबेश लाइलाज हो गया है। इससे जनपद में इन फलों की फसल को 40 से 50 प्रतिशत तक नुकसान का प्रारंभिक अनुमान स्वयं विभागीय अधिकारियों के द्वारा लगाया जा रहा है, अलबत्ता नुकसान का सही औपचारिक अनुमान अभी नहीं लगाया जा सका है। यह भी बताया जा रहा है कि यह संक्रमण केवल नैनीताल जनपद तक सीमित नहीं होगा, वरन पूरे प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में इस मौसम के फलों की खेती पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में किसान इससे हुए नुकसान के मुआवजे की मांग भी कर रहे हैं।
बताया गया है टफरीन नमी से होने वाला फंगल इंफेक्शन है। इसके कारण पेड़ों की पत्तियां पहले मुड़-सिकुड़ और अंततः सूख जाती हैं। इस कारण वे पेड़ एवं उस पर लने वाले फलों के लिए जरूरी भोजन बनाने का अपना कार्य नहीं कर पाती हैं। साथ ही आगे पेड़ों को अन्य बीमारियां लगने का खतरा भी बढ़ जाता हैं इसका सीधा व नकारात्मक प्रभाव फलोत्पादन पर पड़ता है। बताया गया है कि इस वर्ष मार्च माह में कमोबेश बेमौसम हुई जबर्दस्त ओलावृष्टि, बारिश और बर्फबारी से प्रकृति में काफी नमी रही। इस कारण ही यह संक्रमण हुआ। वहीं इसी दौरान कोरोना का संक्रमण होने के कारण बागवान इसके उपचार के लिए अपेक्षित लाइम सल्फाइड और कॉपर ऑक्सी क्लोराइड की दवा का छिड़काव भी नहीं कर पाए। इस कारण मर्ज अब लाइलाज हो गया है। जिला उद्यान अधिकारी भावना जोशी ने पूछने पर स्वीकारा कि अब तक जनपद में फलोद्यान पर टफरीना के संक्रमण से 40 से 50 फीसद तक नुकसान हो चुका है। राजस्व विभाग को सही नुकसान के आंकलन के लिए कहा गया है। अलबत्ता पहले राजस्व उपनिरीक्षकों तथा फिर जनरल-ओबीसी राज्य कर्मचारियों की हड़ताल तथा अब कोरोना व लॉक डाउन की वजह से नुकसान का सही पता लगाने के लिए सर्वेक्षण कार्य नहीं हो पाया है। बागवानों से अब भी लाइम सल्फाइड और कॉपर ऑक्सी क्लोराइड की दवा का छिड़काव कर आगे होने वाले नुकसान को बचाने को कहा जा रहा है।

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नवीन समाचार, देहरादून, 6 अप्रैल 2020। उत्तराखंड सरकार ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के निर्देशों पर सहकारी बैंकों से फसलों एवं कृषि के लिए किसानों द्वारा लिए गए ऋणों के भुगतान हेतु 3 माह की समयावधि बढ़ा दी है। बताया गया है कि प्रदेश में लगभग साढ़े तीन लाख किसानों ने विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण लिये हैं। लिहाजा उन्हें इस घोषणा से लाभ मिलेगा।

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प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने इस तरह लहसुन की क्यारियों की मेढ़ों में उगाया गया है गेहूं।

नवीन समाचार, देहरादून, 12 जनवरी 2020। उत्तराखंड सरकार प्रदेश की सबसे बड़ी पलायन की समस्या के खिलाफ एक बड़ी पहल करने जा रही है। इस पहल के तहत सरकार पढ़े-लिखे इंटर पास 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं को किसानी करने के लिए तीन साल तक हर महीने नौकरी की तरह 1500 मानदेय तथा किसानी के लिए बीज, खाद व उपकरणों के लिए 90 फीसद अनुदान देगी। सरकार की इस पहल के जरिये योजना है कि ग्रामीण पढ़े-लिखे युवा अपने गांव में ही रहकर खेती को रोजगार के रूप में लें और गांव में ही रुकें। इस दौरान उन्हें एक निश्चित आय भी होती रहेगी, तथा वे अधिक मेहनत करके अधिक आय भी प्राप्त कर सकेंगे।

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उत्तराखंड सरकार की इस ‘उत्तराखंड मंडी कृषि ग्राम्य विकास योजना’ को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर प्रदेश के नौ पूरी तरह से पर्वतीय जिलों के दो-दो विकास खंडों के एक-एक गांव के 20-20 यानी कुल 180 युवाओं से शुरू करने जा रही है। योजना के लिए उत्तरकाशी जिले के डूंडा व पाही विकास खंडों के ग्राम पाही व भटवाड़ी के 20-20 युवाओं का चयन कर भी लिया गया है। उत्तराखंड कृषि उत्पादन मंडी बोर्ड की ओर से शुरू की जा रही इस योजना में शामिल होने के लिए एक शर्त यह भी है कि युवाओं के पास 15-15 नाली भूमि होनी चाहिए। देखने वाली बात होगी कि प्रदेश के पर्वतीय जिलों के किसी गांव में 20 युवाओं के पास इतनी 20-20 नाली भूमि मिल भी पाती है कि नहीं।
इस बारे में पूछे जाने पर मंडी परिषद के अध्यक्ष गजराज बिष्ट ने कहा कि इस पर प्रारंभिक प्रस्ताव बनाया गया है। आगे इस पर विस्तार से चर्चा होगी, तभी योजना धरातल पर आ पाएगी। सरकार की कोशिश है कि पलायन कर चुके युवा भी वापस गांव लौटकर आएं और यहीं रोजगार करें। इससे गांवों में खेती का माहौल बनेगा तो अन्य लोग भी गांवों की ओर लौटेंगे।

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-अनार की खेती से बढ़ेगी मुक्तेश्वर के बागवानों की आय भी
-टेरी के सहयोग से लगाये गये अनार के पाँच सौ पौधे इसी वर्ष देने वाले हैं फल

सुनकिया गांव में फल देने को तैयार अनार का पौधा।

दानसिंह लोधियाल @ नवीन समाचार, धानाचूली। आड़ू, खुमानी, पुलम एवं सेब के बागानों के लिए मशहूर नैनीताल जनपद के बागान इस वर्ष एक नये फल का स्वाद देने को तैयार हैं। यहां पिछले 3-4 साल से किसानों ने टेरी यानी ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सेज’ के समहयोग से टिश्यू कल्चर तकनीक से विकसित किये गये अनार की सुपर भगवा प्रजाति के करीब 500 पौधे लगाए हैं जो अब इस वर्ष ही फल देने वाले हैं। यह स्थानीय किसानों की आय बढाने का एक महत्वपूर्ण पहल तो मानी ही जा रही है, साथ ही इससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व फलों के प्रेमियों को एक नया स्वाद भी मिलेगा। उन्हें अब बाहर से आने वाले और आने में ही पुराने हो जाने वाले अनार की जगह ताजा स्थानीय अनार के फलों का रसीला स्वाद मिल सकेगा।
आपको बताते चलें फल उत्पादन में मुक्तेश्वर, रामगढ़ विशेष स्थान रखता है। यहां दुनिया की अनेक विशेष फल प्रजातियों का उत्पादन किया जाता रहा है परंतु बढ़ते तापमान, उचित प्रसार एवं वैज्ञानिक ज्ञान की कमी के कारण पिछले एक दशक में उत्पादन धीरे-धीरे गिरता चला गया जिस कारणयहां के बागवान आडू़, पुलम एवं अन्य प्रकार के फलो को उगाने लगे। इधर मुक्तेश्वर के सुनकिया गांव में पिछले 3-4 साल से (टेरी) की मदद से बागवानों को अनार के पौधे वितरण किये गये जिनके इस वर्ष फल देना की उम्मीद की जा रही है। टेरी के डा. नारायण सिंह बताते है सुनकिया गांव के किसानों के लिए अनार की खेती की ओर ध्यान आकर्षित कर उनकी आजीविका बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। उन्होंने दावा किया कि 7 से 8 साल बाद एक पेड़ 25 से 30 किलो फल देगा। स्थानीय किसान बिशन सिंह कहते है टेरी अनार के अलावा कई अन्य नई प्रजातियों की खेती के बारे में भी लगातार प्रशिक्षण देती आ रही है।
डीएच 01। सुनकिया गांव अनार के लहलहाते पेड़।

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नवीन समाचार, पौड़ी, 7 जनवरी। पहले ही कर्ज माफी से इंकार कर चुके  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि किसानों को कृषि उपकरण खरीदने के लिए शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इस ब्याज की धनराशि भरपाई खनन, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र से हुए राजस्व से की जाएगी। इससे किसानों की आय दोगुनी करने में मदद मिलेगी। इससे पहले किसानों को यह ऋण दो प्रतिशत ब्याज दर पर दिया जाता था। उल्लेखनीय है कि आज ही केंद्र सरकार ने देश के 100 जिलों मे किसानोंं को कृषि से संबंधित विभिन्न प्रशिक्षण देने की योजना का भी ऐलान किया है। इन दोनों भाइयों को सकारात्मक माना जाा रहा है।

पौड़ी में अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना का शुभारंभ करते हुए सीएम ने कहा कि जब तक राज्य के प्रत्येक परिवार का योजना के तहत गोल्डन कार्ड नहीं बन जाता, तब तक आयुष्मान जैसी महत्वाकांक्षी योजना संचालित होती रहेगी।

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    • पहाड़पानी में कश्मीर के अखरोट के पौधे उगाने की तैयारी, जायका परियोजना द्वारा चल रही है योजना की तैयारी
    • लाखों रूपए की लागत से तैयार किया जा रहा मदर प्लांट पॉली हाउस, तापमान एवं आद्रता  का निर्धारण किया जा सकेगा पॉलीहाउस में
  • नैनीताल जिले के ओखलकांडा एवं धारी के अनेठी, खुजेठी, सलियाकोट तल्ला, लेटीबूँगा और कोटला गाँव में किसानों को बाटे गए हैं 500 पौधे
  • कश्मीर से यहां लाने का एक पौधे का खर्च है लगभग 540 रुपए, बिजली का भी अहम योगदान है मदर प्लांट में
नर्सरी में तैयार कश्मीरी अखरोट के पौधे।

मनोज कुमार जोशी @ नवीन समाचार, पहाड़पानी (नैनीताल)। राज्य के नैनीताल सहित कई अन्य जिलों में वन विभाग, भूमि संरक्षण एवं जायका परियोजना की ओर से किसानों को हिमांचली सेब के बाद अब कश्मीरी अखरोट के पेड़ उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। नैनीताल जिले में वन विभाग की ओर से किसानों तक कश्मीर से उच्च गुणवत्ता वाले अखरोट के पौधे लाकर कुल लागत के दस फीसदी अंशदान में बांटे गए हैं, और अब इन्हें यहां भी उगाने की तैयारी की जा रही है। नैनीताल जिले के पहाड़पानी के पास रतोडा (सेलालेख ) नर्सरी में नये पौध तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

जायका परियोजना के अंतर्गत भूमि संरक्षण के द्वारा जिलेभर में तीन मदर प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है। जिसमें से दो मुक्तेश्वर रेंज और एक चोगड़ रेंज में तैयार किया जा रहा है। पहाड़पानी में भी एक मदर प्लांट लगभग तैयार हो चुका है। इसमें तापमान एवं आर्द्रता बनाए रखने के लिए कूलर एवं हीटर जैसे दोनों तरह से पालीहाउस को तैयार किया गया है जिसके लिए पर्याप्त पानी एवं बिजली की आपूर्ति की भी व्यवस्था भी कर ली गई है।
भूमि संरक्षण के एसडीओ पूरन चन्द्र जोशी एवं वन क्षेत्राधिकारी मुक्तेश्वर रेंज के लक्ष्मण सिंह मर्तोलिया के मुताबिक जिलेभर में 500 पौधे कश्मीर से 540 रुपये की लागत से लाए गए हैं, और यह किसानों को 54 रुपए अंशदान में बांटे गए हैं, जिससे किसान उच्च गुणवत्ता के पौधे तैयार कर अच्छे अखरोट का लाभ ले सकें। खास बात यह भी है कि यह अंशदान भी किसानों के एसएचजी खाते में जमा किया गया है। इससे परियोजना का लाभ सीधे किसानों को होगा। इसके अलावा पहाड़पानी स्थित मदर प्लांट में स्थानीय अखरोट के 1600 पौधे रोप दिए गए हैं जिनमें फरवरी में कश्मीर से उच्च श्रेणी के पौधों की कटिंग चढ़ाई जाएगी, और इस तरह नए बेहतर प्रजाति के पौधे  जायेंगे।  दावा है कि इन पेड़ों में अगले चार सालों में अखरोट लगना शुरू हो जायेंगे। आगे भी लगातार इसप्रकिया के द्वारा कश्मीरी कटिंग रोपित की जाएगी और कश्मीरी अखरोट की प्रजाति इन मदर प्लांट में बनाई जाएगी।

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  • आलू का महँगा बीज और उत्पादन साल दर साल घटने एवं उचित दाम नहीं मिलने से पहाड के किसान परेशान ।
  • इस साल कम आलू की पैदावार की संभावना।
  • आलू के लिए प्रसिद्ध माना जाता है धारी ब्लॉक में मज्यूली न्याय पंचायत।

मनोज कुमार जोशी @ नवीन समाचार, पहाड़पानी (नैनीताल) 29 दिसंबर 2018। हर वर्ष आलू के बीज के दाम आसमान छूना व मौसम की मार झेल रहे किसानो का मन सब्जियों के राजा कहे जाने वाले पहाड़ी आलू के उत्पादन से अब उचटने लगा है। जहाँ दिसम्बर व जनवरी में खेतों में आलू की पैदावार के लिए गोबर की खाद के साथ जुताई को खेत खाली छोड़ दिये जाते थे लेकिन उनमें अब अन्य फसलों की पैदावार करने की तैयारियाँ जोरो पर है।

बताते चलें कि हर साल हजारों रुपये कुंटल के आलू बीज को बोने के बाद किसानों की फसल मूल रकम के भी बराबर नहीं हो पा रही है। जहां एक तरफ आलू के बीज के दाम आसमान छू रहे हैं वहीं दूसरी तरफ जंगली जानवरों के आतंक के साथ साथ मौसम की मार झेल रहे किसानों ने अब आलू से हटकर अन्य तरह की सब्जियों की पैदावार करने की भी ठान ली है। जिससे पहाड़ी आलू के लिये प्रसिद्ध नैनीताल जिले के पहाड़पानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में आलू के कम पैदावार की संभावना हो गई है। बताते चलें कि पहाड़ में आलू उत्पादन के लिए जिले में धारी ब्लॉक भी आलू के लिए प्रसिद्ध बताया जाता है। पहाड़ी क्षेत्र में ऊंचाई वाले इलाकों को विशेष तौर पर आलू के लिए जाना जाता है। पहाड़पानी और इसके आसपास के सभी गांवों में आलू की सब्जी की पैदावार आज तक लगातार होती आ रही है। लेकिन यह हर साल कम होती जा रही है इसका मुख्य कारण यह है कि काश्तकार आलू का महँगा बीज लगा रहे हैं और उपज कम होने के कारण वह हल्द्वानी मंडी से जुड़े आडतियो से मंगाते हैं जिसके कारण आलू के बीज का दाम खुला नहीं होता मनमाने रेट में तंग आकर किसानों ने खेती का तरीका भी बदल दिया है.।. किसानों का कहना है कि वह आलू की फसल उत्पादन करके दिन रात मेहनत कर सालभर का खर्चा पूरा नहीं कर पाता है और मंडी के आडतियो से दबा रहता है।

ये है मुख्य कारण – आलू के बीज मांगते समय उसका रेट नहीं खोला जाता है और पहाड़ के अधिकतर किसानों के पास नहीं होता है नगद रुपया कही भी बाहर से स्वयं बीज मगाँए। इसके अलावा फसल बेचकर भी मनमर्जी के रेट लिए जाते हैं बीज के दाम। पहाड़पानी में मुक्तेश्वर किसान प्रोड्यूसर कम्पनी ने लीज पर जमीन लेकर करीब पाँच सौ कट्टे आलू का बीज बोया था लेकिन जिसमें केवल 150 कट्टे की पैदावार कर बाजार में बेचा इसके अलावा उन्होंने मनाघेर फ़ार्म में भी करीब 35 कुटल आलू का बीज बोया लेकिन ठीक उसका आधा उत्पादन हुआ। प्रोड्यूसर कम्पनी के देवेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि उनके मजदूरों और बुआई की भी लागत वसूल नहीं हो पाई। लाखों रुपये का किसान कम्पनी को घाटा हुआ है।

इस बार लगने लगी है अब मटर, बहुत कम मात्रा में आलू बोए जाने की है संभावना
इस बार किसान आलू के बजाय मटर उगाने को है उत्सुक किसानों का कहना है कि हर साल आलू की फसल बेचकर हो रहा है घाटा।

पहाड़पानी के आसपास में अधिक होगी मटर की पैदावार…
पहाड़पानी उत्पादन एंव विपणन स्वायत सहकारिता चिया संस्था से जुड़े किसानों ने की फेडरेशन में मटर के बीज की माँग। फेडरेशन के सचिव पीताम्बर मेलकानी के मुताबिक इस बार जाड़ों में बोए जाने के लिए फेडरेशन से जुड़े 415 काश्त्कार ने फेडरेशन से लिया है अब तक करीब साढ़े नौ कुंटल बीज अंशदान जमा कर ले लिया है। इसके अलावा भी कुछ किसानों ने बाजार से बीज खरीदकर बोने की तैयारी शुरू कर दी है। पहाड़पानी के आसपास ही करीब बाहर कुटल मटर का बीज आ चुका है।

सहकारी समिति में भी मिलने लगा है आलू का बीज
साधन सहकारी समितियो में भी मनाली गोला आलू का बीज मिलने लगा है जिसका अभी निर्धारित मूल्य तय नहीं हुआ है। और अभी तक कम लोग यहाँ से बीज खरीद रहे हैं। जो किसान ले रहे हैं वह भी सीमित मात्रा में।

“लगातार एक ही फलस को बोने से मिट्टी की पोषण एंव उर्वरक क्षमता कम होती है। मिट्टी के पोषक तत्वों की लगातार एक ही फसल उगाने से कम हो सकती है। इसलिए किसानों को मिट्टी की जाच के आधार पर फ़सल उगानी चाहिये एंव जैविक खाद के भी उपयोग करने की आवश्यकता है। आलू की फसल के लिए खेतों के बदलाव की भी आवश्यकता है क्यूंकि हर फ़सल बोने के लिए बदलाव जरूरी है लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की पोषक क्षमता कम हो जाती है।
भावना जोशी, जिला उद्यान अधिकारी, नैनीताल

“किसानों को गुणवत्ता युक्त बीज नहीं मिल पाता है। किसान स्वयं बीज का चयन करें तो बेहतर होगा। आलू एवं टमाटर में अगेथी और पचेथी नाम रोग मुख्यतः इसके लिए हानिकारक होता है। मिट्टी की जाच एंव उचित दवा एवं रसायनिक खाद की भी जरूरत होती है।
विजय दोहरे, प्रभारी कृषि अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्यूलीकोट

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सरकार  व स्थानीय जनप्रतिनिधियों की  अनदेखी  से हुआ लाचार किसान
कई दशकों से नही खुल पाए कृषि विज्ञान केंद्र, मृदा परीक्षण कराए बीत गए सालों, पूरे क्षेत्र की 
एक जैसी रिपोर्ट, महंगे बीज  के साथ जंगली जानवर  बने मुसीबत, फसल का भाव लागत के बराबर भी नही मिलता
दानसिंह लोधियाल @ नवीन समाचार, धानाचूली, 28 दिसंबर 2018 । कई सालों से पहाड़ में लगातार गिरती फसल की पैदावार पर न तो सरकार गंभीर दिखाई दे रही है, ना ही जनप्रतिनिधि। हाल यह हो गया है कि किसान अपनी पीड़ा बतायें भी तो किसको। किसानों को बनियागिरी व बैकों के कर्ज से उबरने का मौका ही नही मिल पा रहा है। ऐसे में पहाड़ का किसान साल दर साल पीछे को जा रहा है। किसान जंगली जानवरों, महंगे बीज और खाद मृदा परीक्षण का नही होना, लागत के बराबर भाव नहीं मिलना न जाने कितनी समस्याओं से घिर गया है। वहीं सरकार का किसानों की दुगुनी आय करने की बात उनका मजाक सा उड़ा रही है। आलीशान कोठियों या आफिसों में बैठे जो नेता व अधिकारी जो किसानों के लिए उनकी आय दुगुनी करने की बात करते हैं, वे धरातल पर उतर कर पहाड़ के किसानों की स्थिति का जायजा लें तो हकीकत पता चले कि कैसे वह गुजारा कर रहे है। महंगा बीज, महंगी खाद का वास्तविक मूल्य भी वसूल नहीं हो पाना, जंगली जानवरों का फसल चौपट करना, जैसी समस्याओं से घिरा किसान आखिर अपना दुखड़ा रोये तो कहां रोये। इन स्थितियों के बावजूद सरकार न तो किसानों को सब्सिडी में बीज ही दिला पाई है और ना ही फसल का अच्छा भाव। घर से लेकर मंडी तक केवल बिचोलियों की पौ-बारह है।
आपको बताते चलें की नैनीताल के अधिकांश विकास खंडों में लोग खेतीबाड़ी व बागवानी से अपना जीवन यापन करते आ रहे है। पर आज तक यहां के किसानों के लिए सरकार या कोई भी जनप्रतिनिधि कोई ठोस कार्ययोजना नही बना पाया है। जिस कारण यहाँ का काश्तकार कर्ज में डूबता जा रहा है। कभी किसान मंडी की बात होती है तो कभी कृषि विज्ञान केंद्र स्थापना करने की, पर आज तक बात ही हुई है। काम कुछ नही हुआ। आलू के महंगे बीज के कारण सैकड़ों किसान इस आस में मटर लगा रहे है कि लागत तो कम होगी। मंडी में अच्छे दाम की आस में आज भी खेतों में बन्दगोभी पड़ी हुई है जिसे किसान अब मजबूरी में मवेशियों को खिला रहे हैं।
इस बारे में मुक्तेश्वर किसान प्रोड्यूसर कम्पनी के एमडी देवेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि रामगढ़, धारी व ओखलकांडा विकास खंड का अधिकांश भाग बागवानी और सब्जी-भाजी आलू उत्पादक क्षेत्र है। जहाँ पर लगभग 150 गाँवों के किसान नकदी फसल पैदा कर आजीविका चलाते हैं। हमारे पहाड़ों के नेताओं ने किसानों के नाम पर सिर्फ अपने घरों को भरा है। लेकिन किसी भी विकास खंड में ना तो कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना की, ना ही बीज उत्पादन की ओर ही ध्यान दिया। और भी जो भी बचा खुचा उद्यान विभाग के फार्म बीज उत्पादन करते थे उनको बंद कर किराये में लगा दिया। आज मजबूरी में किसानों को बाहरी प्रदेशों से मंहगा आलू का बीज लेना पड रहा है, जिसमें किसानों को बहुत नुकसान हो रहा है। देवेंद्र ने इन स्थितियों को पलायन का मुख्य कारण भी बताया। बताया कि सरकार व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते आने वाले समय मे पहाड़ में सारे खेत बंजर हो सकते हैं, और यह एक गंभीर मुद्दा बन सकता है। क्या सरकारें यही चाहती है कि पहाड़ों से किसान अपनी जमीनें बेचकर पलायन करें। उन्होंने यह भी बताया कि आज भी इसी क्षेत्र में सैकड़ों ऐसे किसान हैं जिनके नाम उनकी जमीन ही दर्ज नहीं है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार द्वारा भूमिधरी का अधिकार देने की कोशिश तक नही की गयी है। ऐसे में यहां की जनता पलायन नही करेगी तो क्या करेगी। ऐसे में जनता आने वाले चुनावो में चुनाव बहिष्कार या नोटा का बटन दबाने जैसा निर्णय भी ले सकती है। 

पॉलीथीन की पन्नी को बनाया गांवों में समृद्धि लौटाने-पलायन भगाने का हथियार

रामगढ़ विकास खंड में पॉलीथीन की पन्नी से जल संरक्षण करते ग्रामीण।
रामगढ़ विकास खंड में पॉलीथीन की पन्नी से जल संरक्षण करते ग्रामीण।

नवीन जोशी, नैनीताल। देश-दुनिया में पर्यावरण के लिए दुश्मन बताई जा रही पॉलीथीन की पन्नी उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों के किसानों की किस्मत बदलने का माध्यम बन रही है। अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी के बाद नैनीताल जनपद के दूरस्थ रामगढ़ और ओखलकांडा आदि विकास खंडों के ऊंचाई वाले वर्षा जल पर निर्भर गांवों के निवासी काश्तकारों ने पॉलीथीन की पन्नियों से अपने खेतों-बागों के साथ ही क्षेत्र में भी हरीतिमा फैला दी है, और अपनी आय बढ़ाकर पलायन की समस्या का हल भी तलाश लिया है। साथ ही वे अब अपनी तरह के अन्य पानी की कमी वाले गांवों के लिये भी मिसाल बन गये हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य में वर्षों से वन विभाग की चाल-खाल एवं सिचाई विभाग की योजनाएं संचालित हैं, किंतु इनका लाभ कहीं ग्रामीणों को मिल पा रहा हो, ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। ऐसे में राज्य के ऊंचाई वाले गांवों को सिचाई के लिए पानी नहीं मिल पाता है। पानी की कमी ग्रामीण काश्तकारों को खेती से दूर करने के साथ पलायन का कारण भी बन रही है। ऐसे में ग्रामीणों ने खुद ही पहल करते हुए पॉलीथीन की पन्नियों से जल संरक्षण की मुहिम शुरू की है। इस पहल में उन्हें भारत सरकार के राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन का साथ मिला है, जो राज्य के पिछड़े क्षेत्रों में पॉलीथीन की पन्नी के प्रयोग से पानी के संरक्षण की मुहिम चलाये हुए हैं। उत्तराखंड सेवा निधि, पर्यावरण शिक्षण संस्थान अल्मोड़ा आदि संस्थाओं ने अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी विकासखंड में जागेश्वर से आगे भगरतोला, चमुवा आदि गांवों में जल संरक्षण में पॉलीथीन का सफल प्रयोग किया है। इससे ही प्रेरित होकर इधर करीब दो वर्षों से नैनीताल जनपद में जनमैत्री संगठन के द्वारा भी ग्राम पाटा, धूरा, जयपुर, गल्ला, सूपी व बूड़ीबना में इस मुहिम को आगे बढाया जा रहा है। मुहिम के तहत पिछले एक वर्ष में पाटा नाम के गांव में 80 परिवारों के लिये 90 जल संचय टेंक बनाये गये हैं। और आगे इस वर्ष 210 टैंकों का निर्माण किया जा रहा है। इस कार्य में जन मैत्री संगठन के बची सिंह बिष्ट, गंगा सिंह गौड़, महेश नयाल, राजेश्वरी नयाल, मोहन राम, हेमा नयाल, मुन्नी देवी, भवानी देवी, कमला गौड़, हरीश नयाल, महेश सिंह गलिया व राधिका आदि लोग प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
क्षेत्र के ग्वाल सेवा संगठन के पंकज कुलौरा ने बताया कि इस कार्य में ग्रामीण बरसात के मौसम से पहले अपने खेतों से ऊपर के क्षेत्र में खुद बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर उन पर पॉलीथीन की पन्नी चढ़ा देते है।। बरसात के मौसम में पानी से यह गड्ढे भर जाते हैं, और पन्नी की वजह से पहले की तरह पानी जमीन में रिसकर बरबाद भी नहीं होता है। पानी वाष्पित होकर भी न उड़ जाये, इस हेतु गड्ढों में भरे पानी के ऊपर भी छाया करने के लिए पन्नी डाल दी जाती है। यह पानी कई महीनों तक सुरक्षित बना रहता है, और आगे खासकर शीतकाल में जब बारिश नहीं होती, फसलों में सिचाई के काम आता है। यह मुहिम इतनी अधिक सफल हो रही है कि राज्य के अधिकारियों के साथ ही और विदेशी शोधकर्ता भी इन गांवों में योजना का परीक्षण करने के लिए खिंचे चले आ रहे हैं, और इसकी सफलता से खुश हो अन्य स्थानों पर भी इस प्रयोग को करने की बात कर रहे हैं।

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बागेश्वर, 24 सितंबर 2018। एक ओर उत्तराखंड के काफी गाँव हर साल खाली होकर ‘भुतहा गांव’ बनते जा रहे है, वहीं बागेश्वर जिला के जारती गांव के 2 युवाओं ने नई प्रेरणात्मक पहल की शुरुआत करते हुए अपने बंजर हो चुके खेतों में हल्दी व अदरक की बुआई कर उन लोगों को एक संदेश दिया है जो गॉव से रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। ये युवा हैं भूपेंद्र सिंह मेहता व जितेंद्र सिंह मेहता। भूपेंद्र सिंह मेहता ने कुमाऊँ विवि से M.Sc गणित व जितेंद्र ने LPU जालंधर से BSc एनीमेशन की शिक्षा प्राप्त की है। दोनों अपनी पैतृक जमीन की दशा देखकर काफी दुःखी थे। तब इन्होंने काफी विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय लिया कि जमीन से रोजगार के ऐसे अवसर तलाशे जाएं, जो कम लागत के हों व जंगली जानवरों के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से बच सकेें। तब इन दोनों ने हल्दी व अदरक की खेती हेतु उद्यान विभाग कपकोट से सम्पर्क किया। जहाँ इन्हें उद्यान अधिकारी श्री गढ़िया ने काफी सहयोग किया तथा विभाग से 7 कुंतल हल्दी व अदरक का बीज उपलब्ध कराया। उल्लेखनीय है कि कन्द वर्गीय फसल में आने वाले तथा मसाले, औषधि व सौंदर्य प्रसाधन के रूप में काम आने वाली यह दोनों फसलें वन्य जीवों से भी सुरक्षित हैं। लिहाजा इनके बीज को इन दोनों ने परिवार के सहयोग से 30 खेतों में हल्दी की सुवर्णा व 5 खेतों में पन्त पीताभ नाम की हल्दी की प्रजाति की बुआई तथा 4 खेतों में रियोडीजनेरिओ प्रजाति के अदरक की बुआई की। जिसका सुंदर परिणाम दिखने को मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि भूपेंद्र सिंह मेहता वर्तमान में मदरलैंड पब्लिक स्कूल बैडा मझेड़ा में बतौर प्रधानाचार्य कार्यरत हैं। उनके इस कार्य में उनकी पत्नी भगवती मेहता भी सहयोग करती हैं, जोकि उसी विद्यालय में शिक्षका भी हैं। जबकि जितेंद्र मेहता एमबी कालेज हल्द्वानी से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। बारी बारी से घर आकर ये अपने खेतों में काम करते हैं। उनका गांव से जुड़ाव सभी गांव वालों को प्रेरित कर रहा है। अपने इस कार्य को जन-जन तक पहुचाने के लिये उन्होंने फेसबुक पर ‘पहाड़ी किचन’ नाम से पेज भी बनाया है, जिसमें काफी रोचक जानकारी दी जाती है कि कैसे पहाड़ का पलायन रूक सकता है, और कैसे रोजगार के अवसर तलाशे जा सकते हैं। उनकी इस पहल को सोशल मीडिया में भी काफी सराहा जा रहा है। उनका कहना है कि कई ऑनलाइन कम्पनियां हल्दी के उत्पाद हेतु उनसे सम्पर्क कर रही हैं। इनका यह भी कहना है यदि सरकार विपणन पर प्रसंस्करण की व्यवस्था पहाडों में उपलब्ध करा दे तो पहाड़ में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, और यह प्रयास पलायन रोकने में कारगर हो सकता है। उनका यह भी कहना है कि पहाड़ के युवाओं में गजब का जोश व जज्बा है लेकिन जरूरत है तो उनके प्रतिभा को पहचाने की। उनकी यह पहल वास्तव में काबिले तारीफ है, औऱ युवाओं को प्रेरित करने वाली है।

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