कुमाऊं का ऋतु पर्व ही नहीं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक लोक पर्व भी है घुघुतिया-उत्तरायणी

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  • 1921 में इसी त्योहार के दौरान बागेश्वर में हुई प्रदेश की अनूठी रक्तहीन क्रांति, कुली बेगार प्रथा से मिली थी निजात
  • घुघुतिया के नाम से है पहचान, काले कौआ कह कर न्यौते जाते हैं कौए और परोसे जाते हैं पकवान

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया को रोशनी के साथ ऊष्मा और ऊर्जा के रूप में जीवन देने के कारण साक्षात देवता कहे जाने वाले सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में यानी दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में आने का उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने वाला पर्व पूरे देश में अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। पूर्वी भारत में यह बीहू, पश्चिमी भारत (पंजाब) में लोहणी और दक्षिणी भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु आदि) में पोंगल तथा देवभूमि उत्तराखंड में यह उत्तरायणी के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के लिए यह पर्व न केवल मौसम परिवर्तन के लिहाज से एक ऋतु पर्व वरन बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लोक पर्व भी है।

Ghughute2उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रांति यानी उत्तरायणी को लोक सांस्कृतिक पर्व घुघुतिया के रूप में मनाए जाने की विशिष्ट परंपरा रही है। इसी दिन यानी 14 जनवरी 1921 को इसी त्योहार के दिन हुए एक बड़े घटनाक्रम को कुमाऊं और उत्तराखंड प्रदेश की ‘रक्तहीन क्रांति” की संज्ञा दी जाती है, इस दिन कुमाऊं परिषद के अगुवा कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने कुमाऊं की काशी कहे जाने वाले बागेश्वर के ‘सरयू बगड़” (सरयू नदी के किनारे) में सरयू नदी का जल हाथों में लेकर बेहद दमनकारी गोर्खा और अंग्रेजी राज के करीब एक सदी पुराने कुली बेगार नाम के काले कानून संबंधी दस्तावेजों को नदी में बहाकर हमेशा के लिए तोड़ डाला था। यह परंपरा बागेश्वर में अब भी राजनीतिक दलों के सरयू बगड़ में पंडाल लगने और राजनीतिक हुंकार भरने के रूप में कायम है। इस त्योहार से कुमाऊं के लोकप्रिय कत्यूरी शासकों की एक अन्य परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसके तहत आज भी कत्यूरी राजाओं के वंशज नैनीताल जिले के रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर उत्तरायणी के दिन रानी जिया का जागर लगाकर उनका आह्वान व परंपरागत पूजा-अर्चना करते हैं।

उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम तथा अन्य जनान्दोलनों की बुनियाद है कुली बेगार

उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम तथा अन्य जनान्दोलनों की बुनियाद है कुली बेगारप्रमोद साह। 13 जनवरी 1921 मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के सरयूबगड़ में दस हजार से अधिक आजादी के दीवानों ने गुलामी और कलंक के प्रतीक कुली बेगार के रजिस्टर को सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर बेगार नहीं देने की शपथ ली. इस हिंसा रहित जनक्रांति के नायक हरगोविंद पंत चिरंजीलाल तथा बद्री दत्त पांडे आदि कुमाऊँ परिषद के नेता थे.

कुली बेगार उतार आंदोलन यद्यपि कुमाऊँ की एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय घटना थी लेकिन इसका संबंध देश में रौलट एक्ट की विरोध से उपजे सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन से भी था.

कुली बेगार का यह आंदोलन एक दिन में उपजे असंतोष का परिणाम नहीं था. कुली बेगार आंदोलन की उत्पत्ति और उस वक्त की सामाजिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम से कुमाऊं की सामाजिक संरचना को समझना होगा.

कुली बेगार आन्दोलन की पृष्ठभूमि
1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव कुमाऊँ में नहीं के बराबर था क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1815 के गोरखा शासन के उपरांत कोई नया अत्याचारी कर यहां नहीं लगाया था. इसकी वजह से यह क्षेत्र कंपनी शासन के विरुद्ध सामूहिक आकार नहीं ले पाया. यद्यपि काली कुमाऊँ चंपावत के कालू सिंह महर आदि ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध बगावत की थी और बगावत की यह चिंगारी अल्मोड़ा, नैनीताल तक भी पहुंच गयी थी, कुल मिलाकर कुमाऊँ तब भी शांत था.

1858 में जब शासन कंपनी से ब्रिटिश क्राउन को स्थानांतरित हुआ और रेल की खोज ने जंगलों के दोहन की नई कहानी शुरू कर दी, तो 18 64 मे वन विभाग की स्थापना की गई. वन सर्वेक्षक के रूप में बेवर की नियुक्ति की और 1868 में एसा प्रथम वन कानून लागू किया गया. जिसने उत्तराखंड के जंगलों में उत्तराखंड के गांव वालों के परंपरागत हक हकूक को समाप्त कर दिया. इससे भी बड़ी बात यह थी कि जो जंगल काटे जा रहे थे उनके ढुलान का कार्य गांव वालों के ऊपर बेगार के रूप में कर-स्वरुप थोप दिया गया.

विरोध की चिंगारियां
गांव मालगुजार और थोकदार के जरिए कुली बेगार के लिए रजिस्टर बना दिए गए. सब ग्रामीण बारी—बारी लाट साहब को बेगार में अपनी सेवाएं देते थे. इस प्रथा से उत्तराखंड वासियों के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंची और विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो गई.

1878 में नए वन कानून से वनों में प्रवेश तथा अन्य हकूको से स्थानीय नागरिकों को और अधिक कड़ाई से वंचित कर दिया. ग्रामीण समाज में इस कर व्यवस्था के विरुद्ध बड़ी गहरी छटपटाहट देखी जा रही थी. 1903 में जब लॉर्ड कर्जन बंगाल विभाजन से पूर्व भारत आए तो अल्मोड़ा में बुद्धिजीवियों के एक शिष्टमंडल ने लॉर्ड कर्जन को कुली बेगार के विरोध में एक प्रत्यावेदन दिया.

1903 में ही खत्याड़ी में सामूहिक रूप से बेगार करने से मना कर दिया गया और इसी वर्ष सोमेश्वर में भी एक ऐसी ही घटना घटित हुई. इस विरोध को जुर्माने के दंड और अन्य दमन की विधियों से कुचल दिया गया लेकिन अल्मोड़ा में सामाजिक सक्रियता के चलते ब्रिटिश हुकूमत ने इस विद्रोह की अनदेखी कर दी. 1905 के बंगाल विभाजन का असर उत्तराखंड में भी देखा गया. 1907 में अल्मोड़ा में एक विशाल सभा आयोजित की गई. बंगाल विभाजन के विरोध के साथ वनों में स्थानीय नागरिकों के अधिकार और कुली बेगार को लेकर भी बात की गई.

1907 में ही श्रीनगर गढ़वाल में गिरजा दत्त नैथानी ने कुली बेगार के विरोध में एक प्रत्यावेदन ब्रिटिश हुकूमत को प्रस्तुत किया और अपील भी जारी की. कांग्रेस की स्थापना के साथ ही कुमाऊँ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेना जारी था.

कुमायूं परिषद की स्थापना ने संघर्ष को दिए नए आयाम
सितम्बर 1916 मे कुमाऊँ परिषद की स्थापनासे यहां सामाजिक आंदोलनों में तेजी आ गई. प्रारंभ में यह एक समाज सुधारक संस्था थी लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए इसने तत्कालीन समाज का निर्माण किया.

परिषद का दूसरा सम्मेलन 1918 में हल्द्वानी में, तीसरा सम्मेलन 1919 में कोटद्वार में और चौथा सम्मेलन काशीपुर में हुआ जिसमें 1000 तक संख्या में लोगों की भागीदारी होने लगी. परिषद की सक्रियता ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से गहरे संबंध स्थापित किये और गढवाल में भी अनुसया प्रसाद बहुगुणा आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बडी संख्या मे कुमायूं परिषद के संपर्क मे आए।

1918 के कांग्रेस के दिल्ली सम्मेलन में 100 से अधिक प्रतिनिधि कुमाऊँ क्षेत्र से पहुंचे जहां कुली बेगार के विषय में राष्ट्रीय नेताओं तक यह बात पहुंचा दी गई और महात्मा गांधी को कुमाऊँ आने का निमंत्रण दिया गया.1919 के अमृतसर और 1920 के नागपुर के कांग्रेसी अधिवेशन में बड़ी संख्या में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने उत्तराखंड से भागीदारी की

अपने कुमाऊनी भाइयों से क्या कहा महात्मा गांधी ने
1920 के नागपुर अधिवेशन में बड़ी संख्या में कुमाऊँ से लोग पहुंचे थे. महात्मा गांधी को बेगार के बाबत बताया गया. महात्मा गांधी ने हरगोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे ,चिंरजा लाल आदि आंदोलनकारियों से कहा – “मेरे कुमाऊनी भाइयों से कह दो अब कुली बेगार देना नहीं होता.”

गांधी के इस वाक्य ने मंत्र का कार्य किया और पूरे कुमाऊं क्षेत्र में इस बार कुली बेगार के विरोध में एक स्वतःस्फूर्त लहर चल पड़ी.

एक घटना 1 जनवरी 1921 की है जब बागेश्वर के पास चामी गांव में 400 से अधिक लोगों ने खड़े होकर हरज्यू के मंदिर में शपथ ली कि वे कुली बेगार नहीं देंगे. फिर कुमाऊं परिषद के बागेश्वर अध्यक्ष शिवदत्त पांडे ने हरगोविंद पंत आदि को उत्तरायणी मेले में आने का निमंत्रण दिया.

बागेश्वर में इतिहास का सृजन
10 जनवरी को हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल, बद्री दत्त पांडे चेतराम सुनार सहित 50 से अधिक कार्यकर्ता कत्यूर होकर बागेश्वर पहुंच गए थे. जहां उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया 12 जनवरी को एक बड़ा जलूस ‘कुली उतार बंद करो’ के नारों के साथ बागेश्वर बाजार में घूमा जिसमें 10 हजार लोग थे. दूसरे दिन सरयू के बगल में 10 हजार से अधिक लोग एकत्रित हुए.

हरगोविंद पंत के आह्वान पर कुली बेगार के रजिस्टर सरयू में प्रवाहित कर दिए गए और लोगों ने सरयू के जल से संकल्प लिया कि अब भविष्य में कुली बेगार नहीं देंगे. डिप्टी कमिश्नर डायबिल मेले के दौरान डाक बंगले में ठहरा हुआ था. उसने हरगोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे और चिरंजीलाल को बुलाकर डांट-फटकार लगाई और कहा 1 दिन में कुली बेगार खत्म नहीं हो सकती। लेकिन इससे आंदोलनकारी नहीं डरे.
इन लोगों ने वापसी में यह संदेश जनता के बीच दिया.कि “यदि आपका साथ रहा तो कुली बेगार आज ही हटेगी अन्यथा यहां से मेरी लाश जाएगी ” यह वक्तब्य हरगोविंद पंत ने दिया ,जिससे जनता और अधिक उद्वेलित हो गई. बचे हुए रजिस्टर भी मालगुजार द्वारा सरयू नदी के जल में प्रवाहित कर दिए गए. अब जनता को मालगुजार और थोकदारो का भी समर्थन हासिल हो गया। डायबिल जनता के दबाव में था और बल प्रयोग नहीं कर सका.

एक तरफ बड़ी संख्या में बागेश्वर में स्थानीय नागरिक थे, वहीं डायबिल ल के पास मात्र 21 अफसर, 25 सिपाही और 500 गोलियां ही थी. इससे भी बड़ी बात यह थी कि थोकदार और मालगुजार भी पक्ष में न होकर जनता के साथ खड़े थे. और हिंसा रहित रक्त हीन क्रांति सरयू के बगड में संपन्न हुई।

हमें इस इतिहास पर गर्व है
इस प्रकार वर्ष 1921 में उत्तरायणी के दिन कलंक की बड़ी दास्तान यानी ” कुली बेगार “का समूचा हिसाब सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया गया. कुली बेगार आंदोलन की सफलता ने उत्तराखंड में आजादी की लड़ाई में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सरयू का यह संदेश कुमाऊँ तथा गढ़वाल के अन्य भागों में भी पहुंचा जहां आंदोलनकारियों का उत्साह द्विगुणित हो गया और आजादी की लड़ाई और तेज हो गई. आज भी उत्तरायणी मेले से नए राजनीतिक संकल्पों को लिए जाने की परंपरा जारी है हमें कुली बेगार के इतिहास पर गर्व है।

Ghughutiyaचंद शासन काल व भगवान राम भी से जुड़ी है घुघुती व मकर संक्रांति मनाने की परंपरा

नैनीताल। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार कुमाऊं के लोकप्रिय चंदवंशीय राजवंश के राजा कल्याण चंद को बागेश्वर में भगवान बागनाथ की तपस्या के उपरांत राज्य का इकलौता वारिस निर्भय चंद प्राप्त हुआ था, जिसे रानी प्यार से घुघुती कहती थी। राजा का मंत्री राज्य प्राप्त करने की नीयत से एक बार घुघुतिया को शडयंत्र रच कर चुपचाप उठा ले गया। इस दौरान एक कौए ने घुघुतिया के गले में पड़ी मोतियों की माला ले ली, और उसे राजमल में छोड़ आया, इससे रानी को पुत्र की कुशलता का समाचार मिला। इस खुशी में उसने संदेशवाहक कौए को तरह-तरह के पकवान खाने को दिए और अपने पुत्र का पता जाना। तभी से कुमाऊं में घुघुतिया के दिन आटे में गुड़ मिलाकर पक्षी की तरह के घुघुती कहे जाने वाले और पूड़ी नुमा ढाल, तलवार, डमरू, अनार आदि के आकार के स्वादिष्ट पकवानों से घुघुतिया माला तैयार करने और कौओं को पुकारने की प्रथा प्रचलित है। बच्चे उत्तरायणी के दिन गले में घुघुतों की माला डालकर कौओं को ‘काले कौआ काले घुघुति माला खाले, ले कौआ पूरी, मकें दे सुनकि छुरी, ले कौआ ढाल, मकें दे सुनक थाल, ले कौआ बड़, मकें दे सुनल घड़़…” आदि पुकार कर कौओं को आकर्षित करते हैं, और प्रसाद स्वरूप स्वयं भी घुघुते ग्रहण करते हैं। कौओं को इस तरह बुलाने और पकवान खिलाने की परंपरा त्रेता युग में भगवान श्रीराम की पत्नी सीता से भी जोड़ी जाती है। कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र का पुत्र जयेंद्र सीता के रूप-सौंदर्य पर मोहित होकर कौए के वेश में उनके करीब जाता है। राम कुश (एक प्रकार की नुकीली घास) के एक तिनके से जयेंद्र की दांयी आंख पर प्रहार कर डालते हैं, जिससे कौओं की एक आंख हमेशा के लिए खराब हो जाती है। बाद में राम ने ही कौओं को प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान कर पश्चाताप करने का उपाय सुझाया था। इस तरह उत्तरायणी हरेला की तरह कुमाऊं का प्रकृति व पर्यावरण से जुड़ा एक और त्योहार भी है।

सूर्य उपासना का पर्व भी है उत्तरायणी

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p style=”text-align:justify;”>नैनीताल। कुमाऊं में उत्तरायणी के दिन लोग सरयू, रामगंगा, काली, गोरी व गार्गी (गौला) आदि नदियों में कड़ाके की सर्दी के बावजूद सुबह स्नान-ध्यान कर सूर्य का अघ्र्य चढ़ाकर सूर्य आराधना करते हैं, जो इस त्योहार के कुमाऊं के भी देश भर के छठ सरीखे त्योहारों की की तरह सूर्य उपासना से जु़ड़े होने का प्रमाण है। तत्कालीन राज व्यवस्था के कारण कुमाऊं में इस पर्व को सरयू नदी के पार और वार अलग-अलग दिनों में मनाने की परंपरा है। सरयू पार के लोग पौष मासांत के दिन घुघुते तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को चढ़ाते हैं। जबकि वार के लोग माघ मास की सक्रांति यानि एक दिन बाद पकवान तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को आमंत्रित करते हुए यह पर्व मनाते हैं।

यह भी पढ़ें : हरेला: लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रया, जागि रया….

  • इस लोक पर्व की ठेठ कुमाउनी आशीषों में त्रेता युग में देवर्षि विश्वामित्र द्वारा भगवान श्रीराम को दी गईं ‘आकाश की तरह ऊँचे होने और धरती की तरह चौड़े होने’ की आशीषों का भाव भी होता है 
परंपरागत परिधानों में हरेला बोती महिलायें
तैयार हरेला के साथ परंपरागत परिधानों में बालिकायें

नवीन जोशी, नैनीताल। `लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रये, यो दिन यो मास भेटनैं रये, तिष्टिये, पनपिये, हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक, अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये, स्याव कस बुद्धि हो, स्यों जस तराण हो, दुब जस पंगुरिये, सिल पिसी भात खाये, जाँठ टेकी झाड़ जाए…´ यानी 10वें दिन कटने वाला हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे, बग्वाल तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीते रहो, जाग्रत रहो, यह शुभ दिन, माह तुम्हारी जिन्दगी में आते रहें, समृद्ध बनो, विकसित होवो, हिमालय में जब तक बर्फ है, गंगा में जब तक पानी है, आकाश की तरह ऊँचे हो जाओ, धरती की तरह चौड़े हो जाओ, सियार की सी तुम्हारी बुद्धि होवे, दूब घास की तरह फैलो, (इतनी अधिक उम्र जियो कि) भात भी पीस कर खावो….. यह वह आशीषें  हैं जो कुमाऊं अंचल में एक ऋतु व प्रकृति पर्व हरेला के अवसर पर घर के बड़े सदस्य सात अनाजों की पीली पत्तियों (हरेले के तिनड़ों) को बच्चों, युवाओं के सिर में रखते हुऐ देते हैं। इन ठेठ कुमाउनी आशीषों में त्रेता युग में देवर्षि विश्वामित्र द्वारा भगवान श्रीराम को दी गईं ‘आकाश की तरह ऊँचे होने और धरती की तरह चौड़े होने’ की आशीषों का भाव भी हैप्रियजन घर की बजाय दूर प्रवास पर सात समुद्र पार भी हों तो उन्हें हरेले के पीले तिनके चिटि्ठयों के जरिऐ भेजे जाते हैं, जिनका उन्हें भी वर्ष भर इन्तजार रहता है।

हरेला कुमाऊं में वर्ष में तीन बार, चैत्र माह के प्रथम दिन, श्रावण माह लगने से नौ दिन पूर्व आषाड़ माह में और आश्विन नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है, और इसी प्रकार नौ दिन बाद चैत्र माह की नवमी, श्रावण माह के प्रथम दिन और दशहरे के दिन काटा जाता है। श्रावण मॉस में मनाया जाने वाला हरेला बरसात के दिनों में पवित्र व शिव के माने जाने वाले श्रावण मास की संक्रांति को मनाया जाता है, इसी दिन सूर्यदेव दक्षिणायन तथा कर्क से मकर रेखा में प्रवेश करते हैं हरेले के लिए पांच अथवा सात अनाज गेहूं, जौं, मक्का, उड़द, सरसों, गहत, कौंड़ी, मादिरा, धान और भट्ट आदि के बीज घर के भीतर रिंगाल की टोकरियों अथवा लकड़ी के बक्सों में एक विशिष्ट पद्धति से पांच अथवा सात परतों में मिट्टी के साथ बोये जाते हैं, और प्रतिदिन नियमानुसार सुबह-शाम पूजा के बाद पानी दिया जाता है। धूप की रोशनी न मिलने के कारण यह पौधे पीले तिनकों के रूप में दिखते हैं। 10वें दिन यानी संक्रान्ति को इन्हें घर के बुजुर्ग अथवा महिलाऐं काटकर आशीषों के साथ पहले घर के मन्दिरों, फिर गांव के मन्दिरों, घर के द्वारों तथा बाद में बच्चों, युवाओं व बड़ों को एक विशेष  पद्धति से पांवों से शुरू करते हुऐ शिर में आशीषों  के साथ चढ़ाते हैं। माना जाता है कि जिस घर में हरेले के पौधे जितने बड़े होते हैं, उसके खेतों में उस वर्ष उतनी ही अच्छी फसल होती है। इस प्रकार इस पर्व से बिना सूर्य की रोशनी के दुरूह परिस्थितियों में पौधों को अधिक तेजी से उगाने की प्रेरणा भी मिलती है। इस त्योहार को उत्तम कृषि उपज, हरियाली, धनधान्य, सुख संपन्नता आदि से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव पत्नी सती को अपना कृष्ण वर्ण नहीं भाता था, इसलिऐ वह अनाज के पौधों, हरेले के रूप में गौरा रूप में अवतरित हुईं। इस पर्व को शिव विवाह से भी जोड़ा जाता है। इस दिन शिव पार्वती की पूजा का प्राविधान है।

हरेला, डिकारे व व्यंजन

डिकारों का भी है प्राविधान

हरेले की पूर्व संध्या को डिकारे बनाने का प्राविधान है। सामान्यतया लाल चिकनी मिट्टी से बिना किसी सांचे के शिव, गौरा एवं गणेश जी की मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें डिकारे कहा जाता है। कई बार डिकारे केले के तने, भृंगराज आदि से भी बनाऐ जाते हैं। इनमें पहले चावल के आटे से श्वेत तथा फिर किलमोड़े, अखरोट, पांगर के छिलकों, कोयले तथा विभिन्न वनस्पतियों के प्राकृतिक रंगों से रंग कर चेहरे की आकृतियां बनाई जाती हैं। शिव सामान्यता नीले तथा गौरा सफेद बनाई जाती हैं। 

देश में अन्य जगह भी मनाऐ जाते हैं ऐसे ही ऋतु पर्व

हरेला जैसे ही ऋतु पर्व देश के अन्य हिस्सों में कमोबेश समान एवं अलग तरीकों से मनाऐ जाते हैं। यहाँ उत्तराखंड के के गढ़वाल अंचल में हरियाला पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही झारखण्ड में बालिकाओं द्वारा अंकुरित बीजों के चारों ओर सामूहिक गायन के साथ इसी तरह का त्यौहार मनाया जाता है, राजस्थान में जौ के बीजों के साथ गणगौर पर्व, हिमाचल प्रदेश के लाहुल में शीत ऋतु में अंधेरे में जौं के पीले अंकुरों (यौरा) उगाने के रूप में, हरियाणा और पशिम बंगाल में दशहरे के दौरान तथा अरुणांचल  प्रदेश में भी ऐसे ही त्यौहार मनाऐ जाते हैं।

कई क्षेत्र पिछले शनिवार से हरेला पर्व पर भी अंधेरे में, अवकाश भी नहीं, इंटरनेट भी धड़ाम…

नवीन समाचार, नैनीताल, 16 जुलाई 2019। जनपद में पिछले शनिवार यानी 13 जुलाई को आई आंधी के बाद से विद्युत आपूर्ति सुचारू नहीं हो पाएगी। जनपद के दूरस्थ ओखलकांडा विकास खंड के सामाजिक कार्यकर्ता रमेश चंद्र टम्टा ने बताया कि विकास खंड के बबियाड़ ग्राम सभा सहित अधिकांश दूरस्थ गांवों में शनिवार के बाद से बिजली नहीं आई है। इसी तरह मुख्यालय के निकटवर्ती गेठिया के पल्ला मोड़ क्षेत्र में भी शनिवार के बाद से बिजली नहीं आई है। ऐसे में क्षेत्रीय ग्रामीणों को कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोक प्राकृतिक पर्व हरेला पर अंधेरे में ही रहना होगा। जनपद वासियों में मंगलवार देर शाम तक हरेला पर्व के लिए अवकाश घोषित न होने पर भी नाराजगी नजर आ रही है। लोगों का कहना है कि एक ओर सरकार हरेला पर्व के नाम पर प्रदेश भर में करोड़ों रुपए प्रचार एवं अन्य मदों में खर्च कर रही है, वहीं राज्य-जनपद वासियों को लोक पर्व मनाने के लिए अवकाश नहीं दे रही है। इधर मुख्यालय में अंग्रेजी माध्यम के सेंट जोसफ कान्वेंट व सेंट मेरीज कान्वेंट सहित कई स्कूलों में हरेला पर्व का अवकाश घोषित कर दिया गया है, जबकि सरकारी हिंदी माध्यमों के विद्यालयों में अवकाश घोषित नहीं किया गया है। बताया गया है कि पड़ोसी अल्मोड़ा जनपद में हरेला पर अवकाश घोषित कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष नैनीताल जनपद में भी हरेला पर्व पर अवकाश घोषित किया गया था।

मुख्यालय में इंटरनेट सेवाएं भी धड़ाम

नैनीताल। मुख्यालय सहित जनपद भर में लंबे समय एवं खासकर पिछले शनिवार को आये आंधी-तूफान के बाद से इंटरनेट की सेवाएं भी बेहद लचर हो गयी हैं। मंगलवार को मुख्यालय में रिलायंस जियो की सेवाएं कमोबेश पूरी तरह से ठप रही। खासकर अपलोड होने में अत्यधिक दिक्कतें रहीं। अन्य दूरसंचार प्रदाता कंपनियों के नेटवर्क में भी खासी समस्या आ रही है।

यह भी पढ़ें : कुमाऊँ के ऋतु, प्रकृति व लोक पर्व-हरेला, भिटौली, चैतौल और फूलदेई

देवभूमि उत्तराखंड में चैत यानी चैत्र का महीना यानी हिंदू कलेंडर विक्रमी संवत के अनुसार वर्ष का पहला महीना, यानी तीज त्योहारों का महीना। इस महीने का इंतजार न केवल यहां के लोगों का नया पंचांग शुरू होने, वरन सर्द हेमंत के बाद ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ कड़ाके की सर्दी से निजात मिलने तथा प्रकृति के सजने-संवरने और नयी फसल के तैयार होने का समय भी होता है। फसलें पक कर तैयार हो रही होती हैं। ऐसे समय में लोग त्योहार मनाते हैं। भाई दूर परदेश में ब्याही गई बहनों के लिए ‘भिटौली’ यानी उपहार ले कर जाते हैं, सो बहनों को भी वर्ष भर चैत्र संग भिटौली का इंतजार होता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में लोक देवता भी अपनी 22 गांवों में रहने वाली बहनों से मिलने निकलते हैं, और लोग इन गांवों में चैतोल मनाते हैं। इसी तरह उत्तराखंड में वर्ष भर लोक त्योहारों की श्रृंखला बनी रहती है।

💐💐फूल देई.. छम्मा देई… जानें इस लोक पर्व के बारे में सब कुछ💐💐

(चित्र साभार विनोद गढ़िया, ग्राम पोथिंग, बागेश्वर)

हिन्दू नव वर्ष यानी चैत्र महीने की 01 पैट (गते) को उत्तराखंड के कुमाऊं में मेष संक्रांति, फूल संक्रांति और फूल देई के नाम से मनाया जाता है। इस वर्ष  बसन्त ऋतु के स्वागत का यह त्यौहार 15 मार्च 2019 को समूचे उत्तराखंड में बड़ी धूम-धाम से फूल देई मनाया जा रहा है। उत्तराखंड की धरती पर अलग-अलग ऋतुओं के अनुसार पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं। ये पर्व एक ओर हमारी संस्कृति को उजागर करते हैं, तो दूसरी ओर प्रकृति के प्रति पहाड़ के लोगों के सम्मान और प्यार को भी दर्शाते हैं। इसके अलावा पहाड़ की परंपराओं को कायम रखने के लिए भी ये पर्व-त्योहार खास हैं। फूल संक्रांति यानी फूल देई का सीधा संबंध भी प्रकृति से है I इस समय चारों ओर छाई हरियाली और नाना प्रकार के खिले फूल प्रकृति के यौवन में चार चांद लगाते हैं।

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने से ही नव वर्ष शुरू होता है। इस नव वर्ष के स्वागत के लिए बसन्त के आगमन से ही पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। खेतों में सरसों खिल जाती है तो पेड़ों में फूल भी आने लगते हैं। इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली, फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं और एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, नारियल और इन फूलों को सजाकर हर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते हुये जाते हैं और देहरी का पूजन करते हुये पास-पड़ोस के घरों में जाकर उनकी दहलीज पर फूल चढ़ाते हैं और सुख-शांति की कामना करते हुए गाते हैं, और प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद भी अदा करते हैं।

” फूलदेई, छम्मा देई.…
जतुकै देला, उतुकै सही ।
देंणी द्वार, भर भकार,
सास ब्वारी, एक लकार,
यो देलि सौ नमस्कार ।
फूलदेई, छम्मा देई.…
जतुकै देला, उतुकै सही । “

इसके बदले में उन्हें परिवार के लोग गुड़, चावल व रुपये देते हैं। इस चावल व गुड़ आदि से शाम को चावल पीसकर इसके आटे का हलवा-‘सई भी बनाया जाता है, और विशेष रुप से प्रसाद स्वरुप ग्रहण किया जाता है।

इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है, होली के फाग की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है। वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गाते हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है।

उत्तराखंड में अनूठी है भाई-बहन के प्रेम की ‘भिटौली’ परंपरा

चैतोल

चैत्र माह में निभाई जाती है यह परंपरा, भाई देते हैं बहनों को सौगात

अनेक अनूठी परंपराओं के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखण्ड राज्य में भाई-बहन के प्रेम की एक अनूठी ‘भिटौली’ देने की प्राचीन परंपरा है। पहाड़ में सभी विवाहिता बहनों को जहां हर वर्ष चैत्र मास का इंतजार रहता है, वहीं भाई भी इस माह को याद रखते हैं और अपनी बहनों को ‘भिटौली’ देते हैं।

‘भिटौली’ का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से हैं। प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा उस दौर में काफी महत्व रखती थी। इसके जरिए भाई-बहन का मिलन तो होता ही था, इसके जरिए उस संचार के साधन विहीन दौर में अधिकांशतया बहुत दूर होने वाले मायकों की विवाहिताओं की कुशल-क्षेम मिल जाती थी। भाई अपनी बहनों के लिए घर से हलवा-पूड़ी सहित अनेक परंपरागत व्यंजन तथा बहन के लिए वस्त्र एवं उपलब्ध होने पर आभूषण आदि भी लेकर जाता था। बाद के दौर में व्यंजनों के साथ ही गुड़, मिश्री व मिठाई जैसी वस्तुएं भी भिटौली के रूप में दी जाने लगीं। व्यंजनों को विवाहिता द्वारा अपने ससुराल के पूरे गांव में बांटा जाता था। भिटौली का विवाहिताओं को बेसब्री से इंतजार रहता था। भिटौली जल्दी आना बहुत अच्छा माना जाता था, जबकि भिटौली देर से मिली तो भी बहनों की खुशी का पारा-वार न होता था। आज के बदलते दौर में भिटौली की परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में तो कमोबेश पुराने स्वरूप में ही जारी है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भाइयों द्वारा ले जाए जाने वाले व्यंजनों का स्थान बाजार की मिठाइयों ने ले लिया है। भाई कई बार साथ में बहनों के लिए कपड़े ले जाते हैं, और कई बार इनके स्थान पर कुछ धनराशि देकर भी परंपरा का निर्वहन कर लिया जाता है।

लोकगीतों-दंतकथाओं में भी है भिटौली

भिटौली प्रदेश की लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसके साथ कई दंतकथाएं और लोक गीत भी जुड़े हुए हैं। पहाड़ में चैत्र माह में यह लोकगीत काफी प्रचलित है-
ओहो, रितु ऐगे हेरि फेरि रितु रणमणी, हेरि ऐछ फेरि रितु पलटी ऐछ।
ऊंचा डाना-कानान में कफुवा बासलो, गैला-मैला पातलों मे नेवलि बासलि।।
ओ, तु बासै कफुवा, म्यार मैति का देसा, इजु की नराई लागिया चेली, वासा।
छाजा बैठि धना आंसु वे ढबकाली, नालि-नालि नेतर ढावि आंचल भिजाली।
इजू, दयोराणि-जेठानी का भै आला भिटोई, मैं निरोलि को इजू को आलो भिटोई।।

इस लोकगीत का कहीं-कहीं यह रूप भी प्रचलित है-

रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।
डाली में कफुवा वासो, खेत फुली दैणा।
कावा जो कणाण, आजि रते वयांण।
खुट को तल मेरी आज जो खजांण।
इजु मेरी भाई भेजली भिटौली दीणा।
रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।
वीको बाटो मैं चैंरुलो।
दिन भरी देली मे भै रुंलो।
वैली रात देखछ मै लै स्वीणा।
आगन बटी कुनै ऊँनौछीयो –
कां हुनेली हो मेरी वैणा ?
रितु रैणा, ऐ गे रितु रैणा।
रितु ऐ गे रणा मणी, रितु ऐ रैणा।।
भावार्थ :-

रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।
डाल पर ‘कफुवा’ पक्षी कूजने लगा, खेतों मे सरसों फूलने लगी।
आज तडके ही जब कौआ घर के आगे बोलने लगा।
जब मेरे तलवे खुजलाने लगे, तो मैं समझ गई कि –
माँ अब भाई को मेरे पास भिटौली देने के लिए भेजेगी।
रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।
मैं अपने भाई की राह देखती रहूंगी।
दिन भर दरवाजे मे बैठी उसकी प्रतीक्षा करुँगी।
कल रात मैंने स्वप्न देखा था।
मेरा भाई आंगन से ही यह कहता आ रहा था –
कहाँ होगी मेरी बहिन ?
रुन झुन करती ऋतु आ गई है, ऋतु आ गई है रुन-झुन करती।।

वहीं ‘भै भुखो-मैं सिती’ नाम की दंतकथा भी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बहन अपने भाई के भिटौली लेकर आने के इंतजार में पहले बिना सोए उसका इंतजार करती रही। लेकिन जब देर से भाई पहुंचा, तब तक उसे नींद आ गई और वह गहरी नींद में सो गई। भाई को लगा कि बहन काम के बोझ से थक कर सोई है, उसे जगाकर नींद में खलल न डाला जाए। उसने भिटौली की सामग्री बहन के पास रखी। अगले दिन शनिवार होने की वजह से वह परंपरा के अनुसार बहन के घर रुक नहीं सकता था, और आज की तरह के अन्य आवासीय प्रबंध नहीं थे, उसे रात्रि से पहले अपने गांव भी पहुंचना था, इसलिए उसने बहन को प्रणाम किया और घर लौट आया। बाद में जागने पर बहन को जब पता चला कि भाई भिटौली लेकर आया था। इतनी दूर से आने की वजह से वह भूखा भी होगा। मैं सोई रही और मैंने भाई को भूखे ही लौटा दिया। यह सोच-सोच कर वह इतनी दुखी हुई कि ‘भै भूखो-मैं सिती’ यानी भाई भूखा रहा, और मैं सोती रही, कहते हुए उसने प्राण ही त्याग दिए। कहते हैं कि वह बहन अगले जन्म में वह ‘घुघुती’ नाम की पक्षी बनी और हर वर्ष चैत्र माह में ‘भै भूखो-मैं सिती’ की टोर लगाती सुनाई पड़ती है। पहाड़ में घुघुती पक्षी को विवाहिताओं के लिए मायके की याद दिलाने वाला पक्षी भी माना जाता है। ‘घुर-घुर न घुर घुघुती चैत में, मकें याद उं आपणै मैत की’ जैसे गीत भी काफी लोकप्रिय हैं।

पिथौरागढ में भिटौली पर ‘चैतोल’ की परंपरा

चैतोल

कुमाऊं के पिथौरागढ़ जनपद क्षेत्र में चैत्र मास में भिटौली के साथ ही चैतोल पर्व मनाए जाने की एक अन्य परंपरा भी है। चैत्र मास के अन्तिम सप्ताह में मनाये जाने वाले इस त्योहार में पिथौरागढ के समीपवर्ती गांव चहर-चौसर से डोला यानी शोभायात्रा भी निकाली जाती है, जो कि निकट के 22 गांवों में घूमती है। चैतोल के डोले को भगवान शिव के देवलसमेत अवतार का प्रतीक बताया जाता है, डोला पैदल ही 22 गांवों में स्थित भगवती देवी के थानों यानी मंदिरों में भिटौली के अवसर पर पहुंचता है। मंदिरों में देवता किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित होकर उपस्थित लोगों व भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले की सोरघाटी में चैत्र मास में चैतोल या चैतोंला पर्व की धूम छा जाती है। चैत्र माह की एकादशी से मनाया जाने वाला यह पर्व पूर्णिमा को समाप्त होता है। सदियों से मनाया जा रहा यह पर्व धार्मिक आस्था और भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। वक्त के साथ साथ भले ही बहुत कुछ बदला हो मगर इस पर्व के प्रति यहॉ के लोगों का लगाव, उत्साह और पूरी श्रद्धा के साथ अभी भी उसी तरह बरकरार है जैसा सदियों पहले होता था।

सोरघाटी पिथौरागढ़ में चैतोल पर्व 22 गॉवों में मनाया जाता है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान के साथ भगवान शिव के भूमिया देव, देवल, बाबा की छतरी और देव डोला  तैयार किया जाता है। उसके बाद इस छतरी को सभी 22 गॉवों में घुमाया जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव व उनके भूमिया देव देवल आदि लोकदेवता माने जाने वाले गण इन 22 गॉवों में डोले और छत्र के माध्यम से अपनी 22 बहनों को भिटौली देने और अपनी प्रजा की रक्षा का वचन देने उनके गॉवों में इन दिनों भ्रमण करते हैं। डोले को चैत्र माह की एकादशी के दिन घुनसेरा गॉव से शुरु कर पूर्णिमा के दिन बिण, चैंसर, जाखनी व कुमौड़ होते हुये घंटाकरण शिव मंदिर लाया जाता है। इस दौरान लोग अच्छी फसल अच्छे स्वास्थ व समृद्धि की कामना करते हैं।

उत्तराखंड के ‘सरकारी हरेला महोत्सव’ से क्या मजबूत होगी परंपरा ?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंतराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की तर्ज पर उत्तराखंड में ‘हरेला’ पर्व मनाने की राजाज्ञा जारी कर दी है। राजाज्ञा के अनुसार हर गांव में सर्वश्रेष्ठ हरेला उगाने वाली महिला को एक वर्ष तक हर माह 500 रुपए दिए जाएंगे। इससे क्या लाभ होगा ? क्या महिलाएं और भी बेहतर हरेला मनाने को प्रेरित होंगी ? जबकि परंपरागत तौर पर वे सदियों से हरेला उगा रही हैं। दूसरे, क्या वे 500 रुपए का इनाम प्राप्त करने के लिए परंपरा तोड़ हरेले की टोकरी को गांव की समिति के समक्ष दिखाने जाएंगी। चलिए, इस जल्दबाजी में जारी राजाज्ञा में इस हेतु यह संशोधन भी हो सकता है कि समिति के लोग हर घर जाकर हरेले की टोकरियों का पुरस्कार हेतु परीक्षण करेंगे। यहां फिर समिति के सदस्यों को टोकरियों के स्थान मंदिर में समिति के सदस्यों को आने देने पर विवाद हो सकता है। विवाद ना भी हो, तो भी बड़ा सवाल यह है कि इस पुरस्कार व हरेला महोत्सव को इस रूप में मनाने से हरेला मनाने की परंपरा मजबूत होगी या टूटेगी ? बेहतर न होता कि हर गांव में सर्वाधिक पौधे लगाने व बचाने वालों को सरकार पुरस्कृत करती ?

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