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नैनीताल : महिलाओं को सह खातेदार बनाने की उठी मांग…

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-भीमताल से कांग्रेस के दावेदार बिष्ट ने महिलाओं को लेकर किया प्रदर्शन

महिलाओं के साथ रैली निकालते गोपाल बिष्ट व पूनम बिष्ट।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 16 नवंबर 2021। एक दिन पहले ही कांग्रेस के विधानसभा पर्यवेक्षक के समक्ष भीमताल सीट से दावेदारी करते हुए गोपाल बिष्ट ने मंगलवार को मुख्यालय के महिलाओं को संपत्ति में सहखातेदार बनाने की मांग पर ग्रामीण महिलाओं को साथ लेकर ताकत दिखाई। उन्होंने पत्नी-जिला पंचायत सदस्य पूनम बिष्ट के साथ क्षेत्र की ग्रामीण महिलाओं को लेकर यूपी जमीदारी अधिनियम 1950 में हुए संशोधन के अनुरूप अब तक महिलाओं को सह खातेदार बनाए जाने को लेकर तल्लीताल गांधी मूर्ति से जिला कलक्ट्रेट तक जुलूस निकाला और जिलाधिकारी को ज्ञापन सोंपा।

ज्ञापन के माध्यम से कहा गया कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकांश पुरुष सरकारी या निजी सेवाओं में अन्य प्रदेशों में कार्यरत हैं, जबकि गांवों मंे महिलाएं ही रहती हैं। लेकिन भूमि-संपत्ति पर पुरुषों का अधिकार होने के कारण महिलाएं स्वरोजगार-उद्यम करने के लिए वित्तीय संस्थानों से ऋण आदि लेने में असमर्थ रहती हैं। इस अधिनियम में 31 मई 2021 में हुए संशोधन के माध्यम से धारा 3, 130 क एवं 171 का अंतःस्थापन कर दिया गया है, किंतु आज तक इसे लागू नहीं किया जा सका है। इसे लागू किये जाने से जमीन की खरीद-फरोख्त के साथ गांवों में प्रचलित शराब पर भी लगाम लग सकेगी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-राज्य में महिलाओं के मुकाबले पुरुष नशबंदी महज 6 फीसद
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जनवरी 2019। उत्तराखंड में महिला और पुरुष नसबंदी में जमीन-आसमान का अंतर होने का बड़ा खुलासा हुआ है। नवंबर 2018 में राज्य बनने के बाद से अब तक 4,79,513 महिलाओं की और केवल 29,801 पुरुषों की नसबंदी हुई है। दोनों आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है कि महिलाओं की तुलना में केवल 6.21 फीसद पुरुषों के द्वारा ही नसबंदी कराई गयी है। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि राज्य की महिलाएं परिवार नियोजन में नसबंदी का स्थाई तरीका अपनाने में पुरुषों से 16 गुना से भी अधिक आगे हैं। जबकि आबादी, जागरूकता सहित अन्य सभी अन्य क्षेत्रों में पुरुष महिलाओं से कहीं आगे बताये जाते हैं।

यह खुलासा जनपद के सूचना अधिकार कार्यकर्ता हेमंत गौनिया द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना से हुआ है। सूचना के अधिकार में विभाग द्वारा न दी गयी जानकारी से इस स्थिति का बड़ा कारण भी स्पष्ट होता है कि विभाग इस गंभीर विषय में कितना गैरजिम्मेदार है। विभाग के पास मुख्यालय स्तर पर नसबंदी में खर्च हुई धनराशि के आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक परिवार नियोजन में कितने कर्मचारियों को कितनी धनराशि दी गयी है, इस प्रश्न पर निदेशालय का सूचना के अधिकार के तहत जवाब है-वांछित सूचना राज्य मुख्यालय में धारित नहीं है। सूचना के लिए पृथक-पृथक जनपदों के लोक सूचना अधिकारियों से आवेदन करें। यानी आवेदक से अनावश्यक तौर पर अतिरिक्त खर्च करने को भी कहा जा रहा है।

इसके अतिरिक्त यह बताया गया है कि पुरुष एवं महिला दोनों की नसबंदी पर करीब बराबर धनराशि दी जाती है। अलबत्ता नसबंदी करने वाले पुरुष को 2000 एवं महिला को 1400, जबकि आशा कार्यकत्रियों को पुरुषों को नसबंदी करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली 300 व महिलाओं को प्रोत्साहित करने पर 200 रुपए प्रोत्साहन के लिए दिये जाते हैं। जबकि एक पुरुष की नसबंदी करने पर विभागीय स्तर पर 2700 एवं महिला की नसबंदी करने पर 2000 रुपये खर्च होते हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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  • धूमधाम से हुआ बरगद व पीपल के पेड़ों का विवाह
  • हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में हुआ आयोजन
  • पुरानी चुंगी से बैंड बाजे के साथ निकली बारात, कुमाउनी परिधानों में ताकुला व रूसी की महिलाओं ने निकाली कलशयात्रा
  • मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ इन्हें कभी न काटे जाने का के संकल्प के साथ यह विवाह पेड़-पौधों के संरक्षण की अनूठी पहल भी है
बरगद एवं पीपल के विवाह समारोह में शगुन आखर, मंगलगान गाती महिलाएं।

नैनीताल। जी हां, धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध देवभूमि उत्तराखंड में युवा वट यानी बरगद और पीपल के वृक्षों ने आपस में ब्याह रचा लिया है। नगर के समीपवर्ती हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में लोग एक अनोखे विवाह समारोह के साक्षी बने। यह विवाह था मंदिर में लगे करीब 6 वर्ष की उम्र के वर के रूप में पीपल एवं करीब 4 वर्ष के कन्या के रूप में बट यानी बरगद के वृक्षों के बीच। 11 फ़रवरी को आयोजित हुए इस अनोखे विवाह में बाराती बने ताकुला और रूसी गांव के लोग, जिन्होंने न केवल बैंड बाजे पर युवक-युवतियों, बच्चों ने कुमाउनी नृत्य के साथ पुरानी चुंगी से मंदिर तक बारात निकाली तथा महिलाओं ने पारंपरिक कुमाउनी परिधानों में कलश यात्रा निकाली, वहीं हल्द्वानी मार्ग से गुजरते लोगों, सैलानियो जिसने भी इस अनूठे विवाह के बारे में सुना, ठिठक गया। इस प्रकार सैकड़ो लोग इस अनूठे विवाह के साक्षी बने। खास बात यह भी है कि इस धार्मिक आयोजन के बाद बरगद व पीपल के मंदिर में लगे धार्मिक आयोजनों, पूजा आदि के योग्य हो गये हैं, तथा इस प्रकार इन्हें मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ कभी न काटे जाने का संकल्प भी लिया गया है, जिसके साथ यह विवाह आयोजन पेड़-पौधों के संरक्षण का भी एक उपक्रम है।

Gamaraयह भी पढ़ें :  गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा) कुछ अंश : गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती…

बारात में बकायदा कुमाउनी विवाहों की धूलिअर्घ्य, शगुन आंखर व मंगलगान गाने, कन्या दान व फेरे सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान एवं भोज का आयोजन हुआ। वर पीपल के माता-पिता की भूमिका दीपा जोशी व पूरन जोशी ने, जबकि जबकि कन्या बरगद के माता पिता की भूमिका जानकी जोशी व सतीश जोशी ने निभा। आचार्य कैलाश चंद्र सुयाल ने मंत्रोच्चारण के साथ विवाह की सभी रस्में पूरी कराईं। आयोजन में नीरज जोशी, पान सिंह खनी, कैलाश जोशी, भगवती सुयाल, पान सिंह परिहार, अमन जोशी, गोविंद सिंह, चन्दन सिंह, हितेश, भाष्कर, चेतन, महेंद्र रावत, देवेश मेहरा, नवीन शर्मा, पान सिंह सिजवाली, महेश जोशी, विशाल व चन्दन बिष्ट सहित सैकड़ों ग्रामीणों ने भागीदारी की।

विवाह आयोजन के आचार्य पंडित कैलाश चन्द्र सुयाल ने बताया की उम्र में बड़े वृक्ष को वर एवं छोटे की कन्या के रूप में प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति वर एवं दूसरे कन्या के पिता के रूप में आयोजन को संपन्न कराते हैं, बाकायदा कन्या के पिता कन्यादान की परम्परा का निर्वाह भी करते हैं। यह पूरा आयोजन प्रकृति के अंगों को मानव स्वरुप में संरक्षित करने की भी पहल है। बरगद और पीपल के पेड़ों को काटे जाने की धार्मिक मनाही भी है।

इस आयोजन के लिए क्षेत्रवासी पखवाड़े भर पूर्व से ही पूर्ण विधि-विधान के साथ इस आयोजन की तैयारियों में उत्साहपूर्वक जुटे थे। नैनीताल के निकटवर्ती गांधी ग्राम ताकुला के युवा सामाजिक कार्यकर्ता नीरज कुमार जोशी ने बताया कि क्षेत्र में इस तरह का आयोजन पहली बार किया गया।  आयोजन की तैयारियों में आदि ग्रामीण जुटे हुए हैं।

बरगद एवं पीपल का धार्मिक महत्व
उल्लेखनीय है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद एवं पीपल के वृक्षों का धार्मिक महत्व व पर्यावरण की दृष्टि से विशेष महत्व है। बरगद को ब्रह्मा समान माना जाता है। वट-सावित्री सहित अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। वहीं पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास बताया जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने पीपल को स्वयं अपना स्वरूप बताया है। जबकि स्कंदपुराण में पीपल की विशेषता और उसके धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए इसके मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत देवों का निवास बताया गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुश्य के अंतिम संस्कार पीपल के वृक्ष के नीचे किए जाते हैं ताकि आत्मा को मुक्ति मिले और वह बिना किसी भटकाव के अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जाए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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